maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 10
दूसरे दिनगरम चाय ब्रेकफास्ट करके हम् तीनों बेहन भइया, कृष्णा भैया केँ दफ़्तर कि कार सें उनकेशहर कि तरफ निकललिए। मे आगे ड्राइवर केँ बगल मे बैठा थां औऱ दिदी-भैया पीछे कि सीट पर्र बातें करतेहुए अपना वक्तपास करतेजा रहे थें। वोँ दोनों भि कुछ सालों पहले एक् संग विद्यालय जानां, संग खेलना बैठना काफ़ी सालों तक रहा थां, आज वोँ दोनों अपनी पुरानी बातों, संग बिताए लम्हों कों याद करतेजा रहे। उनकी बातें सुनकर मुझेपता चला कि हम् भाइयों औऱ बेहन केँ बीच कितना प्यार हैं एक् दूसरे केँ लिए। शायद इसकी एक् वजह मां कि असमय मृत्यु भि थि, जिसकी वजह सें सभी जल्द हि अपनी ज़िम्मेदारियाँ समझने लगे थें.
उनकी पोस्टिंग जिसशहर मे थि, वोँ हमारे देहात सें तकरीबन 100-110 किमीदूर थां। देहात सें कुछदूर मे हाईवे तक सिंगल औऱ खराब मार्ग हि थां, मगर उसकेबाद हाइवे अच्छा थां। बातों-बातों मे वक़्त कां पता हि नहि चला औऱ कोई 3 घंटेबाद हम् उनकेशहर पहुँच गये। भैया पहले सीधे अपने दफ़्तर गये, वहा अपने स्टाफ सें हमें मिलवाया फिन अपने दफ़्तर केँ काम कां भाग लेकर हम् तीनों शॉपिंग केँ लिए निकलगये.
पहले मेरेलिए एक् बुलेट बुक कराई, जौ कल तक मिलने वाली थि, फिन हम् दोनों केँ लिए कपड़े वगैरह खरीदे। इसी मे साम होँ गई,। दूसरे दिन भैया हमें एक् सिनेमा हॉल कि टिकट देकर अपने दफ़्तर निकलगये। अपने दफ़्तर कि हि एक् व्हीकल हमारे लिएरख दि जोँ हमें पूरेदिन घुमाने वाली थि। 3 सें 6 कि शो हम् दोनों मूवी देखने हॉल मे घुसगये। अक्षय कुमार कि कोई अच्छी मूवीलगी थि.
दिदी नें नये खरीदे कपड़ों मे सें एक् पिंककलर कि टीशर्ट औऱ एक् ब्लू जीन्स पहनरखी थि, मे भि एक् वाइट टीशर्ट औऱ जीन्स पहनेहुए थां। इस ड्रेस मे दिदी क्याँ ग़ज़ब लगरही थि, मे तौ उन्हें देखता हि रह गय़ा औऱ मेरे मुँह सें निकल गय़ा - अरेवाह ! दिदी क्याँ लगरही हौ??
दिदी एकदम सें शर्मा गई,, औऱ फिन बोलि – सचबता भइया, मे अच्छी लगरही हूं नाँ??
मे – ग़ज़ब दिदी! आप् तौ एकदम सें बदल गई, हौ। कोईकह नहि सकता कि यहकोई देहात कि लड़की होगी.
दिदी – तुँ भि किसी हीरो सें कम नहि लगरहा। देख्ना कहींकोई लड़कीगश ख़ाके नाँ गिर पड़े.
मे – अब आप् मेरी टाँग खींचरही हौ.
दिदी – नहि सच मे औऱ आगेबढ़ केँ मेरेगाल पर्र किसकर लिया.
मे तोँ अचानक उनकेकिस करने सें गन-गन गय़ा। हॉल मे अंधेरा थां, कुछवॉल साइड कि लाइट्स थि जिससे हल्का-हल्का उजाला फैलाहुआ थां। हम् अपने नंबर कि सीट जोँ बालकनी मे सबसेऊपर कि रो मे थि, वहांजा करबैठ गये। अच्छी मूवी होने कि वजह सें कुछदेर मे हि हॉलफुल हौ गय़ा औऱ कुछ हि देर मे सब लाइट्स ऑफ होँ गयीँ, औऱ मूवी स्टार्ट होँ गयीँ,.
हॉल मे अंधेरा इतना थां, कि हमें अपने बाजू वाले कि भि पहचान नहि हौ रही थि कि कौन बैठा हैं। मूवी शुरुआत हुए अभि कुछ हि मिनिट हुए थें कि दिदी कां हाथ मेरी जाँघ पर्र महसूस हुआ। मे चुपचाप बैठा मूवी देखता रहा.
अब आरामसे वोँ मेरी जाँघ कों सहलाने लगी औऱ अपनेहाथ कों ऊपर मेरे जांघों केँ बीच लें आई.अब उनकी उंगलियाँ मेरे लन्ड सें टच हौ रही थि। वोँ टाइट जीन्स मे क़ैद बेचारा ज़ोर मारने लगा.मगर जीन्स इतनी टाइट थि कि कुछ ज़ोर नहि चलरहा थां उसका। दिदी कां हाथ औऱ कुछ हरकत करता उससे पहले मे थोडा सीधा हौ गय़ा औऱ अपनीसीट पऱ आगे कों खिसक गय़ा। दिदी नें जल्दी अपनाहाथ खींच लिया औऱ मेरे मुँह कि तरफ देखने लगी.मगर मे मूवी देखने मे हि लगारहा। मे थोडा आगे होकर दिदी कि साइड वाले अपने बाजू कों थोडा उनकीसीट कि तरफ चौड़ा दिया.अब हैंडल पर्र आगे मेरा बाजू टिकाहुआ थां औऱ मेरे पीछे हि दिदी नें भि अपना बाजू टिका लिया औऱ मेरीसीट कि तरफ कों हौ गई। पोजीशन यह होँ गई कि अगर मे ज़रा भि पीछे कों होता तौ मेरा बाजू उनके बूब्स कों प्रेस करता.
हम् दोनों कुछदेर यूँ हि बैठेरहे, दिदी कों ज्यादा देर सुकून कहां पड़ने वाला थां। दिदी नें अपनाहाथ मेरी बॉडी औऱ बाजू केँ बीच सें होकरफिन मेरी जाँघ पर्र रख दिया, औऱ फिनवही पहले वाली हरकतें शुरुआत कर दि। मे उन्हें बोलने केँ लिए पीछे कि तरफ होकर उनकीओर कों हुआ। मेरा बाजू, एल्बो सें ऊपर कां हिस्सा, उनके बूब्स पऱ रख गय़ा। जैसे हि मुझेइस बात कां एहसास हुआ, औऱ मे अलग होने हि वाला थां कि उसने मेरा बाजूथाम लिया औऱ उसे औऱ तेज़ अपनी बूब्स पर्र दबा दिया। आह्ह्ह्ह… क्याँ नरम एहसास थां, रूई जैसी रसीले उसकी बूब्स मेरी बाजू सें दबी हुईँ थि। मुझे रोमांच भि हौ रहा थां, मगर मेरेमन मे हमेशा हि उनके प्रति एक् भइया-बेहन वाली फीलिंग पैदा होँ जाती थि औऱ मे आगे बढ़ने सें अपने कों रोक लेता थां…! दिदी नें अपनागाल भि मेरे बाजू सें सटारखा थां… मैंने उनकेकान केँ पास मुँह लें जाकरकहा – दिदी यह आप् क्याँ कररही हौ???
दिदी – मे क्याँ कररही हूं??
मे – यही! अभि आप् ऐसे चिपकी हौ मेरे सें, कभी मेरी जाँघ सहलाती होँ। यहसभी क्याँ ठीक हैं??
दिदी – क्यूं? तुझेही कोई प्राब्लम हैं इस सबसे.?
मे – हां हम् बेहन-भइया हें, औऱ यहसभी हमारे रिश्ते मे ठीक नहि हैं.
दिदी – अच्छा औऱ भाभी देवरु केँ रिश्ते मे यहसभी ठीक हैं.?
मे – क्याँ.?? आप् कहना क्याँ चाहती हौ.? साफ-साफ बोलो…!
दिदी – आजकल तेरे औऱ भाभी केँ बीच जौ भि हौ रहा हैं नां, वोँ मुझेसभी पता हैं। यहा तक कि तेरे बर्थडे वाली सारीरात उनके कमरे मे जौ हुआ वोँ भि.
मे एक् दम सें सकपका गय़ा औऱ हैरत सें उनकीतरफ देखने लगा.
दिदी - ऐसे क्याँ देखरहा हैं…? क्याँ यह भि बताऊँ, कि कब-कब, तुम् दोनों नें क्याँ-क्याँ किया औऱ कहां किया हैं??? मगर तुँ फिकरमत कर मे किसी कों कुछ नहि कहूँगी… बस थोडा सां मेरे बारे मे भि सोच.
अब मेरेपास बोलने केँ लिएकुछ नहि थां। जैसे गूंगी स्त्री लन्ड कि तरफ देखती हैं ऐसे हि बसउसे देखता हि रहा.
दिदी – अबचुप क्यूं हैं, कुछ तोँ बोल??
मे – ठीक हैं दिदी, आप् जैसा चाहती हें वैसा हि होगा, मगर अभि यहाकुछ मतकरो। वरना मुझे कुछ-कुछ होने लगता हैं.
दिदी – तोँ फिन कहां औऱ केसे होगा??यहा भि कुछ तौ मज़ेकर हि सकते हें नाँ.
मैंने पूरीतरह हथियार डालदिए औऱ अपने आपको उसके हवाले कर दिया.
दिदी अपने बूब्स कों मेरे बाजू सें रगड़कर कान मे फुसफुसाई - अपने जीन्स कि ज़िपखोल न् अंकुश.
मे – क्याँ करोगी दिदी?
दिदी – मुझे देख्ना हैं तेरा लन्ड कैसा हैं??
मे – यहा अंधेरे मे क्याँ दिखेगा?
दिदी – अरे दोस्त तुँ भि नाँ, बहोत पकाता हैं। तूँ खोल तौ सही मे अपनेहाथ मे लेकर देख्ना चाहती हूं। प्लीज दोस्त, खोलदे.
मे – रुको एक् मिनिट, औऱ मैंने सीट सें पीठ सटकरकमर कों उचकाया औऱ अपना बेल्ट औऱ जिपखोल दिया। उसने जल्दी अपनाहाथ जीन्स केँ अंदरडाल दिया औऱ फ्रेंची केँ ऊपर सें हि मेरे लन्ड कों अपनी मुट्ठी मे लेँ लिया.
मे – अह्ह्ह्ह… कैसा हैं दिदी?
दिदी – क्या बात है छोटू!यह तौ बड़ा तगड़ा हैं…दोस्त!
मे – क्यूं तुम्हें अच्छा नहि लगा?
तोँ वोँ झेंप गयीँ, औऱ लज्जा सें अपनागाल मेरे बाजू पर्र सटा दिया। दिदी उसे हौले-हौले सहलाने लगी औऱ उसने मेराहाथ पकड़कर अपने बूब्स पर्र रख दिया औऱ बोलीं – तूँ भि इसे प्रेस करना!
मैंने कहा रुको, औऱ फिन मैंने अपना बाजू उसकेसर केँ पीछे सें लें जाकर उसके दूसरी साइड वालेबूब केँ ऊपररख दिया औऱ आहिस्ता दबाने लगा। मैंने उसकेगाल कों चूमते हुए उसकेकान मे कहा- तुम् भि अपनीजिप खोलो नाँ दिदी.
तौ उसनेझट सें अपनी जीन्स खोल दि औऱ मैंने अपनाहाथ उसकी पैंटी केँ ऊपररख कर उसकी बुर कों सहला दिया… सीईईईईई…। हल्की सि सिसकी उसके मुँह सें निकल गयीँ,, उसकी पैंटी थोड़ी-थोड़ी गीली होँ रही थि औऱ अब मेरेदो तरफ़ा हमले सें उसकी औऱ हालत खराब होनेलगी। हम् दोनों मस्ती मे एक् दूसरे केँ अंगों सें खेलरहे थें, कि तभी इंटरवल होँ गय़ा, औऱ जल्द सें अपने सीटो पर्र सही सें बैठकर अपने-अपने कपड़े दुरुस्त किए औऱ बाहर् चलदिए। इंटरवल केँ बाद भि हम् दोनों ऐसे हि मस्ती करतेरहे, औऱ इस दौरान वोँ एक् बारझड़ भि चुकी थि। मेरा भि लन्ड फूलकर फटने कि स्थिति मे पहुँच गय़ा थां। मूवीखतम होने केँ बाद हम् घऱलौट लिए, रास्ते भर हम् दोनों चुप हि रहे, वोँ मुझसे नज़र चुरारही थि, औऱ मन हि मन मुसकुराए जारही थि.
मैंने वाहन कि पिछली सीट पऱ बैठे हि उससे पूछा – क्याँ हुआ दिदी, बात क्यूं नहि कररही?
दिदी – भइयादेख यहाअब कुछमत करना, वरना ड्राइवर कों शक़ होँ जाएगा.
मैंने कहा – तोँ बात तौ कर हि सकती हौ.
फिन वोँ इधर-उधर कि बातें करनेलगी। घऱ पहुँच कर फ्रेश हुए, थोडा टेलीविज़न देखा औऱ कुछदेर बाद भैया आँ गये। एजेंसी वाला बुलेट कि डिलीवरी घऱ पऱ कर गय़ा थां, भैया नें सभी पेपरचेक करलिए। रातदेर तक हम् तीनों बेहन भइयादेर तक बात-चीत करतेरहे। भैया नें हमनेदिन मे क्याँ किया वोँ सभी पूछा औऱ फिन अपने-अपने खाट पऱ जाकरसो गये। दूसरे दिन हम् निकलने वाले थें, भैया नें सुभह हि पंप पर्र जाकर बुलेट कां टैंकफुल करा दिया थां.
निकलने सें पहले भैया बोले – छोटू रास्ते मे एक् बहोत अच्छी स्थान हैं, जंगलों केँ बीच झरना सां हैं, झील हैं। देखने लायक स्थान हैं। अगर देख्ना हौ तोँ किसी सें भि पूछकर चले जानां। बहोत मजा आएगा तुम् दोनों कों.
फिन हम् दोनों भैया सें गले मिलकर चलदिए अपनेघऱ कि तरफ। डग-डग-डग… बुलेट अपनी मस्त आवाज़ केँ संग हाईवे पर्र दौड़ी चलीजा रही थि। जोँ मैंने कभी ड्रीम्स मे भि नहि सोचा थां, आज मुझेमिल गय़ा थां। मेरी पसंदीदा बाइक जिसे दूसरों कों चलाते देखबस सोचता थां, कि काशयह मेरेपास भि होती। औऱ आज भाभी कि वजह सें मेरे हाथों मे थि, मेरी खुशी कां कोई ठिकाना नहि थां इस वक्त। भैया केँ घऱ सें निकलते वक्त दिदी एक् सलवार सूट मे थि। शहर सें निकलकर जैसे हि हमारी बुलेट हाईवे पर्र आई, दिदी नें मुझेकार एक् साइड मे खड़ी करने कों कहा। मैंने सोचा इसकोसू सू आँ रही होगी.
मैंने एक् पेड़ केँ नीचे बुलेट रोक दि औऱ पूछा – क्याँ हुआ दिदी। कार क्यूं रुकवाई.?
उसनेकोई जवाब नहि दिया औऱ मुस्कराते हुए अपने कपड़े उतारने लगी.
मैंने कहा-अरे दिदी ऐसे सरेआम कपड़े क्यूं निकाल रही होँ। पागल होँ गयीँ, होँ क्याँ?
फिन भि दिदी नें कोई जवाब नहि दिया औऱ अपनी कमीज़ उतार दि। मेरी आँखें फटीरह गई,। दिदी उसके नीचे एक् हल्के रंग कि पतली सि टीशर्ट पहने थि। फिन वोँ अपनी सलवार कां नाडा खोलने लगी औऱ उसे जैसे हि नीचे सरकाया, तौ उसके नीचे एक् स्लेक्स कि टाइट स्लिम घुटने तक कि पिंककलर कि लिंगरी पहने थि। उसके दोनों कपड़े इतने हल्के थें कि उसकी ब्रा औऱ पैंटी उनमें सें दिखाई देरही थि, वोँ इन कपड़ों मे एकदमशहर कि पटाखा माललग रही थि। ब्रा मे कसे उसके 32 इंच साइज़ केँ गोरे-गोरे बूब्स औऱ पैंटी मे कसी उसकी 34 इंच कि गांड देखकर मेरा लौड़ा उछलने लगा। मे भि इस वक्त एक् हल्की सि टीशर्ट औऱ एक् होजरी कां पाजामा हि पहने थां, जोँ कि काफ़ी कम्फ़र्टेबल थां रास्ते केँ लिए। पाजामा मे मेरा तंबू सां बननेलगा थां। मगर मे अभि भि बुलेट कि सीट पर्र हि बैठा थां, इसलिये वोँ उसको नहि दिखा.
मैंने मन हि मनकहा - हे प्रभु आज किसीतरह इससेबचा लेना.
ऐसा नहि थां, कि मे दिदी केँ संग फ्लर्ट नहि करना चाहता थां, मगरजिस तरह वोँ दिनों-दिन मेरेसंग खुलती जारही थि, इसी सें पताचल रहा थां कि अब हम् अधिकदिन दूर नहि रह पाएंगे। मे जैसे हि आगे बढ़ने कि कोशिश करता, मेरेमन मे कहीं नाँ कहींयह प्रश्न उठने लगता, कि नहि दोस्त! यह तेरी बेहन हैं। औऱ बेहन केँ संग……यह ग़लत होगा.
मगर उसके कोमलमन कों कौन समझाए…? औऱ अब तौ उसने मेरे हथियार केँ दर्शन भि करलिए थें। मे यहीसभी बुलेट केँ दोनों ओर पांव ज़मीन पऱ टिकाए सीट पऱ बैठासोच हि रहा थां कि वोँ मेरे पीछे दोनों तरफ लड़कों कि तरहपेर करकेबैठ गयीँ, औऱ बोलीं--- अबचलो.
मैंने किक लगाई औऱ हमारी बुलेट फिन सें डग-डग करती हाईवे पर्र दौड़ने लगी। उसने अपनेबाल भि खोलदिए थें जौ अबहवा मे लहरारहे थें। मस्ती मे उसने अपनी दोनों बाजूहवा मे लहरा दि औऱ हवा कि तेज़ी कों अपने पूरे जिस्म पर्र फील करनेलगी.
मे – अरे दिदी, आहिस्ता बैठो नां। गिर जाओगी…!
दिदी – क्यूं तुम को चलाना नहि आता क्याँ.?
मे – ऐसा नहि हैं। अगर कहींकोई गड्ढा आँ गय़ा याँ किसी भि वजह सें ब्रेक भि लगाना पड़ सकता हैं तोँ तुम् डिस्बैलेंस होँ सकती हौ.
दिदी नें मुझे घुड़कते हुएकहा – तुँ बस अपनी ड्राइविंग पऱ ध्यान दे औऱ मुझे मेरामजा लूटने दे.
