विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
विरासत कां जाल औऱ 'अधूरा हिसाब'
जगह: कोठी कां बरामदा
वक्त: सुभह९:०० बजे
रात केँ उस 'महा-संगम' केँ बाद कोठी कि हवा मे अब एक् अजीब सि भारीपन थि। नव्या आज किचन सें बाहर् निकली तोँ उसकी निगाहें झुकी हुई थीं। कल रात उसने ससुरजी केँ विकराल मूसल कि जौ अश्लील वंदना अपनी मम्मी कां नाम लेकर कि थि, वो बातअब उसे अंदर हि अंदरकाट रही थि।
विक्रम सिंह अपनी कुर्सी पऱ लाल कपड़ा बिछाए ऐसे बैठे थें जैसे किसी ऊंचे सिंहासन पऱ कोई सम्राट बैठा होँ। उनके चेहरे पऱ एक् ऐसी कुटिल मुस्कान थि जोँ येबता रही थि कि उनकेहाथ मे अब नव्या कि 'गर्दन' आँ गई हैं।
जैसे हि नव्या नें गरमचाय कां कपमेज पर्र रखा, विक्रम सिंह नें अखबार हटाकर सीधे उसकी आँखों मे देखा। आज उनकी नज़रों मे 'प्यास' केँ संग-संग एक् 'अधिकार' भि थां।
विक्रम सिंह: (गहरी औऱ मखमली आवाज़ मे) "आज हल्दी कां तिलक बहोत गहरा लगाया हैं नव्या। पऱ लगता हैं रात कि 'बेचैनी' अभि भि आँखों केँ घेरों मे बाकी हैं। रातभर तुम् अपनी मम्मी मालती कों यादकर रहीथीं। बहोत याद आँ रही हैं क्याँ उनकी?"
नव्या केँ हाथ सें लोटा छूटते-छूटते बचा। उसका चेहरा सफ़ेदपड़ गय़ा। उसे अहसास होँ गय़ा कि उसकी 'नग्नता' औऱ उसके'राज' कि झिरीअब ससुरजी केँ कब्ज़े मे हैं।
नव्या: (हकलाते हुए) "बाबूजी। वोँ। मां। हाँ, बहोत दिन होँ गए मिले। "
विक्रम सिंह: (कुर्सी पऱ पीछे झुकते हुए, एक् रहस्यमयी हंसी केँ संग) "तौ फिन बुलालो उसे। बहोत दिनहुए, मुझे भि मालती सें कुछ 'पुराने हिसाब' बराबर करने हें। उसे बुलालो, तुम् दोनों मम्मी-बेटी जबइस कोठी मे संग होगी, तब असली रौनक आएगी। आखिर जौ विरासत उसने तुम्हें दि हैं, उसे फलते-फूलते देख्ना उसका भि तौ हक हैं। "
नव्या केँ कानखड़े हौ गए। उसे लगा कि ससुरजी केँ शब्दों मे 'हिसाब' शब्द किसी पैसे केँ लेनदेन कां नहि, बल्कि उसी 'चुदाई' कि प्यास कां हैं जिसका ज़िक्र उसनेरात कों किया थां। वो अंदर हि अंदर कांप गई। उसे नहि पता थां कि उसकी मम्मी औऱ ससुरजी केँ बीच क्याँ 'प्राचीन खेल' बाकी हैं जिसे विक्रम सिंह नें अभि तक राजबना कररखा हैं।
विक्रम सिंह: "हैरान क्यूं हौ? मैंने कहा नं। मम्मी कों बुलालो। उसे कहना कि सुमित नहि हैं तोँ क्याँ हुआ, उसका 'समधी' अभि भि जवान हैं औऱ कोठी कां मेहमान नवाजी कां तरीका अभि बदला नहि हैं। वो आएगी, तौ तुम् दोनों संग मिलकर इस'नाग' कि सेवा करना जिसे तुम् कलरात बहोत यादकर रहीथीं। "
नव्या नें अपने गुलाबी होंठों कों दांतों तले दबाया। उसेसमझ आँ गय़ा कि ससुरजी अबउसे औऱ उसकी मम्मी कों एक् हि तराजू मे तौलने वाले हें।
नव्या: (दबी आवाज़ मे, पऱ शोखी केँ संग) "बाबूजी। मम्मी आएगी तोँ कोठी मे आगलग जाएगी। आपकोपता हैं न्, वो भि मेरीतरह हि 'कंटीली' हैं। क्याँ आपका वो विकराल मूसल हम् दोनों कि आगसह पाएगा?"
