maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 4
हम् दोनों रेडी होकर विद्यालय केँ लिए निकललिए। दोनों एक् हि साइकल सें विद्यालय जाते थें, मे साइकल लेकरघऱ सें बाहर् निकला तोँ देखा दिदी अपनाबैग लिए मेरे प्रतीक्षा मे हि खड़ी थि। मे भि अपने पापा औऱ भाइयों कि तरह काफ़ी तंदुरुस्त बदन कां थां, इसउमर मे भि मेरी लंबाई भाभी केँ बराबर थि (5’5”) दिदी सें लंबा थां। अच्छा खानां पीनादूध, घी कां, उपर सें भाभी कां एक्सट्रा लाड प्रेम, तोँ थोडा भारी भि होताजा रहा थां मेरा जिस्म। वैसे तौ मां कां दर्जा तौ कोई औऱ नहि लेँ सकता, पऱ सच कहूँ तोँ भाभी केँ लाड प्रेम नें मुझे अपनी मम्मी कि ममता कों भि भूलने पऱ विवशकर दिया थां.
मैंने दिदी कों अनदेखा करके साइकल लेकरचल दिया, तोँ दिदी नें आवाज़ देकर रुकने कों कहा औऱ बोलि – अरे! मुझेकौन लें जाएगा? तुँ तोँ अकेला हि भगाजा रहा हैं.
मैंने साइकल तोँ रोकली मगरकोई जवाब नहि दिया औऱ उल्टे अपनेगाल फूलालिए, जैसे मे उनसे बहोत अधिक नाराज़ हूं। दिदी मेरेपास आई औऱ अपने दोनों कानों कों पकड़कर सॉरी बोला – छोटू! भैया अपनी दिदी कों क्षमा करदे.
मैंने कहाठीक हैं, क्षमा किया.मगर मेरेहाथ मे अभि भि दर्द हैं तौ मुझसे डबल बिठाकर साइकल नहि चलेगी, आप् चलो.
मजबूरी मे दिदी नें साइकल लें ली, औऱ मे पीछे कॅरियर पर्र बैठ गय़ा। देहात सें निकलकर हम् मार्ग पर्र आँ गये, मगर दिदी कि साँस फूलने लगी, औऱ वोँ साइकल खड़ी करके हाँफने लगी आँ.स्सा.आँ.सससा। उफ़फ्फ़…छोटू। तुँ बहोत भारी हैं रे… मेरे सें नहि चलेगी। तूँ जा अकेला। मे पैदल हि आँ जाती हूं… ज्यदा दूर भि नहि हैं… थोडा लेट हि होंगी औऱ क्याँ.?
मे – हूंम्म… फिनसाम कों बाबूजी सें जूते पड़वाना हें। अगर उन्हें पताचला कि आप् अकेली पैदल विद्यालय गई, होँ तौ जानती होँ नाँ क्याँ करेंगे वोँ?
दिदी – तौ फिन क्याँ करें? तेरेहाथ मे तौ दर्द हैं, डबल सवारी हैंडल केसे करेगा तुँ?
मे – एक् काम होँ सकता हैं, आप् हैंडल पकडो, मे कॅरियर पऱ दोनों ओरपेर करके पेडल मारता हूं.
दिदी – चला पाएगा तूँ ऐसे?
मे – हां आप् शुरुआत करो.
फिन हम् नें ऐसे हि साइकल चलाना शुरुआत कर दिया, मे पीछे सें पेडल मारने लगा, मगर बिनाकुछ पकड़े ताक़त लग हि नहि पारही थि.
जिन लोगों नें इसतरह सें साइकल चलाई होँ वोँ इस सिचुयेशन कों भली भाँति समझ सकते हें.
मे – दिदी! बिनाकुछ पकड़े मेरी ताक़त पेडल केँ उपर नहि लगपारही, क्याँ करूँ?
दिदी- तोँ सीट कों आगे सें पकड़ लेँ.
मैंने दोनों हाथों कों सीट केँ आगे लेँ गय़ा मगर उनकी दोनों जांघे बीच मे आँ रही थि, मैंने कहा दिदी अपने पांव तोँ उपरकरो, तौ उन्होंने अपने दोनों पेरउठा करआगे सामने वाले फ्रेम केँ डंडे पर्र रखलिए। मैंने सीट केँ दोनों साइड सें हाथआगे लेँ जाकर अपने हाथों कि उंगलियों कों एक्-दूसरे मे फँसा लिया औऱ साइकल पऱ पेडल मारने लगा, अब मुझे ताक़त लगाने मे आसानी हौ रही थि। मगर दिदी अपनेपेर ज्यादा देर तक डंडे सें टिका नहि पाई औऱ उनकेपेर नीचे कि ओर सरकने लगे जिससे उनकी मोटी रसीले जांघे मेरी कलाईयों पऱ टिक गई,। जोरे लगाने मे मेरासर भि आगे पीछे कों होता तौ मेरीनाक औऱ सर उनकीपीठ सें टच होने लगते.रमा दिदी कों आज दूसरी बार अपने भइया केँ जिस्म केँ टच कां अनुभव होँ रहा थां, जोँ शुरुआत तौ मजबूरी सें हुआमगर अब उसके कोमलमन कि भावनाएँ कुछ औऱ हि तरह सें उठनेलगी। जांघों पऱ हाथों कां स्पर्श, पीठ पऱ नाक औऱ सर केँ बारटच होने सें उसको सुभह अपने स्तनों पऱ हुए अपने भइया केँ हाथों कां मसलना यादआने लगा, उसके कोमल अंगों मे सुरसूराहट होनेलगी। नां चाहते हुए भि वोँ थोडा सां औऱ आगे कों खिसक गयीँ, औऱ आगे-पीछे हिला-हिलाकर अपनी बुर कों अपने भइया कि उंगलियों सें टच करनेलगी। उसकी पैंटी मे गीलापन कां एहसास उसेसाफ महसूस हुआ औऱ वोँ मन हि मन गुड-गुडाने लगी। वोँ अपने आप् कों कोसरही थि कि क्यूं उसने सुभह अपने भइया कों नाराज़ किया, थोड़ी देर औऱ अपने स्तनों कों मसलवा लेती तौ कितना मजाआता। यहीसभी सोचती हुईँ वोँ मन हि मनखुश होँ रही थि, औऱ अब उसने अपने भइया कों औऱ अपनेपास आने कां मंसूबा बना लिया। दोनों विद्यालय पहुँचे औऱ अपनी-अपनी क्लास मे जाकर पढ़ाई मे लगगये। उमरकोई भि हौ, संग केँ दोस्त यारसभी तरह कि बातें तोँ करते हि हें, आप् चाहो याँ नां चाहो, वोँ सभी बातें आपको भि असर तोँ डालती हि हें। रमा कि भि क्लास मे कुछऐसी लड़कियाँ थि, जौ इसउमर मे भि लन्ड कां स्वाद लेँ चुकी थि, औऱ आपस मे वोँ एक् दूसरे सें इसतरह कि बातें भि करती थि। तोँ ऐसा तोँ बिल्कुल भि नहि थां कि रमा कों इनसभी बातों कि कोईसमझ हि नां होँ, मगर वोँ उन दूसरी लड़कियों जैसी नहि थि कि कहीं भि किसी केँ भि संग मज़े लें सके। उसके अपनेघऱ केँ संस्कार इसकेलिए कतई उसकोइस तरह कि इजाजत नहि दे सकते थें। सारेदिन रमा कां पढ़ाई मे मन नहि लगा, रह-रहकर आज उसकोदिन कि घटनाएं याद आँ रही थि, औऱ उनसे पैदा हुई अनुभूतियों कों सोच-सोच कर रोमांचित होतीरही। टॉयलेट करते टाइमआज पहलीबार उसकामन किया कि अपनी बुर कों सहलाया जाए, औऱ यह ख्याल आते हि उसकाहाथ स्वतः हि अपनी प्यारी कमसिन बुर पऱ चला गय़ा, औऱ वोँ उसे सहलाने लगी। थोडा अच्छा भि लगाउसे, पर्र अब वोँ अपनीबंद आँखों सें इस आभास कों अपने भइया कि उंगलियों केँ टच सें हुइ अनुभूति सें तुलना करनेलगी.
विद्यालय 9 बजे सुभह शुरुआत होता थां औऱ 3 बजेऑफ होँ जाता थां, छुट्टी केँ बाद दोनों भइया बेहनघऱ लौटलिए। रमा नें लौटते समय कां कुछ औऱ हि प्लान सोच लिया थां। छुट्टी होते हि वोँ छोटू केँ पासआई जौ स्टैंड सें अपनी साइकल निकाल कर पैदल हि गेट कि तरफ आँ रहा थां। रमा पहले सें हि गेट पऱ जाकर खड़ी हौ गई, थि। अपना विद्यालय बैग भि हैंडल पऱ लटकाते हुए बोलीं – भइया तेरेहाथ कां दर्दअब कैसा हैं, कुछकम हुआ याँ वैसा हि हैं?
मे – वैसेफील नहि होता हैं, मगरकुछ करने पर्र थोडा दुखता हैं.
रमा – मैंने सोचा तुझेही कॅरियर सें पेडल मारने मे थोडा अधिक ताक़त लगानी पड़रही थि नाँ सुभह, तोँ इधर सें हम् दोनों संग मे पेडल चलाएँगे.
मे – अरे!मगर पेडल तौ इतना छोटा हैं, उसपर दोनों केँ पेर केसे आँ पाएँगे?
रमा–अरे! तूँ देख तौ सही, आँ जाएँगे, मे अपनीएड़ी सें ज़ोर लगाऊंगी, तूँ बाहर् सें पंजों सें लगाना। हौ जाएगा देख्ना.
तौ वोँ सीट पऱ बैठ गयीँ, औऱ मे कॅरियर पर्र दोनों ओरपेर करकेबैठ गय़ा.
मे – मगर दिदी! अब मे पाकडूँगा केसे?
रमा – तुँ मेरी जांघों केँ उपर सें सीट कों पकड़ लें… औऱ उसने अपनी एड़ीयों सें साइकल आगे बढ़ाई, मैंने भि उसकी एड़ीयों कि बगल सें बाहर् कि तरफ अपने पंजेजमा लिए औऱ हम् दोनों मिलकर पेडलों पऱ ज़ोर लगाने लगे। जैसे हि विद्यालय कि भीड़ सें बाहर् निकले, रमाने सीट पकड़ने केँ लिएकहा। मैंने अपने दोनों हाथ उसकीकमर कि साइड सें लेँ जाकरसीट कि आगे कि नोक पऱ जमालिए। सुभह केँ मुकाबले अब मुझे ताक़त भि कम लगानी पड़रही थि, रमा दिदी बोलीं- क्यूं भइयाअब तौ अधिक ज़ोर नहि लगाना पड़रहा तेरी?
मे – हां दिदी! अबसही हैं, औऱ साइकल भि तेजचल रही हैं.
हम् दोनों मिलकर साइकल चलनेलगे, दिदी केँ बदन सें उठने वाले पसीने कि महक मेरीनाक सें अंदरजा रही थि औऱ धीरे धीरे मैंने अपनागाल उसकीपीठ पऱ टिका दिया.उधर अपने भइया कि बाजुओं कां दबाव अपनी जांघों पऱ बिल्कुल उसकी बुर केँ बगल सें पाकररमा कि बुर मे सुर-सुराहट होनेलगी औऱ वोँ उसे आगे-पीछे हिल-हिल कर उसके हाथों सें रगड़ने लगी। मज़े सें उसकी आँखें बंद होनेलगी, जिसकी वजह सें साइकल लहराने लगी, छोटू कों लगा कि साइकल गिरने वाली हैं, तौ वोँ चिल्लाया – दिदी क्याँ कररही होँ? साइकल गिर जाएगी। अपने भइया कि आवाज़ सुनकर रमा कों होशआया औऱ वोँ ठीक सें बैठकर हैंडल पऱ फोकस करनेलगी.
रमा – भइया तुँ मेरीपीठ सें क्यूं चिपका हैं?
मे – अरे दिदी! सीट पकड़ने केँ लिएहाथ आगे करूँगा तौ मुझे भि आगे खिसककर बैठना पड़ेगा नां!
रमा– तौ तूँ एक् कामकर! सीट कि स्थान मुझे पकड़ लेँ औऱ अपने एक् हाथ सें मेराउधर कां हाथ पकड़कर अपनी जाँघ केँ जोड़ पऱ अंदर कि तरफरख दिया औऱ बोलि- दूसरा हाथ भि ऐसे हि रख लेँ। ठीक हैं?
मैंने हां बोलकर दूसरा हाथ भि ऐसे हि रख लिया, अब मेरे दोनों हाथों कि उंगलियाँ एकदम उसकी बुर केँ उपर थि, मेरेमन मे ऐसीकोई भावना नहि थि कि अपनी बेहन कों टीज़ करूँमगर वोँ आगे-पीछे होकरअब मेरे हाथों सें अपनी बुर कि फुल मसाजकरा रही थि। घऱ पहुँचते पहुँचते रमा इतनी एक्ससिटेड होँ गयीँ,, कि उसकाफेस लाल होँ गय़ा, कान गर्म हौ गये, औऱ उसकी पैंटी पूरीतरह गीली हौ गई,, जौ मुझेलगा शायद पसीने कि वजह सें हौ। घऱ पहुँचते हि वोँ जल्द सें साइकल मुझे पकड़ा कर बाथरूम कों भागी, औऱ लगभग 10 मिनिट बाद उसमें सें निकली, तब तक मैंने साइकल आँगन मे खड़ी कि, दोनों बाग उतारे, औऱ अपने कपड़े निकाल कर फ्रेश होने बाथरूम कि तरफ गय़ा, वोँ उसमें सें निकलरही थि.
मैंने पूछा - दिदी इतनी तेज़ी सें बाथरूम मे क्यूं भागी?
तोँ वोँ बोलीं- अरे दोस्त बहोत तेज़ बाथरूम लगी थि। मैंने सोचा शायदठीक हि कहरही होगी। मे फ्रेश होकर भाभी केँ रूम मे चला गय़ा, वोँ बेसुध होकरसो रही थि, अब मुझे तोँ पता नहि थां कि बेचारी, रातभर भैया केँ संग बिस्तर तोड़ कुश्ती खेलती रही हें। सोतेहुए वोँ इतनी प्यारी लगरही थि मानोकोई देवी कि मूरत होँ, साँसों केँ संग उनका वक्षउपर नीचे होँ रहा थां, जौ आजकुछ ज्यादा हि उठाहुआ लगा मुझे। मे उनकेपास बैठ गय़ा औऱ उनका एक् हाथ अपने हाथों मे लेकर अपनेगाल पऱ रखकर सहलाया औऱ धीरे-धीरे सें आवाज़ लगाई, मगर वोँ गहरी नींद मे थि सोकोई असर नहि पड़ा.
तौ मैंने उनकाहाथ हिलाकर थोडा ऊँची आवाज़ मे पुकारा – भाभी! भाभी!। उठिए नाँ… भूखलगी हैं। खानां दो.
वोँ थोडा सां कुनमुनाई औऱ मेरीओर करवट लेकरफिन सो गयीँ,, करवट लेते वक्त उनका दूसरा हाथ मेरी जाँघ पऱ आँ गय़ा। उनका साड़ी कां पल्लू सीने सें अलग होँ गय़ा औऱ ब्लाउज मे कसे उनकेतने बूब्स कां उपरी हिस्सा करीब 1/3 दिखाई पड़ने लगा। दोनों बूब्स एक्-दूसरे सें सटगये थें, अबउन दोनों केँ बीच एक् पतली सि दरार जैसीबनी हुइ थि। मेरामन किया कि इस दरार मे उंगली डालकर देखूं, मगर एक् ममतामयी भाभी कि छवि नें मुझेरोक दिया, औऱ मे उनकेपास सें चलाआया। बाहर् आकर देखा तौ दिदी खानां लेकरखा रही थि.
मैंने कहा – मुझे नहि बुला सकती थि खाने केँ लिए.
दिदी – मुझेलगा तूँ बिना भाभी केँ दिए नहि खाएगा। सो इसलिये नहि पूछा, चल आजा मेरेसंग हि खा लें। दोनों मिलकर खाते हें.
