दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani - Real Story Continue Part 1
दूध नां बख्शूंगी/Vedprakas sharma
"ओफ्फो-----अब यह क्याँ उठा लिया आपने?"
" जुदाई। "
अमिता कां दिल धक्क सें रह गय़ा------ जाने क्यूं मुंह सें कम्पित स्वर निकला-----"ज---जुदाई। "
"हांभई---। " तोताराम -सि मुस्कान केँ संग सामान्य स्वर मे कहा------"मे प्यार बाजपेयी कां बहोत पुरानां पाठक हूं-------ओर 'जुदाई' -बाजपेयी कि लेटेस्ट रचना हैं, जिसे मनोज पाॅकेट बुक्स नें प्रकाशित किया हैं। "
"वो तौ मे जानती हूमगर आप् पिछले तीनदिन सें लगातार इसे अपनेसंग तौ चिपकाए फिनरहे हें, ऐसा इसमे क्याँ हैं ?"
धीमे सें हंसते हुए तोताराम नें जवाब दिया-------“तुम् नहि समझेगी!"
"क्याँ मतलब?"
“तुम् उपन्यास नहि पढ़ती होँ नां, इसलिये तुम्हें उपन्यास कि कशिश कां अन्दाजा भि नहि हैं-------मै तभी सें वाजपेयी कां पाठकहु जब विधायक नहि थां-----तब मेरेपास बहुत वक़्त होता थां---- बाजपेयी कां कोई भि उपन्यास प्रकाशित होते हि उसे एक् हि बैठक मे पढ जानां मेरेलिए खानां खाने सें भि अधिक जरूरी होता थां… ख़्वाहिश तौ अब भि यही होती हैं, मगर क्याँ करू इतना वक्त हि नहि मिलत्ता-----विधायक हूं नं--पिछले तीनदिन सें ये चौबीस घण्टे मेरेसंग हैं-----खाली वक़्त मिलते हि पड़ना शुरुआत कर देता हूं-अब भि पचासपेज बाकीरह गए हें। "
" अब आप् 'सम्राट' मे मेरेसंग डिनर लेनेचल रहे हैं याँ इस क्लमुही 'जुदाई' केँ बाकी पचासपेज पढ़ने---?"
तोताराम नें हंसते हुए, जवाब दिया---------"तुमने तोँ तिल कां पहाड़ बना दिया….मे तुम्हारे संग डिनर लेने हि जारहा हू। ”
"मे तुमसे बात करती रहूगी औऱ तुम् इसमें डूवे रहना। "
" ऐसा नहि होगा-मे केवल खाली टाइम मे हि इसे पढूगा----चलें?"
"चलते हें-----मै जरा अपने कमरे सें अपना पर्स लेकरआती हू !" कहने केँ बाद बुरा-सां मुह बनाती हुई अमिता मुडी औऱ तेज कदमों केँ संग अपने कमरे कि तरफबढ गई॥॥॥
उसकीपीठ देखता हुआ तोताराम होठो-हि-होंठों मे बुदबुदाया------" मै जानता हू अमिता कि तूँ किसहद तक गिर सकती हैं औऱ यदि,,, तुँ उसहद तक गिरी तौ मनोज पॉकेट बुक्स सें निकली प्यार बाजपेयी कि ये लेटेस्ट रचना हि तेरेलिए फांसी कां फन्दा बन जाएगी---"सांरी दुनिया केँ सामने तुम्हे नग्नकऱ देगी। "
वो तोताराम राजनगर केँ केंट क्षेत्र सें विधानसभा सें विपक्ष कां विधायक थां, जोँ कि 'सम्राट' होटल केँ हाॅल मे अभि-अभि अपनी बीबी केँ संग प्रविष्ट हुआ थां--लम्बे चौड़े हॉल मे तीव्र प्रकाश थां-----अधिकांश सीटें भरी हुईँ थि-----कुछ रिक्त भि थीं। उन्हीं मे सें एक् कि तरफ वो जोड़ा बढ़ गय़ा।
अमिता केँ गोरे-सुडौल औऱ तराशे गए शरीर पर्र कीमती साड्री थि,, जबकि तोताराम खद्दर कां कलफ़लगा सफेद चिट्टा कुर्ता-पायजामा पहने थां-उसके दाएंहाथ मे अब भि 'जुदाई' थि-----सीट पर्र बैठने केँ कुछदेर बाद हि वेटर आँ गय़ा।
तोताराम नें कहा…“अपनी पसंद कां आर्डर देदो अमिता। "
"अभि नहि---। " अमिता नें अपना श्रृंगार सें पुता चेहरा वेटर कि तरफ उठाकर कहा-----"पहले हम् एक् राउण्ड डांस करेगे-उसके बाद डिनर लेगे। "
जब वेटर "जेसी ख़्वाहिश" कहकरचला गय़ा तब तोताराम नें कहा-----"डांस औऱ मे---? "
"क्यूं क्याँ हुआ?" अमिता नें आंखें निकाली।
"मे भला डांस केसेकर सकता हूं ?"
