दुग्ध व्यसन - Preeti aur Prateek ki kahani - Full Story Part 1
Chapter- 01 parichay (01)
हेलो प्रतीक कब आँ रहे हें आप्
बसकुछ दिनों बाद आऊंगा तुम् कैसी होँ वैसेकल हि पताचला चाची जी सें तुम्हें मोबाइल करनाभूल गय़ा हरीश आँ रहा हैं आजसाम तक पहुंच जाएगा घऱ पर्र
मगर वो तौ अगले महीने आने वाला थां नां
हांहां मगर उसको एडमिशन होने सें पहले वो यहां पऱ कोई कोचिंग क्लास ज्वाइन करनी हैं कहरहा थां
अच्छा ठीकठीक
हां चाची नें बताया मुझे केँ 1 महीने पहले हि वो उधरआकर ज्वाइन कर लेगा क्लास तोँ कॉलेज मे थोड़ी आसानी होगी
अच्छा ठीक हैं उसको एड्रेस तौ दे दिया हैं नां शायद रांची मे पहलीबार आँ रहा हैं वो
हांहां एड्रेस वगैरा सभी दिया हैं वैसे पप्पू कैसा हैं हेलो प्रीति आवाज़ कटरही हैं तुम्हारी
हांहां पप्पू ठीक हैं अभि अभि उसेदूध पिलाकर सुला दिया हैं
तबीयत तौ ठीक हैं नां उसकी
हां तबीयत सभीठीक हम् दोनों कों आपकी बहोत याद आँ रही हैं जल्दआइए नाँ
बस अधिक सें अधिक एक् हफ्ता औऱ ठीक हैं मेरीजान अब मोबाइल रखता हूं ठीक सें अच्छे सें रहना औऱ हरीश कां भि ख्याल रखनाठीक हैं
ठीक हैं जी आप् भि अपना ख्याल रखनालव यू
तृप्ति नें मोबाइल रखरखा औऱ वो बेडरूम मे जाकर पप्पू कों देखने लगी वो धीरे-धीरे बैड पर्र सोरहा थां।
पप्पू। तृप्ति औऱ प्रतीक कां बेटा अभि सालभर कां थां। तृप्ति औऱ प्रतीक दोनों हाल हि मे धनबाद सें रांची शिफ्ट हुए थें। प्रतीक रांची केँ एक् बड़े न्यूज़पेपर कंपनी मे फील्ड फोटोग्राफर कि पोजीशन पऱ ज्वाइन हुआ थां। काम केँ चलते प्रतीक कों महीने मे एक् याँ दोबार कुछ दिनों केँ लिए दूसरी स्थान जाकर रहना पड़ता थां। दोनों कि विवाह हुए अभि 2 साल हि हुए थें। इसी केँ चलते तृप्ति कों प्रतीक कां यूं बाहर् रहना अच्छा नहि लगता थां। उसनेकई बार प्रतीक कों प्रेम सें येकह भि दिया थां कि वो कोई दूसरी स्थान पऱ ट्रांसफर लेँ लेँ जिससे कि वो सभी एक् संग हि रहसके।
तृप्ति नें खानां बना लियाउसे पता थां कि हरीश आएगा तोँ हौ सकता हैं कि उसेभूख लगी हौ।
हरीश प्रतीक कां चचेरा भइया। जौ अभि-अभि बारहवीं कि एग्जाम मे अच्छे परसेंटेज लेकरपास हुआ थां, रांची केँ प्रसिद्ध निर्मला कॉलेज मे बीएससी कि एडमिशन कराली थि। प्रतीक केँ चाचा चाची बलियापुर केँ रहने वाले थें। चाचा केँ कहने पऱ प्रतीक नें हरीश कों अपनेसंग रहने औऱ उसकी पढ़ाई पर्र ध्यान देने कि जिम्मेदारी खुशी-खुशी लेँ ली थि।