मे भि दिदी केँ संग हि बैठ गय़ा खाने औऱ फिन हम् दोनों बेहन भइया नें एक् हि थाली मे बैठकर खानां खाया, जौ मुझेकुछ ज्यादा अच्छा लगा एक् संग खाने मे। आप् भि कभी अपने परिवार केँ संग एक् थाली मे ख़ाके देख्ना अधिक टेस्टी लगेगा, यह मेरा अपना अनुभव हैं। साम कों भाभी टेलीविज़न केँ सामने बैठकर सब्जी काटरही थि, दिदी बड़ी चाची केँ यहा गयीँ, थि, नीलू भैया सें नोट्स लेने.
यहा थोडा अपने परिवार केँ दूसरे सदस्यों केँ बारे मे बताना ज़रूरी हैं.
मेरे 3 चाचा: बड़े चाचा राम किशन पापा सें दोसाल छोटे खेती करते हें, उमर 44, बड़ी चाची जानकी उमर 42 इनके 3 बच्चे हें दो बड़ी बेटियाँ रेखा औऱ आशा, उमर 22 औऱ 19, बड़ी बेटी कि विवाह मेरे भैया सें एक् सालबाद हि हुई थि, तीसरा बेटा नीलू जौ रमा दिदी केँ बराबर कां उन्हीं कि क्लास मे पढ़ता हैं.
दूसरे (मंझले) चाचा : रमेशउमर 41, यह भि खेती हि करते हैं, चाची निर्मला 38 कि होंगी, इनकेदो बच्चे हें, दोनों हि लड़के हें सोनू औऱ मोनू। सोनू मेरे सें दोसाल बड़ा हैं, औऱ मोनू मेरीउमर कां हैं मगर मेरे सें एक् क्लास पीछे हैं.
दो फूफी – मीरा औऱ शांति 36 औऱ 33 कि उमर दोनों कि विवाह अच्छे घरों मे हुइ हैं ज्यादा डीटेल वक़्त आने पर्र.
तीसरे चाचा जोँ सभी बेहन भाइयों मे छोटे हें नाम हैं राकेश 12 क्लास तक पढ़े हें, इसलिये पापा नें इन्हें विद्यालय मे हि जॉब दिलवा दि औऱ खेती तोँ हैं हि संग मे तौ अच्छी कटरही हैं इनकीइस टाइम 30 केँ होँ चुके हें। छोटी चाची रश्मि उमर 26 साल, सच पुछो तोँ चाचा केँ भाग हि खुलगये, चाची एकदम हेमा मालिनी जैसी लगती हें। विवाह केँ 6 सालबाद भि अभि तक कोई बच्चा पैदा नहि करपाए हें। भाभी सोफे पऱ बैठी सब्जी काटरही थि साम केँ खाने केँ लिए, मे बाहर् आँगन मे चारपाई पऱ बैठा अपनाआज कां होमवर्क कररहा थां। थोड़ी देरबाद भाभी मेरेपास आकर सिरहाने कि तरफबैठ गयीँ, औऱ पीछे सें मेरेसर पर्र हाथ फेरकर बोलि – अंकुश! होमवर्क कररहे होँ?
मे – हां भाभीआज टीचर नें ढेर सारा होमवर्क दे दिया हैं, उसी कों निपटा रहा हूं। वैसे होँ हि गय़ा हैं बस थोडा सां हि औऱ हैं.
भाभी – दूध लेँ आऊं, पीओगे?
मे – नहि अभि नहि रात कों खाने केँ बादपी लूँगा। अरेहां भाभी!याद आया, आपकी तबीयत कैसी हैं अब?
भाभी – हां? मुझे क्याँ हुआ हैं? भली चंगी तोँ हूं!
मे – नहि ! वोँ दोदिन सें आप् कुछ लंगड़ा करचलरही थि, औऱ जब मैंने विद्यालय सें आँ केँ आपको बहोत जगाया, मगर आप् उठी हि नहि, सोचा शायद आपकोकोई प्राब्लम हुईँ होँ? भाभी थोडा शरमा गई,, फिन शायद थोड़ी देर पिछली दो रातें यादआई होगी तौ उनके चेहरे पर्र एक् शर्मीली मुस्कान तैर गयीँ, औऱ उनके दोनों गालों मे गड्ढे बनगये। मैंने जैसे हि उनके डिंपल देखे, मेराजी ललचाने लगा तौ मैंने अपनी उंगली कों उनके डिंपल मे घुसा दिया औऱ उंगली कों गोल-गोल सहलाकर बोला- भाभी मे आपसेकुछ मांगूँ तोँ आप् नाराज़ तौ नहि होगी नां?
उन्होंने हँसते हुए हि मेरे बालों मे उंगलियाँ डाली औऱ बोलि – यह क्याँ बात हुईँ। भला.? तुम्हें आज तक मैंने किसी चीज़ केँ लिएमना किया हैं जोँ ऐसे माँगरहे होँ.? सभीकुछ तौ तुम्हारा हि हैं इसघऱ मे। बताओ मुझे क्याँ चाहिए मेरे प्यारे देवरु कों औऱ यहकहकर मेरेगाल कों प्रेम सें अपने एक् अंगूठे औऱ उंगली केँ बीचदबा कर हल्का सां दबा दिया.
मे – मेराजी करता हैं, एक् बार आपके डिंपल कों चूमने कां… कहोचूम लूँ.?
भाभीकुछ देर तक मेरे चेहरे कि तरफ देखती रही, फिन एक् मुस्कान उनके चेहरे पर्र तैर गयीँ, औऱ बोलीं – एक् शर्त पऱ.
मे – क्याँ.? इसकेलिए आप् जोँ कहोगी मे करूँगा.
भाभी – मुझे भि अपनेगाल चूमने दोगे तोँ हि मे अपने चूमने दूँगी। कहो मंजूर हैं.?
मे – हेहेहे… इसमें क्याँ हैं ? आप् तौ कभी भि मेरा चुम्मा लेँ हि लेती हौ नाँ.
भाभी – नहि यहकुछ स्पेशल वाला होगा। मैंने कहा जैसे आप् चाहो वैसे लें लेना। तोँ वोँ हँसते हुए बोलि ठीक हें तोँ फिन तुम् लें लो, पहले.
मैंने उनके हँसते हि उसकेगाल कों चूम लिया औऱ उनके डिंपल मे अपनीजीभ कि नोकडाल दि। वोँ खिल खिलाकर हँसते हुए बोलि- हटो चीटिंग करते हौ, जीभ लगाने कि कबबात हुइ थि?
फिन मैंने बिनाकहे दूसरे गाल पऱ भि ऐसा हि किया.
भाभी नें कहा – बस हौ गय़ा। अब मेरी बारी हैं.
फिन उन्होंने मेरासर अपने सीने सें सटा लिया औऱ मेरेगाल पर्र अपने दाँतगड़ा दिए। मेरे मुँह सें चीख निकल गयीँ, मगर उन्होंने मेरागाल नहि छोड़ा औऱ उसे अपने दांतों मे दबाकर काट लिया, औऱ कुछदेर तक काटने वाली स्थान पऱ अपने होंठों सें हि सहलाने लगी। मेरा दर्दपता नहि कहां छूमंतर होँ गय़ा औऱ मुझेमजा आनेलगा, मेरी आँखें बंद होँ गई,, फिन उन्होंने ऐसा हि दूसरे गाल पऱ भि किया, इस बार दर्दहुआ पऱ मे चीखा नहि औऱ उनके होंठों केँ सहलाने कां मजा लेतारहा। “क्यूं कैसालगा मेरा चुम्मा???” जब भाभी नें पूछा तोँ मैंने कहा – आआहहहह। भाभीमजा आँ गय़ा, ऐसा चुम्मा तौ आप् रोज़ लियाकरो, औऱ यह बोलकर मे उनकी जाँघ पर्र अपनासर रखकरलेट गय़ा औऱ उनकी पतलीकमर मे अपनी बाहें लपेटकर उनके ठंडे-ठंडे पेट पऱ अपना मुंहरख कर बोला- भाभी आप् कोई चमत्कार तौ नहि जानती?
भाभी – क्यूं मैंने क्याँ चमत्कार कर दिया तुम् पर्र?
मे – कुछदेर पहले मेरा दिमाग़ थका-थका सां लगरहा थां, मगर आपने सारी थकानखतम कर दि मेरी, यह बोलकर मैंने उनके ठंडेपेट कों चूम लिया.
भाभी मेरासर चारपाई पऱ टिकाकर हँसती हुई खानां बनाने चली गयीँ, औऱ मे फिन अपने होमेवर्क मे लग गय़ा। दूसरी सुभह हम् फिन विद्यालय केँ लिए तैयार होकर लेँ साइकल निकाल लिए.आज मेराहाथ एकदम स्लिम थां, सो मैंने साइकल बढ़ा दि औऱ दिदी कों बैठने केँ लिए बोला। दिदी नें जैसे हि बैठने केँ लिए कॅरियर पकड़ा, वोँ सीट केँ नीचे वाले जॉइंट सें अलग होकर पीछे कों लटक गय़ा.
दिदी चिल्लाई – छोटूरुक, यह कॅरियर तौ निकल गय़ा.
मे – तौ अब क्याँ करें, चलो पैदल हि चलते हें वहीं जाकर मेकैनिक सें ठीककरा लेंगे, बैग दोनों साइकल पर्र टाँग उसके हैंडल कों पकड़कर हम् दोनों निकल पड़े पैदल विद्यालय कों। पीछे सें नीलू भैया साइकल पऱ आँ रहे थें, उनके पीछेआशा दिदी जौ अब क्लास 12 मे थि, लेट पढ़ने बैठी थि इसलिये वोँ अभि क्लास 12 मे हि थि। दोनों भइया बेहन एक् हि क्लास मे थें। हमेंदेख कर उन्होंने भि अपनी साइकल रोकी औऱ पूछा कि क्याँ हुआ, हमने अपनी प्राब्लम बताई तौ वोँ दोनों भि बोले कि ठीक हैं हम् भि तुम् दोनों केँ संग पैदल हि निकलते हें.
रमा दिदी नें उनकोकहा- अरे नहि आप् लोग निकलो क्यूं बिना किसी कारण हमारी वजह सें लेट होते हौ? तौ वोँ निकलगये। जैसे हि हम् मार्ग पर्र पहुँचे तोँ
दिदी बोलीं – छोटू ! भइयाऐसे तौ हम् लोगलेट होँ जाएँगे, पहला पीरियड नहि मिल पाएगा, वोँ भि मेरा तोँ फिज़िक्स कां हैं.
मे – तोँ क्याँ करें आप् हि बताओ?
दिदी – एक् काम करते हें, मे आगे डंडे पर्र बैठ जाती हूं। कैसा रहेगा?
मे – मुझेकोई प्राब्लम नहि हैं, आप् बैठो। तोँ वोँ आगे डंडे पऱ बैठ गई, औऱ मे फिन सें साइकल चलाने लगा। विद्यालय केँ लिए थोडा लेट होँ रहा थां तौ मैंने साइकल कों तेज चलाने केँ लिए अधिक ताक़त लगाई जिससे मेरे दोनों घुटने अंदर कि तरफ हौ जाते औऱ सीनाआगे करना पड़ता पेडल पर्र अधिक दबाव डालने केँ लिए। मेरे लेफ्ट पांव कां घुटना दिदी केँ घुटनो मे अड़ने लगा तौ वोँ औऱ थोडा पीछे कों हौ गई,, जिससे उनके कूल्हे राइट साइड कों ज़यादा निकलआए औऱ उनकीपीठ मेरेपेट सें सटनेलगी। मेरी राइट साइड कि जाँघ उनके कूल्हे कों रब करनेलगी औऱ लेफ्ट पांव उनकी टाँगों कों। उनके कूल्हे सें मेरी जाँघ केँ बार-बार टच होने सें मेरे जिस्म मे कुछ तनाव सां बढ़ने लगा, औऱ मेरे पैंट मे क़ैद लन्ड, जौ अब धीरे धीरेआकर लेताजा रहा थां अकड़ने लगा। दिदी भि अबजान बूझकर अपनीपीठ कों मेरेपेट औऱ कमर सें रगड़ने लगी, अपनासर उन्होंने औऱ थोडा पीछेकर लिया औऱ अपना एक् गाल मेरे चेहरे सें टच करनेलगी ज़ोर लगाने केँ लिए मे जबआगे कों झुकता तोँ हम् दोनों केँ गाल एक् दूसरे सें रगड़ जाते औऱ पूरे जिस्म मे एक् सनसनी सि फैलने लगती.आधे रास्ते पहुँच,
दिदी बोलीं- छोटू थोडा औऱ तेजकर नां लेट हौ रहे हें। तोँ मैंने अपने दोनों हाथ हैंडल केँ बीच कि ओर लाया जिससे औऱ अच्छे सें दमलगा सकूँ.मगर सही सें पकड़ नहि पारहा थां। हैंडल…! क्योंकि दिदी केँ दोनों बाजूबीच मे आँ रहे थें। तौ उसने आइडिया निकाला औऱ अपने दोनों बाजू मेरे बाजुओं केँ उपर सें लेजाकर हैंडल केँ दस्तानों कों पकड़ लिया, जहाँ नोर्मली चलाने वाला पकड़ता हैं। हैंडल कों बीच कि तरफ पकड़कर अब साइकल चलाने मे दम तोँ लगरहा थां औऱ साइकल भि अब बहोत तेज-तेज चलरही थि मगरअब मेरे लेफ्ट साइड कि बाजू दिदी केँ बूब्स कों रगड़ने लगी। दूसरी ओर मेरीदाई जाँघ दिदी केँ रसीले चूतड़ कों रगड़ा देरही थि। मेरे जिस्म कां करंट बढ़ता हि जारहा थां, उधर दिदी कि तोँ आँखें हि बंद हौ गई,, वोँ औऱ अधिक अपने बूब्स कों जानबूझकर कर मेरे बाजू पऱ दबाते हुए अपनी जांघों कों ज़ोर-तेज़ भिंचने लगी। उत्तेजना केँ मारे हम् दोनों केँ हि जिस्म गर्म होनेलगे थें। विद्यालय पहुँच दिदी नें साइकल सें उतरते हि मेरेगाल पऱ एक् किसकर दिया औऱ थैंकयू बोलकर भागती हुई अपनी क्लास रूम मे चली गयीँ,.
छुट्टी केँ बाद लौटते समयजब मैंने दिदी कों पूछा कि आपने थैंक्स क्यूं बोला थां, तौ बोलीं – अरे दोस्त टाइम पऱ विद्यालय पहुंचा दिया तूने इसकेलिए औऱ क्याँ। वैसे तुँ क्याँ समझा थां.?
मे – कुछ नहि, मे क्याँ समझूंगा? आज पहलीबार आपने थैंक्स बोला इसलिये पूछा। दिदी नज़र नीची करके स्माइल करनेलगी। घऱ लौटते समय भि ऐसा हि कुछ हमारे संगहुआ, बल्कि इससे भि आगे बढ़कर दिदी नें अपनी लेफ्ट बाजू मेरी जाँघ पऱ हि रखी थि औऱ अपने अल्प-विकसित उभारों कों मेरी बाजू सें रगड़-रगड़ कर स्वयं भि उत्तेजित होतीरही औऱ मुझे भि बेहाल कर दिया.
