विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
नव्या कि आँखों मे जैसे वासना कां मोतियाबिंद उतरआया थां। झिरी सें उस विकराल लंड कों हिलते देख उसकी कल्पनाओं नें मर्यादा कि हर दीवार कों ढहा दिया। वो वहीं नग्न अवस्था मे दीवार सें चिपकी, अपनी जांघों कों आपस मे रगड़ते हुएउस 'काल्पनिक सुहागरात' केँ मंजर मे डूब गई जोँ अब उसकेमन मे किसी अश्लील फिल्म कि तरहचल रही थि।
नव्या (मन हि मन कल्पना करतेहुए): "अहह.अगर यही हमारी सुहाग सेज होती। मे उस मखमली खाट पर्र केवल एक् महीनलाल चुनरी ओढ़कर लेटी होती। शरीर पऱ धागा भि नं होता, बस वो पारभासी लाल कपड़ा मेरेइन भारी बोबों औऱ फूली हुइ गांड़ केँ उभारों कों औऱ भि कयामत बनारहा होता। मेरी बुर उसलाल कपड़े केँ नीचे सें ससुरजी जी कों न्यौता देरही होती। औऱ तभी कमरे कां दरवाजा खुलता। "
नव्या कि साँसें तेज होँ गईं, उसने खिड़की कि झिरी सें अंदरहाथ चलारहे विक्रम कों देखा औऱ अपनी कल्पना मे उन्हें 'दूल्हा' बना लिया।
नव्या (मन हि मन): "सामने सें बाबूजी अंदरआते। मात्र सिर पर्र दूल्हे कां सेहरा बांधे, पऱ शरीर पर्र एक् कतरा कपड़ा भि नहि। उनका वो काला औऱ खूंखार मूसल सेहरे कि लड़ियों केँ नीचे सें झाँकता हुआ, किसी भूखे अजगर कि तरह मेरीओर बढ़रहा होता। वो अपनेउस भारी शरीर केँ संगजब बैड पऱ चढ़ते, तौ उनकी नग्नता कां वो बोझ मेरी कोमलदेह कों कुचलने केँ लिए रेडी होता। "
नव्या नें अपनी आँखें मूंदलीं औऱ स्वयं कों उसखाट पर्र महसूस करनेलगी।
नव्या (मन हि मन): "वो आते हि अपनी भारी आवाज़ मे कहते—'नव्या बेटी, आजइसलाल चुनरी कों हटाकर तेरीइस कट्टर जवानी कां असलीरंग देखूँगा। ' औऱ फिन वो अपने खुरदरे हाथों सें मेरी चुनरी खींच देते। मेरे अधनंगे तरबूज जैसे बोबे उनकी आँखों केँ सामने नाचने लगते। वो अपनेउस विकराल अंग कों मेरी जांघों केँ बीच रगड़ते औऱ मे। मे जौ आज सावित्री बनी फिरती हूं, उनके पैरों सें लिपटकर भीख माँगती—'बाबूजी, अब औऱ इंतजार नहि होता, अपनाये मर्दाना स्वाभिमान मेरेइस अमृत कुंड मे उतार दीजिये, मुझे फाड़ दीजिये!'"
नव्या कां पूराबदन पसीने सें नहा गय़ा थां। झिरी केँ अंदर विक्रम सिंहअब अपनेचरम पऱ थें औऱ बाहर् नव्या अपनी कल्पना केँ उस 'नग्न दूल्हे' औऱ उसके मूसल कि मार कों अपनीरूह मे महसूस कररही थि।
नव्या (मन हि मन): "कितना डरावना औऱ कितना लुभावना हैं ये ख्याल। ससुरजी जी दूल्हा बनकर नंगे खड़ेहों औऱ मे उनकी 'भोग्या' बनकरउस मूसल कि गहराई नापूँ। सुमित केँ पास तौ केवल प्रेम थां, पऱ बाबूजी केँ पास तौ वो 'तबाही' हैं जोँ मुझ जैसी कटीली महिला कों पूरीतरह तबाहकर दे। अहह! काशये कल्पना सच होती औऱ वो सेहरा बांधे अभि इसी वक़्त बाहर् आकर मुझेइसी गलियारे मे नंगा दबोच लेते। "
नव्या कि बुर सें निकला तरलअब फर्श पर्र टपकने कों थां। वो बुरीतरह काँपरही थि, उसकी 'कट्टरता' उसलाल चुनरी औऱ नंगे ससुरजी कि कल्पना केँ नीचे दबकरदम तोड़ चुकी थि।
कोईबहु यह बताए कि ये किस्सा वास्तविकता केँ बहोत लगभग हैं याँ नहि, बहु ससुरजी कां नाता औऱ मम्मी बेटी केँ नाताऐसा होता हैं सच मे याँ नहि
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
झिरी कां न्याय औऱ चरम विद्रूप
जगह: विक्रम सिंह कां कक्ष औऱ अंधेरा गलियारा
वक़्त: रात केँ २:४५बजे
कमरे केँ भीतर औऱ बाहर्, मर्यादा कि राख पर्र वासना कां तांडव अपनेचरम पर्र थां। अंदर विक्रम सिंहइस बात सें पूरीतरह अनजान थें कि उनकी नग्नता औऱ उनका वो विकराल अंग किसी कि नज़रों कि कैद मे हैं। वो पलंग केँ कोने पऱ बैठे, अपने बाएंहाथ सें बैड कि चादर कों मुट्ठी मे भींचे हुए थें औऱ दाएंहाथ सें अपनेउस काले मूसल कों पूरी ताकत सें रगड़रहे थें।
विक्रम सिंह:(दम घुटती आवाज़ मे) "अहह। नव्या। फाड़ दूँगा तुम को.देख इस लोहे कों। यह तेरीउस भरी हुईँ गांड़ केँ फांकों कों अलग करने केँ लिए हि बना हैं। तूँ आज सुभह नंगी क्याँ हुईँ, तूने मेरी कब्रखोद दि। आँ। आँ। नव्या!"
