चूत के चक्कर में - चूत की कहानी - Episode 1
बुर केँ चक्कर मे
मित्रो आपने इससे पहले मेरी रचना अनोखा सफर कों जौ प्रेम औऱ स्नेह दिया उसकेलिए धन्यवाद। उम्मीद हैं आप् मेरी याँ रचना कों भि वैसा हि आशीर्वाद देंगे। धन्यावाद।
रामलाल आज अपनी सेना कि जॉब छोड़कर वापस अपने गाँवलौट रहा थां। 18 साल कि उम्र मे सेना मे भर्ती हुआ रामलाल अंग्रेजो कि सेना मे युद्ध लड़ाफिन भारत केँ आजाद होने केँ बाद भि वोँ भारतीय सेना मे रहा। अब 14 वर्ष कि सेना कि जॉब छोड़ वोँ वापस देहात लौटरहा थां। करता भि क्याँ रामलाल, इसी वर्ष उसके पिता स्वामीनाथ कां स्वर्गवास होँ गय़ा, माता कि तोँ उसके बचपन मे हि मृत्यु होँ चुकी थि, कुछ वर्ष पूर्व उसकी पत्नि कमला कों भि गाँव मे फैले हैजा नें लील लिया थां। अब गाँव पे उसकेखेत औऱ घऱ कि देखभाल करने वालाकोई नहि थां अतः रामलाल नें अपनी फ़ौज कि जॉब छोड़ गाँव लौटने कां फैसला किया।
32 वर्षीय रामलाल स्वयं कों अब बहोत अकेला महसूस कररहा थां जबतक उसकी पत्नि कमला जीवित थि तबतक तौ वोँ गाँवआता जाता रहता थां पर्र उसके मरने केँ उपरान्त उसने गाँव आनां हि छोड़ दिया। भगवान् नें उसेकोई औलाद भि नहि दि थि जिसके सहारे वोँ बाकी कि जीवन काटे। कई लोगो नें उसको दुबारा शादी करने कि सलाह दि पर्र रामलाल अब दुबारा इस व्यर्थ केँ झंझटों मे नहि फंसना चाहता थां। बस एक् समस्या थि उसके सामने कि वोँ अपनीठरक कों केसे शांत करेगा। रामलाल नें सोचा किसी नं किसीतरह वोँ गाँव पहुचकर एक् परमानेंट बुर कां जुगाड़ करेगा।
सामढल चुकी थि औऱ रामलाल भि अब गाँव पहुच चूका थां। गाँव कि चौपाल पे कुछ बुजुर्ग बैठकर हुक्का फूंकरहे थें। उनमे सें एक् गाँव केँ मंदिर कां पुजारी माधव थां दूसरा गाँव कां सरपंच लखन औऱ तीसरा गाँव केँ मौलवी साहब बिलाल मियां थें।
रामलाल नें पास पहुचकर सबको प्रणाम करतेहुए कहा " पुजारी जी प्रणाम लखन ताऊ रामराम औऱ मौलवी साहब आदाब "
रामलाल कों देखते हि तीनोखुश होँ गए। लखन सिंह बोले " आओ रामलाल बेटा बैठोकब आये ?"
रामलाल " बस ताऊ अभि आया "
तभी पुजारी जीबोल पड़े " औऱ सुनाओ रामलाल शहर मे क्याँ हालचाल हैं ?"
रामलाल " सभी बढ़िया हैं पुजारी जी आप् केसे हैं औऱ पुजारन जी कैसी हें। "
पुजारी " हम् दोनों बहोत अच्छे हें। "
अब मौलवी साहब भि बोल पड़े " औऱ रामलाल तुम्हारे पिताजी केँ जाने केँ बाद तोँ हमारी गोल हि टूट गयीँ, तुम् कितने दिन केँ लिएआये होँ ?"
