विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Complete Kahani All Parts
अध्याय १: रेशमी बंधन औऱ चूडैल सिसकारियाँ
जगह: विजयनगर, (एक् आलीशान कोठी)
पात्र:
* नव्या: २३साल कि बेहद हसीनबहू, जिसके जिस्म कि सुडौलता अच्छे-अच्छों कां ईमान डगमगा दे।
* विक्रम सिंह:५२ साल केँ ससुरजी, जोँ जिम औऱ खान-पान सें ३५ केँ 'जवान सांड' दिखते हें।
* अंजलि: नव्या कि सगी छोटी चाची (मायके सें), जोँ ग्वालियर मे रहती हैं औऱ स्वयं एक् मंझी हुइ 'चूदेल' हैं।
विवाह कों दोसाल बीत चुके हें। नव्या कां पति सुमित अक्सर बिजनेस केँ सिलसिले मे बाहर् रहता हैं। घऱ मे विक्रम सिंह कि हस्ती ऐसी हैं कि परिंदा भि पर्र नहि मारता। वो नव्या पर्र कभीहाथ नहि उठाते, कभी जबरदस्ती नहि करते, बस अपनी आँखों औऱ अपनी 'प्रार्थना' सें उसे धीरे धीरे मानसिक रूप सें नंगाकर रहे हें।
आज दोपहर, नव्या नें अपने कमरे कां दरवाजा अंदर सें बंद किया औऱ ग्वालियर अपनी चाची अंजलि कों मोबाइल लगाया। नव्या इस टाइम केवल एक् पारभासी साटन कि नाइटी मे हैं, उसका जिस्म पसीने सें भीगा हैं क्योंकि अभि-अभि ससुरजी जी उसके कमरे मे 'पानी' देने केँ बहाने आए थें।
नव्या: (हाँफते हुए, आवाज़ मे कंपन) "चाची। उह्ह। मे पागल हौ जाऊँगी। मे अब औऱ सहन नहि करपारही। ससुरजी जी। वोँ मुझे छूते तक नहि, पर्र उनकी बातें। उनकी वोँ गिड़गिड़ाहट मुझे भीतर सें गीलाकर देती हैं। "
अंजलि (ग्वालियर सें): (एक् ठंडी औऱ कामुक हंसी केँ संग)"अरे मेरी भोली नव्या! फिन क्याँ हुआआज? क्याँ फिन सें विक्रम जी नें अपनी 'भक्ति' कां प्रदर्शन किया?"
नव्या: "चाची, आज वोँ मेरे कमरे मे आए। मे सोरही थि, मेरी नाइटी थोड़ीऊपर चढ़ गई थि। उन्होंने मुझे जगाया नहि, बस मेरे पैरों केँ पास फर्श पऱ बैठगए। जब मेरीआँख खुली, तौ देखा वोँ हाथ जोड़कर रोरहे थें। कहरहे थें— 'नव्या बेटा, तूँ मेरीबहू नहि, इसघऱ कि लक्ष्मी हैं। बस एक् बार.बस एक् बार अपनी जांघों पर्र मुझे अपनासर रख लेनेदे, मेरी बरसों कि तपिश शांत हौ जाएगी। मे तुझेही हाथ नहि लगाऊँगा, बस तेरा स्पर्श चाहिए'। चाची। उनकी आँखों मे वोँ तड़प देखकर मेरा कलेजा मुंह कों आँ गय़ा। मेराहाथ स्वयं-ब-स्वयं उनकेसर पर्र चला गय़ा औऱ उन्होंने मेरे तलवों कों अपनीगरम साँसों सें भिगो दिया। उह्ह। मेरी बुर अब तक फड़करही हैं!"