बाहर् गलियारे मे नव्या कि हालत किसी पागल नागिन जैसी थि। खिड़की कि झिरी सें ससुरजी केँ हाथ कि वो रफ़्तार औऱ उसलाल सुपाड़े कि चमक देखकर उसका संयम पूरीतरह बह गय़ा। उसने दीवार कां सहारा लिया औऱ अपनी टांगें चौड़ी करके अपनी नग्नदेह कों वहीं फर्श पऱ टिका दिया। उसका एक् हाथ उसके विशाल बोबों कों मसलरहा थां औऱ दूसरे हाथ कि उंगलियां उसकी तरबतर बुर केँ भीतर किसी पागलपन कि हद तक चलरही थीं।
नव्या (मन हि मन सिसकते हुए): "बाबूजी। मार डालिये मुझे। आपका वो मूसलदेख कर मेरीरूह कांपरही हैं। रगड़िये। औऱ तेज़। मे यहा बाहर् नंगीखड़ी होकर आपकीहर गंदी गाली कों अपनी बुर पर्र महसूस कररही हूं। अहह!काश आपकी मुट्ठी कि स्थान मेरी गहराई होती!"
अंदर विक्रम सिंह कां जिस्म अब कमान कि तरहतन गय़ा थां। उनकी गर्दन कि नसेंउभर आईथीं औऱ वो विकराल लंड अब फटने कि कगार पऱ थां। वो नव्या केँ अंगों केँ नाम लेँ-लेकर उसेहवा मे हि भोगरहे थें।
विक्रम सिंह:"अब नहि रुकता। लें नव्या। लेँ अपनाये 'भोग'.अहह!"
ठीकउसी लम्हा, जब अंदर विक्रम सिंह कां सफ़ेद सैलाब फव्वारे कि तरह छूटकर फर्श औऱ खाट पर्र गिरने लगा, बाहर् नव्या कां भि सब्रटूट गय़ा। ससुरजी कों झड़तेदेख नव्या केँ बदन मे जैसे बिजली कां बड़ा झटकालगा। उसकी बुर नें काम-रस कां ऐसा फव्वारा छोड़ा कि वो दीवार सें टकराकर नीचे फर्श पऱ गिरपड़ी। उसकी आँखें पलटगईं, शरीर धनुष कि तरहमुड़ गय़ा औऱ उसके मुँह सें एक् दबी हुई, अश्लील हल्की चीख निकली जिसे उसने अपने हि हाथों सें दबा लिया।
दोनों एक् संग, एक् हि टाइम पऱ, वासना केँ उस महा-शिखर सें गिरे थें। अंदर विक्रम सिंह हांफते हुए निढाल पड़गए, उनकी मर्दानगी अब शांत होकर उनके जांघों पर्र लुढ़क गई थि। औऱ बाहर् नव्या, पूरीतरह नग्न औऱ पसीने मे नहाई हुई, उस ठंडे फर्श पर्र अपनी हि बुर केँ पानी मे सराबोर पड़ी थि।
आज 'स्पर्श' नहि हुआ थां, पर्र आत्माएं नग्न होकर एक्-दूसरे मे समा चुकीथीं।
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विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
सुभह कि नमी औऱ शब्दों कां संभोग
जगह: कोठी कां पिछला आंगन (तुलसी कां चौरा)
टाइम: सुभह८:१५ बजे
रात केँ उस 'महा-विस्फोट' केँ बाद कि सुभह औऱ भि भारी थि। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पर्र हल्दी कां तिलक लगाए औऱ शरीर पऱ एक् कसी हुइ नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी केँ चौरे केँ पासजल चढ़ारही थि। पऱ आज उसकीचाल मे वो 'सावित्री' वाला अनुशासन कम औऱ एक् मदहोश नागिन कि लचक अधिक थि। उसेपता थां कि पीछे बरामदे मे बैठे विक्रम सिंह कि नज़रें उसकेहर उभार कों साड़ी केँ पार भि 'नग्न'देख रही हें।
विक्रम सिंह केँ चेहरे पऱ आज एक् अजीब सि विजय वालीचमक थि। उन्होंने अखबार मेज पऱ पटका औऱ अपनी भारी, कामुक आवाज़ मे सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह:"आज तुलसी मे जलकुछ ज़्यादा हि चढ़ाया जारहा हैं नव्या? लगता हैं रात कि 'तपन' अभि तक शांत नहि हुईँ। याँ फिन अंदर कहींऐसी आगलगी हैं जिसे बुझाने केँ लिएयह लोटा छोटापड़ रहा हैं?"
नव्या कां हाथ ठिठका, पर्र उसने नज़रें नहि उठाईं। रात कों जौ विकराल मूसल उसने झिरी सें देखा थां, उसकीछवि उसकी आँखों केँ सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुरजी कि आँखों मे सीधे झाँका—आज डर नहि, एक् चुनौती थि।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पर्र जीभ फेरते हुए)"आग जब कोठी केँ भीतर हि सुलगरही होँ बाबूजी, तौ बाहर् जल चढ़ाने सें क्याँ होगा? औऱ तपन तोँ तब शांत हौ जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा मे रहे। आप् तोँ रातभर स्वयं हि किसी 'मूसल' कि तरह अपनी प्यास सें लड़रहे थें, मैंने सुना थां कि रात कों आपकी नींदकुछ अधिक हि उखड़ी हुई थि। "
विक्रम सिंह कां दिलधक सें रह गय़ा। नव्या कां 'मूसल' शब्द कां प्रयोग करनासाफ़ इशारा थां कि उसनेकुछ देख लिया हैं। उनके चेहरे पर्र एक् कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह:"नीद तोँ तबआएजब आँखों केँ सामने वो 'लाल चुनरी' वाला मंज़र नं हौ। औऱ मेरा वो 'मूसल'। वो तोँ अबउस 'कुंड' कि गहराई नापने केँ लिए उतावला हैं जिसे तुमने सुभह-सुभह खुलेआम दिखाया थां। क्याँ करूँ नव्या, उसकी जिद्द केँ आगे मे भि हार जाता हूं। वो कहता हैं कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ कों नहि तोड़ेगा, उसे सुकून नहि आएगा। "
नव्या नें खाली लोटाकमर पर्र टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक् तरफ कों तन गई। उसने एक् अदा केँ संग अपने बालों कों पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ मे) "जिद्द तौ बुरीबला हैं बाबूजी। पऱ याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' हैं। अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तौ खून भि निकल सकता हैं। हाँ, आप् अपनी आँखों सें जितना चाहें उतना 'दोहन'कर लीजिये। दूधवही अच्छा जौ बिनाथन छुए नज़रों सें पी लियाजाए। क्याँ आपकी प्यास केवल 'देखने' सें नहि बुझती? याँ फिन आपकोउस 'विकराल औजार' केँ लिएकोई औऱ हि काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पर्र अकड़ते हुए) "देखने सें तोँ केवलभूख बढ़ती हैं नव्या। असलीसुख तौ उस 'मंथन' मे हैं जिससे अमृत निकलता हैं। तूँ चाहे जितना भि 'छूनामना हैं' कि तख्ती टांग लें, पऱ तेरी आँखों कि यहनमी बतारही हैं कि रात कों तूने भि उस 'मूसल' कि मार कों ख्यालों मे महसूस किया हैं। बता न्। क्याँ वो खयालउस 'लाल कपड़े' मे तुम्हें सुहाग कि याद नहि दिलारहा थां?"
