सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
रोमी कां पतंग कों कुछहद तक ढिल देना औऱ फिन वापस खिंच लेनायही दर्शा रहा हैं कि वो रवि केँ संग रोमांटिक तौ होना चाहती हैं मगर मर्यादा कि अंतिम दिवार नहीं लांघना चाहती हैं। कम सें कमतब तक तौ नहींजब तक दोनो पूर्ण रूप सें चेतना अवस्था मे नं हौ।
वाणी मैडमइस इन्सेस्टियस रिलेशनशिप केँ पुल कां कामकर रही हैं औऱ येपुल तभी साकार रूप लें सकता हैं जब दोनोतट एक् दूसरे केँ संग जुड़ने केँ लिए रेडीरहे।
स्पष्ट जाहिर हौ रहा हैं वाणी औऱ रोमीहर बात एक् दूसरे सें साझाकर रही हैं। इसका साफ-साफ मतलब हैं रोमी इन्सेस्टियस ट्रेन पऱ सफर करने केँ लिए रेडी हैं।
बेहतरीन एपसोड भइया।
bhut chamatkari likha h bhay. Emotional and very heart breaking pr shayad iss liye mummy sabse uper mani jati hhai. wo bachon kaa dasha apne ap jan leti h
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
UPDATE 15:
मसूरी आकर, मैंने स्वयं कों होटल मे काम मे इतने उत्साह केँ संग झोंक दिया कि मे भि आश्चर्यचकित रह गय़ा। रोज़आने जाने वाले गेस्ट्स कि ज़रूरतों औऱ उनके स्वागत मे मे इसतरह सें व्यस्त हुआ केँ वक़्त गुजरने कां पता हि नहि चला। रोज़मर्रा केँ काम मे व्यस्त होकर मेरे अराजक विचारों कों कुछ सांत्वना मिली। रोमा कों पाने कि चाहतें मेरेमन केँ भीतर जौ उथल पुथल मचाये थीं उन्हें मेरी व्यस्तता कि वजह सें उभरने कां मौका नहि मिलरहा थां।
मगरजब रात होती औऱ मेरे होटल केँ कमरे मे शांति छा जाती, तौ रोमा केँ शरीर कि गर्माहट, उसकी त्वचा कि कोमलता औऱ उसके शरीर कि मादक खुशबु कि यादें मेरे दिमाग़ मे छा जाती। मे हाथ मे मोबाइल लेकर पलंग पऱ लेटा रहता औऱ स्क्रीन पऱ उसकानाम देखता रहता। रोमा कों पाने कि मेरी व्याकुलता सामाजिक नियमो कों कोसती रहती।
मेरा अंगूठा कॉलआई बटन पऱ मंडरा कररह जाता, एक् अनचाहा डर मेरेदिल कि धड़कने बड़ा देता। मुझेपता थां कि मुझे उससेबात करनी होगी, उस चुप्पी कों तोड़ने केँ लिए जोँ हमारे चारों ओर एक् दीवार कि तरह ऊँची होँ गयीँ, थि। मगरहर बारजब मे उसका नंबर डायल करने जाता थां, तौ डर मेरेगले मे चिपक जाता थां औऱ वे शब्ददब जाते थें जौ मे बहोत उत्सुकता सें कहना चाहता थां। कांपते हाथों सें मैंने उसका नंबर डायल किया पर्र फिनकॉल आई कनेक्ट होने सें पहले हि मोबाइल काट दिया।
प्रेम औऱ भावनाओं सें भरीउस बगावती रात कों तीन महीने बीत चुके थें, फिन भि उसकी नंगी चिकनी त्वचा कि यादें, उसकी भारी मांसल चूचियों कां एहसास, मेरेमन मे ऐसे ज्वलंत थें मानोकल कि बात हौ। मुझे उम्मीद थि कि टाइम केँ संग, मेरी भावनाओं कि तीव्रता कम हौ जाएगी, अपराधबोध कम होँ जाएगा, औऱ हम् केवल भइया-बेहन बनकरलौट सकेंगे। पऱ हुआ इसके विपरीत, मेरी लालसा औऱ भि मजबूत हौ गई थि, किसी जंगल मे सुलगती आग कि तरह जिसेकोई भि व्यस्तता औऱ काम कां बोझकम नहि कर सकता थां।