रामलाल " मौलवी साहबअब तोँ मे यहीं गाँव मे रहूँगा औऱ घऱ औऱ खेती कि देखभाल करूँगा। "
मौलवी साहब " यह तोँ बहोत अच्छा हैं बेटा तुम्हारे यहा रहने सें तुम्हारे पिता जी कि कमीहमे नहि खलेगी। रोजआते रहना चौपाल पे हमसे मिलने हम् भि मियां गप्पे मारेंगे तुम्हारे संग "
रामलाल " जी मौलवी साहब "
लखन सिंह " आजरात कहां खानां वाना खाओगे चलो मेरेघऱ चलो वहींआज भोजनकरो फिनघऱ जानां। "
रामलाल " नहि ताऊ आज नहि फिनकभी। रमुआ होगाघऱ पे औऱ उसकी महरी भि वही खानां बना देंगे आज मेरा। "
लखन सिंह " रमुआ तोँ कहींपी पा केँ पड़ा होगा ससुरा पर्र हाँ उसकी महरी कजरी होगीघऱ पे। ठीक हैं पऱ एक् दिन हमारे यहा भि भोजन करनेआओ "
रामलाल " जी ताऊ "
रामलाल तेजी सें अपनेकदम घऱ कि तरफ बढ़ाता हैं। रामलाल कां घऱ अधिक बड़ा तौ नहि थां प्राचीन खपरैल कां घर-मकान। आगे कि तरफ एक् खुला आँगन थां जौ चारोओर सें कच्ची दिवार सें घिरा थां। पीछेदो कमरे औऱ एक् किचनघऱ थां।
रामलाल नें घऱ पहुचकर घऱ कां ताला खोला औऱ अपना सामान बरामदे मे रखा। अंदर केँ कमरे सें एक् चारपाई निकाल केँ वोँ आँगन मे बिछा दि। उसने अपना पेंट बूसट निकाल दिया औऱ बनयान औऱ धोतीपहन ली।
उसकोभूख लगी थि तौ उसने रामू कों बुलाने कि सोची। रामू रामलाल केँ घऱ सें अलगकुछ दूर पर्र बनी झोपडी मे रहता थां।
रामलाल रामू कि कुटिया केँ पास पहुँचा औऱ रामू कों आवाज़ देके बुलाया " रमुआओ रमुआ कहां हैं बे "
तभी उसकी दुल्हन कजरी अंदर सें घूँघट मे निकली " मालिक पाई लागु हमरे मर्द तौ अभही नहि हें "
रामलाल " अच्छा कहां गवा हैं रमुआ "
कजरी " कहां गए होइहे मालिक बसउहि मुई दारू केँ ठेके पे पड़े होंगें। "
रामलाल " ठीक हैं मुझेभूख लगरही हैं जराकुछ बनादो। "
कजरी " अभि लो मालिक "
कुछदेर बाद कजरी रामलाल केँ घऱ केँ आँगन मे बने मिट्टी केँ चूल्हे मे लकड़ी डाल उसपर खानां पकारही थि। रामलाल वही बिस्तर पे लेटाउसे देखरहा थां। रामलाल कों वोँ दिन भि याद आँ गय़ा जब रमुआ कि मम्मी कजरी कां ब्याह रमुआ सें करा केँ लाई थि। दोनों कि विवाह बचपनमें हि कर दि गई, थि। कजरी अपनेनाम स्वरुप हि रंग सें अत्यंत हि काली थि। इतना कि जब वोँ हंसती थि उसके दांतो कि मात्र सफेदी उसके चेहरे पे मात्र दिखाई देती थि। अब वोँ 20 22 साल कि हौ गई, थि। रामलाल नें एक् बारउसे अपना परमानेंट जुगाड़ बनाने कि सोची पर्र उसके काले हाथो कों देख विचार त्याग दिया।
कुछदेर बाद वोँ खानां बना केँ चली गई, रामलाल नें भोजन किया औऱ दिनभर कि थकान केँ कारण हि जल्द हि वोँ सो गय़ा।
अगलेदिन सुभह रामलाल कि आँख खुली तौ सूरजसर पे चढ़आया ता। रामलाल उठा औऱ घऱ सें बाहर् निकलआया देखा तौ कजरी उसकी भैसों औऱ बैलों कों चाराडाल रही थि। रामलाल सामने लगेनीम केँ पेड़ सें दातून तोड़ लाया औऱ घऱ केँ अंदर आँ केँ अपने दांत घिसने लगा। फिन रामलाल नें कुल्ला किया औऱ लोटाउठा केँ घऱ केँ पिछवाड़े झाड़ियों मे संडास करनेचला गय़ा।
रामलाल नें एक् स्थान झाड़ियों केँ पीछेसाफ स्थान देखकर बैठ गय़ा औऱ संडास करनेलगा। तभी उसने देखा कि कजरी वहां आँ गई,। उसने एक् बारइधर उधरनजर दौड़ाई मे चूंकि झाड़ियों केँ पीछे थां इसलिये उसे दिखाई नहि पड़ा। उसे शायद मूतना थां तौ उसने अपनी साड़ी कों घुटनों तक उठाया औऱ वहीबैठ गयीँ,। रामलाल कों अब उसकी काली बुर मे सें झांकती उसकी गुलाबी मुनिया साफ़ साफ़ दिखाई देरही थि। बुर देखकर रामलाल कां लन्ड भि खड़ा हौ गय़ा। उधर कजरी केँ मूत्रद्वार सें सि कि आवाज़ केँ संग पानी कि एक् धारछूट गई,। मूतने केँ बाद वोँ उठी औऱ वहां सें चली गयीँ,। रामलाल अपने लन्ड कों शांत करने केँ लिए वहीँ बैठे बैठेमुठ मारी। फिन वोँ अपनाकाम निपटा केँ वापस अपनेघऱ नें आँ गय़ा।
घऱआके रामलाल नें स्नान किया औऱ कुरता धोतीपहन केँ घऱ सें बाहर् निकला। बाहर् कजरीहाथ मे गरमचाय कां गिलास लिए उसकीतरफ आँ रही थि। रामलाल कों देख उसने घूघट लेँ लिया औऱ बोलि " मालिक गरमचाय पी लीजिये। "
रामलाल नें उसके हाथों सें गरमचाय कां गिलास लेँ लिया औऱ उससे पूछा " रमुआ कहां हैं ?"
