Sagar (Full Storyd) – New Episode
समय तौ मिला तोँ नाइटी गुम होने केँ बाद केँ आज सारेभाग पढ़े, रितु कां दिमाग़ तौ बहोत तेज निकला, यह मेरी पसंदीदा कहानियों मे सें एक् हैं जौ मे पढ़रहा हूं, इंसेस्ट, एडल्ट्री, एक्शन, थ्रिलर, सस्पेंस सभीकुछ हें।
bhay pahle too yeh batao kee . kya yeh wakai main update h ya uski jhalak . agar yeh update thaa too . hum readers kee bhaavnao k saath aesa khilwaad na karo . or agar sirf jhalak thi too . aage kaa intezaar rahega .
Sagar (Full Storyd) – New Episode
प्रस्तुत स्टोरी केँ प्रति औऱ पूरे कथानक केँ प्रति अपने कद्रदान पाठकों कि अमूल्य, निष्पक्ष, बेवाक राय कि इंतजार करूंगा। आप् कि राय कैसी भि हौ, उससे निसंकोच मुझे अवगत करायेगा।
bhut bhut shukriya Amita ji. mein koy writer nahee ho.haa padhne kaa khub shauk h. lockdown k chalte waqt pass k liye yeh betuka kam karne baith gyaa. ap kaa support mere liye prerna dayak h. Many many thanks for your wishes ?
Sagar (Full Storyd) – New Episode
Update 19। Continue.
" वोँ शुरुआत सें हि ऐसे थें। अधिक किसी सें मतलब नहि। अपने मे हि खोया रहना " - चाची अपने विवाह केँ टाइम कों याद करतेहुए बोलि -" कालेज मे खेलकूद मे बहोत माहिर थें औऱ खेलकूद केँ चलते हि जॉब भि मिली थि। उन्होंने कई प्रतियोगिताएं भि जीती थि। मेरे माँ बाप नें सरकारी जॉब वाला लड़का देखा औऱ फिन हमारी विवाह होँ गई। हमारे जमाने मे लड़का लड़की देखने कां रिवाज नहि थां। माँ बाप अपने लड़के औऱ लड़कियों कि विवाह फिक्स करते थें औऱ विवाह हौ जाती थि। "
" औऱ यदि किसी कों लड़का याँ किसी कों लड़की पसन्द नाँ आए तोँ ?"
" तोँ भि कुछ नहि होँ सकता थां। एक् बार विवाह हौ गई तौ होँ गई। भले हि लड़का याँ लड़की एक् दुसरे कों मनपसंद आए याँ नां आए, वे जिन्दगी भर केँ लिए विवाह केँ डोर सें बंध जाते थें। तुम्हारे मां औऱ डैडी कि विवाह भि तोँ बिना देखेहुए हि हुई थि। "
" डैड कों तोँ मैंने माॅम केँ सामने कभीतेज आवाज़ मे बातें करते याँ लड़ते झगड़ते नहि देखा हैं मगरतात श्री कों कईबार आपसे लड़ते झगड़ते देखा हैं। उनकेखौफ सें श्वेता दि भि उनके सामने नहि जाती थि। मेरे पुछने कां मतलब थां कि क्याँ जब आप् कि विवाह हुईँ थि तब भि क्याँ वोँ ऐसे हि थें ?"
" नहि नहि, विवाह केँ शुरुआती कई सालों तक बहोत अच्छे थें मगरजब सें उन्हें हार्ट कि बिमारी हुई तब सें थोड़े बदलगये औऱ बची खुची बवासीर केँ रोग नें कर दिया। "
" बवासीर ! यहकबहुआ ?"