अब यह हमारा रोज़ कां हि रूटिन सां बन गय़ा थां, दिन मे एक् बारकम सें कम मे भाभी कां चुम्मा लेता, बदले मे वोँ भि मेरेगाल काटकर अपने होंठों सें सहला देती, कभी-कभी तोँ मे अपनासर याँ गाल याँ फिन मुँह उनके स्तनों पर्र रखकर रगड़ देता। दूसरी तरफ दिदी औऱ मे भि दिनों दिन मस्ती-मज़ाक मे बढ़ते हि जारहे थें, मगर सीमा मे रहकर.ऐसे हि मस्ती मज़ाक मे दिन गुज़रते चलेगये, औऱ यहसाल बीत गय़ा, मे अबनयी क्लास मे आँ गय़ा थां, दिदी 12थ मे पहुँच गई,, यहसाल हम् दोनों कां हि बोर्ड थां, सो शुरुआत सें हि पढ़ाई पऱ फोकस करना शुरुआत कर दिया.उधर बड़े भैया कां बी.एड कंप्लीट होने कों थां, घऱ मे खर्चे भि कंट्रोल मे होने शुरुआत हौ गये थें क्योंकि बड़े भैया कि पढ़ाई कां खर्चा तोँ अब नहि रहा थां, औऱ आने वालेकुछ महीनों मे अब वोँ भि नौकरी करने वाले थें। हम् दोनों भइया-बेहन नें भाभी सें जुगाड़ लगाकर एक् व्हीकल लेने केँ लिए पहले भैया केँ कानों तक बात पहुँचाई औऱ फिन हम् सभी नें मिलकर बाबूजी कों भि कन्विन्स कर लिया, जिसमें छोटे भैया कां भि सपोर्ट रहा.अब घऱ केँ सब सदस्यों कि बात टालना भि बाबूजी केँ लिए संभव नहि थां, ऐसा नहि थां कि उनको पैसों कां कोई प्राब्लम थां, मगर एक् डर थां कि मे व्हीकल मैनेज कर पाऊंगा याँ नहि? सबके रिक्वेस्ट करने पर्र वोँ मानगये औऱ उन्होंने एक् बिना गियर कि टू वीलर दिलवा दि, अब हम् दोनों भइया-बेहन समय सें विद्यालय पहुँच जाते थें.
दिदी नें भि चलाना सीख लिया तोँ कभी मे लेँ जाता औऱ कभी वोँ, जब मे चलाता तोँ वोँ मेरे सें चिपककर बैठती औऱ अपने विकसित होँ रहे बूब्स कों मेरीपीठ सें सहला देती.जब वोँ चलती तोँ जानबूझ कर अपने हिप्स मेरेआगे रगड़ देती, जिससे मेरा पप्पू बेचारा पैंट मे टाइट होँ जाता औऱ कुछ औऱ नां पतादेख मन मसोसकर रह जाता, मगर दिदी उसे अच्छे सें फील करके गर्म होँ जाती.ऐसे हि कुछ महीने औऱ निकलगये, इतने मे बड़े भैया कों भि एक् इंटर कालेज मे लेक्चरर कि नौकरी मिल गई,, मगरशहर मे हि जिससे उनकेघऱ आने केँ रूटिन मे कोई तबदीली नहि हुई। इसबार विद्यालय मे एनुअल स्पोर्टस डे मानने कां आदेशआया थां, रूरल एरिया कां विद्यालय थां सोसब देहाती टाइप केँ देशीगेम होने थें, जैसे खो-खो, कबड्डी, लोंगजंप, हाइजंप। लड़कियों केँ लिए अंताक्षरी, म्यूज़िक, डांस। मेरी बॉडी अपने क्लास केँ हिसाब सें बहोत अच्छी थि, सो स्पोर्ट्स टीचर नें मेरे बिना पूछे हि मेरानाम स्पोर्ट्स केँ लिएलिख लिया, औऱ सबसे प्रॅक्टीस कराई, जिसमें मेरा कबड्डी औऱ लोंगजंप मे अच्छा प्रदर्शन रहा औऱ मे उन दोनों खेलों केँ लिए सेलेक्ट कर लिया। सारेदिन खेलते रहने कि वजह सें जिस्म तक केँ चूर हौ रहा थां, पहले सें कभीकुछ खेलता नहि थां, तोँ थकान ज्यादा महसूस हौ रही थि। विद्यालय सें लौटते हि मैंने बैग एक् तरफ कों पटका औऱ बिना चेंजकिए हि आँगन मे पड़ी चारपाई पर्र पसर गय़ा। सारे कपड़े पसीने औऱ मिट्टी सें गंदे होँ रखे थें। थोड़ी हि देर मे मेरी झपकीलग गई,, जब भाभी नें आकर मुझेइस हालत मे देखा तोँ वोँ मेरेबगल मे आकरबैठ गयीँ,, औऱ मेरे बालों मे उंगलियाँ फिराते हुए मुझे आवाज़ दि.
मैंने आँखें खोलकर उनकीतरफ देखा तौ वोँ बोलि – क्याँ हुआ, आज ऐसेआते हि पड़गये, नाँ कपड़े चेंजकिए, औऱ देखो तौ क्याँ हालतबना रखी हैं कपड़ों कि। बैग भि ऐसे हि उल्टा पड़ा हैं। किसी सें कुश्ती करकेआए होँ?
मैंने कहा नहि भाभी, असल मे आज विद्यालय मे स्पोर्टस डे केँ लिएगेम हुए, औऱ मेरादो खेलों केँ लिए सेलेक्शन होँ गय़ा हैं। सारेदिन खेलते-खेलते शरीरटूट रहा हैं, कभी खेलता नहि हूं नाँ। इसलिये। प्लीज़ थोड़ी देर सोनेदो नां भाभी.
अरे! यह तौ बहोत अच्छी बात हैं, मगरऐसे मे केसे नींद आँ सकती हैं, जिस्म मे कीटाणु लगेहुए हें, चलोउठो ! पहलेनहा केँ फ्रेश हौ जाओ, कुछ खापीलो, फिन देख्ना अपनी भाभी केँ हाथों कां जादू, केसेबदन कि थकान छूमंतर करती हूं। चलो, अब उठो.
औऱ उन्होंने जबरनहाथ सें पकड़कर मुझे खड़ाकर दिया, औऱ पीठ पऱ हाथरख कर पीछे सें धकेलते हुए बाथरूम मे भेज दिया।
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 5
बीते एक् साल मे मोहिनी कां शरीर पहले सें भर गय़ा थां, उसके बूब्स भि अब ज्यादा बड़े-बड़े दिखने लगे थें, कूल्हों कां उठानअब साड़ी मे साफ-साफ दिखता थां। कुल मिलकर अब मोहिनी भाभी एकदम कड़कमाल होतीजा रही थि। संडे केँ संडेराम भैया अपनी प्यारी पत्नि यानी मोहिनी भाभी कि अच्छे सें सर्विस जौ कर जाते थें। फ्रेश होकर मुझे भाभी नें बादाम वालादूध दिया औऱ संग मे कुछ बिस्किट वगैरह देदिए, मैंने कहा भाभी इनसे क्याँ होगा, मुझे तोँ खानां खानां हैं, तौ उन्होंने प्रेम सें झिड़कते हुएकहा – नहि आज सें इस वक्त तुम् खानां नहि खाओगे, खानां मे विद्यालय केँ लिएरख दिया करूँगी, तोँ रिसेस मे खा लिया करना, घऱ आकरबस हल्का फुल्का औऱ खानां सीधेरात कों हि। अब तुम्हें मे गबरू जवान मर्दबना केँ छोड़ूँगी। मे चाहती हूं मेरा देवर जी अपने पूरे परिवार मे सबसे अधिक ताक़तवर हौ। जब सीनातान करचले तोँ लगे मानोकोई शेर आँ रहा हौ.
मैंने हँसते हुएकहा क्यूं भाभी बेवजह मुझे चढ़ारही होँ.
तौ भाभी बोलि – तुम् इसे मज़ाक समझरहे होँ। चलोअब छत पऱ। तुम्हारे जिस्म कि मालिश करनी हैं फिन देख्ना कैसा तुम्हारी थकान कोसों दूर खड़ी दिखेगी.
हम् दोनों छत पऱ आँ गये, हमारे आधे पोर्षन पऱ दो-मंज़िला बनाहुआ थां, वाकई हमारे अलावा आस-पास किसी कां इतना उँचा घर-मकान नहि थां। देहात केँ दूसरे छोर पऱ सिर्फ़ प्रधान कां हि घऱ हमारे सें उँचा थां, मगर बहोत दूर थां वोँ हमसे.ऊपर दो बड़े कमरे औऱ उनकेआगे एक् बरामदा, इस सबकी एक् कंबाइंड छत काफ़ी लंबी चौड़ी थि, जोँ चारों तरफ 2.5 फीट उँची बाउंड्री सें कवर कि हुई थि.
भाभी नें एक् बिछावन नीचे डाला औऱ मुझे अपनी बनियान उतारकर उसपर लेटने कों कहा, नीचे मे बस एक् बरमूडा हि पहनेहुए थां। भाभी नें अपनी साड़ी केँ पल्लू कों दुपट्टा कि तरह अपने सीने पर्र कसकर लपेटा औऱ उसेपीठ पर्र सें लातेहुए अपनीकमर मे खोंस लिया, कसे हुए ब्लाउज औऱ साड़ी केँ बाहर् सें हि उनके सुडौल बूब्स एकदमउभर कर बाहर् कों निकलआए। वोँ मेरे बाजू मे उकड़ू बैठ गई,, अपनेसंग लाई एक् कटोरी जिसमें गुनगुना सरसों कां तेल थां उसे मेरेसर पासरख दिया, फिन अपने हाथों मे ढेर सारातेल लें कर मेरे सीने औऱ कंधों कि मालिश करनेलगी। भाभी केँ गोरे रसीले हाथ मेरे जिस्म पर्र उपर-नीचे हौ रहे थें, उनकी एक् साइड कि मांसल जाँघ मेरीकमर सें रगड़रही थि, जब वोँ ऊपर कों आती तोँ जाँघ केँ संग-संग उनकेपेट कां हिस्सा भि मेरे जिस्म सें रगड़ जाता.
मे अपनी आँखें बंदकिए हुएयह सभीफील कररहा थां, औऱ आरामसे एक् अजीब सि उत्तेजना मेरे जिस्म मे भरतीजा रही थि। सीने औऱ कंधों कि मालिश केँ बाद भाभी थोडा नीचे कि तरफ हुईँ औऱ अब उनकी जांघों कां एहसास मुझे अपनी जाँघ केँ निचले भाग पर्र हुआ, अब भाभी मेरेपेट औऱ उसके साइड कि मालिश करनेलगी। जब उनकेहाथ मेरे दूसरी साइड कि मालिश करते तौ उन्हें ज्यादा झुकना पड़ता जिससे उनकापेट मेरेकमर सें टच होता। नां चाहते हुए भि मेरे बरमूडा मे उभार सां बनाने लगा.फिन उन्होंने मेरे पैरों कि तरफ रुख़ किया औऱ पांव केँ पंजों सें शुरुआत करतेहुए भाभीऊपर कि तरफआने लगी, घुटनो केँ ऊपर उनके हाथों कों फील करते हि मेरी उत्तेजना औऱ बढ़ने लगी औऱ मेरी लन्ड कड़क हौ गय़ा.
भाभी केँ हाथ जांघों कि मालिश करतेहुए ऊपर औऱ ऊपर कि तरफआते जारहे मैंने हल्के सें अपनी आँखें खोलकर देखा तोँ मालिश करतेहुए उनकी नज़र मेरे उभार पर्र हि टिकी हुईँ थि औऱ मंद-मंद मुस्करा रही थि। अब भाभी नें मुझे पलटने केँ लिएकहा- तोँ मे अपनेपेट केँ बललेट गय़ा। उन्होंने अपनी साड़ी कों घुटनों तक चढ़ाया औऱ मेरेऊपर दोनों तरफ कों पांव करके अपने घुटनो पर्र बैठ गई,। लाख कोशिशों केँ बावजूद भि जब वोँ मालिश करतेहुए हाथ अपनीतरफ करती तौ उनके गद्दे जैसे रसीले नितंब मेरीकमर सें टच हौ जाते, फिन वोँ जैसे-जैसे नीचे कों खिसकती गई, अब उनके मोटे-मोटे चूतड़ मेरी गांड केँ ऊपर थें। जब वोँ अपना दबाव मेरेऊपर डालती तोँ मेरी नीचे कड़ी हुइ लन्ड जोँ छाती सें दबी हुइ थि औऱ ज्यादा फूलने लगी, मारे उत्तेजना केँ मेरे मुँह सें सिसकी निकलने लगी.
भाभीमन हि मन हँसते हुए बोलि – क्याँ हुआ अंकुश जी.कोई प्राब्लम हैं.?
अब मे उनको क्याँ बताऊँ कि मुझे क्याँ प्राब्लम हैं? फिन भि मैंने उनकोकहा – अहह। भाभी अपनावजन मतरखो, मुझेदुख रहा हैं.
भाभी – कहां दुखरहा हैं… ?
मे – अरे समझाकरो भाभी, आप् भि नाँ! मेरीकमर मे औऱ कहां…
भाभी – ओह्ह्ह। तौ मालिश बंदकर दूँ.?
मे – नहि ! मगर थोडा वजनकम रखो नाँ प्लीज़…
फिन भाभी थोडा नीचे कों मेरी जांघों केँ ऊपरबैठ गयीँ, तोँ मुझेकुछ राहत मिली, मगर अब उन्हें मेरे कंधों तक पहुँचने मे ज्यादा झुकना पड़रहा थां तौ भाभी कि बुर मेरी गांड सें रगड़ खानेलगी। उन्हें अब औऱ अधिकमजा आनेलगा औऱ मालिश केँ बहाने औऱ तेज-तेज हाथ चलाने लगी, कुछ देरबाद हि भाभी अपनी बुर कों मेरी गांड सें चिपका कर हाथों कों मेरीपीठ पर्र टिकाए अकड़कर बैठ गयीँ, औऱ कुछदेर ऐसे हि शांत बैठीरही। मैंने सर घुमाकर पीछे देखने कि कोशिश कि तोँ भाभी नें अपने हाथों कां दबाव मेरीपीठ पऱ औऱ बढ़ा दिया जिसके कारण मे देख नहि पाया कि भाभीऐसे क्यूं शांत बैठी हें?
मालिश करने केँ बादजब भाभी मेरेऊपर सें उठ गई, तोँ मे कुछदेर यूँ हि उलटा पड़ारहा, क्योंकि मे अपने उभार कों दिखाना नहि चाहता थां। वाकई मे मेरेबदन कि अकड़न एक् दमचली गई, थि, भाभी बिनाकुछ कहे अपने कपड़े ठीक करके नीचेचली गयीँ, औऱ मे वहीं पड़े-पड़े नींद मे डूबता चला गय़ा.
अब भाभी रोज़ सुभह 5 बजे मुझेजगा देती, औऱ फ्रेश होकर कसरत करवाती, वही देसीदंड बैठक औऱ कुछ देसी एक्सरसाइज। उसकेबाद नहाना-धोना, विद्यालय केँ लिए तैयार होने केँ बाद एक् लीटर बादाम कां दूध पिलाती। विद्यालय मे भि रोज़ गेम्स कि प्रैक्टिस होती, फिन साम कों मालिश, भाभी कि मस्तियाँ बढ़ती जारही थि, मगर एक् अनदेखी दीवार थि जोँ हम् दोनों कों रोकेहुए थि अपनी हदेंपार करने सें। दूसरी ओररमा दिदी भि मौका निकाल हि लेतीमौज मस्ती कां। अबउन दोनों केँ संग क्याँ होता थां, मुझे नहि पता, मगर ऐसे मौकों पर्र मेराहाल बेहाल हौ जाता थां, औऱ कुछकर भि नहि सकता थां, क्योंकि यहीपता नहि थां कि करूँ तौ क्याँ?
स्पोर्टस डे तक मेराबदन भाभी कि मालिश, खेलों कि प्रैक्टिस औऱ कसरतों कि वजह सें एक् दम पत्थर जैसा हौ चुका थां। लॉन्ग जम्प मे, मे अपने विद्यालय मे सबसेआगे थां, औऱ कबड्डी मे भि मेरीवजह सें हमारी क्लास केँ आगे 12 क्लास कि भि टीमहार जाती थि। फाइनल डे कों जोँ होना थां वहीहुआ, लास्ट मे कुश्ती कि प्रतियोगिता भि हुई, जिसमें मैंने हिस्सा तौ नहि लिया थां, मगर 11 क्लास कां एक् लड़का जोँ चैंपियन हौ गय़ा थां पास केँ हि देहात कां, वोँ घमंड मे आँ गय़ा औऱ उसने पूरे विद्यालय केँ बच्चों मे ओपन चैलैंज कर दिया.