"क्यूं नहि कर सकते ?"
चारों तरफ़ देखते हुए तोताराम नें कहा-----------"यहा बहोत सें ऐसेलोग बैठे हें, जोँ मूझे जानते हें----बे देखेंगे तोँ क्याँ कहेंगे ?"
"क्याँ कहेगे, बीबी केँ संग डांस कराना क्याँ -जुर्म हैं ? "
" ओंफ्फो----तुम् समझती क्यूं नहि अमिता----इस शहर कां विधायक हू----मेरा यू तुम्हारे संग फ्लोर पर्र जाकरडास करना अच्छा नहि लगता-किसी नें फोटो खिंचबाकर अखवार मे छपवा दिया कों जबरदस्ती सरदर्द करने वाला स्कैंण्डल खडा हौ जाएगा। "
"तोँ फिन मे यहां क्याँ आपका मुंह देखने आई हूं ?" अमिता भड़कउठी।
"अरे नाराज क्यूं होती होँ ? ”
"नहि तौ, क्याँ खुश होऊं। " अमिता बिफर पडी-"मुझे नहि लेनाऐसा डिनर आप् हि बैठोयहा -मैचली। "
"अरे----रे----कहां जाती हौ?", तोताराम बौखला गय़ा।
अमिता गुर्रा-सि उठी------मै तौ आपसे विवाह करके पछताई----यदि मुझें पता होता कि विधायक सें विवाह करके अपंने सारे अरमानो कां खून करना पड़ता हैं तौ यह विवाह कभी नं करती। "
"अमिता !'!'!"
"मे जारही हू। ” कहने केँ संग हि एक् झटके सें अमिता उठखडी हुईँ।।
तोताराम नें जल्द सें उसकाहाथ पकड़कर दबे स्वर मे कहा…"ठ-ठहरो अमिता-बैठो….मे वेसा हि करूंगा बाबा, जैसा कहती होँ, मगर ईश्वर केँ लिएबैठ जाओ। "
गुस्से मे भुनभुनाती हुई--सि अमिता बैठ गई------तोताराम उसके उखड़े हुएमूड कों सामान्य करने कि चेष्ठा करनेलगा… कम-सें-कस इस हाँल मे वो तमाशा बनना नहि चाहता थां।
दस मिनट केँ अन्दर तोताराम नें अमिता कां मूड 'फ्रैश' कर दिया थां--------अचानक अमिता नें कुर्सी सें उठतेहुए कहा…"मे अभि टॉयलेट सें होकरआती हूं। "
तोताराम नें गर्दन हिलाकर स्वीकृति दि।
दूध ना बख्शूंगी/ completee - prem kahani – New Episode
अमिता टॉयलेट कि तरफबढ़ गई जबकि मौका मिलते हि तोताराम नें 'जुदाई' खोलली औऱ पढ़ने लगा!!!!
टॉयलेट कि तरफ बढती अमिता केँ कदमों मे जाने क्यूं हल्की-सि लड़खड़ाहट थि …हांल केँ एयरकंडीशन होने केँ बावजूद मेकअप सें पुते चेहरे पऱ पसीने कि नन्ही-नन्ही बूंदे उभरआई! !
टेयलेट केँ समीप पहुंचकर उसने कनखियों सें तोताराम कि तरफ देखा-बह पुस्तक मे डूबाहुआ थां !!'
अमिता फुर्ती केँ संग एक् केबिन मे घुस गई।
किसी मर्द नें पूछा-----"क्याँ रहा?"
