मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
भइया
क्याँ लिखते हौ दोस्त
क्याँ क्याँ सिनस लिखते हौ
किस्सा केँ मोड क्याँ मस्त उतारते हौ
आज तक इतनी मदहोश करदेने वाली स्टोरी मैने नहींपढी
सचमुच आपकी जितनी तारीफ करु उतनीकम हैं
एक् रिक्वेस्ट हैं पिक्स ज़्यादा डालीये
बहोत हि गरमागरम कामुक औऱ उत्तेजना सें भरपूर कामोत्तेजक भाग हैं भइया आनंद आँ गय़ा
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-18
सुभह कि पहली किरण खिड़की सें छनकर आँ रही हैं।
कमरे मे हल्की सुनहरी रोशनी हैं।
बैड पऱ माँ-बेटा, दोनों एक्-दूसरे मे सिमटे हुए हें।
सुमन कि आँखें धीरे-धीरे सें खुलती हें। उसके चेहरे पऱ एक् चैनभरी मुस्कान हैं। शुभम अभि भि सुमन केँ ऊपर लेटाहुआ हैं।
उसका भारीबदन सुमन कों सुरक्षा कां अहसास देरहा हैं।
सुमन पूरीतरह नंगी हैं।
उसने अपनी बाहें शुभम कि पीठ पऱ कसरखी हें।
उसकी टांगें नें शुभम कों इर्द गिर्द जकडाहुआ हें।
सुमन नें उसे अपने आप् मे समेटा हुआ हैं।
वो शुभम केँ बालों कों धीरे-धीरे सें सहलाती हैं। (फूक मारती आँ.फ़ू…….) श्भम् कि जुल्फे हिलती हें
शुभम कि गर्म सांसें सुमन कि गर्दन पऱ महसूस हौ रही हें।
वो शुभम कों स्वयं सें औऱ जकड़ लेती हैं।
(सुमनमन मे) …मेराbaby’…सोते हुए कितने प्यारे लगरहे
सुमन: (प्रेम सें शुभम केँ बाल सहलाते हुए) "सुनिए जरा.जाग गए क्याँ आप्?"
शुभम: (सुमन कि गर्दन मे मुँह छिपाते हुए) "हूं। सोनेदे नं दोस्त। "
सुमन: "कितनी देर सोएंगे? देखिए, सूरजकब कां निकलआया हैं। "
शुभम: "निकलने दे। मुझेबस यहीं चिपके रहना हैं। "
सुमन:"बड़े जिद्दी होँ गए हें आप्। रातभर भि सुकून नहि पड़ा क्याँ?"
शुभम: "बिल्कुल नहि। तुँ हैं हि इतनी सॉफ्ट, हटने कां मन हि नहि करता। "
सुमन: (मुस्कुराते हुए) "छोड़िए अब, सभी देख लेंगे तौ क्याँ सोचेंगे?"
शुभम:"कोई नहि देखरहा। तुँ बस मुझेऐसे हि पकड़ केँ रख। "
सुमन: "आप् बहोत शरारती हें। चलिए, अब उठिए औऱ फ्रेश हौ जाइए। "
शुभम: "एक् किसदे पहले.फिन सोचूँगा। "
उम्हा
(शुभम् कों नीचे लेटा केँ सुमनउपर चढ़ बैठती हैं बंदरिया माफिक औऱ उसके सीने मे लेट जाती हैं )
सुमन नें अपनीपकड़ औऱ मजबूत करली औऱ शुभम केँ कान केँ पास धीरे-धीरे सें फुसफुसायी।
सुमन:"ओए मेरे बेबी। इतनी जल्द जाने देंगे क्याँ हम् आपको? अभि तौ बर्थडे पार्टी शुरुआत हुइ हैं!"
शुभम: (हँसते हुए)"अरे, अभि तौ तूँ कहरही थि कि सूरज निकलआया हैं, कोईदेख लेगा!"
सुमन:(नाक सिकोड़ते हुए) "देखने दो! मेरा बेबी हैं, मेरी मर्जी। आप् इतने क्यूट लगरहे हें नं कि मनकररहा हैं आपको कच्चा चबा जाऊं। "
शुभम: "पागल होँ गई हैं क्याँ? औऱ कितना चिपकेगी?"
सुमन: (शुभम केँ गालों कों खींचते हुए)"हाँ, पागल हूं आपकेलिए! सुनिए जरा.दिल कि धड़कनसुन रहे हें? यह मात्र 'शुभम-शुभम' बोलरही हैं। आप् हटोमत, मुझे आपकेऊपर हि लेटे रहना हैं। "
शुभम: "तूँ तोँ सच मे बच्ची बन गई हैं। देख, पसीने सें चिपकरहे हें हम् दोनों। "
सुमन: "तोँ क्याँ हुआ?यह तोँ औऱ भि रोमांटिक हैं। आप् मेरे छोटे सें गोलू-मोलू बेबी हौ न्? बोलिए। हूं न् मे आपकी फेवरेट?"
शुभम: "तुँ मेरी फेवरेट भि हैं औऱ मेरीजान भि। पर्र अबभूख लगी हैं, कुछ खिलाएगी?"
सुमन: (शरारत भरी नजरों सें देखते हुए)"भूख लगी हैं? तोँ खाइए नं। मना किसने किया हैं? मे तोँ यहीं हूं, पूरी कि पूरी आपकी!"
शुभम: "तूँ सुधरेगी नहि नं?"
सुमन: "बिल्कुल नहि! अभि तौ औऱ तंग करना हैं आपको। रुकिए, भागिए मत."
सुमन नें शुभम कों फिन सें अपनीओर खींचउसे अपनेउपर लिटा लिया औऱ उसके पूरे चेहरे पर्र नन्हीं-नन्हीं किसेस करनेलगी।
शुभम नें जैसे हि उठने कि कोशिश कि, सुमन नें अपनी टांगें उसकेऊपर औऱ कसलीं औऱ बच्चों कि तरह मुँह बनाकर उसे वापस अपनी छाती सें चिपका लिया।
सुमन: (मचलते हुए)"ओए बेबी। कहां जारहे होँ? अभि तौ मैंने आपको परमिशन हि नहि दि!"
शुभम:"अरे बाबा, प्यास लगी हैं। गलासूख रहा हैं मेरा। "
सुमन:"झूठ! बहाने बनारहे हें आप्। मुझसे दूर दौड़ना हैं नं? गंदे बच्चे होँ आप्। "
शुभम: (हँसते हुए) "पगलू, पानी पीने केँ लिए तोँ छोड़ना पड़ेगा न्? तूँ तोँ ऐसे चिपक गई हैं जैसे फेविकोल होँ। "
सुमन: (अपनी उँगलियाँ शुभम केँ सीने पर्र घुमाते हुए)"हाँ, मे फेविकोल हि हूं। औऱ आप् मेरे प्यारे सें डब्बे। अब चिपके रहिए चुपचाप। सुनिए जरा। आप् मुझेछोड़ केँ जाओगे तोँ मे रो दूँगी, सच्ची!"
शुभम: "तुँ तोँ डरारही हैं मुझे। अच्छा बाबा, नहि जारहा। अबखुश?"
सुमन: (खिलखिलाकर) "बहोत खुश! मेरा क्यूट सां बेबी। अच्छा सुनिए। एक् गेम खेलें?"
शुभम:"अब कौन सां गेम?"
सुमन: (शरारत सें उसकीनाक खींचते हुए) "जोँ पहले हिलेगा, उसे दूसरे कि हरबात माननी पड़ेगी। औऱ जौ जीतेगा। उसे एक् बड़ा वाला सरप्राइज मिलेगा!"
शुभम: "तूँ तौ बहोत शातिर हैं। तुझेही पता हैं मे हिलूँगा हि। "
सुमन: "तोँ हारमान लीजिए न्! बोलिए— 'सुमन बेबी, मे आपका गुलाम हूं'। "
शुभम:"चल हट! मे नहि बोलने वालाऐसा कुछ। "
सुमन: (उसके कंधे पऱ हल्का सां दाँत काटते हुए) "बोलिए नं। वरना मे ऐसे हि काटती रहूँगी। बेबी कों क्रोध आँ रहा हैं अब!"
सुमन कि आँखों मे इससमय गजब कि चमक औऱ मस्ती थि। वो शुभम कों एक् लम्हा केँ लिए भि स्वयं सें अलग नहि होने देना चाहती थि।
Suman(ma)
सुमन तौ शुभम सें ऐसेखेल रही थि जैसे वोँ कोई खिलौना होँ
सुमन: (शुभम कि छाती पऱ अपनी उँगलियों सें गोल-गोल निशान बनाते हुए) "सुनिए जरा। आप् हारमान रहे हें नं? बोलिए कि आप् मेरे बेबी हें। "
शुभम: (हँसते हुए औऱ स्वयं कों छुड़ाने कि नाकाम कोशिश करतेहुए) "अरे दोस्त, तुँ तोँ सच मे चिपकू होँ गई हैं। अच्छा बाबा, मे तेरा बेबी हूं। अब तौ छोड़दे?"
सुमन:(जोर सें 'नां' मे सिर हिलाते हुए) "बिल्कुल नहि! अभि तौ सजा बाकी हैं। आपने मुझसे दूर जाने कि कोशिश कि थि नं? अब आपको यहीं लेटे रहना पड़ेगा। पूरेदिन!"
शुभम: "पूरेदिन? पागल हैं क्याँ? भूख सें पेट मे चूहेकूद रहे हें। "
सुमन: (मचलते हुए औऱ अपनी टांगें उसकेऊपर औऱ कसतेहुए) "चूहों कों कूदने दीजिए! मेरेपास तोँ एक् बड़ा वाला चूहा हैं जिसे मे अभि प्रेम करने वाली हूं। ओए बेबी। आप् इतने हैंडसम क्यूं होँ? मुझे बहोत लस्ट आँ रहा हैं आप् पर्र। "
शुभम: "लस्ट? तुँ तौ एकदम देसी विलेन बनरही हैं। "
सुमन: (खिलखिलाकर) "हाँ! मे आपकी प्यारी वाली विलेन हूं। औऱ आप् मेरे कैदी। सुनिए जरा.अगर मे आपकोयहा सें जाने नं दूँ, तौ क्याँ करेंगे आप्?"
शुभम: "तौ मे भि तेरी यहींपकड़ केँ रखूँगा। तुँ समझती हैं कि केवल तुँ हि शरारती हैं?"
सुमन: (आँखें मटकाते हुए) "अच्छा? दिखाइए फिन। कितनी ताकत हैं मेरे बेबी मे?"
सुमन नें जानबूझकर अपना चेहरा शुभम केँ औऱ लगभगकर लिया, उसकी सांसें शुभम केँ चेहरे पऱ महसूस होँ रहीथीं। वो अपनीनाक शुभम कि नाक सें रगड़ने लगी औऱ बच्चों जैसी चुलबुली आवाज़ मे बोलि:
सुमन: "छोटा बेबी। प्यारा बेबी। मेरा शुभम बेबी! चलिए, एक् प्यारी सि प्रॉमिस करिए कि आप् हमेशा मेरेऊपर ऐसे हि सोएंगे। "
शुभम: "हमेशा? फिन तोँ हम् दोनों हि बेड सें कभी नहि उठ पाएंगे। "
सुमन: "तौ मत उठिए! मुझे तोँ बस आप् चाहिए। नंगे-पुंगे, केवल मेरेपास!
शुभम नें हार मानकर बेड सें उठने कि कोशिश कि, मगर सुमन तौ जैसे गोंद कि तरह उससे चिपकी हुइ थि।
शुभम:"अरे दोस्त, अब तोँ छोड़दे! पेट मे गुड़-गुड़ हौ रही हैं, मुझे फ्रेश होने जानां हैं। "
सुमन: (मुँह फुलाकर औऱ बाहें औऱ कसकर) "नहि! कहीं नहि जानां हैं आपको। मुझे छोड़कर अकेले-अकेले कहां भागरहे हें आप्?"
शुभम:"अरे पगली, टट्टी करने जानां हैं! वहा भि संग चलेगी क्याँ?"
सुमन: (शरारत भरी आँखों सें देखते हुए औऱ चुलबुली आवाज़ मे) "हाँ! क्यूं नहि? मे भि आऊँगी। बेबी अकेला केसे जाएगा? डर लगेगा न् आपको?"
शुभम: (हैरानी सें) "क्याँ? तूँ पागल होँ गई हैं क्याँ सुमन? लज्जा कर थोड़ी, टट्टी करनेजा रहा हूं मे!"
सुमन: (हँसते हुए औऱ पेर पटकते हुए) "लज्जा कैसी?कल रात तोँ सभी लज्जा हवा हौ गई थि। सुनिए जरा। मे तोँ आऊँगी हि आऊँगी। मे वहा बैठकर आपको देखूँगी औऱ बातें करूँगी। "
शुभम:"छी दोस्त! तुँ सच मे बच्चा बन गई हैं। वहा स्मेल आएगी, तुँ भाग जाएगी स्वयं हि। "
सुमन: (शुभम कि पीठ पऱ चढ़तेहुए) "बिल्कुल नहि भागूँगी! आपकेपास सें तौ मुझे खुशबू आती हैं। चलिए, मुझे अपनीपीठ पर्र उठाकर लें चलिए। बेबी कों पॉटी करानी हैं न्!"