विक्रम सिंह: "सहना हि तौ मर्दानगी हैं नव्या। उसे बुलाओ। औऱ देखो कि ये 'प्राचीन हिसाब' केसे चुकता होता हैं। बसयाद रखना, शर्तवही रहेगी—कोठी कि दीवारें औऱ मेराये मूसल, किसी कि गवाही नहि देंगे। "
नव्या मुड़ी औऱ अपनी भारी गांड़ कों एक् विजयी ठुमके केँ संग मटकाते हुए अंदरचली गई। उसेडर भि थां औऱ एक् अजीब सि उत्तेजना भि, कि जब मां आएगी, तोँ इस कोठी मे 'नग्नता' कां कौन सां नया अध्याय लिखा जाएगा।
: साये कां डर औऱ उभरती हवस
जगह: कोठी कां बरामदा / किचन कि दहलीज
टाइम: सुभह९:३० बजे
विक्रम सिंह कि उस 'हिसाब' वालीबात नें नव्या केँ मन मे खलबली मचा दि थि। वो किचन मे खड़ी थि, पर्र उसकेहाथ काम नहि कररहे थें। उसे बार-बार ससुरजी कि वो कुटिल मुस्कान औऱ उनके शब्दों कि भारीपन याद आँ रही थि— "उसे बुलालो, मुझे भि मालती सें कुछ पुराने हिसाब बराबर करने हें। "
नव्या नें अपनेमन मे सोचा, "क्याँ मां औऱ बाबूजी केँ बीच पहले सें कुछऐसा थां जिसके बारे मे मुझे नहि पता? क्याँ मां कि उस 'फेरों वालीरात' कां राज बाबूजी कि नज़रों केँ सामने हि घटा थां?"
इधर बरामदे मे बैठे विक्रम सिंह अपनी अगलीचाल सोचरहे थें। उन्होंने देखा कि नव्या किचन केँ दरवाज़ा पर्र खड़ी अपनी साड़ी कां पल्लू उंगलियों मे लपेटरही हैं। उसकी भारी गांड़ कां उभार साड़ी कों तानरहा थां, जोँ विक्रम कि आँखों कों फिन सें न्यौता देरहा थां।
विक्रम सिंह: (ऊँची आवाज़ मे) "क्याँ हुआ नव्या? मम्मी केँ आने केँ डर सें हाथ-पैर फूलगए क्याँ? याँ फिनउस 'पुराने हिसाब' कि कल्पना सिर्फ सें हि तुम्हारी बुर मे फिन सें वहीरात वाली'नमी' भर गई हैं?"
नव्या धीरे-धीरे सें बाहर् आई, उसकी आँखों मे अब एक् तीखापन थां।
नव्या: "बाबूजी, मम्मी आएगी तोँ अपना हिसाब स्वयं कर लेगी। पऱ अभि जौ हिसाब मेरे औऱ आपकेबीच हैं, उसका क्याँ? आप् नज़रों सें तोँ मुझेरोज़ नंगा करते हें, पर्र आपकीयह प्यास तोँ दिन-ब-दिन बढ़ती हि जारही हैं। कहींऐसा नं होँ कि मम्मी केँ आने तक आप् इस'नाग' कों काबू मे हि न् रख सकें। "
विक्रम सिंह: (हंसते हुए) "काबू तौ तुम् हि कर सकती होँ नव्या। बिनाछुए। आजसाम जब तुम् आँगन मे दीपक जलाओगी, तोँ याद रखना कि तुम्हारी साड़ी कां पल्लू कंधे सें ढलकाहुआ हौ। मे देख्ना चाहता हूं कि तुम्हारी मम्मी नें तुम्हें सजाने केँ लिएकौन सें 'गहने'दिए हें। "
नव्या नें अपनी गर्दन कों एक् ओर झुकाया औऱ अपने गुलाबी होंठों कों सिकोड़ते हुएकहा, "शर्तयाद हैं नं बाबूजी? देख्ना मना नहि हैं, पर्र छुएंगे आप् तब भि नहि। चाहे मे आपके सामने पूरी नग्न हि क्यूं न् खड़ी होँ जाऊं। "