"मैंने उसेडास केँ लिए रेडीकर लिया हैं।
" गुड। " मर्द नें कहा…"अब तुम् केवल अपने होंठों पऱ येलगा लो। "
। अमिता नें अपने सामने फैली मर्द कि हथेली देखी…हथेली पर्र एक् छोटी-सि डिबिया रखी थि-----डिबिया मे 'मरहम' जैसाकोई पदार्थ थां-----उसी पदार्थ पर्र दृष्टि टिकाए अमिता नें थोड़े भयभीत स्वर मे कहा…“म-मुझें डरलगरहा हैं दीवान। "
"डर-डरने कि क्याँ बात हैं?"
"पता नहि क्यूं-----ऐसा लगता हैं जैसे कि उसेमूझ पऱ शक हौ गय़ा हैं। "
" ये तुम्हारे मन कां वहम हैं औऱ यदिइसे सचमान भि लियाजाए तोँ क्याँ फ़र्क पड़ता हैं-------उस बेचारे कि जिन्दगी अब हैं हि कितनी देर कि----इस हाॅल सें उसकीलाश हि निकलेगी। "
" यदि किसी कों पतालग गय़ा कि उसका कत्ल हमने किया हैं तौ ????"
" तुम् तौ बेकार हि डररही हौ-किसी कों पता नहि लेगेगा-हमारा तरीका हि ऐसा हैं-जल्द करो-देर होने पऱ वो चौक सकता हैं----बस, फ्लोर पऱ डांस करते वक्त तुम्हें केवल उसके सीने पऱ एक् प्यारा-सां चुम्बन लेना हैं-------चुम्बन उसकेलिए मौत सावित होगा। "
अमिता नें डिबिया सें थोडा -सां मरहम लेकर लिपस्टिक सें पुते अपने होंठों पऱ ठीकइस तरहलगा लिया जैसे, लिपस्टिक लगाई जाती हे…अबउस मरहम औऱ लिपस्टिक कां मिश्रण उसके होंठों पऱ लगाहुआ थां।।।
"अब तुम् जाओ। " दीवान नामक शख्स नें डिबिया बन्द करने केँ बाद अपनीजेब मे डालते हुए कहा----"अब-----जब हम् मिलेंगे तोँ हमारे बीच तोताराम नाम कि दीवार नहि होगी अमिता !"
" पहलेयह तौ देखो कि बह क्याँ कररहा हैं-यदि वो संयोग सें इधर, हि देखरहा हुआ औऱ मुझेइस केविन सें निकलते देख लिया तौ।। "
इसबीच दीवान नें धीरे-धीरे सें केबिन कां पर्दा सरकाकर जाल मे झांका औऱ किर अमिता सें मुखातिब होकर बोला----"कोई पुस्तक पढ़रहा हें। ”
अमिता कों जैसे एकदमकुछ याद आया--अरे हाँ, एक् बात औऱ कहनी हैं दीवान?"
"क्याँ?”
" वो प्यार बाजपेयी कि 'जुदाई' नामक पुस्तक पढ़रहा हैं !”
" फिन ?"
“इस उपन्यास कों वो पिछले तीनदिन सें लगातार अपनेसंग चिपकाए हुए हैं-जैसे वो उसकी सबसे प्यारी चीज होँ। "
“अच्छी पुस्तक होगी। "
" ओफ्फो----तुम् समझ नहि रहे हौ दीवान। "
"क्याँ समझाना चाहती होँ?"
“मुझे लगता हैं कि उस उपन्यास केँ पीछे जरूरकोई रहस्य हैं। "
दीवान नें चकित स्वर मे पूछा…"कितम्ब केँ पीछे क्याँ रहस्य होँ सकता हैं?”
"यही तोँ मे नहि समझपा रहीहू मगर पिछले तीनदिन सें 'जुदाई' कों उसकायूं अपनेसंग चिपकाए रखना मुझें अजीब-सां लगरहा हैं-मुझें सन्देह-सां हौ रहा हैं। "
"किसबात कां संदेह! "
"यही तौ मे नहि जानती, मगर उसका 'जुदाई‘ कों हर क्षणसंग लिए फिरना।। "
दीवान नें हल्की-सि आवाज़ केँ संग कहा-"मे बताऊं वो "जुदाई" कों अपनेसंग क्यूं लिएफिन रहा हैं?”
