सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
Jaisa की ap sabko maloom h abi pichhle hafte hi humne USC की announcement की h aur abi कुछ waqt pahle Rules and Queries thread bi open किया h aur Chit Chat thread तो pahle से hi Hindi section में khula h.
Well iske baare में थोड़ा aapko bata dun yeh एक short kahani contest h jisme ap kisi bi prefix की short kahani post krr sakte hu, joo minimum 700 words and maximum 8000 words के bich honi चाहिए (kahani के words count karne के liye iss tool kaa use kare — Characters Tool)। iss liye mein aapko invitation deta hoon की ap iss contest में apne khayaalon ko shabdon ka roop देकर ismein apni kahaniyan daalein jisko pura XForum dekhega, yeh एक bohot अच्छा kadam hoga aapke aur aapki kahaniyan के liye क्योंकि USC की kahaniyan ko poore XForum के readers read karte haen। ap XForum के sarvashreshth lekhakon में से एक haen। और aapki story bi बहुत achchi chl rahi h। iss liye हम aapse USC के liye एक choti story likhne kaa anurodh karte haen। हम jaante haen की aapke pas समय की abhav h लेकिन iske bawajood हम yeh bi jaante haen की aapke liye कुछ bi asambhav नहीं h.
or joo readers likhna नहीं chahte wo bi iss contest में participate krr sakte haen "Best Readers Award" के liye। Aapko bus krna yeh hoga की contest में posted kahaniyan ko read karke unke ऊपर apne views dene honge.
Winning Writer's ko well deserved Cash Awards milenge, उसके alawa aapko अपना thread apne section में sticky karne kaa mouka bi milega taaki aapka thread top पर rahe uss dauraan। iss liye aapsab के liye yeh एक behtareen mouka h XForum के sabhi readers के ऊपर apni chhaap chhodne kaa aur apni reach badhaane ka। yeh ap sabhi के liye एक बहुत hi sunehra avsar h apni kalpanao ko shabdon kaa raah dikha के यहाँ pesh karne kaa। iss liye aage badhe और apni kalpanao ko shabdon में likhkar world ko dikha de.
Entry thread 25th March ko open hu chuka matlab ap apni kahani daalna shuru krr sakte haen aur wo thread 25th April 2025 tak open rahega iss dauraan ap apni kahani post krr sakte haen। iss liye ap abi से apni kahani likhna shuru kardein तो aapke liye better rahega.
or ha! story ko sirf एक hi post में post किया jaana चाहिए। kyonki yeh एक short kahani contest h jiska matlab h की हम kewal choti kahaniya की ummeed krr rahe haen। iss liye apni story ko kayi post / bhaagon में post karne की anumati नहीं h। Agar कोई bi issue hu तो ap kisi bi staff member ko Message krr sakte haen.
Important Links:
- Chit Chat Thread (For discussions)
- Review Thread (For reviews)
- Rules & Queries Thread (For contest details)
- Entry Thread (too submit your kahani)
Regards, XForum Staff
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
UPDATE 18
The Wedding Day
अगलादिन एक् नई शुरुआत केँ वादे केँ संग शुरुआत हुआ, जोँ हमारे अदृश्य प्यार कि कड़वाहट सें भराहुआ थां। साम केँ उस टाइम रिसोर्ट कि सजावट औऱ जगमगाती लाइट्स मेरेदिल कि उथल-पुथल कां मजाक उड़ारही थि। घऱ केँ बड़े बेटे केँ रूप मे, मेहमानों कां स्वागत करना मेरा कर्तव्य थां औऱ मैंने ये भूमिका अच्छी तरह सें निभाई, भीतर कि उथल-पुथल केँ बावजूद मेरी मुस्कान कभीकम नहि हुइ।
साम केँ उस वातावरण मे जब मे ज़रूरी काम सें बहारआया मेरी नज़र पार्किंग मे खड़ी चमचमाती काली एसयूवी पऱ पड़ी, जौ मे तोहफा स्वरुप रोमा कों देने वाला थां। ये हमारे द्वारा चुराए गए पलों कि एक् स्पष्ट याद दिलाती थि, उस जिंदगी कां प्रतीक जिसे हम् वास्तव मे कभी साझा नहि कर सकते थें। गाड़ी कि चाबियाँ मेरीजेब मे बहोत भारीलग रही थि। अपने हि प्रेम कों तोहफा केँ संग मे किसी औऱ केँ घऱ विदाकर रहा थां जिसेसोच कर मेरादिल भारी होँ उठा। दुःखी औऱ भारीमन सें मे वापसहॉल केँ अंदर आँ गय़ा।
हॉल केँ अंदरहवा उत्साह औऱ म्यूज़िक सें भरी हुईँ थि। कुछ गिने चुने महमानो सें हॉल मे रौनक थि, उनकी हँसी औऱ बकबक एक् ऐसे हंगामा मे घुलरही थि जौ दीवारों सें उछलता हुआ प्रतीत हौ रहा थां। फर्नीचर औऱ इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अन्य तोहफा हॉल केँ अंदर सुरक्षित रूप सें रखेगए थें, जोँ उस भौतिक संपत्ति कां एक् प्रमाण थें जौ हमारी मां नें वर्षों सें जमा कि थि।
जैसे हि आकाश कि ओर सें मेहमान आनेलगे, मैंने अपने चेहरे पर्र मुस्कुराहट बिखेर ली औऱ उसी गर्मजोशी औऱ उत्साह केँ संग उनका स्वागत किया जिसकी मुझसे अपेक्षा थि। वेसब मेरेलिए अजनबी थें, ऐसे चेहरे जिन्हें मैंने पहलेकभी नहि देखा थां।
एक् आकर्षक सफ़ेद सेडान गाड़ी फूलों सें सजी हुइ रिसोर्ट केँ अंदर दाखिल हुइ, औऱ उसमे सें आकाश बाहर् निकला, जोँ एक् मैरून शेरवानी मे दूल्हे कि तरहसजा हुआ थां। उसके मित्र औऱ परिवार वाले भि उसके पीछेचल रहे थें, उनकी हँसी औऱ बातचीत सें उस शोरगुल मे औऱ इजाफा होँ रहा थां जौ पहले सें हि हवा मे व्याप्त थां। वो आत्मविश्वास सें भरे कदमों सें मेरीओर बढ़ा, उसकी आँखें उत्साह सें चमकरही थीं। मैंने मजबूती सें हाथ मिलाने केँ लिए अपनाहाथ बढ़ाया, उसे देखकर जिसतरह सें मेरेपेट मे हलचल हौ रही थि, मे उसे नजरअंदाज करने कि कोशिश कररहा थां।
"स्वागत हैं" मैंने कहा, मेरी आवाज़ सौहार्द कां मुखौटा थि। "आओ! मे तुम्हे तुम्हारा रूम दिखता हूं। "
आकाश नें सर हिलाकर हामीभरी औऱ मेरे पीछे पीछे चलनेलगा, उसकेयार हमारे पीछे आँ रहे थें, उनकी आवाज़ मे उत्साह औऱ घबराहट भरी नोक-झोंक कां मिश्रण थां। वे युवा थें, बिल्कुल मेरे जैसे, औऱ जबवे मज़ाक करते औऱ हँसते थें तौ मे ईर्ष्या कि भावना महसूस किए बिना नहि रह पाता थां।
जैसे हि हम् गैलरी सें होतेहुए कमरे केँ पास पहुँचे, कोल्ड ड्रिंक कि ट्रे केँ संग एक् युवा वेटर कि नज़रमुझ पऱ पड़ी। "इनका ख्याल रखना, " मैंने आकाश औऱ उसके साथियों कि ओर इशारा करतेहुए उससेकहा। वेटर नें सिर हिलाया, मेहमानों कि सेवा करने सें पहले उसकी नज़र एक् लम्हा केँ लिएमुझ पर्र टिकीरही। "आप् लोग आरामकरो, " मैंने उनसेकहा औऱ वोँ सभी कमरे केँ अंदर प्रवेश करगए।
वापसी मे जब मे हॉल मे पहुँचा मेरी मुलाकात आकाश केँ पिता गुप्ता जी औऱ उसकी मां सें हुइ। "गाड़ी बदलने सें पहले तुम्हे एक् बार पूछना चाहिए थां, " उनकी आवाज़ मे नाराजगी थि, गुप्ता जी नें कर्कश स्वर मे कहा। "हमने जौ सोचा थां, वैसा नहि हुआ। "
"माफ़ कीजिये अंकल, वोँ गाड़ी स्टॉक मे नहि थि औऱ इसे रोमा नें हि पसन्द किया हैं" मैंने बात कों सम्हालने कि कोशिश कि।
गुप्ता जी कि नज़रमुझ पर्र ज़रूरत सें ज्यादा पलों केँ लिए टिकीरही, उनकी आँखें थोड़ी सिकुड़ गईं। "वैसेयह भि अच्छी हैं, " उन्होंने कहा, उनका स्वर रूखा होँ गय़ा। "मगर मुझे उम्मीद हैं कि बाकीसभी कुछ वैसा हौ जैसे हमने डिसकस किया थां। "
मैंने हामी मे सिर हिलाया, "जी बिलकुल, " मैंने जवाब दिया, मेरी आवाज़ रुंधी हुईँ थि। "सभीकुछ वैसा हि होगा जैसा आपनेकहा थां। "
गुप्ता जी नें अपनी एड़ी घुमाई औऱ मेराहाथ पकड़कर हॉल केँ एक् शांत कोने कि ओर लेँ गए, "देखोरवि, " उन्होंने कहना शुरुआत किया, उनकी आवाज़ धीमी थि। "आकाश अपने बिज़नेस कों एक्सपैंड करनाचाह रहा हैं, अब तुम् जानते हि होँ, इन चीजों केँ लिए बहोत फंड्स कि ज़रूरत पड़ती हैं। मुझे उम्मीद हैं तुम् उसकीकुछ हेल्प कर पायो। "
उनकीबात समझते हि मेरादिल मेरे सीने मे पत्थर कि तरहबैठ गय़ा। "कैसी हेल्प चाहिए अंकल?" मैंने उसके चेहरे पऱ लालच कां भाव महसूस करतेहुए पूछा।
गुप्ता जी नें जवाब दिया, "अधिक नहि, केवल पांचलाख कॅश सें कामचल जायेगा। " उनकीनजर हमारे पीछे मेहमानों कि भीड़ पऱ थि।
"ठीक हैं, अंकल, " मैंने मुस्कुराते हुएकहा। "मे कोशिश करता हूं। "
गुप्ता जी कि आँखों मे लालच स्पष्ट थां, मेरे हामी भरते हि उनकी आँखें चमकने लगीं, दहेज केँ लिए पैसे कि व्यवस्था करने कां विचार मेरेलिए घृणित थां, पर्र उस टाइम मे किसीतरह कि बहस मे उनकेसंग नहि उलझना चाहता थां।
गुप्ता जी सें विदा लेकर मे बाकी कि व्यवस्था देखने लगा, लगभगआधे घंटेबाद सोनिया मुझे खोजती हुई मेरेपास आयी, "भैया, रोमा दिदी आपको बुलारही हें, " उसनेकहा, उसकी आवाज़ मे तत्परता औऱ मासूमियत कां मिश्रण थां। "उन्हें मेकअप केँ लिए पार्लर छोड़ने जानां हैं। क्याँ आप् उन्हें लें जा सकते हें?"
जैसे हि मैंने सिर हिलाया, मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा। "ठीक हैं, " मैंने उत्तर दिया, मेरी आवाज़ कुछ ज़्यादा हि उत्सुक थि। विवाह कि रस्में शुरुआत होने सें पहले रोमा केँ संगकुछ मिनट अकेले बिताने कां ये सबसे अच्छा बहाने थां।
जैसे हि हम् कमरे केँ पास पहुंचे, चमेली औऱ गुलाब कि मीठी खुशबू हवा मे तैरने लगी, जौ उस सुंदरता कि ओर इशारा कररही थि जोँ अंदर हमारा प्रतीक्षा कररही थि। सोनिया आगे नाचती हुइ चलरही थि, उसने नाटकीय ढंग सें दरवाजा खोला।
रोमा दोनों पेअरऊपर कियेबैड पर्र गुमसुम सि बैठी थि औऱ उसके पैरों केँ पास एक् बड़ा सूटकेस रखाहुआ थां। उसने मैरून रंग कां कढ़ाईदार सलवार कुर्ता पहनाहुआ थां औऱ उसके कानों मे छोटी-छोटी सोने कि बालियाँ झूलरही थीं।
"क्याँ हुआ?" कमरे मे कदम रखते हि मैंने उससे पूछा, मेरी आवाज़ चिंता सें भारी हौ गई थि।
रोमा नें मेरीओर देखा, उसकी आँखें लालथीं। "मुझे पार्लर लेँ चलो, " उसनेकहा, उसकी आवाज़ फुसफुसाहट सें थोड़ी हि ऊपर थि। "मुझे सजधजकर होना हैं। "
उसकी बातें मुझ पऱ हथौड़े कि तरह लगीं, मगर मे स्वयं कों संभालने मे कामयाब रहा। "चल फिन, " मे सूटकेस कों उठाते हुए बड़बड़ाया।
जैसे हि हम् रिसॉर्ट सें बाहर् निकले, साम कि ठंडीहवा नें हमारे जिस्मों कों सहलाया, जौ हमारे गुप्त प्यार कि गर्मी केँ बिल्कुल विपरीत थि। सोनिया कोई गाना गुनगुनाती हुई आगे कि सीट पर्र बैठ गई, विवाह केँ लिए उसका उत्साह देखते हि बनता थां। रोमा पिछली सीट पऱ बैठ गई, औऱ मैंने गाड़ीशहर कि तरफमोड़ दि।
ड्राइव केँ बीच मे मेरी नज़रबैक व्यू मिरर सें रोमा पर्र पड़ी। वो मुझे ताड़रही थि, उसकी निगाहें खामोश थि, किसीसोच मे खोई हुईँ थि। उसका प्रतिबिंब हमारे बीचजल रहे जुनून कि एक् मूक स्वीकारोक्ति थि, एक् रहस्य जोँ अब उसके चेहरे कि रेखाओं मे लिखाहुआ थां।
जैसे हि हम् पार्लर पहुंचे, गाड़ी सें बाहर् निकलने सें पहले अंतिम बार रोमा कि नजरें मुझसे शीशे मे मिलीं। उसने गाड़ी सें उतरते हुएकहा "मे फोन करुँगी, लेने आँ जानां। "
सूटकेस उठाकर, मे उसके पीछे-पीछे पार्लर केँ गेट तक गय़ा, शांतरात मे मेरे जूतों कि आवाज़ गूँजरही थि। "कोई प्रॉब्लम ?" मैंने सूटकेस नीचे रखतेहुए उससे पूछा, जैसे हि वो मेरीओर मुड़ी।
"नहि, " उसने जवाब दिया, उसकी आवाज़ मे एक् नरम दुलार थां।
मैंने एक् गहरी साँसली, अपने कुर्ते कि जेब मे हाथ डाला औऱ एक् लिफाफा निकाला।
"इसेरख, " मैंने रोमा कों लिफाफा देतेहुए कहा, "इसमें क्याँ हैं?" उसने लिफाफा पकड़ते हुए पूछा, "पैसे हें, पार्लर कां बिल नहि देना क्याँ?" मैंने मुस्कुरा केँ उसे जवाब दिया
"थैंक्स, " वो बुदबुदायी, उसकी आवाज़ रुंधी हुई थि। वो मुड़ी औऱ पार्लर मे चली गई, रात केँ सन्नाटे मे उसके पीछे द्वार (दरवाज़ा) बंद होने कि आवाज़ गूँजरही थि।
मे औऱ सोनिया कार सें वापस रिजॉर्ट पहुंचे।
“वाहन बढ़िया हैं नं भैया?” सोनिया कि आवाज़ शांति कों भेदरही थि, जब वो मेरीओर देखने केँ लिए अपनीसीट पर्र मुड़ी तोँ उसकी आँखें उत्साह सें चमक उठीं। "दिदी कों भि ये बहोत पसन्द हैं!"
