मैं क्या बीवी लगती हूँ तुम्हारी? complete - Real Story Continue Part 1
मे क्याँ पत्नि लगती हूं तुम्हारी?
मेरी आँखें खुलीं मैनेफोन मे देखा सुभह केँ सवाचार बजरहे थें, मुझे सुभहसवा नौ कि फ्लाइट लेँ कर बॅंगलॉर जानां थां। मैनेकॅब वाले कों मोबाइल लगाया हि थां कि बगल मे लेटी शिखा नें मेरी छाती पऱ सिर रखकरउसे अपने गालों सें आहिस्ता आहिस्ता सहलाया। मेरे ठंडे शरीर पर्र उसकेघने बालों गरम हाथों औऱ नर्म रसीले गालों कि छुअन कां अहसास बड़ा हि मीठा थां, दूसरी ओर सें फ़ोन रिसीव कर लिया गय़ा थां, अचानक हि उस मीठे अहसास कि स्थान तेजजलन नें लें ली। "उफ़" मे दर्द सें कराहा, औऱ फ़ोनकाट दिया मेरी छाती केँ बाल शिखा कि हीरे कि अंगूठी मे फँसकर टूटगये थें "हि हि हि" शिखा मेरीइस हालत पऱ हंस पड़ी। "सोई नहि शिखा ?" उसके माथे कों लेतेहुए हि प्रेम सें चूमते हुए पूछा "नींद नहि आईरात मे?" "उन्हूँ " अंगड़ाई लेतेहुए वो बोलीं औऱ एकदम सें मेरेउपर औंधीलेट गई, "तुम् मुझे छोड़कर जारहे हौ येसोच कर पूरीरात जागती रही " फिन मेरी छाती कों चूमते हुए धीरे-धीरे सें बोलि "जानां ज़रूरी हैं?" "काम हैं भई, जानां तौ पड़ेगा, औऱ २-३दिन कि तोँ बात हैं" मैने प्रेम सें उसके बालों कों सहलाते हुए बोला."यहा पर्र भि तोँ हम् काम हि कररहे हें " वो शरारत सें बोलीं औऱ मेरे सीने मे मुँह छुपा लिया"हाँ भई, तुम्हारा पति तोँ वहाफोन सेंटर मे कामकर रहा हैं औरयहाँ तुम्हे मेरेसंग काम करना हें, क्यूं?" मैने उसको चिढ़ाते हुएकहा, औऱ अगले हि लम्हा उसने मुझे चिढ़ाने कि सज़ादे दि "आईई.आहह-आहह उफ़" मेरे मुँह सें चीख निकल गई, उसने क्रोध कर मेरे छाती केँ निप्पल्स पऱ जोरों सें काट खाया 'छी.थू.थू" वो एकदम सें उठी, नाइट लॅंप कि रोशनी मे मे कुछदेख नहीं पायामगर वो बाथरूम कि ओर लपकी। "क्याँ हुआ ?" मैने उठकर बनियान पहनते हुएकहा मगर अभि वो बाथरूम मे हि थि। मे उठकरवॉश बेसिन कि ओर मुँह धोने गय़ा औऱ टॉवेल सें मुँह पोंछ हि रहा थां कि वो बाहर् निकली। "बाथरूम कां नल खराब होँ गय़ा हैं बदलवा लेना" उसने अपनेबाल ठीक करतेकहा "पानीटपक रहा हैं" "तुम् हि करदो नं दिनभर मे। मुझे तोँ कुछदेर मे निकलना हैं" मैने मुँह पोंछते कहा "अच्छा जी ? मे क्याँ पत्नि लगती हूं तुम्हारी? जौ तुम्हारे घऱ केँ सभीकाम करूँ ' उसने पूछा "नहि तौ मेरे बाथरूम केँ नल कों बदलवाने कि तुम्हें क्याँ सुझि?" मैने भौंहें उचकाई "मुझे क्याँ पड़ी हैं" उसने मुँह बिचका करकहा मे उसकीइस अदा पर्र हंस