मे लगातार वाणी केँ संपर्क मे थां, मसूरी मे अपने जिंदगी कि हरबात, होटल मे होने वालीहर रोजमर्रा कि बात साझा करता थां। वो इकलौती मेरी राज़दार थि, मेरेमन कि आवाज़ थि जिसने मेरे अंतर्मन मे निषिद्ध रोमांस कां बीज बोया थां। वो मेरे भीतर उमड़ते-घुमड़ते भावनाओं केँ उथल-पुथल भरे भंवर कों समझती थि, वही मुझे उम्मीद देती औऱ नए रास्ते सुझाती थि।
"अपनी चाहत पर्र भरोसा रखो, रवि, " वो कहती थि, उसकी आवाज़ मेरी आत्मा पऱ एक् सौम्य मरहम लगाती थि। "तुम् भि जानते होँ कि वो तुम्हे कितना चाहती हैं। मानायह थोड़ा मुश्किल हैं पर्र नामुमकिन नहि। "
कभीकभी काम सें थोड़ी फुर्सत मिलते हि वाणी केँ शब्द मेरेमन मे गूँज उठते थें "वोँ तुम्हारी हैं, केवल तुम्हारी"। मगर मे स्वयं पऱ भरोसा खोताजा रहा थां, मुझे यकीन नहि होता थां केँ मेरी ज़िंदगी मे यहसभी हकीकत मे घटरहा हैं। हमारे बीच सम्बन्धो केँ अदृश्य दायरे थें, एक् ऐसी मर्यादों कि रेखा खिंची थि जिसे एक् बारपार कर दिया तोँ फिन वापसी कां कोई विकल्प नहि थां।
जब भि मे अपनी आँखें बंद करता, तौ रोमा कां चेहरा हि मेरेमन मे किसी रौशनी कि तरह जगमगाने लगता। उसकी आँखें, गालों कि सुर्खी औऱ उसके मुलायम होंठ मुझे अपनेपाश मे जकड़ने लगते। उसकी नंगी कोमल त्वचा कि यादें मेरी आत्मा पऱ एक् निशान कि तरह थि, जिसे सोचकर हि मेरी रगों मे लहू दौड़ने लगता थां।
औऱ फिन, एक् दिनऐसा आया। मम्मी कि कॉलआई नें उस नियंत्रण केँ भ्रम कों तोड़ दिया जौ मैंने बहोत सावधानी सें अपने चारों ओर बनाया थां।
"रवि, केसे होँ बेटा? " उन्होंने फ़ोन पऱ अपनी पतली औऱ कमज़ोर आवाज़ मे पूछा, "मे ठीक हूं मां, तुम् बताओ कैसी होँ?" मैंने जवाब देतेहुए पूछा, "यंहा भि सभीठीक हैं। "मैंने तुम्हे बताना थां कि मैंने रोमा कि विवाह तयकर दि हैं, अगले महीने कि १५ तारीख निकली हैं। तुम् अपने हिसाब सें छुट्टियां लें लेना। " उन्होंने बहोत उत्साह केँ संग पूरीबात बताई थि।
उनके शब्द मेरेसर पर्र हथौड़े कि तरह पड़े। मेरी धड़कने सहसातेज़ होँ गयीँ,, औऱ मेरे चारों ओर कां रूम मुझे घूमता हुआ प्रतीत हुआ। विवाह? रोमा कि? मेरामन मां कि बाकी बातों कों सुनने समझने मे असमर्थ होँ गय़ा, ऐसा केसे हौ सकता हैं? रोमा मेरी हैं, वो किसी औऱ सें विवाह केसेकर सकती थि?
"सचमुच, मम्मी?" मैंने अपनी आवाज़ कों स्थिर रखने कि कोशिश करतेहुए पूछा। "लड़काकौन हैं, क्याँ करता हैं?"
"उसकानाम आकाश हैं, " उन्होंने कहा, उनके स्वर मे उत्साह कां संकेत थां। "वो एक् अच्छा लड़का हैं, एक् सभ्य परिवार सें हैं। उनकी एक् कपड़े कि दुकान हैं। "
मेरादिल ऐसा महसूस हुआ जैसे वो मेरी छाती सें बाहर् निकाला जारहा होँ। आकाश? एक् ऐसानाम जिसका मेरेलिए कोई मतलब नहि हैं, मगर जल्द हि रोमा केँ लिएसभी कुछ हौ जाएगा। मुझे गुस्सा औऱ ईर्ष्या कि लहर महसूस हुई।
"क्याँ रोमा कों मनपसंद हैं?" मे पूछने मे कामयाब रहा, मेरी आवाज़ फुसफुसाहट सें थोड़ी हि ऊपर थि।
"हाँ, उसनेहाँ कर दि हैं, " मां नें उत्तर दिया, उसकी आवाज़ उत्साह सें भर गई। "दोनों कि जोड़ी जंचेगी, तुम् जबघऱ आओगे तौ स्वयं देख लेना"