विक्रम सिंह कां विकराल मूसलफिन सें उनकी धोती केँ भीतर अंगड़ाई लेनेलगा। उन्होंने मन हि मनतयकर लिया थां कि मालती केँ आने सें पहले वो नव्या कों उस मुकाम पर्र लें आएंगे जहाँ वो स्वयं स्पर्श कि भीख मांगेगी।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
रहस्य कि परछाईं
जगह: कोठी कां बरामदा
वक़्त: सुभह १०:००बजे
नव्या केँ चेहरे पऱ उभरीउस बेचैनी औऱ जिज्ञासा कों देखकर विक्रम सिंहसमझ गए कि उन्होंने एक् बड़ा पत्ता चल दिया हैं। नव्या कि आँखें बार-बार उस 'हिसाब' कि गहराई कों टटोलने कि कोशिश कररही थीं, मगर विक्रम सिंह अभि उसराज कि पोटली खोलने केँ मूड मे नहि थें।
जैसे हि नव्या नें एक् कदम औऱ आगे बढ़ाकर पूछना चाहा, विक्रम सिंह नें अपनी आवाज़ कां लहजा अचानक बदल दिया औऱ एक् ठंडी हंसी हंसे।
विक्रम सिंह:"अरे! तुँ तोँ गंभीर होँ गई नव्या। हिसाब-विसाब कुछ नहि हैं, मे तोँ बस तुम्हे छेड़रहा थां। मालती सें भला मेरा क्याँ हिसाब होगा? वो तौ तेरी मां हैं औऱ मेरी समधिन। मे तोँ बस मज़ाककर रहा थां कि बहोत दिनहुए उसे देखे, तोँ घऱ मे रौनक आँ जाएगी। "
नव्या कों लगा जैसे किसी नें ऊँचाई सें उसे नीचेपटक दिया हौ। उसकी आँखों मे चमकता वो कौतूहल अचानक संशय मे बदल गय़ा।
नव्या: (संदेह भरी नज़रों सें देखते हुए) "मज़ाक? पर्र बाबूजी आपकी आवाज़ मे तौ उस टाइमकुछ औऱ हि लगरहा थां। ऐसालग रहा थां जैसेकोई बरसों पुरानी आगआज भि धधकरही हैं। "
विक्रम सिंह: (नव्या केँ उभरेहुए बोबों पऱ अपनी नज़रें टिकाते हुए)"आग तोँ आज भि धधकरही हैं नव्या। पऱ वो पुरानी नहि, बल्कि बिलकुल नई हैं। वो आग जौ कलरात उस खिड़की कि झिरी सें फूटरही थि। मालती कां आनां तौ बस एक् एक्सक्यूज़ हैं, असली मकसद तौ उस 'विरासत' कों अपनी आँखों केँ सामने जलते देख्ना हैं जोँ उसने तुझेही दि हैं। "
नव्या खड़ीरही, पर्र उसकामन ये मानने कों सजधजकर नहि थां कि वो केवल मज़ाक थां। उसेलगा कि ससुरजी कुछ बहोत गहरा छुपारहे हें। वो समझ गई कि ये 'हिसाब' कोई गुप्त पहेली हैं जौ विक्रम सिंह केवल मालती केँ सामने हि सुलझाएंगे।
नव्या: "ठीक हैं बाबूजी, अगर मज़ाक हैं तोँ मज़ाक हि सही। मे आज हि मां कों चिट्ठी लिखती हूं याँ मेसेज भेजती हूं। पऱ याद रखियेगा, मां आँ गई तौ कोठी केँ कायदे बदल जाएंगे। वो मेरीतरह चुप रहकर आपकी नज़रों कां 'अत्याचार' नहि सहेगी। "