मे मुस्कुराने मे कामयाब रहा, मेरा दिमाग़ आने वाले वक़्त केँ विचारों सें जूझरहा थां। "हां, ये बहोत सुन्दर औऱ सेक…." मैंने सेक्सी शब्द बोलने सें पहले रुकते हुएकहा।
मेरीबात कों समझते हुए सोनिया खिलखिला उठी। "हाँ ये सेक्सी हैं! आप् ऐसाकह सकते हें" उसने ताली बजाते हुएकहा। "दि औऱ आकाश इसमें घूमते हुए बहोत अच्छे लगेंगे। "
उसकी बातों कि मासूमियत मेरेदिल पर्र छुरी कि तरहलगी। वो गाड़ी रोमा केँ लिए थि, जौ हमारे प्रेम कां प्रतीक थि औऱ एक् ऐसा भविष्य जौ हमेंकभी नहि मिल सकता थां। "हाँ, " मैंने उत्तर दिया, मेरी आवाज़ मे तनाव थां। " आँ परफेक्ट वेडिंग उपहार। "
सोनिया कि आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, उसकी अभिव्यक्ति मे जिज्ञासा औऱ चिंता कां मिश्रण थां। "क्याँ हुआ भैया?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ सच्ची चिंता सें भरी थि।
मे ज़बरदस्ती मुस्कुराने लगा, भावनाओं केँ उस तूफान कों दबाने कि कोशिश कररहा थां जोँ मुझे निगल जाने कि धमकीदे रहा थां। "कुछ नहि बस विवाह कि टेंशन हैं, " मैंने उसकेसिर पऱ हाथ फेरते हुएकहा। "मेरे बारे मे चिंता मतकर। " कहकर मे गाड़ी सें बाहर् उतर गय़ा।
मगर सोनिया इतनी आसानी सें मूर्ख नहि बनीं। उसने अपनी पैनी नजरों सें मेरा अध्ययन किया औऱ मुझेपता थां कि वो मेरे चेहरे केँ आर-पार देख सकती हैं। गाड़ी सें उतरकर गेटबंद कर केँ मेरेपास आकर उसनेकहा "भैया, " उसने शुरुआत किया, उसकी आवाज़ अब धीमी होँ गई, "मुझेपता हैं कि रोमा दि केँ चले जाने केँ बाद आप् अकेलेपन केँ बारे मे सोचरहे होँ। "
उसके शब्दमुझ पऱ टनों ईंटों कि तरह गिरे। ये केवल रोमा कों खोने कां विचार नहि थां जोँ मुझे दर्ददे रहा थां; ये तथ्य थां कि वो किसी औऱ सें विवाह कररही थि, कोईऐसा आदमी जौ उसके लायक नहि थां, कोईऐसा आदमी जिससे वो सच्चा प्रेम नहि करती थि। "सभीठीक होँ जायेगा, " मैंने उसे आश्वासन दिया, भीतर कि उथल-पुथल केँ बावजूद मेरी आवाज़ स्थिर थि। "येसभी जिंदगी कां हिस्सा हैं, सोनिया। "
जैसे हि हम् रिसॉर्ट केँ भव्य प्रवेश दरवाज़ा मे पहुंचे, जीवंत सजावट औऱ हलचलभरी गतिविधि मेरेदिल मे उथल-पुथल केँ बिल्कुल विपरीत थि। मे हर किसी कि आँखों मे उत्साह, एक् नई शुरुआत कि प्रत्याशा देख सकता थां, मगर मे मात्र उस दुनिया केँ अंत केँ बारे मे सोच सकता थां जिसे मे जानता थां।
जैसे हि हम् रिसॉर्ट केँ भव्य प्रवेश दरवाज़ा मे पहुंचे, जीवंत सजावट औऱ हलचलभरी गतिविधि मेरेदिल मे उथल-पुथल केँ बिल्कुल विपरीत थि। मे हर किसी कि आँखों मे उत्साह, एक् नई शुरुआत कि प्रत्याशा देख सकता थां, मगर मे मात्र अपनेउस जिंदगी केँ अंत केँ बारे मे सोचरहा थां जिसे मैंने थोड़ा सां जिया थां औऱ जिसे पूरीतरह जी पाना मुमकिन न् थां।
"जब भि आपको अकेलापन महसूस होँ तोँ आप् मुझेफोन कर सकते हें, " सोनिया नें कहा, उसकी आवाज़ हवा मे घूमरही थि जब वो मेरेसंग संग रिसोर्ट केँ अंदर दाखिल होँ रही थि। ये एक् सांत्वना थि जौ मेरे कंधों पऱ एक् भार कि तरह महसूस हुई।
"थैंक्स, सोनिया, सो स्वीट ऑफ़यू" मैंने संग चलतेहुए उसके कंधे कों हलके सें दबाते हुए मुस्कुराकर कहा।
जैसे-जैसे रात बढ़ती गई, मैंने स्वयं कों खाने पीने कि वयवस्था औऱ मेहमानों केँ संग औऱ ज्यादा शामिल होते पाया। ये मेरे अंदरचल रहे तूफ़ान सें ध्यान हटाने केँ लिए एक् प्रयास भर थां। टाइम खुशी औऱ निराशा केँ क्षणों केँ बीच घूमता रहा, घड़ी कि प्रत्येक टिक-टिक मुझेउन असहनीय पलों केँ नज़दीक लारही थि जिन्हे अब किसी भि हाल मे टाला नहि जा सकता थां।
फिन, जैसे हि घड़ी मे रात केँ 12 बजे, शीतल फूफी तत्परता सें मेरेपास आईं। "रवि, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ मे अधीरता कां भाव थां, "देर होँ रही हैं। तुम्हे रोमा कों पार्लर सें वापस लाना होगा। "
"पऱ उसने अभि तक कॉलआई नहि किया, " मैंने अपनी आवाज़ मे कंपन कों दूर रखने कि कोशिश करतेहुए उनसेकहा। "उसनेकहा थां वोँ सजधजकर होकरकॉल आई करेगी। "
शीतल फूफी कि आँखें सिकुड़ गईं, उनके चेहरे पर्र अस्वीकृति केँ भावउभर आए। "कॉल आई कां इंतजार मतकरो, तुम् बसजाओ औऱ उसे लें आओ, " उन्होंने मुझे आदेश दिया, उसके स्वर मे कोई गुंजाइश नहि थि.
मैंने सिर हिलाया, जैसे हि मे जाने केँ लिए मुड़ा तोँ मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा। वो रात अनकहे शब्दों औऱ अधूरी इच्छाओं कि एक् लय थि, रिसॉर्ट सें हरकदम दूर मुझेउस लम्हा केँ लगभग लेँ जारहा थां जिससे मे डररहा थां। जैसे हि मे गाड़ी कि ओर जानेलगा तोँ शीतल फूफी नें पीछे सें आवाज़ लगाई, "रवि, रुको। "
मे रुक गय़ा, जैसे हि वो मेरेपास आई, मेरा जिस्म तनावग्रस्त होँ गय़ा। "मे भि तुम्हारे संग चलती हूं, " उन्होंने दृढ़ता सें कहा, उनकी आंखें मेरी आंखों मे विरोध कां कोई संकेत तलाशरही थीं।
"मगर फूफी, यंहा पऱ कौन सम्हालेगा?" मैंने हताशा सें अपनी आवाज़ दबाते हुए पूछा।
उनकी आँखें सिकुड़ गईं औऱ उन्होंने अपनाहाथ मेरी बांह पऱ रख दिया। "यहा सभीठीक हैं, तुम् चलो"
पार्लर तक कि ड्राइव धुंधली थि, शहर कि रोशनियाँ रात केँ आकाश मे सितारों कि तरहचमक रहीथीं, जिनका इतना उज्ज्वल होनाकोई मायने नहि रखता थां।
गाड़ी केँ रुकते हि, फूफी तेज़ क़दमों सें पार्लर केँ अंदर गई,, रोमा केँ लिए उनकी तत्परता साफझलक रही थि। मे अपने विचारों केँ संग गाड़ी मे इंतजार करनेलगा।
पाँच मिनटबाद, वो वापस आयीं, उनका चेहरा लाल थां। जब वो गाड़ी केँ पास पहुंची तौ वो काँपरही थि, उनकी आँखें डर सें चौड़ी होँ गई थीं। "क्याँ हुआ फूफी?" मैंने पूछा, मेरादिल मेरे सीने मे जोर सें धड़करहा थां।
"व.वोँ यहां नहि हैं, " उन्होंने करीब रोतेहुए कहा, उनकी आवाज़ कांपरही थि। "यहलोग बोलरहे हें तुम्हारे छोड़ने केँ १० मिनटबाद हि वोँ किसी एमर्जेन्सी कां बोलकर यंहा सें चली गई, थि"
"चली गई, !!….पर्र कँहा, क्यूं?" मेरेमन मे सैकड़ों सवाल एक् संग उभरने लगे। "मुझे नहि पतारवि, मुझे बहोत डरलगरहा हैं" फूफी नें आगेवाली सीट पऱ बैठते हुए जवाब दिया। मैंने रोमा कां फ़ोन मिलाया पऱ वोँ स्विच ऑफ थां। मे कांपते हाथों सें बारबार उसका नंबर डायल करनेलगा पऱ हरबार एक् हि वाक्य सुनाई देता"द नंबरयू आर कालिंग इस स्विच ऑफ".
हताश होकर मैंने इग्निशन मे चाबी घुमाई, मे घबरा गय़ा, इंजनजोर सें चालू होँ गय़ा औऱ हम् पार्लर सें तेजी सें दूरचले गए। मेरेमन मे सैकड़ों विचार उमड़ पड़े, जिनमें सें प्रत्येक पिछले सें भि ज़्यादा चिंताजनक थां। रोमा कहां जा सकती थि? क्याँ हौ सकता थां? क्याँ वो ठीक थि?