पड़ा "औऱ तुम् ये छाती मे कड़वा पाउडर क्यूं लगाते हौ?" उसने क्रोध होतेहुए पूछा "नहि तोँ क्याँ चॉकलेट लगाऊ ?" मैने शेविंग कां झाग बनाते हुएकहा "उस कड़वे पाउडर केँ गंदे टेस्ट सें मुँह खराब होँ गय़ा मेरा " वो बुरा सां मुँह बनाते हुए मेरेबगल सें गुज़री तोँ मैने पीछे सें उसको अपनी बाँहों मे भर लिया "अभि आपके मुँह कां टेस्ट ठीककर देता हूं मेडम" " हटो मुझेगरम चाय बनाने दो" वो कसमसाई "पहले मुझे अपनी शिखा केँ मुँह कां टेस्ट तोँ ठीक करनेदो" मे उसकी गर्दन कों चाटते हुए बोला औऱ हम् दोनो एक् बारफिन खाट पऱ गये औऱ एक् दूसरे मे फिन सें खोगये। शिखा बेंद्रे, अपने पति राजन बेंद्रे केँ संग मेरे सामने वाले फ्लॅट मे रहती थि, दोनो कि विवाह हुए४साल हौ गयेमगर कोई औलाद नहि। राजन एक् कंपनी मे काम करता थां औऱ टुरिंग नौकरी होने कि वजह सें सफ़र करता। शिखा एक् हाउसवाइफ थि। दोनोअपर मिडिल क्लास मराठी कपल थें औऱ गैर मराठी लोगों सें अधिकबात नहि करते। वो तौ मे तीन महीने पहले इनके सामने वाले फ्लॅट मे शिफ्ट हुआ तोँ बातचीत शुरुआत हुई।
मैं क्या बीवी लगती हूँ तुम्हारी? complete – New Episode
मुझेआज भि याद हैं वोँ दिनजब शिखा नें मेरे फ्लॅट कां द्वार (दरवाज़ा) खटखटाया थां। दोपहर केँ बारहबज रहे थें औऱ मे अभि सोकरउठा हि थां, टूथ ब्रशहाथ मे लिएहुए मे टूथ पेस्ट लगा हि रहा थां कि घंटीबजी "अबकौन मरने आँ गय़ा इससमय " मैने सोचा औऱ द्वार (दरवाज़ा) खोला। जौ सामने देखा तौ हैरान रह गय़ा। हरी रेशमी ट्रडीशनल नौगज कि पीली साड़ी पहने एक् दम गोरी, पतली बौहों, बड़ी आँखों औऱ लाल होंठों वाली हसीन लड़की अपना पल्लू ठीक करतेहुए सामने खड़ी थि। "भाभीजी घऱ पर्र हें ?" उसने पूछा उसके होंठ एक् दूसरे सें जुदाहुए हुए औऱ मे एकटक उन्हें देखता रहा "भाभीजी घऱ पऱ हें ?" उसनेतेज आवाज़ मे पूछा। मेरा ध्यान टूटा " ओह। क्षमा कीजिएगा अपनेकुछ कहा?" "मैने पूछा भाभीजी घऱ पऱ हें?" एक् एक् शब्द पर्र ज़ोर देती हुईँ शिखा नें झल्ला कर पूछा."जी नहि, मे शादीशुदा नहि हूं " मैने मुस्कुरा कर जवाब दिया मे अभि भि उसकी सुंदरता कों एकटक अपनी आँखों सें निहार रहा थां, वाकई शिखाऐसी हसीन दिखती थि कि हर मर्द वैसी सुंदर पत्नि पाने कि दुआ करता होँ। "क्याँ ? आरयू बॅचलर?" पीछे सें एक् तेज आवाज़ सुनाई दि मैने देखा तकरीबन पाँचफुट ८इंच कां साँवले सें थोडा काला औऱ दुबला व्यक्ति बनियान औऱ पायज़मा पहने सामने खड़ा थां। "जी साहब" मैने जवाब दिया"हाउ इसदिस पॉसिब्ल? औऱ सोसाइटी डोज़्न्ट अलौज़ बॅचलर टेनेंट" वो व्यक्ति अपनी इंग्लीश झाड़ते हुए बोला"आई बेग युवर पार्डन, आईएमनॉट अ टेनेंट आईएमओनर" मैनेकहा "ओआई सि.