कजरी कों तोँ जैसेयही चाहिए थां वोँ तुनक केँ बोलि " वोँ देखिये मालिक वहीँ झोपडी केँ सामने खटिया तोड़रहे हें। "
रामलाल रामू केँ पास पंहुचा औऱ एक् जोर कि लात उसकीकमर पे लगाई। रामू खटिया सें नीचेगिर पड़ा औऱ चिल्लाते हुए खड़ाहुआ " कौन हैं ससुरजी केँ नाती "
रामलाल नें खींच केँ एक् झापड़ उसकेकान पे लगाया तोँ उसकी आँखों केँ संग उसकी बुद्धि भि खुल गयीँ,। रामलाल कों देखते हि वोँ खींस निपोरते हुए उसके पैरों मे गिर गय़ा औऱ बोला " भैया क्षमा करदो मे जान नहि पाया आप् कबआये। "
रामलाल " कल हि आयाहु औऱ तेरी करतुते देखरहा हु। "
रामू " अरे वोँ तौ भैया ऐसे हि। "
रामलाल " ससुरे काम पे ध्यान देअब मे आँ गय़ा हूं कोई गलती हुइ तौ गांड तोड़ दूंगा। "
रामू " जी भैया "
रामलाल " चलअब सजधजकर हौ जा औऱ मुझे खेतो पे लेँ चल "
कुछदेर रामलाल अपने खेतों पे घूमता रहा औऱ उनकी स्थिति जांचता रहा। खेत बहोत बुरी स्थिति मे तोँ नहि थें पर्र उनकी स्थिति सुधारी जा सकती थि।
कुछदेर तक इधरउधर टहलने केँ बाद रामलाल नें रामू सें पूछा " औऱ बता रमुआ गाँव कि कोईखबर ?"
रामूयह बातसुन केँ खुश होँ गय़ा औऱ चहकते हुए बोला " अरे भैया आपको क्याँ बताऊँ इस गाँव मे बूढों कों ठरकचढ़ गई, हैं। "
रामलाल चौंकते हुए " क्याँ हुआबे ?"
रामू आनंद लेतेहुए " अरे भैया अपनें मौलवी साहब हें नं वोँ चौथी बेगम लाये हें औऱ वोँ भि अपनी बेटी कि उम्र कि। "
रामलाल " सही मे बे "
रामू " हाँ भैया औऱ सुना हैं ससुरी चौचकमाल हैं। "
रामलाल " तुम्हें केसेपता बे "
रामू " अरे भैया पंडित जीबता रहे थें। "
रामलाल " अरे पंडित जी कि ठरक कैसी हैं ?"
रामू " वैसे हि भैया जैसे पहले थि मौकादेख केँ गोटी फंसा लेते हैं। "
रामलाल " बेचारी पंडिताइन। "
यहीसभी बात करतेहुए दोनों वापसघऱ आँ गए। कजरी नें रामलाल कां भि खानां बना दिया थां। रामलाल नें खानां खाया औऱ दुपहर कि नींद लेने केँ लिए खटिया पे लेट गय़ा।
Nice update....
