सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
UPDATE 16:
मम्मी कि चिता सें उठती लपटों कों देखकर एक् बार कों ऐसालगा केँ मानो हमारी ज़िन्दगी भि उनकी भेंट चढ़कर भस्म होँ गयीँ, हौ। हमें अपनी मम्मी कां आखिरी संस्कार कियेहुए पन्द्रह दिनबीत चुके थें। ऐसा महसूस हुआ जैसे एक् पूरा जिंदगी बीत गय़ा, औऱ फिन भि, मेरे सीने मे एक् दर्दबना हुआ थां, उसदिन कि तरह ताज़ा औऱ दर्दनाक, जिसदिन वो हमें छोड़कर गई थि। रोमा औऱ मैंने एक्-दूसरे कों उस कठिन टाइम मे थामाहुआ थां, हम् दोनों एक् दूसरे कां सहारा थें।
हम् दोनों पऱ हि दुखों कां एक् पहाड़ सां टुटा थां जिसे हम् अपनी पूरी शक्ति केँ संगसहन कररहे थें।
घऱ आरामसे खाली होँ गय़ा थां, सब रिश्तेदार हमे दिलासा देकर अपने-अपने जिंदगी मे लौटगए थें, औऱ हमें हमारी क़िस्मत केँ सहारे छोड़ दिया थां। मात्र एक् शीतल फूफी (पिताजी कि चचेरी बेहन) औऱ उनकी बेटी, 21 साल कि सोनिया, हमारे संग रुकी रहीं, उनकी उपस्थिति एक् सांत्वना थि औऱ उस जिंदगी कि याद दिलाती थि जौ हमारे दुःख केँ घेरे केँ बाहर् बदस्तूर जारी थां। सोनिया एक् दुबले पतले जिस्म कि सुन्दर औऱ जीवंत लड़की थि, जोँ हमारे जिंदगी पर्र पड़ी छाया केँ बिल्कुल विपरीत थि। सोनिया रोमा केँ आगे पीछे घूमती रहती औऱ इधरउधर कि बातें कर केँ रोमा कां ध्यान भटकाती।
शीतल फूफी औऱ सोनिया मिलकर घऱ कां साराकाम सम्हालती औऱ कभीकभी रोमा भि उनकी हेल्प करतीनज़र आती।
वाणी अपनी प्रेगनेंसी केँ कारण आँ नहि पायी थि पऱ हमारी फ़ोन पर्र करीब-करीब रोज़ हि बातें होतीथीं जंहा वोँ मुझे हिम्मत देती औऱ मेरा ढांढस बांधती।
शीतल फूफी कि किस्सा भि कुछअलग थि उनका१२ साल पहले divorce होँ गय़ा थां, उन्होंने बड़े संघर्षों केँ बाद सोनिया कि परवरिश कि थि। ४५साल कि उम्र मे भि शीतल फूफी स्वयं कों अच्छे सें मेन्टेन कियेहुए थीं, उनको देखने सें नहि लगता थां केँ उन्हें कभी मर्द कि कमीरही होगी। उनकी आँखें हमारे प्रति सहानुभूति सें भरी होतीथीं, उनके शब्दों मे करुणा कां भाव होता औऱ जब भि मुझे अकेला पाती तोँ मेरेपास बैठकर मुझे जिंदगी कि बारीकियां समझती।
ये आखिरी संस्कार केँ सोलहवें दिन कि सुभह थि, एक् ऐसा टाइमजब हादसे केँ दुःख कों वहनकर केँ वास्तविकता मे लौटना औऱ अपने जिंदगी कि गाड़ी कों पटरी पर्र लाना थां। मैंने मम्मी कि अलमारी मे सें उस डायरी कों ढूंढ लिया थां जिसके बारे मे उन्होंने बात कि थि।
जैसे हि मैंने डायरी कों उठाया, मुझे एक् ज़िम्मेदार औऱ घऱ केँ सरदार होने कां एहसास हुआ।
मैंने तेज़ी सें डायरी कों खंगालना शुरुआत किया, उसमे मम्मी केँ सेविंग अकाउंट, फिक्स्ड डिपॉजिट्स औऱ बैंक लाकर कि सब जानकारियां दर्ज़ थि।
मुझे अपने मम्मी पऱ गर्व कि अनुभूति हुइ जब मैंने देखा कि उन्होंने अपनी मेहनत औऱ लगन सें हमारे लिए कितना कुछबचा केँ रखा थां।
औऱ फिन, मुझे एटीएम पिन मिला, जोँ एक् मुड़े हुए पन्ने पऱ लिखाहुआ थां, जैसे कि वो चाहती हों केँ उनके जानेबाद इसे आसानी सें ढूंढा जासके। ये ज़िम्मेदारी कां प्रतीक थां, एक् मूक मेसेज थां कि वो जानती थि कि उसका टाइम निकट थां औऱ उन्होंने उसकेलिए तैयारी करली थि।
डायरी मे बैंक केँ लॉकर कां विवरण भि थां, जहाँ उसने अपने सबसे कीमती गहने - सोने कां हार, सोने कि बालियाँ, सोने कि सुकून, हीरे कि अंगूठी औऱ सोने कि चार चुड़िया रखी थि जिनमे सें कुछ उन्हें उनकी सासू माँ यानी केँ मेरी दादीमा द्वारा भेंट स्वरुप मिला थां औऱ कुछ उन्होंने शायदबाद मे जोड़ा थां। मुझे एहसास हुआ कि वो हमसे कितना प्रेम करती थि, वो कितना चाहती थि कि हम् सुरक्षित रहें।
मैंने बैंक लॉकर कि चाबी ढूंढी जोकि अलमारी केँ लॉकर केँ अंदर एक् पाउच मे हिफाज़त सें रखी गई, थि।
मैंने डायरी औऱ चाबी कों उठाया औऱ भावनाओं औऱ ज़िम्मेदारी कां अजीब मिश्रण महसूस करतेहुए बैंक केँ लिएघऱ सें निकल गय़ा।
मे बैंक मे काउंटर केँ पासआया, कीबोर्ड कि खड़खड़ाहट औऱ बातचीत कि बड़बड़ाहट उस जिंदगी कि याद दिलाती थि जोँ हमारे दर्द केँ बुलबुले केँ बाहर् जारी थां।
"क्याँ मे आपकी सहायता कर सकता हूं?" बैंक मैनेजर श्रीवास्तव नें सहानुभूति भरी आँखों सें मेरी औऱ देखकर पूछा।
मैंने सिर हिलाया, मेरागला रुंध गय़ा। "मे अपनी मम्मी केँ सेविंग खाते कां नॉमिनी हूं, वोँ अब नहि रहीं" मैंने कहा, मेरी आवाज़ मेरे कानों कों अजीबलग रही थि।
"I am sorry, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ धीमी औऱ सम्मानजनक थि। "मे समझता हूं कि ये आपकेलिए कठिन टाइम हैं। "
मैंने आवश्यक दस्तावेज़ सौंपदिए- मां कां मृत्यु प्रमाण पत्र, उनकी आईडी औऱ लॉकर कि चाबी। उसने उन्हें सावधानीपूर्वक हाथों सें लिया, उसकी आँखें मेरी आँखों सें कभी नहि हटीं। "मुझे आपके नुकसान केँ लिएखेद हैं, " कागजी कार्रवाई भरते टाइम वो बड़बड़ाया।