“क-क्याँ तुम् जानते हौ-----हाहा बताओ।। "
"क्योंकि कुछ हि देरबाद इस दुनिया सें स्वयं उसी कि "जुदाई' होने वाली हैं। "
"मजाकमत करो दीवान-प्लीज, सीरियसली सोचो कि ऐसा क्यूं हैं--- उस उपन्यास मे क्याँ हैं, जिसकी वजह सें बहउसे ऐक मिनट केँ लिए भि स्वयं सें जुदा नहि कररहा हैं ?"
"तुम्हारा मन खराब हौ गय़ा हैं अमिता-साधारण सि बात केँ तुम्हें मात्र इसलिये अजीब-सि लगरही हैं, क्योंकि कुछ हि देरबाद तुम् उसेमौत कां एक् चुम्बन देने वाली हौ-----यह उपन्यास बालेलोग बड़े चस्की होते हें----उपन्यास कां पीछातब तक नहि छोड़ते, जब तक पूंरा न् पढ लेँ। "
अमिता संतुष्ट नं होँ सकी।
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जबकि दीवान नें कहा-बहुत देर हौ गई हैं…अब तुम् जाओ। "
फ्लोर पऱ तोताराम कों बांहों मे लिए अमिता थिरकती रही-अमिता रह-रहकर उससे लिपट जाती थि, जबकि तोताराम थोडा झिझकरहा थां-----तोताराम कों फ्लोर पऱ देखकर एक् अखबार केँ संवाददाता नें फ्लोर कां दृश्य अपने कैमरे मे कैदकर लिया--- देखते हि तोताराम नें अमिता कों अपने सें अलग किया!!!!
वो तेजी सें गले मे कैमरा लटकाए संवाददाता कि तरफ लपका !!!
अभि उसने फ्लोर सें नीचेकदम रखा हि थां कि---------
एकदम हाॅल कि सब लाइटे आँफ होँ गई।
अथेरा छा गय़ा--घुप्प अँधेरा।
याँ तोँ सारेशहर कि हीँ लाइटचली गई थि याँ किसी नें होटल कां मेन स्विच आँफकर दिया थां…हांल मे मोजूद सब लोगों केँ सांथ-संग तोताराम कि आंखों केँ सामने भि घने अंधेरे केँ कारण हरे-हरे दायरे चकरा उठे----बह ठिठक-सां गय़ा।
पहलेसमय तौ अचानक हि अंधेरा होँ जाने केँ कारण सारे हाॅल मे सन्नाटा सां छा गय़ा…फिन अजीब-सि गहमागहमी उभरी---------जब हाॅल मे अंधेरा छाए एक् मिनट होँ गय़ा तोँ आवाजें गूंजने लगी---सिसकांरियां भि उभरी-कदाचित कुछ 'जोडों नें अंधेरे कां लाभ उठाने कि ठानली थि-किसी मनचले नें जोर सें सीटी भि बजा दि।
वक्त गुजारने केँ संग हि वातावरण मे शोर होताजा रहा थां कि--------धांय------!'!
अंधेरे मे कोई रिवॉल्वर गर्जां-एक् शोला लपका।
हॉल केँ वातावरण मे किसी नारी कि दर्दनाक चीख उठी…ये चीख यकीनन अमिता कि थि-इसचीख केँ बाद हाॅल मे जैसे हाहाकार मच गय़ा डरी औऱ सहमी वहुत-भि चीखें गूजऩे लगी-----लोग अपने-अपने जगह छोडकर इधर-उधर भागने लगे।
अंधेरे मे एक्-दूसरे सें टकराते, चीखते, गिरते उठकरपुन: भागते-फायर कि आवाज़ नें वहां आतंक फैला दिया थां।
कोई घबराए हुए स्वर मे चीख पडा----यहा कत्ल होँ गय़ा हैं-----लाईट ऑनकरो---॥.
तभी------धांय---।
दुसरा फायर! '
इसबार हाॅल तोताराम कि चीख सें झनझना उठा।
भगदडमच -गई-आतंक फैल गय़ा।
फिन------अचानक हि साराहाल पहले कि तरह चकाचौंध कर देने वाली रोशनी सें भर गय़ा…लोग जहा केँ तहाँरुक गए…
आखे बुधिया गई-होटल कां मैनेजर चीखपडा-
"पुलिस केँ आने सें पहलेकोई भि शख्स हाॅल हैं बाहर् नं निकले !"