चूत के चक्कर में - चूत की कहानी – New Episode
साम कों रामलाल कि नींदलखन सिंह कि आवाज़ सें टूटी। रामलाल घऱ सें बाहर् निकला तोँ देखा कि लखन सिंह दरवाजे पे खड़े थें।
रामलाल बोला " ताऊ प्रणाम आओ अंदरआओ। "
लखन सिंह " नं बेटा अभि नहि अभि तूँ जल्द मेरेसंग चलकाम हैं तुझसे। "
रामलाल " क्याँ काम ताऊ ?"
लेखन सिंह " तूँ सजधजकर हौ जा बड़ी हवेली चलना हैं जरुरी काम सें। "
रामलाल एक् बार केँ लिए चौंका बड़ी हवेली पऱ ताऊ कि बातमान कर चलने केँ लिए सजधजकर होँ गय़ा। कुछदेर बाद दोनों बड़ी हवेली कों चल पड़े।
रामलाल नें लखन सिंह सें पूछा " ताऊ हवेली वालो कों मुझसे क्याँ काम मे तौ अभि देहात आयाहु। "
लखन सिंह " अरे वहां केँ दीवान जी नें बुलाया हैं। "
रामलाल कों अब बड़ी हवेली सें जुडी बचपन कि यादें यादआने लगती हें कि केसेअगर किसी कों बड़ी हवेली सें बुलावा आया जाता तौ आधे लोगो कि जान हि सूख जाती थि। एक् जमाना थां जब बड़ी हवेली राजा हुकमसिंह कि रियासत कां केंद्र हुआ करती थि। राजा हुकमसिंह बड़ा हि खूंखार औऱ ऐय्याश किस्म कां राजा थां इसलिये अगर किसी गाँव वाले कों हवेली सें बुलावा आया जाता तोँ इसका मतलब होता कि उसने हुकमसिंह कि नाराजगी मोल लेँ ली हौ औऱ अब उसकीखैर नहि। हुकमसिंह कि तक़रीबन दससाल पहले शिकार केँ टाइम घोड़े सें गिरकर मौत हौ गई, औऱ उसकेखौफ केँ साम्राज्य कां अंत होँ गय़ा। हुकमसिंह कि मृत्यु केँ बादअब उसकी विधवा रानी ललिता देवी नें राजपाट संभाला। रानी ललिता स्वाभाव सें दयालु थि उन्होंने गाँव वालों कि पिछले कुछ वर्षों मे बहोत सहायता कि औऱ इस वक़्त वोँ विधायक भि हें यहा कि। पर्र अब भि अगर किसी कों बड़ी हवेली सें बुलावा आँ जाता हैं तौ कोईमना नहि कर सकता।
कुछदेर चलने केँ बाद रामलाल औऱ लखन सिंह बड़ी हवेली पहुचते हें। हवेली अब भि पहले कि तरह हि सजीधजी थि बाहर् सुरक्षा केँ लिए लठैतों कि पूरी सेना तैनात थि। लखनसिंह नें दरवाजे पे पहुचकर अपनेसर सें पगड़ी औऱ पेर सें जूती निकल केँ हाथ मे लेली। भारत कों आजादहुए 13 साल होँ गए थें पऱ गुलामी कि यह परंपरा अभि जिन्दा थि। रामलाल नें भि मन मारते हुए अपना जूता निकल केँ हाथ मे लेँ लिया औऱ लखन सिंहजे पीछे पीछे हवेली मे होँ लिया।
हवेली केँ अंदर कि भव्यता तोँ बाहर् सें भि अधिक थि। हर स्थान सजावट कि महँगी महँगी चीज़े लगी हुइ थि। कुछदेर बादलखन सिंह औऱ रामलाल एक् कमरे मे पहुचे जहाँ बड़े सें दीवान पे एक् बूढ़ा व्यक्ति बैठाहुआ थां।
लखन सिंह नें उससेकहा " प्रणाम दीवान जी "
उस बूढ़े नें लखन सिंह कों देखा औऱ बोला " आओलखन सिंहआओ "
लखन सिंहआगे बढ़ा औऱ बोला " दीवान जीयही हैं मेरा भतीजा रामलाल जिसके बारे मे मैंने आपको बताया थां "
रामलाल नें भि दीवानजी कों प्रणाम किया।
दीवान नें कहा " अच्छा तोँ यह हैं रामलाल आओ बैठो "
वहां कुर्सियां तोँ लगी हुइ थि पऱ लखन सिंह ज़मीन पर्र बैठ गय़ा औऱ रामलाल भि मन मारकर ज़मीन पर्र बैठ गय़ा। फिन दीवान जी बोले " हाँ तौ बेटा रामलाल तुम् फ़ौज मे थें ?"