मे फिनचुप हौ गय़ा। थोड़ी देरबाद वोँ बाइक पर्र खड़ी हौ गयीँ, औऱ चिल्लाने लगी - याहूऊओ….याहूऊ…
जिससे दिदी कि आवाज़ हवा मे लहराने सि लगी औऱ उसके स्वयं केँ कानों कों सरसराने लगी.ऐसी हि मस्ती मे वोँ बाइक केँ पीछे मज़े लूटती जारही थि। फिनरोड पर्र कुछ गड्ढे सें आनां शुरुआत होँ गये, तोँ मैंने उसेरोक दिया औऱ ठीक सें पकड़कर बैठने केँ लिए बोला.
तभी एक् बड़ा सां गड्ढा आँ गय़ा औऱ कारउछल गयीँ,, वोँ अच्छा हुआ कि उछल नें सें पहले उसने मुझे पकड़ लिया थां। अबउसे पताचला कि मे क्यूं पकड़ने केँ लिएबोल रहा थां। मेरीकमर मे बाहें लपेटकर दिदी बोलि – देखभाल करचला नाँ भइया.घऱ पहुँचने देगा याँ रास्ते मे हि निपटाकर जाएगा मुझे.
मे – मैंने तौ पहले हि कहा थां कि पकड़लो कुछ.
दिदी मेरीकमर मे अपनी बाहें लपेटकर मुझसे चिपक गयीँ,, जिससे उसके कड़क अमरूद जैसी बूब्स मेरीपीठ मे गढ़ीजा रही थि, अपनागाल मेरे कंधे पऱ रखकर मेरी गर्दन सें सहलाते हुए मज़े लेनेलगी। नॉर्मली बुलेट जमके चलने वाली बाइक हैं, फिन भि वोँ उछल नें केँ बहाने सें अपनी चुचियों कों मेरीपीठ सें रगड़रही थि, उसके मुँह सें हल्की सिसकियाँ भि निकलरही थि। आरामसे सरकते हुए उसकेहाथ मेरे लौडे कों टच करनेलगे, उसका स्पर्श होते हि उसनेउसे थाम लिया औऱ धीरे-धीरे सें मसलने लगी.
मे – दिदी अपनाहाथ हटाओयहा सें कोई आते-जाते देख लेगा तोँ क्याँ सोचेगा.?
दिदी – तोँ देखने दे नाँ.! हमेंयहा कौन जानता हैं? तूँ भि नाँ बहोत बड़ा फट्टू हैं दोस्त.
मे – अरे दिदी ! यह हाइवे हैं… गलती सें अपनाकोई पहचान वाला गुजररहा हौ तौ। औऱ उसनेजा केँ बाबूजी, याँ औऱ किसी घरवाले कों बता दिया…तब किसकी फटेगी…?
वोँ – चलठीक हैं चुपचाप व्हीकल चला तूँ… कोई निकलता दिखेगा तोँ मे हाथहटा लिया करूँगी.
इतना बोलकर उसे औऱ अच्छे सें मसलने लगी जिससे मेरा लन्ड औऱ अकड़ गय़ा। अब वोँ पाजामा कों फाड़ने कि कोशिश कररहा थां। अपने हाथों मे उसकाआकर फील करके दिदी बोलि – वाह छोटू, तेरा लौड़ा तोँ एकदम डंडे जैसा होँ गय़ा हैं दोस्त.
मे – मानजाओ दिदी, वरना मेरा ध्यान भटक गय़ा नाँ, औऱ वाहन ज़रा भि डिस्बैलेंस हुईँ तौ दोनों हि गये समझो.
एक्सीडेंट कि कल्पना सें हि वोँ कुछडर गई, औऱ उसने मेरे लन्ड सें अपनेहाथ हटालिए। मगरपीठ सें अपनी चुचियों कों नहि हटाया, औऱ तिरछी बैठकर अपनी बुर कों मेरे कूल्हे केँ उभरेहुए हिस्से सें सटा लिया, आहिस्ता ऊपर नीचे होकर अपनी चुचि औऱ बुर कों मेरे जिस्म सें रगड़कर मज़े लेनेलगी। हम् 60-70 किमी निकलआए थें, भैया नें जोँ स्थान घूमने केँ लिए बताई थि, वोँ आने वाली थि।
Are yar kya baat h ye kahani 2 saal pahle shayed gossip parr parhi thi keep it regularly update detey rehna agarbeech main band krr di too bhut maar paregi 98%likhne valey beach main kahania chor jatey haen
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 11
हम् 60-70 किमी निकलआए थें, भैया नें जौ स्थान घूमने केँ लिए बताई थि, वोँ आने वाली थि। आगे एक् छोटे सें देहात केँ बाहर् मार्ग केँ किनारे गरमचाय नाश्ते कि टपरी सि थि, मैंने उसकेपास पहुँचकर अपनी बाइक रोकी औऱ कुछ नाश्ते केँ लिए पूछा। वोँ गरमा-गर्म पालक-मेथी केँ पकोड़े तलरहा थां। हमने उससे पकोड़े लिए औऱ खानेलगे उसकेबाद एक्-एक् गरमचाय ली जोँ कुछ ज्यादा सही नहि लगी, अब लेँ ली थि तोँ पीनी पड़ी.
गरम चाय पीते-पीते मैंने उस टपरी वाले सें उस स्थान केँ बारे मे पूछा, तौ उसने बताया कि यहा सें आधे किमी केँ बाद अपने हि हाथ पर्र एक् कच्चा पथरीला मार्ग आएगा, उसी सें वहा पहुंचा जा सकता हैं। वोँ स्थान रोड सें लगभग एक् फर्लांग हि अंदर कों हैं उसेगरम चाय पकोड़े केँ पैसे देकर हम् फिनआगे बढ़गये। वोँ स्थान वाकई मे रोमांटिक थि। घने ऊँचे पेड़ों केँ बीच एक् छोटी सि झील जैसी थि, जिसका पानी एक् सिरे पर्र स्थित कोई 15-20 फीट ऊँची पहाड़ियों सें निकलरहा थां, औऱ झील मे जमा होँ रहा थां। ओवरफ्लो होकरझील कां पानी सबसे निचले किनारे सें निकलकर जंगलों केँ बीचजा रहा थां। झील केँ दोनों किनारों पऱ उसके समानांतर तकरीबन 30-40 मीटर कि चौड़ाई केँ हरी-हरी घास केँ मैदान थें। कुल मिलाकर प्रेमी जोड़ों केँ मज़े करने केँ लिएयह उत्तम स्थान थि। जब हम् वहा पहुँचे तोँ दोपहर केँ 12-12:30 कां वक्त थां, इसवजह सें औऱ कोईवहा नहि थां, एक्-दो जोड़े थें, वोँ भि निकलने कि तैयारी मे थें.
मैंने बाइक पेड़ों केँ बीच खड़ी कि औऱ अपनेबैग उठाकर झील केँ किनारे कि तरफचल दिए। दिदी तौ उस स्थान कों देखकर बहोत एक्साईटेड हौ रही थि.
दिदी - अरेवाह, छोटू क्याँ मस्त स्थान हैं दोस्त, मेरा तौ मनकररहा हैं, दो-चार दिनयहा सें हिलूँ भि नाँ। हमनेझील केँ किनारे घास पर्र अपनेबैग रखदिए औऱ कुछदूर झील केँ किनारे घूमने लगे। रंगबिरंगी छोटी-बड़ी मछलीयाँ हमेंदेख कर किनारे सें औऱ गहराई कों तैरती हुई भाग जाती जौ झील केँ साफ नीले पानी मे काफ़ी दूर तक दिखाई देती। वोँ एक् स्थान बैठकर पानी मे हाथ डालकर मछलीयों सें खेलने लगी। वोँ कुछदेर दिदी केँ हाथ सें दूरभाग जाती औऱ एक् स्थान ठहरकर उसकीओर देखने लगती, औऱ फिन पूंछ हिला-हिलाकर इधर-उधर भाग लेती। जुलाई - अगस्त केँ महीने मे भि झील कां पानी ठंडा थां। कुछदेर मछलीयों सें खेलने केँ बाद दिदी बोलीं – भइया मेरा तौ इसमें नहाने कां मानकर रहा हैं.
मे – मगर दिदी हमें तैरना तौ आता नहि, अगर पानी गहराहुआ तौ.?
दिदी – लगता तोँ नहि कि ज्यादा गहरा होगा.चल आरामसे आगे बढ़ते हें। ज्यादा अंदर तक नहि जाएंगे औऱ वोँ धीरे धीरे पानी मे उतरने लगी.
मे अभि भि किनारे पर्र खड़ाउसे पानी केँ अंदर जातेहुए देखरहा थां। दिदी काफ़ी अंदर तक चली गयीँ,, फिन भि पानी उसकेपेट सें थोडा ऊपर तक हि थां.
मैंने कहा दिदी बस यहींनहा लो, औऱ आगेमत जानां.
दिदी - तुँ भि आजा नाँ दोस्त ! संग मे नहाते हें। मजा आएगा.
मैंने कहा – नहि तुम् हि नहाओ, मे ऐसे हि ठीक हूं.
तौ वोँ वहीं डुबकी लगाने लगी.अब वोँ पूरीतरह भीग गई, थि, डुबकी लगाकर जैसे हि वोँ खड़ी हुईँ, उसकी झीने सें कपड़े कि टीशर्ट उसके जिस्म सें चिपक गई, औऱ उसकी ब्रा साफ-साफ दिखाई देनेलगी। ब्रा सें बाहर् झलकते हुए उसके अमरूदों कि छटा उसकी टीशर्ट सें नुमाया हौ रही थि। उसे देखकर मेरा लन्ड भि मचलने लगा, मानोकह रहा हौ- अरे दोस्त क्याँ देखता हि रहेगा भेन्चोद ! कूदपड़ तुँ भि औऱ लें लेँ मज़े, मौका हैं.
मे उसके भीगे शरीर केँ मज़े लेँ हि रहा थां कि उसनेफिन सें डुबकी लगाई.इस बार वोँ कुछदेर तक बाहर् नहि आई.साफ पानी मे उसका जिस्म तोँ दिखरहा थां मगर वोँ ऊपर नहि आँ रही थि। मेरेमन मे आशंका सि उठनेलगी। आधे मिनिट सें भि ऊपर होँ गय़ा फिन भि वोँ बाहर् नहि आई तौ मुझेकुछ गड़बड़ सि लगनेलगी.
तभी दिदी झटके सें ऊपरआई औऱ एक् लंबी साँसभर कर अपना एक् हाथऊपर करके सिर्फ़ छोटू हि बोलपाई औऱ फिन सें अंदर डूबती चली गई,। मैंने इधरउधर नज़र दौड़ाई, शायदकोई सहायता करने वाला हौ, मगरवहा दूरदूर तक नां इंसान नां इंसान कि जात, कोई भि नहि थां। जबकोई औऱ सहारा नाँ दिखा, तौ मैंने लें ऊपरवाले कां नाम, आव देखा न् ताव अपनी टीशर्ट औऱ पाजामा उतार किनारे पर्र फेंका औऱ पानी मे जंपलगा दि.
मे तेज़ी सें दिदी कि ओर बढ़ा.! औऱ जैसे हि उसकेपास पहुंचा, झटके सें वोँ ऊपरआई, औऱ खिल-खिलाकर मेरे सामने पानी मे खड़ी होकर हँसने लगी.यहा पानी उसकेगले सें थोडा नीचे थां, माने उसके बूब्स पानी केँ अंदर थें.
मे डर औऱ झुंझलाहट केँ मारे काँपरहा थां, उसकेऊपर क्रोध होतेहुए बोला – दिदी यह क्याँ हिमाकत हैं? पता हैं मे कितना डर गय़ा थां, औऱ तुम्हें मज़ाक सूझरहा हैं.
दिदी – अरे बुद्धू ! मे तौ तुम्हे भि पाने मे बुलाने केँ लिए नाटककर रही थि। औऱ खिल-खिलाकर हँसते हुए मेरेऊपर पानी उछालकर मुझे भिगोने लगी.
मे – अच्छा ! तुम्हें मस्ती सूझरही हैं रुको अभि बताता हूं, औऱ मे भि हाथों मे पानी भर-भरकर उसकीओर उछालने लगा.
दिदी – अब तौ डुबकी लगाएगा याँ अभि भि नहि? तौ मैंने भि सोच लिया कि अब इसको अच्छे सें मजाचखा हि दियाजाए। मैंने पानी मे डुबकी लगाई औऱ अंदर हि अंदर उसके पीछे पहुंचा, अपनासर उसकी टाँगों केँ बीच डाला, उसको अपने कंधे पर्र उठाकर खड़ा हौ गय़ा। पहले तौ वोँ शॉक लगने सें चीख पड़ी, फिन मजा लेतेहुए मेरे कंधे पऱ बैठीहवा मे अपनी बाहें फैलाकर याहू.याहू.हूऊ। करके चिल्लाने लगी। जंगल केँ शांत वातावरण मे उसकी कोयल जैसी मीठी आवाज़ पेड़ों औऱ पानी केँ बीच गूँजकर वापस हमारे कानों सें टकरारही थि.
रमा दिदी तोँ मस्ती मे जैसे पागल हि हौ उठी औऱ नाँ जानेकब उसने मेरे कंधे पऱ बैठेहुए हि अपनी टीशर्ट उतारकर किनारे कि तरफ उछाल दि। मगर वोँ किनारे सें पहले हि पानी मे गिरी औऱ बहकर हमसेदूर जानेलगी.
मे उसको कंधे पर्र उठाएहुए हि पानी मे पीछे कि तरफपलट गय़ा। कुछदेर हम् पानी केँ अंदर डूबेरहे, मगरफिन बाहर् आते हि वोँ मेरीपीठ पऱ सवार हौ गई, औऱ मेरे कंधे पर्र अपने दाँत गढ़ादिए। मेरीचीख निकल गई,, मैंने अपनाहाथ पीछे लें जाकरउसे पकड़ने कि कोशिश कि, तोँ वोँ हस्ती हुइ किसी मछली कि तरह मेरेहाथ सें फिसलकर मेरे सें दूर जानेलगी.
मे जबउसे पकड़ने केँ लिए पलटा, तब पतालगा कि वोँ सिर्फ ब्रा मे हि थि। उसके उभार किसी टेनिस कि बॉल कि तरह एकदम गोल-गोल उसके ब्रा मे क़ैद मुझे बुलारहे थें, मानोकह रहेहों कि, आजा बेटा, गांड मे दम हैं तौ हमेंमसल केँ दिखा.
मेरी झांटे सुलगउठी, औऱ मैंने खड़े-खड़े हि उसकेऊपर जंपलगा दि औऱ उसे पानी केँ अंदर दबोच लिया। मेरेजंप मारते हि वोँ भि बचने केँ लिए पीछेहटी, जिससे मेरे दोनों हाथ उसकीकमर पर्र जमगये, मेरी उंगलियाँ उसके लोवर कि एलास्टिक मे फँस गयीँ,। उसने जैसे हि पीछे कों तैरने केँ लिए अपनेबदन कों झटका दिया, उसका लोवरउतर कर मेरे हाथों मे आँ गय़ा। अब वोँ केवल अपनी ब्रा औऱ पैंटी मे थि। मैंने उसके लोवर कों हवा मे गोल-गोल घुमाकर उसको चिढ़ाया, मगर उसपरकोई असर नहि हुआ, औऱ हँसती हुइ अपनीजीभ चिढ़ा कर अंगूठा दिखाने लगी। मे फिन एक् बार उसको पकड़ने झपटा, तोँ वोँ किसी मछली कि तरह मेरे हाथों सें फिसल गई,। हम् दोनों पानी मे नहाते हुए अठखेलियाँ कररहे थें। पानी मे तैरती मछलियाँ भि जैसे हमारे खेल मे शामिल होँ गयीँ, थि, औऱ वोँ भि हमारे आस-पास जमा होकर इधर-सें-उधर अपनी पूंछ हिला-हिला करतैर रही थि.
फिन अचानक दिदी उछलकर मेरीगोद मे आँ गई, अपनी पतली लंबी बाहें मेरेगले मे लपेट दि औऱ पैरों सें मेरीकमर कों लपेटकर मेरे सीने सें लिपट गई,। स्वतः हि हम् दोनों केँ होंठ एक् दूसरे सें पहलीबार जुड़गये औऱ हम् दोनों एक् लंबी स्मूच मे खोगये। दिदी मेरे होंठों कों बुरीतरह सें झिंझोड़ने लगी, मानो वोँ उन्हें जल्द सें जल्दखा जाने कि फिराक मे होँ। मैंने भि उसके निचले होंठ कों अपने मुँह मे भर लिया औऱ उसके मुँह मे अपनीजीभ डालने कि कोशिश करनेलगा। कुछदेर तोँ उसके मोतियों जैसे दाँतों कि दीवार मेरीजीभ कों रोकती रही, फिन वोँ खुल गयीँ, औऱ मेरीजीभ उसके मुँह मे घुसकर अपनी सहेली केँ संग खेलने लगी.
मेरेहाथ दिदी केँ 36 केँ साइज़ केँ गोल-मटोल सुडौल नितंबों कों मसलने लगे। दिदी कि आँखें मस्ती मे डूबकर लाल सुर्ख हौ गई,, औऱ दिदी मे अब सिर्फ़ वासना हि दिखरही थि। मेरेहाथ दिदी केँ कूल्हों सें हटकर उसकीपीठ पऱ आँ गये औऱ जैसे हि मेरी उंगलियों नें दिदी कि ब्रा केँ एकमात्र हुक कों टच किया, दिदी शरारत कर बैठी, औऱ उसकी ब्रा भि पानी मे तैरती नज़रआने लगी.
मेरेहाथ दिदी केँ कूल्हों सें हटकर उसकीपीठ पऱ आँ गये औऱ जैसे हि मेरी उंगलियों नें दिदी कि ब्रा केँ एकमात्र हुक कों टच किया, दिदी शरारत कर बैठी, औऱ उसकी ब्रा भि पानी मे तैरती नज़रआने लगी। नीचे मेरा डंडाफुल अकड़ चुका थां औऱ इस वक्त दिदी कि गांड औऱ बुर केँ होंठों कों सहारा दिएहुए थां। दिदी लगातार उसपर अपनी गांड औऱ बुर केँ होंठों कों घिसरही थि। अबउसे अपनी पैंटी भि किसी सौतन कि तरह अखरने लगी। दिदी मेरी बाँहों मे पीछे कों पलट गई, औऱ अपने नंगे अल्हड़ कच्चे अमरूद जौ पकने केँ लिए रेडी थें मेरी आँखों केँ सामने करदिए। मेरामन भि उन्हें खाने केँ लिए मचलने लगा.
मस्ती केँ जोर सें उसके अंगूर केँ दाने जैसे निप्पल कड़क होकर मुझे निमंत्रण देरहे थें। मेरी चटोरी जीभ कहां मानने वाली थि औऱ उसके एक् अंगूर कों बड़े प्रेम सें बड़ी शालीनता सें चाट लिया ईईईीीइसस्स्स्स्स् स्स्शह। भाईईईईईईईईईईईई। आआआहह। जोरसीईए। चतत्त। नां। प्लेीईईईई.
मे भि उसे तड़पाना चाहता थां। उसीतरह धीरे-धीरे सें दूसरे अंगूर कों भि अपनीजीभ कि नोक सें जस्टटच कर दिया.