बैंक मैनेजर श्रीवास्तव नें मुझे आश्वासन दिया कि मे तीन कार्य दिवसों केँ बाद लॉकर मे रखी चीजों पर्र दावाकर सकता हूं। श्रीवत्साव नें मुझसे अनुरोध किया केँ अगर मे अपना अकाउंट उसी बैंक मे खुलवा लूँ तौ मम्मी केँ सेविंग अकाउंट केँ फंड्स औऱ फिक्स्ड डिपॉजिट्स भि मेरे अकाउंट मे ७दिन केँ भीतर ट्रांसफर करदिए जायेंगे। मैंने सिर हिलाया, श्रीवास्तव नें जल्दी हि एक् फॉर्म मंगाकर मेरे सेविंग अकाउंट खोलने कि प्रक्रिया शुरुआत करवा दि। अगले१ घंटे मे मेरा सेविंग अकाउंट खुलकर रेडी थां, मैंने श्रीवत्साव सें मां कां अकाउंट बैलेंस पूछा जोकि लगभग२० लाख रुपये थां औऱ १०लाख कि एक् FD थि - हमारी मम्मी, हमारे लिए उनकी विरासत मे बहोत कुछछोड़ गयीँ, थि।
रात कों डिनर केँ बाद आकाश केँ पिता मिस्टर गुप्ता कां मोबाइल आया, वो मुझसे जल्दी मिलना चाहते हें। "मुझेकुछ बात करनी हैं तुमसे, रवि" Mr। गुप्ता कि आवाज़ दृढ़फिन भि चिंतित थि। " आकाश औऱ रोमा कि विवाह केँ बारे मे। क्याँ तुम् कल सुभहघऱ आँ सकते होँ?"
मेरादिल बैठ गय़ा। अंतिम चीज़ जिसके बारे मे मे सोचना चाहता थां वो थि विवाह, मगर मे मना नहि करसका। "ठीक हैं, आँ जाऊंगा अंकल, " मैंने अपनी आवाज़ कों स्थिर रखने कि कोशिश करतेहुए उत्तर दिया।
अगली सुभह, मे गुप्ता निवास मे गय़ा, उसजगह कि भव्यता मेरेदिल कि शून्यता केँ बिल्कुल विपरीत थि। Mr गुप्ता नें मुझे अपने ड्राइंग रूम मे बैठाया, उनकी अभिव्यक्ति गंभीर थि।
"आने केँ लिए शुक्रिया, रवि, " वो कहनेलगे, उनकी आँखें मेरा चेहरा तलाशरही थीं। "हम् सब बहोत कुछझेल चुके हें, औऱ मुझेपता हैं कि ये हममें सें किसी केँ लिए भि आसान नहि हैं। "
मैंने न् चाहते हुए भि अपनासिर हिलाया। विवाह कां ज़िक्र मेरेदिल मे एक् खंजर कि तरहचुभ रहा थां।
"देखो, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ भारी थि। "तुम्हारी मम्मी केँ निधन केँ बाद सें रोमा अजीब बर्ताव कररही हैं। मुझेपता हैं कि वो इस दुःख सें अभि उभरी नहि हैं, औऱ मे समझता हूं कि उसे वक्त चाहिए। मगर हम् विवाह मे देरी नहि कर सकते क्योंकि तुम् जानते हौ कि सभीकुछ बुक हौ चुका हैं। "
मैंने सिर हिलाया, ये महसूस करतेहुए कि हमारी स्थिति कां फंदा मेरी गर्दन केँ चारों ओरकस गय़ा हैं। "मे समझ सकता हूं अंकल, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ महज़ फुसफुसाहट थि। "मे कुछ करता हूं। "
गुप्ता जी सोफे पऱ पीछे कि ओरझुक गये, उनकी आँखें मेरी आँखों कों खोजरही थीं। "मे तुम् पऱ भरोसा कररहा हूं, रवि, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ मे आशा औऱ निराशा कां मिश्रण थां। "आकाश एक् अच्छा लड़का हैं औऱ वो रोमा सें प्रेम करता हैं। वो उसकेसंग खुश रहेगी। "
मैंने फिनसिर हिलाया, शब्द मेरी ज़ुबान पऱ झूठ जैसेलग रहे थें। जबउसे मेरेसंग रहना थां तौ वो किसी औऱ केँ संग केसेखुश रह सकती थि? मगर मुझेपता थां कि मे ऐसा नहि कह सकता, यहां नहि, अभि नहि। "मे उससेबात करूंगा, " मैंने उन्हें आश्वासन दिया, मेरी आवाज़ उतनी हि मजबूत थि जितनी मे इसेबना सकता थां।
घऱ वापसी कां मार्ग धुंधला थां, मेरे विचार नदी मे बाढ़ कि तरह तेजी सें बढ़रहे थें। मे रोमा सें क्याँ कहनेजा रहा थां? मे उसेऐसी विवाह केँ लिए केसेमना सकता थां जोँ हम् दोनों केँ लिए विश्वासघात जैसालगे? रास्ते मे बारिश शुरुआत होँ गई थि, बूँदें बन्दूक कि गोलियों कि तरह मुझे छलनीकर रहीथीं, मार्च केँ महीने मे बारिश बेमौसमी थि।
जैसे हि मे घऱ केँ पासआया, रोशनी कम होँ गई, मात्र हॉल मे लगे एक् बल्ब कि धीमी रोशनी सें रोशनी आँ रही थि। ऐसालग रहा थां मानों घऱ हि शोक मे डूबा होँ, दीवारों पर्र नाचती परछाइयाँ हमारे दर्द कि मूक गवाहहों।
अपने आप् कों सुखाने केँ बाद मे रोमा केँ कमरे कि ओरचल दिया।
जब मे रोमा केँ कमरे कि औऱ बढ़रहा थां तौ मेरे पांव भारीलग रहे थें।
द्वार (दरवाज़ा) थोडा सां खुलाहुआ थां, औऱ दरार केँ माध्यम सें, मे उसे पलंग पर्र बैठेहुए देख सकता थां। वो सोनिया कि ओर झुकी हुई थि, उनकेसिर एक् दूसरे केँ लगभग थें औऱ वे फुसफुसा रहे थें औऱ खिलखिला रहे थें। उसकी हँसी कां दृश्य, इतना सच्चा औऱ लापरवाह, मेरी आत्मा पर्र मरहम जैसा थां। बहोत टाइम होँ गय़ा थां जब मैंने उसे वास्तव मे खुश देखा थां, औऱ ये मेरी मम्मी केँ एक् टुकड़े कों उसमें जीवित देखने जैसा थां।
मैंने दरवाजे कों धक्का देकर खोलने सें पहले हल्के सें थपथपाया। रोमा नें ऊपर देखा, उसकी आँखें रोने सें लाल होँ गई थीं, मगर उसने मुझे जोँ मुस्कान दि वो मजबूर थि, उसके दर्द कों छिपाने केँ लिए एक् मुखौटा थां। सोनिया नें उत्सुकता सें मेरीओर देखा, उसकी आँखों मे यौवन कि मासूमियत चमकरही थि।
"भईया, " रोमा नें कहा, उसकी आवाज़ भावुकता सें भरी हुइ थि। "तुम् ठीक हौ?"