हम् सुनसान सड़कों सें गुज़रे, वाहन कि हेडलाइट्स अंधेरे कों ऐसेकाट रहीथीं जैसे मक्खन मे चाकू। मेरी नज़रें इधर-उधर घूमरही थीं, उसकाकोई निशान ढूँढ़ रहीथीं। वाहन मे सन्नाटा दमघोंटू थां, जोँ सिर्फ शीतल फूफी कि कभी-कभार सिसकने सें टूट जाता थां।
"क्याँ तुम्हें कोई अंदाज़ा हैं कि वो कहां गई होगी?" आख़िरकार उन्होंने पूछा, उनकी आवाज़ महज़ फुसफुसाहट थि।
मुझे नहि पता थां कि क्याँ कहूं। मे विचारों मे इतनाखो गय़ा थां, भय औऱ अपराधबोध सें इतना ग्रस्त हौ गय़ा थां कि मैंने रोमा केँ जल्द पार्लर छोड़ने कि संभावना पर्र विचार नहि किया थां। "नहि, फूफी, " मैंने उत्तर दिया, मेरी आवाज़ भावना सें भरी हुई थि। "मुझे नहि पता कि वो कँहा गई, हैं। "
हम् रोमा केँ किसी भि संकेत केँ लिए अंधेरी सड़कों कों स्कैन करतेहुए घूमरहे थें, रास्ते मे पड़ने वाले बैंक्वेट हॉलों कि शादियों सें हंसी औऱ म्यूज़िक कां हंगामा मेरेदिल मे किसीशूल कि तरहचुभ रहा थां।
आख़िरकार, अब दर्दसहन न् कर पाने केँ कारण, मैंने गाड़ी कों कुछबंद दुकानों केँ सामने रोक दिया। इलाका एकदम शांत थां, मंद स्ट्रीट लाइटें सुनसान सड़क पऱ अँधेरे सें लड़रही थि। "वो मेरेसंग ऐसा केसेकर सकती हैं?" मे स्टीयरिंग पर्र ज़ोर सें मारते हुए चिल्लाया।
सन्नाटे कों तोड़ने वाली मेरी आवाज़ परेशान करने वाली थि, मगरये मेरी अपनी सिसकियों कि आवाज़ थि जिसने मुझे वास्तव मे वास्तविकता मे वापसला दिया। आँसूगरम औऱ मोटे थें, मेरे चेहरे सें बहतेहुए मेरी दृष्टि धुंधली होँ गई। मुझेयाद नहि आँ रहा कि अंतिम बार मे इसतरह कबरोया थां, मगरऐसा लगा जैसेकोई बांधटूट गय़ा हौ, जिससे वर्षों कि दबी हुई भावनाएं बाहर् आँ गईं।
फूफी कां हाथ मेरीपीठ पऱ नरम थां, उनकी कोमल थपथपाहट एक् मूक सांत्वना थि क्योंकि वो मुझे शांत करने कि कोशिश कररही थीं। उनकी आँखें चिंता औऱ भ्रम केँ मिश्रण सें भरी हुई थीं, मगर उन्होंने कुछ नहि कहा, जिससे मुझेकुछ भि कहने कां मौका नहि मिला। उनकी चुप्पी मेरी आत्मा केँ लिए एक् मरहम थि, मेरेसिर मे डर औऱ संदेह केँ हंगामा केँ बिल्कुल विपरीत।
एक् गहरी, कंपकंपी भरी सांस लेतेहुए मैंने स्वयं कों संभाला। मे अपनेहाथ केँ पिछले हिस्से सें अपने आँसू पोंछते हुए बुदबुदाया। "हमेंउसे ढूंढना होगा। "
आंटी नें दृढ़ता सें सिर हिलाया, उनकी आँखों मे वो दृढ़ संकल्प झलकरहा थां जोँ मेरे अंदरबस गय़ा थां। "परेशान मत हौ बेटा, " उन्होंने मुझे आश्वासन दिया। "हम् उसे ढूंढेंगे औऱ फिन उससे पूछेंगे उसनेऐसा क्यूं किया?। "
उसकी आवाज़ मेरे विचारों केँ तूफ़ान मे शांति कां प्रतीक थि, औऱ मुझेपता थां कि वो सही थि। हम् यहां बैठकर उसे नहि खोज सकते। हमें पुलिस कि सहायता कि ज़रूरत पड़ेगी, हमे उन्हें इन्फॉर्म करना होगा।
हम् पास केँ पुलिस स्टेशन मे चलेगए, स्थिति कि कड़वी सच्चाई तब सामने आईजब तेज़ रोशनी कि परछाइयाँ हमारे चेहरे पर्र पड़रही थीं। जब हम् डेस्क केँ पास पहुंचे तौ हवा मे डर औऱ अनिश्चितता कि महकभरी हुई थि, जहां नींदभरी आंखों वाला एक् इंस्पेक्टर हमें बोरियत औऱ उत्सुकता केँ मिश्रण केँ संगदेख रहा थां।
"कहिये, क्याँ समस्या हैं?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ कर्कश औऱ उपेक्षापूर्ण थि।
मैंने स्वयं कों संयत करने कि कोशिश करतेहुए एक् गहरी सांसली। "मेरी बेहन, रोमा, वो पार्लर सें लापता होँ गई हैं। वो अपनी विवाह केँ मेकअप केँ लिए वहां गई थि, औऱ वंहा सें कंहीचली गयीँ, हैं। "
इंस्पेक्टर कि निगाहें तेज़ होँ गईं, उसकी पहले कि बोरियत दिलचस्पी कि चमक सें बदल गई। "बहोत बढ़िया, दुल्हन हि लापता हौ गयीँ, ?" इंस्पेक्टर कि बात सुनकर साइड मे बैठे सिपाही भि मुस्कुराने लगे। इंस्पेक्टर जिसका नाम उसकी नेमप्लेट पऱ जसवंत सिंह लिखा थां उसनेहमे अपने सामने बैठने कां इशारा किया औऱ फिन एक् डायरी औऱ पेनउठा कर बोला "विस्तार सें बताओ"
मैंने उसे सारी घटना विस्तार सें बताई जिसे वोँ अपनी डायरी मे नोट करनेलगा।
इंस्पेक्टर नें अपनेपैड पर्र कुछ लिखा, उसकी अभिव्यक्ति अपठनीय थि। "कंहीऐसा तोँ नहि केँ वोँ यह विवाह करना हि नां चाहती हौ ?" उसने पूछा, उसकी आँखें मेरीओर ताड़रही थीं।
मुझेडर कां झटका सां महसूस हुआ। क्याँ रोमा इसलिये भाग सकती थि क्योंकि वो आकाश सें विवाह नहि करना चाहती थि? क्योंकि वो मुझसे प्रेम करती थि? ये विचार उत्साहवर्धक भि थां औऱ भयानक भि। "पता नहि, सर" मैंने कहा, मेरी आवाज़ फुसफुसाहट सें थोड़ी हि ऊपर थि।
। "वोँ थोड़ा दुःखी ज़रूर थि, हमेलगा मम्मी केँ गुज़रने सें दुःखी हैं, विवाह कों लेकर उसनेऐसी कोईबात नहि कि थि। "
इंस्पेक्टर नें सिर हिलाया, उसकी अभिव्यक्ति अपरिवर्तित रही। "ठीक हैं, " वो खड़ा हौ गय़ा औऱ हमें अपने पीछेआने कां इशारा किया। "मेरेसंग आओ, हम् गुमशुदगी कि रिपोर्ट दर्जकरा देते हें। "
जब हम् एक् छोटे औऱ तंग कमरे कि ओरजारहे थें तौ स्टेशन पर्र चारों औऱ सन्नाटा सां पसरा थां। दीवारें फाइलों सें अटी पड़ीथीं औऱ हवा बासीकप कॉफ़ी औऱ सिगरेट केँ धुएं कि महक सें भरी हुई थि। जब हम् साम कि घटनाओं केँ बारे मे बातकर रहे थें तोँ इंस्पेक्टर कागजों सें भरी एक् मेज़ केँ पीछेबैठ गय़ा, उसकी आँखें हमसेदूर नहि हौ रहीथीं। उसके सवाल तीखे औऱ सटीक थें, जोँ रोमा केँ जिंदगी औऱ उसकेसंग हमारे संबंधों केँ हर विवरण कि जांच करते थें।
मेरा मोबाइल जोँ बार-बार मेरीजेब मे बजरहा थां औऱ मे जिस समस्या कां सामना कररहा थां उसके कारणइसे हरबार काट देता थां, वो अचानक फिन सें बजउठा, ध्वनि तनावपूर्ण माहौल कों भेदरही थि। मैंने स्क्रीन पर्र नज़र डाली, जैसे हि मैंने गुप्ता जी कां नाम देखा तौ मेरादिल बैठ गय़ा। मैंने माफी मांगते हुएउसे शीतल फूफी कों सौंप दिया। उन्होंने कांपते हाथों सें इसे लेँ लिया, फोन कां उत्तर देते टाइम उनकी आँखें मेरी आँखों सें हट हि नहि रहीथीं।
फूफी नें गुप्ता जी कों सारीबात समझाई, गुप्ता जी शायद मुझसे बात करने कों उत्सुक थें फूफी नें फ़ोन मेरीतरफ बड़ा दिया।
जैसे हि मैंने फ़ोनकान सें लगाया, इंस्पेक्टर कि नज़रमुझ पर्र टिकीरही, उसकी अभिव्यक्ति अपठनीय थि। "अंकल, हम् पुलिस स्टेशन मे हें औऱ गुमशुदगी कि रिपोर्ट लिखवा रहे हें, " मैंने कांपती आवाज़ मे कहा।
मिस्टर गुप्ता कि आवाज़ तेज़ हौ गई, छोटे सें कमरे मे गूँजने लगी। "क्याँ? गुमशुदगी कि रिपोर्ट? तुम् लोगों नें क्याँ भसड़मचा केँ रखी हैं?" उसने मेरा जवाब सुने बिना हि मोबाइल काट दिया.
इंस्पेक्टर नें हमसे बातें समझने केँ बाद वायरलेस पर्र कुछ जानकारी रोमा केँ बारे मे प्रसारित कि औऱ फिन हमसे मुखातिब होतेहुए बोला "देखोरवि हम् रोमा कों ढूंढ़ने कि पूरी कोशिश करेंगे, पर्र अब तक जितना तुमने हमे बताया हैं उससेऐसा हि लगरहा हैं जैसे वोँ अपनी मर्ज़ी सें कंहीचली गई, हैं"
इंस्पेक्टर कि बात सुनकर मे औऱ फूफी एक् दूसरे कां मुंह ताकने लगे।
उसकेबाद इंस्पेक्टर मुझसे विवाह मे दिए जाने वाले दहेज़ केँ बारे मे पूछने लगा, मैंने उन्हें बताने केँ लिए अपना मुंह खोला हि थां कि कार्यालय कां द्वार (दरवाज़ा) खुला औऱ मिस्टर गुप्ता, आकाश औऱ उसके साथी अंदर आँ गए। रूम छोटा हौ गय़ा, तनाव इंस्पेक्टर कि सिगरेट केँ धुएं सें भि अधिक गहरा होँ गय़ा। आकाश कि आँखों मे घबराहट थि, वो कमरे कि तलाशी इसतरह सें लेनेलगा जैसे रोमा कों हमने वंही कंही छुपा केँ रखा हौ। उसके दोस्तों नें देखा, उनके चेहरे पर्र भ्रम औऱ गुस्स कां मिश्रण दिखरहा थां।
"यहसभी क्याँ हैं?" गुप्ता जी चिल्लाये, उनका चेहरा लाल हौ गय़ा। "रोमा कहां हैं?"
इंस्पेक्टर नें घुसपैठ सें बेफिक्र होकर, अपने कागजी काम सें ऊपर देखा। "मिस्टर गुप्ता, " उन्होंने शांति सें कहा, "मे आपकी चिंता कों समझता हूं, मगर हम् आपकीबहू कां पता लगाने केँ लिएहर संभव कोशिश कररहे हें। "
आकाशआगे आया, उसके चेहरे पऱ गुस्स थां। "रोमा कँहा गयीँ, ?" उसने मुझसे पूछा, उसकी आवाज़ डर केँ मारे ऊँची हौ गई।
मेरी नज़रें उसकी नज़रों सें मिली, मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा। "हम् नहि जानते, " मैंने अपनी आवाज़ कों स्थिर रखने कि कोशिश करतेहुए उत्तर दिया। "हमे तुमसे ज़ादा फ़िक्र हैं आकाश। "
गुप्ता जी कि आंखें झुकगईं, मोबाइल पऱ उनकी पकड़ मजबूत होँ गई। "ऐसा केसे होँ सकता हैं, " उन्होंने कहा। "इंस्पेक्टर साहब जल्द सें उसे ढूंढिए। "
इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी पऱ पीछे कि ओरझुक गय़ा, उसकी अभिव्यक्ति अपरिवर्तित रही। "मे आपको विश्वास दिलाता हूं, मिस्टर गुप्ता, हम् लड़की कां पता लगाने केँ लिएहर संभव कोशिश करेंगे। फिरभी, अभि तक दि गई जानकारी सें ऐसा लगता हैं कि वो अपनी मर्ज़ी सें गई हैं। "
आकाश कि पकड़ मेरे कंधे पर्र मजबूत होँ गई, उसके नाखून मेरी त्वचा मे गड़रहे थें। "कहां हैं वोँ? तुम् जरूरकुछ छुपारहे हौ?" वो फुसफुसाया, उसकी आवाज़ कांपरही थि।
"मे भि तुम्हारी तरह असमंजस मे हूं, " मैंने जवाब दिया, मेरी अपनी आवाज़ हताशा सें भरी हुइ थि। "मे उसे ढूंढना चाहता हूं औऱ मुझे उसकी सुरक्षा कि चिंता हैं। "
इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी पऱ आगे कि ओरझुक गय़ा, उसकी अभिव्यक्ति पऱ संदेह थां। "ठीक हैं, रविये बताओ, " उसनेकहा, उसकी आँखें मेरीओर देखरही थीं। "क्याँ उसकाकोई अफेयर चलरहा थां?"
मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा, औऱ मुझे अपने माथे पर्र ठंडा पसीना बहताहुआ महसूस हुआ। "नहि, " मैंने कहा, मेरे सीने मे कंपन केँ बावजूद मेरी आवाज़ दृढ़ थि। "मैंने उसके बारे मे ऐसीकोई बात नहि सुनी। "
शीतल फूफी नें मेरीओर देखा, उनकी आँखें मेरी आँखों मे धोखे कां कोई संकेत खोजरही थीं। "रोमा हमेशा सें एक् अच्छी लड़कीरही हैं, " उन्होंने कांपती आवाज़ मे कहा। "मे उसके किसी औऱ केँ संगभाग जाने कि सोच भि नहि सकती। "
इंस्पेक्टर कि नज़र शीतल फूफी पऱ गई,, "औऱ आप् उसके मंगेतर केँ संग उसके रिश्ते केँ बारे मे क्याँ जानती हें?"
शीतल फूफी कि उंगलिया साडी केँ पल्लू सें उलझ गयीँ,, उनकी आँखें नीचेझुक गईं। उन्होंने फुसफुसा केँ स्वीकार किया, "रोमा कों आकाश पसन्द नहि थां" "मगर उसनेकभी नहि कहा कि वो इतनी दुखी थि कि भागजाए। "
मोबाइल पऱ गुप्ता जी कि पकड़ औऱ भि मजबूत होँ गई, उनकी उंगलियां सफेद होँ गईं। "क्याँ बकरही होँ?" वो गुर्राए, उसकी आँखें मुझ पर्र सिकुड़ गईं।
मैंने अपने अंदर कि उथल-पुथल कों शांत करने कि कोशिश करतेहुए एक् गहरी साँसली। "सर, रोमा औऱ आकाश केँ बीचकुछ मतभेद थें"
गुप्ता जी कि नज़र मेरीओर उठी, उनकी आँखें संदेह सें सिकुड़ गयीं। "केसे मतभेद?" उन्होंने पूछा, उनकी आवाज़ धीमी औऱ खतरनाक थि।
"अगर आप् आकाश सें पूछें तौ बेहतर होगा, " मैंने जवाब दिया, मेरे भीतर भावनाओं केँ तूफ़ान केँ बावजूद मेरी आवाज़ स्थिर थि।
आकाश नें ऊपर देखा, उसकी नज़रें इंस्पेक्टर सें मिलीं, जिनमें गुस्से औऱ हताशा कां मिश्रण थां। "हमारे बीच कुछ.छोटी-मोटी असहमति थि, " आकाश बुदबुदाया, इंस्पेक्टर नें कर्कश आवाज़ मे कहा। "मगर वो इसवजह सें भाग नहि जाएगी!"