नव्या कां शरीर सिहरउठा। उसने अपनी साड़ी केँ पल्लू कों सीने पर्र औऱ कसा, पऱ उसकी उभरी हुइ छाती ससुरजी कि आँखों कों जवाबदे रही थि।
नव्या: "सुहाग कि सेज तौ दूर कि बात हैं बाबूजी, अभि तौ आपकोइसी 'दर्शन' पऱ गुजारा करना होगा। आप् अपनीउस 'जागीर' कों संभाल कर रखिये, कहींऐसा नं होँ कि मर्यादा कि आग मे वो जलकरराख होँ जाए। मे तौ सावित्री हूं। मात्र नज़रों सें जलाना जानती हूं। "
वो बलखाती हुई किचन कि ओरबढ़ गई, पऱ जाते-जाते पीछे कि ओर एक् ऐसीनज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह केँ लंड मे फिन सें जान फूंक दि। दोनों केँ बीच स्पर्श कि दीवार अभि भि खड़ी थि, पर्र शब्दों केँ जरिएवे एक्-दूसरे कों नंगा करकेभोग रहे थें।
नव्या किचन कि दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक् गहरी सांसली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी मे कसेहुए बोबे बाहर् निकलने कों बेताब होँ उठे। वो धीरे-धीरे सें पलटी औऱ अपनीकमर पऱ हाथ रखकर, तिरछी नजरों सें विक्रम सिंह कों देखने लगी। उसकी आँखों मे अब वो 'बहू' वाली लज्जा नहि, बल्कि एक् शिकारी कि शोखी थि।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक् बात कहना तौ भूल हि गई। रात कों जिस'नाग' कों आप् अपनेहाथ मे थामे फुफकार रहे थें, उसे इतना खुला न् छोड़ें। वो बहोत खतरनाक लगरहा थां। कहींऐसा न् हौ कि अपनी फुफकार केँ नशे मे वो किसीऐसे 'बिल' मे घुसने कि कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने कि उसे इजाजत नहि हैं। "
विक्रम सिंह नें गरमचाय कां घूंटभरा औऱ अपनी मूंछों पर्र ताव देतेहुए नव्या केँ जिस्म केँ एक्-एक् उतार-चढ़ाव कों अपनी आँखों सें चाटने लगे।
विक्रम सिंह:"बिल अगर इतना रसीला औऱ तंग हौ नव्या, तोँ नाग अपनीजान कि परवाह नहि करता। औऱ वो कोई मामूली सांप नहि हैं, वो तोँ 'काल' हैं। उसेबिल कि गहराई सें डर नहि लगता, उसे तोँ बसउस 'गर्मी' कि तलाश हैं जोँ आज सुभह तेरेउस गीले जिस्म सें छूटरही थि। तूनेउसे खुली आँखों सें देख लिया हैं, अब वो शांत नहि बैठेगा। "
नव्या नें अपने गुलाबी होंठों कों फिन सें दाँतों तले दबाया औऱ अपनी गांड़ कों थोडा औऱ पीछे कि ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तौ बिल मे बहोत हैं बाबूजी, पऱ उसबिल केँ मुहाने पऱ मर्यादा केँ पत्थर रखे हें। आपका वो नाग चाहे जितना भि विकराल हौ जाए, उन पत्थरों सें टकराकर अपनासिर हि फोड़ेगा। औऱ सुनिए, वो जौ आप् 'अमृत' कि बातें कररहे थें। उसे अपनी मुट्ठी मे हि कैद रखिये। उसे फर्श पऱ एक्सक्यूज़ शोभा नहि देता, वो तोँ किसी 'पवित्र कलश' कि अमानत हैं। "
विक्रम सिंह कि आँखों मे अश्लीलता कां सैलाब उमड़पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी कों थोड़ाआगे खिसकाया।
विक्रम सिंह:"कलश तौ तूँ हि हैं नव्या। पर्र तूनेउस पऱ 'छूनामना हैं' कि मुहरलगा रखी हैं। पऱ तूँ भूलरही हैं, नाग कों छूने कि ज़रूरत नहि होती, वो तौ अपनी ज़हरीली फुफकार औऱ नज़रों सें हि शिकार कों अधमरा कर देता हैं। औऱ जौ तूनेरात कों झिरी सें मेरा वो 'औजार' देखा हैं, वो अब तेरे सपनों मे भि बिल खोदने आएगा। बता नं। क्याँ उसे देखकर तेरीउस 'कंटीली बुर' मे खुजली नहि हुई? क्याँ तुम्हें ये नहि लगा कि काशये पत्थर कि दीवार अभि गिरजाए औऱ वो नाग सीधे अपनी मंजिल पा लें?"