घऱ। वो जगह जहाँये सभी शुरुआत हुआ, जहाँ हमारी गुप्त लालसा एक् मूक तूफ़ान मे बदल गई थि जौ हमें किसी भि लम्हा अपने आगोश मे भर सकती थि। उसघऱ मे लौटने, रोमा कों किसी दूसरे व्यक्ति कि बाहों मे देखने कां विचार करीब-करीब असहनीय थां। फिन भि, मुझेपता थां कि मुझे जानां होगा। मुझे उसका सामना करना पड़ा, क्योंकि वो मेरी बेहन हैं। '
रोमा कि विवाह कां सुनकर मेरेदिन इसतरह सें कटनेलगे जैसे मेरे जिस्म सें किसी नें मेरी आत्मा खींचली हौ। मे बेमन सें काम मे लगा रहता, दुल्हन केँ लहंगे मे उसकीछवि मेरे अंतर्मन कों झकझोर कररख देती, आकाश कां उसकेहाथ कों थामना औऱ उसके नज़दीक आनां हमारे वर्जित प्यार केँ ताबूत मे कील ठोकने केँ सामान प्रतीत होता।
एक् दिन अपने केबिन मे बैठा अपने विचारों मे गुम लैपटॉप कि स्क्रीन कों ताड़रहा थां, काम करने कां मेरा बिलकुल भि मन नहि थां।
"हे हैंडसम, कँहा खोये होँ?" प्रीती गौर (मेरी hour) नें मेरे केबिन मे एंटर होतेहुए पूछा जिससे मेरी तन्द्रा भंग हुई।
"क.क.कुछ नहि मैम, वोँ बसऐसे हैं" मैंने बात कों टालते हुए जवाब दिया। "मे कुछदिन सें नोटकर रही हूं रवि, तुम् बहोत खोये खोये सें रहते हौ, लञ्च पर्र भि लेटआते हौ, तुम्हारी मंथली रिपोर्ट्स भि इसबार लेट हैं, इस एवरीथिंग ओके?" प्रीती मैम नें मेरे सामने कि कुर्सी पऱ बैठते हुए पूछा।
"यस यसमैम, सभीठीक हैं" मैंने अपने चेहरे पऱ बनावटी हंसी लाने कां प्रयास करतेहुए जवाब दिया।
"देखोरवि, अगरकुछ प्रॉब्लम हैं तोँ तुम् मुझसे शेयरकर सकते हौ, हम् मिलकर कोई सोलुशन ढूंढेंगे" उन्होंने मुझे विश्वास मे लेने कि कोशिश कि।
"नहि.नहि मैम, ऐसी कोईबात नहि हैं वोँ बस मम्मी कि तबियत ख़राब रहती हैं बस इसीलिए थोड़ामन दुःखी थां" मैंने झूठ बोला औऱ असलीवजह कों छुपा गय़ा।
"अरे! इसमें इतनी टेंशन वाली क्याँ बात हैं कुछदिन कां ब्रेक लें लो औऱ मिलआओ अपनी फॅमिली सें" उन्होंने उपाय सुझाया, "हाँमैम सोच तोँ रहा हूं" मैंने जवाब दिया।
"गुड, अब मुझेकल तक मंथली रिपोर्ट्स औऱ परसों तक नेक्स्ट मंथ कि बुकिंग डिटेल्स भेजो उसकेबाद अपनीलीव एप्लीकेशन लेकर आनां" उन्होंने मुझे हिदायत दि औऱ कुर्सी सें उठकर केबिन सें बहारचली गयीं।
मैंने जानबूझकर रोमा कि विवाह कि बात उनसे छुपाई थि जबकि मुझे उन्हें सचबता कर अपनी छुट्टियां एडवांस मे सैंक्शन करा लेनी चाहिए थीं। मे जानबूझकर अपने स्टाफ सें रोमा कि विवाह कों छुपाना चाहरहा थां क्यूंकि अगर मे अपनी बेहन कि विवाह कां ज़िक्र करता तौ फिन बहोत सें लोगों कों वंहा इनविटेशन देना पड़ता औऱ मे नहि चाहता थां केँ कोई वंहाआये।
मैंने सोचा केँ घऱ पहुंचकर अपनी छुट्टियां बाद मे एक्सटेंड करा लूंगा, नहि तौ अनपेड लीव कां ऑप्शन तौ थां हि मेरेपास।
एक् हफ्ते बाद मेरी पांचदिन कि छुट्टियां मंज़ूर होँ गयीँ,। जैसे जैसे रोमा कि विवाह कां दिन नज़दीक आँ रहा थां मेरी बैचनीयां बढ़तीजा रही थि, मे अपने जज़्बातों कों बमुश्किल काबू कियेहुए थां। अकेले मे अपने कमरे मे जब भि उसके बारे मे सोचता मेरी सांसें उखाड़ने लगती औऱ मेरी आँखों सें आंसू बहने लगते.