"क्याँ तुम् विस्तार सें बता सकते होँ कि वे असहमतियाँ क्याँ थीं?" इंस्पेक्टर नें जोर देकर आकाश सें पूछा
आकाश कां चेहरा तमतमा गय़ा औऱ उसने नीचे अपने पैरों कि ओर देखा। " उसे कभी-कभी मेरा उससेबात करने कां तरीका पसन्द नहि आता थां, " वो बड़बड़ाया, उसकी आवाज़ बमुश्किल सुनाई देरही थि।
"नहि, यहझूठ बोलरहा हैं। इसे दहेज मे बहोत कुछ चाहिए थां" मैंने गुस्से मे टोकते हुए इंस्पेक्टर कों दहेज केँ बारे मे बताया।
इंस्पेक्टर अपनी कुर्सी पर्र पीछे कि ओरझुक गय़ा, "हम्म, तोँ यहबात हैं, सभी दहेज कां मसला हैं?" क्याँ येसच हैं, गुप्ता जी?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ भ्रामक रूप सें शांत थि।
आकाश कि नज़र कमरे केँ चारों ओरघूम गई, मेरे कंधे पर्र उसकी पकड़ थोड़ी ढीली हौ गई। "ऐसा.ऐसा नहि हैं, " उसने हकलाते हुएकहा, उसकी आवाज़ उसके अपराध बोध कों उजागर कररही थि। "हमेंबस विवाह केँ खर्चों केँ बारे मे एक् छोटी सि गलतफहमी होँ गई थि। "
"एक् छोटी सि ग़लतफ़हमी?" इंस्पेक्टर नें पूछा, उसकी आवाज़ जेल कि कोठरी कि स्टील कि सलाखों जैसी ठंडी थि।
"पाँचलाख रुपए, " मैंने कहा, यह शब्द मेरेगले मे धूल कि तरह चिपकगए। "यहलोग दहेज़ मे पांचलाख रुपये चाहते थें। "
इंस्पेक्टर कि निगाहें तेज़ होँ गईं, उसकी नज़रें आकाश सें मिस्टर गुप्ता कि ओर औऱ फिन वापस आँ गईं। "क्याँ येसच हैं?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ शांत थि।
गुप्ता जी असहज होँ गये, उनके चेहरे पर्र रोष कां मुखौटा थां। "ये एक् ग़लतफ़हमी हैं, " उन्होंने कसी हुई आवाज़ मे कहा। "हमने तुमसे कभीकुछ नहि मांगा। "
"झूठ, " मैंने जवाब दिया, मेरी आँखों मे क्रोध झलकने लगा। "आप् अपने लालची हाथ फैलाकर मेरेपास आए। आपनेकहा आकाश कों बिज़नेस एक्सपैंड करना हैं"
गुप्ता जी हकलाये, उनका चेहरा गहरालाल रंग कां हौ गय़ा। "येसच नहि हैं, " उन्होंने जोर देकरकहा, मगर उनकी आवाज़ केँ कांप नें उनके अपराध कों उजागर कर दिया।
"ऐसा लगता हैं कि हमारे पास लापता दुल्हन केँ अलावा औऱ भि बहोत कुछ चर्चा करने कों हैं, " इंस्पेक्टर नें कहा, उसकी आवाज़ स्टील जैसी ठंडी थि। उसने दरवाजे पर्र खड़े एक् हट्टे-कट्टे पुलिसकर्मी कों इशारा किया। "तुलाराम, इन बाप बेटे कों उठा केँ अंदरडाल" उसने आदेश दिया।
गुप्ता जी कि आँखें आश्चर्य सें बाहर् निकलआईं, लड़खड़ाते हुए पीछे कि ओर जाने पऱ मोबाइल पर्र उनकी पकड़छूट गई। "क्याँ? नहि, नहि, आप् प्लीज समझने कि कोशिश कीजिये!" उसने विनती कि, उसकी आवाज़ ऊँची औऱ हताश थि। आकाश केँ घुटने मुड़गए औऱ वो फर्श पऱ गिर गय़ा, उसके साथी भयभीत होकर पीछेहट गए।
हट्टे-कट्टे पुलिसकर्मी कि ओर इशारा करतेहुए इंस्पेक्टर कि अभिव्यक्ति स्थिर रही। "तुलाराम, लेकेजा इन्हे, " उसने अपनी आवाज़ मे दृढ़ स्वर मे दोहराया। "लड़कीमिल जाने केँ बाद इनसे निबटेंगे। "
गुप्ता जी औऱ आकाश कों घसीटकर तुलाराम दूर लेँ गय़ा औऱ सलाखों केँ एक् गेट केँ पीछेबंद कर दिया। शीतल फूफी नें मेरीतरफ देखा, उनकी आँखें सदमे सें फैल गयीं। “यह तुमने क्याँ कियारवि?” वो फुसफुसाई, उनकी आवाज़ कांपरही थि।
"मे बस अपनी बेहन कों ढूंढना चाहता हूं, सर" मैंने कांपती आवाज़ मे कहा। "मे दहेज कि शिकायत दर्ज नहि कराना चाहता, प्लीज सर उन्हें छोड़दें। हमें रोमा कों ढूंढने पऱ ध्यान केंद्रित करने कि जरूरत हैं। " मैंने इंस्पेक्टर सें हाथ जोड़कर विनती कि.
इंस्पेक्टर नें बहोत देर तक मेरीओर देखा, उसकी अभिव्यक्ति अपठनीय थि। फिन उसनेअहह भरतेहुए सिर हिलाया। "ठीक हैं, " उसने हट्टे-कट्टे पुलिसकर्मी कि ओर मुड़ते हुएकहा। "उन्हें जानेदो"
गुप्ता जी औऱ आकाश कों रिहाकर दिया गय़ा, उनके चेहरे पर्र हार औऱ गुस्से कि तस्वीर थि। "घऱजाओ गुप्ता जी, विवाह ख़त्म होँ गई हैं" इंस्पेक्टर नें मिस्टर गुप्ता कों ताना मारा।
मिस्टर गुप्ता औऱ आकाश सलाखों सें बाहर् आते हि कमरे सें बाहर् चलेगये।
इंस्पेक्टर नें हमारी ओर देखा, "मैंने आपकी शिकायत लिखली हैं, " उसनेकहा, उसकी आवाज़ धीमी थि। "तुम्हें भि घऱ जानां चाहिए। हम् रोमा कि तलाश करते रहेंगे, औऱ अगर हमेंकुछ मिलेगा तौ हम् तुम्हें सूचित करेंगे। "
भारीमन सें, हम् पुलिस स्टेशन सें बाहर् आये, रिज़ॉर्ट कि ओर वापसी कां मार्ग खामोश थां, हममें सें प्रत्येक अपने-अपने विचारों मे खोयाहुआ थां। चमकदार रोशनी औऱ उत्सव कि सजावट चेहरे पऱ एक् तमाचे कि तरह महसूस हुई, जिस तनाव औऱ संकट कों हम् महसूस कररहे थें उसके बिलकुल विपरीत।
रिसोर्ट पहुंचने पऱ, हमने जल्दी दूल्हे केँ परिवार कों दिए जाने वालेसब उपहारों कों एक् DCM मे लोडकरा कर अपनेघऱ केँ लिए रवाना किया। ये प्रक्रिया बहोत भारी औऱ असहनीय गुज़री थि, फिन भि हमेयह करना हि पड़ा। हमने जोँ भि बॉक्स उठाया, नकदी कां हर लिफाफा जौ हमने एकत्र किया, वो उस विवाह कि एक् दर्दनाक याद थि जौ अब बिखर चुकी थि।
रिसोर्ट सें अपना सामान समेटते वक़्त नाँ चाहते हुए भि मैंने रोमा केँ बारे मे लोगों कों फुसफुसाते हुए सुना। कोई उसके चरित्र पर्र ऊँगली उठारहा थां तोँ कोई दहेज़ कों विवाह केँ टूटने कि वजह मानकर चर्चा कररहा थां।
रिसोर्ट कां साराकाम निबटा कर हम् तीनो (मे, फूफी औऱ सोनिया ) गाड़ी मे बैठगए, हमारे बीचघना सन्नाटा पसरा थां। हमारे घऱ तक पहुँचने कां सफर धुंधला थां, गुजरते दृश्य मेरे भीतर उमड़ती उथल-पुथल भरी भावनाओं कि धुंधली पृष्ठभूमि थें। जब हम् आख़िरकार घऱ पर्र पहुँचे, तौ घऱ किसी लुटेहुए किले जैसालग रहा थां, जिसकी सजावट फीकी औऱ रौनक वीरान हौ चुकी थि।
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
UPDATE 19:
सुभह केँ 5 बजे थें जब मे अपने कमरे मे दाखिल हुआ, मेराबदन थकावट सें भारी थां मगर मेरा दिमाग़ रोमा केँ विचार लिएघूम रहा थां। मैंने अपना कुर्ता उतारकर एक् तरफ फेंक दिया औऱ बनियान औऱ पजामे मे खाट पर्र गिर पड़ा। जब मैंने छत कि ओर देखा तौ गद्दे कि कोमलता सें कोई आराम नहि मिलरहा थां। कमरे कां अँधेरा मेरेदिल मे उथल-पुथल कों प्रतिबिंबित कररहा थां, औऱ शांति रोमा कि अनुपस्थिति कि बहराकर देने वालीयाद दिलारही थि।
तभी ख़ामोशी कों तोड़ते हुए मेरा मोबाइल टेबल पऱ वायब्रेट करनेलगा मैंने आगे बढ़करफ़ोन उठाया स्क्रीन पऱ एक् चीर परिचित नाम देखकर मेरे होंठों पऱ एक् मुस्कान तैर गई,, मैंने कॉलआई रिसीव की करने केँ लिए स्वाइप किया "हैलो" मैंने जवाब दिया
"वेल played ब्रो" दूसरी तरफ सें वाणी कि चहकती हुईँ आवाज़ सुनाई दि,
"तौ तुम्हे भि पताचल गय़ा" मैंने उसे छेड़ते हुएकहा, "हाँ अभि अभि माँ नें फ़ोन पर्र बताया, अबसचसच बताना यहसभी तुम्हारी प्लानिंग थि नं?" वाणी नें उत्सुकता सें पूछा
"कैसी प्लानिंग?" मैंने अनजान बनतेहुए जवाब दिया
"अच्छा बेटा, अबयह भि मे बताऊँ" "ज़ादा नाटकमत करो, औऱ कहो" उसने थोड़ाज़ोर देकर अपना सवाल दोहराया
"हम्म, तूने हि तोँ आईडिया दिया थां" मैंने धीमी आवाज़ मे कहा
"मैंने कहा तौ थां पऱ मुझे विश्वास नहि थां केँ तुम् ऐसाकर पाओगे" वाणी नें धीमी आवाज़ मे कहा
"पऱ अब तौ विश्वास हौ गय़ा न्?" मैंने उसे छेड़ा
"हम्म, पऱ तुमने उसे केसे राज़ी किया इतनाबड़ा स्टेप लेने केँ लिए" वाणी नें सवाल किया
"प्रेम मे बहोत ताकत होती हैं वाणी" मैंने बात कों घुमाया
"इसका मतलब तुम्हारे बीच…ओह माय गॉड….रियली" उसने आश्चर्य सें पूछा
"हाँ, हमारे बीच कि सब दीवारें टूट गई, वाणी औऱ" इससे पहले मे वाणी कों औऱ कुछबता पाता
मेरे दरवाजे पर्र एक् कोमल दस्तक कि आवाज़ नें मुझेबैड सें उठने पऱ विवशकर दिया।
"दरवाज़े पर्र शायदकोई आया हैं, तुझसे रात कों बात करूँगा, बाई" मैंने बिना उसका रिप्लाई सुनेकॉल आईकाट दि
अपने चेहरे पऱ झलकती ख़ुशी कों एक् उदासी कि चादर मे ढककर मैंने दरवाज़ा खोला तौ सामने शीतल फूफी खड़ी थि, रात केँ उन्ही कपड़ों मे फूफी मेरे दरवाज़े केँ बहार खड़ीथीं, उनकेबाल एक् काले प्रभामंडल कि तरह उनके चेहरे केँ चारों ओर लहरारहे थें। उनकी आँखें लाल औऱ सूजी हुई थीं। उन्होंने मेरीओर देखा, उनकी उदासी हवा मे साफझलक रही थि।
"क्याँ तुम् ठीक हौ?" उन्होंने पूछा, "हाँ फूफी, बस सोने कि कोशिश कररहा थां" कहकर मे दरवाज़े सें पीछेहट गय़ा औऱ वापस अपनेबेड पर्र आकरबैठ गय़ा, फूफी मेरे पीछे पीछे कमरे केँ अंदर आँ गई,।
फूफी मेरेबगल मे बैठ गई,, उन्होंने मेरे कंधों केँ चारों ओर एक् हाथ लपेटा, उनका स्पर्श कोमल औऱ आरामदायक थां। "आज तुमने बहोत कुछ झेला हैं, " वो बड़बड़ायी, उनकी आवाज़ दर्द मे किसीबाम कि तरह थि। "मगरसभी कुछठीक हौ जाएगा। "
मेरी आँखों सें आंसूबह चले। फूफी कां हाथ मेरेसिर पर्र आया, उन्होंने मेरे बालों कों सहलाया। "चिंता मतकरो पुलिस उसकापता लगा लेगी, " "हिम्मत रखो, बेटा, " उन्होंने मेरे कंधे पऱ अपनी पकड़ मजबूत करतेहुए कहा। "सभी ठीक होँ जायेगा। "