तृप्ति नें घऱ केँ सारेकाम निपटा दिए.साम हुइ तौ उसको हरीश कां मोबाइल आया.कुछ देरबाद हरीश रिक्शा सें घऱआया। करीब 8:00 बजगए थें। आते हि हरीश नें भाभी केँ चरण स्पर्श किए औऱ इधर-उधर कि बातें करतेहुए दोनों नें खानां खा लिया। छोटा पप्पू भि अब हरीश केँ संग घुलमिल गय़ा थां। हरीश बीच-बीच मे अपने भाभी केँ बड़े बड़े स्तनों कों आंखों केँ कोनों सें चोरी चोरी देखा करता थां। वाकई तृप्ति केँ बूब्ज़ बहोत बड़े थें औऱ पप्पू कों पिलाने केँ चलते उनमें बहुतदूध भि भरा रहता थां।
तृप्ति घऱ पऱ अपने स्तनों कों लेकर उतनी व्यवस्थित नहि थि। कईबार हरीश केँ सामने उसका पल्लू जबढल जाता तौ वो उसे वापस समेटने केँ लिए बिल्कुल कष्ट नहि लेती.ये वो जानबूझकर नहि करती थि। उसका स्वभाव हि ऐसा थां। अधिकतर टाइमघऱ पऱ अपने बेटे केँ संग अकेले रहने कि वजह सें उसने ब्रा पहनना भि बंदकर दिया थां। हरीश केँ मन मे कोई तूफ़ान सां उठ जाता थां जब वो अपनी भाभी केँ ढलेहुए पल्लू केँ पीछे केँ वो बड़े बड़े वक्षओं केँ गोलाकार कों देखता। औऱ कभी-कभी हरीश कों तृप्ति केँ ब्लाउज केँ सामने उसके निप्पल कि छाप भि साफ दिखाई पड़ती थि।
खानां समाप्त होने केँ बाद वो दोनों हॉल मे टेलीविज़न देखने बैठगए। टेलीविज़न केँ सामने एक् सिंगल बेडलगा हुआ थां औऱ बगल मे एक् सोफा भि लगाहुआ थां। तृप्ति नें पप्पू केँ रोने कि आवाज़ सुनी तोँ वो उसे बेडरूम सें लें आई।
भूखलग गई मेरे बेटे कों दूदू पीना हैं आलेआले। आओ बेटा मेला बेटा मममम करेगा नाँ ओ.आजा मेरे लाजा बेटा।
दोस्त किस्सा कां शीर्षक हिंदी मे रखकर , किस्सा कों हिंगलिश मे मतलिख देना ?
I would like too write it in Hinglish. In That case what needs too be done. Where should i move the thread. And hiw can i move the thread. Please let mai know.
Flashback achaa thaa bhay. halanki update ekdum sneha k mammo jaesa h. Updates ko trupti bhabhi k stano (than kahun toh better hoga) jaisa do. Bade bade or mazedaar.
दुग्ध व्यसन - Preeti aur Prateek ki kahani – New Episode
Chapter-02 शुरुआत
तृप्ति नें पप्पू कों गोद मे उठा लिया औऱ वो हॉल मे आँ गई।
" इसेभूख लगी हैं, मे जरादूध पिला देती हूं। हरीशअगर तुम्हें नींद आँ रही हौ तौ तुम्हारा खाटबगल वाले गेस्ट रूम मे लगा दिया हैं ठीक हैं".
"हां भाभीबस थोड़ी देर मे सो जाऊंगा। अभि नींद नहि आँ रही हैं."