टीचर्स कों उसकीयह बात बुरीलगी, तोँ प्रिन्सिपल नें अपनीतरफ सें बड़ा सां इनाम घोषित करके बोले-सब बच्चों सुनो, तुम् लोगों मे सें जोँ भि बच्चा इस लड़के कों हरा देगाउसे मे अपनीतरफ सें पचास हज़ार इनाम दूँगा.
जबकोई आगे नहि आया तोँ मेरे क्लास टीचर बोले – क्यूं अंकुश तुम् भि नहि लड़ सकते इससे?
मे – नहि सर ! मुझे कुश्ती लड़ने कां कोई आईडिया नहि हैं, औऱ नां हि मे लड़ना चाहता हूं.
क्लास टीचर मेरेपास आए औऱ धीमी आवाज़ मे बोले- मे जानता हूं तुम्हारे अंदर इससे बहोत ज्यादा ताक़त हैं, बस इसके पैरों पऱ नज़र रखना औऱ अपना बचाव करते रहना.जब यह थकनेलगे तभी उठाकर पटक देना। देखोयह अपने विद्यालय कि इज़्ज़त कां प्रश्न हैं, यह लड़का इतनी बदतमीजी सें सभी कों चैलैंज कररहा हैं, औऱ अब तोँ अपने प्रिन्सिपल साहब कि भि इज़्ज़त दाँव पऱ लग गई, हैं.
मैंने कहाठीक हैं सरअगर आप् चाहते हें तोँ मे कोशिश अवश्य करूँगा। उन्होंने फिन अपनीतरफ सें हि अनाउन्स कर दिया कि इससे अंकुश लड़ेगा। फिन हम् दोनों मे कुश्ती हुईँ, वोँ दाँवपेच मे माहिर थां, मगर ताक़त मे मेरे मुकाबले बहोत कम, तौ जैसे मेरे टीचर नें बोला थां मे कुछदेर उसकेदाव बचाता रहा, फिन एक् बार फुर्ती सें मे उसके पीछेआया औऱ उसकीकमर मे लपेटा मारकर दे मारा ज़मीन पऱ। मगर सालाहवा मे हि पलटीखा गय़ा औऱ चित्त नहि हुआ, अब मे उसकेऊपर सवार थां औऱ उसको चित्त करने कि कोशिश करनेलगा। जबउसे लगा कि अब वोँ ज्यादा देर तक मेरे सामने नहि टिक पाएगा, तोँ उसने अपनी मुट्ठी मे रेत भरकर मेरी आँखों मे मार दि। मे बिल-बिलाकर उसे छोड़कर अपनी आँखों पऱ हाथरख कर चीखने लगा, मौकादेख कर वोँ मेरे पीछेआया औऱ मेरीकमर मे लपेटा लगाकर मुझे उठाना चाहरहा थां। मैच रेफरी फ़ाउल प्ले कां विस्सल बजारहा थां मगर उसने उसकी नहि सुनी। जैसे हि उसने मुझे उठाने कि कोशिश कि मैंने अपनी एक् टाँग उसकी टाँग मे अड़ा दि औऱ ताक़त लगाकर मैंने उसके हाथों सें अपने कों आज़ाद किया, औऱ पलटकर एक् हाथ उसकी गर्दन मे लपेटा। मैंने बंद आँखों सें हि उसकी गर्दन कों कस दिया। उसने अपनी गर्दन छुड़ाने कि लाख कोशिश कि मगरटस सें मस नहि हुइ, आखिरकार उसकी साँसें फूलने लगी औऱ रेफ़री नें आकरउसे मेरी गिरफ़्त सें छुड़ा लिया.कोई मेरेलिए पानी लेँ आया थां तौ मैंने मिट्टी कों धोने केँ बाद अपनी आँखों मे पानी मारा, आँखें खुलने तोँ लगीमगर सुर्ख लाल हौ चुकी थि। जब मेरी नज़र उसपर पड़ी तोँ अभि भि वोँ ज़ोर-ज़ोर सें साँसें लें रहा थां औऱ मुझेखा जाने वाली नज़रों सें ताड़रहा थां.
प्रिन्सिपल नें मुझेजीत कां इनामदे दिया। मुझे जल्दी डॉक्टर कों दिखाया औऱ दवा डलवाकर औऱ अपना इनाम लेकर हम् घऱलौट आए। बाहर् चौपाल पऱ हि बाबूजी बैठे थें, उन्होंने मेरी आँखें देखकर पुछ लिया तोँ दिदी नें उन्हें सारीबात बता दि। उन्होंने मुझे शाबासी दि औऱ अपनेगले सें लगा लिया। मेरे हाथों मे ट्रॉफी देखकर भाभी फूली नहि समाई, औऱ उन्होंने मुझे अपने सीने सें कस लिया, उनकी आँखें डब-डबा गयीँ,। मैंने कारण पूछा तौ भाभी बोलीं – आज मे अपनी ज़िम्मेदारियों मे पास होँ गयीँ,, इससे अधिक मेरेलिए औऱ क्याँ खुशी कि बात होँ सकती हैं, मां जी नें जिस विश्वास सें तुम्हारा हाथ मेरे हाथों मे सौंपा थां उसमें मे कितना सफल हुईँ हूं यह मुझेइस ट्रॉफी केँ रूप मे दिखरहा हैं.
बाबूजी दरवाजे केँ पीछे सें यह सारी बातें सुनरहे थें, उनसे भि रहा नहि गय़ा औऱ अंदरआते हुए बोले-सच कहाबहू तुमने, आज तुम्हारे कारण मेरा बेटा यहसभी कर पाया हैं। शायद विमला भि इतना नहि कर पाती जितना तुमने इन बच्चों केँ लिए किया हैं। पापा कि आवाज़ सुनकर भाभी नें झट सें अपनेसर पर्र पल्लू डाला औऱ उनकेपेर पड़ गयीँ,.
जुग-जुग जियो मेरी बच्ची, तुमने साबित कर दिया कि तुम्हारे संस्कार कितने महान हें, इतनेकम उमर मे तुमने इसघऱ कों इतने अच्छे सें संभाला हैं। मे हर रोज़ ईश्वर कां कोटि-कोटि शुक्रिया करता हूं, कि उन्होंने हमें एक् दुख केँ बदले तुम्हारे रूप मे इतनी बड़ी सौगात दि हैं.
जीतीरहो बेटा, औऱ अपनेघऱ कों इसीतरह सजाती संवारती रहो। इतनाबोल अपनी भीगी आँखें पोंछते हुए बाबूजी बाहर् चलेगये.
ऐसी हि कुछ खट्टी मीठी, यादों केँ सहारे, आपस मे मौज मस्ती करतेहुए वक्त अपनीगति सें बढ़ता रहा, औऱ देखते-देखते हमारे एग्जाम कि डेट भि आँ गई। हम् दोनों बेहन भइया पढ़ाई मे जुटगये, हम् दोनों देररात तक जागकर पढ़ते रहते, बीच-बीच मे आकर भाभी देखने आँ जाती कि किसी चीज़ कि ज़रूरत तोँ नहि हैं। दोनों बड़े भइया भि बीच-बीच मे घऱआते औऱ हमें अपने एग्जाम केँ एक्सपीरियेन्सस शेयर करके एनकरेज करते.
एक् दिन पढ़ते-पढ़ते मे थक गय़ा, तोँ बिस्तर पर्र लंबा होकर पढ़ने लगा, नां जानेकब मेरीआँख लग गयीँ, औऱ अपने सीने पर्र खुलीबुक रखकर गहरी नींद मे सो गय़ा.
पढ़ते-पढ़ते रमा दिदी जबबोर होनेलगी, रात काफ़ी होँ गई, थि, आँखों मे नींद कि खुमारी आनेलगी थि, अपनी किताबें उसने टेबल पर्र रखी.जब उसकी नज़र अपने छोटे भइया पर्र पड़ी, तोँ उसके चेहरे पर्र मुस्कान आँ गई,। कुछदेर वोँ अपने भइया केँ मासूम चेहरे कों देखती रही, जौ सोतेहुए किसी मासूम सें बच्चे कि तरहलग रहा थां। उसने धीरे-धीरे सें उसके हाथों केँ बीच सें उसकीबुक निकाली औऱ टेबल पऱ रख दि। कुछसोच कर एक् शरारत उसके चेहरे पर्र उभरी औऱ लाइटऑफ करके वोँ उसकेबगल मे लेट गई,। छोटूपीठ केँ बल सीधा लेटाहुआ थां, उसके दोनों हाथ उसके सीने पर्र थें, रमाकुछ देर दूसरी ओर करवटलिए पड़ीरही फिन उसकामन नहि माना तोँ वोँ अपने भइया कि तरफपलट गई,.
अपने एक् बाजू कों वीशेप मे मोड़कर अपनेगाल केँ नीचे टिकाया औऱ अपनेसर कों उँचा करके उसने छोटू केँ चेहरे कों देखा, वोँ अभि भि बेसुध सोयाहुआ थां। रमा थोड़ी सि उसकीतरफ खिसकी औऱ हल्के सें उसने अपनेबदन कों अपने भइया सें सटा लिया, औऱ अपनीऊपर वाली टाँग उठाकर छोटू केँ ठीक जांघों केँ जोड़ केँ ऊपररख लिया.कुछ देर वोँ यूं हि पड़ीरही, फिन वोँ अपनी टाँग कों उसके बरमूडा केँ ऊपर रगड़ने लगी.
उसकी टाँग कि रगड़ सें छोटू कि लन्ड जौ अब एक् मस्त लन्ड होतीजा रही थि, आरामसे अपनी औकात मे आनेलगा। उसके लौड़े कां साइज़ फूलता देखरमा दिदी कुछसहम सि गई, औऱ उसने अपनी टाँग कि घिसाई बंदकर दि। मगरकुछ देर तक भि छोटू केँ जिस्म मे कोई हलचल नहि हुईँ, तौ उसकी हिम्मत औऱ बढ़ी औऱ उसने उसकेहाथ कों अपने सीने पऱ रख लिया औऱ ऊपर सें अपनाहाथ रखकर अपने रसीले कच्चे अमरूदों पर्र रगड़ने लगी। छोटू केँ हाथ कों अपने अमरूदों पऱ फीलकर केँ वोँ अपनी आँखें बंद करके मुँह सें हल्की-हल्की सिसकियाँ लेनेलगी। जैसे-जैसे उसकी उत्तेजना बढ़ती जारही थि, उसकी झिझक, उसकी लज्जा, भइया-बेहन वाला बंधनसभी सिसकियों केँ माध्यम सें बाहर् होतेजा रहे थें.
उसकाबदन अब मनमाने तरीक़े सें थिरकने लगा, औऱ अबरमा दिदी उसकेहाथ केँ संग-संग अपनी प्यारी दुलारी बुर कों अपने भइया कि जाँघ सें सटाकर उपर नीचे कों होनेलगी। छोटू कों नींद मे किसी दूसरे जिस्म कि गर्मी कां एहसास हुआ तौ उसकी नींदखुल गई,, एक् बार उसने अपनी बेहन कि तरफ देखा औऱ उसनेफिन सें अपनी आँखें कसकरबंद करली औऱ अंकुश भि मजा लेनेलगा। रमा दिदी कि पजामी अब थोड़ी गीली होनेलगी थि, उसके गीलेपन कां एहसास उसकी नंगी जाँघ पर्र हौ रहा थां.
अबरमा दिदी नें उसकाहाथ अपनी गीली बुर केँ ऊपररख दिया औऱ उसे मसलवाने लगी। थोड़ी देर तक अपनी बेहन केँ हाथ केँ इशारे सें हि वोँ उसकी गीली बुर कों सहलाता रहा, फिन अचानक अपनी उंगली मोड़कर उसकी बुर जोँ मात्र पजामी मे हि थि, केँ ऊपर सें हि कुरेदने लगा.रमा उत्तेजना केँ आवेग मे सभीकुछ भूल गई, औऱ उसेयह भि एहसास नहि रहा कि उसके भइया कि उंगली उसकी गीली बुर कों कुरेद रही हैं, वोँ बस अपनीबंद आँखों सें नीची आवाज़ मे आहें भरनेलगी अपनेकमर कों तेज़ी सें हिलाए जारही थि। एक् संग हि उसका पूरा जिस्म इतनी ज़ोर सें आकड़ा औऱ उसने छोटू केँ हाथ कों बुरीतरह सें अपनी गीली बुर केँ ऊपरदबा दिया औऱ उससे चिपक गयीँ,। दो मिनिट तक वोँ ऐसे हि चिपकी रही, फिन जब उसका ओर्गास्म हौ गय़ा तबउसे होशआया औऱ वोँ उससेअलग होकरलेट गयीँ,.
कुछदेर पहलेहुए इवेंट्स कों जब उसने अपने दिमाग़ मे रीवाइंड कियातब उसे ध्यान आया कि केसे उसके भइया कि उंगली उसकी बुर मे घुसीजा रही थि। झट सें उसके दिमाग़ नें झटका खाया, कि यहसभी उसने नींद मे नहि किया हैं.
तोँ क्याँ वोँ जागरहा थां.??
उसने डरी-डरी आँखों सें एक् बारफिन अपने भइया कि तरफ देखा, औऱ जबउसे उसीतरह सोताहुआ पाया तौ उसने अपने दिमाग़ कों झटक दिया औऱ मन हि मन फ़ैसला भि सुना दिया कि ऐसाकुछ भि नहि हुआ, अंकुश तोँ सोरहा हैं, औऱ अपनेमन कों तसल्ली देकर वोँ भि अपने पलंग पर्र जाकरलेट गयीँ,, औऱ कुछ हि देर मे नींद नें उसे अपने आगोश मे लेँ लिया.
सुभह मे जल्दउठ गय़ा थां, फ्रेश-व्रेश होकर भाभी रसोई मे थि, उन्होंने मुझेगरम चाय दि बाबूजी कों देने केँ लिए, मैंने बाहर् जाकर बाबूजी कों गरमचाय दि, उन्होंने मुझे अपनेपास बिठाया औऱ मेरेसर पर्र हाथ फेरते हुए मुझे एग्जाम कि तैयारियों केँ बारे मे पूछा.फिन उनका खालीकप लेकर रसोई मे रखा, औऱ आँगन मे आकर चारपाई पर्र बैठ गय़ा.
थोड़ी देर मे दिदी भि फ्रेश होकर बाथरूम सें निकली, मैंने उन्हें गुडमॉर्निंग विश किया। उन्होंने बड़ी बारीकी सें मेरे चेहरे कों देखाजब मेरे चेहरे पर्र उन्हें सामान्य सें हि भाव दिखे तौ मुस्कराते हुए उन्होंने मेरेविश कां जवाब दिया औऱ मेरे माथे पर्र एक् किस करके मेरेपास बैठ गई,। हम् दोनों नें संग मे ब्रेकफास्ट किया, कुछ देर भाभी केँ संग हँसी ठिठोली कि औऱ फिनबैठ गये पढ़ाई करने। हमारे बोर्ड एग्जाम खतम हौ चुके थें औऱ समर वेकेशन चलरहा थां। आगे दिदी कां ग्रेजुएशन करने कां विचार थां, मगर बाबूजी उन्हें शहर भेजना नहि चाहते थें, तोँ प्राइवेट करने कां फ़ैसला लिया.
बड़े भैया शहर मे रहकर नौकरी कररहे थें, औऱ हर सैटरडे कि सामघऱ आते, मंडे अर्ली मॉर्निंग निकल जाते। नौकरी केँ संग-संग बड़े भैया नें पोस्ट ग्रेजुएशन भि शुरुआत कर दिया थां, आगे उनका प्लान पीएचडी करके प्रोफेसर बनाने कां थां। कभी-कभी मंझले भैया भि आँ जाते थें औऱ अब वोँ ग्रेजुएशन केँ फाइनल ईयर मे आने वाले थें। जबरमा दिदी केँ प्राइवेट ग्रेजुएशन करने कि बातचली, तौ मैंने भैया कों सुझाव दिया कि क्यूं नाँ भाभी कों भि फॉर्म भरवा दियाजाए, वोँ भि ग्रेजुएशन कर लेंगी। बाबूजी समेतसभी मेरीतरफ देखने लगे, भाभी तोँ मेरीओर बलिहारी नज़रों सें देखरही थि। दोनों भाइयों नें कुछदेर बाद मेरीबात कां समर्थन किया, अब सिर्फ़ पापा केँ जवाब कि इंतजार थि। सभी कि नज़रें उनकी हि तरफ थि.