शुभम: "तुँ नहि सुधरेगी। चलफिन, गिरेगी तौ मत कहना। "
शुभम नें हारमान ली औऱ सुमन कों अपनीपीठ पऱ लादकर नंगी हालत मे हि बाथरूम कि तरफबढ़ा। सुमन उसकी गर्दन कों चूमरही थि औऱ बच्चों कि तरह "हुर्रे, हम् पॉटी करनेजा रहे हें!" चिल्ला रही थि।
शुभम जैसे हि कमोड पऱ बैठा, सुमन उसके सामने हि जमीन पऱ उकड़ू (squat) बैठ गई औऱ बड़ी मासूमियत भरी पऱ बेहद शरारती नजरों सें उसे ताकने लगी।
शुभम: (हैरान होकर)"अरे दोस्त सुमन, तुँ सच मे यहींबैठ गई? जा न् बाहर्, स्मेल आएगी। मुझे प्रेशर नहि बनेगा ऐसे। "
सुमन: (खिलखिलाकर औऱ जीभ निकालकर) "क्यूं नहि बनेगा? मेरे बेबी कि पॉटी भि तोँ मेरी हैं। सुनिए जरा। निकालिए नं, मे देखूँगी कि मेरा बेबी कितनी गंदी औऱ बदबूदार टट्टी करता हैं। "
शुभम: (गुस्से औऱ चिढ़ मे) "छी! पागल होँ गई हैं क्याँ? कितनी गंदी बातें कररही हैं। हटयहा सें, दिमाग़ मतचाट। "
सुमन: (मचलते हुए औऱ शुभम केँ घुटनों कों सहलाते हुए)"ओह होँ। क्रोध आँ गय़ा? बेबी कों क्रोध आता हैं तोँ औऱ भि प्यारा लगता हैं। हटूंगी तोँ बिल्कुल नहि। मे तौ यहीं बैठूँगी औऱ आपकी 'पॉटी' कि खुशबू लूँगी। बोलिए न्। आँ रही हैं क्याँ? निकालो न् जल्द, पूरापेट खालीकर दो मेरे सामने। "
शुभम: (मुँह फेरते हुए) "तूँ सच मे घटिया औऱ नीच हौ रही हैं सुमन। हट जा वरना मे उठ केँ चला जाऊँगा। "
सुमन: (बेबी वॉइस मे पर्र गंदे शब्दों केँ संग) "कहां जाओगे? पिछवाड़े मे दबा केँ रखोगे क्याँ? निकाल दो नं सारागंद। मे तोँ यहीं देखूँगी कि मेरे शुभम कां पिछवाड़ा कितना गंदा होता हैं। हगिए न्। शरमा क्यूं रहे हें? कलरात तौ बड़ेशेर बनरहे थें, अब टट्टी करने मे लज्जा आँ रही हैं?"
शुभम:"शट अप दोस्त! तुँ बहोत अधिकगिर रही हैं अब। यहसभी क्याँ बकवास हैं?"
सुमन: (शरारत सें ऊपर देखते हुए) "बकवास नहि हैं, यह तौ मेरा प्रेम हैं। मे तौ आपकेपाद (fart) भि सूंघूँगी। बेबीपाद मारो न्। जोर सें! मुझे सुनना हैं कि मेरा बेबी कितना हंगामा मचाता हैं। "
सुमन नें अपनीनाक शुभम केँ पैरों केँ पास लेँ जाने कां नाटक किया औऱ गंदी सि शक्ल बनाकर उसे औऱ अधिक चिढ़ाने लगी। शुभम बेचारा गुस्से औऱ लज्जा केँ मारेलाल होँ रहा थां, मगर सुमन कों जैसे इसमें हि सबसे ज़्यादा आनंद आँ रहा थां
शुभम नें जैसे हि अपनी क्रिया पूरी कि, सुमन कि आँखों मे एक् अजीब सि, बच्चों जैसीचमक आँ गई। वो जल्दी उठी औऱ शुभम कों उठने हि नहि दिया।
शुभम: (गुस्से औऱ झुंझलाहट मे) "होँ गय़ा दोस्त! अब तौ बाहर् जा, मुझे धोनेदे। तूने तोँ तमाशा बनारखा हैं। "
सुमन: (मचलते हुए औऱ शुभम केँ कंधों कों पकड़कर वापस बिठाते हुए)"ओए! कहां जारहे हें आप्? अभि तौ मेनकाम बाकी हैं। रुकिए, मे धोऊँगी आपका पिछवाड़ा। "
शुभम: (हैरान औऱ एकदमलाल होकर) "क्याँ? पागल हौ गई हैं क्याँ सुमन?यह क्याँ गंदी हरकत हैं? मे बच्चा नहि हूं अब, हाथ मतलगा देना!"
सुमन: (चुलबुली औऱ शरारती आवाज़ मे) "क्यूं नहि हूं? मेरेलिए तौ आप् वही छोटे सें गोलू-मोलू बेबी होँ। याद हैं, बचपन मे केसे टांगें उठा-उठा केँ हगा करते थें? तब भि तौ मे हि साफ़ करती थि न् आपकी टट्टी?"
शुभम: "वोँ बचपन थां! अब मे बड़ा हौ गय़ा हूं। लज्जा कर थोड़ी, कितनी घिनौनी बात हैं यह। "
सुमन: (गंदे शब्दों कां इस्तेमाल करतेहुए औऱ पानी कां मगहाथ मे लेतेहुए) "बड़ा-वड़ा कुछ नहि! कलरात तोँ बड़ा 'मर्द'बन रहे थें, अब पिछवाड़ा साफ़ कराने मे नानीमा याद आँ रही हैं? चुपचाप बैठे रहिए, वरना मे जबरदस्ती हाथडाल दूँगी। मुझे देख्ना हैं कि मेरा बेबी कितना गंदा होकर बैठा हैं। "
शुभम: "सुमन, मे सच मे चिल्ला दूँगा! हटयहा सें, छी दोस्त!"
सुमन: (हँसते हुए औऱ मग सें पानी गिराने कां नाटक करतेहुए) "चिल्लाइए! सबकोपता चलना चाहिए कि शुभम बेबी अपनी टट्टी साफ़ नहि करपारहा। सुनिए जरा। धीरे-धीरे सें अपनी रसीली गाँड ऊपर उठाइए, मे रगड़-रगड़ केँ साफ़ करूँगी जैसे बचपन मे करती थि। एकदम चकाचक कर दूँगी आपके गंदे पिछवाड़े कों। "
सुमन बिल्कुल नहि मानी औऱ घुटनों केँ बल बैठकर शुभम कि जाँघों कों फैलाने लगी, उसकी हरकतें एकदम ज़िद करने वाले बच्चे जैसीथीं मगर बातें बेहद कामुक औऱ गंदी
सुमन नहि मानी शुभम् कि गांड पानी सें साफ़ करने केँ बाद कुल्ला करनेवाश बेसन मे गए(वहा भि सुमन शुभम् कि पीठ मे चढ़ केँ गायी बच्ची बन गायी )
(शुभम, सुमन दोनों कुल्ला कररहे थें तौ सुमन नें फिन घिनौनी हड़कते करने कि सोची सुमन कि फैंटसिस हि इतनी जायदा थि कि सुभम कों सभी पागलपैन लगता थां कभीकभी)
शुभम नें जैसे हि बेसिन केँ पास जाकर पानी कां मग उठाया, सुमन उसकेठीक नीचे घुटनों केँ बलबैठ गई औऱ अपना मुँह पूराखोल दिया।
सुमन: (नज़रें ऊपर टिकाकर, मासूमियत औऱ लस्ट केँ संग) "सुनिए जरा। बेसिन मे मत फेंकिए। मेरे मुँह मे थूकदो नाँ बेबी!"
शुभम: (लस्ट औऱ गुस्से केँ मिले-जुले अहसास मे) "पागल हौ गई हैं क्याँ? कुल्ला हैं मेरा, गंदा पानी हैं। "
सुमन: (मचलते हुए)"वही तौ चाहिए! अपने बेबी कां जूठा पीना हैं मुझे। थूकिए न् पूरागंद मेरे मुँह मे। "
शुभम: (ज़ोर सें कुल्ला करके सीधा उसके मुँह मे थूकते हुए)"यह लें! पी लेँ इसे, मादरचोद रंडी कहीं कि!"
सुमन: (हँसते हुएथूक निगल गई औऱ होंठ चाटने लगी)"अहह। बहोत टेस्टी हैं! औऱ गाली दीजिए न्, अच्छा लगरहा हैं। "
शुभम: (उसका चेहरा दबोचकर) "गांडवी हैं तूँ! भोसड़की, एकदम छिनाल बन गई हैं मेरी। "
सुमन: (खिलखिलाकर) "हाँ, मे हूं! आपकी अपनी छिनाल। औऱ बोलिए न्। औऱ क्याँ हूं मे?"
शुभम: "कुतिया हैं तुँ! अपनी औलाद कां गंदचाट रही हैं, लज्जा नहि हैं तुम को?"
सुमन: (शरारत सें आँख मारकर) "लज्जा कैसी? बेबी कां गंद तोँ प्रसाद हैं। लीजिए, एक् बार औऱ थूकिए। अभि तौ प्यास बाकी हैं!"
सुमन नें फिन सें मुँहखोल दिया औऱ शुभम केँ पैरों कों सहलाने लगी। उसकी आँखों मे इससमय अपनी मर्यादा भूल जाने कां नशासाफ दिखरहा थां।
सुमन कि आँखों मे अब औऱ भि गहरानशा थां, वो घुटनों केँ बल बैठी शुभम केँ चेहरे कों ताकरही थि।
सुमन: (शुभम कि जांघों कों सहलाते हुए) "सुनिए जरा.अब बहोत होँ गय़ा बेसिन-बेसिन। मुझे यहींपटक दो न् फर्श पऱ!"
शुभम: (लस्ट मे अंधा होकर) "यहीं? गीले फर्श पर्र, रंडी?"
सुमन: (मचलते हुए औऱ अपनीपीठ फर्श सें सटाते हुए)"हाँ! यहीं गंदे मे। मारिए मुझे। रगड़ दीजिए एकदम। अपनीइस छिनाल कों अपनी औकात दिखा दीजिए। "
शुभम: (उसकेबाल दबोचकर) "सच मे पागल होँ गई हैं तुँ, भोसड़की! अपनी हि औलाद सें यहसभी करवारही हैं?"
सुमन: (खिलखिलाकर औऱ टांगें फैलाते हुए)"हाँ, क्योंकि मे आपकी गांडवी हूं न्! पटकिए मुझेजोर सें। हड्डी-पसली एक् कर दीजिए अपनेइस बेबी कि। "
शुभम:(उसे फर्श पर्र जोर सें पटकते हुए)"यह लें फिन! लेँ आनंद अपनीइस गंदीजिद कां। "
सुमन: (सिसकते औऱ हँसते हुए)"अहह। औऱ जोर सें! गाली दीजिए नं बेबी। बोलिए कि मे कितनी बड़ीनीच हूं। "
शुभम:"नीच नहि, तुँ तोँ एकदम बाजारू छिनाल हैं! अपनी हि कोख सें जन्मे कों अपनी जंघों केँ बीच लें रही हैं। "
सुमन: (आँखें बंद करके लस्ट मे डूबते हुए) "उफ़्फ़.यही सुनना थां। अब औऱ मत रुकिए। ठोक दीजिए अपनीइस कुतिया कों!"
बाथरूम कि दीवारें उनकी सिसकियों औऱ गंदी गालियों सें गूँज उठीं। सुमन कां चेहरा उस टाइम किसी मासूम बच्चे जैसा थां, मगर उसकी बातें औऱ डिमांड्स उतनी हि ज़्यादा लस्ट सें भरी हुईँ थीं।
शुभम नें सुमन कां चेहरा जोर सें दबोचा औऱ अपना लन्ड उसके मुँह मे ठूस दिया। सुमन कि आँखों मे लस्ट औऱ बच्चों जैसी शरारत अब पूरीतरह समर्पण मे बदल गई थि।
शुभम: (गुस्से औऱ लस्ट मे चिल्लाते हुए)"यह लेँ! चूस लन्ड मेरा, मादरचोद रंडी! तुम कोयही चाहिए थां नं?"
सुमन: (मुँह मे लन्ड लिएहुए अजीब सि आवाज़ें निकाल रही थि, पऱ उसकी आँखों मे गजब कि खुशी थि) "उममम.अहह."
शुभम: (बालों कों पीछे खींचते हुए)"चूस इसेजोर सें, भोसड़की! अपनी औलाद कां गंद चाटने मे आनंद आँ रहा हैं तुम को?"
सुमन: (हँसने कि कोशिश करतेहुए औऱ चुलबुली आवाज़ मे थूकते हुए)"हाँ बेबी। बहोत स्वाद हैं। अपनी छिनाल कों औऱ दीजिए न्!"
शुभम: (जोर-शोर सें धक्के मारते हुए) "गांडवी कहीं कि! तूँ मम्मी हैं याँ कोई बाजारू छिनाल? देख केसेगले तक लेँ रही हैं। "
सुमन: (मुँह सें बाहर् निकाल कर हांफते हुए) "मे तोँ आपकीसभी कुछ हूं! कुतिया बनालो मुझे, पऱ रुकना मत। ठोकते रहो अपनीइस रंडी कों!"