मेरी छुट्टी सें पहले केँ दिन उत्साह औऱ भय कां एक् अजीब मिश्रण थें। मे रोमा कों फिन सें देखने, उसकी नज़दीकी महसूस करने औऱ उसकी आँखों मे देखने केँ लिए उत्सुक थां, मगर उसकी विवाह कां विचार मेरेहर जागते लम्हा पऱ काले बादल कि तरह मंडरा रहा थां। मैंने स्वयं कों अपनेकाम मे झोंक दिया, अपनी हताशा औऱ ख़्वाहिश कों दबाकर काम मे मन लगाया, ये उम्मीद करतेहुए कि शारीरिक परिश्रम किसीतरह मेरी आत्मा सें उस जुनून कों दूरकर देगा जिसने मुझ पऱ कब्जा कर लिया हैं।
रोमा कि विवाह केँ लिए निकलने सें ठीकचार दिन पहले। दिन कि हलचल मे जब मे अपनेकाम मे व्यस्त थां मेराफ़ोन मेरीजेब मे बजनेलगा। मैंने जेब सें फ़ोन बहार निकाला औऱ स्क्रीन पर्र नज़र डाली औऱ महसूस किया कि मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा हैं। ये रोमा कां नाम थां, जौ अँधेरी पृष्ठभूमि मे आशा कि किरण कि तरह रोशन थां।
मैंने जवाब देने केँ लिए स्वाइप किया, मेरी धड़कनें तेज़ होँ गईं। "हैलो, रोमी, " मैंने अपनी आवाज़ कों संतुलित रखने कि कोशिश करतेहुए कहा।
फ़ोन केँ दूसरे छोर पर्र एक् ठहराव थां, जौ उसकी उखड़ी साँसों कि आवाज़ सें भराहुआ थां। "भईया, " वो फुसफुसाई, उसकी आवाज़ कांपरही थि। "मां कों अटैकआया हैं। "
मेरी दुनिया घूमना बंद हौ गई,। "क्याँ? कब?" मैंने चिल्ला कर पूछा, मेरादिल तेजी सें धड़करहा थां।
"आज सुभह, वो अपने दफ़्तर मे थि, " रोमा कि आवाज़ फुसफुसाहट सें थोड़ी हि ऊपर थि। "उनका BP। बढ़ गय़ा। डॉक्टर नें कहा कि सीरियस हैं। "
मे उसकी आवाज़ मे डर, उसके शब्दों मे कंपकंपी सुन सकता थां, औऱ ये मेरेपेट पऱ एक् मुक्का मारने जैसा थां। "अब कैसी हें वोँ?" मे पूछने मे कामयाब रहा, मेरा दिमाग़ उसके शब्दों केँ निहितार्थ केँ संग दौड़रहा थां।
"वोँ आईसीयू मे हैं, " रोमा नें उत्तर दिया, उसकी आवाज़ मे थकावट झलकरही थि।
मेरादिल धक सें रह गय़ा। "मे निकलरहा हूं, " मैंने जल्दी हि निर्णय लेतेहुए कहा। "तुँ टेंशन मत लेँ मे जल्द सें जल्द पहुँचने कि कोशिश करूँगा। "
अगले 1 घंटे मे मैंने अपनी पैकिंग कि औऱ अपनी इमरजेंसी केँ बारे मे होटल प्रबंधक कों बता केँ मे घऱ केँ लिए निकलपड़ा, मेरे एक् सहकर्मी नें मुझेबस स्टैंड पर्र ड्राप किया। घऱ कि यात्रा अनंतकाल कि तरह महसूस हुईँ, मार्ग कां ट्रैफिक औऱ हार्न कि आवाज़ें मेरेमन मे बेचैनियां बढ़ाती थि।
जैसे हि मे अस्पताल पहुंचा, सफ़ेद दीवारें औऱ एंटीसेप्टिक महक नें भय कि भावना ला दि जोँ ठंडी फुहार कि तरहमुझ पऱ हावी हौ गई। मैंने जल्दी रोमा कों देखा, जोँ आईसीयू केँ बाहर् वेटिंग एरिया मे चिंतित बैठी थि। उसने साधारण सफ़ेद सलवार कमीज़ पहनरखी थि, उसकी आँखें लालथीं औऱ रोने केँ कारण सूजी हुई थीं। उसे इतना नाजुक औऱ असुरक्षित देखकर मेरेमन मे उसकेलिए प्रेम औऱ सुरक्षा कि भावना औऱ भि बढ़ गई।
"रोमी, " मैंने उसकेपास आतेहुए धीरे-धीरे सें कहा। उसनेऊपर देखा, औऱ एक् समय केँ लिए, मैंने उसकी आँखों मे किसी चीज़ कि झलक देखी जोँ आशा, राहत याँ शायद प्रेम भि हौ सकती थि। वो दौड़कर मेरी बांहों मे आँ गई औऱ मैंने उसेकस कर पकड़ लिया, उसकी गर्माहट महसूस होँ रही थि, उसका कांपता जिस्म मेरेबदन सें चिपक गय़ा थां। ये अस्पताल केँ ठंडे, बाँझ वातावरण सें बिल्कुल विपरीत थां।