बाबूजी – तुम् क्याँ कहती हौ बहू.? क्याँ तुम् आगे पढ़ना चाहती हौ.?
भाभी नें घूँघट मे सें हि अपनासर हां मे हिला दिया। तौ बाबूजी नें मुझे अपनेपास आने कां इशारा किया.
मे डरतेहुए उनकेपास गय़ा। उन्होंने मेरे माथे पर्र एक् किस किया औऱ बोले – मेरा बेटा अब समझदार होँ गय़ा हैं। हैं नाँ बहू! जुग-जुग जियो मेरे बच्चे। मे तौ चाहता हूं कि शिक्षा कां अधिकार समानरूप सें सभी कों मिले.यही बात मैंने अपने भाइयों कों भि समझाने कि कोशिश कि मगरतब उनकीसमझ मे मेरीबात नहि आई, मगर अब वोँ भि अपने बच्चों कों पढ़ा-लिखा रहे.चलो देर सें हि सही शिक्षा कां महत्व समझ तोँ आया उनकी.
भाभी कां मन गद-गद हौ रहा थां, जैसा हि अकेले मे उन्हें मौका मिला, अपने सीने सें भींच लिया मुझे औऱ मेरे चेहरे पऱ चुम्बनों कि झड़ीलगा दि.
थैंकयू अंकुश डिअर, तुमने मेरेदिल कि बातसभी केँ सामने कहकर मुझेबिन मोल खरीद लिया.आगे पढ़ने कि मेरी कितनी ख्वाहिश थि, मगर जल्द विवाह होने सें मन कि मन मे हि रह गयीँ,। उसदिन केँ बाद भाभी कां झुकाव मेरीतरफ औऱ ज्यादा होँ गय़ा, औऱ वोँ हर संभव मुझे ज्यादा सें ज़्यादा खुशी देने कि कोशिश करती। एक् दिनसब भइयाघऱ पर्र हि थें, बाबूजी बाहर् चौपाल पऱ बैठे, लोगों केँ संगगप सड़ाके मे लगे थें, कि अचानक भाभी कां जी मिचलाने लगा औऱ वोँ सिंक मे जाकर उल्टियाँ करनेलगी। अबघऱ मे औऱ कोई बुजुर्ग स्त्री होती तोँ वोँ उनकी तकलीफ़ कों समझती। आनन फानन मे बड़े भैया नें उनको स्कूटी पर्र बिठाया औऱ कस्बे मे डॉक्टर कों दिखाने चलदिए। नां जाने क्याँ हुआ होगा, यह सोचकर मे भि अपनी साइकल जोँ काफ़ी दिनों सें कम यूज़ हौ रही थि, उठाई औऱ उनके पीछे-पीछे चल पड़ा.
डॉक्टर नें उनका चेकअप किया औऱ भैया सें बोले- बधाई होँ राम, तुम् बाप बनाने वाले होँ.
भैया कि खुशी कां ठिकाना नहि रहा, फिन डॉक्टर कि फीस देकर वोँ बोले- छोटू तुँ अपनी भाभी कों लेकरघऱ चल मे साइकल सें आता हूं, कुछ मिठाई-विठाई लेकर.
रास्ते मे मैंने भाभी कों छेड़ा – क्यूं भाभी बधाई हौ, अब तौ आप् मां बनोगी। मगर अपने बच्चे कि खुशी मे अपनेइस नालायक देवरु कों मतभूल जानां.
वोँ मेरीपीठ पर्र अपनागाल सटाकर मुझसे लिपट गई, औऱ बोलीं- तुम् मेरे बच्चे नहि होँ.? जौ मे भूल जाऊंगी.! हां? आइंदा ऐसीबात भि मत करना। वरना मे तुमसे कभीबात नहि करूँगी… समझे…
मे – अरे भाभी! मे तौ मज़ाक कररहा थां। क्याँ मुझेपता नहि हैं कि आप् मुझसे कितना प्रेम करती हें.
ऐसी हि बातें करते-करते हम् घऱ आँ गये.जब घऱ पऱ सभी कों यह खुशख़बरी सुनाई तोँ सभी खुशी सें नाचने लगे.घऱ मे उत्सव जैसा माहौल बन गय़ा थां, भैया नें पूरे देहात मे मिठाई बँटवाई, हमारे पूरे परिवार नें मिलकर हमारी इस खुशी मे संग दिया.
भाभी अपनेघऱ जारही थि। पता नहि मेरेमन मे दोतरह केँ भाव क्यूं आँ रहे थें, बोले तोँ डबल माइंड। एक् तौ इसबात कि खुशी थि कि भाभी इतने सालों मे अपनेघऱ जारही थि, दूसरा उनसे इतने सालों बाद बिछड़ना होँ रहा थां। सच कहूँ तौ मुझे उनकीआदत सि होँ गयीँ, थि, तोँ उनके जाने केँ वक्तकुछ दुःखी सां होँ गय़ा। जिसे भाभी नें घूर लिया औऱ मुझे अकेले मे लेँ जाकर समझाने लगी.
अंकुश क्याँ हुआ.? मेरे जाने सें खुश नहि होँ.?
मे – नहि भाभी, आपको इतने सालों बाद अपनेघऱ जाने कां मौका मिला हैं, मे भला क्यूं खुश नहि होऊँगा.?
वोँ – (मेरेगाल पकड़ते हुए), तोँ फिनऐसे मुँह क्यूं लटकारखा हैं.?
मे – पता नहि भाभी एक् तरफ तोँ आपके जाने कि खुशी भि हैं कि चलो इतने दिनों बाद आपको अपनेघऱ जाने कां मौकामिल रहा हैं, दूसरी ओरऐसा लगरहा हैं जैसे मेरे अंदर सें कोई चीज़ निकलकर आपकेसंग जारही होँ, औऱ मे खाली सां होताजा रहा हूं.
भाभीकुछ देर शांत खड़ी मेरे चेहरे कों देखती रही.फिन अचानक उनकी पलकें भीग गयीँ,, औऱ रुँधे स्वर मे बोलीं – यह मेरे प्रति तुम्हारा लगाव हैं, जौ स्वाभाविक हैं औऱ ऐसा नहि कि यह स्थिति मात्र तुम्हारी हि हैं। मेरा भि कुछऐसा हि हाल हैं। तुम्हारी भावना तोँ सिर्फ मेरेलिए हि हें तब इतनादुख होँ रहा हैं, मगर मेरा तौ पूरेघऱ केँ संग हैं तौ सोचो मेरा क्याँ हाल हौ रहा होगा?फिन भि अगर तुम् नहि चाहते कि मे नाँ जाऊं तोँ नहि जाऊंगी.
मे – नहीं.नहीं.! भाभी प्लीज़ आप् मेरीवजह सें अपनी खुशी कुर्बान मत करिए, दो महीने कि हि तोँ बात हैं.
भाभीचली गयीँ, औऱ मे अपनाजी कड़ा करके उन्हें बस स्टॉप तक विदा करकेआया। मन्झ्ले भैया कां यह फाइनल ईयर थां, उन्होंने डिसाइड किया थां कि वोँ इससाल केँ पीसीएस केँ एग्जाम मे बैठेंगे। बड़े भैया कि भि यही सलाह थि जिस पऱ पापा कों भि कोई आपत्ति नहि थि.
हम् बेहन भइया कि रास्ते कि मस्तियाँ बंद हौ गई, थि, मगरघऱ मे हम् एक् दूसरे कों छेड़ने कां मौका निकाल लेते थें, अब इसमें रेखा दिदी भि शामिल होँ गयीँ, थि। एक् दिन दिदी मुझे गुदगुदाके भाग गयीँ,, औऱ दूर खड़ी अपनीजीभ निकाल कर चिढ़ा नें लगी तौ मे भि उनकीतरफ भागा…मगर वोँ मेरेहाथ नहि आँ रही थि.
फुर्रर इधर- तौ फुर्रर उधर, किसी तितली कि तरफ निकल जाती, एक् दोबार हाथआई भि तौ झुककर अपने कों छुड़ा लेती औऱ फिनदूर भाग जाती.यहा तक कि हम् दोनों कि साँसें उखाड़ने लगी.
अब यह मेरेलिए प्रेस्टीज इशू बनताजा रहा थां, मे उनको अधिक खुलेतौर पर्र टीज़ नहि करना चाहता थां, मगर उनकेमन मे पता नहि क्याँ चलरहा थां, मे जैसे हि जानेदो सोच केँ खड़ा होता तौ वोँ थोडा दूर सें मुझे अंगूठा दिखा केँ जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती। मैंने ठान लिया कि अब इनकोसबक सीखा केँ हि रहूँगा। इस वक्त हम् अपने लंबे-चौड़े आँगन मे हि थें।
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 6
अबयह मेरेलिए प्रेस्टीज इशू बनताजा रहा थां, मे रमा दिदी कों ज्यादा खुलेतौर पर्र टीज़ नहि करना चाहता थां, मगर उनकेमन मे पता नहि क्याँ चलरहा थां, मे जैसे हि जानेदो सोच केँ खड़ा होता तौ वोँ थोडा दूर सें मुझे अंगूठा दिखा केँ जीभ निकाल कर चिढ़ाने लगती
मैंने ठान लिया कि अब इनकोसबक सीखा केँ हि रहूँगा। इस टाइम हम् अपने लंबे-चौड़े आँगन मे हि थें। मैंने एक् लंबी सि छलांग लगाई औऱ इससे पहले कि रमा दिदी संभाल करभाग पाती मैंने पीछे सें उनकीकमर मे लपेटा मार दिया। वोँ नीचे कों झुकती चली गयीँ,, मे उनकेऊपर थां। पीठ मेरे सीने सें सटी हुई थि, मैंने उनको अपनी बाजुओं मे कसकरउठा लिया.रमा दिदी खिल-खिला रही थि, औऱ मुझसे छोड़ने केँ लिए बोलती जारही थि। दिदी केँ हाथ मेरे हाथों केँ ऊपर थें, मगर उनसे वोँ मेरे हाथों पऱ दबाव डाले थि, उन्हें छुड़ाने कां कोई प्रयास नहि थां। मेरी लंबाई दिदी सें कुछ अधिक हि थि, उनकोऊपर उठाते हुए मेरेहाथ उनकेपेट सें सरककर थोडा ऊपर कों हौ गये औऱ उनके अमरूद केँ निचले हिस्से कों टच होनेलगे.
दिदी लगातार खिल-खिलाए जारही थि औऱ अपने हाथों सें मेरे हाथों कों औऱ ऊपर कों खिसकाने कि कोशिश कररही थि, अब उनकीकमर कां ऊपरी हिस्सा मेरेठीक लन्ड केँ सामने थां जौ कमर केँ दबाव सें फूलने लगा थां। दिदी नें अब अपने कों छुड़ाने केँ बहाने अपने कों औऱ झुकाया औऱ मेरी बाजुओं पर्र झूल गयीँ,, अपने दोनों पेरहवा मे उठालिए औऱ उन्हें मेरे घुटनों पर्र जमा लिया। उसकेबाद उन्होंने अपनीकमर कों औऱ ऊपर कि ओर उछाला, अब उनके गोल-मटोल चुतड़ों कि दरारठीक मेरे अकड़ चुके लन्ड केँ सामने थि, वोँ लगातार मुझसे छोड़ने केँ लिएबोल रही थि औऱ संग हि अपने गांड कों मेरे बाबू केँ ऊपर रगड़रही थि.
हम् दोनों केँ हि मुँहलाल पड़गये थें। अभि कुछ औऱ आगे होता उसके पहले बाहर् केँ दरवाजे सें एक् औऱ खिल-खिलाहट कि आवाज़ सुनाई दि। मैंने दिदी कों छोड़ दिया औऱ हम् दोनों नें हि पीछे मुड़कर देखा, दरवाजे पर्र आशा दिदी खड़ी ताली बजा-बजा कर हमारा खेल देखते हुएहंस रही थि.
आशा – वाउ ! भइया-बेहन अकेले-अकेले हि खेल मे लगे हौ। अरे भइया हमें भि शामिल करलो.
रमा– देखो नाँ दिदी, यह छोटू बहोत तंग करता हैं मुझे, ऐसा कसकर पकड़ लिया कि छोड़ हि नहि रहा थां.
मे – अच्छा मेरे गुदगुदी किसने कि थि हां!अब बताओ दिदी कों स्वयं शुरुआत करती हैं, औऱ दोष मेरेऊपर डालरही हैं.
आशा – अरेबस करो तुम् दोनों औऱ बताओकोई काम-वाम तौ नहि हैं तुम् दोनों कों.?
दोनों एक् संग – नहि ऐसा तोँ कोईकाम नहि हैं.
आशा – तौ चलो क्यूं नाँ हम् लोग खेतों मे चलें, वही बाग़ मे बैठकर खेलते हें, यहा कितनी गर्मी हैं.
मैंने कहा – हां दिदी चलो वहीं चलते हें। फिन हम् बाबूजी कों बताकर तीनों खेतों कि तरफचल दिए, जौ बसघऱ सें कोईआधा किमी कि दूरी पर्र हि थें.
हमारी लंबी चौड़ी ज़मीन थि, ज़मीन केँ करीब सेंटर मे 4 एकड़ कां आम औऱ अमरूद कां बाग थां, जिसमें औऱ भि आमला, बेर जैसे पेड़ थें, मगर मुख्य तौर पर्र आम औऱ अमरूद हि थें। बगीचे केँ चारों तरफ केँ हिस्से बराबर-बराबर खेत चारों भाइयों मे बँटेहुए थें। देहात कि तरफ कां हमारा हिस्सा थां, औऱ उसकेठीक अपोजिट आशा दिदी केँ खेत थें, चारों कि ज़मीन कि सिंचाई हमारे हि ट्यूबवेल सें होती थि। यह सीज़न आमों कां थां, मगर कच्चे आमलगे थें, पकने मे अभि कम सें कम एक् महीना औऱ लगने वाला थां.
हम् तीनों आम केँ बगीचे मे जहाँघने पेड़ थें उनके नीचे एक् चादर बिछाकर बैठगये, औऱ कार्ड्स खेलने लगे। गर्मियों कि चिलचिलाती दोपहरी मे घऱ सें ज्यादा यहा राहत थि, वैसे तोँ हवा ज्यादा नहि थि, फिन भि जब भि हवा कां झोंका आता, तोँ बड़ी ठंडक पहुँचती उस तमतमाति गर्मी मे.
कार्ड खेलते हमारी पूरी दोपहरी निकल गयीँ,, 3 बजेरमा दिदी बोलीं, दोस्त अबचलो, बोर हौ गये खेलते-खेलते। तभीआशा दिदी बोलीं चलोठीक हैं, मगरकुछ आम लें लेते हें, साम कों चटनी बनाने केँ काम आएँगे.
आशा दिदी बोलीं – छोटू तुँ ट्राइ करनाकुछ आम तोड़ने कि। तौ मे उचककर कुछ नीचे कि तरफ लटके आमों कों तोड़ने कि कोशिश करनेलगा, मगर काफ़ी कोशिश करने पर्र भि उन तक पहुँच नहि पाया। दोनों दिदी मिट्टी केँ ढेले उठाकर आमों कों निशाना लगाकर तोड़ने कि कोशिश करनेलगी, मगर निशाना नहि लगपारहा थां औऱ एक्-आध लगा भि तौ कच्चे आम मिट्टी केँ ढेलों सें नहि टूटपाए.
आशा – छोटू दोस्त ! तुँ घोड़ा बनजाए तौ तेरेऊपर चढ़कर मे याँ रमा पहुँच सकती हें आमों तक। मे अपने घुटने टेककर घोड़ा बन गय़ा, पहलेरमा दिदी नें कोशिश कियामगर वोँ नहि पहुँच पाई, फिन आशा दिदी नें भि कोशिश किया, उनकावजन थोडा ज्यादा थां, मगर मैंने उनको भि सहनकर लिया, मगर नतीजा वोँ हि ढाक केँ तीनपात.