अंजलि: (मुलायम अंदाज़ मे) "वाउरे विक्रम! क्याँ शिकारी हैं। नव्या, तूँ समझ नहि रही हैं, वोँ तुम्हें 'बेबस'कर रहा हैं। देख, ससुरजी जब जबरदस्ती करता हैं तौ महिला 'सती'बन जाती हैं, पऱ जब वोँ पेर पकड़कर रोता हैं, तोँ स्त्री 'रांड'बन जाती हैं। तूँ बता, जब उनकेगरम होंठ तेरे तलवों कों छूरहे थें, तब तुम्हारी तरफ अपने जवान पति सुमित कि यादआई याँ ससुरजी केँ उसखड़े हुए स्वाभिमान कि, जोँ उनकी धोती केँ नीचेमचल रहा थां?"
नव्या: "चाची। आप् भि नं! उह्ह.सच कहूँ तोँ उस वक़्त सुमित कहीं नहि थां। मुझेबस ससुरजी जी कि वोँ 'अनुनय-विनय' औऱ उनकीदेह कि वोँ 'मर्दाना महक' महसूस होँ रही थि। उन्होंने जाते-जाते कहा— 'बेटी, कल मे तेरे कमरे केँ बाहर् बैठूँगा, जब तक तूँ मुझे अपनी नग्नता कां एक् दर्शन नहि देगी, मे अन्न-जल ग्रहण नहि करूँगा'। चाची, मे क्याँ करूँ? वोँ भूखेमर जाएंगे। क्याँ मे उन्हें अपनीपीठ दिखादूँ?"
अंजलि: (अश्लील ताना मारते हुए)"पीठ क्यूं? पूरी नंगीखड़ी हौ जा उनके सामने! नव्या, हमारे खानदान कि औरतों कि नियति हि यही हैं। तूँ ग्वालियर कि हैं, यहा कि मिट्टी मे हि 'चूदेल' तत्व हैं। देख, वोँ तुझेही मजबूर कररहे हें कि तुँ स्वयं उन्हें अपनी पनाह मे लेँ लें। कलजब वोँ बाहर् बैठें, तोँ तूँ दरवाजा थोड़ा खुलाछोड़ देना। उन्हें दिखा देना कि उनकीबहू केँ पास क्याँ-क्याँ 'खजाना' हैं। जब वोँ अपनी प्रार्थना लेकर तेरे अंगों केँ पास आएंगे, तोँ तुँ स्वयं उनका वो 'जवान मूसल'थाम लेगी। डर मत, ये 'अधर्म' हि तेरा असलीसुख हैं!"
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नव्या आज रसोई मे कामकर रही थि। विक्रम सिंह डाइनिंग टेबल पऱ बैठे अखबार पढ़रहे थें, पर्र उनकी नज़रें अखबार केँ कोने सें नव्या कि झुकती हुइ कमर औऱ उसकी साड़ी केँ पल्लू सें झाँकती 'दूधिया पीठ' पऱ गड़ीथीं। उन्होंने नव्या कों पास बुलाया।
विक्रम सिंह: (गंभीर पर्र रेशमी आवाज़ मे) "नव्या बेटा, आज सब्जी मे नमक थोड़ातेज हैं। बिल्कुल तेरी जवानी कि तरह। इतना तीखापन सेहत केँ लिएठीक नहि होता, इसे कहीं 'खपाना' सीखना होगा, वरना अंदर हि अंदरजल जाओगी। "
नव्या कां चेहरा लाल होँ गय़ा। वो समझ गई कि ये मात्र सब्जी कि बात नहि हैं। वो बिनाकुछ बोले, नज़रें नीचीकर वहां सें निकल गई। वो उन्हें ध्यान न देना (Ignore) कररही थि, पऱ विक्रम सिंह कि वो 'डबल मीनिंग' बात उसके कानों मे पिघले हुए शीशे कि तरहउतर गई।
दोपहर मे नव्या नें दरवाजा बंद किया औऱ अपनी चाची अंजलि कों ग्वालियर मोबाइल लगाया। नव्या पसीने सें तर-बतर थि।
नव्या: "चाची। उह्ह। मे क्याँ करूँ? ससुरजी जीअब सीधे शब्दों मे बात हि नहि करते। हर बात मे ऐसा 'अश्लील' संकेत होता हैं कि मेरा जिस्म काँपने लगता हैं। आज उन्होंने मेरी जवानी कि तुलना नमक सें कर दि। वोँ मुझे छूते नहि, पऱ उनकी नज़रें। चाची, उनकी नज़रें मेरी साड़ी कों फाड़कर मेरी बुर तक पहुँच जाती हें। मे उन्हें अनदेखा करती हूं, पर्र वोँ हार नहि मानते। "
अंजलि (चाची): (खिलखिलाकर हंसते हुए)"अरी नव्या! तूँ तौ बड़ी बुद्धू निकली। तुँ जिसे 'अनदेखा' करनाकह रही हैं, विक्रम सिंहउसे 'मौन सहमति' समझरहे हें। तुँ जितनी अधिक 'कट्टर' बनेगी, उनके भीतर कां सांड उतना हि जोर मारेगा। सुन मेरीबात, तूँ उन्हें नज़रअंदाज़ मतकर, बल्कि उन्हें उसमोड़ पऱ लें आँ जहाँ वोँ स्वयं अपनी मर्यादा तोड़ें। "
नव्या: "नहि चाची! मे ऐसाकभी नहि करूँगी। सुमित (पति) मुझसे इतना प्रेम करते हें। मे ससुरजी जी केँ जाल मे नहि फँसूँगी। "
अंजलि: (कमीनेपन सें, अश्लील शब्दों मे) "अरे सुमित कां प्रेम तौ 'दाल-चावल' हैं नव्या! असलीमज़ा तौ उस 'अचार' मे हैं जौ तेरे ससुरजी कि नज़रों मे हैं। सुन, तुँ कहती हैं न् कि वोँ तुम्हे हाथ नहि लगाते? कलजब तुँ नहाकर निकले औऱ वोँ सामने हों, तोँ जानबूझकर अपनी साड़ी कां पल्लू ढीलाछोड़ देना। देख्ना। जौ ससुरजी आज मात्र 'नमक' कि बातकर रहा हैं, वोँ कल तेरे बोबों कां रस पीने केँ लिए अपनी सारी 'अनुनय-विनय' दांव पऱ लगा देगा। तुँ बस उनकीतड़प देख नव्या। उनकी आँखों मे जोँ तेरेलिए 'लार'टपक रही हैं, उसे महसूस कर!"
नव्या: "चाची। आप् कितनी गंदी बातें करती हें। उह्ह। पऱ सच कहूँ, जब आप् यहसभी कहती हें, तौ मुझे ससुरजी जी कि वोँ 'दो अर्थी' बातें यादआती हें औऱ मेरी जांघों केँ बीच एक् अजीब सि जलन होने लगती हैं। मे कल भि उन्हें ध्यान न देना करूँगी, पर्र। पऱ चाची, अगर वोँ फिन सें कुछऐसा कहदें तोँ?"
अंजलि: "तौ तूँ भि पलटकर जवाब देना! कहना— 'बाबूजी, नमकतेज हैं तोँ शहद (Honey) चख लीजिये'। फिनदेख, वोँ जवान ससुरजी केसे अपनी मर्यादा भूलकर तेरे पैरों मे गिरता हैं। "
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नव्या 'कट्टर जवान' तौ हैं, पऱ वो 'शनि कि प्रधानता' वालीऔरत हैं—अडिग, शीतल औऱ आत्म-नियंत्रण सें भरी हुइ। विक्रम सिंह कां आकर्षण जितना गहरा हैं, नव्या कां तिरस्कार उतना हि तीखा।
यहा 'नमक' वाला उलाहना फेल होँ चुका हैं। अबखेल मानसिक युद्ध (Psychological Warfare) कां हैं।
अध्याय २: पत्थर कि दीवार औऱ ससुरजी कां 'अदृश्य' जाल
जगह: कोठी कां पुस्तकालय (Library)
वक्त:साम केँ साढ़ेचार बजे।
नव्या अलमारी सें कुछ किताबें ठीककर रही थि। उसने गहरे नीलेरंग कि साड़ी पहनी थि, जिसका पल्लू उसने कंधे पऱ पिन सें बड़ी मज़बूती सें टाँकरखा थां—मर्यादा कां एक् अभेद्य कवच। तभी विक्रम सिंह वहांआए। उनकेहाथ मे एक् गुलाब कां फूल थां, जिसकी पंखुड़ियाँ पूरीतरह खिली हुईँ थीं।
विक्रम सिंह: (नव्या केँ बिल्कुल लगभगआकर, पर्र उसे बिनाछुए, उनकी आवाज़ मे एक् रसीली प्रार्थना थि) "नव्या, इस गुलाब कों देखो। इसकी पंखुड़ियाँ कितनी कोमल हें, पऱ इन्हें छूने कि हिम्मत नहि होती.डर लगता हैं कि कहीं मेरी ऊँगली केँ स्पर्श सें यह कुम्हला नं जाएं। कुछ हुस्न ऐसी होती हैं जिसे मात्र दूर सें पूजना चाहिए, हैं नं?"