तृप्ति टेलीविज़न केँ सामने लगेहुए बैड पर्र बैठ गई। उसने पप्पू कों गोद मे लिया औऱ अपने ब्लाउज केँ नीचेहाथ डालते हुए उसने ब्लाउज केँ कुछहुक खोलदिए। इधर हरीश कां दिल जोरो सें धड़कने लगा। उसकामन बार-बार अपनी प्यारी सि भाभी केँ बड़े बड़े स्तनों केँ दृश्य कां अनुमान लगाने लगा। वो मन हि मन सोचने लगा।
'मुझे भाभी कि स्तनों केँ दर्शन होंगे। कैसा होगा उनका निप्पल? उनका एरियोला कां क्याँ कलर होगा? क्याँ उनका निप्पल लंबा होगा?। हौ सकता हैं। क्यू केँ सालभर सें बारबार चूसे जाने कि वजह सें जरूर उनके निप्पल बहुत लंबे हौ चुके होंगे। काश मुझे भि भाभी केँ दूध सीधे उनके स्तनों सें पीने कां अवसरमिल जाए तोँ मे अपने आप् कों धन्य मानूंगा'।
इधर तृप्ति नें अपना मम्मों बाहर् निकाला। वो निकालने मे उनको थोड़ी दिक्कत जरूर हुईँ क्योंकि उनकाजगह बहोत हि बडा थां। हरीश कों पुरा बूब्ज़ नहि देख पाया क्योंकि। तृप्ति नें अपने सारी कां पल्लू ऊपरढक रखा थां। हांमगर बगल सें बूब्ज़ कां कोर औऱ उसकी वो गोरी गोरी त्वचा जरूर हरीश कों दिखाई दि थि। तृप्ति नें पप्पू कों पल्लू केँ नीचे लिया औऱ वो उसेदूध पिलाने लगी। थोड़ी हि देर मे पप्पू केँ निप्पल चूसे जाने कि हल्की हल्की चूसाई कि आवाज़ साफ सुनाई देरही थि। वातावरण बहोत हि अद्भुत होँ गय़ा थां। हरीशअब नां रहकर सीधे भाभी केँ स्तनों कि ओरदेख रहा थां जौ उस टाइम पल्लू केँ नीचेढका हुआ थां। तृप्ति कां एक् बार हरीश कि ओर ध्यान गय़ा फिन उसनेनजर हटाली। तृप्ति मन हि मन सोचने लगी।
'काश प्रतीक होता तौ रात मे मेरादूध जरूर समाप्त कर लेता 4 दिन होँ गए.हाथ सें निचोड़ निचोड़ करदूध निकालना पड़ता हैं। क्यूं नां मे हरीश सें कहकरदूध उसे हि पिलादूं'।
औऱ वो मन हि मन मुस्कुराने लगी.फिन उसने जानबूझकर सारी कां पल्लू थोडा सां साइड मे कर दिया जिससे कि हरीश कों वो अपनी निप्पल कां कलर दिखासके। जैसे हि हरीश कि नजरइधर उधर देखते हुए भाभी केँ स्तनों केँ ऊपर आँ ठहरी तोँ उसका मुंह अचानक सें खुल गय़ा। उसको पप्पू केँ मुंह मे जोँ निप्पल चूसाजा रहा थां उसका एरियोला साफ दिखाई देरहा थां। डाक चॉकलेटी कलर कां वोँ एरियोला बहुत बड़ा थां। क्योंकि पप्पू नें चूसते हुए भि बहोत सारा एरियोला बाहर् हि थां। तृप्ति नें हरीश कां वो हावभाव देख लिया औऱ उसनेसर घुमा लिया औऱ वो टेलीविज़न कि ओर देखने लगी वो अंदर हि अंदरखुश हौ रही थि कि हौ सकता हैं हरीश कों वो दूध पीने केँ लिए प्रवृत्त करसके।
थोड़ी देरबाद उसने दोबारा हरीश कि ओर देखा औऱ उसे पूछा
"क्यूं हरीश?। क्याँ हुआ?। क्याँ देखरहे हौ तुम्?। औऱ तुम्हारा मुंह क्यूं खुलाहुआ हैं?.".
तौ हरीश थोडा शकपका गय़ा औऱ उसने झिजकते हुएकहा।
"नहि नहि। भाभी वो। टेलीविज़न देखते देखते। पता नहि मुंह केसे"।
"हरीश। मुझसे तुम् झूठमत हि कहो, मुझेपता हैं तुम् क्याँ देखरहे थें। मे तुम्हारी भाभी हूं ठीक हैं"।
" हां.हां भाभी। सॉरी भाभी, बस मे अंदर हि जाकर बैठता हूं"
"नहि। यहीं बैठोकोई बात नाही.".
फिन तृप्ति नें हरीश सें उसके12वीं केँ बारे मे पूछा औऱ इधरउधर कि बातें करके वो येदेख रही थि कि क्याँ वो हरीश पऱ भरोसा कर सकती हैं। जिस पर्र अंततः उसेये यकीन हौ गय़ा कि.हरीश पऱ भरोसा कियाजा सकता हैं। फिनरात मे जब वो सोने केँ लिए अपने बेडरूम मे जारही थि तोँ तृप्ति नें टेलीविज़न देखरहे हरीश कों कहा।
"हरीश देखो मे कुछ दवाइयां लें रही हूं। मेरा थायराइड कां प्रॉब्लम चलरहा हैं। इन दवाइयों केँ चलते मुझेरात मे बहोत गहरी नींदआती हैं। जब प्रतीक होते हें तौ वो पप्पू कों संभाल लेते हें। मगरअब जब प्रतीक नहि हैं तोँ होँ सकता हैं कि रात मे पप्पू उठजाए याँ रोए। तौ तुम् उसे सुलाने कि कोशिश करना औऱ अगर वो नहि सोरहा तब मुझेउठा देनाठीक हैं?!"