आशा दिदी बोलि, दोस्त! यह तोँ बात नहि बनरही, तुँ पेड़ पऱ चढ़के नहि तोड़ सकता क्याँ? अब मे आज तक किसी पेड़ पर्र नहि चढ़ा थां, तोँ मैंने मनाकर दिया.
फिन वोँ बोलीं – तोँ एक् कामकर, मुझे उचकादे। मे तोड़ लूँगी.
मैंने रमा दिदी कि ओर देखा, तौ वोँ मन हि मन मुस्करा रही थि, मगर प्रत्यक्ष मे कुछ नहि बोलीं, मुझेचुप रहतेहुए वोँ फिन बोलि- अरे उचका नां बिंदास, सोच क्याँ रहा हैं। तूँ भि नां… !
मैंने आशा दिदी कों जैसे हि पीछे सें पकड़ने कि कोशिश कि तौ वोँ पलट गई, औऱ बोलि – आगे सें उठा, जिससे तुम्हे भि दिखे कि औऱ कितना ऊपर करना हैं.
मैंने थोडा झुककर उनकी जांघों कों अपने बाजुओं मे लपेटा औऱ ऊपर कों उठाया। इस पोज़िशन मे उनकी बुर मेरेकमर सें थोडा ऊपर मानेपेट पऱ थां औऱ उनके बूब्स मेरे मुँह सें थोडा सां नीचे थें। उनकी मोटी मांसल जांघों केँ एहसास नें मेरे जिस्म मे झुरझुरी सि दौड़ा दि, भारी-भारी गोल रसीले चुचियों कां उपरीभाग मेरी ठोडी कों सहलारहा थां। दो-चार आम तौ उनकीहद मे आँ गये औऱ उन्होंने उन्हें तोड़ लिया, मगर औऱ भि तोड़ने केँ लिए अभि भि वोँ नहि पहुँच पारही थि.
आशा – छोटू! भइया औऱ थोडा ऊपरकर नाँ!
मैंने उन्हें औऱ 6-8” ऊपर किया तोँ मेरा मुँहठीक उनके बूब्स केँ बीच मे आँ गय़ा, मेरेगाल उनकी चुचियों पऱ थें.
अचानक उनके मुँह सें एक् हल्की सें सिसकी निकल गयीँ,। ईीीइसस्स्शह…सीईईईईईई., मैंने कहा- क्याँ हुआ दिदी.? तौ वोँ फ़ौरन बोलीं – कुछ नहि तूँ ऐसे हि पकड़े रहबस मे आम कों पकड़ने हि वाली हूं… अरेहिल मत…नां.!
मेरा मुँह औऱ नाक उनकी मोटी-मोटी चुचियों मे दबरहा थां, तोँ उसको थोडा इधर-उधर किया। इससे मेरीनाक उनकी चुचियों पऱ रगड़ने लगी। वोँ तौ आम तोड़ना भूलकर अपनी आँखें बंद करके मस्ती मे खो गई,.
मेरा भि नीचे तंबू बनताजा रहा थां, फिन अचानक रमा दिदी बोलीं – अरे दिदी ! तोडो नां आम जल्द उसको प्राब्लम हौ रही हैं, कब तक वोँ ऐसे उठाए खड़ा रहेगा.?
आशा – अरे तोड़ तौ रही हूं! छोटू ! भैया थोडा पीछे कों हौ नां ! यहचार आम थोड़े तेरे पीछे कों हें.
मे जैसे हि थोडा पीछे कों हुआ, मुझेपता नहि थां कि ज़मीन थोडा उबड़-खाबड़ हैं, मेरा पांव एक् गड्ढे मे चला गय़ा औऱ मे पीछे कों गिरने लगा। छोटूऊऊ….संभाअल। वोँ चिल्लाई मगर एक् बार बॅलेन्स क्याँ बिगड़ा कि धडाम सें मे पीछे कों गिर पड़ा.आशा दिदी मेरेउपर उनकी बुर मेरे आकड़े हुए लन्ड कों किसकर रही थि.
उसके 34” केँ दोनों उभार मेरे सीने मे दबे पड़े थें, उत्तेजना केँ कारण दिदी केँ निप्पल भि कड़े होकर मेरे सीने मे चुभन पैदाकर रहे थें। मेरे दोनों हाथ अभि भि उनकी मस्त गद्देदार गांड पर्र थें। मुझेपता नहि चला कि कही चोट-वोट भि लगी हैं, मे तोँ बस उनके मादक जिस्म केँ नीचे पड़ा उनकी आँखों मे झाँकरहा थां, जिसमें एक् निमंत्रण दिखाई दिया। वोँ भि ऐसे हि कुछदेर मज़े केँ आलम मे खोईरही। रमा दिदी पास मे खड़ी खिल-खिला रही थि.
फिन मुझे अपनीपीठ मे कुछ चुभता सां महसूस हुआ औऱ मैंने उनसेकहा- अरे दिदी ! उठो मेरीपीठ टूट गयीँ,.!
वोँ – तौ पहले तुँ मुझे छोड़ तौ सही, तभी तौ मे उठुँगी…! तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मेरे दोनों हाथ उसके चुतड़ों पर्र कसेहुए हें। जब मैंने उन्हें छोड़ा, तौ अपनी बुर कों मेरे लन्ड केँ ऊपर ज़ोर सें रगड़ा औऱ एक् मादक सिसकी भरती हुइ वोँ मेरेऊपर सें उठ गई,.
मे जैसे हि खड़ाहुआ तब मुझे अपनीपीठ मे दर्द कां एहसास हुआ। क्योंकि जहाँ मे गिरा थां, वहा एक् छोटा सां ब्रिक (ईंट) कां टुकड़ा पड़ाहुआ थां औऱ उस साले नें मेरीपीठ कों चटका दिया थां.
मे आहह-आहह भरतेहुए उठा… तोँ रमा दिदी बोलीं – क्याँ हुआ छोटू.?चोट लग गयीँ, क्याँ.?
मे – हां दिदी इस पत्थर सें मेरीपीठ टूट गई शायद, तौ आशा दिदी नें मेरी शर्टऊपर करके अपनेहाथ सें कुछदेर सहलाया औऱ बोलीं- रमाघऱ जाकर थोडा आयोडेक्स कि मालिश कर देनाठीक होँ जाएगा। इसीतरह कि चुहलबाज़ियों मे वक़्त व्यतीत होँ रहा थां, मेरी दोनों बहनें मेरेसंग दिनों दिन खुलती जारही थि औऱ मे उनकी हरकतों सें बुरीतरह उत्तेजित होँ जाता थां, मगरकुछ कर नहि पाता.
मैंने अभि तक अपने लौडे कों हाथ मे लेकर सिवाय मुताने केँ औऱ कोईउसे नहि किया थां। मन हि मन सोचता थां, कि काश इसकेआगे भि कुछकर पाता.मगर क्याँ? यहकोई आईडिया नहि थां। मेराकोई ऐसायार भि नहि थां जिससे मे इसतरह कि बातें शेयरकर पाता। वोँ दोनों तौ मुझे गर्म करके अपनाकाम निकाल कर अपने रास्ते होँ लेती औऱ मे यूँ हि चूतिया बनारह जाता.
आख़िरकार छुट्टियों केँ दिनबीत गये औऱ मैंने क्लास 11 मे एडमिशन लेँ लिया। विद्यालय शुरुआत होने केँ कुछदिन बाद हि मोहिनी भाभीलौट आई, मतलब बड़े भैया लेँ आए अपनी ससुराल जाकर। आखिर उनके भि तौ लौड़े मे खुजली होती हि होगी। भाभी नें आते हि मेरी क्लास लें ली, औऱ वोँ जोँ समय टेबलबना कर गई, थि, उसके बारे मे पूछा जिसे मे एक् आज्ञाकारी शिष्य कि तरह ईमानदारी सें पालनकर रहा थां। उन्होंने मुझेगले सें लगा लिया औऱ मेरा माथाचूम कर मुझे अपनीगोद मे लिटाया औऱ बीते दिनों कां सारा प्रेम उडेल दिया.
मे अकेला विद्यालय जाने वाला हि रह गय़ा थां, मंझले चाचा केँ बच्चे तौ अपने मामाजी केँ यहाशहर मे रहकरपढ़ रहे थें। औऱ मेरी दिदी समेत वाकी कि 12थ तक कि पढ़ाई पूरी होँ गयीँ, थि। भाभी कि प्रेग्नेन्सी कों जैसे-जैसे दिनबढ़ रहे थें, उनके जिस्म मे कुछ अधिक हि बदलाव दिखने लगे थें, उनके वक्ष औऱ कूल्हे एक् दम अपोजिट साइड कों बाहर् निकलते जारहे थें.
यही नहि, वोँ दिनों दिन बोल्ड भि होतीजा रही थि। एक् दिन मालिश करते-करते भाभी नें मेरी हालत बहोत खराबकर दि। नाँ जानेआज उनको क्याँ सूझी कि अपनी साड़ी उतारकर एक् तरफरख दि, औऱ केवल ब्लाउज औऱ पेटीकोट मे मेरे लौड़े केँ ऊपर अपनी उभरी हुइ गांड टिकाकर मेरे सीने पर्र मालिश करनेलगी। आगे-पीछे होतेहुए उनकी गांड मेरे लन्ड पर्र रगड़ा देरही थि, जिसकी वजह सें मेरे लन्ड महाराज बुरीतरह अकड़गये, फिन तौ उसकीऐसी रेलबनी कि पुछोमत.
उधर ब्लाउज मे कसे उनके बूब्स बिल्कुल मेरी आँखों केँ सामने थें जोँ झटकों केँ संग उछल-उछल कर बाहर् कों निकलने पऱ आमादा दिखाई देरहे थें। फिन भाभी मेरेऊपर हि पसर गयीँ, औऱ उन्होंने मेरे होंठ अपने होंठों मे भरलिए, मुझे बड़ा अजीबलगा कि यहकर क्याँ रही हें, जीवन मे पहलीबार किसी नें मेरे होंठों कों चूमा थां। यही नहि, वोँ अपनीकमर कों लगातार ज़ोर-तेज़ मेरे लन्ड पऱ घिसने लगी.
15 मिनिट मे उन्होंने मेरी हालत बैरंग कर दि, उनका मुँहलाल होँ गय़ा, जिस्म भट्टी कि तरहतप रहा थां, मानो बुखार चढ़ गय़ा होँ। फिन अचानक हि वोँ शांतपड़ गई, औऱ कुछदेर बाद मेरेऊपर सें उतरकर अपनी साड़ी उठाई औऱ नीचेभाग गयीँ,। मे बड़ा असमंजस मे पड़ गय़ा औऱ सोचने लगा कि शायद भाभी कों कहीं बुखार तोँ नहि आँ गय़ा, जिसकी वजह सें वोँ ऐसी हरकतकर रही थि। इधर मेरा बुराहाल थां, मेरामन कररहा थां, कि अपने लन्ड कों कच्छे सें बाहर् निकललूँ औऱ ज़ोर-ज़ोर सें हिलाऊँ, उसे सहलाऊँ…!
आखिरकार मैंने आज पहलीबार उसको बाहर् निकाल हि लिया औऱ ज़ोर-ज़ोर सें मसलने लगा.इधर जैसे हि मेरे लन्ड केँ टोपे कि खालऊपर कों खिंची, मुझे बेहद दर्द कां भि एहसास हुआ.मगर मनकरे कि तेज़ इसको रगड़ूं, मसलूं। अभि मे इसी कश्मकश मे थां कि क्याँ औऱ केसे करूँ कि अचानक भाभी कि आवाज़ सुनाई दि.
भाभी - अंकुश!। यह क्याँ हौ रहा हैं.?
मैंने गर्दन घुमाकर देखा, तोँ भाभी जीने कि सबसे उपरी सीढ़ी पर्र अपनीकमर पऱ हाथरखे खड़ी थि। मेरी तोँ गांड हि फट गई,, इधर मेरा लन्ड फुल अकड़ मे थां। मैंने झट सें उसे अपनेपेट कि तरफ लिटाया औऱ अपने शॉर्ट कों ऊपर कि तरह खींचकर एलास्टिक छोड़ दि। चटकककक! शॉर्ट कि टाइट एलास्टिक लन्ड केँ ठीक टोपे पर्र जहाँ उसकी स्किन कां जॉइंट थां वहा पड़ी। अरईईई….मैय्आआआआअ………मररर्र्र्र्र्र्र्ररर….गय्आआ…….रीईईईईईईईईईई। दर्द केँ मारे मेरी हालत पतली हौ गई, औऱ मे करवट लेतेहुए, अपने घुटनों कों पेट पर्र मोड़कर लोट-पोट होनेलगा…!
मुझे दर्द सें तड़पता देख भाभी दौड़कर मेरेपास आई, औऱ मेरेसर केँ पासबैठ, हाथ फेरते हुए बोलीं – क्याँ हुआ मेरे राजा मुन्ना कों, बताओ मुझे… क्याँ हुआ.?
मेरे मुँह सें कोई शब्द हि नहि निकलपा रहे थें। मे लगातार कभी करवट सें होँ जाता तोँ कभीपीठ केँ बल, मेरे घुटने मुड़े हि हुए थें। मेरी आँखों सें पानी निकलआया। तेज दर्द कि लहर मेरीजान हि निकाले देरही थि। भाभी मेरेसर कों लगातार सहलाए जारही थि औऱ बार-बार पूछने कि कोशिश कररही थि कि आख़िर मुझेहुआ क्याँ हैं.? जब थोडा दर्द मे राहत हुई औऱ मेरा चीखना कम होँ गय़ा तोँ उन्होंने फिन सें पूछा… देखो अंकुश मुझे बताओ… क्याँ हुआ हैं तुम्हें.?
आह्ह्ह्ह…। भाभी मेरेपेट मे बहोत तेज दर्द हैं… मैंने बात कों छिपाने कि कोशिश करतेहुए कहा। मे नहि चाहता थां कि भाभी कों पताचले कि मे क्याँ कररहा थां.?
भाभी – देखोझूठ मतकहो, … पेट दर्द मे कोईऐसा नहि बिलबिलाता हैं… सच-सच बताओ… शरमाओ नहीं… कहींकुछ बड़ी प्राब्लम हौ गयीँ, तौ लेने केँ देनेपड़ जाएँगे…
दरअसल उन्होंने मुझे वोँ करतेहुए तौ देख हि लिया थां, तोँ प्राब्लम भि कोईउसी सें रिलेटेड होगी। इसलिये वोँ जानना चाहती थि.
मे – नहि भाभीसच मे मेरेपेट मे हि दर्द हैं। मैंने फिन सें छिपाने कि कोशिश कि.
भाभी थोडा बनावटी क्रोध अपने चेहरे पर्र लाकर बोलि – अंकुश.! मुझे तुमसे यह उम्मीद नहि थि कि मुझसे तुम् कोईबात छिपाओगे…!
सच बताओ क्याँ बात हैं। कहींकुछ ज्यादा प्राब्लम होँ गयीँ, तोँ सभी मुझे हि दोष देंगे, कैसी भाभी हैं यह?बिन मम्मी केँ बच्चे कां ख्याल भि नहि रखसकी। क्याँ तुम् चाहते होँ कि तुम्हारी भाभी किसी सें बात करने लायक नां रहे?
अब मेरेपास सच बताने केँ अलावा औऱ कोई चारा नहि बचा थां… उन्होंने इमोशनली मुझे फँसा दिया थां। मेरा दर्द भि अबजा चुका थां तोँ मे उनकीगोद मे अपनासर रखकर बोला – भाभी मेरी सूसू मेरे शॉर्ट कि एलास्टिक सें दब गयीँ, थि। बस औऱ कुछ नहि.
भाभी – मगर तुम् ऐसा क्याँ कररहे थें जौ तुम्हारी सूसूदब गयीँ, ? औऱ इतनी ज़ोर सें केसेदबी कि इतना दर्दहुआ…?
मे – जानेदो नां भाभी.!अब सभीठीक हैं.!