चेहरे पीलेपड़ गए…आतंक पुता पड़ा थां उनपंर'!!
हर दृष्टि फ्लोर केँ समीपपडी अमिता कि लाश औऱ उससे थोडा हटकर फर्श पऱ पड़े तोताराम केँ लहूलुहान बदन पऱ चिपक गई…तोताराम केँ बदन कों लाश इसलिये नहि कहाजा सकता, क्योंकि अभि तक उसके शरीर मे थ्रोड्री हरकत थि।
गोली उसकेपेट मे लगी थि।
। दोनों हाथों सें अपनापेट दबाए तोताराम उठ खड़ाहुआ सफेद कपड़े बुरीतरह खून मे रंग चुके थें…उसके चेहरे पऱ असीम पीड़ा केँ भाव थें-सारा जिस्म बुरीतरह कांपरहा थां-कुछ कहने केँ लिए उसने मुंह खोला…मुंह केँ अन्दर सें ढेर साराखून उबल पड़ा। "
देखने वालों कि चीखें निकल गई, लेकिन किसी नें आगे बढकर तोताराम कों सहारा देने कां साहस नं किया ----- ऐसे अवसरों पर्र कौन रिस्क लेता हैं--सब जानते हें कि ऐसी बेवकूफी करने पऱ आदमी पुलिस कि चक्करदार प्रक्रिया मे उलझ जाता हैं।
सबमूक दर्शक वने असीमित दर्द सें छटपटाते र्तोताराम कों देखते रहे----आगे बढ़कर संवाददाता नें इस दृश्य कां फोटो जरूर लें लिया ॥॥॥॥
पेट कों दबाए तोताराम लड़खड़ाता हुआ अपनीसीट कि तरफ बढा-----दर्द मे डूबी उसकी आंखें मेज पऱ रखी जुदाई पऱ गडी हुइ थि…हर लम्हा, वो बोलने कि भरपूर चेष्टा कररहा थां, लेकिन मुहसे घुटी घुटीचीख केँ अलावा एक् भि शब्द नहि निकला !!!!!!
संवाददाता अब लगातार उसके फोटो लेँ रहा थां।
तोताराम अपनीसीट केँ लगभग पहुंचकर लड़खड़ाया-बड्री मुश्किल सें उसनेमेज पकडकर खुद कों गिरने सें रोका---खून सें सना दायां हाथ बढाकर मेज पऱ रखी 'जुदाई' उठा ली-----पुस्तक कां आवरणखून सें लथपथ होँ गय़ा----इस पुस्तक कों हाथ मे लिए तोताराम घूमा----- पुस्तक वालाहाथ उसनेऊपर उठा लिया----कुछ कहने केँ लिएपुन: मुहं खोला------संवाददाता केँ कैमरे कां फ्लैश चमका ॥॥॥॥॥
तोताराम केँ कंठ सें अंन्तिम हिचकी निकली-------उसका जिस्म लाश बनकर फर्श पर्र लुढ़कता चला गय़ा…खून मे डूबी 'जुदाई' एक् तरफ़पडी रह गई -बैक पऱ छपे प्यार बाजपेयी केँ चित्र पर्र भि कई स्थान खून केँ धब्बे लगगये थें।
विजय केँ गोरे--चिट्टे एवंगठे हुएबदन पर्र इस टाइम केवल एक् अडंरवियर थां---लाल रंग कां चुस्त, अंडरवियर--शेष सारे शरीर पर्र आवश्यकता सें ज्यादा तेलमला हुआ थां…तेल लगेबदन पऱ फिसलरहा थां ढेर सारा पसीना।
फिसलता भि क्यूं नहि---???
किसीऐसे शख्स कां पसीने सें तर-वतर हौ जानां स्वाभाविक हि हैं जौ कि पिछले दो घण्टे सें अपने कमरे कि दीवार कों सरकने कि चेष्टा कररहा हौ-वो बुरीतरह हांफ़ रहा। थां----------दोनों हथेलियाँ दीवार पर्र टेककर उसने एक् बारफिन इसतरह ताकत लगाई, जैसेकोई घक्के सें स्टार्ट होने वाली वाहन कों धक्का लगारहा होँ, परन्तु दीवार टस सें मस न् हुइ।
" धत् तेरे कि। " कहने केँ संग हि उसने अपने माथे सें पसीना औऱ हाथ झटकता हुआ बोला…“इस दुनिया मे तुम् कुछ नहि कर सकते विजय दि ग्रेट !"