मे जबरदस्ती मुस्कुराते हुए कमरे मे दाखिल हुआ औऱ अपने पीछे द्वार (दरवाज़ा) बंदकर लिया। "मे ठीक हूं, " मैंने बैड केँ किनारे पर्र बैठते हुएकहा। "मुझेबस तुझसे बात करनी थि। "
सोनिया नें मेरीओर देखा, उसकी जिज्ञासा बढ़ गई। "सभीकुछ ठीक हैं?" उसने पूछा.
"हाँ, " मैंने झूठ बोला, मेरी नज़र रोमा पर्र टिकीरही। उसेसभी कुछ बताने, अपने प्रेम कां इज़हार करने औऱ विवाह रद्द करने कि ख़्वाहिश मेरे अंदर एक् तूफ़ान पैदाकर रही थि। मगर टाइमिंग बिल्कुल ग़लत थि। " गुप्ता अंकल नें मुझे विवाह केँ बारे मे चर्चा करने केँ लिए बुलाया थां। "
रोमा कि आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, उसके प्रश्न कां वजन अनकहा थां। " क्याँ कहा उन्होंने ?"
मैंने एक् गहरी साँसली, स्वयं कों उस बातचीत केँ लिए सजधजकर करतेहुए जिससे मे डररहा थां। "वो विवाह कों आगे बढ़ाना चाहतें हैं, " मैंने दबी आवाज़ मे कहा। "सभी कुछबुक होँ गय़ा हैं, औऱ वोँ तेरे बारे मे चिंतित हैं। "
रोमा कि मुस्कान लड़खड़ा गई औऱ उसने दूसरी ओर देखा, उसकी आँखों मे बिना रुके आँसुओं कि चमक थि। "मुझेपता हैं, " वो फुसफुसाई। "मगर मे अभि सजधजकर नहि."
मे सोनिया कि ओर मुड़ा, मेरी आवाज़ मे तनाव थां। "क्याँ तूँ मेरेलिए एक् गिलास पानीला सकती हैं?"
कमरे मे तनाव देखकर उसकी आँखें थोड़ी चौड़ी होँ गईं, मगर उसनेसिर हिलाया औऱ हमें चुपचाप छोड़कर चली गई।
जैसे हि द्वार (दरवाज़ा) बंदहुआ, रोमा कां चेहरा टूट गय़ा। उसने अपना चेहरा अपने हाथों मे छिपा लिया औऱ चुपचाप सिसकने लगी। "मे आकाश सें विवाह नहि करना चाहती, " वो फुसफुसाई, उसकी आवाज़ टूट गई। "मुझसे नहि होगा। "
मैंने उसकी उंगलियों कां कंपन महसूस करतेहुए उसकाहाथ थाम लिया। "रोमी, " मैंने धीरे-धीरे सें शुरुआत कि, "मुझेपता हैं कि ये कठिन हैं, मगर हमें परिवार केँ बारे मे, मां कि आखिरी इच्छाओं केँ बारे मे सोचना होगा। "
उसकी आँखें मेरी तलाशकर रहीथीं, उनकी गहराइयों मे निराशा औऱ भ्रमघूम रहे थें। वो खामोश रही।
"रोमी, " मैंने शुरुआत किया, मेरी आवाज़ धीमी थि, "हम् विवाह रद्द नहि कर सकते। मैंने मम्मी कि डायरी देखी उसमेसभी डिटेल्स हें, वेन्यू, गाड़ी, फर्नीचर, इलेक्ट्रॉनिक्स, ज्वेलरी सभी केँ लिए मम्मी एडवांस मे कुछ न् कुछ अमाउंट pay कर चुकी हें जोकि करीब-करीब १०-१२लाख रूपये हैं, हम् बहोत मुश्किल मे आँ जायेंगे "
उसकी आँखें मेरी तलाशकर रहीथीं, उनकी गहराइयों मे निराशा औऱ भ्रमघूम रहे थें। फिन, मानो संकेत पर्र, उसका मोबाइल बजा, तीखी आवाज़ कमरे कि शांति कों भेदरही थि। स्क्रीन पऱ टिमटिमाता हुआनाम आकाश कां थां, जोँ आकाश सें कि गई उसकी प्रतिबद्धता कि याद दिलाता हैं।
रोमा कां हाथ स्क्रीन पर्र मंडरा रहा थां, उसकी कांपती उंगलियों मे अनिर्णय स्पष्ट थां। अचानक झटके सें उसनेफोन काट दि औऱ दूसरी तरफ अपना चेहरा घुमा लिया।
मगर ये एक् संक्षिप्त राहत थि, क्योंकि मोबाइल फिन सें बजनेलगा, फ़ोन कि ओर देखते हि रोमा कि आँखें गुस्से सें चमक उठीं।
"रोमी, " मैंने उसे सांत्वना देने केँ लिएहाथ बढ़ाते हुए फुसफुसाया।
उसनेबैड सें मोबाइल उठाया औऱ अपने अंगूठे केँ जोरदार प्रहार सें उसे स्विच ऑफकर दिया, स्क्रीन पर्र अंधेरा हौ गय़ा।
"रोमी, " मैंने गहरी सांस लेतेहुए औऱ अपनी आवाज़ कों शांत रखने कि कोशिश करतेहुए कहा। "तुझेही उससेबात करने कि ज़रूरत हैं। प्लीज स्थिति कि गंभीरता कों समझने कि कोशिश कर। "
मगर वो अपनी हि उथल-पुथल मे खोई हुइ थि, उसकेमन मे उठरहे विचारों सें मे अनिभिज्ञ थां। "मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा, " उसने जवाब दिया, उसकी आवाज़ महज़ फुसफुसाहट थि।
मैंने एक् गहरी साँसली औऱ अपने अंदर भावनाओं केँ तूफ़ान कों शांत करने कि कोशिश कि। "रोमी, " मैंने दृढ़ता सें कहा, "हमेंआगे बढ़ना होगा। मे विवाह कि तैयारी शुरुआत कररहा हूं। "
उसकी आँखें मुझसे मिलने केँ लिए उठीं, उनकी गहराई मे गुस्स औऱ दुःख कां मिश्रण घूमरहा थां। “मगर.मगर मे सजधजकर नहि हूं?” उसने मांग कि, उसकी आवाज़ बिना रुके आंसुओं सें भरी हुई थि।
उसकी आवाज़ मे दर्द देखकर मुझे ग्लानि महसूस हुई, मगर मुझेपता थां कि हमारे पासकोई विकल्प नहि थां। "मुझेपता हैं कि ये मुश्किल हैं, " मैंने कहा, मेरेदिल मे उथल-पुथल केँ बावजूद मेरी आवाज़ सुखद थि। "मगर हमें मां कि इच्छाओं कां सम्मान करना होगा। हम् उन्हें उदास नहि कर सकते। "
रोमा कि नज़र उसके हाथों पर्र पड़ी, जोँ अब उसकीगोद मे कसकर जकड़े हुए थें। "मगर तुमने मम्मी सें मुझेखुश रखने कां वादा किया थां" वो फुसफुसाई, शब्द मुश्किल सें सुनाई देरहे थें। "क्याँ तुम् भूलगये?"