"हां भाभी आप् निश्चिंत होकरसो जाइए। मे पप्पू कों संभाल लूंगा"
ये कहकर हरीश नें भि टेलीविज़न बंदकर ली। औऱ वो अपने गेस्ट बेडरूम मे चला गय़ा। इधर तृप्ति नें अपना पासा फेंक दिया थां। दरअसल तृप्ति किसी भि नींदआने वाली दवाई कां सेवन नहि कररही थि। अबउसे ये भि पता थां कि रात मे करीब 3:30 याँ 4:00 बजे पप्पू उठ जाता हैं। औऱ रोता हैं।
तौ उसने पप्पू कों बेड पऱ रखा औऱ उसकेबगल मे लेटगए। लेटने सें पहले उसने अपने ब्लाउज मे सें उसका एक् बूब्ज़ बाहर् निकाल कररख दिया। जोँ पप्पू केँ होठों केँ बिल्कुल पास मे उसका निप्पल थां। औऱ फिन वो सोने कि एक्टिंग करनेलगी।
करीब-करीब आधा पौना घंटा हौ गय़ा। तब हरीशदबे पैर बेडरूम मे आया लाइटबंद थि मगर खिड़की सें चंद्र कां प्रकाश रूम मे फैलाहुआ थां। वो देखपा रहा थां। भाभी कि आकृति जोँ बिस्तर पर्र लेटी हुई हैं एक् जिस्म पर्र, औऱ फिन उसने देखा कि बगल मे पप्पू भि सोरहा हैं। उसने धीरे-धीरे सें अपनेफोन कां टॉर्च शुरुआत किया औऱ टॉर्च कों भाभी कि औऱ घुमायला। तौ वो तोँ बहोत चक्का रह गय़ा।
उसकी आंखों केँ सामने उसके भाभी कां बड़ा सां एक् बूब्ज़ ब्लाउज सें बाहर् आयाहुआ थां औऱ उनका वो बड़ा। विशाल निप्पल मनो। हरीश कों बुलारहा थां। हरीश उत्तेजित हौ गय़ा उसने हल्के सें भाभी केँ पैरों कों छूकर देखा कहीं वो जगी तौ नहि?। मगरइधर तृप्ति बड़े धीरे-धीरे येसभी नजारा देखरही थि औऱ ऐसा प्रतीत कररही थि कि वो गहरी नींद मे हैं। तब हरीशआगे बढ़। हरीश नें पहले तोँ तृप्ति केँ खुले मम्मों कों हाथ लगाकर टटोला। बहोत हि बडा बूब्ज़ थां वो। औऱ बहोत रसीले। फिन भि तनाहुआ। औऱ ऊस मे खासबात ये थि कि उसके निप्पल ऊपर कि ओरउठे हुए थें। तोँ वो औऱ हि मादक औऱ मोहकदिख रहे थें।
फिन हरीश नें सोचा क्यूं नाँ मे थोडा भाभी कां दूध हि पीलू तोँ हरीश नें धीरे-धीरे सें झुककर तृप्ती कां निप्पल पहले अपनीजीभ सें हल्के सें सहलाया औऱ फिन धीरे-धीरे सें निप्पल कों मुंह मे भर लिया।
'हाहाहा कितना प्यारा लगरहा हैं मुझे। हरीश कितना अच्छे सें चूसरहे होँ तुम्। सुसु सुसु बेटा चूसो। बहोत अच्छा लगरहा हैं। पप्पू इतनी अच्छे सें नहि चूस पाता। पर्र तुम् जिसतरह सें चूसरहे हौ। बहोत हि मजा आँ रहा हैं'.