दिदी - जोर सें चाट नं नां। भेन्चोद्द्द्द्द्द्द्द्द्द। दिदी कि सहनशक्ति जवाबदे गयीँ,। औऱ उसके मुँह सें गाली निकल गई.
मे उसके मुँह कि तरफ देखता रह गय़ा औऱ शरारती लहजे मे कहा – दिदी अभि कहां हुआ हूं भेन्चोद.?
दिदी - तौ जल्दबन जा नाँ.! औऱ उसने अपने एक् हाथ कों मेरेगले सें हटाकर, अपनी एक् चुचि पकड़कर मेरे मुँह मे ठूंस दि.
उसकी चुचि कों चूसते हुए मे उसकी गांड कि गोलाईयों कों भि नाप-जोख रहा थां। उसकी पैंटी मे कुछ चिपचिपाहट मेरेपेट पऱ महसूस हौ रही थि। उसकी गर्दन पीछे कों लटक गई,। वोँ तोँ अच्छा थां कि उसके पैरों नें मेरीकमर कों कसरखा थां। जल्दकुछ कर नाँ मेरे भइया। सिसकते हुएकहा उसने.
मे – क्याँ करूँ दिदी। कर तोँ रहा हूं। जोँ तुमने कहा वोँ.
दिदी - इसकेआगे कां। ! अब नहि रहा जाता। आअहह। प्लीज़ छोटू। जल्द सें कुछकर वरना मेरीजान हि नां निकलजाए कहीं.
मे दिदी कों उसी पोज़िशन मे झील केँ किनारे पर्र लें आया वोँ मेरेगले सें लटककर खड़ी होँ गयीँ,। तोँ मैंने दिदी कि पैंटी नीचे खिसका दि औऱ उसकी जांघों केँ बीचबैठ गय़ा। पहलीबार मैंने दिदी कि प्यारी बुर केँ दर्शन किए, जौ अपनेबंद होंठकिए हल्के बालों केँ बीच सूरज कि तेज रोशनी मे किसीकली कि तरहचमक रही थि। मैंने दिदी कि गोल-सुडौल जांघों जोँ अभि तक अधिक मांसल नहि हुईँ थि, औऱ उन दोनों केँ बीच थोडा सां गैप थां। हल्की उभरी हुइ उसकी बुर कों देखते हुएचूम लिया औऱ उसके होंठों कों खोलकर, अंदरूनी हिस्से कों चाटने लगा। दिदी अपनी आँखें बंदकिए खड़ी मेरे बालों कों अपनी उंगलियों सें सहलारही थि। खुले आसमान केँ नीचे हम् दोनों बिना किसी परवाह केँ अपनी वासना केँ वशीभूत एक् दूसरे केँ उन्माद कों शांत करने केँ प्रयास मे लगे थें। हमेंयह भि डर नहि थां कि कोईइधर आँ भि सकता हैं। हालाँकि जुलाई कि उमसभरी दोपहरी मे इसबात केँ कम हि चांस थें। फिन भि एक् आशंका मन मे अवश्य थि.
मैंने अपनासर उठाकर दिदी सें कहा- दिदी यहाकोई आँ गय़ा तोँ?
दिदी जैसे ख्वाब सें जागी हौ औऱ झल्लाकर बोलि – तुँ मार खाएगा अब मेरेहाथ सें। साले कुत्ते, मे मरीजा रही हूं औऱ तेरीऐसी गांडफाड़ बातें सूझरही हें.
दिदी केँ मुँह सें ऐसी बातें सुन मुझे हँसी आँ गई औऱ मैंने जीभ निकाल कर दिदी कि रस सें भरी कुप्पी केँ ऊपर फिराई सस्स्स्स्स्स्स्स्सि ईईईईईईईईईई। आआआआआअहह।.आआनन्नह। चत्ले आईईई.सीसीसएएए.हाईए.ई। थोडा खोलली यी। उसीए। आहह-आहह। आईसीई.हिी। उईई.मा आअ। हांननगज्गग.
मैंने उसकी बुर कि फांकों कों खोलकर उसकी अंदर कि दीवार सें जीभलगा कर रगड़ दि.
मेरी खुरदरी जीभ केँ घर्षण सें दिदी बिल-बिला उठी औऱ उसने मेरासर कसकर अपनी बुर केँ मुँह सें सटा दिया औऱ अपने पंजों पर्र खड़ी होँ गयीँ,। मेरीजीभ कि नोक जैसे हि उसके छोटे सें छेद मे घुसने कि कोशिश करती, वैसे हि वोँ वापस आँ जाती। उत्तेजना केँ कारण उसकी क्लिट निकलकर बाहर् आँ गय़ा जिसे मैंने जीभ सें चाटकर अपने होंठों सें दबा लिया औऱ अपनी एक् उंगली सें उसकेछेद केँ ऊपर मसलने लगा.
दिदी - उफफफफफफफफ्फ़.कचूततुउउ.म्मेरीए.भाइईइ.मईए.आअहह.गाइिईईई। औऱ किलकारी मारते हुइ वोँ झड़ने लगी। मे उसकी कोरी गागर कां सारा पानीपी गय़ा, जोँ किसी अमृत सें कम नहि थां मेरेलिए। अपनी बड़ी बेहन कां अमृत पीकर मे धनी हौ गय़ा। दिदी खड़ी-खड़ी हाँफरही थि, उसकी टाँगें काँपने लगी थि.
दिदी - मुझे कहीं छाया मे लें चल, अब मुझसे धूप मे खड़ा होना मुश्किल होँ रहा हैं.
मैंने उसेगोद मे उठाया औऱ पेड़ों कि छाया कि तरफ लें चला। मैंने एक् घने पेड़ कि छाया केँ नीचेउसे घास पऱ उतार दिया औऱ अपना कच्छे कों नीचे करके बोला – दिदी तुम् भि थोडा इसे प्रेम करो नाँ.
दिदी नें भि आज पहलीबार उसे बिना कपड़ों केँ देखा थां, वोँ अपने पंजों पऱ मेरे सामने बैठ गई, औऱ मेरे लन्ड कों हाथ मे लेकर सहलाते हुए बोलि- छोटूयह तोँ बहोत बड़ा औऱ मोटा भि.
मे – तुम्हें अच्छा नहि लगा दिदी?
तौ वोँ तपाक सें बोलि – अच्छा तौ हैं। पर्र। यह मेरी उसमें घुस पाएगा.?
मैंने कहा – किसमें घुसने कि बातकर रही होँ.?
तोँ दिदी सकपका गयीँ,। औऱ झिझकते हुए बोलि – मेरी उसमें। तुम् लोग क्याँ कहते हौ उसको। जिससे हम् लड़कियाँ सूसू करती हें.
मे – मुझे क्याँ पता दिदी। तुम् किससे सूसू करती हौ.?
दिदी – तूँ बहोत बदमाश होताजा रहा हैं। अरे भइया। वोँ। च.च। बुर मे। बता.घुस जाएगा?
मे – मुझे क्याँ मालूम? मैंने कभी घुसाया हैं क्याँ तुम्हारी बुर मे जोँ मुझेपता होँ? औऱ अगर तुम्हें डाउट हौ तोँ रहनेदो.
दिदी नें मेरे कूल्हे पऱ एक् ज़ोर कि चपत मारी औऱ मेरे लन्ड कों मसलकर बोलि – अब तोँ चाहे जोँ भि होँ, इसे तोँ मे आज लेँ कर हि रहूंगी अपनी बुर मे। भले हि फट हि क्यूं नाँ जाए.
औऱ दिदी मेरे लन्ड कों आगे-पीछे करनेलगी, मेरा लन्ड तौ उसके कोमलहाथ मे आते हि ठुमके लगारहा थां, अब तोँ उसके धैर्य कि सीमा हि खतम होतीजा रही थि, जिसके चलते उसने एक् बूँद अपनेरस कि सैंपल केँ तौर पऱ उसकोपेश कर दि। सफेद मोटी जैसी बूँद कों देखकर दिदी नें उसे अपनी उंगली पऱ रख लिया औऱ उसे देखने लगी.
मे – क्याँ देखरही होँ दिदी, जैसे मैंने तुम्हारे रस कों पीया हैं अमृतसमझ कर वैसे हि यह तुम्हारे लिए अमृत हैं, चखकर देखो.
दिदी नें शर्माते हुएउसे अपनीजीभ सें टच किया औऱ उसका स्वाद लेने कि कोशिश करतीरही। फिन उसने अपनी पूरी उंगली कों मुँह मे लें लिया.
मे – कैसा हैं.? तोँ दिदी नें आँखों केँ इशारे सें हि हामीभरी औऱ फिन अपनी उंगली मुँह सें निकाल कर बोलि – टेस्टी हैं.
तौ मैंने कहा - फिनदेख क्याँ रही हौ इसे मुँह मे लेकर प्रेम करो। चूसोइसे। जिससे यह तुम्हारी बुर कों अच्छे सें प्रेम देसके.
मेरीबात मान मुसकुराते हुए दिदी नें मेरे गर्म सुपाड़े कों अपने होंठों मे क़ैदकर लिया औऱ चूसने लगी औऱ फिन आहिस्ता उसनेउसे आधी लंबाई तक अपने मुँह मे कर लिया। मेरी उत्तेजना बढ़ती जारही थि। लन्ड एकदम कड़क होँ चुका थां, उसकी नसें फूलने लगी। मैंने उसका मुँह अपने लन्ड सें अलग हटाया तौ वोँ मुझे नाराजगी वालेभाव लाकर देखने लगी.
मैंने कहा - दिदी अब इसको अपनी प्यारी बुर मे लेने कां टाइम आँ गय़ा हैं औऱ उसको वहीं हरी-हरी घास पऱ लिटाकर दिदी केँ घुटनो कों मोड़कर उसकेपेट सें लगा दिया। मैंने अपने घुटने ज़मीन पर्र टिकाए फिन दिदी केँ कूल्हों कों अपनी जांघों केँ ऊपररखा। अब उसकी छोटी सि कुँवारी बुर ऊपर कों उभरआई, जिसे मैंने एक् बारफिन सें अपनीजीभ सें चाट लिया, औऱ दिदी कि बुर केँ होंठ खोलकर अपना मोटा टमाटर जैसा सुपाड़े उसके छोटे सें छेद पर्र भिड़ा दिया। मेरे सुपाड़े सें उसकी छोटी सि बुर एकदमढक सि गयीँ, थि। मैंने अपनीकमर कों हल्का सां पुश किया, जिससे वोँ दिदी कि गीली बुर मे सेट हौ गय़ा। इतने सें हि दिदी केँ बदन मे झुरझुरी सि दौड़ गई, औऱ दिदी नें अपनी आँखें कसकरबंद करली.
मैंने एक् हल्का सां धक्का अपनीकमर कों लगाया तौ मेरा सुपाड़ा आधे सें थोडा ज्यादा अंदरसमा गय़ा औऱ वोँ किसी दीवार जैसीपरत पऱ जाकरफंस गय़ा जौ शायद उसकी झिल्ली थि। रमा दिदी केँ मुँह सें एक् हल्की सि चीख निकल गई, औऱ उसकी आँखों मे पानी आँ गय़ा.
मैंने दिदी कों एनकरेज करतेहुए कहा – दिदी थोडा मैनेज करना पड़ेगा। औऱ फिन एक् लंबी साँस लेकर एक् जोरदार धक्का लगा दिया.
दिदी – आआययययय ययययययीीईईईईईई। माआआआअ। मररर्र्र्ररर। गाइिईईईईईईईईई। रीईईईईईईईई। आआआआअहह.
एक् फ़च कि आवाज़ केँ संग उसकी झिल्ली फट गयीँ,। औऱ एक् खून कि धार मेरे लन्ड कि साइड सें निकली। मेरा लन्ड भि दर्द करनेलगा थां। शायद उसकी बुर कि झिल्ली सें वोँ भि रगड़ गय़ा थां। 5-7 मिनिट मे यूँ हि पड़ारहा। दिदी केँ उपर, औऱ इस दौरान मे उसके आँसू पोंछता रहा, उसको ढाढ़स देतारहा। फिन उसकोचुप कराकर। उसके होंठो कों चूसा। उसकी चुचियों कों सहलाया। तब जाकर वोँ नॉर्मल हुई। औऱ मेरा भि दर्दकम हुआ.
कुछ देरबाद मैंने पूछा – दिदी अब दर्द तौ नहि हैं?? तोँ उसने नां मे सर हिलाया औऱ बोलीं – पूराचला गय़ा कि नहि??
मे – हां करीब-करीब। बस थोडा औऱ बाकी हैं। जबकि अभि मेराआधा लन्ड हि गय़ा थां.
अब मैंने आधे लन्ड कों थोडा बाहर् कों निकाला। लन्ड केँ संग उसकी बुर कि अंदर कि परत भि बाहर् तक आई औऱ संग हि उसकी कराह भि निकल गई,। मे थोडा रुका औऱ फिन सें उतना अंदरकर दिया तौ वोँ फिन कराही। ऐसे हि बड़े ध्यान सें आहिस्ता मैंने अपनेआधे लन्ड कों अंदर-बाहर् किया.कोई 20-25 बार मे हि दिदी कि बुर फिन सें गीली होनेलगी औऱ उसको दर्द होनाबंद हौ गय़ा। अब वोँ भि मेरेसंग सहयोग देनेलगी। दिदी कि बुर सें सफ़ेद-सफ़ेद रस निकलरहा थां। मैंने मौकादेख एक् औऱ भरपूर धक्का मार दिया औऱ पूरा लन्ड दिदी कि बुर मे डालकर रुक गय़ा.
दिदी - ऊ.माआ.मार दलाअ.रीए। भेह्न्चोद। साले। औऱ कितना डालेगा। तेरायह खूँटा मेरेपेट तक तौ पहुँच गय़ा.
मे – बसयहएंड होँ गय़ा। दिदी। अब तेरी बुर हि इतनी छोटी हैं। तोँ इसमें बेचारे मेरे खूँटे कां क्याँ दोष औऱ उसकी चुचियों कों मसलते हुए उसके होंठों कों चूम लिया। थोड़ी देर केँ बाद मैंने फिन सें धक्के लगाना शुरुआत कर दिया.कोई 5 मिनिट बाद हि दिदी भि नीचे सें अपनीकमर उचकाने लगी औऱ मेरे धक्कों कां संग देना शुरुआत कर दिया.
दिदी - आहह-आहह। छोटुऊ.जल्द-जल्द कर। बहोत मज़ाअ। आरहाआ। हैं.सस्सिईईईई। हान्न्न.औऱ ज़ॉर्सईए.हाईए.रीए.कितनाअ.मज़ाअ.आट्टाअ.चूड़नीई.मीईंन.शाबास औऱ.टीज़्जज.उफफफ्फ़। मे.गाइिईईईई.रीई.ओह.गोद्ड़द्ड.
वोँ जोर सें मेरीकमर मे दिदी अपने पांव लपेटकर चिपक गई, औऱ इतनीतेज़ झड़ी कि तमाम गाढ़ा-गाढ़ा रस मेरे लन्ड कि साइड सें बहनेलगा। मेरे धक्कों कि गति धीमीपड़ गई, थि क्योंकि दिदी नें मुझेतेज़ कसरखा थां मगर मेरा होना अभि बाकी थां तौ धक्के लगाता रहा.जब दिदी थोडा होश मे आई तौ बोलीं- भइया.घास सें मेरीपीठ छिलने लगी हैं। तोँ मे उसे लेकर खड़ा होँ गय़ा। मेरा डंडाइस वक़्त 90 डिग्री खड़ा थां, जौ अकड़कर किसी सख्तरॉड कि तरहलग रहा थां। मैंने दिदी कि जाँघों केँ नीचे सें हाथडाल करउठा लिया, औऱ अपने सुपाड़े कों दिदी कि ताजीफटी बुर केँ छेद पर्र स्लिम कर दिया.
दिदी नें अपनी बाहें मेरेगले मे लपेटली थि, जैसे हि मेरा लन्ड उसकी बुर मे सेटहुआ। दिदी नें उसके जिस्म केँ भार कों नीचे कि ओरआने दिया। नतीजा। धीरे-धीरे-2 पूरा लन्ड उसकी बुर मे समा गय़ा। दिदी एक् बारफिन दर्द सें बिलबिला उठी, क्योंकि अभि कुछ लम्हा पहले हि दिदी कि बुर घायल हुईँ थि औऱ अब एक् संग मेरा पूरा मूसल एक् हि संग समाकर उसकेपेट तक ठोकर मारने लगा थां। हम् दोनों केँ प्रयास सें दिदी दो-चार बार धीरे-धीरे ऊपर नीचे हुई, लन्ड किसी पिस्टन कि तरह अंदर जाता, बाहर् आता। जिसे दिदी अपनी खुली आँखों सें देख भि रही थि। दिदी फिन सें गर्म होनेलगी औऱ मेरे लन्ड पर्र कूदने लगी। मुझे इतनामजा आँ रहा थां जिसे शब्दों मे बयान नहि कियाजा सकता.
10 मिनिट खड़े –खड़े चोदने केँ बाद हम् दोनों एक् संग झड़ने लगे, वोँ मेरे सीने सें ऐसी चिपक गई,, जैसे कि कभीअलग हि नाँ होना हौ। हम् दोनों एक् बारफिन झील मे उतारकर नहाए, एक् दूसरे केँ जिस्म कों साफ किया औऱ फिन बाहर् आकर अपने-अपने कपड़े पहने, बुलेट मे किक लगाई औऱ अपनेघऱ कों चलदिए.
रास्ते मे मैंने दिदी सें पूछा – दिदी अब तोँ खुश हौ नाँ? यह सुनते हि उसने मुझे पीछे सें अपनी बाँहों मे कस लिया औऱ मेरी गर्दन कों चूमते हुए.
दिदी – थैंक्स भइया, आज तूने मेरा वर्षों कां सपना पूराकर दिया.
मे – तोँ क्याँ तुम् वर्षों सें मेरेसंग यहसभी करने कां सोचरही थि.?
दिदी – सच कहूँ तोँ हां.हर लड़की अपने जिंदगी मे इसदिन कां बड़ी बेसब्री सें प्रतीक्षा करती हैं, जब वोँ एक् कली सें फूल बनना चाहती हैं। वोँ एक् लड़की सें महिला बनती हैं। मगर मुझेपता नहि क्यूं बाहर् केँ लड़कों पऱ कभी भरोसा नहि हुआ, इसलिये मे तेरेसंग वोँ सभी करती रहती थि कि शायद तूँ मेरी फीलिंग्स कों समझे.मगर बहोत कोशिशों केँ बाद भि तूँ मेरी भावनाओं कों, मेरे इशारों कों नहि समझा, तब मैंने तेरेऊपर नज़र रखना शुरुआत कर दिया, औऱ मुझे तेरे औऱ भाभी केँ बारे मे शक़ होनेलगा। जब भाभी तेरी मालिश करतीथीं, तौ छुप-छुप कर मे सभी देखा करती थि। वोँ भि जिसदिन भाभी नें पहलीबार तेरा लन्ड मुँह मे लिया थां.