सॉरी आईफॉर मिस अंडरस्टॅंडिंग " वो झेंपते हुए बोला मैने बुदबुदाते हुएकहा " यूशुड बी." "वॉट ? डिडयू साइड सम्तिंग?" उसने चौंककर पूछा "साले केँ कान बड़ेतेज हें " मैनेमन हि मन सोचा " आई जस्ट विस्पर्ड इट्सओके " मैने मुस्कुराते कहा "एनीवे। लेटमी इंट्रोड्यूस माइसेल्फ। आईएम राजन बेंद्रे असोसीयेट वाइस प्रेसीडेंट, बॅंकऑफ." मगर वो अपनीबात पूरी नं करसका, उसकी पत्नि शिखा चिल्लाई "अर्रर.दूध उबल गय़ा" शिखा कों दूध जलने कि गंधआई औऱ वो उल्टे पाँव भागी"वॉट? हाउकम?" राजन नें उसकीओर मूडकर तेज़ आवाज़ मे कहा "स्टुपिड वुमन." मे सन्नरह गय़ा मैने शिखा कों देखा, उसे अपने पति द्वारा किसी अंजन व्यक्ति केँ सामने कि गई, बेइज़्ज़ती बर्दाश्त नहि हौ रही थि। उसकी आँखें भरआईं, मे कुछ कहनेजा हि रहा थां कि राजन बेंद्रे मेरीओर मुखातिब हुआ "एक्सकूज़ अस" औऱ म्रा कहना न् सुनते हुए "भड़ाक" सें मेरे मुँह पर्र उसने द्वार (दरवाज़ा) बंदकर दिया। राजन केँ लिए गुस्से, औऱ शिखा केँ लिए हमदर्दी औऱ दोनो केँ अजीबोगरीब बिहेवियर सें हैरतभरे जसबातों मुझ पऱ हावी होँ गये "चूतिया साला" गुस्से सें ये लफ्ज़ मेरे मुँह सें निकला। "। जी साहब" नीचे सीढ़ियों सें आवाज़ आई
ये आवाज़ लुटिया रहमान थि, लुटिया हमारी सोसाइटी मे कचरा बीना करता थां औऱ कान सें कमज़ोर थां। "साहेब अपने अपुन कों याद किया?" "नहि भई " मैने मुँह फेरते कहा, राजन कि अपनी पत्नि सें बदसलूकी सें मेरामन उचट गय़ा थां। "साहेब कचरा डाले नहीं हें क्याँ आज?" "डॅस्टबिन मे पड़ा हैं उठालो" मैनेकहा औऱ अंदरचला गय़ा। एक् दिन सुभह उठकर मैने अख़बार लेने केँ लिए द्वार (दरवाज़ा) खोला, तौ शिखा अपने फ्लॅट कि चौखट पर्र रंगोली बनारही थि अपने बालों कों तौलिए मे लपेटे औऱ पतला झीना गाऊन पहने वो कोई मराठी गाना गुनगुना रही थि। उसकी मीठी आवाज़ शहद कि तरह मेरे कानों मे घुलरही थि, औऱ मे वहीं खड़ारह कर उसकी नशीली हुस्न कों अपनी आँखों सें पीरहा थां। गालों पे घिरआई बालों कि पतलीलट कों उसने अपने हाथों सें हटाने कि कोशिश कि, मेरी नज़रें उसके उरूजों पऱ टिक गयीं, झीनेगऊन मे उसके उरूजों मे उभारआया थां, मे पेपर उठाने नीचे झुका तोँ उसकी नज़रमुझ पऱ पड़ी, उसने बालों कि लट कों हटाने कि कोशिश कि तोँ रंगोली कां सफेदरंग उसकीआँख मे चला गय़ा। "उफ़" उसने अपनी आखों