नव्या कां चेहरा तपउठा, पर्र वो हटी नहि। उसने एक् कदम औऱ आगे बढ़ाया, इतनी लगभग कि विक्रम सिंह कों उसकेबदन कि मांसल गंधआने लगी।
नव्या: "खुजली तौ उसे भि होती हैं बाबूजी, जोँ प्यासा हौ औऱ सामने समंदर दिखरहा होँ। पर्र मे वोँ दरिया हूं जौ मात्र सुमित केँ लिए बहता हैं। आप् बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये औऱ अपनेउस 'विकराल मूसल' कों हाथ सें सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इसबिल कां दरवाजा तोँ बंद हि रहेगा, चाहे आपकानाग कितना हि फन क्यूं न् पटक लें। "
इतना कहकर नव्या नें एक् जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ केँ दोनों हिस्से साड़ी केँ नीचे एक्-दूसरे कों मसलगए, औऱ वो खिलखिलाती हुई अंदरचली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती केँ भीतरउस पत्थर होँ चुकेअंग कों संभालते रहगए। उन्हें पता थां कि नव्या उन्हें तड़पारही हैं, पऱ उसतड़प मे जौ मज़ा थां, वो दुनिया केँ किसी औऱ सुख मे नहि थां।
खिड़की कां उलटफेर औऱ नग्न गुणगान
जगह: नव्या कां शयनकक्ष / गलियारा
टाइम:रात केँ २:१५बजे
आजरात फिजाओं मे वासना कि नमीकुछ ज़्यादा हि भारी थि। नव्या केँ शरीर मे रात केँ उस 'दर्शन' नें ऐसीआग सुलगा दि थि कि वो कमरे कि ठंडक मे भि पसीने सें नहारही थि। उसेलगा कि बाबूजी अपने कमरे मे अपनेउसी विकराल मूसल कि सेवा मे व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया थां। इसी बेफिक्री औऱ चरम उत्तेजना मे नव्या नें अपनी साड़ी, पेटीकोट औऱ चोली उतारकर फेंक दि।
वो अपने कमरे मे पूरीतरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी कि तरहटहल रही थि। मद्धम दूधिया रोशनी मे उसके विशाल औऱ जूसी बोबे औऱ उसकी भारी गांड़ केँ मांसल पट अपनी पूरी नग्नता केँ संगचमक रहे थें। वो अपनी जांघों केँ बीचहाथ फेरते हुए औऱ अपनी बुर केँ गीलेपन कों महसूस करतेहुए तेज़-तेज़ सें बड़बड़ा रही थि।
नव्या: (सिसकते हुए औऱ शरीर कों मरोड़ते हुए)"ओह। बाबूजी! क्याँ चीज़पाल रखी हैं आपने अपनी धोती केँ नीचे। वो खूंखार काला लंड। जब सें देखा हैं, मेरीइस बुर नें पानी छोड़ना बंद नहि किया। मेरा सुमित तोँ इसके सामने कुछ भि नहि हैं। क्या बात है! वो विकराल अंगअगर एक् बार मेरीइन फांकों कों चीरता हुआ अंदरघुस जाए, तोँ मे तौ पागल हि होँ जाऊँगी। "
उसीसमय, विक्रम सिंह बाथरूम जाने केँ लिए अपने कमरे सें बाहर् निकले। गलियारे सें गुजरते टाइम उनकी नज़र अचानक नव्या केँ कमरे कि उसी खिड़की कि झिरी पर्र पड़ी, जहाँ सें कल नव्या नें उन्हें देखा थां। उन्होंने ठिठककर एक् नज़र अंदर मारी औऱ उनकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
अंदर कां दृश्य किसी महा-विस्फोट सें कम नहि थां। उनकी 'सावित्री' बहू पूरीतरह निर्वस्त्र होकर अपना हि शरीरमसल रही थि औऱ उनके मूसल केँ कसीदे पढ़रही थि।
नव्या: (अपने बोबों कों दोनों हाथों सें भींचते हुए) "बाबूजी। कहां छुपाकर रखा थां आपनेये कामुक औजार?इसे देखकर तौ पत्थर भि पिघलजाए। मेरामन कररहा हैं कि इसे अभि अपने मुँह मे भरलूँ औऱ इसका साराजहर पी जाऊँ। आप् कहरहे थें न् कि मे आपकी 'कामधेनु' हूं। तोँ आइये नं, अपनेउस हथियार सें मेरीइस जवानी कां शिकार कीजिये। मेरीये गांड़। यह तरबूज। यहसभी आपकेउस विकराल लंड कि मार सहने केँ लिए प्यास रहे हें। "
खिड़की केँ बाहर् खड़े विक्रम सिंह कां बुराहाल थां। उनकी धोती केँ भीतर उनका मूसलफिन सें पत्थर कि तरह सख्त होँ गय़ा औऱ नसेंउभर आईं। अपनीबहू केँ मुँह सें अपने'अंग' कि ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर् सें बुदबुदाते हुए):"ओह। मेरी कंटीली नागिन! तौ तुम्हें मेरा वो मूसल इतना मनपसंद आया हैं? तुँ अंदर नंगी होकर मेरानाम जपरही हैं औऱ मे बाहर् अपनी प्यास सें लड़रहा हूं। देख लें। देख लें अपनीइस बेबसी कों, क्योंकि अबयह आँखें तुम्हें केवलदेख कर नहि मानेंगी। "
नव्या अपनी हि धुन मे अपनी बुर पर्र उंगलियां चलारही थि, वो ससुरजी केँ शब्दों कों याद कर-कर केँ औऱ भि उत्तेजित हौ रही थि। वो बार-बार अपनीपीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने मे देखरही थि औऱ कल्पना कररही थि कि उस पऱ ससुरजी केँ थप्पड़ औऱ उनके लंड कि मारपड़ रही हैं।
विक्रम सिंह वहींबुत बनकर अपनीबहू केँ उस नग्न तांडव कों देखरहे थें। आज पासापलट चुका थां। कल उसने देखा थां, आज वो देखरहे थें। औऱ इस 'देखने' नें कोठी कि मर्यादा कि आखिरी ईंट कों भि हिलाकर रख दिया थां।
सुभह कि नमी औऱ शब्दों कां संभोग
जगह: कोठी कां पिछला आंगन (तुलसी कां चौरा)
वक़्त: सुभह८:१५ बजे
रात केँ उस 'महा-विस्फोट' केँ बाद कि सुभह औऱ भि भारी थि। नव्या नहा-धोकर, मस्तक पऱ हल्दी कां तिलक लगाए औऱ शरीर पऱ एक् कसी हुइ नारंगी साड़ी लपेटे तुलसी केँ चौरे केँ पासजल चढ़ारही थि। पऱ आज उसकीचाल मे वो 'सावित्री' वाला अनुशासन कम औऱ एक् मदहोश नागिन कि लचक ज़्यादा थि। उसेपता थां कि पीछे बरामदे मे बैठे विक्रम सिंह कि नज़रें उसकेहर उभार कों साड़ी केँ पार भि 'नग्न'देख रही हें।
विक्रम सिंह केँ चेहरे पऱ आज एक् अजीब सि विजय वालीचमक थि। उन्होंने अखबार मेज पर्र पटका औऱ अपनी भारी, कामुक आवाज़ मे सन्नाटा तोड़ा।
विक्रम सिंह:"आज तुलसी मे जलकुछ ज़्यादा हि चढ़ाया जारहा हैं नव्या? लगता हैं रात कि 'तपन' अभि तक शांत नहि हुई। याँ फिन अंदर कहींऐसी आगलगी हैं जिसे बुझाने केँ लिएयह लोटा छोटापड़ रहा हैं?"