" नहि, बिलकुल नहि, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ भावुकता सें भरी हुइ थि। "मगर तूने भि मेरीबात मानने कां वादा किया थां। "
रोमा कां सिरऊपर उठ गय़ा, उसकी आँखें सदमे सें चौड़ी हौ गईं। "मुझेपता हैं मगर" उसनेकहा, उसकी आवाज़ बमुश्किल फुसफुसाहट थि।
मैंने एक् गहरी साँसली, मैंने शुरुआत किया, मेरे सीने मे दर्द केँ बावजूद मेरी आवाज़ दृढ़ थि, "हमेंवही करना होगा जौ हमारे लिए सबसे अच्छा हैं। औऱ इसका सीधा सां मतलब हैं कि तुँ आकाश सें विवाह कररही हैं। "
उसकी आँखें मेरी तलाशकर रहीथीं, समझने कि एक् मूक प्रार्थना। मगर मे हार नहि मान सकता थां। मुझे हम् दोनों केँ लिए मजबूत बनना थां।
सोनिया नें ट्रे मे पानी कां गिलास लेकर द्वार (दरवाज़ा) खोला। भारी सन्नाटे कों महसूस करतेहुए उसने हमारे बीच देखा।
"इसे देदो, " मैंने रोमा कि ओरसिर हिलाते हुए सोनिया सें कहा।
उसकी आँखें मेरी तलाशकर रहीथीं, अनकहा प्रश्न हवा मे लटकरहा थां। "मगर." वो शुरुआत हुई।
"रोमी, " मैंने कहा, मेरेदिल मे कंपन केँ बावजूद मेरी आवाज़ दृढ़ थि। "बसतीन दिन औऱ हें। हम् इतनीदूर आँ गए हें। हमें मम्मी केँ लिएये करना होगा। "
वो एक् टक मेरी आँखों मे देखरही थि। मगर मे उसेउस उथल-पुथल कों देखने नहि देसका जोँ उसकी अपनी उथल-पुथल कों प्रतिबिंबित करती थि। "स्वयं कों सम्हाल औऱ हिम्मत जुटा, " मैंने सोनिया केँ कांपते हाथ सें पानी कां गिलास लेतेहुए फुसफुसाया। " हमें मजबूत होना होगा। "
सिर हिलाते हुए उसने पानी लें लिया, उसकी आँखें मेरी आँखों सें हट हि नहि रहीथीं। कमरे मे दमघुट रहा थां, हवा अनकहे शब्दों औऱ हमारे साझा रहस्य केँ बोझ सें भरी हुई थि। "तीनदिन औऱ, " मैंने दोहराया, यह शब्द उत्सव केँ बजाय फांसी कि उलटी गिनती कि तरहलग रहे थें। "तुझेही हिम्मत दिखानी होगी "
मे भारीमन औऱ बढ़ते दर्द केँ संग द्वार (दरवाज़ा) बंद करके कमरे सें बाहर् चला गय़ा।
घऱ मे बेहद शांति महसूस होँ रही थि, मात्र रोमा केँ कमरे सें दबी-दबी सिसकियों कि आवाज़ आँ रही थि। मे जनता थां कि मुझेउसे अकेला छोड़ना होगा ताकि वोँ स्वयं कों सजधजकर करसके, मगर मेरी आत्मा कां रोम-रोम वापस जाकरउसे सांत्वना देने केँ लिए चिल्ला रहा थां, उसेये बताने केँ लिए कि मे उसकेलिए वहां थां, कि हम् एक् संग रहने कां मार्ग ढूंढ सकते हें।
मे अपने कमरे मे चलाआया, दीवारें मेरे चारों ओर उदासी कि चादर लपेटे कड़ीथीं। मैंने गुप्ता जी कां नंबर डायल किया, मेराहाथ थोडा कांपरहा थां। जब उन्होंने उत्तर दिया, तौ मैंने एक् गहरी सांसली औऱ दृढ़ता सें बोला जिसने मेरे भीतर कि अराजकता कों झुठला दिया। "अंकल, आप् तैयारी कीजिये विवाह उसी तारिख कों होगी, " मैंने कहा। "मगर बस आपसे इतनी सि गुज़ारिश हैं केँ इसेसरल रखियेगा, जितना कम सें कम लोगों केँ संग होँ सके। "
उन्होंने राहत कि साँसली। "बिलकुल, रवि, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ कृतज्ञता सें भरी हुई थि। "हम् बसकुछ ख़ास लोगों कों हि आमंत्रित करेंगे"
अगलेदिन गुप्ता जी नें मुझे विवाह केँ वेन्यू पर्र आके मिलने कां बोला औऱ योजना केँ अनुसार विवाह कों आगे बढ़ाने केँ वादे केँ संग बातचीत खत्म हुइ। अपने कंधों पर्र दुनिया कां भार महसूस करतेहुए मैंने मोबाइल रख दिया।
अगलेदिन, मे शादी स्थल कां निरीक्षण करने केँ लिए निकला, येशहर सें बहार एक् फार्म हाउस टाइप बैंक्वेट थां जोँ तीनतरफ सें हरेभरे खेतों सें घिराहुआ थां। अमीर लोगों कि शादियों केँ लिएये एक् फेमस स्थान थि, मां नें रोमा केँ लिए बेस्ट वेन्यू चुना थां।
थोड़ीदेर केँ इंतज़ार केँ बाढ़ गुप्ता जी भि वंहा आँ गए। उन्होंने मुझे वस्तुओं कि एक् सूची सौंपी।
"तुम्हारी मां केँ संगइस सभी पऱ चर्चा होँ चुकी थि, " उन्होंने मुझसे कहा, उनकी आवाज़ मे लालच कां पुट थां।