जैसे हि उसने अपना चेहरा मेरे सीने मे छिपाया, उसकी सिसकियाँ तेज़ हौ गईं। "भैया, " वो चिल्लाई, "मुझेकुछ समझ नहि आँ रहा हैं। "
मैंने उसके बालों कों सहलाया, महसूस किया कि रेशमी बाल मेरी उंगलियों सें फिसलरहे हें औऱ मैंने उसकेकान मे सांत्वना भरे शब्द फुसफुसाए। "घबरामत, सभीठीक हौ जाएगा, " मैंने उसे आश्वासन दिया, फिर भी मेरी अपनी आवाज़ मे संदेह करीब-करीब स्पष्ट थां।
उसकी पकड़ मेरे चारों ओर मजबूत हौ गई औऱ वो मेरे आलिंगन मे कस गई, उसका जिस्म मेरे जिस्म सें मिलकर कांपरहा थां। मे उसकेदिल कि धड़कन कों अपनेदिल कि गति सें मेल खातेहुए महसूस कर सकता थां। उससमय मे, हवा मे व्याप्त भय औऱ हताशा केँ संग, मुझे एहसास हुआ कि उसे मेरी कितनी ज़रूरत थि। वो मुझ पर्र कितना भरोसा करती थि, नं सिर्फ एक् भइया केँ रूप मे, बल्कि एक् विश्वासपात्र, एक् रक्षक औऱ शायद इससे भि कुछ ज्यादा केँ रूप मे।
मैंने उसे दिलासा दि औऱ शांत किया, उसने मुझसे अलग होतेहुए मम्मी कां पूराहाल विस्तार सें सुनाया।
हमने धीमे स्वर मे अपनी मम्मी कि स्थिति, डॉक्टरों कि सलाह केँ बारे मे बात कि। मगरकुछ अनकहे शब्द हमारे बीच भारी थें, उन उथल-पुथल भरी भावनाओं कों हम् दोनों हि मन केँ कोने मे दबाये सहजता सें बातकर रहे थें।
तभी मेरी उम्र कां एक् व्यक्ति अपने पिता केँ संग हमारे पासआया, उनके चेहरे पर्र चिंता कि लकीरें थि। उसने रोमा पर्र एक् चोर नज़र डाली, उसकी नज़रें उसके आँसुओं सें सने चेहरे पर्र टिकगईं, फिन जल्द सें उसने नज़रें घुमाली। मुझे गुस्से औऱ इर्षा कि एक् लहर महसूस हुइ जौ उस आदमी कों रोमा सें दूर धकेलना चाहरही थि। मगर मे जानता थां कि मुझे अपने प्रेम कों पारिवारिक कर्तव्य औऱ सामाजिक मानदंडों कि परतों केँ नीचे छिपाकर रखना होगा।
"हेलो, रवि" व्यक्ति नें अपनाहाथ बढ़ाते हुएकहा, उसकी आवाज़ अस्थायी थि। “मे आकाश हूं। ” मैंने गौर सें उसकीतरफ देखा, उसकी सूरत जानी पहचानी सि लगी, वो पतला औऱ लंबा थां, उसके माथे पऱ बिखरे हुएबाल थें। एक् साधारण चेक शर्ट औऱ जींस पहनेहुए, वो ऐसालग रहा थां जैसे वो अभि अभि कॉलेज सें पासआउट हुआ होँ। जब उसने मुझे रोमा कां हाथ पकड़ते हुए देखा तोँ उसकी आंखों मे जिज्ञासा कां भावझलक रहा थां, शायद ईर्ष्या कां भाव।
मैंने उसकीओर देखा, उसकी नज़रें मेरे औऱ रोमा केँ चेहरे पर्र घूम रहीं थि।
आकाश मुझे कंही सें भि रोमा केँ काबिल नहि लगा, उस तरह सें तौ बिलकुल नहि जौ वास्तव मे मायने रखता थां। हमनेहाथ मिलाया.
उसकी पकड़ मजबूत थि, उसकी आँखें गहरीथीं औऱ उसने पूछा, "वोँ कैसी हें?"
मैंने अपनी आवाज़ धीमी रखतेहुए सिर हिलाया। "फिलहाल तौ स्थिर हैं, डॉक्टर चेककर रहे हें। "
आकाश औऱ उसके पिता, Mr। गुप्ता, मम्मी केँ स्वास्थ्य केँ बारे मे प्रश्न पूछते रहे, उनके चेहरे पऱ चिंता कि लकीरें उभरीथीं संग हि हम् दोनों भइया बेहन कों दिलासा देतेरहे औऱ हर संभव सहायता कि पेशकश कि।