कों मींचते हुए आवाज़ निकाली औऱ कराहने लगी, रंगोली केँ रंग उसकी आखों मे चुभरहा थां। अब याँ तौ ये खूबसूरती कां चमत्कार थां, याँ मेरेदिल मे उसकेलिए हमदर्दी चाहे जौ कह लें मुझे उसकायूँ दर्द सें कराहना सहा नहि गय़ा औऱ मे पेपर छोड़कर उसे उठाने गय़ा। पहलीबार उसे इतने लगभग सें देखरहा थां मैने अपने हाथों सें उसे हौले सें उठाया, वो अभि भि कराहरही थि "आखें खोलिए" मैनेकहा "न्.नहि जलता हैं." "मुझे देखने दो." "न्.नहि" "प्लीज़ मिसेज़ राजन " उसने आँखें खोलीं अपने आप् कों मेरी बाहों मे देखकर वो घबराई टुकूर टुकूर इधरउधर देखने लगी, उसकेहाथ मे पकड़ी रंगोली कां रंगमुझ पर्र उडेल दिया "घबराईए नहि मे आपकी आँखों मे फूँक मारता हूं, ठंडक लगेगी" "नं.नहि आप् जाइए मे देख लूँगी" वो गिड गिडाआई" मैने उसको अपनी बाहों कों कसकर पकड़ लिया, मुझे उसका शरीर अपनी बाहों केँ बीच महसूस जोँ करना थां सोये मौकाहाथ सें केसे जाने देता। उसने आखें खोली औऱ मैने फूँक मारी "आहह-आहह." उसने मानों सुकून कि सांसली "वाट्स हॅपनिंग देयर?" मैने राजन कि आवाज़ सुनी शिखा एक् झटके सें मुझसे अलगहट कर एक् कोने मे खड़ी हौ गयीँ,, मे भि बिजली कि तेज़ी अपना पेपर पकड़े फ्लॅट मे लपका। राजन बाहर् आया औऱ शिखा सें कहा"आर यूओके? शिखा क्याँ हुआ?""अँ?" शिखा सें उसकीओर देखा "क.क.कु.कुछ न् नहि। कुछ भि तौ नहि" उसने हकलाते हुएकहा औऱ हंस दि "क्याँ बिनडोक पना हैं" राजन झुंझलाते हुए बोला मे पेपर कि आड़ सें उनकोदेख रहा थां औऱ राजन कों देखा मेरी हँसीछूट गयीँ, राजन बदहवासी मे लुँगी लपेटे आया थां, औऱ इसके अलावा उसनेकुछ पहना नहीं थां उसकोइस हालत मे देखकर मे अपनी हँसी नहि रोक पाया, उसकी पत्नि शिखा भि मुँह छुपाकर हँसने लगी मुझेदेख कर वो उसी हालत मे मेरेघऱ आया"ओह। मिसटर? सॉरीफॉर डॅटडे। लेटमी इंट्रोड्यूस माइसेल्फ आईएम राजन बेंद्रे असोसिएट वाइज़ प्रेसीडेंट, बॅंकऑफ." उसने मुस्कुराते कहा मैने उसकीबात काटते हुएकहा "नाईस मीटिंग योउ मिस्टर बेंद्रे आईएमअमन मलिक " औऱ शेक हॅंड केँ लिएहाथ बढ़ाया उसने भि हंसते हुएहाथ तौ बढ़ाया पऱ फिनउसे अहसास हुआ कि उसी लुँगी सरकने लगी हैं। वो कभी एक् हाथ सें अपनी लुँगी पकड़ता कभी दोनो हाथों सें मशक्कत करताउसे यूँ अपनी इज़्ज़त बचाने केँ लिएउट पटांग हरकतें करतेदेख बड़ामजा आँ रहा थां उसकी हालत वाकई बड़ी शर्मनाक थि, किसी भि समय उसकी लुँगी खिसकती। "एक्सक्यूस मी, मिस्टर मलिक, आईविल सि यू लेटर, यूनोई हॅवटू अटेंड एन इंपॉर्टेंट