नव्या कां हाथ ठिठका, पऱ उसने नज़रें नहि उठाईं। रात कों जौ विकराल मूसल उसने झिरी सें देखा थां, उसकीछवि उसकी आँखों केँ सामने नाच गई। उसने पलौटकर ससुरजी कि आँखों मे सीधे झाँका—आज डर नहि, एक् चुनौती थि।
नव्या: (अपने भीगे होंठों पऱ जीभ फेरते हुए)"आग जब कोठी केँ भीतर हि सुलगरही होँ बाबूजी, तौ बाहर् जल चढ़ाने सें क्याँ होगा? औऱ तपन तोँ तब शांत होँ जब 'बुझाने वाला' अपनी सीमा मे रहे। आप् तोँ रातभर स्वयं हि किसी 'मूसल' कि तरह अपनी प्यास सें लड़रहे थें, मैंने सुना थां कि रात कों आपकी नींदकुछ ज़्यादा हि उखड़ी हुइ थि। "
विक्रम सिंह कां दिलधक सें रह गय़ा। नव्या कां 'मूसल' शब्द कां प्रयोग करनासाफ़ इशारा थां कि उसनेकुछ देख लिया हैं। उनके चेहरे पर्र एक् कुटिल मुस्कान फ़ैल गई।
विक्रम सिंह:"नीद तौ तबआएजब आँखों केँ सामने वो 'लाल चुनरी' वाला मंज़र नं होँ। औऱ मेरा वो 'मूसल'। वो तौ अबउस 'कुंड' कि गहराई नापने केँ लिए उतावला हैं जिसे तुमने सुभह-सुभह खुलेआम दिखाया थां। क्याँ करूँ नव्या, उसकी जिद्द केँ आगे मे भि हार जाता हूं। वो कहता हैं कि जब तक उस 'कंटीली' बाड़ कों नहि तोड़ेगा, उसे सुकून नहि आएगा। "
नव्या नें खाली लोटाकमर पऱ टिकाया, जिससे उसकी भारी गांड़ एक् तरफ कों तन गई। उसने एक् अदा केँ संग अपने बालों कों पीछे झटका।
नव्या: (द्विअर्थी अंदाज़ मे) "जिद्द तोँ बुरीबला हैं बाबूजी। पऱ याद रखियेगा, बाड़ 'कंटीली' हैं। अगर बिना इजाजत हाथ लगाया तोँ खून भि निकल सकता हैं। हाँ, आप् अपनी आँखों सें जितना चाहें उतना 'दोहन'कर लीजिये। दूधवही अच्छा जौ बिनाथन छुए नज़रों सें पी लियाजाए। क्याँ आपकी प्यास मात्र 'देखने' सें नहि बुझती? याँ फिन आपकोउस 'विकराल औजार' केँ लिएकोई औऱ हि काम चाहिए?"
विक्रम सिंह: (कुर्सी पऱ अकड़ते हुए) "देखने सें तौ मात्र भूख बढ़ती हैं नव्या। असलीसुख तोँ उस 'मंथन' मे हैं जिससे अमृत निकलता हैं। तूँ चाहे जितना भि 'छूनामना हैं' कि तख्ती टांग लें, पऱ तेरी आँखों कि यहनमी बतारही हैं कि रात कों तूने भि उस 'मूसल' कि मार कों ख्यालों मे महसूस किया हैं। बता न्। क्याँ वो खयालउस 'लाल कपड़े' मे तुम्हारी तरफ सुहाग कि याद नहि दिलारहा थां?"
नव्या कां शरीर सिहरउठा। उसने अपनी साड़ी केँ पल्लू कों सीने पर्र औऱ कसा, पर्र उसकी उभरी हुईँ छाती ससुरजी कि आँखों कों जवाबदे रही थि।
नव्या: "सुहाग कि सेज तौ दूर कि बात हैं बाबूजी, अभि तोँ आपकोइसी 'दर्शन' पऱ गुजारा करना होगा। आप् अपनीउस 'जागीर' कों संभाल कर रखिये, कहींऐसा न् होँ कि मर्यादा कि आग मे वो जलकरराख हौ जाए। मे तोँ सावित्री हूं। केवल नज़रों सें जलाना जानती हूं। "
वो लचकती हुई किचन कि ओरबढ़ गई, पऱ जाते-जाते पीछे कि ओर एक् ऐसीनज़र डाल गई जिसने विक्रम सिंह केँ लंड मे फिन सें जान फूंक दि। दोनों केँ बीच स्पर्श कि दीवार अभि भि खड़ी थि, पऱ शब्दों केँ जरिएवे एक्-दूसरे कों नंगा करकेभोग रहे थें।
नव्या किचन कि दहलीज तक जाकर अचानक ठिठक गई। उसने एक् गहरी सांसली, जिससे उसकी नारंगी साड़ी मे कसेहुए बोबे बाहर् निकलने कों बेताब होँ उठे। वो धीरे-धीरे सें पलटी औऱ अपनीकमर पर्र हाथ रखकर, तिरछी नजरों सें विक्रम सिंह कों देखने लगी। उसकी आँखों मे अब वो 'बहू' वाली लज्जा नहि, बल्कि एक् शिकारी कि शोखी थि।
नव्या: (मुस्कुराते हुए) "बाबूजी, एक् बात कहना तोँ भूल हि गई। रात कों जिस'नाग' कों आप् अपनेहाथ मे थामे फुफकार रहे थें, उसे इतना खुला न् छोड़ें। वो बहोत खतरनाक लगरहा थां। कहींऐसा न् होँ कि अपनी फुफकार केँ नशे मे वो किसीऐसे 'बिल' मे घुसने कि कोशिश कर बैठे, जिसकी गहराई नापने कि उसे इजाजत नहि हैं। "
विक्रम सिंह नें गरमचाय कां घूंटभरा औऱ अपनी मूंछों पर्र ताव देतेहुए नव्या केँ शरीर केँ एक्-एक् उतार-चढ़ाव कों अपनी आँखों सें चाटने लगे।