करीब एक् घंटे केँ बाद, Mr। गुप्ता नें दुःखी मुस्कान केँ संग मेरीपीठ थपथपाई। "अब हम् चलते हें, तुम्हे किसी भि चीज़ कि ज़रूरत हौ तोँ कॉलआई करना" उन्होंने कहा, उनकी आँखों मे भइया-बेहन केँ रिश्ते कि समझझलक रही थि। आकाश परेशान लगरहा थां, उसकी नज़र रोमा औऱ मेरेबीच घूमरही थि, इससे पहले कि उसने भि सिर हिलाया औऱ जाने केँ लिए मुड़ गय़ा।
उनके आँखों सें ओझल होते हि रोमा नें कसकर मेरी बांहपकड़ ली, हम् बहुतदेर तक मौन बैठेरहे, मेरेमन मे अपने औऱ रोमा केँ सम्बन्धो औऱ मां कि सेहत कों लेकर विचारों कां एक् रेलाउमड़ रहा थां। रोमा भि शायद वैसा हि महसूस कररही थि।
"हमेंबात करनी चाहिए, " आख़िरकार उसनेकहा, उसकी आवाज़ धीमी औऱ लड़खड़ा रही थि।
मैंने उसके शब्दों कि गंभीरता कों महसूस करतेहुए सिर हिलाया। "उधरचल कर बैठते हें" मैंने कोने मे पड़ी एक् खाली बेंच कि औऱ इशारा करतेहुए कहा। वोँ मेराहाथ पकडे मेरेसंग संगचल दि औऱ हम् दोनों उस कोनेकी बेंच पऱ आकरबैठ गए।
"क्याँ बात हें? रोमी?" मैंने पूछा, मेरी आवाज़ धीमी औऱ सौम्य थि।
रोमा नें गहरी साँसली, उसकी आँखें मेरी तलाश मे थीं। "मुझे इससे विवाह नहि करनी, " वो फुसफुसाई, उसकी आवाज़ अस्पताल मे रात केँ सन्नाटे मे सुनाई देरही थि।
उसकी बातें सुनकर मेरादिल धड़कउठा। "क्याँ मतलब?" मैंने अपनी आवाज़ कों शांत रखने कि कोशिश करतेहुए पूछा।
"मेरा मतलब हैं, " उसने कहना शुरुआत किया, उसकी आँखें मेरी आँखों सें हट हि नहि रहीथीं।
अचानक, एक् नर्सहमे खोजते हुए वंहाआयी "ओह, तुम् उधर बैठे हौ, " उसनेकहा, उसकी आवाज़ मे तात्कालिकता कां संकेत थां। "तुम्हारी मां तुम् दोनों केँ लिएपूछ रही हैं। "
रोमा औऱ मैंने एक्-दूसरे कों देखा, हमारी बातचीत केँ अनकहे शब्दघने कोहरे कि तरहहवा मे लटकरहे थें। हम् जल्द सें खड़े हौ गए, औऱ नर्स केँ पीछे पीछेचल पड़े उसकी एड़ियाँ शांत गलियारे मे थिरकरही थीं, उसकी सैंडल कि हील कि टकटक अस्पताल मे गूँजरही थि।
जैसे हि हम् ICU केँ पास पहुँचे, मुझे अपनेपेट मे एक् गांठ सि महसूस हुई। द्वार (दरवाज़ा) खुला, औऱ एंटीसेप्टिक कि महक एक् लहर कि तरहमुझ पऱ छा गई। वो अस्पताल केँ पलंग पऱ लेटी हुइ थि, विभिन्न मशीनों सें चिपकी हुईँ थि, उनका चेहरा पीला औऱ ऑक्सीजन मास्क सें ढकाहुआ थां।
"मां, " मैंने कहा, मेरी आवाज़ भावना सें भर्राई हुइ थि। उसने धीरे-धीरे सें अपनासिर घुमाया, उसकी आँखें मेरीथीं औऱ फिन रोमा कि ओर बढ़ी।
"बैठो, " उन्होंने कमजोर स्वर मे कहा, हमें अपनेबैड केँ पास वाली बेंच पऱ बैठने कां इशारा करतेहुए। नर्स नें कमरे सें बाहर् निकलने सें पहलेसिर हिलाया, औऱ हमें हार्ट मॉनिटर कि लयबद्ध बीप केँ संग अकेला छोड़ दिया।
जब मम्मी नें अपना ऑक्सीजन मास्क हटाया तौ मेरेहाथ पऱ उसकी पकड़ आश्चर्यजनक रूप सें मजबूत थि। उसकी आँखें मेरे चेहरे कों खोजरही थीं, कुछ अनकहा तलाशरही थीं।
"रवि, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ हड़बड़ी औऱ थकान केँ मिश्रण सें कांपरही थि। "मुझे तुम्हें कुछ बताना हैं। "
मैंने उनकीओर देखा, मेरेपेट मे गाँठकस रही थि। वो संभवतः क्याँ कह सकती हैं जौ इस स्थिति कों औऱ ज्यादा जटिलबना देगी?
"मां, " मैंने शुरुआत किया, मेरी आवाज़ अस्थायी थि। "क्याँ बात हैं, कहो?"