मैंने सिर हिलाया, मेरागला रुंध गय़ा औऱ मैंने उनकेहाथ सें सूची लें ली। स्थिति कि वास्तविकता नें मुझे बहोत परेशान किया - रोमा आकाश सें विवाह करनेजा रही थि, औऱ मे इसे रोकने केँ लिएकुछ नहि कर सकता थां। मगर जैसे हि मैंने वस्तुओं कों स्कैन किया, मेरीनजर आखिर मे पड़ी - बोलेरो गाड़ी।
"गाड़ी, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ महज फुसफुसाहट थि।
गुप्ता जी नें गंभीरता सें सिर हिलाया। "हाँ, वाहन पऱ सहमति तुम्हरी मम्मी सें चर्चा कर केँ बनी थि " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ इस अनकही समझ सें भारी थि कि ये मात्र एक् विवाह नहि थि बल्कि एक् तरह कां लेन-देन थां।
उन्होंने आगेकहा, "उन्होंने वाहन स्वयं बुक कि थि, डिलीवरी केँ बारे मे एक् बार शोरूम सें कन्फर्म कर लेना। "
"मुझे इसके बारे मे कुछपता नहि थां, " मैंने उनसेकहा, मेरी आवाज़ खोखली थि। इस रहस्योद्घाटन नें मुझ पर्र हथौड़े कि तरह प्रहार किया।
गुप्ता जी नें सिर हिलाया, उनकी अभिव्यक्ति मे सहानुभूति औऱ संकल्प कां मिश्रण थां। "ये उनकी ख़्वाहिश थि, " उन्होंने कहा। "औऱ अब, ये सुनिश्चित करना तुम्हारी ज़िम्मेदारी हैं कि सभीकुछ योजना केँ अनुसार हौ। " गुप्ता जी नें अपनीजेब सें एक् रसीद निकलकर मुझे देतेहुए कहा, वोँ एक् वाइट बोलेरो वाहन कि बुकिंग कि रसीद थि जिसे३ लाख रूपये एडवांस देकरबुक किया गय़ा थां।
मे गुप्ता जी सें विदा लेकरघऱ आया औऱ फूफी कों रोमा केँ लिए कपडे खरीदने कि ज़िम्मेदारी सौंपी। फूफी औऱ सोनिया सहर्ष रेडी होँ गई, पर्र रोमा केँ चेहरे पर्र अब भि एक् उदासी कां भाव थां, नं चाहते हुए भि उसे मेरीबात माननी पड़ी। उन तीनो (फूफी, सोनिया औऱ रोमा) कों लेकर मे बाजार केँ लिए निकल गय़ा। मैंने उन तीनो कों साड़ी कि एक् बड़ी सें शॉप पऱ छोड़ा "फूफी जी आप् लोग कपडे सेलेक्ट करो मे तब तक दूसरे काम निबटा करआता हूं " मैंने फूफी जी कों निर्देश देतेहुए कहा, फूफी नें "ठीक हैं " कहकर सहमति जताई। मैंने कुछरुक कर फूफी जी कों पलटकर आवाज़ दि "फूफी जी ", शीतल फूफी रोमा औऱ सोनिया कों शॉप केँ गेट पर्र छोड़कर मेरेपास आयी "क्याँ बात हैं? रवि" उन्होंने पूछा "फूफी जी, पैसों कि टेंशन मत लेना, जौ भि अच्छा लगे लेँ लेना " मैंने थोड़ा झिझकते हुएकहा "तुम् उसकी टेंशन मतलो हम् लेडीज बार्गेनिंग मे एक्सपर्ट होती हें " फूफी नें मुस्कुरा केँ जवाब दिया औऱ वापसशॉप कि तरफमुड़ गयीँ,। भारीमन सें, मे वाहन केँ शोरूम मे पहुँचा, बारिश अबतेज़ होँ कर मेरी भावनाओं कों प्रतिबिंबित कररही थि।
जब मैंने वंहा मम्मी कां नाम औऱ बुक कि गई गाड़ी कां विवरण दिया तोँ शोरूम केँ सेल्समैन नें मुझे भ्रम औऱ सहानुभूति केँ मिश्रण सें देखा। उसने अपने रिकॉर्ड जांचे औऱ गंभीरता सें सिर हिलाया। "हाँ, सर, मिस रोमा केँ नाम पर्र" उसनेकहा। "हम् पिछले पांच दिनों सें उन तक पहुंचने कि कोशिश कररहे हें, मगर उनका नंबर नहि मिलरहा हैं। इसलिये हमनेउसे किसी औऱ कों दे दिया हैं। "
मैंने उसे समझाया कि जिस नंबर पऱ वे पहुंचने कि कोशिश कररहे हें वो मेरी माँ कां थां औऱ वो अबइस दुनिया मे नहि रहीं, उनके जाने केँ बाद सें उनका मोबाइल बंद हैं।
स्थिति कि गंभीरता औऱ भि बढ़ गई। "मेरेपास दूसरा मॉडलकब होगा?" मैंने पूछ लिया
उन्होंने दृढ़ता सें उत्तर दिया, "नई खेपआने मे पांचदिन औऱ लगेंगे। "
"मगर.मगर मुझेदो दिनों मे इसकी ज़रूरत हैं" मैंने उसे अपनी तात्कालिकता केँ बारे मे बताया।
"माफ़ करेंसर, अभि कोई वैसा मॉडल उपलब्ध नहि हैं, आप् चाहें तौ दूसरे मॉडलों पर्र विचार कर सकते हें" उसने उत्तर दिया।
मैंने अपनी चिंताओं कों नियंत्रित करतेहुए एक् गहरी सांसली "मे कल आपकेपास वापस आऊंगा, मुझे दूल्हे केँ परिवार केँ संगइस पर्र चर्चा करनी पड़ेगी" मैंने उससेकहा।
"कोईबात नहि सर, हमारे पास जौ भि मॉडल उपलब्ध हें कारों केँ उनकी सूची कीमत केँ संग दि गई हैं, बस मुझेइस नंबर पऱ फोन करें औऱ इनमे सें कोई भि मॉडल हम् नेक्स्ट डे डिलीवर कर देंगे" उसने मुझे एक् पैम्फलेट देतेहुए कहा।