विक्रम सिंह:"बिल अगर इतना रसीला औऱ तंग होँ नव्या, तौ नाग अपनीजान कि परवाह नहि करता। औऱ वो कोई मामूली सांप नहि हैं, वो तौ 'काल' हैं। उसेबिल कि गहराई सें डर नहि लगता, उसे तोँ बसउस 'गर्मी' कि तलाश हैं जोँ आज सुभह तेरेउस गीले जिस्म सें छूटरही थि। तूनेउसे खुली आँखों सें देख लिया हैं, अब वो शांत नहि बैठेगा। "
नव्या नें अपने गुलाबी होंठों कों फिन सें दाँतों तले दबाया औऱ अपनी गांड़ कों थोडा औऱ पीछे कि ओर मटकाया।
नव्या: "गर्मी तौ बिल मे बहोत हैं बाबूजी, पर्र उसबिल केँ मुहाने पऱ मर्यादा केँ पत्थर रखे हें। आपका वो नाग चाहे जितना भि विकराल होँ जाए, उन पत्थरों सें टकराकर अपनासिर हि फोड़ेगा। औऱ सुनिए, वो जौ आप् 'अमृत' कि बातें कररहे थें। उसे अपनी मुट्ठी मे हि कैद रखिये। उसे फर्श पर्र एक्सक्यूज़ शोभा नहि देता, वो तौ किसी 'पवित्र कलश' कि अमानत हैं। "
विक्रम सिंह कि आँखों मे अश्लीलता कां सैलाब उमड़पड़ा। उन्होंने अपनी कुर्सी कों थोड़ाआगे खिसकाया।
विक्रम सिंह:"कलश तौ तूँ हि हैं नव्या। पर्र तूनेउस पर्र 'छूनामना हैं' कि मुहरलगा रखी हैं। पर्र तुँ भूलरही हैं, नाग कों छूने कि ज़रूरत नहि होती, वो तौ अपनी ज़हरीली फुफकार औऱ नज़रों सें हि शिकार कों अधमरा कर देता हैं। औऱ जौ तूनेरात कों झिरी सें मेरा वो 'औजार' देखा हैं, वो अब तेरे सपनों मे भि बिल खोदने आएगा। बता नं। क्याँ उसे देखकर तेरीउस 'कंटीली बुर' मे खुजली नहि हुइ? क्याँ तुम्हें ये नहि लगा कि काशये पत्थर कि दीवार अभि गिरजाए औऱ वो नाग सीधे अपनी मंजिल पा लें?"
नव्या कां चेहरा तपउठा, पर्र वो हटी नहि। उसने एक् कदम औऱ आगे बढ़ाया, इतनी लगभग कि विक्रम सिंह कों उसके शरीर कि मांसल गंधआने लगी।
नव्या: "खुजली तोँ उसे भि होती हैं बाबूजी, जौ प्यासा होँ औऱ सामने समंदर दिखरहा हौ। पर्र मे वोँ दरिया हूं जौ मात्र सुमित केँ लिए बहता हैं। आप् बस किनारे बैठकर उसकी लहरें देखिये औऱ अपनेउस 'विकराल मूसल' कों हाथ सें सहलाकर मन बहला लीजिये। क्योंकि इसबिल कां दरवाजा तौ बंद हि रहेगा, चाहे आपकानाग कितना हि फन क्यूं न् पटक लेँ। "
इतना कहकर नव्या नें एक् जोरदार ठुमका लगाया, जिससे उसके तरबूज जैसे गांड़ केँ दोनों हिस्से साड़ी केँ नीचे एक्-दूसरे कों मसलगए, औऱ वो खिलखिलाती हुई अंदरचली गई। विक्रम सिंह वहीं बैठे अपनी धोती केँ भीतरउस पत्थर होँ चुकेअंग कों संभालते रहगए। उन्हें पता थां कि नव्या उन्हें तड़पारही हैं, पर्र उसतड़प मे जोँ मज़ा थां, वो दुनिया केँ किसी औऱ सुख मे नहि थां।
खिड़की कां उलटफेर औऱ नग्न गुणगान
जगह: नव्या कां शयनकक्ष / गलियारा
टाइम:रात केँ २:१५बजे
आजरात फिजाओं मे वासना कि नमीकुछ ज़्यादा हि भारी थि। नव्या केँ जिस्म मे रात केँ उस 'दर्शन' नें ऐसीआग सुलगा दि थि कि वो कमरे कि ठंडक मे भि पसीने सें नहारही थि। उसेलगा कि बाबूजी अपने कमरे मे अपनेउसी विकराल मूसल कि सेवा मे व्यस्त होंगे, जैसा उन्होंने कल किया थां। इसी बेफिक्री औऱ चरम उत्तेजना मे नव्या नें अपनी साड़ी, पेटीकोट औऱ चोली उतारकर फेंक दि।
वो अपने कमरे मे पूरीतरह नग्न होकर किसी मदहोश हिरणी कि तरहटहल रही थि। मद्धम दूधिया रोशनी मे उसके विशाल औऱ मुलायम बोबे औऱ उसकी भारी गांड़ केँ मांसल पट अपनी पूरी नग्नता केँ संगचमक रहे थें। वो अपनी जांघों केँ बीचहाथ फेरते हुए औऱ अपनी बुर केँ गीलेपन कों महसूस करतेहुए जोर-शोर सें बड़बड़ा रही थि।
नव्या: (सिसकते हुए औऱ जिस्म कों मरोड़ते हुए)"ओह। बाबूजी! क्याँ चीज़पाल रखी हैं आपने अपनी धोती केँ नीचे। वो खूंखार काला लंड। जब सें देखा हैं, मेरीइस बुर नें पानी छोड़ना बंद नहि किया। मेरा सुमित तोँ इसके सामने कुछ भि नहि हैं। हायरे! वो विकराल अंगअगर एक् बार मेरीइन फांकों कों चीरता हुआ अंदरघुस जाए, तोँ मे तोँ पागल हि होँ जाऊँगी। "
उसी टाइम, विक्रम सिंह बाथरूम जाने केँ लिए अपने कमरे सें बाहर् निकले। गलियारे सें गुजरते समय उनकी नज़र अचानक नव्या केँ कमरे कि उसी खिड़की कि झिरी पऱ पड़ी, जहाँ सें कल नव्या नें उन्हें देखा थां। उन्होंने ठिठककर एक् नज़र अंदर मारी औऱ उनकी आँखें फटी कि फटीरह गईं।
