दीदी ने चखाया अपना गीलापन - दीदी की चुत – New Episode
Episode 8
सुधा दिदी सुभह कि हल्की रोशनी मे पूरीतरह सें नंगी लेटी हुइ थि औऱ मेरे अगलेकदम कां प्रतीक्षा कररही थि। उनके होंठों पऱ हल्की मुस्कान औऱ चेहरे पर्र लज्जा थि। मे धीरे धीरे स्वयं कों भि कपड़ों सें आजाद करनेलगा। जैसे-जैसे मैंने अपनी शर्ट औऱ फिन बाकी कपड़े उतारने शुरुआत किए, दिदी कि आँखें चौड़ी हौ गई। उनके चेहरे पर्र हल्की मुस्कान औऱ गहरीचमक साफझलक रही थि। कभी वो नज़रें चुरा लेती, तौ कभी हिम्मत कर केँ मेरीओर देखने लगती। उनके गालों कि लाली औऱ तेज़ हौ गई थि, जैसे मेरेहर कपड़े उतारने केँ संग उनकी साँसें औऱ भारी हौ रही होँ।
जब मैंने अपने सारे कपड़े उतारदिए, तोँ मे धीरे धीरे दिदी केँ औऱ पास आँ गय़ा। मे उनके पैरों केँ बीच जाकर बैठा। दिदी नें हल्के सें अपनी जाँघें खोल दि, ताकि मे उनके औऱ लगभग आँ सकूँ। उनकीइस हरकत सें मुझे उनके सबसे गहरे हिस्से केँ पास धीरे-धीरे स्थान मिल गई। उनका शरीरगरम थां, औऱ मे उनकेबीच मे बैठकर उनकी साँसों कि गर्मी महसूस कर सकता थां। दिदी कि आँखें लज्जा सें झुकी हुईँ थि, मगर उनके जिस्म कि भाषासाफ बतारही थि कि वो इससमय कों पूरीतरह स्वीकार कर चुकी थि।
मैंने काँपते हाथों सें उनकी जाँघों कों सहलाना शुरुआत किया। उनकी त्वचा गरम औऱ रसीले थि, मेरे हाथों केँ नीचे हल्की-सि नमी औऱ उनकी गर्मी साफ महसूस होँ रही थि। जैसे हि मेरी उँगलियाँ उनके औऱ नाजुक हिस्से तक पहुँची, उनकी साँसों कि रफ्तार बदलने लगी। हर सांस छोटी औऱ भारी होतीजा रही थि। उनके चेहरे पर्र हल्की घबराहट औऱ चाह दोनों झलकरहे थें, वो लगातार होंठकाट रही थि औऱ कभी आँखें खोलकर मुझे देखतीं तोँ कभीझट सें पलकेबंद कर लेती।
कुछ देर उनकेउस हिस्से कों छूने केँ बाद मैंने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ हटा लिया औऱ अपना लन्ड उनकेपास लें आया। जैसे हि मेरीगरम औऱ सख़्त नोक उनकी नर्मी सें टकराई, मेरे पूरेबदन मे एक् झटका-सां महसूस हुआ। दिदी कि पलकों मे हल्की हलचल हुई, उन्होंने आँखें खोली औऱ मेरीतरफ देखा। उनकी नज़रों मे डर नहि थां, बस एक् गहरी झिझक औऱ अंदर छुपी हुई चाहसाफ दिखाई देरही थि।
मे आहिस्ता औऱ झुक गय़ा ताकि मेरा लन्ड उनके नाज़ुक हिस्से सें लगातार लगारहे। जैसे हि हल्की रगड़ शुरुआत हुई, मेरे पूरेबदन मे गर्मी दौड़ने लगी। दिदी कां जिस्म भि मेरीहर हल्की हरकत पऱ हलचलदे रहा थां। उन्होंने अपने पैरों कों औऱ फैला दिया, इतना कि मे आसानी सें उनके औऱ लगभगबैठ सकूँ। उनकेइस इशारे सें मुझे औऱ हिम्मत मिली।
अब मेरा लन्ड उनके नाजुक हिस्से केँ ऊपर रगड़खा रहा थां। कभीनोक हल्के सें ऊपर कि तरफ खिसक जाती, कभी नीचे। इस लगातार छूने सें मेरे जिस्म कि धड़कन तेज़ होँ रही थि। दिदी कि साँसें तेज़ औऱ भारी थि, उनके सीने कां उठना-गिरना साफ दिखाई देरहा थां। उनके होंठ बार-बार काँपरहे थें, कभी वो उन्हें भींच लेती औऱ कभी हल्का खोल देती, जैसेकुछ कहनाचाह रहीहों। मगर आवाज़ बाहर् नहि आँ पारही थि।
उन्होंने चादर कों कसकर पकड़रखा थां। उनकी उंगलियाँ इतनीजोर सें धंसी हुईँ थि कि गाठें सफेदपड़ गई थि। उनके चेहरे पर्र गहरी लाली थि औऱ माथे पऱ पसीने कि बूंदें चमकने लगी थि। जब मेरीनोक बार-बार उनकेउसी हिस्से सें टकरारही थि, तोँ उनके पूरे जिस्म मे हल्का-सां झटका जातादिख रहा थां। उनकी जाँघें कभीकस जाती तोँ कभी ढीली होँ जाती।
मे आहिस्ता औऱ दबाव सें टचकररहा थां ताकि वो महसूस करें कि मे पूरीतरह उनकेपास हूं। उनकी आँखें अब ज़्यादातर बंद थि, मगर कभी-कभी आधी खुलती औऱ मेरीतरफ देखने कि कोशिश करती। उनकी साँसें इतनी भारी थि कि वो मेरे चेहरे तक महसूस हौ रही थि। मे उनके बहोत लगभग थां, मेरा सीना उनके पैरों सें लगाहुआ थां औऱ मेरा लन्ड लगातार उनके नाज़ुक हिस्से सें सटाहुआ थां।
हर सेकंड लंबा औऱ भारीलग रहा थां। मे अपनी स्थान पर्र रुककर भि उनके शरीर कि हर हलचल कों महसूस करपारहा थां। दिदी पूरीतरह तनाव औऱ सुख केँ बीच फंसी हुइ लगरही थि। उनके होंठों सें आहिस्ता कराह जैसी आवाज़ें निकलने लगी, बहोत हल्की मगरसाफ। येसभी मुझे औऱ लगभग खींचरहा थां। मैंने औऱ जोर सें उन्हें टच नहि किया, बस लगातार वही टिकारहा ताकि वो आहिस्ता उस एहसास मे खो जाएँ।
वो अब धीरे धीरे अपने पैरों कों हिलाने लगीं, जैसे स्वयं मुझे औऱ पास खींचरही हों। उनका चेहरा पूरीतरह लाल हौ गय़ा थां, आँखों केँ कोनों मे हल्की नमीदिख रही थि। उनकी साँसों कि आवाज़ कमरे मे साफ गूँजरही थि। मे वहीं उनकेपास, उनके पैरों केँ बीच, अपने लन्ड कों उनकेउस हिस्से सें लगाकर टिकारहा औऱ हर छोटे-सें-छोटे बदलाव कों महसूस करतारहा।
उसी दौरान दिदी नें आँखें खोली, मेरे चेहरे कि तरफ देखा औऱ धीमीमगर साफ आवाज़ मे बोलीं “अब औऱ मत खेलो, इसे अंदर डालो। ”
मैंने जैसे हि अपनीनोक उनकेबीच धकेलने कि कोशिश कि, उन्होंने अचानक मुझेरोक लिया। उनकी उंगलियाँ मेरे सीने पऱ आकरटिक गई। उन्होंने गहरी सांस लेकर धीरे-धीरे सें कहा – “रुको… अभि मतकरो। ये बहोत सूखा औऱ टाइट हैं। पहले अपने लन्ड पऱ कुछलगा लो, नहि तोँ दर्द होगा। ” उनकी आवाज़ गंभीर थि मगर उसमें चाहसाफ झलकरही थि। उनकीबात सुनकर मैंने रुककर उनकी आँखों मे देखा औऱ महसूस किया कि वो सजधजकर तोँ थि, मगर चाहती थि कि सभी धीरे-धीरे औऱ बिना परेशानी केँ हौ।
मैंने उनकीबात सुनते हि पासरखी टेबल कि तरफ देखा। उस टेबल पऱ दिदी कां छोटा-सां मेकअप किट हमेशा रहता थां। मे जल्दी उठकर वहां गय़ा औऱ धीरे-धीरे सें ढक्कन खोला। अंदर अलग-अलग क्रीम औऱ लोशन कि बोतलें रखी थि। मेरी नज़र एक् छोटे सें क्रीम केँ डिब्बे पर्र गई। मैंने उसे उठाया औऱ हाथ मे पकड़कर पलट-पलट कर देखा। उसके अंदर हल्की-सि खुशबू वाली क्रीम थि, जौ नरम औऱ चिकनी लगरही थि।
मैंने उस डिब्बे कां ढक्कन खोलते हि हल्की मीठीगंध महसूस कि। क्रीम उँगलियों पर्र लेते हि ठंडी औऱ रसीले लगी। मे डिब्बा हाथ मे लेकर वापस दिदी केँ पासआया। वो अब भि पैरों कों हल्का फैलाकर लेटी थि, चेहरे पर्र गहरी लाली औऱ आँखों मे प्रतीक्षा साफ दिखाई देरहा थां। उनके होंठ कांपरहे थें जैसे वो स्वयं कों रोकरही हों।
मे उनके पैरों केँ बीचबैठ गय़ा। दिदी नें थोडा कमरउठा कर स्थान बनाई ताकि मे आसानी सें उनके औऱ लगभग आँ सकूँ। मैंने उँगलियों पर्र थोड़ी-सि क्रीम ली औऱ पहले अपने लन्ड पर्र लगाने लगा। क्रीम कि ठंडक मेरीगरम त्वचा पर्र फैल गई। मैंने धीरे धीरेनोक सें लेकर नीचे तक पूरी लंबाई पर्र उसे फैलाया। क्रीम लगाते हि मेरा लन्ड औऱ चमकदार औऱ फिसलन वाला हौ गय़ा।
मैंने एक् नजर दिदी कि तरफ डाली। वो चुप-चाप मुझेदेख रही थि, उनकी आँखें आधीबंद थि औऱ चेहरे पऱ चाह औऱ बेचैनी थि। मैंने एक् बारफिन उँगलियों पऱ थोड़ी क्रीम ली औऱ अब धीरे-धीरे सें उनके नाजुक हिस्से पर्र लगाना शुरुआत किया।
जैसे हि मेरी उँगलियाँ उनकेउस हिस्से सें टकराई, वो हल्का-सां सिहरउठी। उनकी जाँघें अपने आप् कस गई औऱ उन्होंने होंठकाट लिए। मैंने धीरे धीरे, बहोत सावधानी सें उनकी त्वचा पऱ क्रीम फैलाना शुरुआत किया। नमी औऱ चिकनाहट उनके नाजुक हिस्से मे फैलने लगी। मैंने हल्के-हल्के गोलाई मे अपनी उँगलियाँ चलाकर क्रीम कों अंदर तक पहुँचाया। दिदी कि साँसें औऱ भारी होतीजा रही थि। उनकी छाती तेज़-तेज़ सें उठ-गिर रही थि, औऱ उन्होंने चादर कों कसकर पकड़रखा थां।
उनके चेहरे पऱ अब हल्की-हल्की कराह कि आवाजें दिखने लगी। हर बारजब मेरी उँगलियाँ उनकी नाज़ुक स्थान कों छूती, वो हल्की-सि काँप जातीं। मैंने ध्यान सें उनके पूरे हिस्से पऱ क्रीम फैलाई ताकिकोई स्थान सूखी नाँ रहे। धीरे धीरे उनकी जाँघें थोड़ी ढीली होनेलगी औऱ उनका जिस्म अब पहले कि तरह सख्त नहि लगरहा थां।
अब वो औऱ अधिक आहिस्ता लेट गई, आँखें बंदकर ली औऱ होंठों सें हल्की-हल्की आवाजें निकलने लगी। उनकी सांसें मेरे कानों तक साफ पहुँच रही थि। मैंने अंतिम बार अपना लन्ड देखा, क्रीम सें पूरीतरह फिसलन भरा औऱ रेडी। फिन मैंने उनकीतरफ झुककर उनकेगाल कों हल्के सें चूमा औऱ उनके पैरों केँ बीच औऱ मजबूती सें बैठ गय़ा।
बहुतदेर प्रतीक्षा औऱ तैयारी केँ बाद आखिरकार वो समयआने वाला थां, जब मे सच मे अपनी दिदी केँ संग सेक्स करने केँ लिए रेडी होँ चुका थां। मे उनके औऱ लगभग झुका हि थां कि अचानक दरवाजे पर्र किसी नें जोर सें दस्तक दि। कमरे कां सारा माहौल एक्-दम सें बदल गय़ा। दिदी घबराकर जल्दी उठने कि कोशिश करनेलगी औऱ मेरी धड़कनें तेज होँ गई।
दिदी नें जल्द सें हल्की आवाज़ मे पूछा, “कौन हैं?”