" छःसात साल होँ गए " - चाची अपने कमरे कि तरफ जाती हुई बोलीं -" तुबैठ। मे पैसे लेकरआती हूं। "
मे सोफे पर्र लेट गय़ा।
थोड़ी देर मे चाची आई औऱ सोफे पऱ मेरेसर केँ बगल बैठने कां प्रयास करी। मेरे लेटने केँ कारण सोफे पर्र स्थान नहि थां इसलिये मैने उठने कां प्रयत्न किया तौ चाची नें मेरेसर कों उठाकर अपनेगोद यानी जांघों पऱ रख दिया औऱ बोलीं - " लेटारह। मे बैठ जाऊंगी। "
" आपको बैठने मे दिक्कत होगी " - मैंने लेटेहुए उनको देखते हुएकहा।
" कोई दिक्कत नहि होगी " - कहकर चाची रूपए मेरेहाथ मे पकड़ाई औऱ मेरेसर केँ बालों कों अपनी उंगलिया सें सहलाने लगी।
मैंने अपनेसर कों उनके मोटे औऱ मांशल जांघों पऱ एडजस्ट करतेहुए रूपए गिनने लगा। बीस हजार रुपए थें।
" यह तोँ बहोत ज़्यादा हैं। कौन सि फोन लाना हैं ?" - कहतेहुए रूपयों कों अपने पैंट केँ अंदररख दिया।
" कोई भि अच्छी सि देखसमझ केँ लेँ लेना। "
" ठीक हैं। मगर चाइनीज फोन नहि लाऊंगा। "
" जौ तुझेही समझ मे आए वोँ लेँ लेना। "
चाची केँ जांघों पऱ सर रखकर लेटने सें उनके जांघों कां गुदाज पन महसूस हौ रहा थां जिससे मुझेकुछ कुछ होँ रहा थां। मैंने करवटली औऱ उनकेपेट कि तरफ मुंह करकेलेट गय़ा। उनकी साड़ी पेट पर्र सें हट गई थि जिससे उनकी थोड़ी चर्बी युक्त औऱ थोड़ी फुली हुई पेट नग्न हौ गई थि। करवट लें कर पलटने सें मेरा मुंह सीधे उनके नंगेपेट सें सट गय़ा। जिससे उनके जिस्म मे हुईँ सिहरन कों मैंने साफ महसूस किया।
वोँ अभि भि मेरेसर केँ बालों कों सहलाए जारही थि। चाची अभि केवल४३ याँ ४४साल कि थि। इस उम्र मे भि औरतों कि सेक्स लाइफ उठाई पीरियड मे रहती हैं। जबकि चाचा कि बिमारी देखकर मुझे नहि लगता थां कि वोँ अपनी सेक्स लाइफ इन्जवाय कररही होगी। औऱ शायदकई सालों सें ऐसी हि जिंदगी जीरही होगी। मुझेउन पऱ नाँ जाने क्यूं बहोत दयाआई औऱ मैंने उनकी नंगेपेट कों अपने होंठों सें चुम लिया।
" अरे ! क्याँ करता हैं, गुदगुदी होती हैं " - चाची अपनेबदन कों झटके देतेहुए बोलि।
" आप् कों अच्छा नहि लगता हैं ? " - कहतेहुए मैंने फिन सें उनकेपेट कों चुम लिया।
वोँ कुछ नहि बोलि। मात्र मेरे बालों पर्र उंगलियां फेरती रही। हम् ऐसे हि अवस्था मे कितनी देर तक पड़ेरहे। तभी किसी नें दरवाजे पऱ दस्तक दि।
मे उठकरबैठ गय़ा। चाची अपने साड़ी कों व्यवस्थित करतेहुए दरवाजा खोलने चली गई।
चाची केँ संग चाचा नें हाॅल मे प्रवेश किया।
" तुम् अभि यहीं हौ, कालेज गए नहि ? " - चाचा नें मुझेदेख कर अपनी चिर-परिचित लहजे मे कहा।
" आज कालेज नहि हैं। कल श्वेता दि औऱ जीजू यहां शिफ्ट होँ रहे हें उसी केँ बारे मे चाची सें बातें चलरही थि। "
" अच्छा ! थोड़ी देर पहले तौ किसी केँ डाइवोर्स केँ बारे मे बोलरहे थें। "
" हां। उसके अलावा इसके बारे मे भि बातें करनी थि। "
" ठीक हैं ठीक हैं.मुझे भि पता हैं कि वोँ लोग.यहां तुम्हारे उस मित्र। क्याँ नाम थां उसका.हां, शायदअमर केँ घऱ शिफ्ट हौ रहे हें। तोँ इस केँ लिए तुम् दोनों कों क्याँ बातें करनी थि ?