उनकी आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, औऱ एक् लम्हा केँ लिए, मुझेलगा कि वो उन रहस्यों कों देख सकती हैं जिन्हें हम् छिपाकर रखेहुए थें। मगर उसने आहिस्ता सिर हिलाया, उसकी सांसें उथलीथीं। "मेरी अलमारी मे एक् डायरी हैं, " वो फुसफुसाई, उनकी आवाज़ महज एक् सांस थि। "उसमेसभी हिसाब पुस्तक हें"
मेरादिल बैठ गय़ा। क्याँ वो सचमुच यही मुझसे कहना चाहती थि? ऐसे वक्त मे हिसाब पुस्तक? मगर रोमा कि पकड़ मेरे दूसरे हाथ पर्र मजबूत हौ गई, उसकी आँखें समझ सें चौड़ी होँ गईं। वो जानती थि कि इसका क्याँ मतलब हैं। हमारी मां हमेशा रिकॉर्ड रखने मे सावधानी बरतती थीं।
"ठीक हैं, मम्मी, " मैंने सिर हिलाते हुएकहा। "उसे मे देख लूंगा। "
रोमा मम्मी केँ लगभगझुक गई, उसकाहाथ हमारी मां केँ हाथ मे थां। उसके गालों सें आँसूबह निकले, जिससे उसकी त्वचा पऱ झिलमिलाती रेखाएँ रहगईं।
"रोमा, तुम् हमेशा अपने भइया कि बात मानोगी, " मां नें आदेश दिया, उनकी आवाज़ महज फुसफुसाहट थि। "मुझसे वादाकरो। "
रोमा कि आँखें मेरीओर घूमगईं, अनकहा सवालहवा मे लटकरहा थां। "मे वादा करती हूं, मम्मी, " वो बुदबुदायी, उसकी आँखों सें बिना रुके आंसुओं कि धरा बहनेलगी थि।
मम्मी कि आँखों नें मेरी आँखों कों खोजा, "रवि, " उन्होंने कहा, उनकी आवाज़ फुसफुसाहट सें थोड़ी हि ऊपर थि। "मुझसे वादाकरो, तुम् इसे हमेशा खुश रखोगे। "
जैसे हि उसने रोमा कां हाथ मेरेहाथ मे रखा, मेरादिल तेजी सें धड़कने लगा, उसकी त्वचा कि गर्माहट अस्पताल केँ बैड कि ठंडी धातु कि रेलिंग सें बिल्कुल विपरीत थि। मैंने रोमा कि ओर देखा, उसकी आँखों मे आँसूछलक रहे थें, औऱ गंभीरता सें सिर हिलाया। "मे वादा करता हूं, मां, " मैंने बुदबुदाया, मेरी आवाज़ भावना सें भरी हुई थि।
मां कि आँखें बंद हौ गईं औऱ उसने गहरी, उखड़ी हुइ साँसली। कमरे मे तनावदम घोंटने वाला थां, उसके शब्दों कां बोझ एक् भारी कंबल कि तरह हम् पऱ दबावडाल रहा थां। जब हम् उनकाहाथ पकड़कर बैठे थें, तोँ मे आश्चर्यचकित हुए बिना नहि रहसका कि क्याँ वो हमारी भावनाओं केँ बारे मे जानती थि, क्याँ उसने किसीतरह हमारे बीचपनप रहे प्यार केँ बीज कों महसूस कर लिया थां।
कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खुला, औऱ सफ़ेद वर्दी मे एक् नर्स अंदरआई। खाट केँ पासआते हि उसने हमें सहानुभूतिपूर्ण मुस्कान दि। "अब आप् बाहर् वेटकरो, " उसने भारी सन्नाटे कों चीरते हुए धीरे-धीरे सें कहा।
हमने आज्ञा कां पालन किया, जैसे हि हमने गलियारे मे कदमरखा, अस्पताल कि ठंडीहवा हमारे चेहरे पर्र तमाचा माररही थि। तेज़ फ्लोरोसेंट रोशनी नें हर चीज़ कों कठोरबना दिया, स्थिति कि वास्तविकता एक् झटके केँ संग सामने आँ गई।
हम् अस्पताल केँ प्रांगण मे आँ गए, रात केँ ११बजे थें औऱ इक्का दुक्का कर्मचारी हि हमेइधर उधरआते जाते दिखाई देरहे थें। अस्पताल मे चारों औऱ शान्ति थि। ठंडीहवा पेड़ों सें होकर फुसफुसा रही थि, बेंचें ठंडी औऱ सख्तथीं, मगर हमें इसकी परवाह नहि थि।
रोमा मेरीओर झुक गई, उसकासिर मेरे कंधे पर्र थां। हमारे बीच पसरा सन्नाटा, अनकहे शब्दों सें भराहुआ। मे उसकी सांसों कि गर्मी, उसकी त्वचा कि कोमलता औऱ मेरे जिस्म पऱ उसकेबदन कां वजन महसूस कर सकता थां। हम् कई घंटों तक ऐसे हि रहे, ऐसा लगा जैसे जैसे-जैसे हम् एक्-दूसरे केँ दिलों कि स्थिर धड़कन पऱ ध्यान केंद्रित कररहे थें, हमारे बाहर् कि दुनिया समाप्त होतीजा रही थि।
किसी अनहोनी कि आशंका सें दिल मे घबराहट थि। मन सें रहरहकर मां केँ स्वस्थ होने कि प्रार्थनाएं उठरही थीं। अस्पताल कि रात कि आवाज़ें लोरीबन गईं, कभी-कभार पास सें गुजरती नर्स कि हंसी, एक् नवजात शिशु कि दूर सें रोने कि आवाज़, मरीजों औऱ उनके प्रियजनों कि दबी हुइ फुसफुसाहट। इन सबकेबीच, हमें एक् अजीब सि शांति, एक् अपनेपन कां एहसास होँ रहा थां केँ इस कठिनघडी मे हम् एक् दूसरे केँ संग हें।