रामलाल " जी दिवान जी "
दीवान " अच्छा तौ बेटा तुम्हे अंग्रेजी तोँ आती होगी। "
रामलाल " बहोत अच्छे सें तोँ नहि हां पर्र पढ़ लेता हूं लिख लेता हूं औऱ टूटी फूटीबोल भि लेता हूं। "
दिवान " बहोत अच्छे बेटा हमे तुमसे हि काम थां देखोअब मेरी उम्र मे मुझसे सही सें देखा नहि जाता एक् चिट्ठी आयी थि विदेश सें जोँ मे पढ़ नहि पारहा थां अबईस रियासत मे अधिक पढ़ा लिखा तोँ कोई हैं नहि औऱ अंग्रेजी पढ़ना सबकेबस कि बात नहि इसलिये मे बहोत परेशान थां। आज सुभहलखन सिंह नें तुम्हारे बारे मे बताया तौ मैंने हि तुम्हे यहा लाने केँ लिए बोला। "
रामलाल " ठीक हैं आप् मुझे वोँ चिट्ठी दीजिये मे पढ़ देता हूं। "
फिन दीवान नें एक् चिट्ठी निकाल केँ रामलाल कों दि। रामलाल नें वोँ चिट्ठी पढ़के दीवान कों सुना दि।
दिवान बोला " बस बेटा बहोत शुक्रिया अब तुम् जा सकते हौ। "
फिन रामलाल औऱ लखन सिंह दीवानजी कों प्रणाम करके हवेली सें अपने गाँवलौट आते हें। गाँव पहुचकर लखन सिंह रामलाल सें कहता हैं " आओ बेटा आजरात कां भोजन मेरेघऱ करो। शांति कों भि तुम् सें मिलकर अच्छा लगेगा। "
रामलाल " ठीक हैं चाचा। "
रामलाल शांति केँ बारे मे सोचने लगता हैं। शांति औऱ रामलाल कि उम्र करीब-करीब एक् हि होगी दोनों संग हि पले बढ़े। लखन सिंह नें शांति कां ब्याह बचपन मे हि कर दिया थां पर्र उसके ससुराल जाने सें पहले हि उसके पति कि मौत हौ गयीँ,। गाँव वालों नें शांति कों अपशकुनी मान किया औऱ लखन सिंह पे बहोत दबाव डाला कि वोँ शांति कों काशी छोड़आए विधवाओं कि तरह जीने केँ लिए। पऱ लखन सिंह नें किसी कि एक् न् सुनी औऱ शांति कों अपनेपास हि रखा। लखन सिंह कि पत्नि केँ गुजरने केँ बाद शांति हि उनका अंतिम सहारा थि।
कुछ हि देर मे दोनों लखन सिंह केँ घऱ पहुचते हें।
लखन सिंह दरवाजे सें आवाज़ लगाते हें " शांति ओ शांति देख तौ कौनआया हैं ?"
कुछदेर बाद सफ़ेद साड़ी मे एक् महिला घऱ सें निकलती हैं। रामलाल उसको देखता हैं लगभग 30 32 कि होगी शांति रंग गोरा पऱ चेहरे पे एक् अजीब सि वीरानी छाई हुइ थि। शांति रामलाल कों देखती हैं औऱ कहती हैं " रामलाल भैया नमस्कार। "
रमलाल " कैसी होँ शांति "
शांति " ठीक हि हु भैया "
लखन सिंह " अबजा दौड़ केँ रामलाल केँ लिए पीने केँ लिए पानी लें आँ औऱ जल्द सें खानां बनादे आज रामलाल हमारे संग हि खानां खायेगा। "
शांती घऱ केँ अंदरचली जाती हैं औऱ रामलाल औऱ लखन सिंहघऱ केँ बाहर् बैठ केँ हुक्का गुड़्गुड़ाने लगते हें। कुछ हि देरबाद शांति पानी लेकेआती हैं। रामलाल कों पानी देने कों झुकती हैं तौ उसका पल्लू सरक जाता हैं औऱ रामलाल कों उसकी मम्मों कि घाटियों कां दर्शन होँ जाता हैं। शांति रामलाल कों नजरों कों भांप लेती हैं औऱ झट सें अपना पल्लू सहीकर घऱ केँ अंदरचली गयीँ,।