बाहर् सें भारी औऱ परिचित आवाज़ आई—”मे हूं, पिताजी… द्वार (दरवाज़ा) खोलो, तुमसे बात करनी हैं। ”
ये सुनते हि दिदी कां चेहरा औऱ भि सफेदपड़ गय़ा औऱ उन्होंने मेरीतरफ डर औऱ बेचैनी सें देखा। फिन उन्होंने धीरे-धीरे सें जवाब दिया, “बापू… मे अभि ठीक सें कपड़े पहनेहुए नहि हूं। थोड़ी देर मे ड्रॉइंग रूम मे आकर आपसे मिलती हूं। ”
बापूचुप हौ गए औऱ बाहर् सें कोई आवाज़ नहि आई। दिदी नें गहरी सांसली, फिन जल्द सें चादर हटाई औऱ पासरखे टिश्यू सें अपने नाजुक हिस्से सें क्रीम कों साफ करनेलगी। उन्होंने बड़ी सावधानी सें पूरा हिस्सा पोंछा, ताकिकोई निशान नां रहजाए। इसकेबाद वो जल्दी अपनी अलमारी कि तरफ गई औऱ कपड़े निकाल कर पहनने लगी।
मे बस वहीं बैठा उन्हें देखता रहा, मन हि मन चाहता रहा कि हर लम्हा उन्हें ऐसे हि देखता रहूँ। जब उन्होंने कपड़े पहनलिए, तौ मेरीतरफ मुड़ी। चेहरे पर्र हल्की मुस्कान लाकर उन्होंने मेरेपास आकर मुझे एक् अंतिम बार होंठों पऱ चूमा। वो किस्स छोटा थां मगर उसके अंदर गहरी इश्क औऱ वादा छिपाहुआ थां। फिन बिनाकुछ कहे वो धीरे-धीरे सें द्वार (दरवाज़ा) खोलकर बाहर् चली गई औऱ मे अकेला कमरे मे रह गय़ा।
मे दिदी केँ बाहर् जाने केँ बादकुछ देर वहीं बैठारह गय़ा। उनकी खुशबू औऱ उनके होंठों कां अहसास अब भि मेरेसंग थां। मगर मुझे भि जल्दहोश आया कि अगर पिताजी याँ मम्मी कों शकहुआ तोँ बड़ी मुसीबत हौ सकती थि। मैंने जल्द-जल्द चादर हटाई औऱ उठकर अपने कपड़े पहनने लगा। शर्ट औऱ पैंट पहनते हुए मेरेमन मे बस दिदी कि हि तस्वीरें घूमरही थि—केसे उन्होंने मुझे अंतिम बार चूमा औऱ फिन बाहर् चली गई।
कपड़े पहनने केँ बाद मैंने आईने मे स्वयं कों देखा। चेहरे पऱ अब भि लालिमा थि औऱ आँखों मे चाहसाफ झलकरही थि। मे सोचरहा थां कि काश मे भि उनके पीछे बाहर् जाता, मगर फिन ध्यान आया कि मे अक्सर देर तक सोया रहता हूं। अगर अचानक अभि बाहर् गय़ा तोँ बापू-माँ कों शक हौ सकता हैं कि मे दिदी केँ कमरे मे क्यूं थां।
इसीसोच मे मैंने धीरे-धीरे सें द्वार (दरवाज़ा) खोला औऱ अपने कमरे कि तरफचल पड़ा। मेरेकदम हल्के थें ताकिकोई आवाज़ नाँ हौ। कमरे मे पहुँचकर मैंने द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ बैड पऱ गिर गय़ा। दिलअब भि तेजी सें धड़करहा थां औऱ दिमाग़ मे वही लम्हे बार-बार दोहराए जारहे थें। मे बसयही चाहता थां कि येसभी कभी ख़त्म नं होँ औऱ हर रोज़ मुझेऐसे हि दिदी केँ संग लम्हा बिताने कों मिले।
लगभगतीन घंटेबाद, सुभह कि हल्की रोशनी कमरे मे फैलरही थि। मे उठा औऱ सोचने लगा कि आखिर पिताजी सुभह-सुभह दिदी सें क्याँ बात करना चाहते थें। दिदी अभि ड्रॉइंग रूम मे हें, मगर मे कुछ अंदाजा लगाना चाहता थां। मैंने कपड़े पहनलिए औऱ आहिस्ता सीढ़ियों कि तरफ बढ़ा, ताकिघऱ मे किसी कों भि मेरी आवाज़ सुनाई नां दे। मेरामन बेचैन थां, औऱ हरकदम पऱ मे सोचरहा थां कि क्याँ सच मे कुछ गंभीर बात हौ सकती थि, याँ बस मामूली कोई चर्चा।
नीचे पहुँचते हि मैंने देखा कि घऱ मे सुभह कि हल्की हलचल हौ रही थि। बापू अपने दफ़्तर जाने कि तैयारी कररहे थें, कपड़े पहनरहे थें औऱ जल्द मे थें। मां किचन मे थि, गरमचाय बनारही थि औऱ खाने केँ लिएकुछ सजधजकर कररही थि। दिदी अभि बाथरूम मे थि, शायद जल्द सें सजधजकर होँ रही थि। घऱ मे सभीकुछ आमलगरहा थां, मगर मे ये जानने केँ लिए औऱ भि चौकस हौ गय़ा कि पिताजी नें सुभह-सुभह दिदी कों क्यूं बुलाया थां।
मैंने धीरे धीरे डाइनिंग टेबल पऱ जाकरबैठ गय़ा औऱ गरमचाय कां कप उठाया। गरमचाय पीते-पीते मे अपनीसोच मे खो गय़ा, औऱ मन हि मन योजना बनारहा थां कि आगे क्याँ करना थां। पिताजी जल्द मे सजधजकर होकरघऱ सें बाहर् निकलगए औऱ मम्मी किचन मे हि कामकर रही थि। अब मेरेलिए मौका थां कि मे देखूं कि दिदी बाथरूम मे क्याँ कररही थि। मे चुप-चाप बाथरूम केँ पास गय़ा, हरकदम बहोत आहिस्ता रखा ताकिकोई आवाज़ नाँ होँ औऱ किसी कां ध्यान मुझ पर्र नां जाए।
बाथरूम केँ बाहर् खड़े होकर मैंने धीरे-धीरे सें दरवाज़े पऱ दस्तक दि। भीतर सें दिदी कि आवाज़ आई, “कौन हैं?”