मैंने सिर हिलाया, "मे तुम्हें कल मोबाइल करता हूं" मैंने उससेकहा। "ओकेसर, " उसनेकहा औऱ मे वंहा सें निकल गय़ा।
मे लगातार हौ रही बारिश मे बाहर् निकला, बूँदें मेरी त्वचा पऱ उस दर्द कि छोटी-छोटी यादों कि तरहचुभ रहीथीं जोँ मे अपने अंदरजी रहा थां। बाज़ार रंगों औऱ ध्वनियों सें धुंधला थां, मगर मे जौ कुछ भि सुन सकता थां वो मेरी मां कि आवाज़ कि गूँज, उसकी अनकही इच्छाएँ थीं जौ अबजेल कि सज़ा कि तरह महसूस होँ रहीथीं।
मे भीड़-भाड़ वाली सड़कों पर्र घूमता रहा, मेरी आँखें सूची मे मौजूद वस्तुओं कि दुकानों पर्र नज़र डालती रहीं - चमचमाते शोरूम केँ संग फर्नीचर कि दुकान, जगमगाती रोशनी केँ संग इलेक्ट्रॉनिक्स कि दुकान, चमकदार डिस्प्ले केँ संग आभूषण कि दुकान। प्रत्येक खरीदारी मेरी अपनी इच्छाओं केँ ताबूत मे एक् कील थि, एक् मूक स्वीकृति कि मे जिस स्त्री सें प्रेम करता थां उसे किसी अन्य पुरुष सें विवाह करतेहुए देखने जारहा थां।
मैंने कुछ सामान जैसा कि गुप्ता जी नें लिस्ट मे मेंशन किया थां कि खरीदारी कि औऱ सब विक्रेताओं कों निर्धारित तिथि पऱ शादी स्थल पऱ फर्नीचर औऱ इलेक्ट्रॉनिक्स पहुंचाने कां निर्देश दिया, तब तक बारिश बंद हौ चुकी थि।
मैंने दूकान केँ अंदर सोनिया कि प्रफुल्लित आवाज़ सुनीं, उसकी हँसी मेरेदिल कि उथल-पुथल सें बिल्कुल विपरीत थि। उसकी ध्वनि सन्नाटे कों भेदरही थि, एक् एहसास कि जिंदगी किसीख़ास केँ जानेबाद भि निरंतर चलता रहता हैं, कि सबसे अंधकारमय वक्त मे भि खुशी केँ क्षणमिल जाते हें। मैंने एक् गहरी साँसली, जोँ आने वाला थां उसकेलिए स्वयं कों मजबूत कर लिया।
अपनीतरफ देखता पाकर रोमा उसमें इधर-उधर घूमने लगी, कपड़ा उसके चारों ओरहवा मे झूमरहा थां.
"कैसीलग रही हैं दि ?" सोनिया नें पूछा, उसकी आवाज़ आशा सें भरी हुइ थि।
"बहोत सुन्दर, " मे कहने मे कामयाब रहा, मेरी आवाज़ भावना सें भर्राई हुईँ थि।
रोमा कि नज़रें मेरी नज़रों सें मिलीं, उसकी आँखों कि उदासी मेरी आँखों कां आईना थि। वो जानती थि कि भइया केँ स्नेह केँ मुखौटे केँ पीछे ख़्वाहिश औऱ प्यार कां अथाह सागर थां जिसेदूर रखने केँ लिए हम् दोनों संघर्ष कररहे थें। लहंगा उसके उभारों सें चिपका हुआ थां, जोँ उसकी उन्हीं विशेषताओं कों उजागर कररहा थां जिन्होंने महीनो तक मेरे विचारों औऱ सपनों पऱ कब्ज़ा जमा केँ रखा थां।
जैसे हि वो शीतल फूफी औऱ सोनिया कों कपड़ा दिखाने केँ लिए मुड़ी, मे ये नोटिस किए बिना नहि रहसका कि उसके ब्लाउज कां कपड़ा उसकी भारी चूचियों पऱ किसतरह सें दबावडाल रहा थां। कपड़े कि जकड़न उस सामाजिक बाधा कि याद दिलाती थि जिसने हमेजकड़ रखा थां, सामाजिक मानदंडों केँ अनुसार हम् कभी भि भइया-बेहन सें ज्यादा नहि होँ सकते थें। मेरामन अंदर हि अंदरचीख रहा थां, प्रेम कि उन सीमाओं कों तोडना चाहता थां पर्र मे ऐसा करने मे असमर्थ थां।
रोमा नें मेरी नज़रों कों उसकी भारी चूचियों कों घूरते हुएपकड़ लिया औऱ एक् समय केँ लिए दूकान मे सन्नाटा पसर गय़ा। हम् दोनों जानते थें कि कपड़ा मात्र कपड़ों कां एक् टुकड़ा नहि थां बल्कि उन बाधाओं कां प्रतीक थां जोँ हमें बांधे हुएथीं। उसने एक् गहरी साँसली, उसकी चूचियां औऱ भि ज़ादा बहार कों उभरआयी, ब्लाउज औऱ ज़्यादा खिंच गय़ा।
"सभीठीक हैं बस ब्लाउज थोड़ा टाइट हैं फूफी" रोमा नें शीतल फूफी कि तरफ देखते हुएकहा
"मुझे देखने दो, " शीतल फूफी नें रोमा केँ पासआते हि अपनी आँखें सिकोड़ते हुएकहा।
"हाँ, ये थोडा टाइट तौ लगरहा हैं, " वोँ बुदबुदायी, उनकी उंगलियाँ ब्लाउज केँ निचले छोर कों चतुराई सें खींच केँ देखरही थीं। "बेहनजी आप् टेंशन मतलो उसकी फिटिंग आपके अनुसार हौ जाएगी" ब्लाउज कि फिटिंग कां सुनकर पीछे सें सेल्समेन बोला
ब्लाउज वास्तव मे तंग थां, मगर तनाव केवल कपड़े मे नहि थां - येउसी हवा मे थां जिसने हमेंघेर रखा थां। शीतल फूफी कि आँखें मेरीओर घूमगईं औऱ एक् समय केँ लिए मुझेलगा कि वो जानती हें। मगर उन्होंने मुझसे बस इतना हि कहा, "रवि, तुम् बताओ कैसालग रहा हैं?"