कुछदेर तक रामलाल औऱ लखन सिंहइधर उधर कि बातें करते हें। तब तक शांति खानां सजधजकर कर लेती हैं औऱ उन्हें खाने केँ लिये बुलाती। घऱ केँ अंदर किचन मे खाने कि व्यवस्था रहती हैं। रामलाल औऱ लखन सिंह खानां खाने लगते हें। कुछदेर बाद शान्ति रामलाल सें कुछ औऱ लेना कां पूछती हैं तौ रामलाल सब्जी मांगता हैं। शान्ति रामलाल केँ सामने झुक केँ फिन सें उसकी थाली मे सब्जी परोसने लगती हैं। उसका पल्लू फिन नीचे ढुलक जाता हैं औऱ रामलाल कों पुनः एक् बार उसकी घाटियों केँ दर्शन हौ जाते हें पऱ इसबार शान्ति उन्हें छुपाने कि कोशिश नहि करती। वोँ धीरे-धीरे धीरे-धीरे रामलाल कों सब्जी परोसती हैं औऱ रामलाल मनभर केँ दर्शन करता हैं। फिन वोँ वापस अपनी स्थान चली जाती हैं। कुछ हि देरबाद रामलाल खानां समाप्त करकेघऱ चलाआता हैं औऱ शान्ति केँ बारे मे सोच केँ मुट्ठ मार केँ सो जाता हैं।
चूत के चक्कर में - चूत की कहानी – New Episode
अगली सुभह रामलाल कि नींद कजरी केँ बुलाने कि आवाज़ सें खुलती हैं। रामलाल घऱ सें बाहर् निकालता हैं औऱ कजरी सें पूछता हैं " क्याँ हुआ ?"
कजरी " मालिक हमरेउ रात सें हि घऱ नहि आये हें औऱ आज खेतों मे धान कि रुपाई करना बहोत जरुरी हैं। थोड़ी हि देर मे धुपतेज होँ जायेगी तौ काम करना मुश्किल हौ जाएगा। "
रामलाल " कहां हैं रमुआ ?"
कजरी " मालिक कहींपी केँ पड़े हुईहै "
रामलाल " ठीक हैं तुम् खेतों पे चलो मे भि आता हूं "
कजरी " ठीक हैं मालिक "
रामलाल जल्द सें अपने सारी नित्यक्रिया पूरी करके खेतों पे पहुचता हैं। कजरी वहां पहले सें हि धान कि रुपाई कररही होती हैं। कजरी अपनी साड़ी घुटनों तक उठा केँ कमर मे खोंसी रहती हैं ताकि उसकी साडीखेत मे भरे पानी सें भीगे नहि। रामलाल भि अपना कुरता उतारकर वहीपास मे एक् पेड़ पऱ टांग देता हैं औऱ अपनी धोतीउठा केँ कमर पे बांध लेता हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों खेतों मे धान कि रुपाई करने लगते हें। लगभग एक् घंटेबाद अचानक आसमान मे बादलछा जाते हें औऱ बारिश होने लगती हैं। बारिश केँ कारण मौसम सुहावना हौ जाता हैं औऱ दोनों कों गर्मी सें छुटकारा मिल जाता हैं। अब दोनों बारिश मे भीगते हुएधान कि रुपाई करने लगते हें।
तभी रामलाल पलट केँ कजरी केँ तरफ देखता हैं तोँ वोँ उसकीतरफ पीठ करकेझुक केँ धान कि रुपाई कररही होती हैं। बारिश केँ कारण उसकी साडी भीगके उसके जिस्म सें चिपक गई, रहती हैं। रामलाल कों अब उसकी गांड एकदमसाफ झलकरही होती हैं। रामलाल कां लन्ड सलामी देने लगता हैं औऱ उसकीकाम भावनाएं भड़कने लगती हें। वोँ धीरे-धीरे धीरे-धीरे कजरी केँ तरफ बढ़ने लगता हैं। जब वोँ उसकेपास पहुचता हैं तोँ अचानक कजरीपलट जाती हैं पऱ उसका पांव फिसल जाता हैं। कजरी गिरने सें बचने केँ लिएहाथ सें कुछ पकड़ने कि कोशिश करती हैं। उसकेहाथ मे रामलाल कि धोती आँ जाती हैं पर्र वोँ उसे गिरने सें नहि बचा पाती। नतीजा यह होता हैं कजरी पानी मे छपाक सें गिरती हैं औऱ उधर रामलाल कि धोती औऱ लंगोट खुलके कजरी केँ हाथ मे आँ जाता हैं। कजरी कि आँखों केँ सामने रामलाल कां लन्ड झटकेखा रहा होता हैं वोँ एकटकउसे देखने लगती हैं। उधर पानी मे गिरने सें कजरी केँ कपडे औऱ भीगके उसके जिस्म सें चिपक जाते हैं औऱ रामलाल कों अब उसकी चूचियो कां आकार साफ़झलक रहा होता हैं। रामलाल सें अब बर्दाश्त नहि होँ होता वोँ झुक केँ कजरी कों अपनीगोद मे उठा लेता हैं औऱ उसे लेकेखेत केँ किनारे पेड़ केँ नीचे लाके लिटा देता हैं। कजरी भि उसकाकोई विरोध नहि करतीयह देख केँ रामलाल कि हिम्मत बढ़ जाती हैं। रामलाल अब कजरी कि साड़ी ऊपरउठा देता हैं जिससे उसकी बुर उसके सामने आँ जाती हैं। रामलाल उसकी बुर कि फांको कों फैलाकर उसकी बुर केँ दाने कों अपने उंगलियों मे लेके मसलने लगता हैं। कजरी कों तौ जैसे करंटलग गय़ा होँ वोँ एकदम सें मजा सें अकड़ जाती हैं।
धीरे-धीरे धीरे-धीरे जब कजरी कि बुर हल्का हल्का पनियाने लगती हैं तौ रामलाल उसमे एक् ऊँगली डाल केँ अंदर बाहर् करने लगता हैं। कजरी कि अनान्द केँ मारे सिसकारियां निकलने लगती हें। उसनेऐसे अनान्द कि अनुभूति पहलेकभी नहि कि थि। रामू तौ बस लन्ड घुसा केँ अपनाकाम निपटा केँ सो जाता थां पऱ रामलाल जौ कररहा थां उससे कजरी कों आजयह एहसास होँ रहा थां कि कामक्रिया कां अनान्द क्याँ होता हैं। रामलाल कि ऊँगली अब कजरी केँ बुर केँ रस सें सन चुकी थि। रामलाल नें अपने लन्ड पे थूक लगाया औऱ कजरी केँ पैरों केँ बीच आँ गय़ा। कजरी तोँ जैसे उसकी गुलाम जोँ गयीँ, थि उसनेकोई प्रतिकार नहि किया। रामलाल नें अब अपना लन्ड उसकी बुर जे मुँह पे सेट किया औऱ एक् जोर कां धक्का लगाया उसका लन्ड थोडा सां कजरी कि बुर मे घुस गय़ा। कजरीजे मुह सें हलकी सि घुटी हुईँ चीख निकल गई,। रामलाल अब अपने लन्ड कों हल्का हल्का आगे पीछे करनेलगा। थोड़ी देरबाद उसने एक् औऱ धक्का मारा अबकीबार रामलाल कां लन्ड सरक केँ कजरी केँ बुर मे पूरा कां पूराघुस गय़ा। कजरी कों ऐसालगा जैसे रामलाल केँ लन्ड नें उसकी बुर कों पूराभर दिया हौ। अब रामलाल कजरी केँ ऊपरलेट गय़ा औऱ अपना लन्ड जोरजोर सें कजरी कि बुर मे पेलने लगा। कजरी असीम अनान्द मे सराबोर खो गयीँ, उसने अपनी दोनों टाँगे उठा केँ रामलाल कि कमर पे रखली जैसे कि रामलाल कां लन्ड उसकी बुर कि औऱ गहराई तक जासके। रामलाल नें भि अब अपने धक्कों कि स्पीड बढ़ाई तौ कजरी केँ मुह सें अजीब अजीब आवाजे आनेलगी " क्या बात है दैया.उफ़्फ़.अहह.ओह अम्मा.मार डाला मालिक.औऱ जोर सें.अरे.हाय राम। रमुआ नें तौ कभीऐसा आनंद नहि दिया.औऱ जोर सें."