शुभम:"चुप कर! अधिकमत बोल वरना यहीं मुँहफाड़ दूँगा तेरा। "
सुमन: (मचलते हुए)"फाड़ दीजिए! अपनेइस बेबी कां सभीकुछ लेँ लूँगी मे। औऱ गाली दीजिए। मुझेनीच बोलिए, मुझे बहोत आनंद आँ रहा हैं। "
शुभम कां क्रोध औऱ लस्टचरम पर्र थां, वो लगातार उसे गंदी गालियां देरहा थां औऱ सुमनहर गाली कों किसी इनाम कि तरह हँसकर स्वीकार कररही थि।
शुभम: (गुस्से औऱ हवस मे पागल होकर)"यह लें, घोंटइसे! अपनी औलाद कां पूरा लन्ड उतार लें अंदर, मादरचोद रंडी!"
शुभम नें अपना लन्ड सुमन केँ गले मे गहराई तक लें जाकर स्थिर कर दिया। सुमन कां दम घुटने लगा, उसका चेहरा नीला पड़नेलगा औऱ ऑक्सीजन केँ लिए उसकाबदन छटपटाने लगा। वो चाहकर भि सांस नहि लें पारही थि, मगर उसकी आँखों मे कोईखौफ नहि थां।
सुमन: (सांस रुकने केँ बावजूद, आँखों मे लथपथ खुशी केँ आँसू आँ गए) "उममम.उघघ."
उसकी आँखों सें ढलकते हुए आँसू गालों पर्र बहनेलगे, जोँ दर्द केँ नहि बल्कि एक् अजीब सि रूहानी तृप्ति औऱ लस्ट केँ थें। उसे अपनी औलाद केँ हाथों इसतरह घुटने मे परमसुख मिलरहा थां।
शुभम: (गालियाँ देतेहुए औऱ धक्के मारते हुए)"देख केसेतड़प रही हैं भोसड़की! दम निकलरहा हैं पऱ मज़ा पूरा चाहिए तुझेही। चूसइसे, अपनी अंतिम सांस तक चूस मेरी छिनाल!"
तभी शुभम केँ जिस्म मे एक् तेज कंपनहुआ औऱ वो सुमन केँ मुँह केँ अंदर हि डिस्चार्ज होनेलगा।
शुभम:"यह लेँ! पीजा सारागंद, गांडवी कहीं कि! अपनीकोख सें जन्मे कां मालचाट अब। पूरी भोसड़की हैं तुँ, एकदमनीच छिनाल!"
शुभम नें अपना लन्ड बाहर् नहि निकाला, बल्कि सुमन केँ मुँह कों अपने हाथों सें औऱ कसकरबंद कर दिया ताकि वो एक् बूंद भि बाहर् नं निकाल सके। सुमन नें उन आँसुओं औऱ घुटती सांसों केँ बीच भि मुस्कुराने कि कोशिश कि, जैसे वो इस गंदी औऱ पवित्र सजा कों पाकर धन्य होँ गई हौ, वो पूरापी गायी
शुभम कां जिस्म ढीलापड़ा औऱ उसने अपना लन्ड सुमन केँ मुँह सें बाहर् निकाला। सुमन फर्श पर्र गिरपड़ी, लंबी-लंबी सांसें लेनेलगी, मगर उसके चेहरे पऱ एक् रूहानी चैन औऱ बड़ी सि मुस्कान थि
सुमन: (हाफते हुए औऱ खिलखिलाकर) "अहह। मज़ा आँ गय़ा बेबी!यही। यही जीवन चाहिए थि मुझे। आपकी गालियां, आपकायह क्रोध औऱ यहगंद। बसयही मेरी जन्नत हैं। "
शुभम कां क्रोध अब आरामसे ठंडा हौ रहा थां। सुमन कि आँखों मे खुशी केँ आँसू औऱ उसकायह पागलपन देखकर उसकादिल थोड़ा पसीज गय़ा। उसने धीरे-धीरे सें सुमन कां चेहरा अपने हाथों मे लिया।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे) "दोस्त सुमन। सॉरी। मुझे इतना ज़्यादा नहि बोल्ना चाहिए थां। मैंने तुम्हे बहोत गंदी गालियां दीं, तुम्हे दर्द भि हुआ होगा। "
सुमन: (शुभम केँ हाथों कों चूमते हुए औऱ बच्चों कि तरह मचलकर) "शशश। माफीमत मांगिए मेरे बाबू!यह गालियां तोँ मेरेलिए म्यूज़िक जैसी हें। आप् मुझे जितना 'रंडी' औऱ 'छिनाल' बोलते हें, मुझे उतना हि अपनापन महसूस होता हैं। मे तोँ आपकी हि हूं न्, जैसे चाहो वैसेरखो। "
शुभम: "तुँ सच मे पागल हैं। इतनासभी होने केँ बाद भि हँसरही हैं। "
सुमन:(खड़ी होकर शुभम केँ गलेलग गई, दोनों अभि भि नंगे औऱ गीले थें) "हाँ, आपके प्रेम मे पागल!अब सुनिए जरा। आप् बहोत थकगए होंगे न्? चुपचाप यहींखड़े रहिए, मे अपने बेबी कों स्वयं नहलाऊँगी। एक्-एक् अंगसाफ़ करूँगी जैसे छोटे बच्चों कों नहलाते हें। "
शुभम: "स्वयं नहा लूँगा तोँ अच्छा रहेगा, तुँ फिनकुछ शरारत करेगी। "
सुमन: (शरारत सें आँख मारकर औऱ शॉवर चालू करतेहुए) "शरारत तोँ होगी हि! हाथ लगाइए मुझे। देखिए कितनी ठंडी होँ रही हूं मे। चलिए, अब मम्मा अपने बेबी कों नहलाएगी। "
सुमन नें गुनगुना पानीखोल दिया औऱ शुभम केँ शरीर पर्र साबुन मलनेलगी, उसकी छुअन मे अब वासना केँ संग-संग एक् अजीब सां ममताभरा चुलबुलापन भि थां
शॉवर सें गिरता गुनगुना पानी दोनों केँ नंगे जिस्म पऱ फिसलरहा थां। सुमन नें साबुन कां झाग अपने हाथों मे लिया औऱ शुभम केँ सीने पर्र मलनेलगी, जैसे किसी छोटे बच्चे कों नहलारही होँ।
सुमन: (खिलखिलाते हुए औऱ बच्चों जैसी आवाज़ मे) "ओए मेरे बेबी। देखिए कितना साराझाग बन गय़ा! अब मेरा गोलू-मोलू बेटा एकदम साफ-सुथरा होँ जाएगा। "
शुभम: (हल्की मुस्कान केँ संग) "तुँ सच मे नहि सुधरेगी। अभि थोड़ी देर पहले जौ गालियां खारही थि, औऱ अबफिन सें मम्मा बन गई?"
सुमन: (शुभम कि पीठ रगड़ते हुए औऱ चुलबुली शरारत सें) "वही तौ आनंद हैं! कभी आपकी रंडी, कभी आपकी मम्मा। सुनिए जरा.हाथ ऊपर उठाइए, बगलसाफ करनी हैं। मेरा बेबी गंदा होकर घूमेगा तौ लोग क्याँ कहेंगे?"
शुभम:(हाथ ऊपर करतेहुए) "लोग क्याँ कहेंगे यह तोँ तूँ भूल हि जा सुमन। जोँ हम् कररहे हें, वोँ सुन लेंगे तोँ पागल होँ जाएंगे। "
सुमन: (मचलते हुए औऱ अपनी छाती शुभम सें सटाकर) "होनेदो पागल! मुझे तौ बस अपनेइस 'बाबू' कि सेवा करनी हैं। अच्छा सुनिए। एक् प्रॉमिस करिए, कल भि आप् मुझेऐसे हि गंदी-गंदी गालियां देंगे न्? मुझे 'छिनाल' सुनना बहोत अच्छा लगता हैं आपके मुँह सें। "
शुभम:(उसे अपनी बाहों मे घसीटकर) "तूँ सच मे 'गांडवी' हैं। जितना मारो, उतना हि चिपकती हैं। "
सुमन: (हँसते हुए औऱ उसका चेहरा चूमकर) "हाँ! क्योंकि मे आपकी अपनी हूं। अब आँखें बंद करिए, शैम्पू डालरही हूं। रोनामत वरना मम्मा औऱ डांटेगी!"
सुमन नें शुभम केँ बालों मे उंगलियाँ फँसाकर बड़े प्रेम सें मसाज करना शुरुआत किया। पानी कि बूंदें उनके चेहरों पर्र गिररही थीं। सुमन बीच-बीच मे जानबूझकर शुभम केँ कानों केँ पास फुसफुसाती औऱ फिन बच्चों कि तरह हंसने लगती
नहने केँ बाद दोनों नें एक् दूसरे कों टावल सें पोछा शुभम नें बोला दोस्त सुमनभूख तेजलगी हैं कुछबना दोस्त
सुमन - बाबू क्याँ खाओगे आप्
शुभम् - पनीर बनाय ?
सुमन - हम्मओके बेबीमगर पनीर तोँ हैं हि नहि आपको हि लाना पड़ेगा बाहर् जाके
शुभम् “मे लें आता हूं “ बोल केँ जानेलगा तोँ सुमन लिपट गई शुभम् बोला“यू गय़ा औऱ यूआया “
इधर होटल केँ कमरे मे सुमन पूरीतरह सें घरेलू औऱ चुलबुली 'मां' वालेमोड मे आँ गई थि। उसने रसोई एरिया मे सारे मसाले कूटकर रेडीकर रखे थें औऱ बार-बार दरवाजे कि तरफदेख रही थि।
सुमन: (मसाले कि खुशबू सूंघते हुए औऱ स्वयं सें बातें करतेहुए) "अरे, यह मेरा बेबी कहां रह गय़ा? कब सें पनीर लेने गय़ा हैं। ग्रेवी तौ एकदम फर्स्ट क्लास सजधजकर हैं, बस पनीर डलने कि देर हैं। "
उसनेलाल रंग कि साड़ी पहनरखी थि बिल्कुल भारतीय नारी औऱ गुनगुनाते हुए शुभम कां प्रतीक्षा कररही थि।
उधरबीच मार्ग पऱ शुभम केँ पसीने छूटरहे थें। उसने देखा कि सामने उसके बापू किसीकाम सें खड़े थें। शुभम कां दिल जोर-शोर सें धड़कने लगा।
शुभम(मन मे): "शिट! पिताजी यहा क्याँ कररहे हें? अगर इन्होंने मुझेदेख लिया तौ गजब हौ जाएगा। घऱ पे तोँ बोला थां कि कॉलेज केँ काम सें बाहर् जारहा हूं। औऱ यहाहाथ मे पनीर कां थैला लेकरघूम रहा हूं। "
शुभम नें जल्दी अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमाया औऱ एक् गली मे छिप गय़ा। उसकामन खराब होँ गय़ा थां कि अब होटल वापस केसेजाए, क्योंकि बापूउसी रास्ते पऱ खड़े थें।
लगभगआधा घंटाबीत गय़ा,
सुमन(मन मे ):। कहां रहगए आप्? पनीरला रहे हें याँ भैंस कां दूध निकालने गए हें? जल्दआइए वरना मे सारा मसाला स्वयं हि चाट जाऊँगी! आपकी बेबी भि कों भूखलगी हैं अब। "
शुभम् इधरमन मे सोचते हुए (पिताजी यहा केसे आख़िर पिताजी यहा क्याँ कररहे औऱ घऱ मे नीतू…नीतू कां क्याँ मुझे अभि हि घऱ केँ लिए निकलना होगा माँ.नहि अब तोँ वोँ मेरी पत्नि हैं सुमन कों बताना होगा )
शुभम जैसे-तैसे छिपते-छिपाते, पिछवाड़े केँ रास्ते सें बदहवास होकर कमरे मे घुसा। उसका चेहरा सफेद पड़ाहुआ थां।
सुमन: (हँसते हुए औऱ उसकीतरफ दौड़कर) "आँ गए मेरे पनीरचोर! लाइए जल्द.अरे, आप् ऐसे कांप क्यूं रहे हें? जैसेकोई भूतदेख लिया होँ?"
शुभम: (गुस्से औऱ घबराहट मे पनीर कां थैला पटकते हुए)"भूत नहि, यमराज देख लिया! बाहर् मार्ग पर्र पिताजी खड़े हें। दिमाग़ कि दही होँ गई मेरी। "
सुमन: (चौंककर, पर्र फिन शरारत सें हँसते हुए) "क्याँ? बापू?ओह रब्बा! फिन तौ बड़ा मज़ा आएगा। अगर वोँ यहा आँ गए तौ हम् दोनों कों इसी हालत मे देख लेंगे। "
शुभम: "तुझेही मजासूझ रहा हैं? पकड़गए तौ जूते पड़ेंगे मुझे औऱ तुम्हें."