भाभी – तोँ तुम् मुझे सच-सच नहि बताओगे। हां!कोई बात नहि, आज केँ बाद मेरे सें कभीबात मत करना औऱ उन्होंने मेरासर अपनीगोद सें उठा दिया औऱ उठकर जानेलगी। मैंने उनकाहाथ पकड़ लिया औऱ बोला – मे सभीसच बताता हूं। मगर प्लीज़ भाभी मुझसे नाराज़ मत हौ। वरना मे केसेजी पाऊंगा…?
उन्होंने लाड़ सें मुझे अपने सीने मे दबा लिया। उनके रसीले दूध मेरे मुँह पर्र दबगये। कुछदेर बाद उन्होंने मुझेअलग किया औऱ मेरा माथा चूमकर मेरीओर देखने लगी…!
मे – भाभीजब आप् मालिश कररही थि, तौ आपके चुतड़ों कि रगड़ सें मेरी सूसू अकड़ने लगी। मेरे अंदर उत्तेजना बढ़ने लगी जोँ निरंतर बढ़ती हि गई,। जब आप् उठकरचली गई, तौ लाख कोशिश केँ बाद भि मे अपने आप् कों रोक नां सका औऱ अपनी लन्ड कों बाहर् निकाल कर मसलने लगा.मगर आपकी आवाज़ सुनकर मैंने जल्दबाज़ी मे उसको छुपाना चाहा औऱ झटके सें एलास्टिक छूटकर उसकेऊपर लगी। भाभीकुछ देरचुप रही, औऱ मेरे मासूम चेहरे कि ओर देखती रही.फिन नाँ जाने क्याँ सोचकर वोँ मुस्कराने लगी औऱ मेरे नंगे जिस्म पर्र हाथ फेरते हुए बोलीं – लाओ दिखाओ तोँ मुझे… क्याँ हुआ हैं वहा…?
मैंने लज्जा सें अपने घुटने जोड़लिए ताकि भाभी कहीं जबरदस्ती मेरे शॉर्ट कों नाँ खींचदें औऱ बोला – नहि भाभीऐसा कुछ भि नहि हुआ हैं। अब दर्द भि नहि होँ रहा आप् रहनेदो.!
वोँ अपनी आँखें तरेरकर बोलीं – तुम् अभि बच्चे हौ, अभि दर्द नहि हैं तोँ इसका मतलबयह तोँ नहि हुआ कि सभीकुछ सही हैं, कही अंदरूनी चोट हुइ तौ बाद मे परेशान कर सकती हैं। देखोयह लज्जा छोड़ो औऱ मुझे देखने दो.फिन उन्होंने मुझे लिटा दिया औऱ मेरे शॉर्ट कों नीचे करनेलगी। मैंने एक् लास्ट कोशिश कि औऱ उनकेहाथ पकड़ लिया। उन्होंने एक् हाथ सें मेराहाथ हटा दिया औऱ मेरा शॉर्ट नीचे खिसका कर घुटनों तक कर दिया.
भाभी - हइई… दैयाआआआ। यह क्याँ हैं अंकुश…? मेरा लन्ड देखकर उनका मुँह खुला कां खुलारह गय़ा औऱ अपने खुले मुँह पर्र हाथरख कर वोँ कुछदेर तक। टक-टॅकी लगाए वोँ मेरे लन्ड कि सुंदरता कों देखती रह गई,.!
मे – क्यूं क्याँ हुआ भाभी…?यह मेरा सूसू हि तौ हैं…!
भाभी - हे ईश्वर.! तुम् इसे अभि भि सूसू हि समझरहे हौ.? यह तोँ पूरा मस्त हथियार होँ गय़ा हैं। फिन वोँ उसकीजड़ कों अपनी मुट्ठी मे पकड़कर इधर-उधर घुमा फिराकर देखने लगी.जब उन्होंने मेरे टोपे कि खाल कों पीछे करने कि कोशिश कि तोँ वोँ बस अपना घूँघट कि खोल पाया कि मुझे दर्द होनेलगा.
मे – अह्ह्ह्ह… भाभी नहि… खोलोमत… दर्द होता हैं.
जब भाभी नें सुपाड़े केँ पीछे देखा तोँ मेरीखाल केँ होल सें कोई आधा-पोना इंच नीचे हि जुड़ी हुई थि, जिसे खींचने पऱ दर्द होने लगता थां.
भाभी – अंकुश! तुम्हारा हथियार तोँ अभि तक कोरा हि हैं। कभीकुछ किया नहि इससे.?
मे – हां ! रोज़ हि करता हूं…। पेशाब.!
भाभी – खाली पेशाब?। औऱ कुछ नहि.?
मे – नहि.! औऱ भि कुछ होता हैं इससे.?
भाभी – हां अंकुश! औऱ बहोत कुछ होता हैं। मगर ताज्जुब हैं.! जब तुमने औऱ कुछ भि नहि किया हैं अब तक… तोँ फिनयह इतना लंबा औऱ मोटा केसे हौ गय़ा…?
मे क्याँ जानू… ? मैंने जवाब दिया तौ
भाभी बोलीं – तौ फिन अभि क्यूं हिलारहे थें.?
मे – सच कहूँ भाभी। आप् जब भि मालिश करती हौ औऱ आपका जिस्म इससे रगड़ा ख़ाता हैं… तौ मे इतना उत्तेजित होँ जाता हूं कि कुछ पुछोमत… औऱ जी करने लगता हैं कि इसकोमसल डालूं…, कुचलकर रखदूं। मगर दर्द कि वजह सें कुछकर नहि पाता….! पर्र आज आपनेइसे अधिक हि रगड़ दिया तौ मुझसे रहा नहि गय़ा औऱ वोँ करनेलगा…
मेरा लन्ड अभि भि ज्यों कां त्यों सोता सां एकदम 90 डिग्री पर्र खड़ा भाभी कि मुट्ठी मे क़ैद थां। उन्होंने उसको थोडा खोलकर उसके पेशाब वालेछेद कों अपनी उंगली सें सहला दिया औऱ बोलीं – तोँ अब कैसालग रहा हैं.?
मे – सीईईईई…। आहह-आहह। भाभीयह सभीमत करो… वरनायह फट जाएगा.
भाभी – तोँ इसको शांत केसे करोगे अब…?
मे – पता नहि भाभी इसके पहलेयह इतनाकभी नहि फूला थां। आज तोँ हद हि होँ गयीँ, हैं औऱ अब आपकाहाथ लगते हि तौ औऱ हालत खराब हौ रही हैं…अह्ह्ह्ह…प्लीज़ भाभीकुछ करो नां ! प्लीज़…… वरना मे कुछकर बैठूँगा…!
भाभी – अच्छा। अच्छा। शांतरहो। ! मे कुछ करती हूं, औऱ फिनउसे हिलाने लगी, धीरे धीरे बड़े एहतियात सें उसकोआगे पीछे करनेलगी ताकि उसकी स्किन अधिक नाँ खिंचजाए। मज़े मे मेरे मुँह सें आहह-आहह….उउउहह…औऱ जल्दीीई। ऐसी आवाज़ें निकलने लगी… औऱ वोँ उनकी मुट्ठी मे औऱ ज्यादा फूलने लगा… उसकी नसेंउभर आईं.
भाभी कि भि एक्साइटमेंट बढ़ने लगी, औऱ किसी सम्मोहन सि शक्ति उनके चेहरे कों मेरे लन्ड केँ नजदीक औऱ नजदीक खींचने लगी.अब भाभी कि गर्म साँसें मेरे लन्ड पऱ महसूस हौ रही थि। उत्तेजना मे मेरेकान तक लाल हौ गये थें। आखिरकार उनके होंठों नें मेरे अधखुले सुपाड़े कों छू हि लिया। उफफफफफफफफफफफ्फ़…… मे तौ जैसे स्वर्ग मे हि उड़ने लगा… उनके होंठों केँ स्पर्श होते हि मुझे एक् चैन सां मिला, औऱ उनके जूसी होंठ उसको अपनी क़ैद मे लेतेचले गये। देखते-देखते उनके होंठों नें मेरे पूरे 3” लंबे सुपाड़े कों जौ दहककर लाल शिमला केँ सेब जैसादिख रहा थां गडप्प कर लिया। एक् ठंड सि पड़ गई, मेरे लन्ड मे, जैसे किसी गर्म चीज़ कों एक् संग पानी मे डाल दिया होँ। उनकीजीभ मेरेपी होल पर्र गोल-गोल घूमरही थि। मजा केँ मारे मेरी आँखें बंद हौ चुकी थि औऱ कमर थरथराने लगी। भाभी मेरे लन्ड कों अंदर औऱ अंदर अपने मुँह मे लेतीजा रही थि, मगरखूब कोशिश करके वोँ उसे लगभगआधा हि लें पाई औऱ उतने पऱ हि अपने होंठों सें मालिश देनेलगी। भाभी मेरेबगल मे हि उकड़ू बैठी थि, लन्ड कों अंदर-बाहर् करते वक़्त उनके मस्त रसीले बूब्स मेरेपेट औऱ कमर पऱ रगड़खा रहे थें.
लन्ड कां जड़ वाला हिस्सा अभि भि भाभी कि मुट्ठी मे हि थां औऱ वोँ मुँह केँ संग-संग अपनेहाथ सें भि उसे मसलती जारही थि। 20-25 मिनिट कि चुसाई केँ बाद भि मेराकुछ नहि हुआ तौ भाभी नें अपना मुँह हटाया औऱ मेरीओर देखकर बोलि – कुछहुआ कि नहि…?
मे – बहोत अच्छा लगरहा हैं भाभी… प्लीज़ रूकोमत ऐसे हि करतीरहो.!
भाभी – तुम्हें तोँ मजा आँ रहा हैं। मगर मेरा तौ मुँह दुखने लगा, औऱ तुम्हारा माल अभि तक नहि निकला.
फिन वोँ मेरीकमर केँ नीचे कि साइड मे आकरबैठ गई, औऱ फिन सें अपने मुँह मे लेकर चूसने लगी, अब संग-संग उनकी उंगलियाँ मेरे टट्टों सें खेलरही थि। मेरा तोँ मजा हि दुगना होँ गय़ा औऱ मे अपनीकमर उचका-उचका कर उनके मुँह मे लन्ड पेलने कि कोशिश करनेलगा। अब भाभी जल्द सें जल्द मेरा पानी निकालना चाहती थि, क्योंकि उनका मुँह दर्द करनेलगा थां, बीच-बीच मे वोँ अपना एक् हाथ अपनी बुर केँ पास लें जाती औऱ ऊपर सें उसको सहला देती.अब वोँ मेरे टट्टों औऱ गांड केँ होल केँ बीच कि स्थान पऱ नाख़ून सें खुरचने लगी.ऐसा करने सें मेरेउस स्थान पऱ करंट जैसालगा औऱ मुझेउस स्थान सें कुछ उठता सां महसूस होनेलगा.
मैंने भाभी केँ सर पर्र हाथरखा औऱ तेज़-तेज़ अपनीकमर उचकाकर अपना ज्यादा सें ज्यादा लन्ड उनके मुँह मे ठूंस दिया उनकागला चोक होँ गय़ा, मे दनादन धक्के मारकर उनकेसर कों दबाएहुए थां। वोँ मेरे हाथों कों हटाने कि जी तोड़ कोशिश कररही थि, मगरअब मे अपने होश-हवास खो चुका थां, फिनकुछ ऐसाहुआ मानो मेरे टट्टों सें कोई बिजली सि दौड़ती हुईँ मेरे लन्ड मे प्रवेश कररही हौ औऱ मे उनकासर अपने लन्ड पर्र कसकर पिचकारी छोड़ने लगा। मुझेलगा जैसेकोई गर्म लावा जैसा मेरे लन्ड सें निकलकर भाभी केँ मुँह मे भररहा हौ। दो मिनिट तक देदना दन पिचकारी मारने केँ बाद मैंने अपनाहाथ उनकेसर सें हटाया औऱ अपनीकमर कों फर्श पर्र लैंडकरा दिया….!!
झट सें उन्होंने अपनासर ऊपर किया। फलफला करढेर सारी मलाई जैसी उनके मुँह सें निकलकर मेरेपेट पऱ गिरी, उनका मुँहलाल सुर्ख होँ रहा थां। वोँ खांसने लगी, फिन भागते हुएछत पर्र लगेनल सें पानी लेकर मुँहसाफ किया.
मे बैठकर उन्हें हि देखरहा थां, मुँहसाफ करके वोँ वापस लौटी औऱ एक् प्रेम भरीधौल मेरीपीठ पऱ जमाई औऱ बोलि – जंगली कहीं केँ! मेरीदम निकालना चाहते थें.? हां!.पता हैं! मेरी साँसें बंद होनेलगी थि.
मे – सॉरी भाभी वोँ मे … मुझे…होश हि नहि रहा…
भाभी मुस्करा केँ बोलि… मे समझ सकती हूं। अच्छा यह बताओअब कैसालग रहा हैं। कुछ हल्का फीलहुआ याँ नहि?
मे – हां भाभी! थैंक्स! अब मेरी उत्तेजना कुछकम हौ गयीँ, हैं.
भाभी – मगर तुम्हारा यह हथियार तोँ ज्यों कां त्यों खड़ा हैं, जाओ बाथरूम मे जाकरकुछ देर इसपर ठंडा पानीडाल लो.
आज पहलीबार मुझेपता चला कि लन्ड सें पेशाब केँ अलावा औऱ भि कुछ निकलता हैं, जोँ इतनामजा देता हैं। अब तोँ मे अपनेहाथ सें भि उस मज़े कों लेने कि कोशिश करनेलगा, मगर वोँ मजा नहि मिला जोँ भाभी केँ चूसने सें मिला थां। फिन एक् दिन बाथरूम मे खड़ा मे अपने लन्ड कों सहलारहा थां कि भाभी नें देख लिया औऱ वोँ डाँट पिलाई कि पुछोमत.
जब मैंने कारण पूछा तौ वोँ समझाने लगी – अंकुश देखोयह रोज़-रोज़ कि आदतमत लगाओ.ठीक नहि हैं, इससे तुम्हारा बदन कमजोर होने लगेगा, होँ सकता हैं कोई बीमारी भि लगजाए। कभी-कभी कर लेने मे कोई बुराई नहि हैं, पऱ हाथ सें नहि। हाथ सें करने कों मूठ मारना बोलते हें औऱ लिमिट सें ज्यादा मूठ मारने सें इसकी (लिंग) नसें कमजोर पड़ जाती हें., यहा तक कि व्यक्ति नामर्द भि हौ जाते हें, औऱ विवाह केँ बाद वोँ किसीकाम केँ नहि रह पाते.
मैंने पूछा कि भाभी तौ औऱ कौन-कौन सें तरीके हें उसमजा कों लेने केँ?
तौ वोँ मुस्कराईं औऱ बोलि – अंकुश तुम् तौ आज हि सभीकुछ जानना चाहते होँ.! फिनकुछ सोचकर वोँ बोलि – उसदिन मैंने जिसतरह सें तुम्हें रिलीस किया थां उसकोमुख मैथुन (ब्लोजॉब) कहते हें। असल मे तोँ वोँ भि सही तरीका नहि हैं.
मे – तोँ सही तरीका क्याँ हैं, भाभी…?
भाभी – मर्द औऱ स्त्री केँ बीच संभोग हि सही तरीका होता हैं, जौ प्राकृतिक माना जाता हैं। मगर उसकेलिए अभि तुम्हारी उमर नहि हुइ हैं, तुम्हारे लिंग कि स्किन जोँ जुड़ी हुईँ हैं नां वोँ भि तभीअलग होगीजब तुम् किसी केँ संगयह सभी करोगे मगर गलती सें भि किसी केँ संगऐसे वैसे संबंध बनाने कि कोशिश भि मत करना… वरना…! मुझसे बुराकोई नहि होगा.!जब भि वोँ वक़्त आएगा, मे स्वयं तुम्हारी सहायता करूँगी.