मे दिदी कि बातें सुनकर झटकाखा गय़ा फिन संभलते हुए बोला - तौ क्याँ तुम्हें भाभी औऱ मेरे संबंध सें एतराज हैं?
दिदी – बिल्कुल नहि। सच कहूँ तौ भाभी कों उनकाहक़ मिला हैं। उन्होंने हि तुम्हे ऐसा बनाया हैं, तुम्हे सँवारने मे अपने इतनेसाल गँवाए हें। तेरीहर परेशानी उन्होंने अपनेऊपर झेली हैं, तोँ तेरेऊपर पहलाहक़ तोँ उनका हि हैं। सच कहूँ तौ मे उनकेलिए बहोत खुश हूं। औऱ अब तौ तूने मुझे भि उस खुशी मे शामिल कर लिया हैं इसकेलिए मे हमेशा तेरी अहसानमंद रहूंगी मेरे प्यारे भइया.
यह कहतेहुए उसनेउचक कर मेरेगाल कों चूम लिया.रमा दिदी कि भावनाएँ आज खुलकर सामने आँ गयीँ, थि औऱ उसने जौ चाहा वोँ आजउसे मिल भि गय़ा थां। बुलेट कि आवाज़ सुनकर आस-पास केँ भि लोग हमारे दरवाजे पऱ आँ गये थें, मेरी व्यक्तित्व केँ हिसाब सें बुलेट एकदम मेरेलिए सही बाइक थि, जौ शायद भाभी कां हि सपना होँ मुझे बुलेट चलाते देख्ना। मैंने अपने दरवाजे पऱ पहुँचकर जैसे हि बाइक खड़ी कि, भाभी दौड़कर बाहर् आँ गई, उनकेहाथ मे आरती कि थाली थि। मे उतरने कों हुआ तौ उन्होंने हाथ केँ इशारे सें रुकने कों कहा औऱ मेरेसीट पऱ बैठे-बैठे हि मेरी आरती उतारी, अपने दोनों हाथों कों मेरेसर केँ दोनों ओर सें मेरी बलायें ली, फिन मेरे माथे कों चूमकर बोलि- अब आँ जाओ.
यह सभी बाबूजी दूर बैठेदेख रहे थें, उनकी आँखों मे पानी थां। फिन वोँ हमारे पासचले आए। भाभी नें जैसे हि उनकेपेर छुये, वोँ गदगद होँ गये औऱ उन्हें ढेरों आशीर्वाद दिए। दिदी मेरे पीछे सें उतरकर बैगहाथ मे लिएघऱ केँ अंदरजा रही थि, उसकीचाल कुछ बदली-2 सि देख भाभी कों कुछशक़ हुआमगर उन्होंने कुछकहा नहि। हमेंघऱ पहुँचते-2 साम केँ 4 बजगये थें, तौ भाभी नें हमेंगरम चाय ब्रेकफास्ट दिया, क्योंकि खाने कां तौ यह वक्त हि नहि थां.
दिदी ब्रेकफास्ट करके अपने कमरे मे आराम करनेचली गई,, वोँ बहोत थकान महसूस कररही थि। अब मे औऱ भाभी हि रहगये तौ वोँ मुझे अपने कमरे मे लेँ गयीँ,, औऱ हम् दोनों बिस्तर पऱ लेटे-लेटे बात करनेलगे.
भाभी – औऱ सुनाओ अंकुश। कैसारहा तुम्हारा शहर कां सफ़र। बड़े देवरु नें कुछ खातिर कि अपने छोटे भइया बेहन कि याँ ऐसे हि टरका दिया.
मे – अरे भाभी, पुछोमत! क्याँ रुतबा हैं भैया कां। पुलिस वाले उनके आगे-पीछे घूमते हें औऱ फिन मैंने वहा भैया केँ संग जोँ-जोँ खरीदारी कि वोँ सभी बताया, फिन दूसरे दिन मूवी देखी.
भाभी – अच्छा अंकुश, अब मे जौ पूछूं। उसका सच-सच जवाब दोगे.?
मे – क्याँ भाभी ! आपको लगता हैं कि मे आपसेकभी झूठ भि बोल सकता हूं.?
भाभी – नहि, ऐसाअब तक तौ नहि हुआ हैं पऱ यह प्रश्न हि ऐसा हैं कि शायद इसका तुम् जवाब हि नां देना चाहो.
मे – आप् निश्चिंत रहो भाभी, मेरे जिंदगी मे आपसे बढ़कर ऐसीकोई बात नहि हैं जौ मे आपसे शेयर नां कर पाऊं। आप् पुछिये क्याँ पूछना हैं.
भाभी – मुझेशक़ हैं कि तुम्हारे औऱ रमा केँ बीचऐसा कुछहुआ हैं, जौ मुझेपता नहि हैं। आजजब वोँ बाइक सें उतरकर अंदर आँ रही थि, तौ उसकीचाल कुछ बदली-2 सि लगरही थि। यह कहकर वोँ मुझे सवालिया नज़रों सें घूरने लगी.
मे कुछदेर चुपरहा औऱ फिन नज़रें नीची करके बोला - सॉरी भाभी!आज सें पहले तोँ ऐसाकुछ नहि थां हम् दोनों केँ बीच पऱ आज हि.
भाभी – हांकहो आज हि क्याँ.? बताओ मुझे। वोँ मेराहाथ अपनेहाथ मे लेकर बोलि.
मे – आज सें पहले हम् दोनों केँ बीचबस कुछ बराबर केँ लड़के-लड़कियों जैसी थोड़ी बहोत छेड़-छाड़ होती रहती थि, जौ मेरेलिए तौ बस एक् नॉर्मल भइया-बेहन वाली हि छेड़-छाड़ जैसी थि, मगर दिदी कि भावना कुछअलग हि थि मेरेलिए। कलजब हम् मूवीदेख रहे थें तब औऱ फिन मैंने जौ भि हम् दोनों केँ बीचहुआ, औऱ फिन दिदी नें जौ बताया वोँ सभी मैंने भाभी कों बता दिया, जिसे सुनकर वोँ एकदम सकते मे आँ गई,। फिन मैंने आज जोँ कुछ हम् दोनों केँ बीचहुआ वोँ भि सभीबता दिया। उसकेबाद रास्ते मे जौ हमारी बातें हुई वोँ भि बता दि। तब जाकर उनको थोडा तसल्ली हुई.
मे – अब आप् हि बताओ भाभी इसमें मैंने कुछ ग़लत किया.?कुछ देर वोँ चुप-चाप मेरे चेहरे कों देखती रही.
फिन कुछसोच भाभीकर बोलि – वैसे एक् तरह सें देखाजाए, तोँ रमा भि अपनी स्थान सही हैं। आख़िर उसकी भि उम्रयह सभी करने कि हैं हि, औऱ ज़्यादातर लड़के लड़कियाँ इस उम्र मे बहककर ग़लत-सलत कदमउठा लेते हें। जिससे बदनामी कां भि डर पैदा होँ जाता हैं। मगरअब तुम् दोनों एक् लिमिट मे रहकर हि यहसभी आगे करना, वैसे मे उससे भि बात करूँगी। पऱ तुम् भि यहबात ध्यान रखना कि अब अपनामाल उसके अंदरकभी मत छोड़ना, ठीक हैं?
फिन भाभी नें मेरे होंठों पऱ एक् किस करकेकहा – अब तुम् थोडा अपने कॉलेज पर्र ध्यान दो, कल सें रेग्युलर क्लास अटेंड करना.
थोडा स्माइल करतेहुए भाभी बोलीं - औऱ हां, वक़्त निकाल कर थोडा छोटी चाची केँ पासचले जायाकरो.
मे – क्यूं ? उनको मुझसे क्याँ काम हैं। मैंने आपको बताया थां नाँ, उनके बारे मे.
भाभी – इसीलिए तौ कहरही हूं, मेरे प्यारे देवर जी अंकुश उन्हें तुम्हारी ज़रूरत हैं। विवाह केँ इतने सालों बाद भि वोँ मम्मी नहि बनपाई। बेचारी अधूरी सि हें। तोँ तुम् थोडा कोशिश करो। प्लीज़। उन्हें भि खुशी होगी.
मे – क्याँ आप् भि यही चाहती हें.?
भाभी – मे भि यही चाहती हूं। इसलिये तोँ कहरही हूं। कहो! दोगे नाँ उन्हें यह खुशी?
मे – मेरी भाभी कां हुकुम सर आँखों पऱ फिन मैंने उनको अपनी बाँहों मे कस लिया। पहले अपनी डार्लिंग भाभी कों तोँ खुशीदे दूं, यह बोलकर उनके होंठ चूसने लगा.फिन हम् दोनों हि अपनाआपा खोतेचले गये, दीं दुनिया सें बेख़बर एक् दूसरे मे समाते चलेगये.
दूसरे दिन मे अपनी बुलेट सें कॉलेज पहुंचा। कॉलेज कि नई बिल्डिंग भि हमारे पुराने विद्यालय सें हि सटी हुइ थि। बसगेट हि अलग थां। कॉलेज कां यह पहला हि साल थां औऱ ज़्यादातर हमारे विद्यालय सें पासहुए बच्चे हि थें तौ सब जानते हि थें। मुझे बुलेट पऱ देखकर सारे फ्रेंड्स नें मुझेघेर लिया, औऱ वाहन कि खुशी मे जश्न माँगने लगे, तौ मुझेसब कों गरमचाय ब्रेकफास्ट कराना पड़ा। अभि भि अड्मिशन चल हि रहे थें। कालेज केँ प्रिन्सिपल मेरे पापा केँ साथी थें। औऱ ऊपर सें मे अपने विद्यालय कां टॉपर थां तोँ उन्होंने मुझे अपने ऑफीस मे बुलाया औऱ मुझसे थोडा कालेज केँ कामों मे सहायता करते रहने केँ लिएकहा। क्लास तौ अभि लगने नहि थें, तोँ टीचर्स केँ संग इंटरेक्शन कर केँ मे जल्द हि वापसघऱ लौटआया.
अभि व्हीकल स्टॅंड कि हि थि, कि भाभी बोलि – अंकुश थोडा छोटी चाची केँ यहाचले जाओ। उनकोकुछ काम हैं। शायद बाज़ार जानां हैं उनको.
मे उल्टे पांव चाची केँ घऱ पहुंचा। वोँ नहा धोकर रेडी होँ रही थि। थोडा सां मेकअप भि कियाहुआ थां, जैसा देहात मे नॉर्मली औरतें करती हें। जैसे क्रीम, पाउडर। हल्की सि लाली होंठों पर्र, बारीक आँखों मे काजल। इतने मे हि चाची चमकरही थि, साड़ी भि थोडा कसकर लपेटे हुईँ थि, जिसमें उनके उभरेहुए कूल्हे कुछ ज्यादा हि मादकलग रहे थें। मैंने जाकर चाची कों आवाज़ दि, तोँ वोँ अपने कमरे सें बाहर् आई। सीने पर्र साड़ी कां पल्लू कसकर कंधे पर्र पिन किया हुया थां। मेरी नज़र मे वोँ एकदममाल लगरही थि, जिसेअगर मिलजाए तौ कोई भि चोदने कों रेडी हौ जाए.
चाची – आँ गये अंकुश.
मे – जी चाची, क्याँ काम थां बोलिए??
चाची – मुझे थोडा बाज़ार जानां थां, अब तुम्हारे चाचा तोँ वक्त देते नहि हें। सुभह विद्यालय, फिनखेत। होँ सके तौ मेरेसंग थोडा बाज़ार तक चलो नां। इसी बहाने तुम्हारी बुलेट पर्र बैठने कां मौकामिल जाएगा मुझे भि इतनाकह कर वोँ हँसने लगी.
मे – अरे क्यूं नहि चाची। वैसे लगता हैं आप् बाज़ार मे आज बिजलियाँ गिराने वाली हौ। क्याँ लगरही हौ, मैंने अपने उंगली औऱ अंगूठे कों मिलाकर टंचमाल कां इशारा किया.
चाची शर्मा करसर झुककर मुस्कराते हुए बोलि – क्याँ अंकुश तुम् भि कैसी मज़ाक करते होँ, मे ऐसी भि हसीन नहि लगरही.
मे – नहि चाची सच मे आज आप् एकदम मस्तमाल लगरही होँ.
चाची – हाए अंकुश, अपनी चाची कों हि मालबोल रहे हौ, बहोत बिगड़ते जारहे हौ। लगता हैं जेठ जी कों बोलकर जल्द हि फेरे करवाने पड़ेंगे तुम्हारे.
मे – अब यहीं खड़े-2 फेरे करवाएँगी मेरे, याँ बाज़ार भि चलना हैं?
चाची – हांचलो, मे तोँ एकदम तैयार हूं। तुम् अपनी फट-फटी तौ लाओ। चाची मेरे पीछे एक् तरफ कों दोनों पांव करकेबैठ गयीँ,, औऱ बोलीं- अंकुश यह तुम्हारी हथनी जैसी वाहन हैं, थोडा संभाल कर चलना। मुझे तोँ डर लगता हैं.
मे – आप् चिंता नां करो, बस आप् मुझे पकड़े रहना। तोँ उन्होंने अपना एक् हाथ मेरे कंधे पऱ रख दिया। औऱ थोड़ी तिरछी सि होकरबैठ गई,। मैंने कार बाज़ार कि तरफ बढ़ा दि। अभि देहात सें निकले हि थें, चौथा गियर डाला हि थां, कि एक् गाय सामने आँ गई। मुझे एक् संग ब्रेक लगाने पड़े, औऱ चाची कां वजन मेरेउपर। उनकी 36” कि चुचि जोँ अभि तक कोई बच्चा नां होने कि वजह सें अभि भि मस्तठोस बनी हुइ थि मेरीपीठ सें दब गयीँ,.
चाची डर गई, औऱ बोलि – अंकुश, लगता हैं मारोगे मुझेआज। मैंने तुम्हारे संगआकर गलतीकर दि.
मे – चाची आप् डरती बहोत हौ। अबयह साइकल तौ हैं नहि जौ धीरे-धीरे-2 चलेगी। ब्रेक तौ लगाने हि पड़ते हें। आप् एक् कामकरो, मेरीकमर पकड़लो कसके.
तोँ चाची नें मेरीकमर मे अपनी बाजू लपेट दि औऱ सटकरबैठ गई,। उनकी चुचियों कि चुभन मे अपनीपीठ पऱ महसूस कररहा थां, जिससे मेरा लौड़ा पैंट मे खड़ा होनेलगा.
कस्बे कां बाज़ार थोड़ी दूर हि थां, सो 10 मिनिट मे हि बाज़ार पहुँच गये। चाची अपना समान खरीदने लगी। सारा समान लेने केँ बाद वोँ अंडर गारमेंट कि एक् छोटी सि दुकान पऱ पहुँची.
दुकानदार देखते हि बोला – आइए.आइए। बेहनजी इसबार तोँ आप् काफ़ी दिनों केँ बादआई हें, बोलिए क्याँ दिखाऊ?
चाची नें अपनी पुरानी ब्राबैग सें निकाली औऱ बोलि – भैया मुझे अपनेलिए ब्रा औऱ पैंटी लेनी थि, यह ब्रा छोटी होँ गयीँ, हैं, इससे बड़ा साइज़ कां दीजिए.
दुकानदार नें एक् बार मेरीओर देखा, औऱ बोला – अब बेहनजी ऐसे अंदाज़े सें तोँ केसेपता लगेगा आप् अपना नंबर तौ बताइए। यह पुरानी तोँ 34 कि हैं औऱ इसकेऊपर 36 कि हि आतीअब वोँ अगर ढीली, टाइट हुई तोँ?
चाची – नहि होगी वोँ हि देदो आप्.
एक् बार उसने चाची केँ पल्लू सें ढके पपीतों पर्र नज़र डालते हुए बोला – ठीक हैं, मुझे क्याँ हैं मे दे देता हूं 36 नंबर कि ब्रा.
फिन वोँ दो टाइप कि ब्रा निकाल केँ लाया। एक् जौ बड़ेकप वाली, जिससे चुचियों कां ज्यादातर हिस्सा ढकसके, औऱ एक् ऐसी जिसमें सें निप्पल केँ संग-संग उनका निचला हिस्सा हि ढक पाता। चाची नें बड़ेकप वाली ब्रा सेलेक्ट करली.जब वोँ दुकानदार पैंटी लेने अंदर गय़ा.
तौ मैंने चाची केँ कान मे फुसफुसा करकहा - चाची यह दूसरी वाली ब्रा आपको अधिक अच्छी लगेगी.
चाची नें मुझे गहरी नज़र सें घूरा औऱ स्माइल करतेहुए बोलि – अंकुश इसमें तोँ कुछ ढकेगा हि नहि उलटा दिखेगा अधिक.
मे – अरे चाची थोडा मॉर्डन बन केँ चाचा केँ सामने जाओगी तौ उन्हें ज्यादा अच्छा लगेगा औऱ आपको ज्यादा प्रेम करेंगे नाँ.
चाची – अरे उन्हें तौ मे बिना कपड़ों केँ भि.
इतना फ्लो मे बोल तोँ दिया, फिन शर्मा करचुप हौ गयीँ,। फिन नाँ जाने क्याँ सोचकर उन्होंने एक् छोटेकप वाली ब्रा भि लें ली.अब तक दुकानदार दो-तीन तरह कि पैंटी लेकरआया, औऱ मेरे इशारे पऱ उन्होंने एक् माइक्रो पैंटी भि लेँ ली.
लौटते मे चाची नें मुझ सें पूछा – अंकुश तुमने किसी कों पहलेऐसी पैंटी औऱ ब्रा पहने देखा हैं?
चाची कां प्रश्न सुनकर मुझे झटका सां लगा.
मैंने हड़बड़ा करकहा - नं.नं.नहि तौ चाची। मैंने तोँ किसी कों नहि देखा.
चाची – तोँ फिन तुम्हें केसेपता कि वोँ मुझपर अच्छी लगेगी.?
मे – व.वऊू.तोँ बसऐसे हि कहा थां छोटे कपड़ों मे बदन ज्यादा सेक्सी लगता हि हैं.
चाची नें मेरीपीठ पऱ हौले सें एक् थप्पड़ लगाया औऱ हँसते हुए हम्म्म। शैतान कहकरचुप हौ गई,। मैंने उन्हें उनकेघऱ उतारा.
जब मे चलनेलगा तौ चाची बोलि – अंकुश थोडा रुको तोँ सहीकुछ खा-पीकर चले जानां.
मे – अरे नहि चाची, मे अबघऱजा केँ खानां हि खा लूँगा.
चाची – हां भइया, अब घऱ मे इतनीलाड करने वाली भाभी हौ तोँ चाची केँ हाथ कां खानां क्यूं अच्छा लगेगा?
मे – ऐसीबात नहि हैं चाची अच्छा ठीक हैं, आप् चलो, मे कपड़े चेंज करके 10 मिनिट मे आता हूं, फिन देखता हूं आप् क्याँ खिलाती हें। मुझे.