मैंने हल्की हिचकिचाहट केँ संगकहा, “दिदी, ये मे हूं, गोलू। ”
कुछ समय चुप्पी रही, फिन धीरे-धीरे सें कुंडी खुली। दिदी नें द्वार (दरवाज़ा) खोला औऱ मुझे अंदरआने कां इशारा किया। मैंने आस-पास देखा औऱ फिन चुप-चाप अंदरचला गय़ा।
अंदरभाप औऱ पानी कि हल्की-हल्की बूंदों कि खुशबू थि। शॉवरचल रहा थां औऱ उससे उठतीनमी पूरे बाथरूम मे फैली हुईँ थि। दिदी केँ गीलेबाल उनकीपीठ औऱ गालों सें चिपके हुए थें, औऱ उनके चेहरे पऱ चमकती बूंदें किसी मोती कि तरहदमक रही थि। उनकी आँखों मे हल्की सि हैरानी औऱ मुस्कान थि, जैसे अचानक मुझेदेख कर वोँ थोडा चौंक भि गई औऱ सहज भि रही।
शॉवर कि धार सें उनका पूरा जिस्म ढकाहुआ थां, पानी कि लहरें उनकी त्वचा पर्र फिसलती हुइ बहरही थि। उस लम्हा मे उनकी भीगी हुइ सूरत औऱ खुशीभरा अंदाज़ इतनाखास लगरहा थां कि मानो वक़्त ठहर गय़ा होँ। मैंने चुप-चाप सांसरोक कर उन्हें देखा, औऱ माहौल मे मात्र पानी कि गिरती आवाज़ औऱ हमारी चुप्पी गूंजरही थि।
दिदी नें धीरे-धीरे सें कहा, “गोलू… तुम् यहा क्याँ कररहे होँ?” उनकी आवाज़ मे हैरानी थि।
मैंने कोई जवाब नहि दिया। मे बस उनके लगभग गय़ा। उससमय मे हमारे बीच कि दूरी बहोत छोटीरह गई थि। उनके होंठों पऱ हल्की थरथराहट थि, औऱ मेरी सांसें उनके चेहरे कों छूरही थि। धीरे धीरे मैंने उनकाहाथ थाम लिया औऱ बिनाकुछ कहे उन्हें अपनेपास खींच लिया। हमारी नज़रों नें जैसे हि एक्-दूसरे कों पकड़ा, हर प्रश्न औऱ हर जवाबउसी खामोशी मे छिप गय़ा।
फिन मैंने झुककर उनके होंठों पऱ अपने होंठरख दिए। ये लम्हा बहोत कोमल थां—नाँ तौ जल्द, नां हि कोई दबाव। बस एक् सहज अहसास, जैसे सारी दुनिया थम गई हौ औऱ हम् दोनों उस एक् छोटे सें समय मे खोगएहों।
दिदी पहले तोँ थोड़ी चौंकीं, मगर आहिस्ता उनकी साँसें भि मेरेसंग मिल गई। भाप औऱ पानी कि गंध केँ बीचये खामोश पल हमारे बीच एक् अनोखी डोर बाँध गय़ा।
हम् दोनों बिल्कुल लगभग खड़े थें। मैंने धीरे-धीरे सें उसके होंठों कों छुआ, जैसे हल्का सां टेस्ट लें रहा हूं। शुरुआत मे बस हल्की सि टच थि, मगरउस छोटे सें समय मे भि मेरे पूरे जिस्म मे सिहरन दौड़ गई। उसकी साँसें मेरेगाल पर्र गर्माहट छोड़रही थि औऱ होंठों पर्र उसका हल्का सां कांपना मुझे साफ़ महसूस हौ रहा थां।
कुछ सेकंड केँ लिए वोँ रुकी, फिन आँखें बंद करके औऱ पास आँ गई। इसबार हमारे होंठ पूरीतरह सें मिले। गीले औऱ रसीले होंठजब आपस मे दबे, तौ एहसास औऱ गहरा हौ गय़ा। मेरादिल बहोत तेज़ धड़करहा थां, औऱ वोँ भि बिना किसी झिझक केँ उसी लम्हा मे खो गई थि।
हम् बार-बार अलग होते औऱ फिन धीरे-धीरे सें एक्-दूसरे कों चूमते। हरबार कां स्पर्श पिछले सें ज़्यादा साफ़ औऱ गहरा थां। अब उसके चेहरे पऱ कोई हिचकिचाहट नहि थि, बस एक् सीधी-सि मुस्कान औऱ उसकीबंद आँखें, जैसे वोँ पूरीतरह सें इससमय मे डूबी हौ।
शॉवर कां पानी हमारे चेहरों पर्र गिररहा थां, बूंदें होंठों पर्र भि महसूस हौ रही थि। मगरइन सबकेबीच हमारी किस साफ़, गहरी औऱ सच्ची लगरही थि। ऐसालग रहा थां जैसे दुनिया मे मात्र हम् दोनों रहगएहों।
मैंने उसेउसी दौरान अपनी बाँहों मे कसकरथाम लिया। पानी कि धार केँ बीच उसका भीगाहुआ जिस्म मेरे सीने सें चिपक गय़ा। वोँ भि हल्के सें मेरे कंधे पर्र झुक गई, औऱ हमारी किस्स औऱ गहरी होँ गई। उसका चेहरा मेरे हाथों केँ बीच आहिस्ता थां औऱ मे उसे जितना पासकर सकता थां, उतना अपनेपास खींचरहा थां। शॉवर कां पानी हमारे चेहरों पऱ गिररहा थां, बूंदें होंठों पऱ भि महसूस हौ रही थि। मगरइन सबकेबीच हमारी किस्स औऱ हमारी गहरी झप्पी, दोनों संग-संग चलरही थि।
फिन अचानक मैंने हल्के सें उसके होंठों सें दूरी बनाई। उसने आँखें खोली औऱ मुझे प्रश्न भरी नज़रों सें देखा। मैंने धीरे-धीरे सें पूछा, “वैसे… सुभह बापू नें तुम्हें क्यूं बुलाया थां?”
यहसुन कर उसने स्वयं कों मेरी बाहों सें अलग किया औऱ जल्दी शॉवरबंद कर दिया। कुछ समय केँ लिएचुप खड़ीरही, फिन धीमी आवाज़ मे बोलीं, “उसदिन विवाह मे पिताजी कि मुलाकात एक् फैमिली सें हुईँ थि। उन्हें मे अच्छी लगी… औऱ आज वोँ फैमिली मुझे देखने हमारे घऱआने वाली हैं। वो नाता देखने केँ लिए आँ रहे हें। ”
मे कुछसमझ हि नहि पारहा थां। अभि कुछ सेकंड पहले हम् दोनों किस मे खोएहुए थें औऱ अब अचानक विवाह कि बात सामने आँ गई। मे उलझन मे उसकीतरफ देखने लगा, फिन धीरे-धीरे सें बोला, “यह सभी तौ बस एक् फॉर्मेलिटी हैं नाँ? तुम् उस लड़के सें विवाह करने वाली तौ नहि हौ… हैं नाँ?”
वोँ थोड़ी देर केँ लिएचुप रही, फिन गंभीर होतेहुए बोलीं, “अगर माँ-पिताजी कों वोँ फैमिली मनपसंद हैं, तोँ मे मना नहि कर सकती। ”
फिन उसने तौलिये मे अपने आप् कों लपेट लिया। भीगेबाल उसके कंधों पऱ गिररहे थें औऱ उसके चेहरे पर्र अभि-अभि कां शावर कां असरसाफ दिखरहा थां। तौलिये कि हल्की पट्टी उसके शरीर पऱ ढकी हुईँ थि, मगर उसकी छाती कां हल्का आकार औऱ सीने केँ बीच कि रेखा थोड़ी दिखाई देरही थि। उसकी आँखों मे खेल औऱ थोड़ी मस्ती थि, औऱ हल्की मुस्कान उसके चेहरे पऱ अब भि थि। शावर केँ बाद उसकी ताजगी औऱ नमी उसके पूरे अंदाज़ मे झलकरही थि, औऱ तौलिये केँ पीछे सें उसके हल्के झुकाव औऱ कंधों कि हरकतें उसे औऱ भि ध्यान देने लायकबना रही थि
कुछसमय बाद वो बाथरूम सें बाहर् निकली। मे चुप-चाप खड़ारह करउसे निकलते देखरहा थां। उसकीचाल मे हल्की लचक थि, औऱ तौलिये केँ पीछे सें उसकीपीठ औऱ पीछे कां हल्का आकार दिखाई देरहा थां। उसके पीछे कां हिस्सा तौलिये मे ढकाहुआ थां, मगरहर हल्की झुकाव औऱ कदम कि गति केँ संग उसकीपीठ कि रेखा औऱ पिछले हिस्से कि हल्की गति भि झलकरही थि। वो आरामसे कमरे कि तरफबढ़ गई, औऱ मे बस वहीं खड़ारह गय़ा, उसकीचाल, मूड औऱ हर हल्की हरकत कों ध्यान सें देखते हुए।
too be continued
bhut mast update .pr acchanak sudha itni badal kyun gai ye abi tak samaj nahee qa raha.lagta h wo ladke ko mana karne k alli h
दीदी ने चखाया अपना गीलापन - दीदी की चुत – New Episode
Episode 9
सुधा दिदी कों देखने केँ लिए रिश्तेदार दोपहर केँ वक़्त आने वाले थें। मगर माँ नें सुभह सें हि घऱसिर पऱ चढ़ाकर रखा थां। वो सुभह सें रसोई मे लगी थि, ताकिसभी कुछ अच्छा हौ। सुधा दिदी स्वयं कों खुबसूरत बनाने कि कोशिश कररही थि औऱ मे ड्राइंग रूम मे बस बैठा थां। मुझेकुछ भि सुझा नहि रहा थां। जिस दिदी नें स्वयं कों मेरे सामने पूरीतरह खोल दिया थां, जिनको कुछ दिनों पहलेइस बात पर्र हंसी आँ रही थि कि दुल्हन एक् अजनबी लड़के केँ संग एक् बैड पर्र सोने वाली हैं। आजवही दिदी मुझसे मुंहफेर रही थि।
कुछदेर बाद वो ऊपर वाले कमरे सें नीचेआई औऱ सीधे रसोई मे चली गई। वहा जाकर उन्होंने माँ सें धीमी आवाज़ मे कहा, “माँ, मेरेपास पहनने केँ लिए अच्छा ड्रेस नहि हैं। ” उनकी आवाज़ मे हल्की झुंझलाहट औऱ बेबसी साफ़ महसूस हौ रही थि।