सुमन: (शुभम केँ गले मे बाहें डालकर, चुलबुली आवाज़ मे) "औऱ मुझे क्याँ? मुझे तोँ औऱ मज़ा आएगाजब आप् मुझे बचाओगे। छोड़िए न् हरामी कों। अभि तोँ हम् यहा हें। चलिए, पहलेयह पनीर बनाइए, फिन देखते हें बापू कां क्याँ करना हैं।
खानां-पीना ख़त्म करके शुभम नें जैसे-तैसे अपनाडर काबू किया औऱ दोनों होटल सें चेक-आउट करके ट्रेन मे बैठगए। ट्रेन कि खिड़की वालीसीट पऱ सुमनजमी हुई थि, जबकि शुभम अभि भि बाहर् केँ नजारों मे अपने पिताजी कां चेहरा ढूंढरहा थां।
ट्रेन कि रफ्तार बढ़रही थि औऱ सुमन कां चुलबुलापन भि। उसनेबड़े मजे सें अपना पांव शुभम केँ पेर पऱ टिका दिया।
सुमन: (खिलखिलाकर) "सुनिए जरा। अभि तक उन्हीं ख्यालों मे खोए हें? चेहरा तौ देखिए अपना,
शुभम: (चिढ़कर औऱ आवाज़ धीमी रखतेहुए) "चुपकर दोस्त सुमन! तुम्हे मजाकलग रहा हैं?मुझे समझ नहि आँ रहा पिताजी यहा पे केसे
सुमन: (बेबाकी सें उसकाहाथ पकड़कर अपनी जांघ पऱ रखतेहुए) "अरे तौ क्याँ हुआ?उस हरामी बातफेर सें मत करिए मेराखून जलाने बड़ा आनंदआता हैं क्याँ आपको
शुभम: "तुँ नहि समझेगी। तुँ तौ अपनी हि धुन मे रहती हैं। यहा मेरीजान सूखीजा रही हैं। "
सुमन: (टेढ़ी मुस्कान केँ संग, शुभम केँ कान केँ पास झुककर) "जान सूखीजा रही हैं याँ कलरात वालानशा उतर गय़ा? सुनिए। अगर पकड़े भि गए, तौ मे हूं नं? मे कह दूँगी कि मेरा बेबी मेरेसंग थां, किसी औऱ केँ संग नहि। मे नहि डरतीउस हरामी सें समझे नां आप्, बस आपसे औऱ नीतू सें मतलब हैं अब
शुभम: (गुस्से मे हाथ हटाते हुए)"यही तौ प्रॉब्लम हैं! थोड़ा सीरियस होँ जा, घऱ पहुँचने वाले हें। "
सुमन: (बच्चों कि तरह मुँह बनाकर) "हूं। बड़ेआए सीरियस वाले! अभि बाथरूम मे तोँ बड़े 'मादरचोद-मादरचोद' चिल्ला रहे थें, अब भीगी बिल्ली बनगए? डरपोक बेबी!
शुभम: "वोँ बाथरूम थां, यह दुनिया हैं। फर्कसमझ। "
सुमन: (शुभम कि टी-शर्ट केँ अंदरहाथ घुसाकर उसे गुदगुदी करतेहुए) "मेरेलिए कोई फर्क नहि हैं। आप् मेरे होँ औऱ मे आपकी। अब मुस्कुराइए, वरना मे यहीं सबके सामने आपकोकिस कर लूँगी! बोलूँ क्याँ जोर सें— 'यह मेरा प्यारा वाला बेबी हैं'?"
शुभम: (घबराकर उसकाहाथ पकड़ते हुए) "नहि! पागलमत बन, लोग देखरहे हें। "
सुमन: (हँसते हुए) "तोँ देखिए न्! मुझे तौ मज़ा आँ रहा हैं आपको तड़पाने मे। चलिए, एक् प्यारी सि स्माइल दीजिए वरना अगली गाली मे स्वयं आपको दूँगी!
शुभम् थोडा चिड़चिड़ा गय़ा थां
शुभम झुंझलाहट अब बेकाबू मे थां। ट्रेन केँ हंगामा औऱ सुमन कि लगातार जारी बेबाक शरारतों नें उसका दिमाग़ सुन्न कर दिया थां। जैसे हि सुमन नें उसकी टी-शर्ट केँ अंदरहाथ डाला, शुभम कां हाथ बिजली कि फुर्ती सें उठा।
चटाक!
एक् तेज आवाज़ गूंजी औऱ सुमन कां चेहरा एक् तरफझटक गय़ा। ट्रेन केँ डिब्बे मे लम्हा भर केँ लिए सन्नाटा पसर गय़ा।
सन्नाटा औऱ आंसू
शुभम कां हाथ कांपरहा थां। उसे अहसास हुआ कि उसने क्याँ कर दिया हैं।
शुभम: (हैरान औऱ पछतावे मे) "सुमन। मे। मेरा वोँ मतलब नहि थां। तूँ मान हि नहि रही थि, मुझेडर लगरहा हैं औऱ तुँ."
सुमन एकदम शांत होँ गई। उसकी वोँ चुलबुली मुस्कान, वोँ चमकती आँखें औऱ वोँ बेबाक अंदाज़ जैसे कहीं गायब होँ गए। उसने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ अपनेगाल पऱ रखा, जहाँ शुभम कि उंगलियों केँ लाल निशान उभरआए थें।
सुमन: (बिल्कुल चुप, पलकें झुकाए हुए) "."
शुभम:"अरे बोल नं कुछ? क्रोध हैं? देख, मे स्ट्रेस्ड हूं पिताजी कों लेकर। "
सुमन नें धीरे-धीरे सें अपनी गर्दन ऊपर उठाई। उसकी आँखों मे अब लस्ट याँ शरारत नहि थि, बल्कि एक् छोटे बच्चे जैसी मासूमियत औऱ गहरीचोट थि। उसकी निचली लिप (labia) कांपने लगी औऱ अगले हि लम्हा उसकी आँखों सें मोटे-मोटे आंसू गिरने लगे।
सुमन: (सिसकते हुए, रुंधी हुइ आवाज़ मे) "गंदे। गंदे हें आप्! बहोत गंदे हें। आपने मुझे मारा?"
शुभम:"सुन तोँ सही."
सुमन: (बच्चों कि तरह फूट-फूट कर रोतेहुए) "नहि सुनना! अपनी प्यारी पत्नि कों कोईऐसा मारता हें? आप्? मे तोँ। मे तोँ बस आपको हंसाना चाहती थि। आप् मुझे 'रंडी' बोलिए, मुझे गाली दीजिए। पऱ ऐसेमत मारिए नं बेबी। "
वोँ अपनी साड़ी केँ पल्लू सें आँखें पोंछने लगी औऱ बच्चों कि तरह हिचकियाँ लेनेलगी। उसका रोना एकदम वैसा थां जैसे किसी छोटे बच्चे कां खिलौना छीन लिया गय़ा हौ।
सुमन: "मे नहि बात करूँगी आपसे। कभी नहि! आप् जाइए अपने बापू केँ पास। मुझे। मुझेघऱ जाकर अकेले सोना हैं। "
शुभम कां दिलबैठ गय़ा। उसनेउसे गाली दि थि, उसे गंदा बोला थां, तब वोँ खुश थि। पर्र इस थप्पड़ नें उसकीरूह कों जैसेडरा दिया थां।
शुभम नें धीरे-धीरे सें उसका कंधा पकड़ा, पऱ सुमन नें झटक दिया औऱ खिड़की कि तरफ मुँह करके सिसकने लगी।
पूरे रास्ते सुमन नें बात नहि किया शुभम सें—
घऱ केँ दरवाजे पर्र ताला लटकादेख शुभम कि सांस मे सांस आई—इसका मतलब थां कि पिताजी अभि तक घऱ नहि पहुंचे थें। मगर सुमन कां चेहरा अभि भि उतराहुआ थां, उसकी आंखों केँ किनारे थप्पड़ कि चोट औऱ रोने कि वजह सें लाल थें।
तभी पड़ोस केँ घऱ सें रेशमा बाहर् निकली। रेशमा, सुमन कि सबसे पक्की सहेली,
रेशमा: (मुस्कुराते हुएपास आतेहुए) "अरे! आँ गए तुम् दोनों? बड़ा लंबा कॉलेज कां काम थां भइया, पूरादिन लगा दिया!"
रेशमा नें शुभम कि तरफ एक् शरारत भरीनजर डाली, जैसेउसे सभीपता हौ कि कॉलेज केँ बहाने यह दोनों कहां गुलछर्रे उड़ारहे थें। फिन उसकीनजर सुमन केँ मुरझाए हुए चेहरे पऱ पड़ी।
रेशमा: "यहलो चाभी, तुम्हारे पापाजी किसी जरूरी काम सें शहर सें बाहर् गए हें, कल सुभह तक आएंगे। पर्र सुमन। तेरी शक्लऐसी क्यूं हैं? जैसे अभि-अभि रोकर आँ रही हौ?"
सुमन नें चाभीली, पऱ कुछ नहि बोलि। उसनेबस एक् ठंडी सांसभरी औऱ बच्चों कि तरह अपनीनाक सिकोड़ ली।
शुभम: (हकलाते हुए) "वोँ। बस थोडा सफर कि थकान हैं रेशमा आंटी। धूप बहोत थि नं। "
रेशमा: (हंसकर) "धूप थि याँ कुछ औऱ? मुझे तौ लगरहा ' शुभम नें अपनी मम्मी कों परेशान किया हैं। क्यूं सुमन? क्याँ बात हैं?"
सुमन: (रुंधी हुइ आवाज़ मे, रेशमा कां हाथ पकड़कर) "रेशमा। यह बहोत गंदे हें। इन्होंने मुझे मारा। ट्रेन मे सबके सामने मुझे थप्पड़ जड़ दिया। "
रेशमा: (हैरान होकर शुभम कों देखते हुए) "क्याँ? शुभम! तूनेहाथ उठाया अपनी मम्मी पऱ? इतनी हिम्मत?"
शुभम् (हैरान होतेहुए कि रेशमा आँटी कों क्यूं बताया ?) सकपका गय़ा
रेशमा- बोल नाँ ?
रेशमा जानती थि कि सुमन कों गालियां औऱ गंदा बोल्ना मनपसंद हैं, पऱ यह थप्पड़ सुमन केँ लिएसजा नहि, बल्कि दिल टूटने जैसा थां। रेशमा नें धीरे-धीरे सें सुमन केँ गाल कों छुआ।
रेशमा: "अरे बाप रे! निशान पड़ गय़ा हैं। शुभम, यह तौ तूने बहोत गलत किया। चल, अबइसे मना, वरना मे तुम्हारी तरफघऱ केँ अंदर नहि घुसने दूँगी। "
सुमन नें सिसकते हुएघऱ कां ताला खोला औऱ बिना शुभम कि तरफ देखे अंदरचली गई। रेशमा दरवाजे पऱ खड़ी शुभम कों ताड़रही थि, जैसेकह रही होँ— 'बेटा, अबइसे संभाल, वरनायह रात भारी पड़ेगी।
शुभम जैसे हि कमरे मे घुसा, उसने देखा सुमनबेड पऱ औंधे मुँह(पेट केँ बल) लेटी हुई हैं। उसका चेहरा तकिए मे धंसा थां औऱ कंधे अभि भि हल्के-हल्के कांपरहे थें।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे) "सुमन.सुन नं। अभि भि क्रोध हैं?"
सुमन नें कोई हलचल नहि कि। वो बस वैसे हि पड़ीरही।
शुभम: "दोस्त, घऱ एकदम खालीलग रहा हैं। नीतू कहां होगी? तुम्हे पता हैं क्याँ?"
सुमन: (रुखे औऱ भारी स्वर मे, ) "जी, मुझे नहि पता। आप् अपनी बेहन कों स्वयं मोबाइल करकेपूछ लीजिए। मे तौ गंदी हूं न्, मुझसे क्याँ पूछना। "
शुभम:"अरे दोस्त, फिनवही बात। मैंने सॉरी बोला तोँ। "
सुमन: (बिना मुँह उठाए) "आप् बाहर् जाइए। मुझे अकेला छोड़ दीजिए। आपकोडर लगरहा थां न्? अब डरिए धीरे-धीरे। मुझे नींद आँ रही हैं। "
शुभम कों समझ आँ गय़ा कि सुमन कां 'बच्चा' वालामूड अब 'गंभीर' होँ गय़ा हैं। वो चुपचाप कमरे सें बाहर् बालकनी मे आँ गय़ा औऱ अपनी बेहन नीतू कों मोबाइल मिलाया।
नीतू सें मोबाइल पर्र बात
शुभम: "हेलो, नीतू? कहां हैं तूँ? घऱ पर्र तालालगा थां। "
नीतू:"अरे भइया! आप् लोग आँ गए? मे तोँ सहेली केँ घऱ बर्थडे जश्न मे आई हूं। बापू नें बताया नहि क्याँ? वोँ भि शहर सें बाहर् गए हें कल तक केँ लिए। "
शुभम: "अच्छा। तोँ तुँ कब तक आएगी?"
नीतू:"आज रात वहीं रुकूँगी। मम्मा कों बता देना। आप् लोग आरामकरो, मे कल सुभह आऊँगी। "
शुभम:"ठीक हैं, ध्यान रखना अपना। "
शुभम नें मोबाइल काटा……….