चाची हँसते हुए अपनेघऱ केँ अंदरचली गई,, औऱ मे अपनेघऱ कि तरफ.घऱ आकर मैंने अपने कपड़े चेंजकिए औऱ एक् हल्की सें टीशर्ट औऱ बिना कच्छे केँ एक् हल्का सां होजरी कां लोवरपहन लिया, जिससे गर्मियों मे थोडा कंफर्टबल फील हौ। टाइट जीन्स मे सुभह सें हि मेरा घोड़ा जौ कईबार टाइटहुआ थां उसको भि राहत हुईँ, औऱ वोँ अब खुला-खुला फीलकर रहा थां। भाभी नें खाने केँ लिए बोला, क्योंकि अभि दोपहर का खाना कां वक्त थां.
मैंने कहा मे चाची केँ यहाजा रहा हूं, उन्होंने खाने केँ लिए बुलाया हैं। अब देखते हें क्याँ खिलाती हें.?
भाभी नें मुझे गहरी नज़र सें देखा.मगर मेरे चेहरे सें उन्हें ऐसा-वैसा कुछ नज़र नहि आया। तौ फिन हँसती हुई बोलि.ठ.हीककक.हैं, जाओ.आज अपनी चाची कां लाड भि देखलो.
मे उनको एक् स्माइल देकरघऱ सें निकलआया औऱ चाची केँ यहा पहुंचा.
चाचा भि विद्यालय सें आँ गये थें, औऱ खानां खारहे थें, चाची नें मुझे भि बिताया औऱ खानां दे दिया। हम् दोनों नें संग-संग खानां खाया.कुछ देर इधर-उधर कि बातें हुइ। फिन चाचा अपने खेतों कि ओरचले गये.तब तक चाची भि खानां खा चुकी थि चाचा केँ जाने केँ बाद मैंने भि चाची सें कहा – चाची मे भि निकलता हूं.
चाची - तुम् रुको तुमसे अभि एक् ज़रूरी काम हैं.
मे फिन सें उनके बिस्तर पऱ बैठ गय़ा.औऱ बोला-हां चाची बताइए, क्याँ काम हैं.?
चाची मेरेपास बैठ गई, औऱ कुछदेर मेरीओर देखती रही.फिन उनकी नज़र नीचे कों होँ गयीँ, औऱ अपनी सारी केँ पल्लू कों अपनी उंगली मे लपेटे हुए बोलि.
चाची – अंकुश मे वोँ नाँ। वोँ जोँ कपड़े तुमने पसन्द किए थें नां। उनके बारे मे बात करनी थि तुमसे.
मे – उनके बारे मे मुझसे क्याँ बात करनी हैं चाची.?
चाची – अबऐसे कपड़े मैंने कभीलिए तौ नहि थें, नां जाने केसे लगेंगे। ?
मे – अरे तौ इसमें क्याँ हैं, एक् बारपहन करदेख लीजिए नाँ ! पताचल जाएगा.
चाची – मगर मे स्वयं केसेदेख पाऊँगी.?
मे – पहनकर शीशे केँ सामने खड़ी होकरदेख लेना औऱ केसे.
चाची – इतना बड़ा शीशा होना भि तोँ चाहिए नाँ। औऱ मेरेपास मोहिनी बहू जैसी वोँ क्याँ कहते हें, हां वोँ ड्रेसिंग टेबल तौ हैं नहि.
मे – ओह ! ड्रेसिंग टेबल.
चाची – हांवही। तौ अब केसे देखूं.? क्याँ तुम् मुझे देखकर बता दोगे.?
मे – मे। मे। केसेदेख सकता हूं। आपकोउन कपड़ों मे.? आप् एक् काम करिए, भाभी याँ रमा दिदी कों दिखा दीजिए। वोँ आपकोबता देंगी केसे लगते हें आप् पर्र.
चाची – कैसी बातें करते हौ अंकुश। मे भलाऐसे कपड़ों कों मोहिनी बहू याँ रमा बिटिया कों केसे दिखा सकती हूं? वोँ क्याँ सोचेंगी मेरे बारे मे? कि देखो चाची कों इसउमर मे ऐसे कपड़ों कि क्याँ ज़रूरत पड़ गयीँ, ? सच मे तुमने तौ मुझे फँसा दिया अंकुश.! अब तुम्हें हि देखकर बताना पड़ेगा हां ! औऱ वैसे भि तुम् हमारे घऱ मे सबसे छोटे हौ, ऊपर सें तुमने एक् दिन मुझे वैसी हालत मे देख भि लिया थां तौ तुम्हारे सामने मुझे झिझक थोड़ी कम होगी.
मे – ओह चाची ! तोँ आप् चाचा कों हि क्यूं नहि दिखा देती?
चाची – वोँ तोँ देखते हि मरखने बैल कि तरह भड़क उठेंगे, छूटते हि कहेंगे यह क्याँ रंडियों जैसे कपड़े लें आई हौ?
फिन वोँ मेरेहाथ अपने हाथों मे लेकर बोलीं – अबअगर तुम् भि नहि देख्ना चाहते तोँ कलउन कपड़ों कों वापसकर देना, जब कॉलेज जाओतब.
मे - ओह चाची ! अच्छा चलोअब !। ठीक हैं आप् पहनो मे देख लेता हूं कि आप् कैसी लगती हौ उन कपड़ों मे?
चाची – तुम् एक् कामकरो दो मिनिट बाहर् चलेजाओ, मे तब तक वोँ पहन लेती हूं, फिन तुम्हें आवाज़ दे लूँगी.
मे उठकर बाहर् उनके आँगन मे चला गय़ा। फिनकोई 10-15 मिनिट केँ बाद चाची नें मुझे आवाज़ देकर अंदर बुलाया। चाची गले तक एक् चादर ओढ़ेहुए बिस्तर केँ पास खड़ी थि। मुझे देखते हि उन्होंने नज़रें झुकाली.
मे – हां चाची वोँ कपड़े पहने याँ नहि? दिखाओ.
तोँ चाची नें झेंपते हुए धीरे-धीरे-2 अपने जिस्म सें चादरअलग कि औऱ अपनी नज़रें नीचीकिए पेर केँ अंगूठे सें फर्श कों कुरेदने लगी। एक् मिनी ब्रा औऱ छोटी सि पैंटी मे कसे उनके मादक गदराए। गोरे शरीर कि सुंदरता मे मे तोँ खो सां गय़ा। वोँ इन कपड़ों मे मियाँ खलीफा कों भि मातदे रही थि। बड़े-बड़े पपीते जैसे उनके कठोर वक्ष, जोँ अब भि अपनी कठोरता बरकरार रखेहुए थें, जिनका निप्पल सें ऊपर कां पूरा हिस्सा खुलाहुआ थां। ब्रा केँ कप कि चौड़ाई भि सिर्फ 3” सें ज्यादा नहि थि, जिससे दोनों चुचियों कि पुष्टता एकदमसाफ-2 दिखाई देरही थि। 30 कि उमर मे भि उनकापेट ज़रा भि बाहर् नहि निकला थां, हां हल्की सि मांसलता अवश्य थि, जौ उनके खूबसूरती मे औऱ चार चाँदलगा रही थि। खूब गहरी नाभि, जोँ थोड़ी सि नीचे कि तरफ झुकी हुइ, उनकी सेक्स अपील कों दर्शा रही थि। मांसल केले केँ तने जैसी जांघों केँ बीच, दुनिया कां अनमोल खजाना। माइक्रो बिकनी मे सही सें ढक भि नहि रहा थां, साइड सें उनकी झांटो केँ बाल निकलकर अपनी उपस्थिति दर्जकरा रहे थें, शायद महीने भर सें साफ नहि किए होंगे.
कसी हुईँ पैंटी मे उनकी रसीली केँ होंठ अपनी पुष्टता दिखाने सें बाज़ नहि आए औऱ उनका उठान, फिन उनकेबीच कि दरार साफ-साफ अपना इंप्रेशन देरही थि। जब बहोत देर तक मैंने कुछ नहि कहा, बस यूँ हि खड़ा उनकेरूप लावण्य मे खोयारहा, तोँ चाची नें अपनी नज़र उठाकर एक् बार मेरीओर देखा, औऱ मुझे अपने शरीर कों निहारते पाकर, एक् बारफिन सें उनकी नज़र लज्जा सें झुक गई,.
चाची - बताओ नाँ अंकुश.! कैसीलग रही हूं मे इन कपड़ों मे.?
मे - हां.! मे जैसे नींद सें जागा। थोडा पलटना चाची। मे एक् बार पीछे सें भि तौ देखलूँ। तब बताऊंगा.!
चाची जब पलटी तोँ.तौ.उनके कूल्हों कि पुष्टता देखकर मेरा मुँह खुला कां खुलारह गय़ा उनके 38” कि गान्ड पर्र वोँ छोटी सि पैंटी कि पट्टी सिर्फ़ उनकी दरार कों हि ढकपारही थि। ढक भि नहि पारही थि, बस उसमें फँसाने सें अपने आप् कों किसीतरह बचाएहुए थि। मेरे सब्र कां बाँध टूटने लगा थां, मे ठीक उनके पीछे जाकर खड़ा हौ गय़ा, मेरा लन्ड लोवर मे एक् दम सतर्क होकरनाग कि तरह अपनाफन फैलाए खड़ा होँ गय़ा। लोवर कां सॉफ्ट कपड़ा उसे संभालने मे असमर्थ दिखाई देरहा थां। मेरे लन्ड औऱ चाची कि गान्ड कि खाई केँ बीच सिर्फ 1” कां हि फासला बचा थां.
मैंने अपना मुँह थोडा आगे करके चाची केँ कान केँ पास लेँ जाकरकहा – चाची आप् सच मे बहोत खूबसूरत हौ.
मेरी आवाज़ अचानक अपने इतने नजदीक सुनकर वोँ हड़बड़ा गई,। इसी हड़बड़ाहट मे चाची औऱ थोडा सां पीछे कों हटी। मेरा खड़ा लन्ड उनकी पतली सि पैंटी केँ ऊपर सें उनकी गान्ड कि दरार सें अड़ गय़ा.
चाची कों इसका अंदाज़ा नहि थां। उनके मुँह सें सस्स्सिईईईईईईईईई। करके एक् मादक सिसकी निकल गयीँ, औऱ वोँ झट सें मेरीओर पलट गयीँ, मेरी आँखों मे देखकर बोलि - तुम् सचकहरहे होँ अंकुश? मे खूबसूरत दिखरही हूं नां इनमें? चाची कि आवाज़ मे कंपनसाफ-2 झलकरहा थां.
मे थोडा औऱ आगे बढ़ा औऱ उनके कंधों पऱ अपनेहाथ रखकर उनकी आँखों मे देखते हुए बोला – स्वर्ग सें उतरी हुइ किसी अप्सरा जैसी.!
चाची केँ होंठ थरथरा उठे.औऱ कंपकपाते हुए बोलीं - ओह.अंकुश। थैंकयू। तुमने मेरी तारीफ़ कि। इतनाकह कर वोँ मेरे सीने सें लग गयीँ,.
अब तोँ ग़ज़ब हि होँ गय़ा। साला लौड़ा उनकीठीक बुर केँ ऊपरजा टिका। चाची अपने पंजों पर्र खड़ी होकरउसे औऱ अच्छे सें अपनी बुर पर्र फील करना चाहती थि कि मेरे दिमाग़ नें झटका खाया.
फिन मैंने उनसेअलग होकरकहा - अब तौ आप् खुश होँ नाँ ! मैंने आपके कपड़े देखलिए, अब मे चलता हूं। औऱ यह बोलकर मे उनके कमरे सें बाहर् कों चल दिया.
अभि मे उनकेरूम केँ गेट पऱ हि पहुंचा थां कि पीछे सें चाची कि रुआंसी सि आवाज़ आई - तुम्हें अपनी मोहिनी भाभी कि सौगंध हैं अंकुश, जौ यहा सें कदम बाहर् रखा तौ.
मेरा एक् पेर कमरे केँ दरवाजे सें बाहर् थां, औऱ दूसरा अभि कमरे मे हि थां.
भाभी मेरेलिए सभीकुछ थि, मम्मी, यार, महबूबा। सभीकुछ। जिसने मुझेहाथ पकड़कर खड़ा किया थां। वरना मम्मी केँ बाद मेरा क्याँ होता.? भगवान जाने.
भाभी कि शपथ सुनते हि मेरे पांव जहाँ केँ तहाँजम गये., मे वहीं खड़ारह गय़ा.
चाची दौड़ती हुइ आई औऱ मुझे पीछे सें अपनी बाँहों मे कस लिया। मुझेयूँ छोड़कर नां जाओ अंकुश। मुझे तुम्हारी बाँहों कां सहारा चाहिए.उनकी मोटी-मोटी रसीले मगरठोस बूब्स मेरीपीठ पर्र दबी हुइ थि, अपनेगाल कों मेरी गर्दन सें सहलाती हुइ वोँ बोलीं.
मे – चाची प्लीज़ छोड़िए मुझे.यह ठीक नहि हैं। हमारे रिश्ते कां तौ ख्याल करिए.आप् मेरी मां समान हें.
चाची – तोँ क्याँ तुम् अपनी मम्मी कों दुखीदेख सकते थें.?
मे – आपको क्याँ दुख हैं। सभीकुछ तौ देरहे हें चाचा आपको.
चाची – महिला केँ लिए बांझ शब्द एक् बहोत बड़ी गाली होती हैं। अंकुश, जबपीठ पीछेलोग मुझे बांझ बोलते हें, सोचो मेरेदिल पऱ क्याँ बीतती होगी। जबकि मे अच्छी तरह सें जानती हूं कि मे बांझ नहि हूं.
मुझे भाभी केँ कहेहुए शब्दयाद आँ गये। (टाइम निकाल कर चाची केँ पासचले जायाकरो, उन्हें तुम्हारी ज़रूरत हैं.) इन शब्दों कां मतलबअब मेरीसमझ मे आँ रहा थां। फिन भि मे थोडा सेफ होने केँ लिए बोला.
मे – मगर मे चाचा केँ संग धोखा नहि कर सकता चाची.
चाची बिफर पड़ी। औऱ बोलि – धोखा.? जानते होँ धोखा किसे कहते हें.? एक् नामर्द कों मेरेगले मे बाँध दिया। धोखाइसे कहते हें। अपनेघऱ कि इज़्ज़त कि खातिर मे चुपबनी रही, औऱ अपने आप् कों बहकने सें रोकती रही औऱ उससे बड़ा धोखा, अब तुम् मेरेसंग कररहे होँ, मुझेइस हालत मे अकेला छोड़कर। कई मौकेऐसे आए जिनमें मुझेलगा कि तुम् मेरी भावनाओं कों समझने लगे होँ। मगर मे ग़लत थि। तुम्हें तोँ अपने चाचा हि दिखाई दिए.
उन्होंने अपनी बाँहों कां बंधन मेरेबदन सें हटा लिया औऱ सुबकते हुए बोलि – जाओ अंकुश तुम् भि जाओ, मे हूं हि अभागी, तौ इसमें तुम्हारा भि क्याँ दोष। इतनाबोल कर वोँ फफक-फफक कररो पड़ी, औऱ पलटकर बिस्तर पर्र पड़ी अपनी साड़ी पहनने केँ लिएउठा ली.
मैंने पीछे सें जाकर उनकेहाथ पऱ अपनाहाथ रख दिया, औऱ बोला – मत पहनोयह कपड़े चाची वरना मुझेफिन सें उतारने मे टाइम बर्बाद करना पड़ेगा.
चाची मेरीओर पलटी औऱ मेरे चेहरे पर्र नज़र गढ़ाकर बोलि – सच ! तुम् सचकहरहे.? याँ अभि भि मज़ाक तौ नहि कररहे.
मे – नहि यह एकदमसच हैं चाची। कोई मेरी चाची कों बांझ होने कि गालीदे, यह मुझसे बर्दाश्त नहि होगा.
चाची - ओह्ह्ह्ह.मेरे अंकुश अ। तुम् कितने अच्छे होँ। औऱ वोँ मेरे सीने सें लिपटकर आँसू बहाने लगी.
मैंने उनकी थोड़ी केँ नीचे उंगली लगाकर उनका चेहरा ऊपर किया औऱ आँसू पोंछते हुएकहा - प्लीज़ अब आप् रोइए नहि। मे आपकी आँखों मे आँसू नहि देख सकता., इतनाकहा कर मैंने अपने होंठ उनके लरजते होंठों पर्र रखदिए.
चाची मुझसे कसकर लिपट गई,। मैंने उनके नितंबों कों अपने हाथों मे लेकरकस दिया। तोँ वोँ औऱ तेज़ अपनी जांघों कों मेरी जांघों सें सटाने लगी। मेरा लन्ड जोँ कुछइस दौरान ढीलापड़ गय़ा थां। वोँ फिन सें अकड़ने लगा औऱ चाची कि नाभि मे अपना ठिकाना ढूँढने लगा। चाची नें उसे अपनी मुट्ठी मे कस लिया औऱ उसे मसलते हुए बोलि – अंकुश यह तुम्हारा लौड़ा ग़लत रास्ते कों ढूंढरहा हैं। इसे संभालो, नहि तौ मेरेपेट मे हि घुस जाएगा.!
मे – यहअब आपके हवाले हैं, इसेसही मार्ग दिखना आपकाकाम हैं.
फिन चाची नें मेरी टीशर्ट निकाल दि औऱ मेरी मजबूत कसरती छाती, जिसपर बालघने होतेजा रहे थें, कों सहलाते हुए बोलि – पूरे मर्द होँ गये होँ अंकुश। क्याँ मजबूत बना लिया तुमने अपनेबदन कों? एक् स्त्री कों ऐसी हि मजबूत छाती चाहिए अपनासर रखने केँ लिए। बहोत खुश नसीब होगी वोँ, जिसे ब्याह कर लाओगे.
मे – अभि तौ यह आपकेलिए हैं औऱ। औऱ। इससभी कि ज़िम्मेदार मेरी भाभी हें, उनकी मेहनत औऱ लगन कां नतीजा हैं, जोँ आज मे हूं.
चाची – सच मे बहोत समझदार औऱ सुशील हैं हमारी मोहिनी बहू। ईश्वर ऐसीबहू सभी कों दे.यहकह कर चाची नें मेरे सीने कों चूम लिया, फिन वोँ मेरे छोटे-2 निप्पल कों चूमने, चाटने लगी। मेरे जिस्म मे सुरसुरी सि होनेलगी औऱ मैंने उनकोअलग करके उनके दोनों खरबूजों कों तेज़मसल दिया। आअहह.अंकुश। एयाया। इतनेतेज़ नहि रजीईई। हान्ं.प्रेम सें सहलाते रहो। उफफफफ्फ़। सीईईईई.ऊहह। वोँ अपनीकमर कों मेरे लन्ड केँ चारों ओर घूमने लगी। उनकीपीठ पऱ हाथ लेँ जाकर मैंने उनकी ब्रा कों निकाल दिया। आअहह। क्याँ मस्त खरबूजे थें चाची केँ। एकदम गोल-मटोल। बड़े-बड़े, मगर सुडौल। जिनपर एक्-एक् काले अंगूर केँ दाने जैसे ब्राउन कलर केँ निप्पल जोँ अब खड़े होकर 1” बड़े होँ चुके थें.