माँ नें उन्हें ध्यान सें देखा औऱ जल्दी मेरीओर देखकर बोलि, “तूँ सुधा कों लेकर मार्केट जा। उसकेलिए एक् अच्छा नया ड्रेस लेँ आँ। रिश्तेदार आने वाले हें, उसे अच्छे सें सजधजकर होना चाहिए। ”
मैंने जल्दी बाइक पार्किंग सें निकाली औऱ बाहर् ला खड़ी कि। सुधा दिदी बिनाकुछ कहे मेरे पीछेआकर बैठ गई। जैसे हि बाइकआगे बढ़ी, उन्होंने संतुलन बनाने केँ लिए मुझेकस कर पकड़ लिया। उनकेहाथ मेरीकमर पर्र कसगए औऱ उनके मम्मों मेरीपीठ सें मजबूती सें टिकगए। वो दबाव रसीले होने केँ बावजूद गहरा थां। हर मोड़ औऱ झटके पऱ स्तनों कि हल्की हलचल मेरीपीठ पर्र साफ़ महसूस होँ रही थि।
उस स्पर्श मे गर्माहट थि, जैसे उनकी साँसों औऱ जिस्म कि धड़कनें सीधे मेरी नसों मे उतररही हों। मेरादिल लगातार तेज़ धड़करहा थां औऱ हैंडल पकड़ते हुए भि ध्यान बार-बार उनकी नज़दीकी पऱ खिंचरहा थां। सवारी कां हरसमय मुझे लंबा औऱ गहरालग रहा थां। हवा चेहरा छूरही थि, मगर असली एहसास उनकी नज़दीकी कां थां। उनके स्तनों कि नरमी औऱ गर्मी कां जोँ मेरीपीठ पर्र चिपकी हुइ थि। इससफर मे मार्ग औऱ ट्रैफिक सें अधिक मेरे दिमाग़ मे बसवही एहसास घूमरहा थां।
कुछदेर बाद दिदी नें धीरे-धीरे सें मेरेकान केँ पासकहा, “चलोमॉल चलते हें, वहा बहोत सारे ऑप्शन्स मिल जाएंगे। मुझेसही ड्रेस चुनने केँ लिएकई ड्रेसेज़ देखनी होंगी। ” उनकी आवाज़ मे उत्साह औऱ थोड़ी गंभीरता दोनों थि। मैंने सिर हिलाकर हामीभरी औऱ बाइक कां रुख सीधेमॉल कि ओर मोड़ दिया।
मॉल पहुँचने केँ बाद हम् दोनों अलग-अलग दुकानों मे घूमें। दिदी बार-बार नए-नए ड्रेस ट्राय कररही थि ताकि उन्हें परफेक्ट ड्रेस मिलसके। कभी वो मुझेदेख कर मुस्कुरा देती तौ कभी आईने मे स्वयं कों गौर सें निहारती। बीच-बीच मे हम् अंडरगारमेंट्स सेक्शन सें भि गुज़रे, जहाँ ब्रा औऱ पैंटी सजी हुई थि। वहा खड़े होकर उन्होंने मुझे हल्की सि शरमाई मुस्कान दि, जैसे मुझे चिढ़ाने याँ कुछ जताने कि कोशिश कररही हौ। उस एक् मुस्कान नें मेरे अंदर अजीब-सि हलचल पैदाकर दि।
फिन एक् बड़ीशॉप मे दिदी कों आखिरकार उनका पसन्द ड्रेस मिल गय़ा। सुभह कां वक़्त थां, इसलिये मॉल करीब खाली थां औऱ चारों तरफ शांति थि। उन्होंने वो ड्रेस उठाया औऱ सीधे चेंजिंग रूम कि तरफबढ़ गई। मे बाहर् खड़ा होकर उनका इंतजार करनेलगा, दरवाज़े केँ ठीकपास जहाँ सें उनकीआहट साफ़ सुनाई देरही थि।
कुछदेर बाद द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुला। वो मेरे सामने हल्की मुस्कान केँ संग खड़ी हुईँ औऱ धीरे-धीरे सें बोलीं, “कैसीलग रही हूं?” उनकी आँखें सीधे मेरी आँखों सें टकराई औऱ उससमय मे मेरेपास जवाब केँ लिए शब्द नहि थें, बसदिल कि धड़कनें औऱ भि तेज़ होँ गई।
उन्होंने उस टाइम हल्की नीलीरंग कि कुर्ती औऱ सफेद पायजामा पहनाहुआ थां। उनका दुपट्टा उन्होंने ओढ़ा नहि थां, जिसकी वजह सें उनके सीने कां हिस्सा साफ़ नज़र आँ रहा थां। उनकी कुर्ती कां गला थोडा ढीला थां औऱ उसकेबीच सें उनकी गहरी क्लीवेज दिखरही थि। जैसे-जैसे वो मेरी तरफ़ बढ़ी, उनकी छाती कां उभार औऱ भि साफ़ होता गय़ा।
उनकी गोलाई भरी छाती कपड़े केँ अंदरकस करभरी हुई लगरही थि। कुर्ती कां पतला कपड़ा उनकी गोलाई कों छुपाने कि बजाय औऱ उभाररहा थां। हरबार जब वो सांस लेती, तौ उनका सीना हल्का-हल्का ऊपर नीचे होता औऱ वो नज़ारा मेरी आँखों कों वहींरोक देता।
उनके सीने केँ बीच कि गहराई ऐसी थि कि नज़र हटाना मुश्किल हौ रहा थां। कुर्ती कां कपड़ा उनके स्तनों पर्र खींचकर चिपकरहा थां औऱ मुझे साफ़ अंदाज़ा होँ रहा थां कि उनके अंदर कितनी नरमी औऱ कसावट छुपी हैं। उनकीहर हल्की हरकत सें कपड़े मे हल्की लकीरें खींचती औऱ उनकी गोलाई औऱ भि साफ़उभर आती।
मैंने अचानक उनकाहाथ पकड़ा औऱ उन्हें हल्के सें पीछे कि ओर खींचते हुएपास हि बने छोटे सें चेंजिंग रूम मे लें गय़ा। उन्होंने हल्की हैरानी सें मेरीओर देखा, मगर विरोध नहि किया। द्वार (दरवाज़ा) बंदकर मैंने जल्दी कुंडी चढ़ा दि। अब वो बस चुपचाप मेरी तरफ़देख रही थि, उनकी आँखों मे हल्की शरारत औऱ झिझक दोनों थि।
मे आरामसे उनके लगभग गय़ा। वो पीछे हटने कि बजाय वहीं खड़ीरही, जैसे मुझेपरख रहीहों कि मे क्याँ करने वाला थां। मेरा चेहरा उनके लगभगआया औऱ मैंने बिनाकुछ कहे उनके होंठों पर्र अपने होंठरख दिए।
पहले वो थोड़ी चौंकी, मगर अगले हि समय उन्होंने भि अपनी आँखें बंदकर ली औऱ मेरे होंठों कों पकड़कर चूमने लगी। हमारे बीच कि दूरी पूरीतरह मिट चुकी थि। मेरी धड़कनें इतनी तेज़ थि कि मुझे स्वयं पर्र काबू करना मुश्किल लगरहा थां, औऱ उनकी साँसों कि गर्मी मेरे चेहरे पऱ उतरते हि मुझे औऱ पागलबना रही थि।
उनके होंठों कि नमी औऱ उनकी नरमी मुझे भीतर तक खींचरही थि। मे उन्हें कसकर अपनेपास खींच लेना चाहता थां। वहीं, उनके जिस्म कां हल्का कंपन, उनकी तेज़ धड़कन औऱ उनके होंठों कां जवाब देना साफ़बता रहा थां कि वो भि इससमय मे उतनी हि खोई हुइ हें जितना मे।
उनकी आँखों केँ बंद होने औऱ होंठों कि बेताबी नें मुझेये एहसास दिला दिया कि येकोई मजबूरी नहि, बल्कि उनकी भि चाह हैं। उसतंग सें कमरे मे, उसबंद दरवाज़े केँ पीछे, हम् दोनों सिर्फ़ एक्-दूसरे मे खोएहुए थें।
धीरे धीरे मेराहाथ उनकी छाती कि ओरबढ़ गय़ा। मैंने उनकी कुर्ती केँ ऊपर सें उनके स्तनों कों दबाना शुरुआत किया। वो हल्की-सि सिहरउठी, होंठों केँ बीच सें धीमी सि अहह निकली मगर उन्होंने मुझे रोका नहि। उनकी साँसें औऱ तेज़ होँ गई औऱ उन्होंने अपने होंठ औऱ गहराई सें मेरे होंठों पऱ दबादिए।
उनके मम्मों मेरे हाथों मे कसकरभर रहे थें। कपड़े केँ ऊपर सें भि उनकी नरमी औऱ गर्मी साफ़ महसूस होँ रही थि। जैसे हि मैंने हल्का दबाव बढ़ाया, वो मेरे जिस्म सें औऱ सट गई। उनकी आँखें बंद थि, माथे पर्र पसीने कि बूंदें झिलमिला रही थि औऱ उनके चेहरे पऱ चाहत साफ़ नज़र आँ रही थि।
मेरेलिए ये अहसास नया थां, मगरनशे जैसालग रहा थां। उनके सीने कां उभार, उनकी छाती कां कंपन औऱ उनकी आहटें मुझे दीवाना बनारही थि। वहीं, उनके चेहरे कि हल्की मुस्कान औऱ होंठों कि बेताबी बतारही थि कि वो भि इससमय कों उतना हि चाहरही हें जितना मे।
उस छोटे सें कमरे मे, हमारे चारों ओर सिर्फ़ हमारी साँसों कि आवाज़ औऱ धड़कनों कि गूँज थि। मे उनकेहर स्पर्श कों, उनकीहर धड़कन कों महसूस कररहा थां औऱ वो मुझे अपने पूरेदिल सें अपनाती जारही थि।
इसीबीच मैंने होंठों कों उनके होंठों सें अलग किया औऱ उनकी आँखों मे गहराई सें देखते हुए धीरे-धीरे सें पूछा, “मगर तुम् उस लड़के सें मिलने केँ लिए क्यूं रेडी हुई, जिसे घरवाले देखरहे हें? क्याँ तुम् सच मे उसे पसन्द करती हौ?”