शुभम् किसीकाम सें बाहर् चला गय़ा
दिन मे कामकरा केँ वो लौटा सीधासाम कों, घऱ कां गेट वोँ बाहर् सें लॉक करके गय़ा थां उसनेगेट खोला औऱ अंदर गय़ा औऱ एक् ठंडी सांसली।
घऱ मे अब मात्र वोँ औऱ रूठी हुईँ सुमन थें। सन्नाटा औऱ भि गहरा हौ गय़ा थां।
शुभम नें गहरा सांस लिया औऱ दबेपैर बेडरूम कि तरफबढ़ा। सुमन अभि भि वैसी हि औंधे मुँह लेटी हुइ थि।
शुभम धीरे-धीरे सें बेड केँ किनारे बैठा। उसने अपनाहाथ सुमन कि पीठ पऱ रखा।
शुभम: "सुमन। प्लीज दोस्त। अबमान भि जाओ। "
सुमन: (कंधा झटकते हुए)"हाथ मत लगाइए। जाइए अपने बापू केँ पास। "
शुभम: (धीमे सें उसकेपास लेटते हुए) "नीतू नहि आँ रही हैं आज। घऱ एकदम खाली हैं। "
सुमन: "तौ मुझे क्याँ? आप् तौ मुझे मारते हें। मे आपकी दुश्मन हूं क्याँ?"
शुभम: (उसकेकान केँ पास जाकर) "नहि, तुँ तौ मेरीजान हैं। मेरा क्यूट सां बेबी हैं। "
सुमन: (सिसकते हुए)"झूठ! बेबी कों कोई थप्पड़ मारता हैं? गाल अभि भि जलरहा हैं मेरा। "
शुभम: (उसकेगाल कों सहलाते हुए) "सॉरी नं। कान पकड़ूँ क्याँ? बोल, जोँ सजा देगी मंजूर हैं। "
सुमन: (तिरछी नजर सें देखते हुए) "सच्ची? जोँ बोलूँगी वोँ करेंगे आप्?"
शुभम: "पक्का! बसयह रोनाबंद करदे। मुझे अच्छा नहि लगरहा। "
सुमन: (मुँह फुलाकर, चुलबुली आवाज़ मे) "तोँ पहले मुझे अपनीगोद मे बैठाइए। जैसे छोटे बच्चे कों बिठाते हें। "
शुभम: (मुस्कुराते हुएउसे घसीटकर अपनीगोद मे बिठा लिया)"यह लेँ! अबखुश?"
सुमन: (शुभम कि गर्दन मे मुँह छिपाकर) "नहि! अभि तौ बहोत सारीसजा बाकी हैं। आपने मेरी आत्मा कों दुखाया हैं बेबी। "
सुमनअब शुभम कि गोद मे पूरीतरह सें चिपक गई थि, मगर उसका चेहरा अभि भि थोडा उतराहुआ थां। उसेपता थां कि शुभमउसे मनाने कि कोशिश कररहा हैं, इसलिये उसने अपनी फरमाइशों कां पिटारा खोल दिया।
सुमन कि ज़िद औऱ नखरे
सुमन: (मुँह बनाकर) "केवलगोद मे बिठाने सें काम नहि चलेगा। मुझे अभि केँ अभि 'गोलगप्पे' खाने हें। तीखे वाले!"
शुभम: (घड़ी देखते हुए)"अरे बाबा, रात केँ 10 बजरहे हें। इस टाइम गोलगप्पे वाला कहां मिलेगा? सभीबंद होँ गए होंगे। "
सुमन: (बच्चों कि तरहपेर पटकते हुए) "मुझे नहि पता! मुझे तौ बसवही खाने हें। बेबी कों भूखलगी हैं, आप् लाकेदो वरना मे फिन सें रोने लगूँगी। "
शुभम: "अच्छा बाबा, शांत हौ जा। मे देख केँ आता हूं। "
शुभम बाहर् गय़ा औऱ बहुतदेर तक भटकता रहा, पऱ जैसा कि डर थां, कोई भि गोलगप्पे कि रेहड़ी नहि मिली। वो खालीहाथ वापसआया।
शुभम: "दोस्त सुमन, कोई नहि मिला। सभी दुकान बढ़ा चुके हें। "
सुमन: (आँखों मे फिन सें आँसू भरकर) "देखा! आप् मुझसे प्रेम हि नहि करते। एक् गोलगप्पा नहि ला सकते मेरेलिए? जाइए, दूर हटिए मुझसे। "
शुभम:(उसे मनाते हुए)"अरे सुन तौ। गोलगप्पे नहि मिले तोँ क्याँ हुआ, तेरी फेवरिट 'चॉकलेट चिप्स' वाली आइसक्रीम लें आया हूं। देख, एकदम ठंडी-ठंडी। "
सुमन: (आइसक्रीम कां डिब्बा देखकर थोड़ी पिघली, पऱ फिन भि नखरे दिखाते हुए) "हूं। आइसक्रीम सें कामचला लूँगी, पर्र खिलाना आपको पड़ेगा। अपने हाथों सें। "
शुभम नें राहत कि सांसली। वो चम्मच सें आइसक्रीम निकाल कर सुमन केँ मुँह केँ पास लें गय़ा।
शुभम:"यह लेँ, मेरा प्यारा बेबी। अब क्रोध थूकदे। "
सुमन: (आइसक्रीम चाटते हुए, शरारत भरी आवाज़ मे) "मम्म। टेस्टी हैं। पऱ सुनिए जरा.यह ठंडी आइसक्रीम खा केँ मुझे बहोत मजा आँ रहा हैं। आप् भि खाओगे?"
शुभम:"हाँ, खिलादे। "
सुमन: (आइसक्रीम अपने होंठों पऱ लगाली औऱ चुलबुली हँसी केँ संग)"हाथ सें नहि! यहा सें खाइए। जैसेकल रातखा रहे थें। "
सुमन कि आँखों मे फिन सें वही 'लस्ट' औऱ मस्ती लौटआई थि। वो आइसक्रीम केँ बहाने शुभम कों फिन सें अपनेजाल मे फंसारही थि सुमन कि शरारत औऱ शुभम कि हवासफिन एक् हुईँ औऱ आहिस्ता दोनों मे फिन चुदाई संग्राम चालू होँ गय़ा
सुमन नें आइसक्रीम कां डिब्बा एक् तरफ पटका औऱ शुभम कि टी-शर्ट फाड़ते हुएउसे बेड पऱ गिरा दिया। उसके चेहरे पऱ अबवही "बेबी" वाली मासूमियत औऱ "छिनाल" वालीहवस कां खतरनाक कॉम्बिनेशन थां।
कमरे कां गंदा मंजर
शुभम नें आव देखा न् ताव, सुमन कों घुटनों केँ बल किया औऱ पीछे सें उसका भारी पिछवाड़ा थपथपाते हुए अपना लन्ड सीधा उसकी बुर कि गहराई मे उतार दिया।
शुभम: (हबक-हबक केँ धक्के मारते हुए)"यह लें भोसड़की! खाअब अपनीसजा। बहोत नखरे दिखारही थि न्?"
सुमन: (सिसकते औऱ बेड कि चादर दबोचते हुए)"अहह। बेबी! औऱ जोर सें। फाड़ दीजिए अपनीइस रंडी कों! गालियाँ दीजिए न्। मुझेनीच बोलिए!"
शुभम:"नीच क्याँ, तूँ तोँ एकदम पैदाइशी गांडवी हैं! अपनी औलाद केँ लन्ड केँ लिए बेचैनी रही हैं मादरचोद। देख केसे पानी छोड़रही हैं तेरी बुर!"
सुमन: (मचलते हुए)"हाँ। मे छिनाल हूं! आपकी पालतू कुतिया हूं। ठोकिए मुझे। अपनी मम्मा कों आज अपनी औकात दिखा दीजिए!"
शुभमउसे बेदर्दी सें हमचरहा थां, थप-थप कि आवाज़ पूरे कमरे मे गूँजरही थि।
खिड़की केँ पीछे कां राज
उधर, घऱ केँ पिछले हिस्से मे, खिड़की कां पर्दा थोडा सां हटाहुआ थां। रेशमा वहीं अंधेरे मे खड़ी थि औऱ अंदर कां सारा नजारा अपनी नंगी आँखों सें देखरही थि।
रेशमा कां एक् हाथ उसकी अपनी बुर पऱ थां, जिसे वो पागलों कि तरह सहलारही थि। उसकी उंगलियाँ गीली हौ चुकीथीं औऱ वो लस्ट मे चूर होकर फुसफुसा रही थि।
रेशमा: (बुदबुदाते हुए)"उफ़। सुमन, तुँ कितनी खुशनसीब हैं। काश शुभम मुझे भि ऐसे हि गालियाँ देकर ठोकता। देख तोँ सही, केसे अपनी मां कों जानवर कि तरहजोत रहा हैं लौंडा। अहह, मेरा तौ पानी निकल जाएगा आजइसे देख-देख कर। "
रेशमा कां बदन कांपरहा थां, वो खिड़की सें चिपकी हुई थि औऱ अंदरचल रहीउस गंदी 'लीला' कां एक्-एक् समय अपनी आँखों मे कैदकर रही थि
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-19
शुभम अपनी मां सुमन कि जाँघों केँ बीच हैं। वो पूरी ताकत सें धक्के लगारहा हैं। रूम सुमन कि सिसकारियों सें गूंजरहा हैं।
"लें औऱ लें, रंडी कहीं कि!" शुभम नें सुमन केँ चेहरे पर्र थप्पड़ जड़ते हुएकहा।
सुमन दर्द औऱ मजे मे दोहरा हौ रही हैं। वो जोर-शोर सें हंसरही हैं।
"हाँ बेटा, औऱ जोर सें! अपनी मम्मी कि फाड़ केँ रखदे!" सुमन नें उसकीकमर कों कसकर पकड़ लिया।
शुभम गालियाँ बकताजा रहा हैं। "भोसड़ी कि, बहोत शौक हैं न् तुम्हें अपने बेटे सें चुदने कां?"
"हाँ, मात्र तेरे सें। तुँ मेराशेर हैं!" सुमनउसे औऱ उकसारही हैं।
बाहर् खिड़की केँ पास सन्नाटा हैं। रेशमा वहा दुबकी हुईँ हैं।
खिड़के केँ कोने सें उसकी आँखें अंदर केँ मंजर पऱ टिकी हें।
उसकी सांसें तेजचल रही हें। उसकाहाथ अपनी सलवार केँ अंदर हैं।
वो अपनी बुर कों पागलों कि तरह रगड़रही हैं।
अंदर सुमन औऱ शुभम केँ बदनआपस मे टकरारहे हें। मांस सें मांस केँ टकराने कि आवाज़ रेशमा कों पागलकर रही हैं।
सुमनजब जबउसे अपने औऱ शुभम केँ बीच कि बाते बताती शुभमउसे केसे बेतहाशा प्रेम करनेलगा हैं।
तब सें हि रेशमा केँ मन मे जलन औऱ चाहत दोनों जन्म लेगी हैं।
'सुमन, तुँ तौ मेरी पक्की सहेली हैं, ' रेशमा नें मन मे सोचा।
उसने अपनी उंगलियों कि रफ्तार बढ़ा दि।
'पर्र शुभम पऱ अब मेरादिल आँ गय़ा हैं। '
वो शुभम केँ चौड़े कंधों कों देखरही हैं। वो उसकी गालियों पर्र मर मिटना चाहती हैं।
रेशमा नें तयकर लिया हैं। वो सुमन कि स्थान लेना चाहती हैं।
अंदर शुभम कां जोशचरम पऱ हैं। वो सुमन कों "छिनाल" बोलकर झटकेमार रहा हैं।
सुमन पागल होकर उसकानाम चिल्ला रही हैं।
बाहर् रेशमा कि आँखें चमकरही हें। वो शुभम कों पाने कां जालबुन रही हैं
अंदर कां हंगामा अब औऱ बढ़ गय़ा हैं। शुभम कि गालियां औऱ सुमन कि आहें एक् होँ गई हें।
सुमन पलंग पर्र पूरीतरह बिखर चुकी हैं। शुभम कां हर धक्का उसेऊपर कि ओर उछालरहा हैं।
"बोल छिनाल, कैसालग रहा हैं अपने बेटे कां लन्ड?" शुभम नें उसकेबाल पकड़कर पीछे खींचे।
"अहह। बहोत गहराजा रहा हैं। औऱ मार मुझे!" सुमन बेधड़क चिल्ला रही हैं।
बाहर् खिड़की पऱ रेशमा कि हालत खराब हैं।
उसकी उंगलियां अब गीली होँ चुकी हें। वो कल्पना कररही हैं कि शुभमउसे गालियां देरहा हैं।
'सुमन कों सभीमिल रहा हैं, औऱ मे यहा मात्र देखरही हूं, ' रेशमा केँ मन मे लालचबढ़ रहा हैं।
उसने अपना दुपट्टा दांतों तलेदबा लिया ताकि उसकी हल्की चीख बाहर् नं निकले।
अचानक शुभम नें सुमन कों पलट दिया। अब वो उसे पीछे सें ठोकरहा हैं।
रेशमा कों शुभम कि पीठ कि मांसपेशियां खिंचती हुइ दिखरही हें।
वो उसकी मर्दानगी देखकर सुन्न पड़ गई हैं।
रेशमा नें मन हि मन एक् फैसला कर लिया हैं।
'सुमन, तूने मुझेसभी बताया, अब मे तेरासभी कुछछीन लूंगी। '
अंदर शुभमअब चरम सीमा पर्र हैं।
उसने सुमन कि गर्दन दबोचली हैं। वो बेतहाशा धक्के माररहा हैं।
सुमन कां जिस्म कांपने लगा हैं। वो डिस्चार्ज होँ रही हैं।
शुभम नें एक् अंतिम जोर कां धक्का मारा औऱ सुमन केँ ऊपर हि ढेर हौ गय़ा।
दोनों हांफरहे हें। रूम पसीने कि महक सें भर गय़ा हैं।
रेशमा खिड़की सें पीछेहट गई। वो अंधेरे मे गायब होँ गई।
उसके चेहरे पऱ एक् शातिर मुस्कान हैं।
अगली सुभह
सुमन किचन मे ब्रेकफास्ट बनारही हैं। उसके चेहरे पर्र कलरात कि थकावट औऱ चमक दोनों साफझलक रही हें। शुभम सजधजकर होकर बाहर् जाने केँ लिए कमरे सें निकलता हैं।
तभी दरवाजे कि बेल बजती हैं। सुमन दरवाजा खोलती हैं, सामने रेशमा खड़ी हैं। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चमक हैं।
"अरे रेशमा, इतनी सुभह?सभी ठीक तोँ हैं नं?" सुमन नें मुस्कुराते हुए पूछा।
"हाँ सुमन, बस रातभर नींद नहि आई, सोचा तुझसे मिललूँ, " रेशमा नें नजरें बचाते हुएकहा। उसकी निगाहें घऱ केँ अंदर शुभम कों ढूंढरही हें।
तभी शुभम जूते पहनते हुए बाहर् आता हैं। रेशमा कों देखते हि वो रुक जाता हैं।
सुमनउसे देखकर प्रेम सें बोलीं, "सुनिए, ब्रेकफास्ट तौ कर लीजिए, फिन जाइएगा काम पऱ। "
रेशमा केँ कानखड़े हौ गए। 'सुनिए?' उसनेमन मे दोहराया। उसेपता हैं कि अकेले मे यह दोनों मर्यादा कि सारी दीवारें तोड़ देते हें।
"नहि माँ, देर हौ रही हैं, बाहर् हि कुछखा लूंगा, " शुभम नें लापरवाही सें कहा।
"अरे बेटा, ऐसे खालीपेट मतजा, " सुमन नें अब स्वरबदल लिया, क्योंकि उसेडर हैं कि रेशमा कुछताड़ नं लेँ। "तुँ हमेशा अपनी मर्जी चलाता हैं। "
रेशमा आगेबढ़ी औऱ शुभम केँ लगभग जाकरखड़ी होँ गई। "शुभम, अपनी मां कि बातमान लेनी चाहिए। औऱ वैसे भि, कहां जारहे होँ इतनी जल्द?"