मैंने सिर हिलाया "अच्छा हैं फूफी"
"ठीक हैं भैया इसे रेडीकरा दो" फूफी नें सेल्समेन कि तरफदेख करकहा " ठीक हैं बेहनजी, औऱ बताये क्याँ दिखाऊं " सेल्समेन नें जवाब दिया। "बस भैया आप् उन पांच साड़ियों, पांच सलवार सूट औऱ इस लहंगे कां बिल बनवादो " फूफी नें उसे निर्देश दिया"जी ठीक हैं अभि करवाता हूं " कहकर सेल्समेन सब कपडे समेटता हुआ काउंटर कि तरफचला गय़ा।
"रवि, तुम् बिल पे करो हम् मार्किट सें कुछ दूसरी ज़रूरी चीज़ें खरीदने जारहे हें " फूफी नें मुझसे कहा"ठीक हैं फूफी जी आप् चलो मे बिल देकरआता हूं" मैंने जवाब दिया
"तुम् घऱ पहुंचो हम् लोग आँ जायेंगे, रोमा कों कुछ पैसेदे दो शॉपिंग केँ लिए" फूफी नें मुझे समझते हुएकहा। मैंने अपनीजेब सें ५०० रूपये कि एक् गड्डी निकाली औऱ रोमा कि तरफ बड़ाई " यह तोँ बहोत ज़ादा हैं भईया" रोमा नें संकोच करतेहुए कहा"रख लेँ, जितने खर्च होँ जाएकर लेना बाकीबाद मे काम आएंगे " रोमा नें मेरेहाथ सें गड्डी ली औऱ अपनेबैग मे रखली उसकी आँखों मे अभि भि एक् सूनापन थां।
उसकेबाद मे वापस सें बैंक्वेट मे गय़ा औऱ कैटरिंग केँ सभी इंतज़ाम कराकर घऱ आँ गय़ा। रात केँ ९बज चुके थें औऱ वोँ सभी भि घऱ आँ चुके थें। हमने खानां खाया औऱ दिनभर कि थकन केँ कारण मे अपने कमरे मे सोनेचला आया।
आँखों मे भारीपन थां पऱ दिमाग़ मे तूफ़ान सां बदस्तूर जारी थां, तभी मेरेफ़ोन कि घंटीबजी मैंने आधे अधूरे मन सें फ़ोन उठाया, स्क्रीन पऱ देखा तौ वाणी कां नाम थां।
"हेलो, कैसी हैं तूँ ?" मैंने धीमी आवाज़ मे पूछा
"मे ठीक हूं दोस्त, तुम् बताओसभी कैसाचल रहा हैं?" उसने पूछा
"बस बिजी हूं विवाह कि तैयारियों मे" मैंने जवाब दिया
"भाग्य केँ खेल भि निराले होते हें, हें नं ?" वाणी धीमी आवाज़ मे बुदबुदायी
"हाँ, ऐसा हि हैं" मैंने एक् गहरी सांसभर कर जवाब दिया
"कँहा तुम् भईया सें सईंया बनने वाले थें औऱ कँहा बेहन कां मंडपसजा रहे होँ" उसने थोड़े मज़ाकिया अंदाज़ मे कहा
"मैंने तोँ तुझसे पहले हि कहा थां यहसभी इतना आसान नहि हैं" मैंने वाणी कि बात कां सहजता सें जवाब दिया
"पर्र मुझे वाकई तुम्हारे लिए बुरालग रहा हैं दोस्त" उसने थोड़ी सि मायूसी जताई
"अब जौ क़िस्मत मे हैं वोँ तौ भोगना हि हैं, तुझेही तोँ मात्र बुरालग रहा मुझसे पूछ मेरा क्याँ हाल हैं" मैंने अपनेमन कों हल्का करने केँ लिएकहा
"तुम् मुझसे शेयरकर सकते हौ दोस्त, कुछमन हल्का हौ जायेगा " उसने मुझे दिलासा सि दि
"क्याँ शेयर करूँ ? यही केँ मे जब भि उसे देखता हूं तोँ ऐसा लगता हैं जैसे मेरे शरीर कां एक् अंगकोई काट केँ लेँ जारहा हैं" मैंने गहरी सांस छोड़ते हुएकहा
"रियली?" उसने आश्चर्य सें पूछा
"हाँ, क्याँ बताऊँ तुम्हारी तरफ उसकी आँखों कि उदासी केसे मुझेबार बारइस विवाह कों किसी भि तरह सें ख़त्म करने कि गुज़ारिश करती हैं" मैंने एक् औऱ गहरी सांस छोड़ते हुएकहा
"क्याँ सच मे, वोँ दुःखी रहती हैं?" वाणी नें हैरत सें पूछा
"हाँ, बहोत दुःखी जिसे मात्र मे देख औऱ समझपा रहा हूं, सबको लगता हैं कि वोँ मम्मी कि वजह सें दुःखी हैं पऱ नहि वोँ इस विवाह सें खुश नहि हैं" मैंने वाणी कों समझते हुएकहा
"अच्छा, औऱ क्याँ महसूस करते होँ?" वाणी नें पूछा
"बहोत बुरा लगता हैं दोस्त, ऐसे केँ जैसे मेरा जिंदगी रोमा कि विदाई केँ संग ख़त्म हौ जायेगा, ऐसे केँ जैसे मेरे शरीर सें आत्मा हि निकल केँ चली जाएगी, पता नहि तुझेही केसे बताऊँ?" कहते कहते मेरी आवाज़ भर्रा गयीँ, औऱ आंसू कां एक् कतराआँख सें निकलकर मेरेगाल कों भिगो गय़ा।
"ओहरवि, तुम्हे प्रेम हौ गय़ा हैं औऱ इसबार अपनी हि सगी बेहन सें" वाणी कि आवाज़ गंभीर थि "ओहशिट, यह मैंने क्याँ कर दियाआई ऍम सॉरी डिअर, यह सभी मेरीवजह सें हुआ" वाणी कि आवाज़ भि कहते कहते भर्रा गई, थि
"तुम्हारी क्याँ गलती हैं दोस्त, तुमने मुझे मार्ग ज़रूर दिखाया थां पर्र उसपे चलना न् चलना मेरेऊपर निर्भर करता थां, मे हि बहक गय़ा थां" मैंने उसे समझते हुएकहा
"तोड़दो यह विवाह औऱ लेँ जाओउसे भगा केँ कंही अपनेसंग बहोत दूर, रवि" वाणी नें मार्ग सुझाया
"लें जाता दोस्त ज़रूर लें जाता पऱ मम्मी कों दियाहुआ वचन, समाज औऱ ज़िम्मेदारी कि कश्मकश नें बाँध केँ रखा हैं" मैंने कहा
"अरे मां चुड़ाये समाज औऱ दुनिया, तुम् बस वोँ करो जोँ तुम्हारा दिलकहे" वाणी नें झल्लाते हुए जवाब दिया
"इतना आसान होता वाणी तोँ कर लेता पऱ अबयह मुमकिन नहि" मैंने उसे समझाया