उन्होंने थोड़ी देरचुप रहकर मेरी आँखों मे देखा, फिन धीमी आवाज़ मे बोलीं, “नहि… मुझे वोँ बिल्कुल मनपसंद नहि हैं। तुम् मेरे छोटे भइया होँ, मगर हमारा नाताअब उस दायरे सें बहोत आगेबढ़ चुका हैं। यह नाताकोई भि स्वीकार नहि करेगा, इसलिये सभी केँ सामने मुझे किसी औऱ सें विवाह करनी हि होगी। मगर इसका मतलबयह नहि कि मे इस लड़के सें विवाह करना चाहती हूं। मे तौ बस मिलने केँ लिए सजधजकर हुइ थि, विवाह केँ लिए नहि। ”
मे उनके जवाब कों समझ हि नहि पारहा थां। मेरे होंठ खुलने हि वाले थें कि कुछकह सकूँ, मगर तभी उन्होंने अचानक मेरे चेहरे कों दोनों हाथों सें पकड़ लिया औऱ मेरे होंठों पर्र ज़ोर सें अपने होंठरख दिए। उनका चूमना इसबार पहले सें कहीं ज्यादा गहरा औऱ तेज थां।
उनकी बेताबी इतनी थि कि मे समयभर कों साँस लेनाभूल गय़ा। वो मुझे इतनी ताक़त सें चूमरही थि कि मुझे साफ़-साफ़ उनकीलार अपने मुँह मे भरती हुई महसूस होँ रही थि। हरसमय उनका चूमना औऱ गहराता जारहा थां, उनकीजीभ मेरे होंठों कों चीरकर भीतरउतर आई थि।
मे उनकेइस पागलपन मे खो गय़ा। उनका चेहरा मेरी हथेलियों केँ बीच थरथरा रहा थां औऱ उनकी साँसें बेक़ाबू थि। उनके चूमने मे एक् ऐसीआग थि जिसे मे रोकना तौ दूर, उसके सामने टिक भि नहि पारहा थां। उनकी आँखें बंद थि, मगर उनकी पकड़ औऱ उनकाजोश बतारहा थां कि वो मुझे पूरीतरह सें अपनाबना लेना चाहती थि।
इसी दौरान मेराहाथ अनजाने मे नीचे उनकी पायजामे कि ओर बढ़ा। मे आहिस्ता उसकी गिरफ़्त कों ढीला करने हि वाला थां कि उन्होंने अचानक मेराहाथ पकड़ लिया औऱ होंठों सें अलग होतेहुए धीरे-धीरे सें बोलि, “नहि… अब बहोत देर होँ गई हैं। माँ चिंता करेगी, हमेंघऱ चलना चाहिए। ”
हम् दोनों नें स्वयं कों संभाला औऱ जल्द सें घऱ कि ओर निकल पड़े। घऱ पहुँचने केँ बाद उन्होंने वोँ नई ड्रेस पहनली जोँ हमनेसंग मे खरीदी थि। वो ड्रेस उन पऱ इतनीखिल रही थि कि मे उन्हें देखता हि रह गय़ा।
लगभग एक् घंटेबाद घऱ पर्र मेहमान आए। वही लड़का औऱ उसका परिवार, जिसे देखने केँ लिएसभी नें बुलाया थां। सभीलोग ड्रॉइंग रूम मे बैठगए, जबकि सुधा दिदी किचन मे गरमचाय बनाने औऱ परोसने मे लगी हुईँ थि। उनके कदमों कि आहट, बर्तनों कि खनक औऱ उनकी मौजूदगी सें पूरेघऱ मे एक् अलग हि हलचल थि।
थोड़ी देरबाद उन्होंने ट्रे मे गरमचाय भरकरसभी केँ सामने रखी। सभी नें मुस्कुरा करगरम चायली औऱ माहौल हल्का-फुल्का होँ गय़ा। दिदी जाकर सीधेउस लड़के केँ सामने बैठ गई। तभी पिताजी भि दफ़्तर सें लौटआए औऱ इसखास मौके केँ लिएसभी केँ संगबैठ गए। पूरेघऱ मे जैसे एक् खुशी कां माहौल फैल गय़ा थां।
बापू नें बात-चीत शुरुआत कि औऱ उस लड़के सें उसकेकाम औऱ परिवार केँ बारे मे पूछने लगे। सभी लोग ध्यान सें सुनरहे थें। वहीं, सुधा दिदी लड़के केँ ठीक सामने बैठी थि। मे भि पास हि बापू केँ बगल मे बैठ गय़ा औऱ चुप-चाप सभी देखता रहा।
मेरी नज़र बार-बार दिदी पऱ टिक जाती। जिस तरह सें वो कुर्सी पऱ बैठी थि, उनकी कुर्ती कां पिछला हिस्सा गर्दन सें नीचे तक थोडा खुलाहुआ थां। उनकी गोरीपीठ कां हिस्सा साफ़ दिखाई देरहा थां। हल्की रोशनी मे उनकी सफ़ेद औऱ रसीले त्वचा औऱ भि निखररही थि। मे अपनी आँखों सें उनकीउस नंगीपीठ कों जैसे महसूस कररहा थां। सभीलोग बात-चीत मे लगे थें, मगर मेरी दुनिया बसउस नज़ारे तक सिमट चुकी थि।
कुछदेर बाद लड़का औऱ उसका परिवार उठनेलगे। जाने सें पहलेउस लड़के नें कहा कि वो दिदी केँ संगकुछ तस्वीरें लेना चाहता थां। सभी नें हँसते हुए हामीभर दि। उसने मुझे हि फोनथमा दिया औऱ कहा, “भइया साहब, हमारी कुछ तस्वीरें लेँ दीजिए। ”
मे कैमरा हाथ मे लेकर खड़ा हौ गय़ा। दिदी उसकेपास खड़ी होँ गई औऱ तभी उसने अपनेहाथ सें दिदी केँ कंधे कों पकड़ लिया। मेरादिल उसीसमय कसकउठा। कैमरे कि तरफ मुस्कुराती दिदी औऱ उनके कंधे पऱ रखाउस लड़के कां हाथदेख कर मुझे बहोत बुरालगा। मैंने हमेशा सपना देखा थां कि दिदी केँ इतने लगभग सिर्फ़ मे हि रहूँ, उन्हें छूने कां हक़ सिर्फ़ मुझे हौ। मगरअब कोई औऱ लड़का उन्हें छूरहा थां औऱ मे बस खड़ा होकर तस्वीरें लेँ रहा थां।
मेरेलिए ये अहसास बेहद दर्दभरा थां। तस्वीरें खींचने केँ बाद उन्होंने शुक्रिया कहा औऱ पूरा परिवार अलविदा कहकरवहा सें चला गय़ा। मगर मेरेमन मे वो नज़ारा बार-बार घूमरहा थां, मेरी दिदी केँ कंधे पर्र किसी औऱ कां हाथ।
उसके जाने केँ बाद हम् सभी ड्रॉइंग रूम मे सोफ़े पऱ बैठगए। माँ-पिताजी बातें करनेलगे कि लड़का अच्छा हैं, अच्छी जॉब करता हैं औऱ अच्छे घऱ-परिवार सें हैं। दोनों केँ चेहरों पर्र खुशी साफ़झलक रही थि, जैसे उन्हें ये नाता बहोत पसन्द आँ गय़ा होँ। लगभगआधे घंटे तक इसीतरह चर्चा चलतीरही। मे चुप-चाप सुनता रहा औऱ दिदी कि तरफ देखता रहा। अचानक हि दिदी कि आँखों मे आँसूभर आए। वो बिनाकुछ कहेउठी औऱ अपने कमरे कि तरफचली गई।
मां उन्हें देखने केँ लिएउठी, मगर मैंने मां कां हाथ पकड़कर धीरे-धीरे सें कहा, “मां, आप् बैठिए… मे दिदी कों देख लूँगा। मे उन्हें शांतकर दूँगा। ”
मे आरामसे उनके कमरे केँ पास गय़ा औऱ दरवाज़े पर्र हल्के सें दस्तक दि। अंदर सें उनकी आवाज़ आई, “कौन?”
मैंने धीरे-धीरे सें जवाब दिया, “मे हूं… तुम्हारा भइया। ”
द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुला। जैसे हि मैंने दिदी कां चेहरा देखा, उनकी आँखें आँसुओं सें भरी हुई थि। मुझे देखते हि वो एक्-दम सें मुझे भीतर खींचलाई औऱ बिनाकुछ कहे मेरे होंठों पर्र टूट पड़ी। उनका चूमना इतना तेज़ औऱ गहरा थां कि मेरी साँसें रुक गई।
उनकी गर्म साँसें मेरे चेहरे सें टकरारही थि औऱ उनके होंठ मेरे होंठों कों इतनी मजबूती सें दबाएहुए थें कि मे स्वयं कों अलग हि दुनिया मे महसूस कररहा थां।
उनकीजीभ मेरे होंठों कों चीरती हुईँ मेरे मुँह केँ भीतरघुस आई। पहलीबार उनकीजीभ मेरीजीभ सें टकराई। वो नमी, वो गरमी औऱ वो हल्की-सि मिठास मेरे पूरे शरीर मे बिजली-सि दौड़ा गई। मे भि अबरुक नहि पाया औऱ अपनीजीभ उनकीजीभ मे उलझाने लगा। दोनों कि लारआपस मे घुलने लगी, हमारे होंठों सें हल्की-सि आवाज़ें निकलरही थि।
दिदी कि आँखें बंद थि, उनके चेहरे पर्र आँसुओं कि बूंदें थि मगर होंठों पऱ इतनी गहराई औऱ चाहत थि कि मे उसमें खो गय़ा। उनके होंठ इतने रसीले औऱ गर्मलग रहे थें कि मुझेलग रहा थां जैसेकोई मीठानशा चढ़रहा हौ। वो मुझे इतनी मजबूती सें चूमरही थि कि मे चाहकर भि अलग नहि हौ सकता थां। हरबार जब उनकीजीभ मेरीजीभ सें टकराती, मेरी साँसें औऱ तेज़ होँ जाती। उनकाये अचानक उफान, उनकाये टूटकर चूमना, मेरेलिए सबसे बड़ा सबूत थां कि वो मुझे कितना चाहती हें।
मैंने उन्हें अपनी बाँहों मे उठाकर धीरे-धीरे सें पलंग पर्र लिटा दिया। हमारे होंठअब भि जुड़े हुए थें, औऱ मे उनकेऊपर झुककर उन्हें लगातार चूमता जारहा थां। मेरी उंगलियाँ अनजाने मे उनकीकमर सें नीचेसरक गई। मैंने उनके पायजामे केँ भीतर अपनाहाथ डाल दिया। सबसे पहले मेरी उंगलियों नें उनकी रसीले पैंटी कों छुआ। वो बेहद गर्म औऱ नर्म महसूस हुईँ।
मैंने कुछसमय उसी पऱ हाथ फिराया, उनकी हल्की-सि सिसकारियों सें समझ आँ रहा थां कि वो भि इसेरोक नहि रही। फिन आहिस्ता मेरी उंगलियाँ औऱ आगे बढ़ी। पैंटी केँ कपड़े कों पार करतेहुए मे आखिर उनके नाज़ुक हिस्से तक पहुँच गय़ा। मेरी उंगलियाँ उनकेउस गीलेपन कों महसूस कररही थि, जोँ मेरे पूरेबदन कों औऱ पागलकर रहा थां। उनकी जाँघें थोड़ी कांपने लगी औऱ वो मेरी गर्दन कों कसकर पकड़ चुकी थि।