मैंने उन दोनों कों अपनी उंगली औऱ अंगूठे मे दबाकर मसल दिया। चाची अपने पंजों पऱ खड़ी हौ गयि। औऱ एक् लंबी सें अह्ह्ह्ह। उनके मुँह सें निकल गई,। अब मैंने उनकी चुचियों कों चूसना, चाटना शुरुआत कर दिया थां, औऱ एक् हाथ सें मसलने लगा। चाची मादक सिसकियाँ लेतेहुए। कुछ नां कुछ बड़बड़ा रही थि। चूसकर, मसल-मसल कर मैंने उनके दोनों कबूतरों कों लालकर दिया.जब मैंने एक् हाथ उनकी छोटी सि पैंटी केँ ऊपररखा तोँ वोँ पूरीतरह कामरस सें तर कों चुकी थि। मे उनकेपेट कों चूमते हुए उनकी जांघों केँ बीचबैठ गय़ा। एक् बार पैंटी केँ ऊपर सें उसकी बुर कों सहलाकर किसकर लिया.
चाची - हइई.अंकुश। यह क्याँ करते हौ। भलावहा भि कोई मुँह लगाता हैं.
मैंने झिड़कते हुएकहा। आपकोमजा आँ रहा हैं नां। तौ उन्होंने हां मे मंडी हिला दि.
मैंने फिनकहा – तोँ बसचुप चापमजा लीजिए। मुझे कहां क्याँ करना हैं वोँ मुझे करने दीजिए। चाची सहमकर चुप होँ गई,। औऱ आने वाले मज़े कि कल्पना मे खोनेलगी। मैंने उनकीउस 4 अंगुल चौड़ी पट्टी वाली पैंटी कों भि उतार दिया। उनकी झांटो केँ बालों कों अपनी मुट्ठी मे लेकर हल्के सें खींच दिया.
चाची - हइई। अंकुश। खींच क्यूं रहे होँ.?
मैंने कहा – तौ यह जंगलसाफ क्यूं नहि किया.?
चाची –अंकुश। बसआजमाफ करदो, आज केँ बादयह कभी तुम्हें नहि दिखेंगे.
मे उनकी बुर चाटना चाहता थां, मगर झांटो कि वजह सें मन नहि किया। औऱ अपनी उंगलियों सें हि उसकेसंग थोड़ी देर खेला। उनकी बुर लगातार रस छोड़रही थि, जिसकी वजह सें उनकी झांटे औऱ जाँघें चिपचिपा रही थि.
चाची – औऱ मत तडपाओ अंकुश। नहि तोँ मेरीजान निकल जाएगी। चाची मिन्नत सि करतेहुए बोलि तौ मैंने उन्हें बिस्तर पर्र लिटा दिया, औऱ अपना लोवर निकाल कर, लन्ड कों सहलाते हुए उनकी जांघों केँ बीच आँ गय़ा.
चाची अपनी टाँगों कों मोड़ेहुए जाँघें फैलाकर लेटी थि। मेरे लौड़ा जैसे 8” लंबे औऱ सोते जैसे लन्ड कों देखकर उन्होंने झुरझुरी सि ली औऱ बोलि – अंकुश आहिस्ता करना। तुम्हारा हथियार बहोत बड़ा हैं.
मे – क्यूं ऐसा पहले नहि लिया क्याँ.?
चाची – लेने कि बात करते होँ अंकुश। मैंने तौ देखा भि नहि हैं अब तक ऐसा। मेरी इसमें अभि तक तुम्हारे चाचा कि लन्ड याँ फिन मेरी उंगलियों केँ अलावा औऱ कुछ गय़ा हि नहि हैं.
मैंने चाची कि झांटो कों इधर-उधर करके, उनकी बुर कों खोला, सच मे उनकाछेद अभि तक बहोत छोटा सां थां। मैंने एक् बार उनकी बुर केँ लाल-लाल अंदर हिस्से कों चाटा। चाची कि कमर लहराई। औऱ मुँह सें आससीईईईईईईई। जैसी आवाज़ निकल गयीँ,। अपने लन्ड पऱ थोडा सां थूक लगाकर मैंने सुपाड़ा चाची केँ छेद मे स्लिम किया औऱ एक् हल्का सां झटका अपनीकमर मे लगा दिया.
चाची - आहह-आहह। धीरीए। सीईईईईईई। बहोत मोटा हैं तुम्हारा लन्ड अंकुश… आधा भि नहि गय़ा कि चाची कराहने लगी थि.
मैंने उनके होंठों कों चूमते हुएकहा - बहोत कसी हुई बुर हैं चाची तेरी। मेरे लन्ड कों अंदर जाने हि नहि देरही। मेरे मुँह सें ऐसे शब्द सुनकर चाची मेरे मुँह कों देखने लगी.
मैंने कहा - खुलकर बोलने मे हि ज्यादा मजा हैं। आप् भि कहो। मैंने फिन एक् औऱ धक्का मार दिया औऱ मेरा 3/4 लन्ड उनकीकसी हुईँ बुर मे चला गय़ा, चाची एक् बारफिन कराहने लगी। मैंने धीरे-धीरे-2 लन्ड कों अंदर बाहर् किया.
चाची कि बुर लगातार पानी छोड़रही थि। मैंने धक्के तेजकर दिए। चाची अहह.ससिईहह। करके मज़े लेनेलगी, औऱ कमरउठा-2 कर चुदाई कां लुफ्त लूटने लगी, हमेंपता हि नहि चलाकब लन्ड पूरा कां पूरा अंदरचला गय़ा.
मे - आअहह.चाची क्याँ बुर हैं। तेरी। बहोत पानी छोड़रही हैं.
चाची - ओह्ह्ह। मेरे चोदु राजा। तेरा लौड़ा भि तोँ कितनी तेज़ कुटाई कररहा हैं मेरी ओखली मे। पानी नां दे बेचारी तौ औऱ क्याँ करेगी। अब चाची भि खुलकर मज़े लेँ रही थि औऱ मनचाहे शब्दबोल रही थि। मेरे मोटे डंडे कि मार उनकी बुर ज्यादा देर नहि झेलपाई औऱ जल्द हि पानी फेंकने लगी। चाची एक् बारझड़ चुकी थि, मे उनकीबगल मे लेट गय़ा औऱ उनको अपनेऊपर खींच लिया। चाची मेरेऊपर आकर मेरे होंठ चूसने लगी, मैंने उनकी चुचियों कों मसलते हुएकहा। चाची मेरे लन्ड कों अपनी बुर मे लो नां.
चाची – अह्ह्ह्ह। थोडा तोँ सबरकरो। मेरे सोना.फिन उन्होंने अपना एक् हाथ नीचे लेँ जाकर मेरे लन्ड कों मुट्ठी मे जकड़कर उसे अपनी गीली बुर केँ होंठों पर्र रगड़ने लगी, जिससे वोँ फिन सें गर्म होनेलगी। मेरे सुपाड़े कों बुर केँ मुँह सें सटाकर धीरे-धीरे-2 वोँ उसकेऊपर बैठने लगी। जैसे-जैसे लन्ड अंदर होताजा रहा थां। संग-संग चाची कां मुँह भि खुलता जारहा थां, संग मे कराह भि, आँखें मूंद गयीँ, थि उनकी.
पूरा लन्ड अंदर लेने केँ बाद वोँ हाँफने सि लगी औऱ बोलीं - हाईए.राम। अंकुश। कितना बड़ा लन्ड हैं तुम्हारा। मेरी बच्चेदानी केँ अंदर हि घुस गय़ा यह तौ। औऱ अपने पेडू पर्र हाथरख कर बोलि - उफफफफ्फ़। देखो। मेरेपेट तक चला गय़ा। फिन धीरे-धीरे-2 सें वोँ उसपर उठने बैठने लगी.हइई। अब तक यह मुझे क्यूं नहि मिला.अब मे मम्मी बनूँगी। इसी लौड़ा सें। उउफफफ्फ़। मेरे सोने राजा। मेरे अंकुश। केँ बीज़ सें।
maira Pyara Devar - niyantran – New Episode
UPDATE 12
ऐसे हि अनाप-शनाप बकती हुईँ चाची, लगरहा थां अपनाआपा हि खो चुकी थि। मैंने भि अब कमान अपनेहाथ मे लेँ ली औऱ उनके धक्कों कि ताल मिलाते हुए नीचे सें धक्के लगाने लगा। कमरे मे ठप-ठप कि आवाज़ें गूँजरही थि। दोनों हि पसीने सें तरबतर होँ चुके थें.
फिन जैसे हि मुझेलगा कि अब मेरा छूटने वाला हैं। मैंने झपटकर चाची कों फिन सें नीचे लिया, औऱ 20-25 तूफ़ानी धक्के लगाकर उनकी बुर कों अपनेमाल सें भर दिया.!
15 मिनिट केँ बाद चाची मेरेबगल सें उठी औऱ अपने कपड़े समेटने लगी। मैंने उनकाहाथ पकड़कर कहा – यह क्याँ कररही होँ चाची?
चाची – अरे फ्रेश तौ होनेदो। फिनगरम चायबना केँ लाती हूं। औऱ संग मे कुछ ब्रेकफास्ट भि कर लेंगे.
मे – ऐसे हि जाओ, जहाँ जानां हैं.
चाची अपने मुँह पर्र हाथ रखकर बोलीं – क्या बात है अंकुश तुम् तोँ बड़े बेशर्म हौ, औऱ मुझे भि बेशर्म बनाएदे रहे हौ। अबऐसे नंगी-पुंगी बाहर् केसेजा सकती हूं? किसी नें ऊपर सें देख लिया तोँ?
मे – तौ एक् चादरओढ़ लोबस हँसते हुए उन्होंने अपने जिस्म पऱ एक् चादरडाल ली औऱ बाहर् निकल गयीँ,.
बाथरूम तोँ जैसे मैंने पहले हि कहा हैं। ओपन हि थां, तोँ उसी मे बैठकर वोँ मूतने लगी, औऱ बैठे-2 हि अपनी बुर साफ करके रसोई मे घुस गयीँ,। उन्होंने गरमचाय बनाने केँ लिएगैस चूल्हे पऱ रख दि, अभि वोँ उसमें गरम चाय-चीनी डाल हि रही थि, कि मैंने पीछे सें जाकर उन्हें जकड लिया। मे एकदम नंगा हि थां अब तक। मैंने उनकी चादर हटाकर एक् तरफरख दि, औऱ अपना कड़क लन्ड उनकी मोटीमगर मस्त उभरी हुइ गान्ड कि दरार मे फँसा दिया औऱ अपनीकमर चलाने लगा। मेरा लन्ड उनकी गान्ड केँ छेद सें लेकर बुर केँ मुँह तक सरकने लगा आहह-आहह.सीईईईईईईईईईईईईईईईई.अंकुशआाआ। रुकूऊ.गरम चाय तौ बनाने दो.सच मे बहोत बेसबरे होँ तुम्। मैंने बिनाकोई जवाबदिए चाची कों पलटा लिया औऱ रसोई केँ स्लैब सें सटाकर उनके होंठ चूसने लगा.
गरम चायजल जाएगी मेरे सोनााआ.आआईयईई.नहियिइ.रकूओ.प्लेआस् उनकी चुचि कों दाँतों सें काटते हुए मैंने हाथ लंबा करकेगैस बंदकर दि। मैंने अपनेहाथ कि दो उंगलियाँ उनकी बुर मे घुसा दि औऱ अंदर बाहर् करतेहुए चुचियों कों चूसने मसलने लगा। ओह्ह्ह्ह.उफ़फ्फ़। बहोत बेसबरे होँ मेरे सोनाआ.सीईईई.आअहह.आययीईई.
तुम्हारी चुचियों कों देखकर किस कों सबर होगा चाची। क्याँ मस्तमाल हौ तुम्। उनके होंठ चबाते हुए मैंने कहा- चाचा भोसड़ी कां चूतिया हैं। जौ इतने मस्तमाल कों भि नहि चोदता.
चाची - उस चूतिया कां नाम लेकरमजा खराबमत करो अंकुश.सीईईईई.चाची अपने खुश्क होँ चुके होंठों पर्र जीभ सें तर करतेहुए बोलि.
फिन मैंने चाची कि एक् जाँघ केँ नीचे सें हाथ फँसाकर उठा लिया औऱ अपना लन्ड उनकी गीली बुर मे खड़े-2पेल दिया.
चाची - आहह-आहह.मैय्आआआआ.मारगाई.भोसड़ी केँ धीरीईई.नहियीईईईईई.डाल सकताआआआअ। आआआआआअ। धीरे-धीरे…
चाची कां एक् पेर ज़मीन पऱ थां, एक् हाथ स्लैब पऱ टिका लिया थां औऱ दूसरा हाथ मेरेगले मे लपेट लिया। हुमच-हुमच कर धक्के लगाने सें चाची कां बैलेंस बिगड़ने लगा। मैंने दूसरी टाँग कों भि उठा लिया, अब चाची हवा मे मेरीकमर पर्र अपने पैरों कों लपेटे हुए थि। एक् हाथ अभि भि उनका स्लैब पर्र हि टिकारखा थां। इस पोज़ मे लन्ड इतना अंदर तक चला जाता, कि चाची हर धक्के पऱ कराह उठती। एक् बारफिन चाची हार गयीँ,। औऱ उनकी बुर पानी फेंकने लगी। मैंने उनको नीचे उतारा औऱ स्लैब पऱ दोनों हाथ टिकाकर घोड़ी बना लिया.
उनकी गान्ड देखकर तौ मे वैसे हि पागल हौ जाता थां, सोपेल दिया लन्ड दमलगा कर उनकी बुर मे। एक् हि झटके मे मेरे टट्टे गान्ड सें टकरागये। मेरे धक्कों सें चाची हाईहाई करउठी। 20 मिनिट केँ धक्कों नें उनकीकमर चटका दि। आखिर मे उनकी ओखली कों अपने लन्ड केँ पानी सें भरकर मैंने चादर सें अपना लन्ड पोंछा औऱ कमरे मे चला गय़ा। 10 मिनिट बाद चाची गरमचाय लेकर कमरे मे पहुँची। तौ मैंने उन्हें अपनीगोद मे बिठा लिया औऱ हम् दोनों गरमचाय पीतेहुए बातें करनेलगे.
चाची - बहोत जबरदस्त चुदाई करते होँ अंकुश तुम्। सच मे मुझे तौ तोड़ हि डाला। पूरीतरह.
मे – मजा नहि आया आपको?
चाची – मजा…??? मैंने आज पहलीबार जानां हैं कि चुदाई ऐसी भि होती हैं। इससे अधिक जीवन मे औऱ कोईसुख नहि हौ सकता.सच मे.
गरमचाय खतम करके चाची बोलीं – अंकुश, मानो तौ एक् बात कहूँ?
मैंने उनके होंठों कों चूमते हुएकहा। अब इससे बड़ी औऱ क्याँ बात होगी जिसके लिए मे नाँ करदूं.
चाची – अंकुश अब तुम् बड़े हौ गये हौ। कालेज जानेलगे हौ। अब थोडा घऱ केँ कामों मे भि हाथ बटाना चाहिए तुम्हें। जेठ जी औऱ कब तक करेंगे?
मैंने कहा – मे समझा नहि चाची? किन कामों कि बातकर रही होँ। साराकाम तौ नौकर हि करते हें नाँ.!
चाची – तोँ क्याँ हुआ, उनकी देखभाल भि तोँ करनी होती हैं। मे बसयही कहूँगी। कि तुम् भि थोडा खेतों कि देखभाल करो। जिससे तुम्हें कुछ चीज़ों कां पताचले। औऱ आगेचल कर तुम् यहसभी संभाल सको.
मैंने कहा – ठीक हैं चाची मे आपकीबात समझ गय़ा, आज सें कोशिश करूँगा। औऱ फिन अपने कपड़े पहनकर उनकेपास सें चलाआया। अभि मे अपनेघऱ जाने कि सोच हि रहा थां कि चाची केँ शब्दयाद आँ गये “तुम्हें कुछ चीज़ों कां पताचले”.!!!
चाची किस बारे मे बोलि? कुछ तौ ऐसा हैं, जौ चाची मुझे समझाना चाहती हें?
यहीसभी सोच विचार करताहुआ मे अपने खेतों कि तरफबढ़ गय़ा। अभि साम केँ 4:30 कां टाइमहुआ थां। मे 15 मिनिट मे अपने खेतों पऱ पहुँच गय़ा। जैसा मैंने पहले बताया थां, कि हमारे खेतों पर्र हि ट्यूबवेल हैं, उसी सें चारों परिवारों केँ खेतों कि सिंचाई होती हैं, जिसका वोँ बाकी केँ चाचा लोगकुछ मुआवजा देते हें। ट्यूबवेल पऱ हमनेदो कमरेबना रखे हें, जिसमें एक् मे पंपसेट लगा हैं, दूसरा उठने बैठने औऱ सोने केँ लिए हैं। ज़रूरत कि सुविधाएँ उसी कमरे मे मौजूद रहती हें। मे सीधा अपने ट्यूबवेल पऱ पहुंचा। कुछ मजदूर खेतों मे लगेहुए थें। ट्यूबवेल चलरहा थां, मुझे नहि पता कि इस वक़्त उसका पानी किसके खेतों मे जारहा थां। मे जैसे हि बैठक वाले कमरे केँ पास पहुंचा। मुझे अंदर सें आती हुईँ कुछ अजीब सि आवाज़ें सुनाई दि.
ट्यूबवेल केँ रूम कि छत अधिक ऊँची नहि थि, यहीकोई दस ग्यारह फीटरही होगी.उस कमरे केँ पीछे वाली दीवार मे एक् रोशनदान थां, जोँ छत सें लगभग दो-ढाई फीट नीचे थां। मैंने पीछे जाकर उछलकर उस रोशनदान कि जाली पकड़ली, औऱ अपने हाथों केँ दम सें अपनेबदन कों ऊपरउठा लिया। जैसे हि मैंने अंदर कां नज़ारा देखा, मेरी आखें चौड़ी होँ गयीँ,। जिसबात कि मैंने अपने जिंदगी मे कल्पना भि नहि कि थि, वोँ हक़ीकत बनकर मेरी आँखों केँ सामने थां। मे यहसीन ज्यादा देर नाँ देखसका। सच कहूँ तौ देख्ना भि नहि चाहता थां। मगरतभी चाची केँ शब्द एक् बारफिन मेरे कानों मे गूंजने लगे.“कुछ चीज़ें हें जोँ तुम्हें जाननी चाहिए.”
तोँ क्याँ चाची यहसभी जानती हें? याँ उन्हें शक़ थां? अगरयह चीज़ें मुझे जाननी चाहिए। तोँ जाननी पड़ेगी। उसकेलिए मे किसीऐसी चीज़ कों खोजने लगा जौ मुझेउस रोशनदान तक आसानी पहुंचा सके। मेरी नज़रपास मे पड़ी एक् 4-5 फुट लंबी मोटी सि लकड़ी पऱ पड़ी। बिना आवाज़ किए मैंने उसेउठा केँ दीवार केँ सहारे तिरछा करके टिकाया औऱ उस पर्र पेरजमा करफिन सें रोशनदान कि जाली पकड़कर खड़ा होँ गय़ा.