तृप्ति मन हि मन सोचेजा रही थि इधर हरीशअब पूरीलय मे तृप्ति कां स्तनपान कररहा थां। दूध तोँ तृप्ति केँ स्तनों मे पहले सें हि बहोत भराहुआ थां।
Ab aayega na majaa. Bhaiya k absence mai Bhabhi kaa dudh waste nahii Hoga, or pappu k wajah say uske chacha ko joo nayan-santusti Milne wali h, uskah majaa bi alag hi level kaa hone waala h
दुग्ध व्यसन - Preeti aur Prateek ki kahani – New Episode
Chapter 03 : व्यसनोत्पत्ति
स्नेहा औऱ रितेश कॉलेज केँ बगल वाले खंडहर कि ओर जानेलगे। पीछे थोड़ी दूरी पर्र तृप्ति कों वो दोनों दिखे तौ तृप्ति नें आवाज़ भि लगाईमगर वो स्नेहा तक पहुंची नहि। तृप्ति नें सोचा कि वो उनके पीछे जाकर देखें कि ये दोनों खंडहर कि ओर क्यूं जारहे हें। वो धीरे-धीरे धीरे-धीरे उनका पीछा करतेहुए खंडहर कि ओर बढ़ने लगी।
सूरजसर पऱ चढ़ाहुआ थां। वैसे तौ उस खंडहर कि ओर अधिकतर कोई जाता नहि हैं, क्योंकि ऐसी बातें चली थि कॉलेज मे कि उस खंडहर मे भूतों कां आवास हैं। इसलिये तृप्ति भि थोड़ी सि डरी हुइ थि फिन भि वो आगे बढ़ेजा रही थि। खंडहर केँ अंदरकुछ देर भटकने केँ बादउसे कुछ आवाज़ सुनाई दि। आवाज़ कि औऱ बिनाकोई आहटकिए तृप्ति बढ़रही थि। औऱ फिनउसे एक् आधी गिरी हुई दीवार केँ आड़ मे रितेश औऱ स्नेहा नजरआए। स्नेहा नें उसकाटॉप उसके दाएं मम्मों सें उठाया हुआ थां औऱ रितेश उसके मम्मों कों चूसरहा थां। यही चूसने कि आवाज़ तृप्ति कों कुछ दूरी पर्र सुनाई दि थि। नेहा केँ चेहरे पर्र एक् मीठी सि मुस्कान थि औऱ वो अपने हाथों सें रितेश केँ बालों कों सहलारही थि।
ये दृश्य देख तृप्ति दंगरह गई वो हल्के सें उस दीवार केँ पीछे खिसक गई औऱ फिन वो उन दोनों कों झांककर देखने लगे.इधर स्नेहा कां निप्पल रितेश कि होठों केँ बीच मे खींचा जारहा थां। हल्की हल्की एक् लेँ मे उसका निप्पल रितेश केँ होठों केँ अंदर बाहर् हौ रहा थां। औऱ स्नेहा मीठी-मीठी आहें भरनेलगी। ये दृश्य देख तृप्ति अब आहिस्ता उत्तेजित होनेलगी। तृप्ति कों वो दृश्य देखने मे अब मज़ाआने लगा.फिन बीच मे हि रितेश नें स्नेहा कां निप्पल अपने मुंह सें बाहर् निकाला औऱ उसने एक् समय नेहा कों प्रेम भरी नजरों सें देखा। औऱ फिन वो स्नेहा कों चुंमने लगा।
बहुत लंबे चुंबन केँ बाद रितेश नें कहा।
"स्नेहा चलो हम् यहीं पर्र कर लेते हें"।
"नहि नहि। यहां पर्र कोई आँ गय़ा तौ?। चलो नाँ हम् उसदिन कि तरहकोई होटल मे रूमबुक कर लें".
"नहि मेरीजान। ऐसे खुले आसमान केँ तले सेक्स कां अपना हि आनंद हैं".रितेश नें उत्कटता सें कहा।
"नहि रितेश। मुझे यहां पऱ बिल्कुल भि नहि करना सेक्स। बात कों समझो। मे सहज नहि महसूस करपारही हूं। वैसे भि जौ मैंने लोगों सें सुना हैं। वो सारी बातों कि वजह सें मे यहां आनां हि नहि चाहरही थि। वो तोँ तुम्हारी जिद कि वजह सें मे आई हूं"
रितेश नें स्नेहा कों मनाने कि बहोत कोशिश कि मगर स्नेहा आखिर तक नहि मानी। तृप्ति दोनों कि सारी बातें बड़ेचाव सें सुनरही थि अंततः स्नेहा नें रितेश कों कहा।
" रितेश चलो नाँ यहां सें मुझे यहां पऱ डरलगरहा हैं मानव नां मेरीबात".