विक्रम सिंह: (अपनी धोती केँ भीतर सख्त होते विकराल लंड कों महसूस करतेहुए) "कायदे बदलने केँ लिए हि तोँ उसे बुलारहा हूं। तुँ बसउसे आने कों कह.फिन देख्ना कि ये ससुरजी अपनीबहू औऱ समधिन केँ बीचकिस तरह कां 'न्याय' करता हैं। जा। जाकर किचन संभाल, औऱ याद रखना कि साम कों जब तुँ दीया जलाएगी, तौ हवा कां एक् झोंका तेरी साड़ी केँ पल्लू कों बेपर्दा करने केँ लिए बेताब रहेगा। "
नव्या पीछे मुड़ी, पऱ उसकेमन मे अब मालती कां वो 'फेरों वालीरात' कां राज औऱ ससुरजी कां ये 'गुप्त हिसाब' गड्डमड्ड हौ रहे थें। वो समझ गई थि कि मालती कां आनांइस कोठी मे वासना कां एक् नया तांडव शुरुआत करेगा, जिसके तार किसी पुराने राज सें जुड़े हें।
विक्रम सिंह नें देखा कि नव्या केँ चेहरे पर्र अविश्वास कि लकीरें अभि भि गहरी हें। उसेसमझ आँ गय़ा कि 'हिसाब' शब्द नें बहू केँ दिमाग़ मे संदेह कां बीजबो दिया हैं। खेल कों सुरक्षित रखने केँ लिएउसे नव्या कों पूरीतरह आश्वस्त करना होगा कि वो केवल शब्दों कां खेल थां।
उसने अखबार वापसमेज पऱ रखा औऱ चेहरे पऱ एक् बहोत हि सरल, पिता समान (पऱ भीतर सें कामुक) मुस्कान ओढ़ली।
विक्रम सिंह: "नव्या, इधर आँ। बैठयहा। "
नव्या झिझकती हुईँ पासपड़ी मूढ़ी पऱ बैठ गई। विक्रम सिंह नें अपनी नज़रों कों उसके सीने सें हटाकर सीधे उसके चेहरे पर्र टिकाया, जैसेकोई बहोत बड़ी सफाईदे रहेहों।
विक्रम सिंह: "तूँ तौ नाहक हि परेशान हौ गई। अरे पगली, हिसाब कि बात मैंने इसलिये कही क्योंकि तेरी मम्मी मालती औऱ मैंने मिलकर सुमित कि विवाह मे कुछ लेन-देन केँ वादेकिए थें। कुछ जेवर, कुछ बर्ताव। वही बातें मन मे आँ गई थीं। पर्र अब मुझे लगता हैं कि इस उम्र मे उन पुरानी बातों कों 'हिसाब' कहनागलत थां। मे तौ बस तुम को छेड़ने केँ लिएकह गय़ा कि मालती आएगी तौ उसेयाद दिलाऊँगा कि वो अपना वादाभूल गई हैं। "
नव्या नें अपनी आँखों कों सिकोड़ा, वो अभि भि पूरीतरह आश्वस्त नहि थि। "मात्र जेवर-कपड़ों कि बात थि बाबूजी?"
विक्रम सिंह: (हल्के सें हंसते हुए) "औऱ क्याँ होगा नव्या? तूँ तौ ऐसेदेख रही हैं जैसे हम् दोनों केँ बीचकोई गहराराज़ दबा होँ। अरे, समधी-समधिन केँ बीच हंसी-ठिठोली कां नाता होता हैं। मे तौ बसयहचाह रहा थां कि तूँ अपनी मम्मी कों याद करके जौ रातभर तड़पती हैं, उसका आनां होँ जाए तोँ तेरामन लगजाए। देख, सुमित हैं नहि। औऱ तूँ इतनी जवान, भरी-पूरी महिला। अकेले इस कोठी मे तेराजी घबराता होगा। "
विक्रम सिंह नें बड़ी चतुराई सें बात कां रुखमोड़ दिया।