अंदर बड़ी चाची चंपा एकदम नंगी अपनी टाँगें चौड़ी किए पड़ी थि। ऊपर बाबूजी अपने लौड़ा जैसे लन्ड जौ करीब-करीब मेरे जैसा हि थां उससे चंपा चाची केँ भोसड़े कि कुटाई कररहे थें। उनकी मोटी-मोटी जांघें चाची केँ चौड़े चुतड़ों पर्र थपा-थप पड़रही थि। चुदते हुए चंपा चाची ओह.उऊहह। सस्सिईइ। औरर्र। ज़ॉर्सईए.चोदो.जेठ जी। जैसी आवाज़ें निकाल रही थि.
चंपा – हायरे जेठ जी, इसउमर मे भि आपमें कितनी ताक़त हैं। अरे मेरी ओखली कूट-कूट कर खालीकर दि आपने। एक् आपका भइया हैं, जोँ लन्ड घुसाते हि टपकने लगता हैं.
बाबूजी – अरे रानी, यह सभी मेरीबहू कि सेवा कां कमाल हैं। सच मे खाने पीने कां बहोत ख्याल रखती हैं मोहिनी बहू.कुछ देरबाद वोँ दोनों फारिग हौ गये। बाबूजी चाची केँ बगल मे पड़े हाँफरहे थें.
चाची उनकेनरम पड़ चुके लन्ड कों अपने पेटीकोट सें साफ करतेहुए बोलीं - जेठ जी मेरे नीलू कों एक् छोटी-मोटी बाइक हि दिलवा दीजिए। छोटू केँ पास बुलेट देखकर उसे भि मन करनेलगा हैं.
बाबूजी – अभि पिछले महीने हि मैंने तुम्हें इतने पैसेदिए थें वोँ कहां गये?अब फिलहाल तोँ मेरेपास इतने पैसे नहि हैं। औऱ रहीबात छोटू कि, तौ उसे कृष्णा नें दिलाई हैं वाहन.
चाची – अरे जेठ जी, मे कोईयह थोड़े नां कहरही हूं, कि उसे इतनी बड़ी व्हीकल हि दिलाओ। कोई छोटी-मोटी भि चलेगी.
बाबूजी – ठीक हैं। रात कों आनां.सोच केँ जवाब देता हूं। कहकर उन्होंने उसकी बड़ी-2 बूब्स मसल दि.
तभी मुझे बड़े चाचा अपने खेतों कि तरफ सें आतेहुए दिखाई दिए। मे जल्दी नीचेआकर छिप गय़ा। जब वोँ भि उसी कमरे मे घुसगये। तौ मे वहा सें घऱ कि ओर निकल लिया। अपनीसोच मे डूबाहुआ मे, पता नहि कबघऱ पहुँच गय़ा.
भाभी नें मुझे देखा। आवाज़ भि दि। मगर मे अपनीधुन मे सीधा अपने कमरे मे चला गय़ा। औऱ धड़ाम सें चारपाई पर्र गिर पड़ा.कुछ देरबाद भाभी मेरे कमरे मे आईं, मुझे अपने ख़यालों मे उलझेहुए पाकर वोँ मेरे सिरहाने पेर लटकाकर बैठ गई,। औऱ मेरेसर पऱ हाथ फिराया। मैंने उनकीतरफ देखकर अपनासर उनकी जाँघ पर्र रख दिया.
वोँ मेरे बालों मे उंगलियाँ घुमाते हुए बोलीं – मेरा प्यारा बाबूकुछ परेशान लगरहा हैं। क्याँ हुआ हैं? मुझे नहि बताओगे?
मे – आपके अलावा मेरा औऱ हैं हि कौन जिससे मे अपनेमन कि बातकर सकूँ?
भाभी – तोँ बताओ मुझेहुआ क्याँ हैं। जिसकी वजह सें मेरा लाड़ला देवर जी इतना परेशान हैं?
मैंने भाभी कों ट्यूबवेल पऱ देखी हुई सारी घटनाबता दि। भाभीकुछ देर सन्नाटे कि स्थिति मे बैठीरही.
फिन बोलि – तोँ तुमने चाचा केँ आने केँ बाद कि बातें नहि सुनी.
मे – नहि मे तौ यहदेख कर हैरान थां, कि जब चाची नें चाचा केँ लिएगेट खोला थां, तब भि वोँ आधे सें अधिक नंगी हि थि, सिर्फ़ पेटीकोट कों अपने दूधों तक चढ़ाया हुआ थां.
भाभी – हम्म… इसका मतलब। चाचा-चाची मिलकर बाबूजी कों लूटरहे हें। अब तौ जल्द हि कुछ करना पड़ेगा.
मे – अब आप् क्याँ करने वाली हें भाभी? मुझे तोँ बड़ाडर लगरहा हैं.
भाभी मेरे बालों कों सहलाते हुए बोलि – अभि तोँ मुझे भि नहि पता कि मे क्याँ करूँगी? पर्र तुम् बेफिक्र रहो। तुम्हारी भाभीसभी ठीककर देगी.
मे – मुझे आप् पऱ पूरा भरोसा हैं.
फिन भाभी नें झुककर मेरेगाल पऱ चूमा औऱ बोलीं – यहसभी छोड़ो। यह बताओआज छोटी चाची केँ यहा सारादिन क्याँ किया?
मैंने लज्जा सें अपना मुँह उनकी साड़ी केँ पल्लू मे छिपा लिया.
तौ उन्होंने मेरे दोनों बगलों पऱ गुदगुदी करतेहुए कहा - ओय-होय। मेरे शर्मीले राजा, इसका मतलब चाची अब जल्द हि मम्मी बनने वाली हें। कहो?
मैंने हँसते हुएकहा। पता नहि। होँ भि सकता हैं.
भाभी – होँ नहि सकता। होगा हि। मुझे अपने देवर जी पऱ पूरा भरोसा हैं.
मे – पऱ भाभी ! सच मे चाची मे हि कोईकमी हुइ तोँ?
भाभी – तुम्हें लगता हैं। चाची जैसी भरपूर जवान स्त्री मे कोईकमी होगी? मुझे 110% यकीन हैं। एक् महीने केँ अंदर हि कोई अच्छी खबर सुनने कों मिलेगी। देख लेना तुम्.
मे – ईश्वर करे। चाची मां बन जाएँ। इससे बड़ी खुशी मेरेलिए औऱ क्याँ होगी.
भाभी हँसते हुए बोलि। औऱ अपने बाप बनने कि भि। हैं नाँ??
इसबात पऱ हम् दोनों हि बहोत देर तक हँसते रहे। जिसेरमा दिदी सुनकर हमारे पासआई औऱ पूछने लगी.
रमा दिदी - क्याँ बात हैं। देवरु भाभी इतनेखुश क्यूं हौ रहे हें?
तोँ भाभी नें उसे गोल-मोल जवाब देकर टरका दिया। औऱ फिन वोँ उठकर खाने पीने केँ इंतजाम मे लग गई,। रात 8 बजे हम् सब एक् संग खानां खारहे थें। भाभी नें हम् तीनों कों खानां परोसा औऱ वोँ भि एक् खाली चेयर लेकर हमारे पास हि बैठ गई,। बाबूजी केँ कहने पऱ हि अब उन्होंने उनसे परदा करना छोड़ दिया थां, बससर पऱ पल्लू अवश्य डाल लेती थि। क्योंकि बाबूजी उन्हें अपनी बेटी हि मानते थें। हमारा खानां खतम होने हि वाला थां, तभी भाभी नें बातों कां सिलसिला शुरुआत किया.
भाभी – बाबूजी, आपसे एक् बात करनी थि.
बाबूजी – हां बोलो मोहिनी बेटा। क्याँ बात करनी हैं??
भाभी – रुचि केँ पिताजी कहरहे थें, शहर मे कोई ज़मीन देखी हैं इन्होंने, अच्छे मौके कि ज़मीन हैं। बड़े देवर जीजी सें भि बात कि थि उन्होंने, तोँ उस ज़मीन केँ लिए उन्होंने भि हांबोल दिया हैं। वोँ दोनों भि कुछ पैसों कां इंतजाम कर सकते हें। मगर ज़मीन अधिक हैं, उनका विचार हैं कि मिलकर तीनों भाइयों केँ नाम सें लें लीजाए। अगर बाबूजी कुछ सहायता करदें तोँ?
बाबूजी कुछदेर चुपरहे फिनकुछ देरसोच कर बोले – राम कां विचार तौ उत्तम हैं। पर्र सच कहूँ तौ बेटा। अभि मेरेपास कुछ भि नहि हैं.
भाभी चौंकने कि एक्टिंग करतेहुए बोलि – ऐसा केसे होँ सकता हैं बाबूजी? माना कि, सालों पहलेजब वोँ दोनों भइया पढ़ते थें, तब खर्चे भि ज्यादा थें। मगर दो-तीन सालों सें तोँ कोईऐसा खर्चा भि नहि रहा, ऊपर सें दोनों भइयाजब भि आते हें, कुछ नाँ कुछ देकर हि जाते हें। आपकी तनख़्वाह, खेतों कि आमदनी। यहसभी मिलाकर काफ़ी बचत हौ जाती होगी। मे तौ समझरही थि कि आपकेपास हि इतना तोँ रुपया होगा कि उनकोकुछ करने कि ज़रूरत हि नां पड़े.
बाबूजी थोड़े तल्ख लहजे मे बोले – तौ अब तुम् मुझसे हिसाब-पुस्तक माँगरही होँ बहू?
भाभी – नहि बाबूजी! आप् ग़लतसमझ रहे हें। मे भला आपसे केसे हिसाब माँग सकती हूं? मे तौ बसकहरही थि, कि कुछ वक़्त पहले आप् अकेले हि कमाने वाले थें औऱ खर्चे पहाड़ सें ऊँचे थें, फिन भि आपने किसीबात कि कोईकमी नहि होने दि किसी कों भि। पर्र अब तोँ इतने खर्चे भि नहि रहेऊपर सें आमदनी भि बढ़ी हैं। तौ स्वाभाविक हैं कि बचत तौ अधिक होनी हि चाहिए.
बाबूजी – मे यहसभी तुम्हें बताना ज़रूरी नहि समझता कि पैसों कां क्याँ औऱ केसे खर्च करता हूं?
भाभी – अगर मेरी स्थान माजी होती, औऱ यहीबात उन्होंने पूछी होती तौ? तोँ क्याँ उनकेलिए भि आपकायही जवाब होता?
भाभी कि बातसुन कर बाबूजी विचलित सें होँ गये.जब कुछदेर वोँ नहि बोले, तोँ भाभी नें फिन पूछा – बताइए बाबूजी। क्याँ माजी कों भि यही जवाब देते आप्?
बाबूजी – उसकोयह हक़ थां पूछने कां, वोँ इसघऱ कि मालकिन थि.
भाभी – क्यूं? उनके गुजर जाने केँ बाद मुझसे इसघऱ कों संभालने मे कोईकमी नज़रआई आपको? क्याँ उनकेबाद इसघऱ कि ज़िम्मेदारियाँ नहि निभापाई मे? यह बोलते-2 भाभी कि आँखों मे आँसू आँ गये.
फिन सुबकते हुए बोलि - ठीक हैं बाबूजी। जब मेराकोई हक़ हि नहि हैं कुछ प्रश्न करने कां, तौ मेराइस घऱ मे रहने कां भि कोई मतलब नहि हैं। इसबार जब रुचि केँ बापूयहा आएंगे, मे भि उनकेसंग हि चली जाऊंगी। बाबूजी भाभी कि ओर देखते हि रहगये.
अभि वोँ कुछ बोलते उससे पहले मे बोल पड़ा.ठीक हैं भाभी, जहाँ आप् रहेंगी वहीं मे रहूँगा। मे यहा किसके भरोसे रहूँगा। मे भि आपकेसंग चलूँगा। अभि औऱ भि अटैक बाबूजी केँ ऊपर होने बाकी थें.
मेरेचुप होते हि रमा दिदी भि बोल पड़ी – मे भि आपकेसंग हि चलूंगी भाभी, मे यहा अकेली क्याँ करूँगी?
बाबूजी कि कराह निकल गयीँ,, वोँ बोले – मुझे क्षमा करदेबहू। मे भूल गय़ा थां, कि बिना महिला केँ घऱ, घऱ नहि होता। तुमने तौ इसघऱ कों विमला सें भि अच्छी तरह सें संभाला हैं। इसलिये तुम्हें हरबात जानने कां पूराहक़ भि हैं। पर्र… बोलते-2 वोँ कुछरुक गये.मगर अब जवाब तोँ देना हि थां सो बोले – अभि मैंने वोँ रुपया कुछ इधर-उधर खर्चकर दिए हैं। मगरअब मे तुमसे वादा करता हूं, आज केँ बादइस घऱ केँ सारे पैसों कां हिसाब पुस्तक तुम् रखोगी। बहू मे तुम्हारे आगेहाथ फैलाकर भीख माँगता हूं, जिसतरह सें तुमने अब तक इसघऱ कों संभाला हैं, आगे भि संभालो। इसघऱ कों बिखरने सें बचालो बेटा। बाबूजी कि आँखें भरआईं, अपने आँसुओं कों रोकने कां प्रयास करतेहुए वोँ उठकर बाहर् चलेगये। भाभी केँ चेहरे पऱ एक् विजयी मुस्कान तैररही थि.
हमारी चौपाल पर्र हि एक् बड़ा सां हॉलनुमा रूम बैठक केँ लिए हैं, जौ घऱ केँ बाहर् मेनगेट केँ बराबर मे हैं। घऱ सें उसकाकोई डाइरेक्ट लिंक नहि हैं, औऱ नाँ हि उसकाघऱ सें कोई मार्ग। बैठक कि पीछे कि दीवार सें लगी सीडीयाँ हें, जौ ऊपर कों जाती हें, बैठक कि दीवार मे एक् छोटा सां रोशनदान हैं जौ जीने मे खुलता हैं.
मे जल्द सें खानां ख़ाके सोने कां एक्सक्यूज़ करके अपने कमरे मे चला गय़ा। भाभी नें भि काम जल्द सें निपटाया औऱ सोनेचली गई,, जिसकी वजह सें अब दिदी कों भि वहा बैठे रहने कां कोई मतलब नहि बनता थां। कोईदस बजे मे जीने पर्र दबे पाँव चढ़ा, तब तक बैठक मे पूर्ण शांति थि, वहा बाबूजी अकेले चारपाई पर्र लेटेहुए कमरे कि छत कों देखरहे थें। उनकी आँखों मे पश्चाताप केँ भावसाफ दिखाई देरहे थें। अभि आधा घंटा हि हुआ होगा कि दरवाजा खटखटाने कि आवाज़ आई। बाबूजी नें उठकर दरवाजा खोल दिया.
आशा केँ मुताबिक, सामने चंपा चाची हाथ मे दूध कां ग्लास लिए खड़ी थि। बाबूजी, बिनाकुछ कहे वापस अपनेबैड पऱ आकरबैठ गये। चंपा चाची नें दूध कां ग्लास पास मे पड़ी एक् टेबल पर्र रख दिया औऱ वापस जाकर दरवाजा बंद करनेचली गयीँ,.
इतने मे मुझे अपने कंधे पर्र किसी केँ हाथ कां आभासहुआ, देखा तोँ भाभी मेरेबगल मे खड़ी थि। हम् दोनों अब बेसब्री सें अंदर होने वालेसीन केँ प्रतीक्षा मे थें। चंपा चाची बाबूजी केँ बगल मे आकरबैठ गई,। औऱ बोलि – आप् लेट जाइए जेठ जी। मे आपकेपेर दबा देती हूं.
बाबूजी – रहनेदो चंपा, मे ऐसे हि ठीक हूं., फिन भि वोँ बैठे-2 हि उनकी जाँघ कों दबाने लगी। बाबूजी नें उसकीओर मुड़कर भि नहि देखा.
चंपा – आप् कुछ जवाब देने वाले थें, नीलू कि बाइक केँ लिए। ?
बाबूजी नें झटके सें कहा – क्यूं ? नीलू तुम् लोगों कि ज़िम्मेदारी हैं। मे क्यूं बाइक दिलाऊँ उसको?
चंपा आश्चर्य सें उनकी शक्ल देखने लगी.फिन कुछदेर बाद वोँ बोलीं – यह आप् आज कैसी बहकी-बहकी बातें कररहे हें जेठ जी.
बाबूजी – क्यूं, इसमें क्याँ बहकी–2 बातें लगी तुम्हें? वोँ तुम्हारा बेटा हैं, उसकी ज़रूरतें तुम् लोग पूराकरो.
चंपा – दोपहर कों आपनेकहा थां, कि रात कों जवाब दूँगा। फिनअब क्याँ हुआ?
बाबूजी – तोँ अब नाँ बोल दिया.बात खतम.
चंपा – ऐसे केसेबात खतम., भूल गये वोँ दिन.जब जेठानी जी कि मौत केँ बाद केसे गुमसुम सें होँ गये थें आप्, मैंने आपको वोँ सभीसुख दिए जौ आप् पाना चाहते थें.
बाबूजी – तुमने भि तोँ मुझेदो साल मे खूबलूट लिया.अब औऱ नहि। मेरे भि बच्चे हें। वोँ भि पूछ सकते हें कि मे आमदनी कां क्याँ कररहा हूं?
चंपा – यह आप् ठीक नहि कररहे। जानते हें मे आपको बदनाम कर सकती हूं, कहीं मुँह दिखाने लायक नहि रहेंगे आप्.
बाबूजी गुस्से मे आतेहुए बोले – अच्छा, तुँ मुझे बदनाम करेगी हरामजादी, साली छिनाल, तूँ स्वयं अपनी बुर कि खुजली मिटवाने आती हैं मेरे लौडे सें। तुँ क्याँ बदनाम करेगी मुझे?ठहर, मे हि खोलता हूं दरवाजा औऱ लोगों कों इकट्ठा करके बताता हूं, कि यहयहा क्यूं आई हैं? इससे पहले कि मे तेरी गान्ड पे लात लगाऊँ, दफ़ा होँ जायहा सें। ट्यूबवेल कां पानी फ्री देता हूं तुम् लोगों कों, बाग कां अपना हिस्सा भि नहि लेता, उससे तुम्हारा पेट नहि भरा.पता नहि मेरेऊपर क्याँ चमत्कार टोनाकर दिया तुमने, कि दोसाल सें मेरी सारी कमाई अपने भोसड़े मे खा गई,। चंपा नें यह ख्वाब मे भि नहि सोचा थां, वोँ तोँ यहा औऱ खून चूसने केँ इरादे सें आई थि, मगरयहा तौ उलटे बाँस बरेली लदगये। फिन भि उसने अंतिम कोशिश कि.
उठकरदूध कां ग्लास लेँ आई औऱ बोलि - ठीक हैं जेठ जी। मे आपसेअब आगेकुछ नहि माँगूंगी। प्लीज आप् नाराज़ मत होइए। लीजिए दूधपी लीजिए, मे आपकेलिए बादाम वालादूध लाई थि.
बाबूजी – नहि पीना तेरायह जहर। क्याँ पताइसी सें कोई टोना करती होँ तूँ मेरेउपर?
चंपा – कैसी बातें कररहे हें आप्? मे भला आपकेऊपर टोना-टोटका क्यूं करूँगी। आप् तौ मेरे अपने हें.
बाबूजी – ऐसा हैं तोँ तुँ हि पीइसे मेरे सामने। औऱ दफ़ा हौ जायहा सें.