"तोँ क्याँ ऐसे हैं सारी ज़िंदगी तड़पते रहोगे?" उसने झल्ला कर पूछा
"अगर ऐसे हि तड़पना लिखा हैं तोँ ऐसे हि सही" मैंने अपने हथियार डालते हुएकहा
"छोड़ दोस्त यहबता तूँ विवाह मे आँ रही हैं नं" मैंने जानबूझकर बात कों बदला क्यूंकि रोमा कां टॉपिक अब असहनीय प्रतीत होनेलगा थां।
"सातंवा महीना चलरहा हैं, डॉक्टर नें सावधानी बरतने केँ लिए बोला हैं, मेरा आनां तौ मुश्किल हि होगा" वाणी नें जवाब दिया
"कोई बात नहि तुँ अपना अच्छे सें ध्यान रख, " मैंने जवाब दिया
"एक् बार औऱ सोचलो, रवि" वाणी फुसफुसाई "अपने प्रेम कों यूँ हि मत जानेदो "
"चल दोस्त बहोत रात हौ गयीँ, हैं, नींद आँ रही हैं बाद मे बात करेंगे" मैंने उसकीबात काटते हुएकहा
"ओकेचलो अपना ध्यान रखना, किसी हेल्प कि ज़रूरत हौ तौ बताना" वाणी नें अपनापन जताते हुएकहा
"बिलकुल, बाई" कहकर मैंने फोनकट कर दि
रोमा औऱ मेरेबीच साझा कियेगए पास्ट केँ कुछ हसीन औऱ उत्तेजक लम्हों कों सोचते हुए मे सो गय़ा।
-------too Be continued------
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
Marmik और karuna से bhar poor पर shayad joo chala गया usse jayada joo h उसकी jayada parwha karna chaiye.
aasman के pita ayese समय mein bi apni lalach mein h ayese aadmi के sath नहीं jana chaiye
Roma ne अपना paksh saf saf रख दिया h तो iska sidha sa matlab h wo नहीं chahti kahi na kahi shayad usse bi ptaa h उसके liye क्या अच्छा h
Kruna say bar pur update bhay Aakash kaa baap aese waqt mai bi lalch dika raha h muze nahee lagta roma sadi k baad vaha kush rha paye ghi Dekte h ab aage kya hotha h
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
बहोत बढ़िया लगा आपको वापसआते देखकर औऱ अपने कमिटमेंट पर्र खरा उतरते हुए देखकर।
रवि साहब कां अपने दिवंगत मम्मी केँ प्रति प्यार, स्नेह औऱ उनके भावनाओं कां सम्मान करतेदेख बहोत हि अच्छा लगा। अपनी माँ कि अंतिम आरजू पुरा करने केँ लिए वोँ अपने प्रेम कां गला घोंटरहे हैं ये वास्तव मे एक् पुत्र केँ लिए बेहतरीन निर्णय हैं।
मगर क्याँ ये वास्तव मे येरवि साहब केँ संगसच निर्णय लगता हैं !
रवि साहब नें अपनी हि बेहन केँ संगतब अश्लील हरकतें कि जब वो सोई हुईँ थि। वोँ अपने हि सगी बेहन केँ संग जिस्मानी ताल्लुकात बनाने केँ लिएहर मर्यादा पार करने पर्र उतारू थें। यही नहीं, उन्होने अपनीकजन बेहन केँ संग सेक्सुअल रिलेशनशिप बनाया जोँ उसके विवाह केँ बाद भि कायम हैं। बल्कि उनकीकजन सिस्टर वाणी उनके हि बच्चे कि माँ बनने वाली हैं।
अगरफिन भि आप् संस्कार औऱ कायदे-कानून, मम्मी कि आखिरी ख़्वाहिश कि बात करने लगते हैं तबइनसभी पर्र तरसआने लगता हैं।
रवि साहब कि मम्मी कि ख़्वाहिश थि कि उनके जीवनकाल मे हि उनकी बेटी कि विवाह हौ जाए। इसकेलिए उन्होने प्रयास भि किया क्योंकि उन्हे इसका आभास होँ गय़ा थां कि वोँ अब केवलचंद दिनो कि हि मेहमान हैं। जोँ सच साबित हुआ।
उन्होने रवि सें कुछ वादे करने कों कहे जिसमे सबसे महत्वपूर्ण थां उनकी बेटी कों दुख नं होँ, वोँ सदैव हंसती मुस्कराती रहे।
मगर रोमा कों इस शादी सें जरा भि खुशी नहीं हैं। उसे उसका होने वाला हसबैंड बिल्कुल हि मनपसंद नहीं हैं।
औऱ सबसे बड़ीबात, रवि साहबखुद गवाह हैं कि रोमा कां ससुराल पक्ष कैसा हैं !
फिनये सभी क्यूं ?
मेरे कहने कां मतलबये नहीं कि रोमा कि विवाह रवि सें हि होँ जाए। रोमा कि विवाह कुछ अरसेबाद किसी औऱ लड़के केँ संग क्यूं नहीं हौ सकती !
रोमा बार-बार अपने हाव-भाव, अपने आंसुओं बल्कि अपने जुबान सें बयांकर रही हैं कि वोँ इस विवाह सें खुश नहीं हैं फिनरवि साहबऐसी हरकत क्यूं कररहे हैं ?
जब स्वयं केँ दामन मे दागलगा हौ तोँ मर्यादा कि सीख नहीं देना चाहिए।
इनका नाता बहुत सेंसेटिव हैं। विवाह-ब्याह कि गुंजाइश हौ हि नहीं सकती। पऱ व्यभिचारित रिलेशनशिप कि सम्भावना सें इंकार नहीं कियाजा सकता।
मगररवि साहबअगर बहोत हि ज़्यादा डेयरिंग नेचर केँ हैं, सेफ गेम्स खेलने मे माहिर हैं औऱ रोमा उनकासंग कंधे सें कंधे मिलाकर देरही हैं तब शायदकुछ अप्रत्याशित ज़रूर हौ सकता हैं।
बहोत हि हसीनभाग भइया।
नायक औऱ नायिका केँ मनः स्थिति कां वर्णन एक् बारफिन सें आउटस्टैंडिंग थां।
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