विक्रम सिंह:"भूल जाउसबात कों। कोई हिसाब-विसाब नहि हैं। बस एक् बाप कां अपनीबहू सें मजाकसमझ लेँ। तुँ तौ मेरी अपनी बेटी जैसी हैं, बस फर्क इतना हैं कि तेरीयह 'कंटीली' जवानी मुझे बाप बनने नहि देती। अब जा। किचन मे देख क्याँ पकरहा हैं, औऱ अपनी मां कों आने कां न्यौता भेजदे। मेरा यकीनमान, सभीठीक रहेगा। "
नव्या कों लगा कि शायद वो हि ज़्यादा सोचरही थि। ससुरजी कि बातों मे वो 'हिसाब' अबउसे सांसारिक लेनदेन जैसा लगनेलगा। उसने एक् राहतभरी सांसली, जिससे उसके बोबे साड़ी केँ भीतर एक् बारफिन उभरे औऱ विक्रम कि धड़कनें बढ़ादीं।
नव्या: "ठीक हैं बाबूजी, अगर मज़ाक थां तौ मे इसे मज़ाक हि समझूंगी। मे आज हि मम्मी कों खबर भिजवाती हूं। "
वो उठी औऱ अंदर कि ओरचल दि। विक्रम सिंह नें उसे जातेहुए देखा औऱ मन हि मन बुदबुदाए, "कन्विंस तौ तूँ हौ गई नव्या। पऱ मालती जब आएगी, तब उसेपता चलेगा कि ये 'हिसाब' जेवर कां नहि, बल्कि उस 'शरीर' कां हैं जोँ उसने बरसों पहले अधूरा छोड़ा थां। "
Thnks, अगरसच लगरही हौ तोँ एक् बार ज़रूर बताइए ताकि मुझे औऱ ठीक सें लिखने कि प्रेरणा मिले
ap bhut acche say likh rahe hu Jitna realistic rakhoge story utnahii achchi Banegi or donon sasur bahu k bich Jitna no joke Hoga utna hi or Achcha lagega
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story – New Episode
आधीरात कां कन्फेशन औऱ मां कां पाप
जगह: नव्या कां शयनकक्ष
वक़्त: रात केँ १२:१५बजे
कोठी मे सन्नाटा पसरा थां, मगर नव्या केँ भीतर तूफानों कां हंगामा थां। ससुरजी केँ संग हुईँ साम कि उस 'दीपक वाली' छेड़छाड़ नें उसके जिस्म मे एक् ऐसीआग लगा दि थि कि वो चाहकर भि सो नहि पारही थि। उसने अपना मोबाइल उठाया औऱ अपनी मां, मालती कों मोबाइल लगाया। उसेपता थां कि मालती इस वक़्त जागरही होगी।
दूसरी तरफ सें मोबाइल उठा, औऱ नव्या नें बिना किसी भूमिका केँ सीधे अपनी मम्मी केँ उसघाव पर्र हाथरखा जिसे उसने बरसों सें छुपारखा थां।
नव्या: (धीमी पऱ जहरीली आवाज़ मे) "मां। सोरही हौ? याँ आज भि वैसी हि जागरही होँ जैसे मेरी विवाह कि रात जागी थि?"
मालती कि आवाज़ मे एक् कपकपी थि। "नव्या। यह क्याँ कहरही हैं बेटी? इतनीरात कों."
नव्या: (एक् अश्लील हंसी केँ संग)"सच कहरही हूं मम्मी। मौसी नें मुझेसभी बता दिया हैं। जिससमय मे बाहर् अग्नि केँ फेरे लेँ रही थि औऱ सात जन्मों केँ वादेकर रही थि, तुम् अंदर किसी केँ खूंखार लंड केँ नीचेदबी अपनी बुर कि आग बुझारही थि। मम्मी, तेरी लज्जा नहि आई? तेरी बेटी कि नई ज़िंदगी शुरुआत होँ रही थि औऱ तूँ अपनी पुरानी हवस कों परवान चढ़ारही थि!"