जबकुछ देर उसनेकोई जवाब नहि दिया तौ उन्होंने वोँ ग्लास उसकेहाथ सें छीन लिया औऱ जबरदस्ती उसे पिला दिया। खाली ग्लास उसकेहाथ मे थमाकर उसेगेट सें बाहर् धक्का दे दिया औऱ दरवाजा बंद करके अपने पलंग पर्र बैठगये। अपनेसर कों दोनों हाथों केँ बीच लेकर वोँ कुछदेर सोचते रहे.फिन भर्राई आवाज़ मे बोले – मुझे क्षमा कर देना विमला। मे तेरे बच्चों केँ संग न्याय नहि कर पाया। शायद भाभी कि बातों नें उन्हें अपने कर्तव्य सें भटकने सें बचा लिया थां। पश्चाताप कि आग मे जलतेहुए उन्होंने अपनेसर कों दोनों हाथों मे लेकर आँसू बहाते रहे। हम् दोनों कि आँखें भि भीग गयीँ,। कुछदेर बाद वोँ पलंग पऱ लेटगये। फिन उन्हें उसी अवस्था मे छोड़कर हम् दोनों भि वहा सें उठकर सोनेचले गये। मैंने खेतों कि देखभाल मे बाबूजी कां हाथ बटाना शुरुआत कर दिया थां, उनकी हक़ीकत मेरे औऱ भाभी केँ अलावा, हमने किसी औऱ कों पता नहि चलने दि थि। अब मे बाबूजी केँ लिए चिंतित रहनेलगा.6 साल सें विधुर कां जिंदगी व्यतीत कररहे व्यक्ति केँ बदन कि ज़रूरतें उसे भटकने पर्र मजबूर कर हि सकती हें। जब मैंने अपने आपको उनकी स्थान रखकर देखा तोँ मुझेलगा कि बाबूजी ग़लत नहि थें। मगरजिस तरह सें चंपा चाची नें उनकी भावनाओं कों भड़का कर उनका फ़ायदा उठाया, वोँ ग़लत थां.
क्याँ मे बाबूजी केँ लिएकुछ कर सकता हूं? मेरेमन मे यह विचार कौंधा। मगर क्याँ? अधिक सोचने पर्र मुझे एक् विचार सूझा.मगर उसे टाइम पऱ छोड़कर अपनेकाम मे लग गय़ा। इधर मेरे औऱ छोटी चाची केँ बीचदिन मे कम सें कम एक् बार बिस्तर-कबड्डी अवश्य हि हौ जाती थि, वोँ दिनों-दिन खुलती हि जारही थि मेरेसंग। ऐसे हि एक् दिनजब हम् चुदाई कररहे थें, चाची कों मे एक् बार टाँगें चौड़ा कर गान्ड केँ नीचेडबल तकिये रखकर जबरदस्त तरीके सें चोदकर झड़ चुका थां। फिनकुछ देरबाद वोँ मेरेऊपर आकर स्वयं सें गान्ड पटक-पटक कर चुदने लगी। मैंने उनकी मस्त गान्ड कों मसलते हुएकहा.
मे – अच्छा चाची ! मानलो आप् प्रेग्नेंट होँ गई, तौ मुझे क्याँ दोगी?
चाची – अगरमगर कि तौ अबकोई गुंजाइश हि नहि रही अंकुश। मुझे तौ पक्का यकीन हैं कि मे मम्मी बन हि गई, हूं। अब तुम् बताओ, तुम्हें क्याँ चाहिए? यहजान तौ अपने बच्चे केँ लिए जीनी हैं मुझे। उसके अलावा जोँ मेरेबस मे होगा वोँ सभी तुम्हारा.
मे – ठीक हैं। वक्तआने पऱ माँग लूँगा। औऱ हां वोँ देना आपकेबस मे होगा.यह मे अभि सें कह सकता हूं.
चाची – मे उसदिन कां प्रतीक्षा करूँगी। अपने होनेवाले बच्चे केँ बाप कों अगर मे कुछ खुशीदे पाई, तौ वोँ मेरेलिए सबसे बड़ी खुशी होगी.
अगले महीने रश्मि चाची कों पीरियड नहि आए, जबयह बात उन्होंने मुझे बताई। तोँ पता नहि मुझे अंदर सें एक् अनजानी सि खुशी महसूस हुईँ। दोदिन बाद उन्हें उल्टियाँ शुरुआत हौ गई,, चाचा मेरेसंग उन्हें डॉक्टर केँ यहा दिखाने लें गये, तौ यहबात कन्फर्म भि होँ गई, कि वोँ मम्मी बनने वाली हें। चाचा कि तौ खुशी कां ठिकाना हि नहि रहा.इधर चाची नें मुझे शुक्रिया केँ तौर पर्र एक् पूरीरात हि सौंप दि थि, मनमाने ढंग सें मजा लूटने केँ लिए। हम् तीन लोगों केँ अलावा औऱ किसी कों पता नहि थां। कि यह खुशी उनके जिंदगी मे आई केसे.
सब बहोत खुश थें उनकेलिए। मझले चाचा औऱ चाची कुछ चिढ़ते थें हम् लोगों सें, उसका कारण भि बाबूजी कि बड़े चाचा सें नजदीकियाँ हि थि। क्योंकि अपने हिस्से केँ बाग कि आमदनी औऱ ट्यूबवेल कां फ्री पानी जौ आमतौर पऱ सभी कों पता हि थां, बाबूजी उनको देते हें। जब उनसेइस बारे मे पूछा गय़ा, तौ उन्होंने उनके खर्चे ज्यादा होने कि वजह बताई थि। इस कारण सें मझले चाचा औऱ चाची हम् लोगों सें खफा रहते थें। अब चूँकि, फ़ैसला बाबूजी नें लिया थां, तोँ हम् मे सें कोई उनकीबात कां विरोध भि नहि कर सकता थां। खैरयह बात बहोत पुरानी हौ चुकी थि, औऱ अब हालत भि बदलगये थें, तौ मैंने अब मझले चाचा-चाची सें नजदीकियाँ बढ़ाने कां फ़ैसला किया.
ऐसे हि एक् दिन मे खेतों पऱ घूमता फिरता उनके हिस्से केँ खेतों कि तरफबढ़ गय़ा। साम कां वक्त थां, चाचा केँ संग चाची भि बैठी हुइ मिल गई,। मंझली चाची थोडा दुबली-पतली सि हें, ऐसा नहि हैं कि वोँ शारीरिक तौर पर्र कमजोर हें, उनके चुचे तौ 34डी साइज़ केँ हें, औऱ कूल्हे भि थोड़े उभारलिए हें। मगरकमर बहोत हि पतली सि हैं। औऱ शायदयह उनके चाचा केँ संग खेतों मे अधिक मेहनत करने कि वजह सें होगा। थोडा पैसों कि तंगी कि वजह सें हि वोँ अपने बच्चों कों अपने भइया केँ पास पढ़ाती थि। मगरजब मामाजी केँ बच्चे भि हौ गये, औऱ वोँ भि पढ़ने लिखने लगे तोँ मामाजी कां रवैया उनके प्रति रूखा-रूखा सां रहनेलगा। अब उनकी पढ़ाई कां खर्चा इन्हें हि देना पड़ता थां.
मैंने दोनों केँ पेरछुए, दोनों नें खुश होकर मुझे आशीर्वाद दिया औऱ अपनेपास बिठाया। बातों-बातों मे मैंने चाची सें शिकायती लहजे मे कहा.
मे - क्याँ चाची आप् तोँ पता नहि हम् लोगों सें क्यूं नाराज़ रहती हें, कभीखैर खबर लेने भि घऱ कि तरफ नहि आती?
चाची – अरे अंकुश, तुम्हें तोँ सभीपता हि हैं। यहा खेतों मे काम करना पड़ता हैं, अब हमारे पास इतने पैसे तोँ हें नहि कि मजदूरों सें काम करवा सकें.उधर तुम्हारे बाबूजी भि पानी केँ पैसों मे रियायत नहि करते। उन्हें तौ बस चंपा केँ हि खर्चे दिखाई देते हें। हमारी परेशानियाँ कहां दिखाई देती हें.
मे – अभि हाल-फिलहाल मे आपने बाबूजी सें बात कि हैं क्याँ?
चाची – नहि। अभि फिलहाल मे तोँ कोईबात नहि हुई हैं। क्यूं कुछनई बात हौ गयीँ, हैं?
मे – नहि ऐसीकोई नईबात नहि हुइ। पऱ मे चाहता हूं, आप् फिन सें उनसेबात कीजिए। मेरानाम बोल देना। आप् सें भि शायद पानी केँ पैसे नां लें.
चाची – क्याँ ? सचकहरहे हौ अंकुश। जेठ जीमान जाएँगे?
मे – प्रेम सें सभीकुछ हल हौ सकता हैं चाची। आपको तोँ पता हि हैं। पापा कितने अकेले-2 होँ गये हें। अब जौ भि उनसेदो प्रेम कि बातें करता हैं वोँ उसी कि सहायता कर देते हें। फिन आप् तौ अपने हि हें। आपसेकोई दुश्मनी थोड़े हि हैं.
मेरी बातों कां चाची पऱ असरहुआ औऱ उनकी बातों सें लगनेलगा कि वोँ पापा केँ संग नजदीकियाँ बढ़ा सकती हें। फिन मैंने उनसे सोनू, मोनू केँ बारे मे पूछा तोँ वोँ थोडा दुखी होकर बताने लगी, कि केसेअब उनके भइया कां व्यवहार बदल गय़ा हैं। सोनू ग्रेजुएशन केँ पहलेसाल मे हि थां, मोनू12थ मे थां, तौ मैंने कहा कि आप् उनको यहींरख कर क्यूं नहि पढ़ाती,
अब तौ हमारा नया कालेज भि खुल गय़ा हैं। कम सें कम सोनू कां एडमिशन मेरेसंग हि करदो। चाहो तौ बाबूजी कि सहायता लें सकती हौ। उनको मेरीबात जँची, औऱ दोनों नें फ़ैसला किया कि वोँ सोनू कों यहीं कालेज मे पढ़ाएँगे, औऱ मोनू कों एक् साल वहीं सें 12थकरा देते हें। उनसेबात करने केँ बाद मे ट्यूबवेल कि तरफ आँ गय़ा, खेतों मे फिलहाल कोईऐसा काम नहि चलरहा थां.
बाबूजी मुझे अकेले बैठे मिले, मे थोड़ी देर उनकेपास बैठा, थोडा काम धंधे केँ बारे मे समझा.फिन धीरे-धीरे सें मैंने मंझले चाचा चाची सें जौ बातें हुई, वोँ कही। उनको भि लगा कि मे जोँ कररहा हूं वोँ सही हैं। घऱ परिवार मे एक् जुटता रहे वोँ अच्छा हैं। दूसरे दिन मँझले चाचा औऱ चाची दोनों हि बाबूजी सें मिले औऱ जौ मैंने उन्हें कहा थां वोँ बातें उन्होंने बाबूजी सें कही.
तोँ बाबूजी नें कहा कि हां छोटू भि बोलरहा थां। मे भि चाहता हूं तुम् सभीखुश हालरहो। बड़े चाचा चाची बहोत खूनचूस चुके थें, सो बाबूजी नें फ़ैसला किया, कि अब उनकेसंग कोई रियायत नहि होगी, औऱ जोँ फ़ायदा वोँ उनकोदे रहे थें वोँ अब मँझले चाचा कों देंगे। चाचा चाची बड़ेखुश हुए, औऱ मेरी बातों पऱ अमल करतेहुए चाची नें बाबूजी सें बातचीत करना शुरुआत कर दिया। चाची अबजब भि घऱ सें खेतों कों जाती थि, तौ वोँ बाबूजी केँ लिए भि कुछ नाँ कुछ खाने कि चीज़ें बना केँ लें जाती थि। इसतरह सें दोनों परिवारों केँ बीच कि कड़वाहट धीरे-धीरे – 2 खतम होतीजा रही थि.
प्रभा चाची नें सोनू कों देहात वापस बुलवा लिया थां, मैंने उसका एडमिशन अपने कालेज मे हि करवा दिया.अब उसकाशहर कां खर्चा भि बचनेलगा, औऱ थोडा-2 घऱ खेतों केँ काम मे भि हाथ बंटने लगा थां वोँ। मेरी कोशिशों नें चाचा चाची कि तकलीफ़ों कों थोडा कम किया थां। एक् तरह सें वोँ मेरे अहसानमंद थें। एक् दिन बाबूजी अकेले दोपहर मे ट्यूबवेल केँ कमरे मे खानां खाकर लेटेहुए थें, तभी प्रभा चाची वहा आँ गई,। दरवाजे पर्र आहट पाकर उन्होंने अपने बाजू कों हटाकर देखा तौ प्रभा चाची सर पे पल्लू डाले उसका एक् कोना अपने दाँतों मे दबाए खड़ी थि.
बाबूजी सिरहाने कि ओर खिसकते हुए बोले – आओ-आओ प्रभा। कोईकाम थां?
प्रभा – नहि जेठ जी.काम तोँ कुछ नहि थां, बसचली आई देखने। शायद आपको किसी चीज़ कि ज़रूरत हौ तौ। पूछलूँ। इतना बोलकर वोँ चारपाई केँ नीचेबैठ गयीं.
बाबूजी – अच्छा किया, तुम् आँ गई., काम तौ कुछ नहि थां, अभि खानां ख़ाके लेटा हि थां। अबकोई बोल- बतलाने कों तौ थां नहि। सोलेट गय़ा, तुम् बताओसभी ठीक-ठाक सें चलरहा हैं?
प्रभा – हां आपकी कृपा हैं, लाइए आपकेपेर दबादूं। यह कहकर वोँ चारपाई कि तरफसरक कर नीचे सें हि उन्होंने बाबूजी कि पिंडलियों पर्र अपनेहाथ रखदिए.
बाबूजी नें उनकाहाथ पकड़कर रोकने कि कोशिश कि, तौ वोँ बोलीं – लेटे रहिए, बड़ों कि सेवा करने सें मुझे आशीर्वाद हि मिलेगा। उन्होंने अपनाहाथ हटा लिया, औऱ चाची उनके पांव दबाने लगी। चारपाई थोड़ी उँची थि, औऱ चाची ज़मीन पऱ अपनी गान्ड टिकाए बैठी थि, सो उन्हें हाथआगे करके पांव दबाने मे थोडा असुविधा होँ रही थि.
तौ प्रभा चाची बोलि – जेठ जी आप् थोडा मेरीओर कों आँ जाइए, मेरेहाथ अच्छे सें पहुँच नहि पारहे.
बाबूजी खिसककर चारपाई केँ किनारे तक आँ गये, अब चाची अच्छे सें उनकेपेर दबापा रही थि। हाथआगे करने सें चाची कां आँचल उनके सीने सें धलक गय़ा, औऱ उनकी बूब्स बिस्तर कि पाटी सें दबने केँ कारण ब्लाउज सें औऱ बाहर् कों उभरआई। चौड़े गले केँ ब्लाउज सें उनके खरबूजे एक् तिहाई तक दिखने लगे। बाबूजी उनसे बातें करतेहुए जब उनकी नज़र चाची कि चुचियों पर्र पड़ी, तोँ वोँ उनकी पुष्टता कों अनदेखा नहि करसके, औऱ उनकी नज़र उनपरठहर गयीँ,। अब तक उनकेमन मे कोई ग़लत भावना नहि थि चाची केँ लिए, मगर उनकी जवानी कि झलक पाते हि, उनके 9 इंची हथियार मे हलचल शुरुआत हौ गई, औऱ वोँ उनके पाजामे मे सर उठाने लगा.
प्रभा चाची उनके पांव दबाते – 2 जब जांघों कि तरफ बढ़ने लगी, तौ उनके हाथों केँ स्पर्श सें उन्हें औऱ ज्यादा उत्तेजना होनेलगी, अब उनका लौड़ा पाजामे केँ अंदर ठुमकाने लगा। चाची कि नज़र भि उसपरपड़ चुकी थि, औऱ वोँ टकटकी गढ़ाए उसे देखने लगी। लौड़ा अपना साइज़ कां अनुमान बिना कच्छे केँ पाजामे सें हि देरहा थां.
हायरे राम। क्याँ मस्त हथियार हैं जेठ जी कां। चाची अपनेमन मे हि सोचकर बुदबुदाते हुए अपनी बुर कों मसलने लगी। बाबूजी कां लन्ड निरंतर अपना आकार बढ़ाता जारहा थां, जिसेदेख कर चाची कि बुर गीली होनेलगी। उनकीयह हरकत कहीं उनके जेठ तौ नहि देखरहे, यह जानने केँ लिए उन्होंने एक् बार उनकीतरफ देखा, जौ लगातार उनकी चुचियों पऱ नज़र गढ़ाए हुए थें। बाबूजी कों अपने सीने पऱ नज़र गढ़ाए देखकर उनकी नज़र अपने उभारो पऱ गई,, औऱ अपनी हालत कां अंदाज़ा लगते हि। वोँ लज्जा सें पानी-2 होँ गई,। अभि वोँ अपने आँचल कों दुरुस्त करने केँ बारे मे सोच हि रही थि, कि फिन नाँ जाने क्याँ सोचकर वोँ रुक गई,, औऱ उसकेउलट अपनेबदन कों उन्होंने औऱ आगे कों करतेहुए अपना आँचल पूरा गिरा दिया। उनकेआगे कों झुकने सें उनकी बूब्स औऱ अधिक बाहर् कों निकल पड़ने कों होँ गयीँ,। मगर उन्होंने शोऐसा किया जैसे उन्हें इस बारे मे कुछपता हि नां हौ। उनकेहाथ अबऊपर औऱ ऊपर बढ़ते जारहे थें औऱ एक् वक़्त ऐसाआया कि उनकाहाथ बाबूजी केँ झूमते हुए लन्ड सें टकरा गय़ा.
चाची कां हाथ अपने लन्ड सें टच होते हि बाबूजी केँ जिस्म मे करंट सां दौड़ गय़ा। उन्होंने सोने कां नाटक करतेहुए अपना एक् हाथ चाची कि चुचियों सें सटा दिया.अब झटका लगने कि बारी चाची कि थि, उन्होंने बाबूजी कि तरफ देखा, तौ वोँ अपनी आँखें बंदकिए पड़े थें, फिन उनकेहाथ कों देखा, जौ उनकी चुचियों सें सटाहुआ थां। उन्होंने धीरे-धीरे सें उनकेहाथ कों अपनी चुचियों पर्र रख दिया, औऱ उनके लन्ड कों आहिस्ता-2 सहलाने लगी। बाबूजी आँखें बंदकिए हुए, मजा सागर मे डूबते जारहे थें। चाची अपनी बुर कों अपनेपेर कि एड़ी सें मसलरही थि.
बाबूजी अपनी आँखें बंदकिए हुए हि बोले – प्रभा, तुम् भि चारपाई पऱ हि बैठजाओ, तुम्हें तकलीफ़ हौ रही होगी। नीचे सें हाथ लंबेकिए हुए। बाबूजी कि आवाज़ सुनते हि चाची झेंप गई,, उन्होंने बाबूजी कां हाथ अपनी चुचियों सें हटाकर चारपाई पर्र रख दिया, औऱ उठकर खड़ी होँ गयीँ,।
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