शुभम नें रेशमा कों ऊपर सें नीचे तक देखा। रेशमा कि साड़ी कां पल्लू थोड़ा ढीला थां।
"काम हैं आंटी, जरूरी हैं, " शुभम नें रूखेपन सें कहा, पऱ उसकी आँखों मे शरारत थि।
तभी अचानक बाहर् सें नीतू कि आवाज़ आई, "माँ, मे आँ गई!"
नीतू अपनी सहेली केँ घऱ सें लौटआई हैं। वो अंदर घुसते हि चहकने लगी।
"अरे रेशमा आंटी, नमस्कार! आप् इतनी जल्दयहा?" नीतू नें बैग सोफे पऱ पटकते हुए पूछा।
"नमस्कार बेटा। बस तेरी मां सें कुछ गप्पे लड़ाने आई थि, " रेशमा नें झूठ बोला।
सुमन नें नीतू कों गले लगाया। "कैसीरही सहेली कि बर्थडे पार्टी?"
"बहोत अच्छी माँ! पर्र घऱ कि याद आँ रही थि, " नीतू नें कहा औऱ फिन शुभम कि तरफमुड़ गई। "भइया, आप् कहां भागरहे होँ? मुझे आपसेकुछ नोट्स चाहिए थें। "
शुभम नें घड़ी देखी। "साम कों बात करेंगे नीतू, अभि मे निकलरहा हूं। "
वो जैसे हि दरवाजे कि तरफबढ़ा, रेशमा कां हाथ गलती सें उसकेहाथ सें टकरा गय़ा। रेशमा केँ बदन मे बिजली दौड़ गई।
शुभम नें उसे तिरछी नजर सें देखा औऱ धीरे-धीरे सें बुदबुदाया, "आता हूं आंटी। "
शुभम केँ जाते हि रेशमा नें सुमन कां हाथपकड़ लिया। "सुमन, तेरा बेटा तौ अबबड़ा होँ गय़ा हैं। बहुत सख्त मिजाज कां हैं। "
सुमन हंसी, "तुम को क्याँ पता रेशमा, वोँ जितना सख्त बाहर् सें हैं, अंदर सें उतना हि जिद्दी हैं। जौ चाहता हैं, वोँ पाकर रहता हैं। "
रेशमा नें मन हि मन सोचा, 'बिल्कुल सहीकहा सुमन, औऱ अब वोँ मुझे चाहिए। '
नीतू किचन कि तरफबढ़ गई, "माँ, भूखलगी हैं, कुछ खाने कों दो नाँ!"
सुमन औऱ रेशमा अब सोफे पऱ बैठी हें। सुमन कों जरा भि अंदाजा नहि हैं कि उसकी सबसे पक्की सहेली उसके हि बेटे पऱ डोरेडाल रही हैं।
किचन मे गरमचाय बनरही हैं। सुमन औऱ रेशमा आमने-सामने बैठी हें। नीतू अंदर अपने कमरे मे कपड़े बदलरही हैं। शुभम जूते पहनकर निकलने हि वाला हैं, पऱ उसकी नजरें बार-बार रेशमा केँ कसेहुए शरीर पऱ टिकरही हें।
सुमन: (मुस्कुराते हुए) "सुनिए, साम कों जल्द आँ जाइएगा। मैंने आपकी मनपसंद कि पनीर कि सब्जी बनाने कां सोचा हैं। "
शुभम: (घड़ी देखते हुए) "कोशिश करूँगा। वैसे भि कल कि थकान अभि उतरी नहि हैं। "
रेशमा: (तिरछी नजर सें शुभम कों देखते हुए) "थकान तोँ होगी हि शुभम। कॉलेज केँ बहाने जोँ बाहर् गए थें, वहा बहोत दौड़-भाग कि होगी नं?"
सुमन: (हल्का सां चौंककर) "हाँ। वोँ तौ हैं। बेचारा बहोत थक गय़ा थां। पर्र तुम्हें केसेपता रेशमा?"
रेशमा: (अपनी साड़ी कां पल्लू ठीक करतेहुए) "अरे, सहेली हूं तेरी। चेहरे कि चमक औऱ थकानबता देती हैं कि रात कैसी बीती होगी। "
शुभम: (रेशमा कि आँखों मे आँखें डालकर) "रात तौ बहोत अच्छी बीती आंटी। बस कुछ 'बाहरी' लोगदखल न् दें तोँ औऱ मजाआता। "
नीतू: (कमरे सें बाहर् आतेहुए) "कौन बाहरी लोग भइया? क्याँ बापूफिन सें कहीं टकरागए थें क्याँ?"
सुमन: (घबराकर) "नहि-नहि नीतू! तेरे बापू कां नाममत लेँ। वो ठरकी इंसान जहाँ भि होता हैं, मूड खराबकर देता हैं। "
रेशमा: (मन मे सोचते हुए)'मूड तौ असली मैंने खराब किया, जब खिड़की सें तुम् दोनों कों नंगा देखा। '
शुभम: (दरवाजे कि ओर बढ़ते हुए) "माँ, मे चलता हूं। आंटी, आप् बैठो। सुमन सें ढेर सारी बातें करना। "
रेशमा: (खड़े होतेहुए) "अरे शुभम, रुको!जरा मुझेगली केँ नुक्कड़ तक छोड़ दोगे? मेरी चप्पल मे कुछ दिक्कत आँ गई हैं, पैदल चलने मे डरलगरहा हैं। "
सुमन: (सहजता सें) "हाँ-हाँ बेटा, छोड़दे इसे। बेचारी सुभह-सुभह आई हैं। "
शुभम: (एक् शातिर मुस्कान केँ संग) "क्यूं नहि? आइये आंटी। मेरी बाइक पऱ पीछे बैठिये। "
रेशमा: (सुमन कि तरफ देखकर) "चलती हूं सुमन। साम कों फिन आऊँगी, कुछराज कि बातें करनी हें। "
नीतू: "मां, यह रेशमा आंटीआज कुछ बदली-बदली नहि लग रहीं? उनकी आँखों मे कुछ अजीब सां हैं। "
सुमन: (संदेहहीन होकर)"अरे नहि, वोँ तौ हमेशा ऐसी हि हैं। तुँ चल, ब्रेकफास्ट कर लेँ। "
बाहर् निकलते हि, जैसे हि शुभम नें बाइक स्टार्ट कि, रेशमा नें पीछे बैठते हुए अपनेहाथ शुभम केँ मजबूत कंधों पऱ रखदिए।
रेशमा: (शुभम केँ कान केँ पास झुककर) "कलरात खिड़की बंद करनाभूल गए थें क्याँ, शुभम?"
शुभम: (हैरान होकर बाइक रोकते हुए) "क्याँ मतलब?"
रेशमा: (हंसते हुए)"सभी देखा मैंने। अपनी मम्मी कों 'रंडी' बोलकर जोँ ठोकरहे थें। बड़ादम हैं तुझमें। "
शुभम: (एकदम ठंडा होकर) "तोँ अब क्याँ चाहती हौ? माँ कों बताओगी?"
रेशमा: (उसकीपीठ पर्र अपनी छातियाँ रगड़ते हुए) "पागल हैं क्याँ? मुझे तोँ बसवही गालियाँ औऱ वही धक्के अपनेलिए चाहिए। सुमन कों पता भि नहि चलेगा औऱ हम् दोनों मजे करेंगे। "
शुभम: (मुस्कुराकर बाइकतेज भगाते हुए) "तौ फिन सजधजकर रहना आंटी। कल रात मां कि बारी थि, आज दोपहर आपकी होगी। "
दोपहर कां टाइम हैं। सुमनदबे पैर रेशमा केँ घऱ पहुँचती हैं। रेशमा अपने कमरे मे अकेले बैठी शुभम कि यादों मे खोई हैं। जैसे हि सुमन अंदर दाखिल होती हैं, रेशमा सकपका जाती हैं।
सुमन: (रेशमा केँ चेहरे कों गौर सें देखते हुए) "रेशमा, तुँ आज सुभह सें कुछ उखड़ी-उखड़ी थि। क्याँ बात हैं?"
रेशमा: (नजरें चुराते हुए) "नहि सुमन, बस ऐसी हि। तबीयत ठीक नहि लगरही। "
सुमन: (उसके कंधे पर्र हाथ रखकर)"झूठ मतबोल। मे तेरी सहेली बाद मे हूं, बेहन पहले हूं। तुँ शुभम कों चाहने लगी हैं नं?"
रेशमा: (हैरान होकर, कांपती आवाज़ मे) "सुमन!यह तुँ क्याँ कहरही हैं? वो तेरा बेटा हैं."
सुमन: (शांत लहजे मे) "औऱ मेरा प्रेमी भि। कलरात तुँ खिड़की पऱ थि, मैंने तुम कोदेख लिया थां। तेरी आँखों कि प्यास मे पहचानती हूं। "
रेशमा: (अचानक फूट-फूट कर रोनेलगी) "मुझेमाफ करदे सुमन! मे स्वयं कों रोक नहि पाई। जब तुँ मुझे बताती थि कि शुभम तेरी केसे पागलों कि तरह प्रेम करता हैं, केसे तुझेही खाट पऱ गालियाँ देकरतोड़ देता हैं। मेरा कलेजा मुँह कों आता थां। "
सुमन:(उसे चुप कराते हुए)"रो मत पगली। "
रेशमा: (सुमन केँ पैरों मे गिरकर) "मे तड़पती थि सुमन! रातों कों उठ-उठकर रोती थि। जब तूँ उसके प्रेम केँ किस्से सुनाती थि, मे अपनी बुर रगड़कर थक जाती थि। मुझेलगा मे तुझसे गद्दारी कररही हूं, पर्र मेरादिल अब मात्र शुभम कों पुकारता हैं। "
सुमन:(उसे उठाते हुए) "मुझेकोई दिक्कत नहि हैं रेशमा। मैंने तुम्हे हमेशा अपनी सहेली सें बढ़कर माना हैं। अगर मेरा बेटा तुम को भि खुशीदे सके, तोँ मुझेजलन क्यूं होगी?"
रेशमा: (उम्मीद भरी आँखों सें) "क्याँ सच मे? तुँ मुझे शुभम केँ संग बाँटने कों रेडी हैं?"