उनकी साँसें भारी हौ रही थि, होंठअब भि मेरे होंठों सें टकरारहे थें औऱ उनकीजीभ मेरे मुँह मे बेख़ौफ़ खेलरही थि। मेरी उंगलियाँ अब औऱ आगे बढ़ी। मैंने धीरे-धीरे सें दो उंगलियाँ उनके नाज़ुक हिस्से मे सरका दि। उनका शरीर अचानक कस गय़ा औऱ होंठों सें एक् धीमी कराह निकल गई। मैंने उंगलियों कों बहोत हि आहिस्ता हिलाना शुरुआत किया, जैसे उनकी साँसों कि लय कों महसूस कररहा हूं।
हर हल्की-सि हरकत केँ संग उनकीकमर मचल उठती, उनकी जाँघें औऱ कसकरबंद होने कि कोशिश करती, मगर फिन ढीलीपड़ जाती। उनकी गर्म औऱ भीगी स्थान मे मेरी उंगलियाँ डूबी हुइ थि औऱ मे उन्हें बहोत धीमीगति सें अंदर-बाहर् कररहा थां। उनके होंठअब औऱ भि ज्यादा मेरे होंठों कों दबाने लगे, उनकीजीभ मेरे मुँह केँ अंदर तेज़ी सें घूमने लगी।
उनकी साँसें अब बेहद भारी होँ चुकी थि, हर सिसकी केँ संग उनका सीना ऊपर-नीचे होँ रहा थां। मेरीदो उंगलियाँ उनके भीतर धीरे धीरेचल रही थि औऱ उनके पूरेबदन कों जैसे झनझना रही थि। दिदी कि हर धड़कन, हरआहट मुझे साफ़ महसूस हौ रही थि औऱ उनके चेहरे पर्र चाहत औऱ बेचैनी दोनों साफ़ दिखाई देरहे थें।
आहिस्ता उनका शरीर औऱ भि ज्यादा कांपने लगा। उनके होंठों सें कराहें अब तेज़ होँ चुकी थि। अचानक उनकीकमर तेज़ी सें मचलउठी औऱ उनकी पकड़ मेरी गर्दन पर्र औऱ भि मज़बूत हौ गई। उन्होंने अपने नाखून मेरीपीठ मे गड़ादिए औऱ फिन एक् लंबी कराह केँ संग उनका जिस्म ढीला पड़ने लगा। मे साफ़समझ गय़ा, वो मेरी उंगलियों पर्र हि आँ गई थि।
उनकी गर्मनमी मेरी उंगलियों कों भिगोरही थि। मे आरामसे अपनी उंगलियाँ बाहर् लें आया। उनकी आँखें अब भि बंद थि, चेहरा लाली सें भरा थां औऱ साँसें तेज़चल रही थि। मे झुककर उनके होंठों केँ पास गय़ा, मगर उन्होंने मेरी उंगलियाँ पकड़ली औऱ धीमी आवाज़ मे बोलि, “मे तुम्हें कभी छोड़कर जानां नहि चाहती, गोलू…”
औऱ फिन उन्होंने मेरी उंगलियाँ अपने होंठों केँ पास लें जाकर आहिस्ता चाटना शुरुआत कर दिया। उनकीजीभ मेरी भीगी उंगलियों पर्र घूमरही थि। वो मुझेदेख रही थि, आँखों मे चाहत औऱ बेचैनी केँ संग, औऱ हरबार जब उनकीजीभ मेरी उंगलियों कों चूमती, मेरे भीतरआग औऱ तेज़ भड़क जाती।
इतने मे पिताजी नें नीचे सें बुलाया। दिदी जल्द सें अपने कपड़े ठीक करनेलगी। मैंने भि उन्हें सहायता कि औऱ हम् दोनों संग मे नीचे ड्रॉइंग रूम मे चलेगए।
जैसे हि हम् ड्रॉइंग रूम मे पहुँचे, पिताजी नें दिदी कों गोद मे उठाकर कसकरगले लगा लिया। उनके चेहरे पऱ खुशी कि हल्की मुस्कान थि, मगर आँखों मे एक् उदासी झलकरही थि। माँ पीछे खड़ीबस हमेंदेख रही थि, उन्होंने कुछ नहि कहा, मात्र मुस्कुराई। पिताजी कि आँखों मे गर्व औऱ चमक थि। उन्होंने धीरे-धीरे सें कहा, “वोँ लड़का हमें अभि कॉलआई करकेबता रहा थां कि वो सजधजकर हैं तुम्हारे संग विवाह करने केँ लिए। ”
दिदी कि आँखों मे अचानक एक् हल्की सि झील सि उमड़आई, औऱ उसका चेहरा थोडा फीकापड़ गय़ा। वो खुशी दिखाने कि कोशिश कररही थि, मगर अंदर सें वो दुःखी थि। मेरेदिल मे एक् अजीब सि पीड़ा उठरही थि, क्योंकि मे उसे हमेशा चाहता थां औऱ उसकेसंग रहने कि ख्वाहिश रखता थां।
too be continued
बहोत हि हसीन लिखा हैं आपने. दोनों कि पहली chudai होते होतेरह गई,. अब देखोरात मे कुछ हौ पाता हैं इनका याँ नहि
दीदी ने चखाया अपना गीलापन - दीदी की चुत – New Episode
Episode 10
आखीरकार सुधा दिदी कि विवाह तय हौ गई औऱ दिन बीतने लगे। अब हम् दोनों केँ बीच पहले जैसाकुछ भि नहि रहा थां। हम् दोनों कों अकेले वक़्त बिताने कां मौका नहि मिलता औऱ अगरऐसा कोई मौकामिल भि जाए, तौ मे स्वयं कों उसके लगभग जाने सें रोकता।
मगरफिन भि, सुधा दिदी कभी-कभी मुझे अपनीतरफ खींचने कि कोशिश करती। वो जान-बूझ करऐसे कपड़े पहनती, जिनसे उनकागला थोडा औऱ खुला दिखाई दे, औऱ झुकते टाइम उनकी क्लीवेज साफ नज़रआती। कईबार वो पल्लू ढीला छोड़कर याँ टी-शर्ट हल्का खींचकर अपने सीने कि ओर मेरा ध्यान खींचने कि कोशिश करती। कभी-कभी वो किचन मे याँ कमरे मे काम करतेहुए अपनी साड़ी थोडा ऊपरउठा देती, जिससे उनका चिकना पेटसाफ दिख जाता।
मे येसभी देखता जरूर थां, मगरहर बार नज़रें चुराकर दूसरी ओर देखने लगता। दिल केँ अंदर खिंचाव तोँ थां, मगर दिमाग़ बार-बार कहता कि अगर मैंने हारमान ली, तोँ हमारी दुनिया पूरीतरह बिखर जाएगी। मे डरता थां कि कहींये नाताअब पूरीतरह समाप्त नां हौ जाए, औऱ यहीसोच कर मे उनकीहर कोशिश कों नज़र-अंदाज़ करतारहा।
दिनयूं हि गुजरते रहे औऱ देखते हि देखते वक्तहाथ सें फिसल गय़ा। आखिरकार वो दिन भि आँ गय़ा जब पूरेघऱ मे विवाह कि तैयारियाँ चरम पऱ थि। ढोलक, गाने औऱ मेहमानों कि चहल-पहल हरओरछा गई। दिदी केँ हाथों मे हल्दी रचाई जाने वाली थि। आज उनकी हल्दी कि रस्म थि औऱ अगले हि दिन उनकी विवाह होने वाली थि।
उसीदिन सुभह लगभगदस बजे सुधा दिदी नें मम्मी सें कहा कि वो अपनी एक् पुरानी सहेली सें मिलना चाहती थि। उसने बताया कि उनकी सहेली कल उनकी विवाह मे शामिल नहि हौ पाएगी क्योंकि उसेजॉब केँ इंटरव्यू केँ लिए दूसरे शहर जानां थां। इसलिये दिदी चाहती थि कि विवाह सें पहले एक् बार उससेमिल लें।
मम्मी नें उन्हें परमीशन दे दि। तभी दिदी नें मुस्कुराते हुएकहा, “मां, क्याँ मे गोलू कों संग लेँ जाऊ? हम् लोग जल्द हि लौट आएँगे। रिश्तेदारों केँ आने सें पहले हि घऱ पहुँच जाएँगे। ”
मम्मी नें सिर हिलाते हुएकहा, “ठीक हैं, गोलू तुम् अपनी दिदी केँ संगजाओ औऱ सीधा वापस आँ जानां। जल्दलौट आनां क्योंकि आजघऱ मे बहोत काम हैं। ”
हम् दोनों घऱ सें निकलकर वाहन तक पहुँचे। मैंने व्हीकल स्टार्ट कि औऱ दिदी मेरे बिल्कुल पास वालीसीट पऱ बैठ गई। सन्नाटा गहराने लगा, बस इंजन कि हल्की गुनगुनाहट औऱ हमारे दिल कि धड़कनें सुनाई देती थि। कल दिदी कि विवाह थि, औऱ मेरेमन मे अजीब-सि कसकउठ रही थि। मुझेलग रहा थां कि शायदये आख़िरी बार थां, जब मे अपनी दिदी कों इतनी क़रीब महसूस करपारहा थां। मेरी नज़रें बार-बार दिदी कि ओर खिंच जाती, मानोहर पल अपने भीतर समेट लेना चाहता होँ।
लगभगआधे घंटे ड्राइव करने केँ बाद अचानक दिदी नें कहा, “कार यहींरोक दो। ” मैंने चौंककर देखा तोँ सामने एक् रेस्टोरेंट होटल थां। मैंने सोचा कि शायद उन्हें कुछ खाने कां मन थां, इसलिये जल्दी गाड़ी रोक दि। मगर दिदी सीधे रेस्टोरेंट कि ओर नाँ जाकर होटल केँ रिसेप्शन काउंटर कि तरफ़बढ़ गई। मे थोडा हैरान-सां उनके पीछे-पीछे चला गय़ा। रिसेप्शन पऱ बैठे व्यक्ति नें मुस्कुरा कर पूछा, “जी मैडम, क्याँ चाहिए?”
दिदी नें बिना हिचकिचाए कहा, “हमें एक् रूम चाहिए। ”
मे हैरान खड़ा थां। रिसेप्शनिस्ट नें कंप्यूटर मे फ़ॉर्म भरना शुरुआत किया। उसनेनाम, पता वगैरह पूछा औऱ दिदी नें बड़े धीरे-धीरे जवाबदिए। आख़िर मे उसनेसिर उठाकर पूछा, “मैडम, रिलेशन क्याँ लिखूँ?”
उस लम्हा दिदी नें अचानक मेराहाथ पकड़ लिया। उनकी हथेलियों कि गर्माहट मेरे पूरेबदन मे फैल गई। उन्होंने बहोत सहज अंदाज़ मे मुस्कुराते हुएकहा, ” ये मेरा बाॅयफ्रेंड हैं। ”
मेरी साँसें थम-सि गई। दिल इतनी ज़ोर सें धड़करहा थां कि जैसे रिसेप्शन हॉल मे सभीसुन सकतेहों। रिसेप्शनिस्ट नें मुस्कुरा करसिर हिलाया औऱ एंट्री पूरी करके हमेंरूम कि चाबीदे दि। दिदी मुझे लेकर लिफ्ट कि तरफ़ बढ़ी। मेरेकदम अपने आप् उनके पीछे खिंचते चलेजा रहे थें। जैसे हि हम् होटल केँ कमरे तक पहुँचे औऱ द्वार (दरवाज़ा) खोला, एक् अजीब-सि धड़कन औऱ अनकही उम्मीद भीतर उमड़आई।
कमरे मे घुसते हि मे बेड केँ पास खड़ा होँ गय़ा औऱ धीरे-धीरे सें पूछा, “दिदी, यह आप् क्याँ कररही होँ?”