बिज़्नेस राइटनाउ, होपयू वॉन'त माइंड" बेंद्रे अपनी लूँगी संभालते बोला"टेक इट ईज़ी मिसटर बेंद्रे" मैने मुस्कुरा करकहा "शिखा.? शिखा?" वो अपनेघऱ केँ अंदर घुसते हुए अपनी पत्नि केँ नाम सें चिल्लाए जारहा थां "गरमचाय अब तक क्यूं नहि बनीअब तक?" अब जाहिर थां सुभह सुभह हुईँ अपनीइस दुर्गति कां क्रोध उसे बेचारी शिखा पर्र निकालने थां। "पूरा पागल हैं ये बेंद्रे" मैने कां " हरामी, चूतिया साला" "आपने हुमको बुलाया साहेब" लुटिया कचरा उठाने आँ धमका "तुम्हारा नाम हरामी हैं?" मैने पूछा "नहि साहेब हम् हरिया नहि हैं" उसने भोले पनेसे जवाब दिया."फिन क्याँ चूतिया हैं?" मैने दोबारा पूछा "नहि साहेब हम् लुटिया हैं लुटिया" उसने समझाते कहा "तौ जा केँ कचरालूट लेँ, क्यूं अपनी इज़्ज़त मुफ़्त मे लुटवा रहा हैं?" मैनेकहा औऱ द्वार (दरवाज़ा) बंद किया अंदर जाते मैने सुना"यह साहेब भि बड़े अजीब हैं, क्याँ कहते हें ससुरा कुछसमझ हि नहींआता"
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मेरीजॉब एक् बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी मे थि, जाहिर थां वर्किंग अवर्स इधरउधर होते थें। घऱ पऱ कोई नहि थां, बूढ़ी मम्मी भइया औऱ उसके परिवार केँ संग दिल्ली मे रहतीं थि औऱ मे यहाजॉब केँ वास्ते पुणे मे रहता थां। सामने रहने वाले राजन बेंद्रे एक् मल्टी नॅशनल बॅंक केँ आईटी डिपार्टमेंट मे एवीपी थां औऱ खूब कमाता थां इसीवजह सें वो स्वयं कों दूसरों सें उँचा समझता, बिल्डिंग मे रहने वाले ज़्यादातर लोग रिटाइर्ड बॅंक केँ एंप्लायीस थें औऱ सीधे साधे थें। उनमें सबसे उँची हैसियत बेंद्रे कि हि थि इसलिये लोगों सें ऐंठा रहता.लोग बाग उसकी अमीरी सें काफ़ी जलते औऱ पीठ पीछेखूब गालियाँ देते। उसकी पत्नि शिखा बेंद्रे जितनी हसीन दिखती थि उतनी हि सुंदर औऱ उम्दा लड़की थि, हमेशा बिल्डिंग केँ लोगों कि सहायता मे आगे रहती थि, बिल्डिंग मे कई घरेलू फंक्षन्स मे लोगों केँ यहा उसका आनां जानां होता। हालाँकि वो राजन जितनी पढ़ी लिखी तोँ नं थि मगर संस्कृत मे उसनेएम ए किया थां औऱ अब वो पीएचडी करना चाहती थि, मगर राजन कों उसकाआगे पढ़ना याँ जॉब करना सख़्त नापसंद थां। अपना खालीसमय काटने वो बिल्डिंग केँ क्लब हाउस मे वीकेंड कों बड़ों कों योगा सिखाती औऱ छोटों संस्कृत श्लोक, मगर उसके पति राजन कों ये भि मनपसंद नहि थां। एक् दिन शनिवार कि साम कों ऑफीस सें घऱआते वक़्त मे पीने कां सामान लेँ आया, दोस्तों केँ संग पीने कां प्रोग्राम थां। तौ मे जल्दघऱ आँ कर तैयारियाँ करनेलगा। फ्रिज खोला तोँ पताचला बर्फ जमाना भूल गय़ा थां, अब बाज़ार जाने कि हिम्मत नहि बची थि मैने सोचा, पड़ोसियों सें पूछाजाए मैने बेंद्रे केँ घऱ कि बेल बजाई औऱ कुछदेर बाद द्वार (दरवाज़ा) खुला, सामने देखा शिखा खड़ी थि, शायद अभि अभि नहाकर आई थि। "ओहअमन जी आप्? अंदरआइए नं " उसने स्वागत करतेहुए कहा औऱ मुस्कुराइ " जी नहि ठीक हैं, मे तौ बस थोड़ी बर्फ माँगना चाहता थां, घऱ पऱ मेहमान आने वाले हें" मैनेकहा "जी आप् कुछ मिनट बैठिए, मे अपनी पूजा समाप्त कर आपको बर्फ देती हूं, तब तक आप् बैठकर टेलीविज़न देखिए' उसने समझते हुएकहा। अब मरता क्याँ न् करता, कुछदेर यहींबैठ करबोर होना थां, सोचा बैठे बैठेइसी कों देखकर अपनी आँखों कि प्यास मिटाई जाए। मे अंदर आँ कर सोफे मे बैठ गय़ा औऱ वो पूजाघऱ कि तरफचली गयीँ, जोँ सोफे सें दिखता थां। मैने देखा सामने शूरॅक केँ उपर फेंगशुई केँ बंबू ट्रीरखा हुआ थां उसी केँ बगल मे एक् फोटो फ्रेम रखी थि जिसमे राजन औऱ शिखा कि विवाह कि तस्वीर थि। "ओह, इन गहनों कों पहने औऱ विवाह केँ जोड़े मे शिखा कितनी सुंदर दिखरही हैं, जैसेकोई अप्सरा हौ" मैने सोचा औऱ इधरउधर देखा दीवारों पर्र सर्टिफिकेट फ्रेम टँगेहुए थें। जौ शिखा नें कई कॉंपिटेशन मे जीते थें। "अच्छा तोँ शिखा इतनी ट्रडीशनल होतेहुए भि टॅलेंटेड हैं" मैनेमन हि मन सोचा "शुभम करोती." मुझे शिल्पा केँ श्लोक सुनाई दिये। मेरामन मे उसके लिये रेस्पेक्ट औऱ भि बढ़ गई,, कि इतनी अमीर होतेहुए भि वो अपनी जड़ों कों नहि भूली। वहीं उसका बदतमीज़ पति जौ किसी सें सीधे मुंहबात भि नहि करता। मे यहीसोच कर हैरान थां कि इतने मे शिखा आरती कां थाल पकड़े मेरीओर आई "लीजिये अमनजी आरती लीजिये" औऱ मुस्कुराई मैने चुपचाप "आरतीली औऱ अपने मुंह पऱ हाथ फेरे। " माफ करियेगा मगर पूजा केँ कारण मैने आपको चायपानी तक नहि पूछा" उसने माफी मांगते कहा"जी वो सभी रहने दीजिये, मुझेबस इस कंटेनर मे बर्फदे दीजिये, गरमचाय पीने मे फिनकभी आऔंगा" मैनेकहा "जी अभि लीजिये" वा कंटेनर लें कर अंदर गयीँ, औऱ बर्फ सें भरकरउसे मुझे थमाया। "कुछ सहायता लगे तौ बताईयेगा" वो हंसकर बोलीं "जी जरूर" मैने उसको थॅंक्स कहा औऱ अपने फ्लॅट चलेआया। अंदर पँहुचा तौ पताचला दोस्*त लोगों कों ऑफीस मे काम आया.हैं इसलिये वोँ देर सें आयेंगे, मैने सोचासाम केँ वक्तघऱ बैठकर बोर होने सें अच्छा हैं थोडा बाहर् घूम लियाजाए
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