कजरी कि यह बातें रामलाल कों औऱ उत्तेजित करनेलगी औऱ वोँ भि कजरी कि बुर मे लंबे लंबेशॉट मारने लगा। तभी कजरी कां शरीर पूरीतरह सें अकड़ गय़ा औऱ वोँ झड़ गयीँ,। रामलाल भि फिन अगले हि शॉट मे कजरी कि बुर मे अपना वीर्य उगलते हुएझड़ गय़ा।
रामलाल कजरी केँ ऊपर सें हट केँ उसकेबगल मे लेट गय़ा। कजरी भि कुछदेर वही ज़मीन ओरउसबगल पड़ीरही। फिनउसे दीन दुनिया कां ध्यान आया औऱ वोँ जल्द सें अपने कपडेसही करतेहुए गाँव कों चली गयीँ,। कजरी नें जाते टाइमपलट केँ एक् बार भि रामलाल कि तरफ नहि देखा रामलाल कों लगा शायद वोँ भावनओं मे बह गयीँ, औऱ अबउसे पश्चाताप हौ रहा होगा। रामलाल नें भि सोचा कि अबअगर कजरीपहल नहि करेगी तोँ वोँ भि नहि करेगा। फिन रामलाल नें अपने कपडे जोँ वहीखेत मे पड़े थें उठाये उन्हें साफ कियाफिन पहनकर गाँव कि तरफचल दिया।
घऱ पहुचकर रामलाल नें नहाने कि सोची औऱ वोँ साफ कपडे लेके गाँव कि नदी पे नहाने चला गय़ा। नदी सें लौट केँ रामलाल घऱ पंहुचा तौ देखा कजरी आँगन मे चूल्हे पे बैठ खानां बनारही थि। रामलाल नें उसकीतरफ देखा पऱ कजरी नें कोई प्रतिक्रिया नहि दि। रामलाल नें औऱ उसे परेशान करना उचित नहि समझा औऱ बिस्तर लेकेघऱ केँ बाहर् चला गय़ा। कुछदेर बाद कजरी खानां बना केँ चुपचाप चली गयीँ, रामलाल नें भि खानां खाया औऱ बिस्तर पे लेट केँ आराम करनेलगा।
साम कों रामलाल कि नींद टूटी तोँ सूरज अस्त होने कों थां। रामलाल नें सोचा कि आज देहात कि चौपाल पे चलते हें सो वोँ जा पंहुचा चौपाल पऱ। वहां पंडितजी, मौलवी साहब औऱ लखन सिंह पहले सें मौजूद थें। रामलाल कों देखते हि लखन सिंहखुश होँ गए औऱ बोले " आओ रामलाल बेटा कभी हम् बुजुर्गों केँ संग भि बैठ लियाकरो "
रामलाल " क्याँ ताऊ मजाक करते होँ आप् लोग औऱ बुजुर्ग अभि तोँ आप् लोग जवान हौ यकीन न् हौ तोँ मौलवी साहब सें पूछलो "
यहबात सुनकर पुजारी जी औऱ लखन सिंह ठहाके लगाके हँसने लगे औऱ मौलवी साहब झेंपगए।
मौलवी साहब नें सफाई देतेहुए कहा " देखो मियां हमारे मजहब मे कोई भि मर्द उतनी बेगमे रख सकता हैं जितनी कों वोँ खिला पिलासके। "
मौलवी साहब कि बात सुनके पुजारी जी बोले " बहोत बढ़िया हैं मौलवी तेरे धर्म मे हमारे यहा तौ सात जन्म तक उसी एक् केँ संग बंधे रहना रहता हैं। "
यह सुनकर मौलवी साहब नें पुजारी जी सें कहा " तौ भि तोँ तुम् हर स्थान मुह मारते रहते होँ। "
अब हम् सभी ठहाके लगारहे थें औऱ झेपने कि बारी पंडितजी कि थि। पंडित जी नें बात पलटते हुएअब निशाना मेरीतरफ कर दिया " रामलाल बेटा तुम् अब विवाह करलोकब तक ऐसे रंडुवा रहोगे ?"
रामलाल " नहि पंडितजी मुझेअब विवाह नहि करनी। "
पंडित जी " अरे बेटा रामलाल तुम् एक् बारहाँ तोँ करो एक् सें एक् सुन्दर औऱ जवान लड़कियों केँ रिश्ते हें मेरेपास। "
रामलाल " नहि पंडितजी अब मे इस उम्र मे अपने सें आधी उम्र कि लड़की सें विवाह करता अच्छा लगूंगा। "
पंडितजी " क्याँ गलत हैं उसमें बेटा नं जाने कितने लोग करते हें औऱ तुम् अपनी बाकी कि जीवनऐसे हि गुजरोगे ?"
रामलाल " हाँ चाचा "
अबलखन सिंहबोल पड़े " मे पंडित कि बात सें सहमत हूं कि तुम्हे अब विवाह कर लेनी चाहिए औऱ मे तुम्हारी बात सें भि सहमत हूं कि तुम्हे अब बहोत छोटी लड़की सें विवाह नहि करनी चाहिए। मेरी एक् सलाह हैं कि तुम् अपनी उम्र कि किसी विधवा सें विवाह करलो। "
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