अचानक दिदी नें मुझेजोर सें गलेलगा लिया। उनका जिस्म हल्का काँपरहा थां औऱ उनकी गर्म साँसें मेरे सीने सें टकरारही थि। वोँ रो पड़ी औऱ बोलीं, “गोलू, विवाह केँ बाद मे तुम्हारे संगयह नाता नहि रख पाऊँगी। इसलिये आज, विवाह सें पहले मे सभीकुछ तुम्हारे संग करना चाहती हूं। ”
मेरेकुछ कहने सें पहले हि उन्होंने मेरे होंठों पऱ अपने होंठरख दिए। उनके होंठ इतने रसीले थें कि मेरा पूराबदन सिहरउठा। मेरी साँसें तेज हौ गई औऱ मे उनके चूमने मे खोताचला गय़ा। उनका सीना मेरे सीने सें दबाहुआ थां। उनके भारी औऱ गर्म बूब्ज़ मेरी छाती सें ऐसे चिपके थें कि मुझेसभी कुछ साफ़ महसूस होँ रहा थां। उनकाहर चूमना, हर छूना मुझे औऱ पागलकर रहा थां। उनके होंठों कि मिठास, उनकेबदन कि गर्मी औऱ उनकाबदन मुझे पूरीतरह अपनेबस मे कररहा थां।
कुछदेर बाद दिदी नें अचानक मुझे पीछे किया औऱ मेरे चेहरे कि ओर देखती हुई अपने होंठों कों हल्का सां काटते हुए मुस्कुराई। उनकी आँखों मे आँसू थें मगर उनमें चाहत भि साफ़झलक रही थि। बिनाकुछ कहे उन्होंने आहिस्ता अपनी कुर्ती उतारना शुरुआत किया। जैसे-जैसे कपड़े नीचे गिरते गए, उनकारूप औऱ भि निखरता गय़ा।
उन्होंने पहले अपना दुपट्टा हटाया, फिन कुर्ती औऱ सलवार भि उतार दि। अब उनके जिस्म पर्र सिर्फ़ ब्रा औऱ पैंटी बची थि। मे उन्हें देखता रह गय़ा, मेरी साँसें रुक-सि गई। उन्होंने मेरीओर देखते हुए धीरे-धीरे सें अपनी ब्रा कि हुक खोली औऱ वोँ भि नीचे गिरा दि। उनके भारी औऱ गोल मम्मों आज़ाद हौ गए, हल्के-हल्के हिलते हुए मेरे सामने थें। उनकी गुलाबी निप्पलें कसाव मे थि औऱ उनके सीने कि हुस्न मुझे औऱ दीवाना बनारही थि।
फिन उन्होंने अपनी पैंटी भि उतार दि। मे अपनी आँखों पर्र यकीन नहि करपारहा थां। उनका जिस्म अब पूरीतरह मेरे सामने थां। उनकापेट सपाट, गोरा औऱ नरमलग रहा थां। उनकेबीच कां हिस्सा, उनकी प्यारी सि स्थान, हल्की जमी बालों केँ बीच छुपी हुईँ थि मगर उतनी हि साफ़ औऱ हसीन।
वोँ धीरे-धीरे सें बेड पऱ लेट गई औऱ मुझे देखने लगी। उनके चेहरे पऱ हल्की लज्जा, थोड़ी घबराहट औऱ ढेर सारी चाहत साफ़ नज़र आँ रही थि। उनका खुलाहुआ बदन, उनके भारी बूब्ज़ औऱ उनकी नाज़ुक स्थान देखकर मेरादिल औऱ तेज़ धड़कने लगा। वोँ लम्हा ऐसा थां जैसे पूरी दुनिया रुक गई हौ औऱ बस मे औऱ दिदी एक्-दूसरे मे खोएहुए हों।
मैंने आरामसे अपने भि सारे कपड़े उतारदिए औऱ उनकेपास जाकर उनके पैरों केँ बीचबैठ गय़ा। वोँ हल्की सिहरन केँ संग मुझेदेख रही थि। मैंने झुककर उनके नाज़ुक पैरों कों अपने होंठों सें चूमना शुरुआत किया। दिदी कि आँखें बंद हौ गई औऱ उनके चेहरे पऱ हल्की मुस्कान फैल गई।
मे उनके पैरों सें ऊपर कि ओर बढ़ता गय़ा। टखनों सें लेकर जाँघों तक उनकेबदन कों चूमता रहा। दिदी कि साँसें तेज़ होनेलगी औऱ उनका सीना ऊपर-नीचे उठनेलगा। उनके होंठों सें हल्की-हल्की आहें निकलरही थि।
आरामसे मे उनके सबसे नाज़ुक हिस्से तक पहुंचा। वोँ हल्की सि काँप गई औऱ अपनी जाँघें थोडा औऱ खोलदीं। मैंने झुककर उनकेउस हिस्से कों चूमना शुरुआत किया। उनका पूराबदन झनझना उठा। वोँ दोनों हाथों सें चादर कों पकड़कर दबाने लगी औऱ उनकी आँखों मे एक् अजीब-सि चमक थि। उनकी साँसें अब औऱ भारी होँ चुकी थि।
वोँ बीच-बीच मे हल्की सिसकारियाँ भरती औऱ मेरीओर देखकर आँखें बंदकर लेती। उनके चेहरे पर्र चाहत, लाज औऱ खुशीसभी एक् संगझलक रहा थां। मे आहिस्ता उनकीउस स्थान पऱ किस्स करतारहा औऱ दिदी पूरीतरह मेरे अहसासों मे खोतीचली गई।
कुछदेर बाद दिदी नें मुझेऊपर खींचते हुए धीरे-धीरे सें कहा, “अब औऱ मतरुक… अंदरडाल दो। ” उनकी आवाज़ काँपरही थि मगर उसमें चाहत साफ़झलक रही थि।
मे उनके बिल्कुल पास गय़ा औऱ अपना लन्ड उनके नाज़ुक हिस्से केँ पास लें आया। पहलीबार मे इससमय कों जीरहा थां, दिल इतनी तेज़ धड़करहा थां कि जैसे सीने सें बाहर् निकल आएगा। मैंने धीरे-धीरे सें उसे उनकी गीली स्थान केँ पास लगाया औऱ हल्के-हल्के वहा रगड़ने लगा।
जैसे हि मेरा लन्ड उनकी नाज़ुक त्वचा सें टकराता, दिदी हल्की सिहरन केँ संग कराह उठती। उनकी साँसें औऱ तेज़ होनेलगी। वोँ आँखें बंद करके होंठ भींच लेती, फिन एक्-दम सें हल्की अहह निकल जाती। मे उनके दोनों पैरों केँ बीचफँस कर धीरे धीरे ऊपर-नीचे करतारहा, मेरा लन्ड उनके भीगे हिस्से पऱ लगातार फिसलरहा थां। हरबार केँ रगड़ सें वहा कि नमी औऱ बढ़ती जारही थि।
उनकी जाँघें हल्की-हल्की काँपरही थि। वोँ कभी चादर पकड़ लेती, कभी मेरे बालों मे हाथडाल देतीं। उनके चेहरे पर्र लज्जा, डर औऱ चाहतसभी एक् संग साफ़झलक रहा थां। उनके होंठों सें लगातार सिसकारियाँ निकलरही थि, मानो वोँ चाहती भि थि औऱ डर भि रही थि।
मे आरामसे औऱ नीचे झुकता गय़ा औऱ अपना लन्ड उनके बिल्कुल नाज़ुक हिस्से केँ मुंह पऱ लेँ आया। वहा कि गर्माहट औऱ नमी नें मुझे पूरीतरह मदहोश कर दिया। मैंने हल्के दबाव सें उसे अंदर डालने कि कोशिश कि। जैसे हि मेरा लन्ड थोडा-सां अंदर गय़ा, दिदी कि आँखें अचानक खुली औऱ वोँ दर्द सें चीखउठी। उनका पूराबदन अकड़ गय़ा।
वोँ काँपती आवाज़ मे बोलीं, “रुकजाओ! बहोत बड़ा हैं… मुझे दर्द हौ रहा हैं। ”
मे ठहर गय़ा औऱ उनकी आँखों मे हैरानी सें देखा। पहलीबार यह एहसास मुझे जितना सुखदे रहा थां, उतना हि डर भि भररहा थां कि कहीं उन्हें चोट नां लगजाए। मैंने हकलाते हुएकहा, “मगर दिदी… आपने तोँ पहले भि किसी औऱ केँ संग किया थां। ”
वोँ परेशानी सें कराहते हुए बोलि, “हाँ…मगर तुम्हारा उससे भि बड़ा हैं। मुझे बहोत दर्द हौ रहा हैं। पहलेकुछ लगाओउस पऱ… नहि तौ मे सह नहि पाऊँगी। ”
उनकी आँखों मे आँसू थें, मगर उनमें अब भि चाहत कि चमक थि। उनका जिस्म तड़परहा थां, पर्र वोँ चाहती थि कि मे उनकी परेशानी समझूँ। मे उनके चेहरे कों सहलाने लगा औऱ उनकीबात सुनकर आरामसे रुक गय़ा।
मैंने टेबल पऱ रखा लोशन उठाया औऱ दोनों हाथों मे महसूस किया। फिन मे उनके पैरों केँ बीच वापसआया। मैंने सबसे पहले लोशन कों अपने लन्ड पऱ लगाया, धीरे धीरेउसे पूरीतरह सें कवर किया ताकिआगे बढ़ने मे आसान हौ। उसकेबाद मैंने उसी लोशन कों उनकी नाज़ुक स्थान पऱ लगाया, आरामसे, हर हिस्से कों नर्माई सें ढकतेहुए। उनकी त्वचा कि गर्माहट औऱ नमीअब लोशन केँ संग औऱ भि साफ होँ गई।
मे फिन सें उनकेबीच बैठ गय़ा। मेरी साँसें तेज़ हौ गई, हाथ हल्के काँपरहे थें, मगरदिल मे अब औऱ हिचक नहि थि। मैंने आरामसे अपने लन्ड कों उनके भीतर लेँ जाने कि कोशिश शुरुआत कि। जैसे हि मेरी पहलीझलक उनके अंदर घुसी, दिदी हल्की कराह केँ संग थोड़ी सि सिकुड़ गई। मे रुका नहि, बल्कि आरामसे औऱ गहराई मे बढ़ता गय़ा। उनकीनमी औऱ गर्माहट नें मुझे अंदर जाने मे सहायता कि।
जैसे-जैसे मे आहिस्ता आगे बढ़ता गय़ा, उनका जिस्म हर स्पर्श पर्र सिहरउठा। उनकी आँखें बंद थि, होंठ हल्के सें खुले थें औऱ हल्की आहें निकलरही थि। हरइंच अंदर जाने पर्र उनकी जाँघें हल्की-हल्की हिलरही थि औऱ उनका जिस्म मेरेहर मूवमेंट पऱ संगदे रहा थां।
मैंने अपना लन्ड पूरीतरह धीरे धीरे अंदर धकेला, हरबार रुककर उनकी हरकत देखी औऱ फिनआगे बढ़ा। ये उनकेलिए भि नया एहसास थां, इसलिये हरकदम आरामसे थां। वोँ हल्की-हल्की कराहती रही, पर्र इसबार उन्होंने मुझे रोकने कि कोशिश नहि कि। उनकी आँखों मे दर्द केँ संग-संग चाहत कि चमक थि।
जैसे हि मेरा लन्ड पूरीतरह उनके भीतर आँ गय़ा, उनकी साँसें भारी औऱ तेज़ हौ गई। उनका जिस्म मेरेबदन सें जुड़ गय़ा, औऱ हर हल्की हरकत पऱ वे काँपरही थि। मे आरामसे आगे-पीछे होनेलगा, हर मूवमेंट कों महसूस कररहा थां, उनका चेहरा कभी उठता, कभी पीछे झुकता, होंठों सें हल्की आहें निकलरही थि, औऱ उनकेहाथ मेरे कंधों औऱ छाती कों कसकर पकड़रहे थें।
ये पहलीबार थां जब मे उनके अंदर पूरीतरह गय़ा। उनकाबदन मेरीहर गति केँ संग झनझना रहा थां, उनकी सांसें मेरे कानों मे हल्की-हल्की हिटकर रही थि, औऱ उनके चेहरे पऱ दर्द औऱ खुशी दोनों कि मिली-जुली भावना थि। मे हर लम्हा कों महसूस कररहा थां, आहिस्ता औऱ पूरीतरह सें उनके अंदर रहने कां एहसास लें रहा थां।
कुछदेर बाद उन्होंने भारी सांसों केँ बीचकहा, “अगर तुम् चाहो तौ अपनी स्पीड बढ़ा सकते होँ। ” येसुन कर मेरे जिस्म मे एक्-दम सें गर्मी दौड़ गई। मेरी उत्तेजना औऱ बढ़ गई। मैंने जल्दी अपनीचाल थोड़ी तेज़कर दि।
जैसे हि मेरी रफ्तार बढ़ी, दिदी नें आँखें कसकरबंद करली, औऱ दर्द सें ऊँची आवाज़ मे कराहउठी। उनकाबदन झटके सें तना औऱ उन्होंने चादर कों दोनों हाथों सें कसकर पकड़ लिया। उनके चेहरे पऱ दर्द साफ़दिख रहा थां। मे घबरा गय़ा औऱ रुककर धीरे-धीरे सें पूछा, “दिदी, क्याँ मे धीरे-धीरे करदूँ?”