अंदर कां दृश्य किसी महा-विस्फोट सें कम नहि थां। उनकी 'सावित्री' बहू पूरीतरह निर्वस्त्र होकर अपना हि शरीरमसल रही थि औऱ उनके मूसल केँ कसीदे पढ़रही थि।
नव्या: (अपने बोबों कों दोनों हाथों सें भींचते हुए) "बाबूजी। कहां छुपाकर रखा थां आपनेये कामुक औजार?इसे देखकर तोँ पत्थर भि पिघलजाए। मेरामन कररहा हैं कि इसे अभि अपने मुँह मे भरलूँ औऱ इसका साराजहर पी जाऊँ। आप् कहरहे थें नं कि मे आपकी 'कामधेनु' हूं। तौ आइये न्, अपनेउस हथियार सें मेरीइस जवानी कां शिकार कीजिये। मेरीये गांड़। यह तरबूज। यहसभी आपकेउस विकराल लंड कि मार सहने केँ लिए प्यास रहे हें। "
खिड़की केँ बाहर् खड़े विक्रम सिंह कां बुराहाल थां। उनकी धोती केँ भीतर उनका मूसलफिन सें पत्थर कि तरह सख्त होँ गय़ा औऱ नसेंउभर आईं। अपनीबहू केँ मुँह सें अपने'अंग' कि ऐसी अश्लील तारीफ सुनकर उनका पोर-पोर कांपने लगा।
विक्रम सिंह (बाहर् सें बुदबुदाते हुए):"ओह। मेरी कंटीली नागिन! तौ तुझेही मेरा वो मूसल इतना मनपसंद आया हैं? तुँ अंदर नंगी होकर मेरानाम जपरही हैं औऱ मे बाहर् अपनी प्यास सें लड़रहा हूं। देख लेँ। देख लेँ अपनीइस बेबसी कों, क्योंकि अबयह आँखें तेरी मात्र देखकर नहि मानेंगी। "
नव्या अपनी हि धुन मे अपनी बुर पऱ उंगलियां चलारही थि, वो ससुरजी केँ शब्दों कों याद कर-कर केँ औऱ भि उत्तेजित हौ रही थि। वो बार-बार अपनीपीठ फेरकर अपनी भारी गांड़ आईने मे देखरही थि औऱ कल्पना कररही थि कि उस पऱ ससुरजी केँ थप्पड़ औऱ उनके लंड कि मारपड़ रही हैं।
विक्रम सिंह वहींबुत बनकर अपनीबहू केँ उस नग्न तांडव कों देखरहे थें। आज पासापलट चुका थां। कल उसने देखा थां, आज वो देखरहे थें। औऱ इस 'देखने' नें कोठी कि मर्यादा कि आखिरी ईंट कों भि हिलाकर रख दिया थां।
विक्रम सिंह खिड़की कि झिरी सें चिपके हुए थें, उनकी सांसें धौंकनी कि तरहचल रहीथीं। अंदर नव्या नग्नता केँ उस मुकाम पऱ थि जहाँ सुध-बुध पूरीतरह खो चुकी थि। वो अपने शरीर कों मसलते हुएअब अपनी मम्मी मालती कों याद करनेलगी थि। उसकी आवाज़ मे एक् अजीब सां नशा औऱ अश्लीलता कां उबाल थां।
नव्या (अंदर नग्नता मे झूमते हुए):"अहह। मां! तूँ सही कहती थि कि इस खानदान कि औरतों केँ खून मे हि प्यास हैं। मौसी नें मुझेसभी बताया थां मम्मी। कि तेरी विवाह कि उन फेरों वाली रातों मे, जब पूराघऱ सोया थां, तुँ एक् जवान औऱ कतई खूंखार लंड केँ नीचेदबी घंटों अपनी बुर कि प्यास बुझारही थि। तूने मर्यादा कि चुनरी उतारकर उस मर्दानगी कां जहर पिया थां, औऱ आजदेख। तेरी बेटी भि उसीराह पऱ हैं!"
बाहर् खड़े विक्रम सिंहये सुनकर सन्नरह गए। मालती कां वो पुरानां किस्सा उनके कानों मे पिघले हुए सीसे कि तरह उतरा। वो हैरान थें कि नव्या कों अपनी मम्मी केँ उस गुप्त 'रति-काण्ड' कां पता हैं औऱ वो उसे बड़े गर्व सें यादकर रही हैं।
नव्या: (अपनी भारी गांड़ कों दीवार सें सटाकर रगड़ते हुए) "मां, तूने तौ किसी गै़र केँ लंड सें अपनीआग बुझाई थि, पऱ तेरी बेटी तोँ अपने हि ससुरजी केँ उस विकराल मूसल कि दीवानी होँ गई हैं। मम्मी, अगर तूँ आज देखती कि बाबूजी केँ पास क्याँ औजार हैं, तोँ तुँ भि अपनी कब्र सें निकलआती। वो काला औऱ मोटानाग। जब वो हिलता हैं, तोँ मेराजी करता हैं कि मे अपनी मम्मी कि तरह हि बेशर्म होकरउसे अपने भीतर उतारलूँ। "
विक्रम सिंह कां कलेजा मुँह कों आँ गय़ा। नव्या केँ मुँह सें 'मम्मी' औऱ 'चुदाई' जैसे शब्द सुनकर उनकी कामुकता हिंसक होनेलगी। उनकी धोतीअब उस पत्थर हुए लंड कां बोझ नहि सहपारही थि। उन्हें समझ आँ गय़ा कि नव्या केँ भीतर मात्र जवानी नहि, बल्कि एक् खानदानी 'आग' विरासत मे मिली हैं।
नव्या: "मम्मी, तूने फेरों कि रात जोँ सुख पाया थां, मे उसे रोज़ अपनी आँखों सें देखरही हूं। बाबूजी कां वो लाल सुपाड़ा। अहह!जब वो मुट्ठी मे उसे दबाते हें, तौ मुझे अपनी बुर मे तेरीवही वाली बेचैनी महसूस होती हैं। मे भि तेरी हि तरह कुलटा बनूँगी मां। इस कोठी कि इज्जत कों बाबूजी केँ उस मूसल केँ नीचे कुचलवा दूँगी!"