नव्या नें अपनी गर्दन धीरे-धीरे सें मोड़ी। उसकी आँखों मे कोई लज्जा नहि थि, बल्कि एक् 'कठोर शीतलता' थि। उसने सीधे विक्रम सिंह कि आँखों मे झाँका—ऐसी नज़रों सें, जोँ किसी कों भि अपनी स्थान पर्र पत्थर करदें।
नव्या: (बर्फ जैसी ठंडी आवाज़ मे) "बाबूजी, फूल कि हुस्न उसकी डाली पर्र हि सुरक्षित रहती हैं। अगरकोई उसे तोड़ने कि याँ बेवजह लगभगआने कि कोशिश करे, तौ उसके काँटे खून भि निकाल देते हें। मेरीगरम चाय ठंडी होँ रही हैं, मुझे जानां चाहिए। "
वो उन्हें एक् बेहद 'कठोर'नज़र सें देखकर, अपनी साड़ी सँभालते हुए वहां सें निकल गई। पीछेखड़े विक्रम सिंहउस गुलाब कों मसलते रहगए। उन्हें लगा जैसे किसी नें उनके पुरुषार्थ पऱ बर्फीला पानीडाल दिया होँ।
नव्या कि 'कठोरता' औऱ विक्रम सिंह कि 'खामोशी' केँ बीच कां ये मानसिक द्वंद्व अब एक् नए औऱ गंभीर मोड़ पर्र हैं।
अध्याय ३: गरिमापूर्ण मौन औऱ चाची कि सूक्ष्म अंतर्दृष्टि
जगह: कोठी कां मंदिर (Prayer kamara)
वक़्त: सुभह कि आरती केँ बाद।
नव्या नें आज हल्के पीलेरंग कि चंदेरी रेशम कि साड़ी पहनी हैं। वो पूरे विधि-विधान सें पूजा करके बाहर् निकली, तोँ सामने विक्रम सिंहखड़े थें। उनकी आँखों मे कल वाली वो 'तड़प' याँ 'गुलाब' नहि थां। उन्होंने नव्या कि ओर देखा भि नहि, जैसे वो वहां हौ हि न्। उन्होंने बहोत हि शांत औऱ गंभीर स्वर मे बस इतनाकहा—
विक्रम सिंह: "नव्या बेटा, आजसाम कों सुमित कां मोबाइल आए तौ कह देना कि मे कुछ दिनों केँ लिए तीर्थ यात्रा पऱ जाने कां विचार कररहा हूं। मन थोड़ा अशांत हैं, एकांत कि आवश्यकता हैं। "
उनके शब्दों मे नं कोई शिकायत थि, नं कोई'डबल मीनिंग' संकेत। वो अपनी भारी खड़ाऊँ कि आवाज़ केँ संग पुस्तकालय कि ओरचले गए। नव्या वहींखड़ी रह गई। उसेलगा जैसे उसनेकल उन पर्र जोँ 'कठोरता' कां बाण चलाया थां, उसने ससुरजी जी केँ आत्म-सम्मान कों गहरीचोट पहुँचाई हैं। वो उन्हें 'नज़रअंदाज़' करना चाहती थि, पऱ अब ससुरजी जी नें उसे 'अदृश्य' (Invisible) कर दिया थां।
दोपहर मे नव्या नें चाची अंजलि कों मोबाइल लगाया। अंजलि इस वक्त अपने बागीचे मे बैठकर किसी साहित्यिक पत्रिका कां अध्ययन कररही थीं।