उन्होंने आँखें खोलकर मुझे देखा, साँसें अब भि भारीचल रही थि। फिन बोलीं, “नहि… मत रुकना। मे यह दर्दसह सकती हूं। अपने छोटे भइया केँ लिए। ” उनकी आँखों मे आँसू थें मगर उसमें एक् साफ़ इरादा भि दिखरहा थां।
मैंने फिन सें आरामसे हरकत शुरुआत कि औऱ आरामसे अपनी स्पीड बढ़ाई। हर धक्का उन पर्र सीधाअसर डालरहा थां। उनकी भौंहें सिकुड़ जाती, होंठों सें दबा-दबा कर आवाज़ें निकलती। जब मे औऱ तेज़ी सें धकेलता, तोँ वोँ ज़ोर सें कराह उठती, उनके सीने ऊपर-नीचे होने लगते औऱ पैरों कि पकड़ औऱ कड़ी हौ जाती।
उनका चेहरा दर्द सें भरा थां, मगरसंग हि उसमें एक् तरह कां अपनापन थां, जैसे वोँ सभीकुछ सहने कों रेडी थि। वोँ बार-बार करवटें बदलने कि कोशिश करतीमगर मुझे रोकती नहि थि। उनकी आँखें कभीकस करबंद होँ जाती, कभी मुझे सीधा देखती। हरबार जब मे औऱ गहराई तक जाता, उनकी आँखों मे दर्द औऱ चाहत कां मिला-जुला असर साफ़ दिखता।
वोँ बार-बार ज़ोर सें साँस खींचती, होंठकाट लेती औऱ उनकेहाथ मेरेपीठ औऱ कंधों पऱ कसकरदब जाते। उनकी हरकतों सें साफ़ थां कि दर्द सच-मुच असली थां, मगर उन्होंने स्वयं कों रोकने नहि दिया। मे उनके चेहरे पऱ हर सच्ची हरकतदेख रहा थां, कराहना, आँखों सें आँसू आनां, होंठ कांपना, सभीकुछ। येसभी बिल्कुल असली औऱ कच्चा थां। कोई बनावटीपन नहि, कोई दिखावा नहि। बस मे, मेरी चाहत, औऱ उनका दर्द जौ वोँ मेरेलिए सहरही थि।
मे आरामसे उनकेऊपर पूरीतरह लेट गय़ा। उनकागरम बदन मेरे सीने सें सट गय़ा औऱ मेरी साँसें उनकी गर्दन पर्र महसूस होनेलगी। मेरा लन्ड अब भि उनकी नाज़ुक स्थान केँ अंदरजोर सें चलरहा थां, औऱ उसी केँ संग मैंने अपने दोनों हाथ उनके सीने पऱ रखे।
मैंने उनके रसीले मगर भारी सें लगते स्तनों कों कसकर दबाना शुरुआत किया। जैसे हि मेरे हाथों नें उन्हें दबाया, उनका चेहरा दर्द औऱ खुशी सें एक् संग मरोड़ गय़ा। मैंने दबाव औऱ बढ़ाया, उंगलियाँ उनके निपल्स तक पहुँच गई औऱ उन्हें पकड़कर खींचने लगा। वोँ ज़ोर सें कराह उठीं, उनकी साँसें तेज़ हौ गई औऱ उनका चेहरा हल्का-हल्का लाल पड़ने लगा।
मेरेहर धक्के केँ संग उनका पूरा जिस्म हिलरहा थां। उनके स्तनों पर्र मेरी पकड़ इतनी मज़बूत थि कि वोँ दबकर हल्के गुलाबी सें लाल होनेलगे। उनके होंठ कांपरहे थें, आँखों मे आँसूचमक रहे थें, औऱ उनका सीना मेरे हाथों केँ दबाव सें लगातार ऊपर-नीचे होँ रहा थां।
उनकी नाज़ुक स्थान औऱ मेरा लन्ड दोनों लोशन सें ढकेहुए थें। हरबार जब मे अंदर तक धकेलता, तौ गीली आवाज़ें कमरे मे गूंजती। यह आवाज़ें हमारी साँसों औऱ उनकी कराहटों केँ संगमि लकर माहौल कों औऱ भि तेजबना रही थि।
मैंने उनके स्तनों कों औऱ कसकर दबाया, कभी दोनों हथेलियों सें घेर लिया, कभी उँगलियों सें निपल्स मरोड़ दिए। वोँ हरबार जोर सें चीख पड़ती, मगर स्वयं कों पीछे नहि खींचती। उनके चेहरे कां लालरंग अब उनके स्तनों तक उतरआया थां। हर हलचल, हर आवाज़ साफ़ औऱ असली थि, उनकाबदन दर्द औऱ उत्तेजना मे पूरीतरह डूब चुका थां।
इसीबीच उन्होंने भारी सांस लेतेहुए कहा, “गोलू… क्याँ तुम् पोज़िशन बदलना चाहते होँ?”
मैंने जल्दी उनकी आँखों मे देखा औऱ बिना रुके बोला, “नहि दिदी, मे अबरुक नहि सकता… मे करीब निकलने हि वाला हूं। ”
मेरी आवाज़ मे उतावली औऱ उत्तेजना साफ़ थि, औऱ यहसुन कर दिदी नें होंठकाट लिए, उनकी आँखों मे मिली-जुली चाहत औऱ दर्दझलक रहा थां।
मेरी हालत बेकाबू होँ चुकी थि। मैंने अपनी रफ्तार औऱ तेज़कर दि, हर धक्के केँ संग दिदी ज़ोर सें कराहने लगी। उनका पूराबदन मेरे नीचे काँपरहा थां। मगरतभी उन्होंने अचानक कराहते हुएकहा, “गोलू… अंदरमत निकलना… आजसेफ डे नहि हैं। ” उनकी आवाज़ मे डर औऱ घबराहट दोनों साफ़झलक रहे थें।
मे जल्दी औऱ अधिक बेकाबू हौ गय़ा। जब मुझेलगा कि अब मे स्वयं कों रोक नहि पाऊँगा, तौ मैंने जल्द सें अपना लन्ड उनके अंदर सें बाहर् खींच लिया। उसी समय मेरे अंदर सें गरमतरल फव्वारे कि तरह बाहर् निकला औऱ सीधा उनकी जाँघों औऱ उनकी नाज़ुक स्थान केँ सामने फैल गय़ा। वोँ गर्माहट उनकेबदन पऱ पड़ते हि उन्होंने हल्की चीख निकाली औऱ आँखें कसकरबंद करली।
मगर मे यहीं नहि रुका। मेराबदन बार-बार झटकाखा रहा थां औऱ हरबार औऱ भि गरमतरल बाहर् निकलरहा थां। मे उनकेपेट औऱ नाभि तक झुक गय़ा औऱ वहा भि बहनेलगा। उनका पूरापेट, उनका रसीले सां निचला हिस्सा उस गाढ़े औऱ गरमतरल सें गीला हौ गय़ा।
दिदी हाँफरही थि, उनकी साँसें बहोत तेज़ थि। उन्होंने अपनी उँगलियों सें अपनेपेट औऱ जाँघों पर्र फैलाहुआ गीलापन महसूस किया। फिन उन्होंने वही उँगलियाँ उठाकर उस गीलेपन सें खेलना शुरुआत किया। वोँ अपनी उँगलियों पर्र चिपका हुआतरल देखतीं औऱ हल्की मुस्कान केँ संगउसे इधर-उधर फैलाती।
कुछ लम्हा बाद उन्होंने अपनी उँगलियों सें कुछ बूंदें उठाई औऱ अपने माथे पऱ भरकर लगाया, जैसे विवाह कां सिंदूर होँ। उनका माथाचमक उठा औऱ उस पऱ वोँ सफेद गीलापन साफ़ दिखाई देनेलगा। उनकी आँखों मे आँसू थें मगर होंठों पऱ हल्की मुस्कान थि। उन्होंने मुझे देखते हुए धीमी आवाज़ मे कहा, “गोलू…आज हमारा आख़िरी दिन हैं। इसकेबाद मे तुम्हारे संग नहि रह पाऊँगी। मगर मे तुम्हें कभी नहि भूलूँगी। ”
उनकीयह हरकत देखकर मेरादिल जोर सें धड़कने लगा। उनके चेहरे पऱ थकान थि, मगर माथे पर्र लगीउस गीलापन कि लकीर उन्हें औऱ भि हसीन औऱ अनोखा बनारही थि। उनकी आँखों कि नमी, माथे पर्र सफेदचमक औऱ होंठों पऱ मजबूर मुस्कान नें उस लम्हा कों हमेशा केँ लिए मेरी यादों मे समा दिया।
मैंने आगेबढ़ कर उन्हें मजबूती सें अपनी बाहों मे भर लिया। दोनों केँ शरीर पसीने औऱ थकान सें भीगेहुए थें, मगरउस हग मे एक् अजीब सां चैन थां। उनकी सांसें मेरे सीने सें टकराकर औऱ भारीलग रही थि। उन्होंने अपनी आँखें बंदकर ली औऱ सिर मेरे कंधे पऱ रख दिया। मे जानता थां कि कल उनकी विवाह थि औऱ उसकेबाद हम् दोनों केँ बीचसभी कुछ ख़त्म होँ जाएगा। येसोच कर मेरेदिल मे कसकउठी।
मैंने उनकीपीठ पऱ हाथ फेरते हुए धीरे-धीरे सें कहा, “दिदी, मे भि आपकोकभी नहि भूलूँगा। ”
हम् दोनों एक्-दूसरे सें कसकर लिपटे रहे। उस बाहों मे हमारे रिश्ते कि सारी किस्सा थि, प्रेम, पागलपन, दर्द औऱ विदाई। कमरे मे सिर्फ़ हमारी सांसों कि आवाज़ गूंजरही थि, औऱ हम् दोनों जानते थें कि कल सें सभीकुछ बदल जाएगा।
किस्सा खत्म।
दीदी ने चखाया अपना गीलापन - दीदी की चुत - Continue reading for full story
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