मेरे अपरिपक्व दिमाग़ मे कुछ पल्ले पड़ाकुछ नहि, पर्र मे इतना अवश्य समझ गय़ा, कि भाभी मेरीसभी जायज़, नाजायज़ ज़रूरतों कां ख्याल रखती हें, औऱ जबजिस काम कि ज़रूरत होगी वोँ अवश्य करेंगी। मे अपनी पढ़ाई मे जुट गय़ा। टाइम निकलता रहा, भाभी कि प्रेग्नेन्सी कां वक़्त नजदीक आताजा रहा थां, अब उनकापेट काफ़ी बड़ा हौ गय़ा थां। मे उनकेपेट पर्र हाथ फेरकर उनको चिढ़ाया करता, कभी उनकेपेट पर्र कान लगाकर बच्चे सें बात करता। छोटी चाची, टाइम-टाइम पऱ भाभी कि देखभाल कर देती.
आखिरकार वोँ वक़्त आँ गय़ा औऱ भाभी नें एक् प्यारी सि गुड़िया कों जन्म दिया.सब बहोत खुश थें उस नन्ही परी केँ आने सें जिसका नाम मैंने रूचिरखा.
कुछ दिनों बाद मेरे एग्जाम भि होँ गये, औऱ अब मे एक् बारफिन बोर्ड कि क्लास मे पहुँच गय़ा थां। उधर कृष्णा भैया नें ग्रेजुएशन केँ फाइनल केँ संग पी.सि.एस। केँ एग्जाम भि देदिए थें, औऱ उनका सेलेक्शन होना करीब-करीब तय थां। रमा दिदी नें फर्स्ट ईयर प्राइवेट सें क्लियर कर लिया थां, मगर प्रेग्नेन्सी कि वजह सें भाभी एग्जाम नहि देपाई, जिसका उनको मलाल थां। मगर वोँ जीवन केँ अहम एग्जाम मे तौ पास होँ हि चुकी थि। कुछ दिनो केँ बाद मँझले भैया कां पी.सि.एस। कां रिज़ल्ट आँ गय़ा, रैंक केँ हिसाब सें उनको डीएसपी कि पोस्ट केँ लिए सेलेक्ट किया गय़ा थां, अब उन्हें कुछ महीनों केँ लिए ट्रेनिंग पऱ जानां थां। मेराइस साल बोर्ड थां, सब कों मेरे भविष्य कि चिंता थि, सो विद्यालय केँ पहलेदिन सें हि सभी कां अटेन्षन मेरेऊपर हि थां.
उसदिन संडे थां, दोनों बड़े भइया भि घऱआएहुए थें, कल मंझले भैया कों ट्रेनिंग केँ लिए निकलना थां, घऱ मे थोडा मिलबैठ कर खाने कां प्रोग्राम रखा थां। हमारे परिवार मे मेरेयहा हि मिक्सर थां, जौ बड़े भैया कि विवाह मे आया थां, औऱ इस टाइम वोँ छोटी चाची केँ यहा थां, वोँ किसीकाम केँ लिए लेँ गयीँ, थि उसे। वैसे तौ चाची कों भि हमारे घऱ हि आनां थां, मगर थोडा काम जल्द होँ जाए तोँ भाभी नें मुझेकहा – अंकुश! छोटी चाची केँ यहा सें अपना मिक्सर तौ लादो ज़रा, कुछ नारियल वग़ैरह कि चटनी भि बना लेंगे.
छोटे चाचा कां घऱ भि बगल मे हि थां, उन्होंने अपने हिस्से मे अपनी ज़रूरत केँ हि हिसाब सें दो कमरे औऱ एक् छोटा सां रसोईमेन गेट केँ संग हि बनारखे थें, बाकी कि ज़मीन मे ऊँची सि बाउंड्री सें कवरकर रखा थां। बाउंड्री कि पीछे कि दीवार पर्र छप्पर डालकर गाय-भैंस केँ लिए स्थान कररखी थि उसी केँ संग मे चारा काटने कि मशीनलगा रखी थि जोँ एक् सिंगल फेज़ कि मोटर सें चल जाती थि.
मे चाची केँ घऱ पहुंचा तौ उनकागेट अंदर सें बंद थां, मैंने गेट खटखटाया, तोँ अंदर सें चाची कि आवाज़ आई…कौन हैं…?
मे हूं चाची… मैंने जवाब दिया तौ वोँ बोलि – रूको अंकुश, अभि गेट खोलती हूं.
थोड़ी देरबाद जैसे हि गेट खुला, सामने चाची कों देखकर मेरी आँखें फटीरह गयीँ, … मुँह खुला कां खुलारह गय़ा औऱ मे फटी आँखों सें उन्हें देखता हि रह गय़ा…। सामने चाची केवल एक् पेटीकोट मे जौ उनकी पहाड़ कि चोटियों जैसी चुचियों पर्र सिर्फ़ लपेटा हुआ थां औऱ वोँ उसे एक् हाथ सें पकड़े हुए थि, वही पेटीकोट नीचे उनके घुटनों सें भि 2”-3” ऊपर तक हि आँ रहा थां औऱ उनकी गोल-गोल खंबे जैसी मांसल जांघें दिखाई देरही थि। गेट खोलते हि वोँ मुझेदेख क मुस्कराईं औऱ बोलीं:
आओ छोटू.! औऱ इतनाकह करपलट गयीँ,। अब उनकी हाहाकारी गांड मेरी आँखों केँ सामने थि। उनकी गांड पीछे कों इतनी उभरी हुइ थि कि, कमर केँ कटाव पर्र अगरकोई तौलिया रख दियाजाए तौ गारंटीड वोँ गिर नहि सकता.ऊपर सें आगे कों खिंचा हुआ पेटीकोट। लगता थां गांड केँ प्रेशर सें कहींफट नां जाए…कसे हुए पेटीकोट मे उनकी गांडऐसी लगरही थि मानोदो बड़े वाले तरबूज स्लिम हौ रहेहों… दोनों केँ बीच कि दरार तरबूजों कि कसावट कि वजह सें बहोत हि कम दिखाई दि मुझे.
चाची अपनी तरबूजों कों मटकाते हुए अपने बाथरूम कि ओरचल दि जोँ रसोई केँ साइड सें केवल 3 फीट कि तीनतरफ सें ओट सि लगाकर नहाने-धोने केँ लिएबना रखा थां। उनके मटकते हुए कूल्हे ऐसेलग रहे थें, मानो एक् दूसरे सें शर्तलगा रहेहों… “कि मे बड़ा कि तुँ.?” अब रहने वालेदो हि तोँ प्राणी थें., विवाह केँ 10 सालबाद भि इतनी उपजाऊ ज़मीन सें भि चाचा कोईफसल नहि काटपाए थें। चाची कि इसजान मारु गांड कों देखकर मेरा लन्ड फड़कने लगा.अब कुछदिन पहलेऐसा कुछहुआ होता तोँ शायद मेरेलिए यह नॉर्मल बात होती, मगर अब भाभी नें मेरेनाग सें जहर निकाल करयहजता दिया थां, कि नारी कां जिस्म क्याँ, क्यूं औऱ किसलिए होता हैं.?
वोँ अपनी लन्ड फाड़ू गांड कों मटकाते हुए बाथरूम कि ओर बढ़ते हुए बोलि – औऱ बताओ अंकुश, केसे आनांहुआ.?
मे हड़बड़ा कर बोला – वोँ चाची… वोँ.वोँ। भाभी नें। वोँ मिक्सर लाने केँ लिए बोला हैं…
चाची – अच्छा हां ! तुम् थोड़ी देर बैठो। उसकेजार कों साफ करना हैं अभि। मे थोडा नहा लेती हूं। उसकेबाद साफ करके दूँगी.
मे वहीं आँगन मे पड़ी चारपाई पर्र पांव लटकाकर बैठ गय़ा, औऱ कनखियों सें उनके बाथरूम कि तरफ देखने लगा। चाची बैठकर नहारही थि, उनकेसर केँ बाल मुझेदिख रहे थें। वोँ मुझसे बातें भि करतीजा रही थि नहाने केँ संग-संग। लगभग 10 मिनिट मे हि उनका नहाना हौ गय़ा औऱ वहीँ पर्र रखे उनके दूसरे पेटीकोट कों उन्होंने बैठे-बैठे हि उठाया औऱ अपनेसर केँ ऊपर सें अपनेबदन पऱ डाल लिया, फिन वहींरखी ब्रा उठाई औऱ उसे पहनने लगी.
मे अभि भि चोर नज़रों सें उधर हि देखरहा थां। अचानक वोँ उठ खड़ी हुई, उनका पेटीकोट ठीक वैसे हि थां जौ नहाने सें पहले वाला थां। उनकीकमर सें ऊपर कां हिस्सा मुझेदिख रहा थां.
उन्होंने मुझे आवाज़ दि – ओ अंकुश! ज़राइधर तोँ आनां.
मे उठकर उनकेपास पहुंचा, इस वक़्त उनके गीले शरीर सें वोँ पेटीकोट भि स्थान-स्थान गीला होकर उनके शरीर सें चिपका हुआ थां। गीले कपड़े सें उनके जिस्म कां रंग तक झलकरहा थां। उन्होंने पेटीकोट केँ ऊपर सें हि वोँ ब्रा जिसकी स्ट्रिप्स अपने कंधों पऱ चढ़ाकर आगे अपने स्तनों पऱ पकड़रखी थि, औऱ उसकी पट्टियाँ जिनको पीछे लेजाकर हुक करते हें, वोँ साइड्स सें झूलरही थीं.
मे उनकेठीक पीछेजा खड़ाहुआ औऱ बोला – जी चाची। बताइए क्याँ काम हैं.?
चाची – अरे अंकुश ! देखो नां यह मेरी ब्रा थोड़ी टाइट हौ गई, हैं, बहोत कोशिश कि मगर मे अपनेहाथ सें इसकेहुक नहि लगापा रही, थोडा तुम् लगादो नां!
मैंने उनके दोनों ओरझूल रही ब्रा केँ स्ट्रैप्स कों पकड़ा। तोँ मेरेहाथ उनके गीले नंगे कांख सें टच हौ गये। मेरे लन्ड नें एक् फिन ठुमका मारा.!फिन उन्होंने पेटीकोट कों ब्रा केँ नीचे सें निकाल कर हाथों मे पकड़ लिया औऱ उसकोकमर मे बाँधने केँ लिए अपनी नाभि जौ किसी बोरिंग केँ गड्ढे कि तरहदिख रही थि… तक लें गयीँ,, अब एक् हाथ उनकाआगे दोनों चोटियों केँ ऊपर सें ब्रा कों थामे थां, औऱ दूसरे मे पेटीकोट पकड़ा हुआ थां…। मैंने दोनों तरफ कि स्ट्रैप कों खींचकर पीछे उनकीपीठ पऱ लाया। मेरी दोनों हथेलियाँ चाची कि नंगीपीठ पऱ आहिस्ता फिसलरही थीं…
नां जानेयह कैसी उत्तेजना थि मेरे जिस्म मे कि मेरेहाथ काँपने लगे….
ब्रा वाकई मे कुछ ज्यादा हि टाइट थि, उनकेहुक केँ होल जोँ धागे केँ बनेहुए थें, उनमें हुक डालने मे मुझे बड़ी दिक्कत आँ रही थि…
अरे ! खड़े-खड़े क्याँ कररहे हौ अंकुश, जल्द डालो नाँ। चाची कि आवाज़ सुनकर मेरेहाथ औऱ अधिक काँपने लगे….
मैंने स्ट्रैप कों औऱ थोडा खींचकर उनकेहोल केँ मुँह तक हुक लाकर छोड़दिए। चाची कों लगा कि अब तोँ हुकलग हि जाएगा, सो उनका वोँ हाथ जोँ ब्रा कों आगे सें संभाले हुए थां, वोँ भि अब पेटीकोट केँ नाडे कों बाँधने केँ लिए नीचेकर लिया थां.! जैसे हि मैंने हुक कों उसकेहोल मे छोड़ा, वोँ सालाहोल मे जाने कि बजाय बाहर् सें हि स्लिप हौ गय़ा… नतीजा… चाची कि ब्रा किसी स्प्रिंग लगे गुड्डे कि तरहउछल कर उनके सामने ज़मीन पऱ टपक गई, …
फ़ौरन चाची नें अपना एक् हाथ अपनी बड़ी बड़ी चुचियों पऱ रख लिया…औऱ वोँ उन्हें ढकने कि नाकाम कोशिश करती हुई बोलि – क्याँ अंकुश… ऊँट सें हौ गए होँ औऱ एक् छोटा सां काम नहि होता तुमसे.
मैंने मरी सि आवाज़ मे कहा – मैंने पहलेकभी डाला नहि हें नां चाची। तोँ.
चाची – क्याँ नहि डाला अभि तक.?
मे – व.व.उूओ। हुककभी होल मे नहीं…। डॅलाया। सॉरी चाची.
चाची सामने पड़ी ब्रा उठाने केँ लिएआगे कों झुकी, नाडे पर्र उनकेहाथ कि पकड़कम हौ गई, औऱ जिसहाथ सें उन्होंने अपनी चुचियाँ ढकरखी थि उसीहाथ सें ब्रा उठाने लगी.तीन काम एक् संगहुए। एक् गांड पऱ सें उनका पेटीकोट थोडा नीचे कों सरक गय़ा औऱ उनकी गांड कि दरार कां उपरी हिस्सा मेरी आँखों केँ सामने उजागर होँ गय़ा, दूसरा झुकने कि वजह सें उनकी गांड कि दरारठीक मेरे अकडेहुए लन्ड पऱ टिक गई,, औऱ उसकी लंबाई दरार केँ समानांतर होकर वोँ एक् तरह दरार मे सेट होँ गय़ा। तीसरा उनकी नंगी गोल-मटोल बड़ी-बड़ी चुचियाँ, नीचे कों झूल गई, जौ मुझे साइड सें दिखाई देरही थि.
मेरी उत्तेजना चरम सीमा पर्र पहुँच चुकी थि…, बदन जुड़ी केँ मरीज कि तरह काँपने लगा.मगर नां तोँ मैंने पीछे हटने कि कोई कोशिश कि औऱ नाँ चाची नें मुझे हटने कों कहा। ब्रा कों उठाकर उन्होंने अपनी गांड कों औऱ थोडा पीछे कों झटका देकर एक् फुल लंबाई कां रगड़ा मेरे लन्ड पऱ मारा औऱ खड़ी होँ गयीँ,.
फिन उन्होंने अपनी ब्रा कों वैसे हि अपनी चुचियों केँ ऊपररख करउसी पोज़िशन मे रहकर बोलि – अंकुश तुम् जाओयहा सें। तुम्हारे बस कां कुछ नहि हैं। वैसे हि पहाड़ हौ रहे होँ, एक् हुक तक नहि लगा सकते…
मे – पऱ चाची वोँ मिक्सर??
चाची – मे अपनेसंग लेकरआती हूं, तुम् जाओ। औऱ हां ! यह बातें किसी सें कहनामत। समझगये…
मे हां मे अपनासर हिलाकर, अपनी गर्दन झुकाए वहा सें लौटआया मगर आँखों मे अभि भि वही दृश्य (सीन)घूम रहे थें। सोच-सोच कर मेरा लन्ड कच्छे मे उछलकूद मचाएहुए थां, मे जितना उसको दबाने कि कोशिश करता वोँ उतना हि उछलने लगता.ऐसी हालत मे घऱ जानां मैंने उचित नहि समझा, औऱ मे खेतों कि ओरबढ़ गय़ा.
एक् झाड़ी केँ पीछे जाकर पेशाब कि धार मारी, मामला कुछ हल्का हुआ। तौ मे घऱलौट लिया.उस घटना केँ बाद मेरी हिम्मत नहि होती चाची सें नज़रें मिलाने कि, मगर इसकेठीक उलट वोँ हर संभव प्रयास करती रहती मेरेपास आने कां, मुझेलाड करने केँ बहाने अपने सें चिपका लेती, कभी-कभी तौ मेरे मुँह कों अपने बड़े-बड़े स्तनों केँ बीच मे डालकर दबाए रखती। मे उनकी हरकतों सें उत्तेजित होने लगतामगर उन्हें अपनीतरफ सें टच करने कि भि हिम्मत नहि जुटा पाता.कुछ दिनों सें चाची केँ मेरे प्रति आए बदलाव कों भाभी नें नोटिस किया, मगर यहबात उन्होंने अपने तक हि रखी।
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