नव्या: "चाची, आज बाबूजी बहोत बदलेहुए लगे। उन्होंने मेरीओर देखा तक नहि। वोँ तीर्थ यात्रा पऱ जाने कि बातकर रहे हें। मुझेलग रहा हैं कि कल मैंने जिस कठोरता सें उन्हें उत्तर दिया, उससे उन्हें बहोत दुःख पहुंचा हैं। मेरामन अब बहोत अशांत हैं। "
अंजलि (चाची): (बड़ी हि सौम्यता औऱ दार्शनिक अंदाज़ मे) "नव्या, यही तौ एक् कुलीन औऱ मर्यादित पुरुष कि पहचान हैं। जबउसे उसकी 'अनुनय' कां उत्तर 'कठोरता' सें मिलता हैं, तौ वो जबरदस्ती नहि करता, वो स्वयं कों समेट लेता हैं। पर्र बेटा, एक् बात गहराई सें समझ। पुरुष कां ये'मौन' उसकी 'कामुकता' सें भि अधिक प्रभावशाली होता हैं। तूने उन्हें ध्यान न देना किया, पऱ अब उनकी 'अनुपस्थिति' तुझेही कचोटरही हैं। ये तेरी 'संवेदनशीलता' हैं, जोँ तेरी अपराधी महसूस करारही हैं। "
नव्या: "तोँ मे क्याँ करूँ चाची? क्याँ मे उनसे माफ़ी माँगूँ?"
अंजलि: "नहि नव्या, माफ़ी माँगना मर्यादा केँ विरुद्ध होगा। तूँ बस उनकी सेवा मे वोँ 'कोमलता' लें आँ जौ एक् बहू कां धर्म हैं। देख, समाज कि मर्यादा मे रहकर भि भावनाओं कां आदान-प्रदान होँ सकता हैं। विक्रम सिंह जैसे प्रभावशाली शख्स कां तीर्थ पर्र जानां सिर्फ 'शांति' केँ लिए नहि हैं, वो तेरीउस 'कठोरनज़र' सें बचने कां प्रयास हैं जिसे वो सहन नहि करपारहे। तूँ अपनी गरिमा मतछोड़, पर्र अपने बर्ताव मे वोँ 'शीतलता' ला जौ उनके जलतेहुए मन कों चैनदे सके। एक् खानदानी स्त्री वही हैं जोँ मर्यादा केँ भीतर रहकर भि घऱ केँ पुरुष कि मानसिक प्यास कों समझ लेँ। "
नव्या: "आप् सचकहरही हें चाची। मुझे अपनी मर्यादा मे रहकर हि उन्हें ये अहसास दिलाना होगा कि मे उनके प्रति अनादर नहि रखती। शायदआज रात उनके भोजन कि थाली मे स्वयं लेकर जाऊँगी। "
अंजलि: "बिल्कुल नव्या। मर्यादा कां पालन करतेहुए भि संबंधों मे वोँ 'तरलता' बनी रहनी चाहिए। तूँ बस अपना धर्म निभा, आगे भगवान कि ख़्वाहिश। "
नव्या नें मोबाइल रखा। अब उसकेमन मे ससुरजी जी केँ प्रति घृणा नहि, बल्कि एक् 'मर्यादित करुणा' जागी थि। उसेपता नहि थां कि ये करुणा हि उस 'कामुक समर्पण' कि पहली सीढ़ी हैं, जिसे विक्रम सिंह नें अपनी खामोशी सें सजधजकर किया हैं।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Kahani ab aur interesting hogi
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