सुमन: (मुस्कुराकर) "हाँ, क्योंकि मे जानती हूं शुभम कों संभालना अकेले मेरेबस कि बात नहि। वो बहोत जिद्दी औऱ गर्म हैं। उसे एक् नहि, दो औरतें चाहिए। "
रेशमा: (दोबारा उसके पांव पकड़ते हुए) "सुमन, तुँ महान हैं! मुझे शुभम चाहिए। बस एक् बारउसे बोलदे कि वो मुझे भि उसीतरह अपना लें, जैसे तुम्हारी तरफ अपनाता हैं। "
सुमन: (उसके आंसू पोंछते हुए) "चिंता मतकर। मैंने उसे पहले हि इशारा कर दिया हैं। आज दोपहर वो यहींआने वाला हैं। बस सजधजकर रह, वो अपनी मां कि सहेली कों छोड़ने वाला नहि हैं। "
रेशमा: (कांपते हुए) "मे उसका प्रतीक्षा करूँगी। उसे कहना मुझे भि वही गालियाँ दे, जोँ तेरी देता हैं। "
सुमन: (हंसते हुए) "वो तौ देगा हि। पऱ यादरख, हम् दोनों संग मिलकर उसेखुश रखेंगे। "
कमरे मे खामोशी हैं, बस रेशमा कि सिसकियां औऱ सुमन कि गंभीर सांसें सुनाई देरही हें। सुमन नें रेशमा केँ कंधे कों मजबूती सें पकड़ा औऱ उसे सीधाखड़ा किया।
सुमन:(कड़क आवाज़ मे) "रेशमा, रोनाबंद कर। पांव पकड़ना छोड़ औऱ मेरी शर्तसुन। तुम को शुभम चाहिए, मुझेकोई ऐतराज नहि हैं। मगर वो मेरा प्रेमी बाद मे हैं, बेटा पहले हैं। "
रेशमा: (आंसू पोंछते हुए) "जौ कहेगी वोँ मानूँगी सुमन। बस शुभम कि एक् झलक, उसका एक् स्पर्श दिलादे। "
सुमन:"बात मात्र स्पर्श कि नहि हैं। मे तेरी शुभम केँ संगतभी सोने दूँगी, जब तुँ उसकी पत्नि बनेगी। तूँ मेरी सहेली हैं, पर्र अब तुझेही मेरीबहू बनकरइस घऱ मे आनां होगा। "
रेशमा: (हैरान होकर)"बहू? पऱ मेरा तोँ निकाह होँ चुका हैं। शौहर हैं मेरा। "
सुमन:"वही तोँ कहरही हूं। उस ठरकी औऱ निकम्मे शौहर कों छोड़ना होगा। अगर शुभम केँ संग रहकर तूने अपने पति कों छुआ, तोँ मे तुम्हारी तरफ कुलक्षणी महिला कां दर्जा दूँगी। मेरे बेटे कां हककोई औऱ नहि बाँटेगा। "
रेशमा: (जुनून मे आकर) "मुझे भि उस इंसान केँ संग नहि रहना सुमन! वो मुझेकभी सुख नहि दे पाया। मेरेपास अपनी जमापूंजी हैं, गहने हें, बहोत पैसेजोड़ रखे हें मैंने। मे उसेछोड़ दूंगी। "
सुमन: "इतना आसान नहि हैं रेशमा। समाज क्याँ कहेगा? कानून क्याँ कहेगा?"
रेशमा: (दृढ़ता सें) "मे चुपके सें उससेतीन तलाक लें लूँगी। हलाला याँ जौ भि करनापड़े, पर्र मे शुभम कि होकर रहूँगी। आज सें तुँ मेरी सहेली नहि, मेरी सासू मां हैं। "
सुमन: (मुस्कुराते हुए) "सासू मां। सुनने मे अच्छा लगा। पऱ एक् बातबता, तेरी बेटी कां क्याँ? जौ बाहर् पढ़रही हैं?"
रेशमा: (खामोश हौ गई) "बेटी."
सुमन:"हाँ, वो जवान हौ रही हैं। जबउसे पता चलेगा कि उसकी मम्मी अपनी सहेली केँ बेटे केँ संगघऱ बसारही हैं, तौ वो क्याँ सोचेगी?"
रेशमा: (कांपते हुए) "मेरेपास इसकाकोई जवाब नहि हैं सुमन। मैंने उसके बारे मे सोचा हि नहि। "
सुमन: "सोचना तौ पड़ेगा। शुभम जवान हैं, गरमखून हैं उसका। अगर उसेपता चला कि तेरी बेटी भि घऱआने वाली हैं, तौ क्याँ गारंटी हैं कि उसकीनजर उस पर्र नहि पड़ेगी?"
रेशमा: (डरकर) "नहि! शुभम मात्र मेरा रहेगा! मे अपनी बेटी कों हॉस्टल मे हि रखूँगी। उसेयहा आने हि नहि दूँगी। "
सुमन:"यह मुमकिन नहि हैं रेशमा। मम्मी-बेटी कां नाता नहि टूटता। पर्र खैर, पहले तुँ अपने शौहर सें पीछा छुड़ा। "
रेशमा: "मे आज हि वकील सें बात करती हूं। मुझेबस शुभम कि बाहों मे वोँ गालियाँ सुननी हें जौ तूँ कलसुन रही थि। मुझे वोँ 'छिनाल' कहे, मुझे मारे, मुझे बर्बाद करदे, मुझेसभी मंजूर हैं। "
सुमन: "पागल हौ गई हैं तुँ। पर्र मुझे खुशी हैं कि मेरीबहू मेरी जैसी हि निकलेगी। चल, अब रेडी होँ जा, शुभम केँ आने कां वक़्त हौ रहा हैं। "
रेशमा: "सासू मां, क्याँ मे आजउसे 'शौहर'कह कर बुला सकती हूं?"
सुमन: "बुला लेना, पर्र याद रखना, मर्यादा मात्र दुनिया केँ लिए हैं। हमारे बीच केवलहवस औऱ हक होगा। "
(रेशमा कां शौहर एक् राइसमील मे मैनेजर कि पोस्ट मे हैं, जोँ कि सुभह जल्दचला जाता हैं, औऱ साम कों घऱआता इसने बहोत लड़कियों कों ब्लैक मेल करके चोदा हैं, कई तौ पेट सें होँ गई उनका बच्चा गिरवाया हैं, अधिकतर वहीकाम करने वाली मजदूर कि बीविया, बेटिया होती थि, जैसेसब कों आहिस्ता घऱ कि दालकम मनपसंद आने लगती हैं बाहर् कि टंगड़ी कबाब जायदा भाते हैं.वैसे हि इसे बाहर् मुंह मारना जायदा पाँसद हैं जबकि इसकी पत्नि क़यामत हैं, कहीं जानां होता तोँ मात्र बुरखा मे, रेशमा एक् पाकीजा इज्जतदार ख़ातून हैं मगर जबसे उसकी सहेली नें उसके औऱ अपनेसगे बेटे केँ समंध मे बात करना चालू कियातब सें रेशमा केँ दिल मे कुछकुछ होनेलगा वोँ जब भि संभम् कों देखती उसकी बुर सें पानीबह निकलता, जल्दी बाथरूम मे जाके अपनी बुर रगड़ती चड्ढी बदलती)
आज रेशमा केँ शौहर कहीं बाहर् गय़ा हैं घऱ मे तोँ यही बताया हैं मगर वो अपनीमाल सें मिलने लखनऊ गय़ा हैं )
दोपहर कां सन्नाटा हैं। सुमन किचन मे रात कि सब्जी कि तैयारी कररही हैं। पसीने कि हल्की बूंदें उसकी गर्दन पर्र चमकरही हें। तभी शुभमदबे पैर पीछे सें आता हैं। उसके चेहरे पऱ एक् शरारती मुस्कान हैं।
उसने बिनाआहट किए सुमन केँ ठीक पीछे अपनी स्थान बनाई। औऱ फिन—चटाक!
शुभम नें पूरी ताकत सें सुमन केँ भारी कूल्हे पऱ एक् जोरदार हाथधर दिया।
सुमन: (उछलकर) "उईईई मां! मर गई रे!"
सुमन कां कलेजा मुंह कों आँ गय़ा। उसने पलटकर देखा तौ शुभमखड़ा दांत निपोड़ रहा थां। डरसमय भर मे जुनून मे बदल गय़ा।
सुमन: (हांफते हुए) "बदमाश! जान हि निकाल दि थि मेरी। यह क्याँ तरीका हैं अपनी मम्मी कों डराने कां?"
शुभम:(उसे कमर सें दबोचते हुए) "मां तोँ दुनिया केँ लिए हैं। अभि तौ तुँ मेरी 'छिनाल' हैं। कलरात कां नशा अभि उतरा नहि हैं। "
शुभम नें उसे घसीटकर अपनी बाहों मे भर लिया। सुमन नें विरोध करने कां नाटक भि नहि किया औऱ उसकेगले मे बाहें डालदीं। दोनों केँ होंठ एक्-दूसरे सें टकराए।
शुरुआत हुआ एक् गहरा औऱ गीलाडीप किस।
चपड़-चपड़। लपड़-लपड़.
थूक औऱ लार कां हंगामा किचन कि दीवारों सें टकराने लगा। शुभम उसकीजीभ कों बुरीतरह चूसरहा थां। सुमन कि आँखें बंद होँ गईं। वो पूरीतरह उसके प्रेम मे झूल गई। उनकेबीच कि लारतार बनकरटूट रही थि औऱ फिनजुड़ रही थि।
सुमन: (सांस फूलते हुए, किस केँ बीच) "उफ़्फ़.बस बाबा.रुक जाओ। नीतू अंदर हि हैं, अगर बाहर् आँ गई तौ शोर हौ जाएगा। "
शुभम: (गर्दन चूमते हुए)"आने देउसे। आज तोँ मेरामूड बहोत खराब हैं। "
सुमन:(उसे धक्का देकरअलग होतेहुए) "नहि बाबू, मानजाओ नां । देखो, अभि रेशमा कां मोबाइल आया थां। बेचारी बहोत परेशान हैं। उसका शौहरघऱ पर्र नहि हैं औऱ उसकेघऱ कि बिजली खराब होँ गई हैं। "
शुभम: (चिढ़कर) "तौ मे क्याँ करूँ? इलेक्ट्रीशियन बुला लेँ वोँ। "
सुमन: (उसकी आँखों मे झांकते हुए औऱ एक् अंतिम गीली वालीकिस देतेहुए) "जाओ न् मेरेशेर। वोँ अकेली हैं। उसे 'सहायता' कि सख्त जरूरत हैं। तूँ जाएगा तौ वोँ खुश होँ जाएगी। औऱ सुन। वोँ अब मात्र मेरी सहेली नहि, तेरी होने वाली 'अमानत' हैं। जा, उसे संभाल लें। "
शुभम: (हैरानी सें) "अमानत? क्याँ मतलब?"
सुमन:"सभी समझ जाएगा। बसजा औऱ उसे अपनी ताकत कां अहसास करादे। साम कों घऱआकर मुझेसभी बताना
शुभम् नें पानी मांगा सुमन नें उसे मटके कां ठंडा पानी दिया
शुभम् निकल गय़ा रेशमा केँ घऱ
गली मे सन्नाटा थां। शुभम नें बिना दरवाजा खटखटाए अंदरकदम रखा, क्योंकि उसेपता थां कि आजकुछ खास होने वाला हैं।
अंदर कां नजारा देख शुभम कि सांसें रुकगईं। रेशमा कमरे केँ बीचों-बीच खड़ी थि, उसने काला रेशमी बुरखा पहनरखा थां। नकाबहटा हुआ थां, जिससे उसका गोरा चेहरा सुर्ख लाल दिखाई देरहा थां। आँखों मे गहरा सुरमा औऱ होंठों पर्र गाढ़ी लाली थि।
शुभम: (हैरानी सें) "अरे आंटी!यह बुरखा? कहीं बाहर् जाने कि तैयारी हैं क्याँ?"
रेशमा: (कपकपाती आवाज़ मे) "बाहर् नहि शुभम। तेरे सामने आने कि तैयारी हैं। आज सें मे तेरी अमानत हूं। "
रेशमा आहिस्ता चलकर शुभम केँ पासआई। उसके बुरखे कि सरसराहट शुभम केँ कानों मे बिजली कि तरह गूंजी। उसने अपनी कांपती उंगलियों सें शुभम कि शर्ट कां कॉलर पकड़ा।
रेशमा: (सिद्धत सें आँखों मे देखते हुए) "तेरी मम्मी नें मुझेहरी झंडीदे दि हैं। मे अब अपनी पुरानी जीवन, उस शौहर औऱ उस झूठे निकाह कों छोड़ने कों रेडी हूं। बस तूँ मुझे अपना लेँ शुभम। "
शुभम:(उसे कमर सें खींचते हुए) "इतनी जल्द?कल तक तौ तुँ केवल माँ कि सहेली थि। "
रेशमा: (रोतेहुए उसके सीने पऱ सिर रखकर)"कल रात खिड़की सें जब तुम्हें अपनी मम्मी कों गालियां देते औऱ उसे ठोकते देखा, तभी सें मेरा ईमानडोल गय़ा। मुझे भि वही जिल्लत चाहिए, वही दर्द चाहिए। मुझे अपनी बेगम, दासीमान लें शुभम, मे तेरी रंडी बनने कों सजधजकर हूं। "
रेशमा नें शुभम केँ हाथ पकड़कर अपने बुरखे केँ ऊपर सें हि अपने उभारों पऱ रखदिए। शुभम नें जोर सें भींचा, तोँ रेशमा केँ मुँह सें एक् आह निकली।
रेशमा: "अहह.मार मुझे! गालियां दे! मुझेवही शब्द सुनने हें जोँ तुँ सुमन कों बोलता हैं। इस बुरखे केँ अंदर एक् प्यासी महिला तड़परही हैं। "
शुभम कां खून खौलने लगा। उसने रेशमा कां जबड़ाजोर सें पकड़ा औऱ उसे दीवार सें सटा दिया।
शुभम:(कड़क आवाज़ मे) "अच्छा? तोँ बहोत शौकचढ़ा हैं तुझेही अपनी सहेली केँ बेटे सें चुदने कां? बड़ी शरीफ बनती हैं इस बुरखे मे, पर्र अंदर सें पूरी छिनाल हैं तुँ!"