फिन, वो क्षण बिखर गय़ा। वही नर्सहमे खोजती हुईँ प्रांगड़ मे हमारे पासआयी, उसकी आँखें उसबोझ सें भारीथीं जोँ वो कहने वाली थि। उसने हमारी ओर देखा, औऱ मे उसके चेहरे पऱ उदासी कों देख सकता थां, जौ हानि कि हृदय-विदारक किस्सा कहरहा थां।
"तुम्हारी मां." वो शुरुआत हुई, उसकी आवाज़ धीमी हौ गई।
दुनिया रुक गयीँ,। मुझेलगा कि मेरे नीचे कि जमीन खिसक गई हैं, उसके शब्दों कि ठंडी, कठोर हकीकत दिल मे चाकू कि तरहधंस रही हैं। मेरी दृष्टि धुंधली हौ गई, अस्पताल कि दीवारों कि सफ़ेद दीवारें मेरी आँखों केँ सामने तैरने लगीं।
"सॉरी, " नर्स नें दोहराया, उसकी शांत आवाज़ नें कान मे किसी बेसुरी धुन कि तरह गूंजी। "सुनीता जी नहि रहीं। अभि थोड़ीदेर पहले उनका निधन होँ गय़ा। "
दुनिया अपनी धुरी पर्र झुक गई,। रोमा केँ चेहरे पऱ बदहवासी थि उसनेकस कर मेरी बांहपकड़ ली, उसके नाखून मेरी त्वचा मे गड़रहे थें। कुछ लम्हा केँ लिए हम् दोनों हि स्तब्ध सें अपनी स्थान पर्र जड़ होकररह गए।
"नहि, " रोमा नें हांफते हुएकहा, उसकी आवाज़ अविश्वास सें डूबी हुईँ थि। "ये नहि होँ सकता। मम्मी….!!" रोमा चीखते हुए ICU कि तरफ भागी, मे भि रोमा केँ पीछे पीछे दौड़ा।
हमारी मम्मी, वो स्त्री जौ हमेंइस दुनिया मे लेकरआई थि, हमारे अस्तित्व कां सार, हमें छोड़कर चली गई थि।
हम् ICU मे पहुंचे, जहाँ मम्मी शांत लेटी हुईँ थीं, उनके चेहरे पर्र एक् शांतिपूर्ण अभिव्यक्ति उभरी हुइ थि, जैसे कि उन्हें वो आराममिल गय़ा होँ जिसकी वो इतने लंबे वक्त सें तलाशकर रहीथीं। जोँ मशीनें उसे जीवित रखरही थीं, वे अब शांतथीं, स्क्रीन पर्र रेखाएं सपाटथीं।
रोमा दहाड़े मारकर रोतेहुए मुझसे लिपट गई,, उसने अपना चेहरा मेरे सीने मे छिपा लिया, उसका जिस्म सिसकियों सें भर गय़ा। मैंने उसेकस करथाम लिया, मेरी अपनी आँखों सें आँसूबह रहे थें। हमारे रहस्य कां बोझ, वो बढ़ता प्रेम जिसे हम् दोनों पूरीतरह सें स्वीकार करने सें बहोत डररहे थें, अब मेरेगले मे एक् भारी पत्थर कि तरह महसूस हौ रहा थां।
जैसे-जैसे हम् खाट केँ पास पहुँचे, रोमा कि चीखें तेज़ हौ गईं, उसका पूरा जिस्म दुःख कि तीव्रता सें काँपरहा थां। मैंने उसे कसकर पकड़ लिया, मेरी अपनी आँखों सें आँसूबह रहे थें। हमनेउस स्त्री कों खो दिया थां जिसने हमे बड़ा किया थां, वो स्त्री जोँ हमारे जिंदगी कि नींव थि।
--------too be continued--------
Great and extra erotic. Emotional kaa tadka bi laga diya aapne. Your are expert in making things emotional. shayad ab thora virah kee aag mein jalne kaa waqt h ya phie kuch or. Agala update kaa intejar h
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) – New Episode
bhut hi achchha shandar update। thora emotional thaa lekin aage की story ke liye raah bnaa गया। sayad mummy in dono ke pyaar ke bare mai janti thi तभी jate waqt Roma kaa hanth apne bete ke hanth mai de krr vada le gai। Uski dairy ne sayad sab kuchh likha hu। Ab Roma और hero एक hu sakte he। aasman से shaadi cancel hu jayegi।
सीड्स ऑफ़ लस्ट (Seeds Of Lust) - Continue reading for full story
बहोत हि अद्भुत एपसोड हैं! थोडा bhavnao कां समावेश जायदा रहा ! बहोत अच्छा लिखरहे होँ दोस्त !
Bro eagerly waiting for next update. Want next update too too see how both will handle the situation and avoid the shaadi and also get cosy in this emotional situation
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