" चाचा, वोँ लोग यहां बहुत सारे सामान केँ संग शिफ्ट कररहे हें। क्याँ आप् नें कोई लेबर वगैरह सें बात कि हैं ? इतना सारा सामान जिसमें बड़े बड़े बिस्तर, आलमारी, बक्से, बर्तनों कां कार्टून, बैग औऱ नं जाने क्याँ क्याँ सामान होगा, वोँ क्याँ आप् स्वयं हि करोगे। "
तात श्री नें मुझे ताड़कर देखा औऱ चाची सें बोले -" मेरीफोन यहांछुट गय़ा हैं, देखो वोँ मेरेरूम मे कहीं होगा। "
चाची कमरे मे चली गई। कुछदेर बाद वोँ चाचा कां फोनलिए हुएआई औऱ उन्हें सौंप दि। चाचा फोन लेकर बाहर् चलेगए।
" तुमने मुझेयह सभी बताया नहि कि मजदूर देखने होंगे " - चाचा केँ बाहर् निकलते हि चाची नें पूछा।
" आप् चिंता मतकरो, मैंने लेबर पहले हि ठीककर दिया हैं। "
" ओह। " - चाची नें थोड़ी देररूक करकहा -" देखा नं कैसा व्यक्ति हैं। जहांकाम दिखाई दिया, फट सें ज़बान बन्द होँ गई। केसे लेबर जुगाड़ होगा। केसे राजीव औऱ श्वेता कों यहां शिफ्ट करने मे सहायता करना हैं.उन कों तोँ जैसेकोई मतलब नहि हैं.सुना औऱ भाग खड़ेहुए। "
" आप् तोँ उनका स्वभाव जानती होँ। छोड़ो उनको। मे सभीकर लुंगा " - मैंने चाची कों आश्वासन दिया।
" हां, कईसाल हौ गए उनको जानते हुए। अगरतु नहि होता तौ मेरेघऱ कां एक् रत्ती भर भि काम नहि होता.मेरा काम, श्वेता कां काम, राहुल कां काम.आज तक तुने हि तोँ किया हैं। "
" मैंने तोँ जौ भि किया हैं अपनी फेमिली केँ लिए किया हैं। छोड़ो वोँ सभी। मे चलता हूं " - कहकर मे दरवाजे कि ओर बढ़ा।
" कहां जाओगे ?" - चाची भि मेरेसंग चलतेहुए बोलीं।
" अमर कि मां केँ पास। वहांरूम वगैरह कि सफाई भि तोँ करवानी हैं। "
" ठीक हैं " - चाची नें कहा।
***********
मे वहां सें निकलकर अमर कि मां केँ घऱचला गय़ा।
वहां मजदूर उपर वाले तल्ले कि साफ सफाईकर रहे थें। आंटी ( अमर कि मां ) मजदूरों केँ संग हि खड़ी थि।
मैंने आंटी केँ चरण स्पर्श कर प्रणाम किया औऱ कहा -" आंटी, एक् बार नीचेचलो नं, कुछबात करनी थि। "
" कैसी बातें ?" - आंटी नें मुझे सवालिए दृष्टि सें देखते हुएकहा।
" अमर केँ बारे मे। "
आंटीकुछ नहि बोलि।
मे आंटी केँ संग उनके कमरे मे आँ गय़ा।
" क्याँ बात करनी हैं ? - वोँ बैड पऱ बैठते हुए बोलि।
" आंटी, अमर कां फोन कहां हैं ?" - मे भि उनकेबगल मे बैठते हुएकहा।
" अमर कां फोन यहां पऱ नहि हैं। पुलिस भि जब यहांआई थि तब उन्होंने भि फोन केँ बारे मे पुछा थां। फिन उन्होंने पुरेघऱ कि तलाशी ली थि। उपर नीचे दोनों तल्लों मे। हर स्थान मगरफोन कहीं भि नहि मिली। "
" ओह ! " - मैंने उदास होतेहुए कहा।
" वैसेअमर केँ क़ातिल कां कुछअता पतालगा ?"
" नहि आंटी, अभि तक तोँ नहि। इसीलिए तोँ फोन केँ बारे मे आप् सें पुछरहा थां। उसके काॅल डिटेल सें पता चलता कि उसनेउस दिन याँ पिछले कुछ दिनों सें किसकिस केँ संगबात कि थि। याँ कुछ मैसेज वगैरह सें पता चलता कि हाल फिलहाल किसके संग ज़्यादा टच मे थां। "
" एक् महिना सें भि ऊपर हौ गय़ा मगर अभि तक मेरे बेटे केँ हत्यारे कों पुलिस पकड़ नहि पाई। मुझे तौ पुलिस पऱ यकीन हि नहींरहा। मेरा बेटा उपर सें मुझेदेख रहा होगा औऱ बोलरहा होगा कि माँ.मेरा हत्यारा अभि तक खुलेआम घूमरहा हैं। क्याँ उसकोसजा नहि मिलेगी। क्याँ उसके हत्यारे ऐसे हि खुलेआम बेफिक्र होकरघुम रहे होंगे " - वोँ भावुक होतेहुए रूंधे गले सें बोलीं - " क्याँ मेरी आत्मा ऐसे हि भटकते रहेगी। "
" सजा मिलेगी आंटी.जरूर मिलेगी। ईश्वर केँ घऱदेर हैं मगर अंधेर नहि। आप् थोड़ी हिम्मत बनाएं रखें। "
" मैंने तोँ हिम्मत हि बनाएरखा हैं बेटा। मे तोँ बस इसलिये जिन्दा हूं कि एक् बार हत्यारे कों फांसी पऱ चढ़ते हुएदेख लूं वर्ना मे तोँ उसीदिन अमर केँ संग हि ऊपरचली गई होती। "
आंटीफफक कररो पड़ी। मेरी आंखें भि भरआई। मैंने उन्हें अपने बाहों मे भर लिया औऱ उन्हें दिलासा देतेरहा।
थोड़ी देरबाद वोँ नोर्मल हुई। वोँ मुझ सें अलग होँ गई।
" बेटा, मे अपनी सारी दौलत लुटा दुंगी अपने बेटे केँ हत्यारे कों फांसी पर्र चढ़ाने केँ लिए। तु पुलिस कों पैसे खिला। औऱ यदि तुम्हें लगता हैं कि पुलिस हत्यारे कों पकड़ने मे कुछ नहि कर पायेगी तोँ कोई डिटेक्टिव ढुंढ। उसे रुपया दे। वोँ जितना मांगे मे उतना दुंगी मगरउस खूनी कों ढुंढे औऱ मेरे हवाले करे। उसेमै सजा दुंगी। अपने हाथों सें उसकाखून करूंगी। " - आंटी क्रोधित होकर बोलि।
" आंटी, मे कलइसी सिलसिले मे गाजियाबाद जारहा हूं पुलिस सें मिलने। औऱ प्राइवेट डिटेक्टिव केँ बारे मे मुझेकोई खास जानकारी नहि हैं। हां इतना मैंने सुना हैं कि वोँ भले हि काम कां रिजल्ट देपाए याँ नाँ देपाए मगर अपना चार्ज लें हि लेंगे औऱ उनके चार्ज भि बहुत बड़ीरकम मे होती हैं। "
" कुछ भि कर पर्र उस हत्यारे कों ढुंढ। रूपए पैसे कि चिंता मतकर जितना लगेगा मे दुंगी। मेरीयह सारीजमा पूंजी, सम्पत्ति किसकाम कि हैं.जब मेरा बच्चा हि नहि रहा तौ यह मेरेकिस काम कि। "
" मे कररहा हूं आंटी। मे पुरेजतन सें खूनी कां पता लगाने कि कोशिश कररहा हूं। औऱ अब तोँ उस खूनी कां अगला टारगेट मे होँ गय़ा हूं। "
" क्याँ ?" - आंटी नें चौंकते हुएकहा।
" हां आंटी। "
मैंने उन्हें मेरे औऱ रीतु केँ बीच मे जोँ बातें हुई थि, वोँ कह सुनाई।
वोँ सुनकर चिन्तित होतेहुए बोलीं -" मेरा एक् बेटा तोँ चला गय़ा औऱ अब मे अपने दुसरे बेटे कों खोना नहि चाहती। एक् मिनटतु बैठ, मे अभि आती हूं। "
यह बोलकर वोँ बैड सें उठी औऱ अपनी अलमारी सें कुछ निकाल कर वापस पलंग पऱ आकरबैठ गई। मैंने देखा वोँ स्टेट बैंकऑफ इंडिया कां उनकेनाम पर्र चेकबुक थां। उन्होंने एक् चेक पऱ अपना साइन किया औऱ चेकबुक सें फाड़कर मुझेदे दिया।
" बेटा, इसमें तीनलाख रुपएभर केँ बैंक सें उठा लें। एक् लाख मुझेदे देना औऱ बाकीतु अपनेपास रख लेना। तुइन पैसों कों उस हत्यारे कों खोजने मे लगा। "
" यह तौ बहुत बड़ीरकम हैं आन्टी। "
" कोईबात नहि। औऱ भि यदि अधिक पैसों कि जरूरत पड़े तौ मुझे बताना। "
मैंने चेक पाकेट मे रख लिया।
" बेटा, तुझसे एक् बात औऱ कहनी थि। "
" हां आंटी बोलिए। "
" कल तुम्हारे जीजा औऱ बेहन आँ रही हैं तोँ मे चाहती हूं कि इसबीच मे चारों धाम दर्शन करके आँ जाऊं। "
" चारों धाम ! कौन सि चारों धाम ?" - मे चौंककर बोला।
" बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री औऱ यमुनोत्री। "
" ओह ! कब जाएंगी ?"