"ठीक हैं स्नेहा। अब मुझेकम सें कमकुछ देर केँ लिए तुम्हारा दूध हि पिलादो। फिन हम् चलते हें। क्याँ तुम्हें मेरा चूसना अच्छा नहि लगरहा?। क्याँ तुम्हें मज़ा नहि आँ रहा?".
"ओके बाबा.आओ पीलो.दूध। वैसेदूध तोँ आता नहि हैं पऱ तुम् चूसते हौ तोँ मुझे बहोत मजा मिलता हैं। थोड़ी देर चुसो.फिन हम् जाते हें। ठीक हैं!".
"चलो.अगर तुम्हें नहि करना तौ मे हिला लूंगा"
ये कहकर रितेश नें अपनी पैंट कि जिप खोली औऱ उसने अपना लिंग बाहर् निकाला। औऱ इधर उसने स्नेहा कां निप्पल अपने मुंह मे लें लिया औऱ वो मजे सें उसे चूसने लगा। स्नेहा केँ बूब्ज़ बहोत बड़े तोँ नहि थें। मगर गोरारंग। औऱ गुलाबी निपल्स कि वजह सें वो बहोत आकर्षक दिखरहे थें। तृप्ति इस नजारे कों अपनी आंखों मे समा लेँ रही थि।
फिन तृप्ति कि नजर रितेश केँ लिंग कि ओर गई। रितेश कां काला मोटा लिंग देखकर वो दंगरह गई। रितेश अपने लिंग कों हिलाते हुए नेहा केँ बूब्ज़ कों चूसेजा रहा थां.मीठी-मीठी चूसाई कि आवाज़ हवा मे घुलने लगी.
इधर स्नेहा आंखें बंद करके चुसाई कां मज़ा लें रही थि। करीब 15 मिनटबाद रितेश कां वीर्य पतनहुआ। औऱ फिन उसने स्नेहा कां निप्पल मुंह सें छोड़ दिया।
"होँ गय़ा?.अच्छा लगा?."
"हां मेरीजान। मुझे तोँ बहोत अच्छा लगा। पऱ अगर सेक्स कर पाते तौ औऱ आनंदआता। पऱ तुम्हें कैसा महसूस हुआ.जब मे तुम्हारे इन हसीन सें गुलाबी निप्पल कों चूसरहा थां?".
"ह्म्म्म। मीठा मीठा। रितेश मे तौ ये चाहती हूं कि तुम् घंटो तक मेरे निपल्स कों चूसते रहो। मुझे बहोत खुशीआता हैं। चलो अभि हम् निकलते हें यहां सें"।
दोनों नें अपने कपड़े ठीककिए औऱ वो वहां सें निकलने लगे.तभी तृप्ति भि उनकेआने केँ पहले हि वहां सें आगेबढ़ चली थि। उसकेमन मे एक् प्यारी सि गुदगुदी सि भि हौ रही थि। संग हि संग थोड़ी सि टेंशन भि थि कि कहींये दोनों उसेदेख नाँ लेँ।
स्नेहा औऱ रितेश ये दोनों तृप्ति केँ क्लासमेट थें। औऱ येबात तृप्ति केँ कॉलेज केँ दिनों कि हैं। औऱ ये घटना जोँ अभि घटि.यह वो घटना हैं जिसकी वजह सें तृप्ति कि जीवन पूरीतरह सें बदल गई। इसके पहले नां तौ तृप्ति नें कभीकोई लिंग देखा थां औऱ नां हि उसने किसी जोड़े कों यूं स्तनपान मे विलीन होतेहुए देखा थां।
उसरात तृप्ति ठीक सें सो भि नहि पारही थि बार-बार उसकी आंखों केँ सामने वही लुभावने दृश्य फेराधरे हुएनाच रहे थें। अगलेदिन रविवार थां तृप्ति कि आंख करीब सुभह केँ 4:00 बजेलग गई तौ उसे उठने मे 11:00 बजगए। उठने केँ बाद तृप्ति अपने मां कों येबता कर बाहर् निकली कि वो स्नेहा केँ यहां उससे मिलने जारही हैं। तृप्ति नें स्नेहा केँ घऱ कां दरवाजा बजाया दरवाजा स्नेहा कि मम्मी नें खोला.कुछ हि देरबाद तृप्ति औऱ स्नेहा स्टडी रूम मे बैठकर बातें कररहे थें।
इधरउधर कि बातें होने केँ बाद नाँ रहकर तृप्ति नें आखिरकार स्नेहा सें पूछ हि लिया।
"स्नेहा तूँ कल गुप्ता जी केँ लेक्चर कों छोड़ कहां चली गई थि?"