मालती चुप थि, उसकी सिसकियाँ मोबाइल पर्र साफ सुनाई देरही थीं।
नव्या: "चुप क्यूं हौ मां? ताना नहि माररही, बस तुम्हे तेरी हकीकत बतारही हूं। तूने जोँ बीजउस रात बोया थां, उसकीफसल आज मे काटरही हूं। यहा कोठी मे ससुरजी जी केँ पास एक् ऐसा विकराल मूसल हैं जिसे देखकर तेरा वोँ 'फेरों वालीरात' कां मर्द भि पानी भरता। मां, तूने तोँ किसीगैर सें अपनी प्यास बुझाई थि, पर्र तेरी बेटी कि भाग्य देख। वो तोँ अपने हि ससुरजी केँ उस कालेनाग कि दीवानी होँ गई हैं। "
मालती नें कांपते हुएकहा, "नव्या। रुकजा। यह तुँ क्याँ कहरही हैं? वो तेरे ससुरजी हें। "
नव्या: "ससुरजी बाद मे हें मम्मी, पहले वोँ एक् ऐसे मर्द हें जिसकी नसों मे लोहाभरा हैं। जब वो अपनी मुट्ठी मे उसे दबाते हें औऱ अश्लील बातें करते हें, तोँ मुझे तेरीयाद आती हैं। मुझे लगता हैं कि मे भि तेरी हि तरह कुलटा बनूँगी। मां, तूने अपनी मर्यादा उसरात बेची थि, मे अपनीहर रात इनके कदमों मे बेचने कों सजधजकर हूं। तुँ यहा आँ रही हैं न्? आनां मां। हम् दोनों मां-बेटी मिलकर उनकेउस मूसल कि पूजा करेंगे। "
नव्या नें मोबाइल पटक दिया। वो हांफरही थि। ताना देकरउसे एक् अजीब सां चैन मिला थां। उसेलग रहा थां कि उसने अपनी मम्मी केँ चरित्र कों नंगा करके अपनी स्वयं कि वासना कों जायज ठहरा दिया हैं।
नव्या अभि मोबाइल रखकरबैड पऱ लेटी हि थि कि फोनफिन सें थरथरा उठा। स्क्रीन पऱ 'मां' कां नामचमक रहा थां। नव्या कों अपनी कड़वाहट पऱ थोड़ा पछतावा हुआ, उसने गहरी सांसली औऱ स्वयं कों संयमित किया। अब उसकी आवाज़ मे वो ज़हर नहि, बल्कि एक् अजीब सि रेशमी औऱ कामुक कोमलता थि।
नव्या: (धीमी औऱ संभली हुईँ आवाज़ मे) "हाँ मम्मी। सॉरी, मे थोड़ाबहक गई थि। पर्र जोँ सच हैं, सो हैं। "
मोबाइल केँ उसपार मालती कि सांसें अभि भि तेजथीं। वो कुछ कहनाचाह रही थि पर्र शब्द नहि मिलरहे थें।
नव्या: "सुनो मम्मी। मे तुम्हें डरा नहि रही हूं। बस इतनाकह रही हूं कि यहा जौ हैं, वोँ बहोत हि 'खतरनाक' औऱ जादुई हैं। ससुरजी जी कां वो विकराल मूसल। मां, वो किसी कों भि अपनी मर्यादा भूलने पर्र मजबूर करदे। पर्र तुम् फिक्र मतकरो, अगर तुम्हारी मंजूरी होगीतभी कुछआगे बढ़ेगा, वरना मेरीतरफ सें तुम् पऱ कोईज़ोर नहि हैं। मे तुम्हारी बेटी हूं, तुम्हारी इज्जत कां ख्याल रखूँगी। "
मालती कि आवाज़इस बार थोड़ी स्थिर थि, "नव्या। तुँ पागल हौ गई हैं। "
नव्या: "पागल नहि मां, प्यासी हूं। औऱ मुझे लगता हैं कि तुम्हारी आँखों मे भि वही पुरानी प्यास दबी हैं। तुम् बसयहा आँ जाओ, मेरामन बिल्कुल नहि लगरहा हैं। सुमित केँ बिनाये कोठी काटती हैं, औऱ बाबूजी कि यह मखमली बातें। मां, मुझे तुम्हारी ज़रूरत हैं। तुम् आओगी तोँ मुझे लगेगा कि मेरी अपनीकोई संग हैं। "
नव्या नें बड़े प्रेम सें मालती कों राजीकर लिया। उसने मोबाइल काटा औऱ एक् गहरी, तृप्त मुस्कान केँ संग तकिये पऱ सिररख दिया। उसे नहि पता थां कि विक्रम सिंह अपने कमरे मे सोरहे हें याँ जागरहे हें, पऱ उसेइस बात कां चैन थां कि अबयेखेल 'मां-बेटी' केँ बीच साझा होने वाला हैं।
उधर अपने कमरे मे विक्रम सिंह अपनी हि धुन मे थें। उन्हें इस मोबाइल फोन कि भनक तक नहि थि। वो तोँ बस सुभह कां इंतज़ार कररहे थें कि कब वो उस 'कंटीली' नव्या कों अपनी नज़रों सें फिन सें नंगा करेंगे।
विक्रम कि जागीर बहु नव्या | incest indian sex story - Kahani ab aur interesting hogi
कोईबहु यह बताए कि ये स्टोरी वास्तविकता केँ बहोत लगभग हैं याँ नहि, बहु ससुरजी कां नाता औऱ मम्मी बेटी केँ नाताऐसा होता हैं सच मे याँ नहि
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