उनके शब्द मेरे भीतर गहराई तक गूँजउठे औऱ मैंने सहमति मे सिर हिलाया, उनके आलिंगन कि गर्माहट मेरी आत्मा पर्र मरहम थि, जौ अंदरचल रहे तूफ़ान सें थोड़ी राहत देती थि। "पता हैं, फूफी" मे बुदबुदाया, "मुझे अभि भि यकीन नहि होँ रहा केँ वोँ ऐसा भि कुछकर सकती हैं। "
शीतल फूफी थोडा दूरहट गईं, उनकाहाथ मेरे चेहरे कों पकड़ने केँ लिएबड़ा, उनका अंगूठा मेरी पलकों सें छूटे आंसू कों पोंछरहा थां। "हम्म, उसे ऐसा नहि करना चाहिए थां" उन्होंने कहा, उसकी आवाज़ हल्की फुसफुसाहट थि। "पर्र क्याँ पता उसकीऐसी क्याँ मजबूरी थि, अभि तुम् आरामकरो उसे ढूंढ़ने केँ लिए तुम्हे अभि आराम कि सख्त ज़रूरत हैं"
उनके शब्दों नें मुझ पऱ गरमलहर कि तरहअसर किया औऱ मुझेलगा कि मेरेबदन कां तनावकम होनेलगा हैं।
मैंने एक् गहरी साँसली, उनके परफ्यूम कि तेज़गंध मेरे नथुनों मे भर गई, औऱ मे उनकेगले लग गय़ा।
एक् हल्की अहह केँ संग, उन्होंने स्नेह सें मेरेसिर कों चूमा, उनकेनरम होंठ मेरे माथे सें टकराये। ये एक् मातृभाव थां, जिसे मैंने कई वर्षों मे महसूस नहि किया थां, औऱ ये अचानक आराम औऱ गर्मजोशी लेकरआया।
"सोनिया कों अपनी किसी फ्रेंड कि विवाह मे कल नॉएडा जानां हैं, मुझे उसकी पैकिंग मे हेल्प करनी हैं, मुझे जानां होगा" उन्होंने मुझसे अलग होतेहुए कहा, उनकीबात सुनकर मेरे चेहरे पऱ एक् मायूसी उभरआयी औऱ मे बस हामी मे अपनी गर्दन हिला केँ रह गय़ा।
"चिंता मतकरो, जैसे हि टाइम मिलेगा मे आँ जाउंगी औऱ फिन हम् मिलकर पुलिस स्टेशन चलेंगे" फूफी नें मुझे सांत्वना देतेहुए कहा, मैंने उनकी आँखों मे देखा औऱ बुदबुदाया "ठीक हैं फूफी"। फूफी एक् मुस्कान केँ संगउठी औऱ कमरे सें बहार जानेलगी "मैंने ब्रेकफास्ट बना केँ रख दिया हैं, जबभूख लगेखा लेना" उन्होंने दरवाज़े पर्र पहुँच कर मेरीतरफ पलटकर कहा। मैंने सहमति मे अपनी गर्दन हिलायी, औऱ फूफी कमरे सें बहारचली गई,।
फूफी औऱ सोनिया केँ जाने केँ बाद मैंने नीचे जाकरघऱ केँ दरवाज़े कों लॉक किया औऱ वापस अपनेरूम मे आकरबेड पऱ लेट गय़ा।
मैंने अपनी आँखें बंद कि औऱ पिछले दो दिनों मे घटी घटनाएं मेरेमन मे किसी फिल्म कि तरह चलनेलगी।
THE FLASHBACK:
विवाह सें दोरात पहलेजब मे खानां खाकर अपने कमरे मे लेटा थां रोमा केँ ख्यालों मे खोयेहुए मेरी न् जानेकब आँखलग गयीँ,। मुझे सोयेहुए कोई घंटाभर हि हुआ थां कि "तड़ाक" कि एक् ज़ोरदार आवाज़ सें मेरी नींद टूटी औऱ मैंने उस आवाज़ कि दिशा मे देखा तौ मेरे सामने कि एक् खिड़की तेज़हवा केँ झोके सें डोलरही थि। बड़ेबे मन केँ संग मे उठा औऱ खिड़की केँ पास जाकरउसे बंद करनेलगा, बहारतेज़ हवा केँ संग बारिश भि होँ रही थि जिससे मेरे कमरे केँ अंदर भि कुछ पानी कि फुहारे आँ रही थि। पानी कि उन फुहारों नें मेरे चेहरे सें नींद कों उड़ा दिया, फरवरी केँ उस मौसम मे बारिश नें यूँ तोँ मौसम मे ठंडकबड़ा दि थि पऱ मेरे अंदर धधकती हुईँ ज्वाला कों शांत करने मे वोँ असमर्थ हि रही।
नं जाने क्यूं मेरामन बारिश मे भीगने कां करनेलगा। मेरेकदम अपने आप् ऊपर कि तरफबढ़ चले, मे ऊपरलगे लोहे केँ गेट कों खोलने लगा, मेरीनज़र बराबर मे लगे स्टोर रूम केँ गेट पऱ पड़ी तोँ रोमा केँ संग बिताये वोँ कुछ अतरंग लम्हा मेरेज़हन मे ताज़ा होँ गए, वोँ स्टोर रूमआज भि अपने भीतर हमारे उसराज़ कों छुपाये हुए थां जिसे दुनिया पाप समझती हैं।
मैंने गेट खोला औऱ खुली छत्त पऱ उसतेज़ बारिश मे समां गय़ा। कुछ हि समय मे मे सर सें पॉव तक भीग चूका थां, बारिश कि उन बूंदें मे यूँ तौ ठंडक थि पर्र मेरेबदन पर्र गिरती हुई वोँ शोले कि तरह प्रतीत हौ रही थि।
मैंने दोनों हाथहवा मे उठाकर बारिश कों महसूस किया औऱ फिन अगले हि समय अपनी गीली होँ चुकीउस सफेट टीशर्ट कों उतारकर एक् तरफ फेंक दिया, अब मे बस एक् शार्ट मे थां औऱ आसमान कि तरफ मुंहउठा केँ बारिश कि बूंदों कों अपने चेहरे पर्र महसूस कररहा थां। आसमान मे बिजली चमकती औऱ तेज़ गड़गड़ाहट केँ संग एक् लम्हा केँ लिए दुनिया रोशन हौ जाती औऱ फिन अँधेरे मे डूब जाती। ऐसा लगरहा थां जैसे मे औऱ आसमान स्वयं कि एक् मूक लड़ाईलड़ रहे हें। बारिश कि मोटी बूंदें मेरे शरीर पऱ सुईओं कि तरह चुभती प्रतीत हौ रही थि।
अचानक, मेरेमन कि उथल पुथल एक् परछाई कों गेट पऱ खड़े देखकर सिहर गयीँ,। एक् लम्हा कों मेरेदिल कि धड़कने ठहर गयीँ,, उसकी आँखें बड़े असमंजस औऱ अचम्भे सें मुझेदेख रही थि, "रोमी" मे बुदबुदाया, उसका पर्पल कलर कां नाईट गाउन जोकि उसने विवाह केँ बाकी कपड़ों केँ संग खरीदा थां उसकेबदन पर्र तेज़हवा केँ संग लहरारहा थां।
"रोमी?" मैंने धीरे-धीरे सें पुकारा, उसने एक् कदमआगे बढ़कर मेरीतरफ देखा।
तेज़ चमकती बिजली कि रौशनी केँ बीच हमारी नज़रें मिली, बस एक् समय केँ लिए। फिन उसने बारिश मे कदमरखा, हवा सें लहराता हुआ उसका नाईट गाउन उसके पैरों मे नाचरहा थां।
"यंहा, क्याँ कररहे हौ?" उसने पूछा, उसकी आवाज़ धीमी औऱ काँपरही थि जोँ तूफान केँ कोलाहल मे करीब-करीब खो गई थि।
मैंने उसकीओर एक् कदम बढ़ाया, बारिश मेरे बालों कों माथे पऱ लेँ आई। "बस, नींद नहि आँ रही थि, " मैंने कबूल किया। "औऱ ऐसी बारिश भि पहलेकभी नहि देखी"
रोमा कि आँखों नें मेरी आँखों मे झाँका, उसने उनमें उथल -पुथल देखी। उसने एक् गहरी साँसली, उसकी चूचियां नाईट गाउन केँ कपडे सें भीगकर चिपक गई, थि औऱ उसकी साँसों केँ संगऊपर नीचे हौ रही थि। "हम्म, बहोत तेज़ बारिश हैं, अच्छी लगरही हैं" वो बड़बड़ायी, उसकी आवाज़ बारिश केँ हंगामा मे मुश्किल सें सुनाई देरही थि। "पऱ मुझेइस तूफान सें डरलगरहा हैं। "
उसकेकहे शब्दहवा मे तैरगए, हमारी परिस्थितियां भि किसी तूफ़ान सें कम नहि थि। हम् अपनीदबी हुइ इच्छाओं केँ तूफान मे खड़े थें, बारिश हमारी उमड़ती हुईँ भावनाओ सें खेलरही थि।
"मुझेपता हैं, " मैंने उसकीतरफ कदम बढ़ाते हुएकहा। "मगरकभी -कभी, हमें अपना मार्ग खोजने केँ लिए तूफान कां सामना करना पड़ता हैं। "
उसकेपास शायद मेरीबात कां जवाब नहि थां वोँ इधरउधर देखने लगी।
"तुम्हें केसेपता चला कि मे यहा हूं?" मैंने उससे पूछा, मे बस स्थिति कों नार्मल रखने कि कोशिश कररहा थां।
रोमा नें एक् कदम लगभग लेँ लिया, बारिश नें उसके बालों कों उसके चेहरे पऱ चढ़ा दिया। "मैंने ऊपर केँ इसगेट केँ खुलने कि आवाज़ सुनी, " उसनेकहा, "मुझे भि नींद नहि आँ रही थि। "
उसकी आँखों नें मेरी तलाशी ली, बारिश नें उसके बालों कों उसके उसके चेहरे पऱ बिखेर दिया, जिससे वो बेहद सेक्सी औऱ मनमोहक दिखरही थि। उसने एक् कदम लगभग लेँ लिया, हमारे बीच कां अंतरअब इतना छोटा थां कि मे उसके जिस्म कि गर्मी कों महसूस कर सकता थां।
"तुम कोसो जानां चाहिए थां रोमी, कल बहोत सें रीती रिवाज होंगे" मैंने अपनी चिंताओं कों उठाया।
"मुझे। तुमसे बात करनी थि। " वोँ फुसफुसाई
उसके शब्द मेरी आत्मा केँ लिए एक् बाम थें, उसके जिस्म कि गर्मी उस बारिश कि ठंडक मे एक् राहत थि। "बोलो, क्याँ बात हैं?, " मैंने फुसफुसा कर पूछा।
"भैया, सचसच बताओ तुम् मुझसे कुछ छुपारहे होँ, हैं न्?" उसने मेरीतरफ देखते हुए पूछा
"नहि तौ, ऐसी तौ कोईबात नहि हैं" मैंने घबराकर जवाब दिया
"खाओ मेरीशपथ?" उसने मेराहाथ पकड़कर अपनेसर पर्र रखतेहुए पूछा।
"वोँ वोँ, रहनेदे क्याँ करेगी जानकार?" मैंने अपनाहाथ वापस खींचते हुएकहा
"जौ भि हैं तुम् बससचसच बताओ" उसने ज़िद्द करतेहुए पूछा
मैंने एक् कदम पीछे लिया औऱ एक् लम्बी सांस लेकर कहना शुरुआत किया "तुम्हे याद हैं हम् एक् बार रेखा आंटी केँ यंहा उनकी बेटी कि विवाह मे गए थें" रोमा मेरे एक् एक् शब्द कों ध्यान सें सुनरही थि "औऱ वंहाकुछ लड़के तेरेऊपर उलटे सीधे कमेंट कररहे थें" मैंने कहकर उसके जवाब कि इंतजार कि "हाँ, अच्छे सें याद हैं भैया, तुमने हि तोँ बीच मे आकर उन्हें घुरा थां औऱ वोँ चुपचाप वंहा सें निकललिए थें" रोमा नें उन यादों कों दोहराते हुए जवाब दिया।
"बिलकुल सही, क्याँ तुम्हे पता हैं उनमे सें एक् आकश थां?" मैंने उस रहस्य कों उजागर कर दिया जोँ न् जानेकब सें मुझे अंदर हि अंदर खायेजा रहा थां।
"क्याँ? सच मे, हे ईश्वर!" रोमा केँ चेहरे केँ भावबदल गए उसकी आँखें आश्चर्य सें चौड़ी हौ गयीँ,।
"हम्म, यह सच हैं रोमी" मैंने उसके कंधे पऱ हाथ रखतेहुए कहा।
"ओह! पर्र….पर्र मैंने उसे पहचाना क्यूं नहि ?" रोमा केँ सवालों नें मुझे भि असमंजस मे डाल दिया। "शायद तूनेउसे ध्यान सें न् देखा होँ" मैंने उसकी चिंता दूर करने कि कोशिश कि, "काश केँ मे उस हरामी कों ठीक सें देख लेती तौ यह नौबत हि नं आती" उसने गुस्से मे अपने दांत भींचते हुएकहा।
"पर्र…पऱ तुमने मुझसे इतनीबड़ी बातकब सें छुपा केँ रखी?" उसने मुझसे सीधा सवाल किया
"मे भि नहि जानता थां रोमी, मे भूल गय़ा थां पर्र कल मैंने आकाश कों उस दूसरे लड़के केँ संगजब मार्किट मे देखातब सभीसमझ आया" मैंने सफाई दि। “इतनी हि बात होती तोँ भि ठीक थां पर्र मैंने जब आकाश कि छानबीन कि तबपता चला केँ यह अव्वल दर्जे कां नशेड़ी औऱ जुआरी हैं” थोड़ीदेर केँ लिए हमारे बीच ख़ामोशी पसर गयीँ,, बस बारिश कि बूंदों कां हि हंगामा सुनाई देरहा थां।