"अरे मुझेकुछ कामयाद आया। माँ नें कुछ लाने बोला थां तोँ बाजार गई थि"।
"सच मे?"
"अरेहां। क्यूं। पऱ तुँ क्यूं पूछरही हैं?" क्याँ हुआ?"
"सच-सचबता। स्नेहा। कहां गई थि तूँ?"
"तृप्ति तूँ मुझे इतनाबता दे। कि तूँ येसभी क्यूं पूछरही हैं?" स्नेहा नें थोड़ी बेचैनी सें कहा।
"मे ये इसलिये पूछरही हूं क्योंकि। मुझेपता हैं तूँ कहां औऱ किसके संग गई थि, अब तूँ हि अपने मुंह सें मुझेबता तब मे जानु"
"अबजब तुम कोपता हि हैं तौ क्यूं बात कां बतंगड़ बनारही हैं। हां गई थि मे रितेश केँ संग। हम् प्रेम करते हें एक् दूसरे सें। औऱ तूनेकब देखा हमें?"
"स्नेहा। मैंने कई आवाज़ लगाई पऱ तूने मुड़कर देखा भि नहि। फिन मे तुम् दोनों केँ पीछे आँ गई" तृप्ति नें मुस्कराकर कहा
"तृप्ति तुँ। तूँ। खंडहर केँ यहांआई थि?".
"हां स्नेहा। मैंने सभीदेख लिया".
"क्यूं तृप्ति?। क्यूं। क्यूं? किया तूनेऐसा" स्नेहा नें नाराजगी जताते हुएकहा।
"ठीक हैं स्नेहा। मे तेरी साथी हूं। मे येबात किसी कों नहि बताऊंगी। अब हम् बड़े हौ गए हें। ठीक हैं"
"वादाकर मुझे। तृप्ति वादाकर!"
"हां बाबा। वादा करती हूं, किसी कों नहि बताऊंगी."
"देख तृप्ति। मे रितेश सें बहोत प्रेम करती हूं, औऱ आगे चलकर हम् दोनों विवाह भि करने वाले हें, अबअगर तूनेदेख हि लिया तौ तुझेही ये भि पता होगा कि हमनेकोई संभोग वगैरा तोँ नहि कियाउधर" स्नेहा नें अगतिक होकेकहा।
"हां। मे जानती हूं। मुझे खुशी हैं कि तुम को तेरा प्रेम मिल गय़ा"
दोनों कि बातें चलरही थि। फिन तृप्ति नें उसकेदिल कि बात स्नेहा सें पूछली।
"अच्छा स्नेहा। मुझे एक् बातबता। कैसा लगता हैं जबकोई हमारे बूब्ज़ कों चूसता हैं!"
"सच बताऊं तृप्ति। मुझे तोँ बहोत अच्छा लगता हैं। बहोत खुशीआता हैं। वो जौ मीठ मीठी गुदगुदी होती हैं। औऱ वो एक् रोम हर्ष जौ होता हैं। वो मे तुम्हें शब्दों मे नहि बता सकती। क्याँ तूनेकभी किसी कों। " स्नेहा अपनीबात पूरीकरे इससे पहले हि तृप्ति नें उसकीबात कों बीच मे हि काटते हुएकहा।
"अरे पगली अभि तक तोँ बिल्कुल नहि। कल हि तौ मैंने पहलीबार किसी पुरुष कां लिंग देखा!"
" तृप्ति सच मे!?"। स्नेहा नें आंखे बड़ी करतेहुए कहा।
"अरेठीक हैं नां। मे कहां उसे पकड़ने जारही हूं!"
दोनों खिलखिलाते हुए हंसदी। फिनइधर उधर कि बातें होने केँ बाद तृप्ति अपनेघऱ आँ गई। मगरअब उसकेमन मे स्नेहा कि वो बातरह गई। स्तनपान वाली। बहोत सोचने लगी कि कैसा लगता होगाजब कोई मेरे निप्पल चूसता होगा।
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