" वोँ लोगकल यहां आँ रहे हें तौ तु परसों कि टीकट करवादे। "
" ठीक हैं आंटी। मे अब चलता हूं। वैसे आप् कों कुछ सामान वगैरह मंगवाना हैं ?"
" हां। कल आनां, बता दुंगी। "
मे वहां सें बाहर् निकल गय़ा।
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मे बाहर् निकलकर रमणीक लाल कों मोबाइल लगाया।
रमणीक लाल करोलबाग थाने मे हवलदार थां। शायद३५ सें ४० केँ बीचउमर होगा। करप्ट पुलिसिया थां। रिश्वतखोरी मे फंस गय़ा थां, जिसकी वजह सें बहुत अरसे सें सस्पेंशन मे चलरहा थां। एक् बार उसकीकुछ लोगों केँ संग पंगे केँ दौरान मैंने उसकी सहायता कि थि इसलिये वोँ मेरी इज्जत करता थां। औऱ मेरा मित्र जैसा हौ गय़ा थां। जबकि हमारे उम्र मे बहुत अंतर थां। चूंकि अभि वोँ सस्पेंशन मे चलरहा थां इसलिये उसकाहाथ तंग रहता थां।
" सागरबोल रहा हूं " - मे बोला - " एक् काम हैं, करेगा ?"
" कैसाकाम ?" - रमणीक लाल नें कहा।
" मामूली काम। "
" अरे ! पहलेकाम तौ बता ?"
" थोडा रूटीन काम हैं। थोडा लेग वर्क हैं, थोडा क्लैरिकल वर्क हैं। कुछ कमाई कां भि जोगाड़ हैं। "
" क्याँ बात हैं। लगता हैं कोई लाटरी लग गई हैं ?"
" वोँ सभी छोड़, काम करेगा तौ हांबोल बरना."
" अगरइल लैगलकाम हैं तोँ सुन.मेरा सस्पेंशन कां दौर समाप्त हौ गय़ा हैं, मेरीजॉब बहाल होँ गई हैं। "
" यह तौ बहोत अच्छी खबर हैं। ठीक हैं मे किसी औऱ कों देखता हूं। "
" कितना देगा ?"
" रमणीक लाल, काम मेरी मर्जी कां औऱ उजरत तेरी मर्जी कां। "
" जरूरकोई मोटा बकरा काटा होगा। "
मे हंसा।
" कुछलोग कि फुलबैक ग्राउंड टटोलनी हैं। उनके बारे मे जितनी ज़्यादा जानकारी हासिल होँ सके, इकठ्ठा करनी हैं। "
" कौनलोग ?"
" इसकाम केँ लिए तुम्हें एक् दो व्यक्ति भि एंगेज करने पड़े तोँ उस कि फीस भि मे भरूंगा। "
" जरूर, जरूर। कोई मोटा बकरा हैं। "
" हां याँ नाँ बोल। "
" हां। "
" कागजकलम निकाल औऱ जौ बोलता हूं, उसेनोट कर। "
" करा। "
मैंने उन तमाम लोगों केँ नाम लिखाये जोँ इसकेस सें सम्बंधित थें।
" सभीनोट कर लिया ?" - फिन मैंने पूछा।
" हां। "
मैंने सम्बन्ध विच्छेद किया औऱ बाइक पऱ बैठकर पहाड़गंज चला गय़ा।
Sagar (Full Storyd) - Kahani ab aur interesting hogi
koy bi post users delete nahee krr sakte . mgr usko edit karke . uski jagah koy sign ya kuch bi random emoji ya phir koy numeric value daal sakte h .
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