"मुझेयह विवाह नहि करनी, मुझे आपसेअलग नहि होना" कहकर रोमा अगले हि समय मेरे नज़दीक आँ गई, हमारी सांसें एक् दूसरे सें टकरारही थि।
"ओह, रोमी, " मे फुसफुसाया, मेराहाथ उसकेगाल कों सहलाने केँ लिएउठ गय़ा। "मे भि इस दर्द कों सहन नहि कर सकता। "
रोमा कि आँखों नें मेरीखोज कि, उसके आंसू बारिश केँ पानी केँ संग मिश्रित होँ गए। "मे भि नहि, भैया, " उसनेकहा, उसकी आवाज़ भावना केँ संग मोटी हैं। "मे आपको अकेला छोड़कर कंही नहि जाउंगी। " उसने अपनेगाल पर्र मेरेहाथ कों पकड़कर कहा।
"फिन तूने आकाश केँ लिएहाँ क्यूं कहा?" मैंने नाराज़ होतेहुए पूछा।
उसने बांयी तरफ अपना चेहरा घुमा लिया, उसकी आँखें नम थि। "मुझे नहि पता, " उसने जवाब दिया, उसकी आवाज़ बारिश केँ हंगामा मे मुश्किल सें सुनाई देरही थि। "शायद मां कि वजह सें। वो बहोत खुश औऱ चिंता सें मुक्त थि, मेरेपास उन्हें न् कहने कि हिम्मत नहि थि। "
बारिश नें हम् दोनों कों तरकर दिया, पानी कि तेज़ ठंडी फुहारों नें हमारे बीच कि आग कों भड़का दिया, रोमा कां गाउन उसके जिस्म सें दूसरी त्वचा कि तरह चिपका हुआ थां।
"I?" मे फिन सें फुसफुसाया, शब्द मेरेगले मे अटकते हुए महसूस हुए "I " मैंने पूरी ताकत लगाई"आई लवयू, रोमी" कहकर मैंने उसकाहाथ थाम लिया।
"मे भि, " वो बड़बड़ायी, उसकी आवाज़ एक् गुहार थि।
मे उसके चेहरे पऱ झुक गय़ा, हमारी गरम सांस एक् दूसरे केँ चेहरे सें टकरारही थि, औऱ इतने लंबे वक्त सें मेरेमन केँ अंदरचल रहेउस द्वन्द पर्र निर्णायक विजय हासिल करतेहुए मैंने उसके खूबसूरत चेहरे कों अपने दोनों हाथों मे थाम लिया। "मे तुम को अपना बनाने केँ लिएमर रहा हूं, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ एक् कर्कश कानाफूसी थि जिसमे प्यार औऱ वासना कां मिश्रण थां।
उसकी आँखों नें मेरी आँखों मे देखा, फिन एक् हलकी सि मुस्कान केँ संग उसने अपनी पलके झुकाली।
"ओह! भईया" वोँ फुसफुसाई, उसने अपनी बाँहें मेरीकमर पर्र लपेट दि, उसकाबदन मेरे जिस्म सें लिपटकर पिघल गय़ा।
मैंने अपने होंठ उसके होंठों पऱ रखदिए, बारिश केँ पानी कां स्वाद उसके मुँह कि मिठास मे घुल गय़ा। उसने अपने होंठ खोलकर मेरे होंठो कां स्वागत किया, वो चुंबन दुनिया केँ खिलाफ युद्ध कि घोषणा थि, जोँ हमेंअलग रखना चाहती थि, एक् वादा कि हम् एक्-दूसरे केँ लिए लड़ेंगे। उसकेहाथ मेरी गर्दन केँ चारों ओर लिपटगए, मुझेपास खींचते हुए, जैसे वो मुझे अपनी आत्मा मे समा लेना चाहती हौ। बाहर् कां तूफान हमारे भीतर कि हलचल कि तरह थां, हमारे दिल जुगलबंदी मे धड़करहे थें जौ बादलों कि गड़गड़ाहट सें मेलखा रहे थें।
मेरेहाथ उसकी सुडोल गांड पऱ फिसलगए औऱ मैंने उसकी मज़बूत मांसपेशियों कों अपने हाथों मे भर लिया, उसका शरीर कंपकंपा गय़ा। उसकीपीठ कमान कि तरहतन गई, औऱ उसका शरीर मेरे शरीर मे सिमट गय़ा। हमारा चुम्बन औऱ भि तीव्र हौ उठा, हम् एक् दूसरे केँ होठों कों किसीआइस क्रीम कि तरह चूसने लगे। रह रहकर आसमान मे चमकती बिजली औऱ बादलों कि गड़गड़ाहट सें अब हम् दोनों बेखबर सें एक् दूसरे मे लीन हौ चुके थें।
उसनेकुछ संकोच केँ संग अपनीजीभ बहार निकाली औऱ मैंने बिना देरी किये उसकीजीभ कों अपने होठों मे कैदकर लिया औऱ किसी मधुरधुन मे खोयेहुए उसकीजीभ कों चूसने लगा। मैंने उसकी चाहत कि गर्मी महसूस कि, उसके अंदर भि वही बेचैनी थि जौ मुझे महीनों सें परेशान कररही थि। हम् अब मात्र भइया औऱ बेहन नहि रहे; हम् दो प्रेमी थें, जौ एक्-दूसरे केँ स्पर्श केँ लिए बेताब थें।
हमारा चुंबन औऱ ज्यादा तीव्र, ज्यादा गहन होँ गय़ा, जैसे हम् उस तूफानी रात कि हलचल मे सांत्वना खोजरहे हों। उसकेहाथ मेरी नंगीपीठ पऱ घूमरहे थें, उसके नाखून मेरी त्वचा मे गहरे निशान छोड़रहे थें। मेरे अपनेहाथ आपे सें बहार थें, उसकीभरी भरकम सुडोल गांड कों भींचते हुएउसे स्वयं मे समेट लेना चाहते थें। उसके शरीर कि गर्माहट मेरे लोहे कि तरह सख्त होँ चुके लन्ड पर्र महसूस होँ रही थि जोकि पूरीतरह सें मेरी शार्ट मे तनकर उसकी नाभि केँ पासगढ़ रहा थां।
मे उसके जूसी होंठों कों इसतरह सें चुमरहा थां जैसे उनके अंदरभरे रस कि एक्-एक् बूँद, जूनून औऱ चाहत कों निचोड़ लूँ जिसे वो न् जाने मुझसे कब सें छुपारही थि। उसके होंठ एक् वर्जित फल थें, पकेहुए, रस सें भरे, तोड़े जाने केँ लिए सजधजकर, औऱ मे किसी सदियों सें भूखे व्यक्ति कि तरहउन पर्र टूटपड़ा थां। बारिश लगातार हम् पर्र बरसरही थि, मगर हम् एक्-दूसरे मे खोएहुए थें, अपने आस-पास कि दुनिया सें बेख़बर
"भईया, मुझे ठण्डलग रही हैं " उसने मुझसे अलग होतेहुए कहा"चलो नीचे चलते हें" औऱ मेराहाथ पकड़ केँ मुझे लेँ जानेलगी। हम् खुलीछत सें ममटी केँ अंदर आँ गए, मैंने पलटकर छत्त वाला दरवाज़ा बंद किया। मेरीनज़र सीधेहाथ पर्र स्टोर रूम केँ दूसरे दरवाज़े पऱ पड़ी औऱ मैंने उसका डंडीला सरका केँ दरवाज़ा खोल दिया। रोमा नें हैरत सें मेरीतरफ देखा, मैंने उसकाहाथ पकड़ा औऱ स्टोर रूम केँ अंदरउसे खींच लिया।
"यह रूमयाद हैं तुम्हारी तरफ " मैंने दीवार पऱ अँधेरे मे स्विच टटोलते हुए पूछा। "हम्म, याद हैं भईया" उसने अपनी नज़रें झुकाकर कहा। तभी स्विच on होते हि कमरे मे हल्का उजाला पसर गय़ा।
मैंने उसे खींचकर अपने सीने सें लगा लिया औऱ उसकी गर्दन पऱ चूमते हुए उसकेकान मे फुसफुसाया "यंही पऱ हमारे प्रेम कि शुरुआत हुईँ थि, हैं न्!", रोमा नें सहमति मे अपनी गर्दन हिलायी।
मैंने अपने होंठ उसके होंठों पर्र रखदिए, उसके गीले बालों सें झड़रहे बारिश केँ पानी कां स्वाद उसके मुँह कि मिठास केँ संगमिल गय़ा। हमारा यह चुंबन दुनिया केँ ख़िलाफ़ युद्ध कि एक् घोषणा थि जौ हमेंअलग रखना चाहती थि, एक् वादा थां कि हम् एक्-दूसरे केँ होक रहेंगे। उसकी बाहें मेरी गर्दन केँ चारों ओर लिपट गयीँ,, मुझे अपने लगभग खींचरही थीं। बाहर् कां तूफ़ान हमारे भीतर केँ तूफ़ान सें मेलखा रहा थां, हमारे दिल एक् तेज़लय मे धड़करहे थें।
मेरेहाथ उसकी गांड पऱ फिसलगए, गीले कपड़े केँ नीचे मजबूत उभारों कों अपनी मुट्ठी मे भरकर भींच दिया, मुझे उसकेबदन मे कंपकंपी महसूस हुइ। उसका आलिंगन मेरेबदन पर्र औऱ भि मज़बूत हौ गय़ा। पुराने अनुपयोगी सामान सें भरेउस कमरे मे हमारी परछाई दीवार पर्र इसतरह सें पड़रही थि जैसे हमारी आत्माएं भि आपस मे मिलरही हों।
उसने अपनीजीभ बहार निकली औऱ मेरे मुंह मे दे दि जिसे मे अपने होठों सें चूसने लगा। हमारे जिस्मो कां तापमान बढ़नेलगा थां, मेरा एक् हाथ उसके भारी सीने कि मांसलता कां जायज़ा लेने केँ उसकी एक् मम्मों कों धीरे-धीरे धीरे-धीरे दबाने लगा, उसकाबदन सिहर गय़ा। अब हम् मात्र भइया-बेहन नहि थें; हम् दो प्रेमी थें, एक् दूसरे मे समां जाने केँ लिए उत्सुक।
मे उसके जूसी होंठों कों चूसकर रस कि एक् एक् बूंद निचोड़ लेनाचाह रहा थां। उसका मुँह एक् वर्जित फल थां, जोँ पूरीतरह पक चूका थां औऱ तोड़ने केँ लिए रेडी थां, औऱ मे किसी बरसों सें भूखे व्यक्ति कि तरहउस पऱ टूटपड़ा। बाहर् बारिश औऱ तेज़ होँ चुकी थि, मगर हम् अपने आस-पास कि दुनिया सें बेखबर एक्-दूसरे मे खोएहुए थें।
मैंने उसकीकमर कों पकड़ केँ उसे पीछे कों झुकाया, उसने हैरानी सें एक् समय केँ लिए मुझे देखा औऱ फिन नीचे फर्श पऱ लेट गयीँ,। मे भि बिना किसी देरी केँ उसकेऊपर आकरलेट गय़ा, उसने मुझे कसकर पकड़ लिया, उसकी भारी चूचियां मेरे सीने पऱ इसतरह दबरही थीं जैसे वो मेरी हि शरीर कां हिस्सा हौ।
उसके गीलेबाल उसके चेहरे केँ चारों ओर फैलेहुए थें, जौ उसके सुन्दर चेहरे कों छुपारहे थें। उससमय मे बस हम् दोनों थें, हमारा प्रेम थां औऱ सामाजिक बंधनो कों तोड़ता हुआ हमारा गुस्स थां।
मेरी आँखें नें उसकी आँखों मे देखा, मेरादिल मेरे सीने मे एक् जंगली जानवर कि तरह धड़करहा थां जौ आज़ाद होने केँ लिए बेताब हौ। हमारे कपड़े हि हमारे बीच एकमात्र बाधा थें, जौ हमारे पारिवारिक बंधन कों बचाये रखने कां एक् कमजोर प्रयास करते प्रतीत होँ रहे थें। मे उसकी बुर कि गर्मी, उसके गीलेपन कों अपनेखड़े लन्ड पर्र महसूस कररहा थां। बाहर् बादलों कि गड़गड़ाहट हुइ, जौ हमारी उखड़ी साँसों कां प्रतिबिम्ब थि।
मैंने कांपते हाथों सें उसके नाइटगाउन कां किनारा पकड़ा औऱ उसेऊपर उसकेपेट तक सरका दिया। उसकी मांसल जाँघों कि चिकनी, सुनहरी त्वचा दिखने लगी। उसकी साँसें फंसगईं, औऱ जब मैंने कपड़े कों उसके कूल्हों पऱ सें सरकाया, तौ उसने थोड़ा सां स्वयं कों ऊपरउठा कर मेरा सहयोग किया।
जैसे हि मे उसकी पैंटी नीचे करने वाला थां, उसने मेराहाथ थपथपाया औऱ मुझेरोक दिया। मैंने उसकी आँखों मे देखा, उसने गालों पऱ लाली लातेहुए अपनी आँखें चौड़ीकर केँ इशारे मे अपनी ठोड़ीउठा केँ पूछा। मैंने सहमति मे अपनी गर्दन हिलायी औऱ फिन उसने अपनी नज़रें झुकालीं, एक् हि झटके मे मैंने उसकी कालेरंग कि पैंटी उसकेबदन सें अलगकर केँ फर्श पर्र फेंक दि।.