विक्रम सिंहअब औऱ बर्दाश्त नहि करपारहे थें। उनकीबहू, जिसे वो केवल एक् 'कंटीली स्त्री' समझरहे थें, वो तौ वासना कि एक् पूरी 'परम्परा' ढोरही थि। मालती कां वो पुरानां ज़िक्र औऱ नव्या कि ये नग्नता—दोनों नें मिलकर विक्रम सिंह केँ संयम कि चिताजला दि थि। वो खिड़की सें चिपके, अपनी धोती केँ भीतरउस विकराल अंग कों सहलाते हुएबस यहीसोच रहे थें कि इस 'मालती कि बेटी' कों अब वोँ मजा चखाना हैं जोँ उसे उसकी मां नें भि नहि चखाया होगा।
नग्न विरासत औऱ दोहरा चरमोत्कर्ष
जगह: नव्या कां शयनकक्ष औऱ बाहरी गलियारा
वक़्त: रात केँ ३:००बजे
अंदर औऱ बाहर्, वासना कां वो घमासान छिड़ा थां जिसकी गूँज कोठी कि दीवारों कों कपारही थि।
नव्या अपनी मम्मी मालती कि उस 'फेरों वालीरात' कि चुदाई कों अपनीबंद आँखों केँ पीछेफिन सें जीरही थि। वो अपनी नग्न जांघों कों फर्श पर्र पटकरही थि औऱ उसके विशाल बोबे उसकीतेज सांसों केँ संग पागलपन कि हद तक उछलरहे थें।
नव्या (अंदर सिसकते हुए):"अहह मां! तूनेउस रात जोँ चीखें दबाईथीं, वोँ आज मेरेगले सें निकलना चाहती हें। तूनेउस जवान लंड कों अपनी बुर कि गहराइयों मे उतारकर जौ स्वर्ग पाया थां। देख मां, आज तेरी बेटी भि वैसे हि सिसकरही हैं। बाबूजी कां वो मूसलदेख कर मेरा रोम-रोम तुम्हें पुकार रहा हैं। यह खानदानी प्यास हैं मां। जोँ आज बाबूजी केँ इस विकराल अंग कों देखकर फटपड़ी हैं! फाड़ दीजिये बाबूजी। जैसेउस मर्द नें मेरी मम्मी कों फाड़ा थां, वैसे हि मुझे भि तहस-नहस कर दीजिये!"
खिड़की केँ बाहर् विक्रम सिंह कां हाल बेहाल थां। मालती केँ उस पुराने किस्से औऱ नव्या कि इन अश्लील बातों नें उनके मूसल कों लोहे कि छड़ सें भि ज़्यादा सख्तकर दिया थां। उनकेहाथ कि रफ़्तार अब किसी मशीन जैसी थि। वो झिरी सें नव्या केँ उस पूरीतरह नग्न औऱ पसीने सें भीगे शरीर कों देखरहे थें, जौ फर्श पर्र लोटरहा थां।
विक्रम सिंह (बाहर् गुर्राते हुए): "मालती कि बच्ची। तूने अपनी मां कां राज खोलकर अपनीमौत बुलाली हैं। अब तेरायह तरबूज जैसा जिस्म औऱ यहभरी हुईँ गांड़ मेरीइस मर्दानगी कि मार सें बच नहि पाएगी। तुँ प्यासी हैं नं? लेँ। देख अपनी मां केँ उस 'पुराने पापकर्म' कां जवाब। मेरायह विकराल लंड तेरी वोँ मज़ा देगा जोँ तेरी मां भि भूल जाएगी!"
अंदर नव्या कां हाथअब उसकी बुर कि गहराई मे पागलों कि तरहचल रहा थां। उसे खिड़की केँ बाहर् ससुरजी केँ हाथ कि रफ़्तार कां अंदाज़ा थां। वो अपनी मम्मी कि उसरात कि कल्पना औऱ ससुरजी केँ इस कालेनाग केँ बीचपिस रही थि।
नव्या: "अहह। मम्मी। मे जारही हूं। बाबूजी कां वोँ लाल सुपाड़ा मेरी आँखों मे धंस गय़ा हैं। लेँ लीजिये मुझे.अहह! मम्मी। मे झड़रही हूं!"
ठीकउसी लम्हा, नव्या केँ बदन मे एक् ज़ोरदार ऐंठनआई। उसकी बुर नें गर्म काम-रस कां फव्वारा छोड़ दिया औऱ वो फर्श पऱ मछली कि तरहतड़प कर निढाल होँ गई। उसकी आँखों केँ सामने अपनी मां कि चुदाई औऱ ससुरजी कां नंगा लंड एक् संग विलीन होँ गए।
बाहर् विक्रम सिंह कां भि बांधटूट चुका थां। नव्या केँ मुँह सें 'मां कि चुदाई' केँ किस्से सुनते हि उनका सफ़ेद औऱ गाढ़ा लावा झटके केँ संग उनकी मुट्ठी सें निकलकर गलियारे कि दीवार औऱ फर्श पर्र बिखर गय़ा। वो हांफते हुए दीवार सें टिकगए, उनका विकराल मूसल अभि भि थरथरा रहा थां।
दो अलग-अलग दुनिया, एक् हि प्यास, औऱ दो चरम—पर्र 'छूना' अभि भि वर्जित थां।
दोनों ससुरजी बहु एक् संग झड़े हें कितना हसीन इत्तेफाक हैं देवियों, क्याँ कोईबहु इतनी कामुक होती हैं कमेंट मे बताएकोई स्त्री,,,,
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