एकाएक कमरे केँ बाहर् सें आबाज उभरी----------" विजय---विजय-----!"
"हांय…यह तौ अपने तुलाराशी कि आवाज़ हैं। " विजय एकदम पछाड-सि खा गय़ा फिनबडी तेजी सें वो फर्श पऱ दीवार' केँ सहारे उल्टा खडा होँ गय़ा…सिऱ नीचे-पैर ऊपर-चेहरा बीमार कि तरफ़किए वो जोर-शोर सें चिल्लाने लगा-------"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तुँ जलाल तुँ आईबला कों टाल तुँ। "
उसे देखते हि सुपर रघुनाथ, दरवाजे पर्र ठिठक गय़ा----मुह सें खुद हि ये वाक्य निकल गय़ा…“अरे---यह तुम् क्याँ कररहे होँ विजय?"
विजय अपनी हि धुन मे कहताचला गय़ा----- ---"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तूँ जलाल तुँ-----आई बला कों टाल तुँ। "
"विजय। ” रघुनाथ नें पुन: पुकारा।
"जल तुँ जलाल तु----------आईबला कों टाल तु-----जल तूँ जलाल तुँ आईबला कों टाल तूँ !"
" ओफ्फो--- तुम् अपनीइन ऊटपटांग हरकतों सें कभीबाज नहि आओगे !” कहने केँ संग हि रघुनाथ लम्बे-लम्बे क़दमों केँ संग कमरे मे दाखिल होँ गय़ा-वो इससमय अपनी सम्पूर्ण यूनीफार्म मे थां…भारी जूतों कि ठक-ठकठीक विजय केँ समीप जाकर रूकी-----विज़य अब बाकायदा हनुमान चालीसा कां पाठ करने लंगा थां-रधुनाथ नें एक् बारपुन: उसे पुकारा, परन्तु जबइस बार----भि पर्र कोई प्रतिक्रिया नहि हुइ तौ उसके दोनों पेर पकड़कर जोर सें झटका दिया।
चित अवस्था मे फर्श पर्र पड़ा वो आंखें बन्दकिए बुदबुदा रहा थां ---"हनुमान-ज़ब नाम सुनावे-भूत-पिशाच निकट नहि आवे !"
" ओफ्फो---!" रघुनाथ झुंझलाहट भरे स्वर मे चीख पड़ा-----"विजय। "
विजय नें पट्ट सें आखेंखोल दीं-रघुनाथ पऱ दृष्टि पडते हि वो एकदमउछल औऱ चीखा…"भ--भूत-भूत-भूत पिशाच निकट नहि आवे---हनुमान जबनाम सुनावे। "
हनुमान चालीसा कां पाठ करताहुआ वो सारे कमरे मे दौड़रहा थां-दुष्टि हर क्षण रघुनाथ पर्र थि-आंखों मे ऐसेभाव थें जैसे रघुनाथ कों वो सचमुच भूतसमझ रहा होँ, रघुनाथ अपनेजगह पर्र जड़वत'-सां खडारह गय़ा…बड्री अजीब-सि स्थिति थि उसकी-बह पागलों कि-सि अवस्था मे चीख पडा---आह-यह मे हूं विजय--रघुनाथ---। "
"आंय--। "' कहकर विजय एकदमरुक गय़ा----जैसे बहोत तेज चलती हुईँ गाडी मे अचानक हि ब्रेक लगादिए गएहों वो ऊंट कि तरह गर्दन उठाकर बोला----"प.प्यारे तुलाराशी-…यह यह तौ तुम् हौ ! तुमने पहले क्यूं -नहीं बताया, हम् तोँ समझरहे थें कि
"यह अपनी मूर्खतापूर्ण बाते तुम् कब छोडोगे विजय?" रघुनाथ नें उसकीबात बीच हि मे काटकर कहा-------" वंहा दीबार केँ सहारे उलटेखडे क्याँ कररहे थें?"
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