औऱ कुछ वक़्त केँ लिए मे एक् टक मंत्रमुग्ध सां उसकी जांघो केँ बीच केँ त्रिकोण कों देखता रहा जिसे हम् आम बोलचाल मे बुर भि कहते हें। उसकी बुर एक् उत्कृष्ट कृति थि, जोँ दुनिया कि कठोरता सें अछूती थि, बारिश केँ पानी सें भीगकर चमकरही थि। एकदम चिकनी, बालों कां नमो निशान भि नहि, ऊपरी हिस्सा उभराहुआ जैसेसूज गय़ा हौ, बीच मे एक् छोटी सें लकीर जौ नीचे उसकी गांड कि तरफ जाकर अँधेरे मे खोरही थि।
मैंने उसकी बुर कों देखते हुए अपना शार्ट अंडरवियर सहित उतार केँ एक् तरफ फेंक दिया। मेरा फनफनाता हुआ लन्ड स्प्रिंग कि तरहझूल गय़ा। जब मे उसके सामने घुटनों केँ बल बैठा, तोँ उसकी आँखें कभी मेरी नज़रों सें नहि हटीं। बाहर् बादलों कि गड़गड़ाहट हुइ, मगर एकमात्र चीज जोँ मैंने सुनी वो मेरे अपनेदिल कि धड़कन थि, जौ गरजती रात मे गूँजरही थि।
रोमा कि नज़रों मे असमंजस औऱ लालसा कां मिश्रण थां, उसकी पुतलियाँ अगले लम्हा कां सोचकर चौड़ी थीं। उसने मेरे फनफनाते लन्ड कों गौर सें देखा, मेरी मांसपेशियों कि हर हलचल, मेरी सांसों कि हर कंपन कों नोटिस किया। एक् कोमल स्पर्श केँ संग, मैंने उसकी गीली बुर कों अपनी मुट्ठी मे भींच लिया, उसकी बुर कि गर्मी कों अपनी हथेली पर्र महसूस किया। मे उसकी बुर केँ ऊपरी हिस्से पर्र अपने होंठ सटाते हुए झुका, औऱ उसे प्रेम सें चूमा। उसने अपनाहाथ बुर पऱ रखकरउसे छुपाने कि असफल कोशिश कि पऱ मैंने अगले हि समय उसकाहाथ हटाकर उसकी बुर कों अपने मुंह मे भर लिया। एक् तेज़आह रोमा केँ होंठो सें निकलकर कमरे मे गूंज गयीँ, "अहह ! हम्म " उसका स्वाद ऐसा थां जैसा मैंने पहलेकभी महसूस नहि किया थां, थोड़ा कसेला, नमकीन औऱ बहोत हि मादक सुगंध सें भराहुआ।
रोमा कां हांफना दुनिया कि सबसे मधुर आवाज़ सां प्रतीत होँ रहा थां, ख़ुशी औऱ पूर्ण समर्पण कां समावेश लिए उसकी सांसें मेरे जिस्म मे करंट प्रवाहित कररही थि। मैंने अपनीजीभ सें उसकी बुर कि परतों कों अलग किया, उसके गीलेपन कां स्वाद चखा। जैसे हि मैंने उसकी बुर कि पंखुड़ियों केँ बीच अपनीजीभ घुमाई उसकेपेर कांपने लगे औऱ एक् तेज़ सिसकी केँ संग उसने मेरेसर केँ बाल अपनी मुट्ठी मे भींचलिए "ओह! भ…भईया"।
रोमा कि बुर कां स्वाद नशीला थां, किसी महंगी व्हिस्की कि तरह, जोँ वाणी केँ संग मेरे अनुभव सें कहीं बेहतर थां। रोमा कां शरीर एक् सुगन्धित बगीचा थां, जौ दुनिया कि नज़रों सें छिपाहुआ थां, औऱ मे उसकेबदन कां पहला माली औऱ मालिक बननेवाला थां। जैसे जैसे मेरीजीभ कां घर्षण उसकी बुर कि फांको पेरतेज़ हुआ उसकी सिसकारियां कराहों मे तब्दील होँ गई, "अहह!अहह! ओह!"।
जैसे-जैसे मैंने उसकी बुर कों चूसकर उसे आनंदित किया, मेरी वासना अपनेचरम पर्र पहुँच गयीँ,, मेरा लोहे सां सख्त लण्ड झटके मारते हुए तृप्ति कि मांग करनेलगा। मैंने अपना मुंह उसकी बुर सें हटाया औऱ ऊपर कि तरफबड़ा। अगले हि समय रोमा कां गाउन मैंने उसके सीने पऱ सें चीर दिया, उसने नीचे ब्रा नहि पहनी थि, उसकी भारी चूचियां गाउन केँ चीरते हि थिरकते हुए मेरी आँखों केँ सामने आँ गयीँ,, मैंने उसकी चूचियों कों देखा, जौ भरी हुईँ औऱ सख्त थि, उसके ब्राउन निप्पल्स मटर केँ दाने जितने थें जोँ तनेहुए थें। रोमा कि तेज़ साँसों केँ संग उसकी चूचियां भि उसके सीने पऱ ऊपर नीचे होँ रही थि, रोमा कि नज़रें मेरी नज़रों कों टटोलरही थि, उसके होठों पऱ एक् धीमी मुस्कान थि।
कांपते हाथों सें, मैंने उसकी दोनों चूचियों कों पकड़ लिया, अपनी हथेलियों मे उनकावजन महसूस करतेहुए उन्हें ज़ोर सें भींचा, रोमा केँ मुंह सें एक् गहरी सांस छूटी"अहह!"। अपने अंगूंठों सें उसकेतने हुए निप्पल्स कों धीमे सें सहलाया, रोमा केँ शरीर मे ऐंठन हुइ, उस हलके ब्राउन रंग घेरे पऱ अपनी उँगलियाँ घुमाई जोँ उसके निप्पल्स केँ चरोंतरफ थां, औऱ उसकी चूचियों कों धीरे-धीरे धीरे-धीरे दबाने लगा। मे अपनी दोनों टाँगे खोलकर उसकेपेट पर्र बैठेहुए उसकी चूचियों कां मर्दन कररहा थां, रोमा आँखें बंद किये सिसकारियां मारती हुइ मजा मे खोयी थि।
मे झुका औऱ उसकी टांगों केँ बीच अपनी टांगो केँ लिए स्थान बनाते हुए, उसके एक् निप्पल कों चुकी सहित मुंह मे भर लिया औऱ उसेज़ोर सें चूसा। रोमा नें अपनी बाँहें मेरेसर पर्र लपेट दि, मे उसकेऊपर पूरीतरह सें नंगा लेटाहुआ थां, मेरे लन्ड कां सुपाड़ा उसकी चिकनी बुर पर्र टकरा केँ ऊपर कि तरफ फिसलरहा थां। मैंने बारी बारी सें उसकी चूचियों कों ऐसे चूसा जैसेकोई नन्हा बालक अपनी मम्मी कां स्तनपान करता हैं। अपनी बुर पर्र मेरे लण्ड कि ठोकरों औऱ अपनी चूचियों केँ चूसे जाने सें रोमा आँखें बंद कियेबस ज़ोर सें हांफरही थि।
वासना जबहद पर्र करनेलगी मैंने अपनाहाथ नीचे सरकाया औऱ उसकी बुर केँ दरवाज़ा पऱ अपना लण्डसेट करने कों थां कि उसने अपनी जांघें बंदकर लीं, उसने अपनाहाथ बड़ाकर मेरे लन्ड कों कसकर पकड़ लिया,
"यही पे करोगे?" उसने कांपती हुईँ आवाज़ मे पूछा। उसकी आँखें मेरी आँखों कों खोजरही थीं, एक् ऐसे उत्तर कि तलाश मे जिससे उसकामन शांत होँ जाए।
"हाँ, रोमी, यहीं पऱ" मैंने जवाब दिया, यह शब्द मेरे अंदर सें पिघले हुए लावा कि तरहबह रहे थें, "मे तेरीउस दिन सें चोदना चाहता हूं जब सें मुझे एहसास हुआ कि तूँ मात्र मेरी बेहन नहि हैं, बल्कि दुनिया कि वोँ सबसे सुन्दर स्त्री हैं जिससे मे बचपन सें प्यार करताआया हूं। "
एक् धीमी मुस्कान केँ संग उसने मेरे कंधे पर्र थपकी मारी"ओह भईया, ऐसा केहना कँहा सें सीखा तुमने, " वो फुसफुसाई, उसकी आवाज़ चाहत सें भरी थि।
"तुम्हारी तरफ भि सीखा दूंगा, जानेमन" मे बुदबुदाया, औऱ उसके होठों कों अपने होठों मे भर लिया। हमारा यह चुंबन पहले सें ज़ादा तीव्र औऱ अंतरंग थां, इसमें एक् स्वीकृति थि केँ अब जोँ चाहे हौ हम् एक् दूसरे केँ होके रहेंगे। उसकीजीभ मेरीजीभ केँ संगनाच रही थि, उसके दाँत मेरे निचले होंठ कों छूरहे थें औऱ वो मेरे मुँह मे कराहरही थि।
उसकेगाल पर्र हल्के सें काटकर मे फुसफुसाया, "अब सें तुँ मेरी औऱ केवल मेरी, रोमी। " मेरे शब्द स्वामित्व कि घोषणा थें, एक् वादा थां कि अबसे वोँ केवल मेरी बनके रहेगी।
उसकाबदन तनाहुआ थां, उसकी साँसें हल्की-हल्की आँ रहीथीं, जैसे हि मैंने उसके निपल्स कों छेड़ा। उसकी आँखें बंद हौ गईं औऱ उसने अपनी बाँहें मेरीकमर पर्र लपेट दि "हाँ, भईया, " उसने बड़बड़ाते हुएकहा, यह शब्द चिलचिल्लाती गर्मी मे ठंडी फुहार कि तरहलगे। "मे हमेशा आपकीबात मानूंगी, मुझेकभी स्वयं सें दूरमत करना। "
“तौ फिन अपनी टाँगें खोल, बेहन?” मैंने उसे आदेश दिया औऱ उसके एक् निप्पल कों मुंह मे भरकर चूसने लगा।
उसका जिस्म पूर्वाभास सें कांपरहा थां, औऱ मे अपने लन्ड केँ सिरे पऱ उसकी बुर कि गर्मी महसूस कर सकता थां। उसने अपनी टाँगें खोलदीं, जिससे मेरा निचला हिस्सा उसकी टांगो केँ बीच आँ गय़ा। मैंने अपने अंदर केँ तूफ़ान कों शांत करने कि कोशिश करतेहुए एक् गहरी साँसली।
"अब मेरा लन्ड पकड़ औऱ उसे अपनी बुर केँ छेद पर्र लगा, " मैंने उसकेकान मे बुदबुदा कर आदेश दिया, मेरी आवाज़ वासना सें भरी हुइ थि। उसने कांपते हाथों सें मेरे लण्ड कों पकड़ा, उसकी उंगलियाँ मेरे लण्ड केँ चारों ओर लिपटी हुईँ थीं। मैंने अपनापेट उठाकर उसे स्थान दि।
उसने मेरी आँखों मे देखते हुए, मेरे लण्ड कि चमड़ी कों थोड़ा पीछे धकेला औऱ फिन लण्ड केँ टोपे पऱ अपना अंगूठा घुमाया, एक् असीम खुशी सें मेरे होंठखुल गए औऱ आँखें बंद हौ गई,। उसके होंठों पर्र एक् धीमी मुस्कान उभरी औऱ उसने लण्ड केँ टोपे कों अपनी बुर केँ छेद पऱ सेटकर दिया। उसकी बुर इतनी गीली औऱ सजधजकर थि, केँ मेरे लण्ड कां टोपा भि उसकेरस सें सन गय़ा। मैंने उसकी आँखों मे देखा औऱ उसने गर्दन धीरे-धीरे सें हिलाकर सहमति दि, मैंने अपने कूल्हों कां दबाब बनाया औऱ लण्ड कां टोपा उसकी गीली बुर केँ अंदर समां गय़ा। वो हांफने लगी, खुशी औऱ खुशी केँ मिश्रण सें उसकी आंखें चौड़ी हौ गईं। "ओह!, रोमी, तेरी बुर बहोत टाइट औऱ गर्म हैं" मे फुसफुसाया।
"अहह! धीरे-धीरे भइया, मेरा फर्स्ट समय हैं" उसने फुसफुसाते हुए मेरेकान मे कहा।
अपने कूल्हों कों हल्के सें हिलाते हुए, मैंने लण्ड कों औऱ अंदर धकेला, औऱ महसूस किया कि उसकी दहकती हुई भट्टी कि तरहगरम बुर कि दीवारों नें मेरे लण्ड कों कस लिया हैं। उसके नाखून मेरीपीठ मे गड़गए औऱ अपने निशान छोड़गए, मगर मे नहि रुका। उसकीगरम, गीली बुर कि गहराइयों मे गायब होने वाले अपने लण्ड कि हरइंच केँ संग, मे उसके शरीर पर्र अपनादवा ठोकरहा थां।
"धीरे-धीरे, भैया, " वो चिल्लाई, उसकी आवाज़ मे दर्द औऱ खुशी कां मिश्रण थां। उसकी आँखें कसकरबंद होँ गईं। उसके शब्दों नें मुझमें तीव्र उत्तेजना पैदाकर दि औऱ मे रुक गय़ा, मेराआधा लन्ड उसकी बुर मे समाया हुआ थां। उसके कुंवारी होने कां एहसास औऱ अपनेसगे भइया सें अपनी कुंवारी बुर कि सील खुलवाना, भयानक औऱ उत्साहजनक दोनों थां।
सिर हिलाते हुए, मैंने एक् गहरी साँसली औऱ अपने कूल्हे हिलाने शुरुआत करदिए, लण्ड कों वापस अंदर धकेलने सें पहले थोडा बाहर् खींच लिया, जिससे उसकी बुर कों मेरे लण्ड केँ आकार केँ अनुसार ढलने कां वक्तमिल गय़ा। उसकेपेर मेरीकमर केँ चारों ओर लिपटे हुए थें, उसकी एड़ियाँ मेरीपीठ मे गड़रही थीं क्योंकि वो उसके अंदरचल रहे संवेदनाओं केँ तूफ़ान केँ बीचकुछ पकड़ने कि कोशिश कररही थि।
उसकी कराहें छत सें टकराती बारिश कि बूंदों कि आवाज़ केँ संग मिलकर तेज होँ गईं। उसे दर्द अभि भि हौ रहा थां, पऱ मजा कि लहरें उसके दर्द पऱ धीरे-धीरे धीरे-धीरे हावी हौ रही थि। मेरेहर धक्के केँ संग उसके मुंह सें एक् हल्की चीख फूटती "हम्म!अहह!", किसी मधुर म्यूज़िक केँ जैसे जौ हर धक्के केँ संग बढ़ती जाती थि।
हमारे गीले जिस्मों केँ थपथपाने कि आवाज़ कमरे मे गूंजरही थि, ये ध्वनि माहौल कों औऱ भि कामुक बनारही थि। खुशी औऱ वासना केँ वशीभूत होकर मैंने थोड़ा सां औऱ ज़ोर लगाया औऱ मेरा लण्ड उसकी बुर कों चीरता हुआजड़ तक उसके अंदर समां गय़ा। "आई!ओह!मर गई.ई.ई.ई" उसकी दर्दभरी कराह मेरेदिल पर्र चाकू कि तरहलगी, पऱ मेरे जिस्म मे उठी बिजली कि तरंगो नें मुझे खुशी सें भर दिया। उसकी बुर कि दीवारें मेरे लण्ड केँ चारों ओर चिपकगईं, मेरे लण्ड केँ आकर केँ संग तालमेल बिठाने कि कोशिश कररही थीं, औऱ मुझेउस दर्द पर्र अपराधबोध महसूस हुआ जौ मे उसेदे रहा थां। मगरउसे अपना बनाने कि ख़्वाहिश इतनी प्रबल थि कि उसका विरोध नहि कियाजा सकता थां।
"अहह, भैया, " वो फिन सें कराहउठी, उसके नाखून मेरीपीठ मे गड़रहे थें। मे रुक गय़ा, उसे अपनी गहरायी मे समाये लण्ड सें तालमेल बिठाने कां एक् क्षण दिया। "बस, बस, सभी ठीक हैं, रोमी" मैंने कहा, उसके एक् निपल कों अपने मुँह मे लेतेहुए, मैंने धीरे-धीरे सें चूसा, इस उम्मीद सें कि उसका ध्यान उसकी तकलीफ़ सें हटजाए। उसकी सांसें रुकगईं औऱ उसने अपनीपीठ झुकाकर अपने मम्मों कों मेरे मुँह मे औऱ धकेल दिया। ये एक् मीठी पीड़ा थि, उसकी चूचियों कां स्वाद औऱ उसके शरीर कि कोमलता बाहर् चलरहे तूफ़ान सें एकदम विपरीत थि। उसकाहाथ मेरेसिर केँ पीछे कि ओरचला गय़ा, औऱ मेरे बालों कों सहलाने लगी। "पूरा गय़ा?" उसने हाँफते हुए पूछा, मैंने अपना मुंह उसके निप्पल सें अलग करतेहुए जवाब दिया "हम्म, पूरा, जड़ तक" औऱ फिन उसकी दूसरी मम्मों केँ निप्पल कों अपने मुंह मे भर लिया।
एक् मिनट केँ लिए, मैंने अपने कूल्हों कों नहि हिलाया, अपने पूरे लण्ड कों उसकी बुर केँ अंदर दबाएरखा, मैंने महसूस किया कि उसकी बुर कि गर्मी मेरे लण्ड पर्र बड़रही हैं, उसकी जकड़न मुझे किसी बुराई कि तरह जकड़रही हैं। वो अनुभूति अवर्णनीय थि, खुशी औऱ अपराध, ख़्वाहिश औऱ भय कां एक् मादक मिश्रण। उसकी बुर कि दीवारें मेरे लण्ड केँ चारों ओर मखमल कि तरह महसूस हुईं, उसकीनमी एक् गरम औऱ सख्त आलिंगन कि तरह थि जैसेदो प्रेमी बरसों बाद मिलेहों।
मैंने फिन सें अपनीकमर हिलायी, वापस अंदर धकेलने सें पहले करीब पूरा लण्ड बाहर् खींच लिया, मुझेऐसा महसूस हुआ कि उसकी बुर मेरे चारों ओरकस गई हैं जैसे कि वो नहि चाहती थि कि मे लण्ड वहां सें हटाऊँ।
उसकी आँखें खुलगईं औऱ उसके मुँह सें तेज़"आआह!" निकली।
"भईया, " वो कराहउठी, उसकी आवाज़ मे दर्द औऱ खुशी कां मिश्रण थां।
मैंने उसकीओर सवाल कि दृष्टि सें देखा। "आआह! प्लीज़ इसे बाहर् निकालो, दर्द हौ रहा हैं" उसने विनती कि.
"बसकुछ सेकंड औऱ सहनकर लेँ, रोमी, " मे उसकेकान मे फुसफुसाया।
"हर लड़की कों ये दर्द पहलीबार महसूस होता हैं। " मे जानता थां कि ये एक् घिसी-पिटी बात थि, मगरउस क्षण मेरेपास सिर्फ शब्द हि थें। उसकी आँखें मेरी आँखों मे देखरही थीं, मेरे शब्दों सें वोँ आशवस्त हुई औऱ उसने सहमति मे सर हिलाया।
मे नीचे झुका औऱ उसके माथे कों चूमा, "तु बहोत हसीन हैं, रोमी, " मे बुदबुदाया, मेरी आवाज़ हमारी स्थिति केँ विपरीत थि। " "बस थोड़ीदेर मे अच्छा लगने लगेगा"
उसकी आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा औऱ उसने जारी रखने कि मौन सहमति केँ संगसिर हिलाया। नएजोश केँ संग, मैंने धीरे-धीरे धीरे-धीरे धक्के लगाना शुरुआत कर दिया, मेरी हरकतें धीमी औऱ सोच-समझकर चलरही थीं, मे उसके चेहरे पऱ असुविधा केँ किसी भि लक्षण कों देखरहा थां।
दर्द औऱ मजा कों एक् संग महसूस करतेहुए उसके दाँत उसके निचले होंठ मे गड़गए, औऱ उसने अपनी आँखें बंदकर लीं। उसके नाखून मेरे कंधों पर्र गड़गए औऱ ऐसे निशान छोड़गए जोँ इसरात कि लगातार याद दिलाते रहेंगे। हरबार जबजब मेरा लण्ड उसकी बुर कि गहरायी मे उतरता, वो तनावग्रस्त होँ जाती, उसका जिस्म उन संवेदनाओं कां युद्धक्षेत्र बन गय़ा जिसका उसने पहलेकभी अनुभव नहि किया थां।
"मेरेलिए ये दर्दसहन कर, रोमी, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ मे माफ़ी औऱ हताशा कां मिश्रण थां, जैसे हि मैंने अपने कूल्हों कों फिन सें जोर सें दबाया, मेरा पूरा लण्ड उसकी बुर मे समा गय़ा औऱ मेरे अंडकोष उसकी बुर केँ दरवाज़ा पऱ टकराये। उसकी आँखें खुलगईं, औऱ वो मेरी नज़रों सें मिली, "अहह!" उसने हलकी कराह केँ संग अपने दर्द कों व्यक्त किया।
"तुम्हारे लिएकुछ भि, भैया, " उसने दाँत पीसते हुए उत्तर दिया, उसकी आँखें प्रेम औऱ दर्द केँ मिश्रण सें भरगईं। यह शब्द मेरे अपराधबोध पऱ मरहम कि तरह थें, उसके पूर्ण समर्पण कां वादा, बहोत मादक औऱ कामोत्तेजक थां जिसने मेरी वासना कों औऱ बढ़ा दिया।
१ मिनट तक उसे धीरे-धीरे धीरे-धीरे चोदने केँ बाद मे उसकेकान मे फुसफुसाया "मे अपनी स्पीड बढ़ारहा हूं, सहने केँ लिए सजधजकर होँ जा, सेक्सी"।
उसकी आंखें खुलगईं औऱ उसनेसिर हिलाया, उसकी सांसें छोटी छोटी औऱ तेजतेज़ चलरही थीं। मैंने तेजी सें धक्के लगाने शुरुआत किये। उसकी कराहें तेज़ होँ गईं, हमारे अवैध प्रेम कि आवाज़ों सें स्टोर रूम गूंजउठा।
उसकी बुर कि दीवारें लण्ड केँ संग एडजस्ट होने लगीं, उसका दर्द धीरे धीरेमजा मे बदल गय़ा। उसने मेरीकमर कों कसकरपकड़ लिया औऱ अपने अंदर समेटने लगी। बाहर् कां तूफ़ान हमारे जिस्मों केँ तूफ़ान कि नकल करताहुआ प्रतीत हौ रहा थां।
"ओह! रोमी, " मे उसकेकान मे अपनीकमर हिलाते हुए फुसफुसाया, मेरी आवाज़ कर्कश थि, "तुझेही अपनी पत्नि बनाऊंगा। " यह शब्द प्रेम औऱ स्वामित्व कि घोषणा थें, एक् ऐसा वादा जौ सामाजिक मानदंडों केँ दायरे सें परे थां। उसकी आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, संदेह औऱ भय आहिस्ता आशा कि चिंगारी कों जन्मदे रहे थें।
"बता बनेगी?" मैंने हाँफते हुए उसकी आंखों मे देखते हुएउसे औऱ तेजी सें चोदते हुए पूछा।
उसकी आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, संदेह औऱ भय हमारे बीच सें गायब होँ चुका थां। "अहह!हाँ, " वो कराहते हुए फुसफुसाई, "बनूँगी, भैया".
यह शब्द बांध टूटने कि तरह थें, जोँ मेरे भीतर उमड़रहे जुनून केँ सैलाब कों बाहर् निकाल रहे थें। "ओह रोमी, " मे कराहउठा, मेरी आवाज़ एक् अनोखे खुशी औऱ वासना सें मोटी होँ गई। "मे तेरी बुर कों अपने पानी सें भरने वाला हूं। " मैंने अपनेचरम पऱ पहुँचने सें पहले घोषणा कि।
जैसे हि उसनेसिर हिलाया, उसकी आँखें मेरी आँखों सें नहि हटीं, उसकाबदन काँपरहा थां। "भर दो, अहह!, " वो कराहउठी, उसकी आवाज़ मे खुशी औऱ दर्द कि स्वर लहरी थि। "अहह!भर दो, भईया" उसके शब्दों नें आग मे घी कां काम किया।
मेरे झटके तेज़ होँ गए, मेरे अंडकोष उसकी बुर सें टकराकर थपथप कि आवाज़ करनेलगे औऱ फिनकुछ हि सेकण्ड्स मे मेरा सब्र सां टूट गय़ा।
"ओह! भैया, आँ…अहह!" वो जोर सें कराहउठी, उसकीपीठ तन गई औऱ उसकी बुर मेरे लण्ड केँ चारों ओर भिंच गई क्योंकि उसकेबदन मे कुछ सेकंड केँ लिए कंपनहुआ। उसके शब्द एक् आदेश, एक् विनती थें जिसे मे नज़रअंदाज नहि कर सकता थां। एक् आखिरी, गहरे धक्के केँ संग, मैंने उसकी बुर कों अपने गाड़ेरस सें भर दिया। " आँ…अहह!, रोमी" मे हाँफते हुए उसकेऊपर ढह गय़ा।
उसकी बुर कि दीवारें मेरे लण्ड केँ चारों ओर सिकुड़ गईं, औऱ मेरे वीर्य कि एक् एक् बूँद कों अपने अंदर समेटने लगी। ये एहसास ज़बरदस्त थां, परम खुशी, राहत औऱ स्वामित्व कां मिश्रण जोँ मैंने पहलेकभी महसूस नहि किया थां।
उसकाबदन मेरे नीचे शिथिल हौ गय़ा, मजा कां तूफान धीमे धीमेथम गय़ा। मे अपनी सांसें नियंत्रित करतेहुए उसकेऊपर पड़ा थां। उसकेपेर मेरीकमर केँ चारों ओर लिपटे रहे, हमारे दिल कि धड़कने किसी ड्रम कि तरहताल मे ताल मिलारही थि।
"I love you, रोमी, " मे उसके बालों कों उसके चेहरे सें हटाते हुए फुसफुसाया, उसने मुझे कसकर अपने आलिंगन मे जकड़ लिया, उसकी बाँहें मेरे फेफड़ों सें हवा निचोड़ रहीथीं। उसकीबड़ी बड़ी चूचियां मेरे सीने मे पिसरही थीं, ये प्रेम सें भरा एक् इशारा थां जोँ उग्र औऱ नाजुक दोनों थां, हम् एक् ऐसे बंधन मे बांधगए थें जोँ पारिवारिक बंधनो कों तोड़कर बना थां।
अपनी सांसों कों समायोजित करने औऱ एक्-दूसरे कों गले लगाने मे कुछ औऱ मिनट बिताने केँ बाद।
"चलो नीचे चलते हें, जान, " मैंने एक् शरारती मुस्कान केँ संगकहा, धीरे-धीरे सें स्वयं कों उसकेगरम आलिंगन सें मुक्त कर दिया। उसकी मुस्कुराहट लौटआई, उसकी आँखों मे शरारत कि चमक थि जिसने मेरेदिल कि धड़कन बढ़ा दि। हम् दोनों जानते थें कि हम् आग सें खेलरहे थें, मगर हमारे खून केँ रिश्ते कां रोमांच इतना नशीला थां कि हम् विरोध नहि कर सकते थें।
हमने फर्श सें अपने भीगेहुए कपड़े उठाए, फर्श कि धुल सें वोँ सन चुके थें मैंने उन्हें नं पहनने मे हि भलाई समझी। रोमा नें फर्श सें खड़े होकर अपनेफटे हुए गाउन सें अपनी चूचियों कों ढकने कां भरसक प्रयास किया पर्र वोँ असफलरही। मेरे नंगेपन पर्र रोमा मुस्कुरायी औऱ शर्मा केँ कमरे सें बाहर् जानेलगी।
मैंने कमरे सें बाहर् निकलकर दरवाज़ा बंद किया औऱ रोमा केँ संग सीढ़िया उतरने लगा। उसने कसकर मेराहाथ थाम लिया, वोँ चलतेहुए मेरे ढीले लण्ड कों हिलते देखमंद मंद मुस्कुरा रही थि। हमारी उंगलियाँ एक्-दूसरे केँ हाथ मे ऐसे गुंथी हुईँ थीं जैसे बिछड़े हुएदो प्रेमी हों। घऱ एकदम शांत थां, बाहर् कां तूफान दीवारों केँ कारण शांतलग रहा थां।
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) - Continue reading for full story
bhut hi mast kahani, dill ❤️ ko chhuti huyi kahani lagi , kal night mai read krna start kia thaa and dopahar tak pure update read krr liye. Ummed krta ho kahani restart huyi hain too update regular aayenge .
bhut hi mast kahani, dill ❤️ ko chhuti huyi kahani lagi , kal night mai read krna start kia thaa and dopahar tak pure update read krr liye. Ummed krta ho kahani restart huyi hain too update regular aayenge .
Relavant source : click here