रेशमा: (पागलपन मे हंसते हुए)"हाँ। मे छिनाल हूं! तेरी छिनाल! मुझे बर्बाद करदे शुभम। मुझेतीन तलाक कि जरूरत नहि, मुझेबस तेरेइस लन्ड कां हलाल चाहिए। "
रेशमा नें नीचे झुककर शुभम केँ पैरों कों चूमना शुरुआत कर दिया। वो पागलों कि तरहउसे मनारही थि, गिड़गिड़ा रही थि कि शुभमउसे अपनी पत्नि औऱ अपनी दासी कि तरह इस्तेमाल करे।
शुभम:"उठ! औऱ यह बुरखा उतार। आज देखूं तोँ सही कि इस पर्दे केँ पीछे सुमन कि सहेली नें क्याँ-क्याँ छुपारखा हैं
शुभम नें रेशमा केँ बालों कों मुट्ठी मे जकड़कर उसकासिर पीछे कि ओर झटका। रेशमा कि आँखों मे सिद्दत औऱ डर कां मिला-जुला भाव थां। शुभम कां चेहरा अब किसी प्रेमी कां नहि, बल्कि एक् क्रूर मालिक कां लगरहा थां।
शुभम: "बेगम बनना हैं नं तुम्हे? मेरी पत्नि कहलाने कां बहोत शौक हैं? तोँ सुन मेरी शर्तें। अगर एक् भि शर्त टूटी, तौ तुम्हें इसी बुरखे मे लपेटकर नाली मे फेंक दूंगा। "
रेशमा: (सिसकते हुए)"हर शर्त मंजूर हैं शुभम.बस मुझे अपना गुलाम बना लेँ। "
शुभम नें एक्-एक् करके अपनी शर्तें गिनानी शुरुआत कीं:• पहली शर्त:"आज केँ बाद तूँ रेशमा आंटी नहि हैं। तुँ केवल मेरी 'रखैल' औऱ इसघऱ कि 'गुलाम' हैं। मां केँ सामने तूँ बहू बनेगी, पर्र कमरे केँ अंदर तुँ मेरी जूती केँ नीचे रहेगी। "• दूसरी शर्त: "तेरा वोँ बुजदिल शौहर.उसे तुँ आज हि तीन तलाक केँ लिए मजबूर करेगी। उससे एक् पैसा नहि लेगी। जोँ तेरा हैं, वोँ अब मेरा हैं। "• तीसरी शर्त: "तुँ कभी भि अपनी मर्जी सें कपड़े नहि पहनेगी। घऱ मे तूँ मात्र वही पहनेगी जोँ मे चाहूँगा, चाहे वोँ यह बुरखा होँ याँ केवल एक् डोरी। "•
चौथी शर्त:"जब मे औऱ मां संग होंगे, तोँ तूँ हम् दोनों कि सेवा करेगी। अगर मैंने तुम्हें मां केँ पैरों मे बैठने कों कहा, तौ तुम्हे वहीं बैठना होगा। "•
पांचवीं शर्त: "गालियां सुनना तुम को मनपसंद हैं न्? तोँ यादरख, अब तेरानाम 'रेशमा' नहि, बल्कि 'कुलक्षणी' औऱ 'छिनाल' होगा। मे तुझेही कभी इज्जत सें नहि बुलाऊँगा। "•
छठी शर्त: "तेरी बेटी। जब वोँ घऱ आएगी, तौ तुँ उसे मुझसे दूर रखेगी। मगरअगर मेरामन बदला, तौ तुम को स्वयं उसे मेरेपास लाना होगा। तुँ बीच मे नहि आएगी। "•
सातवीं शर्त: "तुँ अपनी बुर पर्र मेरानाम लिखवाएगी। तुँ जहाँ भि जाएगी, सबकोपता होना चाहिए कि तुँ शुभम कि संपत्ति हैं। "•
आठवीं शर्त: "मे तुम्हें मारूँगा, पीटूंगा औऱ बेतहाशा ठोकूंगा। तुँ उफ़ तक नहि करेगी। जितना ज़्यादा मे तुम को जलील करूँगा, उतना अधिक तुँ मुझे प्रेम करेगी। "•
नौवीं शर्त: "खानां बनाने सें लेकर पांव दबाने तक, सारेकाम तूँ नग्न होकर करेगी अगर मे चाहूँ तोँ। "•
दसवीं शर्त: "तुँ बाहर् जातेसमय हमेशा इस बुरखे मे रहेगी, ताकि किसी औऱ कि नजरतुझ पर्र न् पड़े। पर्र घऱ केँ अंदर तुँ मात्र मेरीहवस कां खिलौना हैं। "
शुभम: (उसकेगाल पऱ जोर सें तमाचा मारते हुए) "मंजूर हैं? बोल छिनाल, मंजूर हैं यह गुलामी?"
रेशमा केँ चेहरे पऱ तमाचे कां निशान उभरआया, पर्र उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चमक आँ गई। उसने शुभम केँ पेरपकड़ लिए औऱ उन्हें चूमने लगी।
रेशमा: "सभी मंजूर हैं मेरे मालिक! मुझे मेरी औकात दिखाने केँ लिए धन्यवाद। मे आपकी बेगम भि हूं औऱ आपकी स्लेव भि। आज सें मेरा खुदा भि आप् होँ औऱ मेरा शौहर भि। "
शुभम नें उसे फर्श पर्र पटक दिया औऱ स्वयं सोफे पर्र बैठ गय़ा।
शुभम: "तौ शुरुआत कर अपनी गुलामी। पहलेइस बुरखे कों दांतों सें पकड़कर उतार औऱ मेरे पैरों केँ पास रेंगते हुए आँ।
शुभम सोफे पर्र पेर फैलाकर बैठ गय़ा। रेशमा नग्न अवस्था मे उसके पैरों केँ पास रेंगरही थि। उसकी आँखों मे एक् अजीब सां पागलपन थां। शुभम नें अपना एक् पेर उसके चेहरे पर्र रख दिया।
शुभम:"बता छिनाल, एक् स्लेव कों अपने मालिक केँ लिए औऱ क्याँ-क्याँ करना चाहिए? तुँ तौ बहोत तैयारी करके बैठी थि। "
रेशमा नें शुभम केँ तलवों कों चूमते हुए अपनी बातें कहनी शुरुआत कीं। उसकी आवाज़ मे समर्पण औऱ हवस कां मिला-जुला सुर थां।
रेशमा: "मालिक, एक् स्लेव कि अपनीकोई मर्जी नहि होती। मेरी पहली चाहतयह हैं कि जब आप् औऱ सासू मम्मी (सुमन)बैड पर्र हों, तोँ मे एक् दासी कि तरह किनारे खड़ी रहूँ औऱ आप् दोनों कि सेवा करूँ। आप् हुक्म दें तोँ मे आपके पसीने कों अपनी जुबान सें साफ करूँ। "
शुभम: (हंसते हुए)"बड़ी ऊंचीसोच हैं तेरी। औऱ क्याँ?"
रेशमा: "मेरे शौहर नें मुझेकभी गाली नहि दि, हमेशा इज्जत दि, औऱ वही मुझेजहर लगती थि। मे चाहती हूं कि आप् मुझे बालों सें पकड़कर पूरेघऱ मे घसीटें। जब नीतूघऱ मे होँ, तब भि आप् मुझे इशारों पर्र नचाएं औऱ मुझेडर रहे कि कहीं वोँ देख नं लेँ। उसडर मे जोँ मज़ा हैं, वोँ कहीं नहि। "
शुभम: "नीतू केँ सामने भि तूँ नंगी होने कों रेडी हैं?"
रेशमा: "अगर आप् चाहें तौ मे उसके सामने आपकी जूतीसाफ करने कों भि रेडी हूं। मेरी एक् औऱ शर्त हैं मालिक। आप् मुझेकभी भि सीधा प्रेम नहि करेंगे। आप् मुझे हमेशा 'रंडी' औऱ 'भोसड़ी कि' बोलकर हि ठोकेंगे। जब तक मेरीरूह न् कांपजाए, तब तक आप् नहि रुकेंगे। "
शुभम: (उसकागला धीरे-धीरे सें दबाते हुए) "औऱ जौ तूने हलाला औऱ तीन तलाक कि बात कि थि?"
रेशमा: "मे कल हि अपने शौहर कों उकसाऊँगी कि वोँ मुझे तलाकदे दे। मे उसे इतनातंग करूँगी कि वोँ मुझेछोड़ दे। उसकेबाद मे आपकेनाम कां निकाह पढ़ूँगी, पर्र वोँ निकाह मात्र दुनिया केँ लिए होगा। असल मे मे आपकी पैरों कि धूल बनकर रहूँगी। मे चाहती हूं कि आप् मेरेबदन पर्र गर्ममोम गिराएं औऱ अपनानाम गोददें। "
शुभम: "बहोत तड़परही हैं तुँ। चलफिन, अपनी पहली गुलामी साबित कर। रेंगते हुएजा औऱ कोने मे रखा वोँ चमड़े कां पट्टा उठाला। आज सें तेरेगले मे मेरानाम होगा। "
रेशमा किसी कुतिया कि तरह रेंगती हुइ गई औऱ अपने हि गले केँ लिए पट्टा उठालाई। उसने शुभम केँ घुटनों पर्र सिररख दिया।
रेशमा: "पहना दीजिये मालिक। आज सें रेशमा मर गई, आज सें केवल आपकीयह पालतू छिनाल जिंदा हैं। मुझे इतना मारिये कि मे शौहर कों भूल जाऊं औऱ केवल आपकानाम जपूँ। "
शुभम नें उसकेगले मे पट्टा कसा औऱ उसे एक् जोरदार झटका दिया। रेशमा दर्द सें कराहउठी, पर्र उसके चेहरे पर्र एक् संतुष्ट मुस्कान थि।
शुभम नें रेशमा केँ गले केँ पट्टे कों थोडा ढीला किया। उसकी आँखों मे अब क्रूरता कि स्थान एक् गहरानशा थां। उसने रेशमा कों फर्श सें उठाया औऱ अपनीगोद मे बैठा लिया। रेशमा कां सफ़ेद जिस्म शुभम केँ मजबूत हाथों केँ नीचे थरथरा रहा थां।
शुभम: (उसकेकान केँ पास फुसफुसाते हुए) "दर्द देना मेरा मकसद नहि हैं रेशमा, बस तेरी अपना बनाने कां जुनून हैं। जब तुँ अपनी हदेंभूल जाती हैं, तोँ मेरामन काम करनाबंद कर देता हैं। "
रेशमा: (उसकी गर्दन मे मुँह छुपाते हुए) "मुझेपता हैं शुभम। तेरेहाथ जब मुझे छूते हें, तौ मुझे अपनी खुशकिस्मती लगती हैं। "
शुभम नें रेशमा केँ चेहरे कों हाथों मे लिया औऱ उसके माथे, आँखों औऱ गालों कों बेहद कोमलता सें चूमना शुरुआत किया। ये एक् अलगतरह कां रोमांस थां—जहाँ अपमान औऱ समर्पण एक् संगमिल रहे थें। शुभम कि जुबान रेशमा केँ कानों केँ पीछे औऱ गर्दन पऱ रेंगरही थि, जिससे रेशमा केँ अंदर सिहरन दौड़ गई।
रेशमा: (दम भरतेहुए) "उफ़्फ़। शुभम.उस हरामखोर शौहर नें आज तक मुझेऐसे नहि छुआ। वोँ तौ बस अपनी प्यास बुझाता थां। उसनेकभी मेरीरूह कों नहि छुआ, कभी मेरी बुर कों अपनी जुबान नहि लगाई। उसे तोँ यहसभी 'गंदा' लगता थां। "
शुभम: (एक् शरारती मुस्कान केँ संग) "अच्छा? उसे गंदा लगता थां? पर्र मुझे तौ इसमें सबसे ज़्यादा मज़ाआता हैं। "
शुभम धीरे धीरे नीचे कि ओर झुका। रेशमा नें सोफे केँ किनारों कों मजबूती सें पकड़ लिया। शुभम नें रेशमा कि जाँघों कों फैलाया औऱ अपनी जुबान सें उसके शरीर केँ सबसे नाजुक हिस्सों कों सहलाना शुरुआत किया। उसकी हल्की झाँटो वाली बुर, उसने ट्रांसपेरेंट फूल वाली पेंटी पहनरखी थि क्याँ ख़ुशबू थि भीनी भीनी। गंध सूंघने कां लग हि आनंद हैं
रेशमा: (पागल होकर चिल्लाते हुए)"आहhh! शुभम.हाँ, वहीं! चाटोइसे। अपनीइस पालतू रंडी कों तृप्त करदो!आज पहलीबार मुझेलग रहा हैं कि मे किसी मर्द केँ संग हूं। "(उसकी झाँटे जायदा बड़ी नहि थि जैसेचार दिन पहले हि बनाई होँ नमकीन स्वाद जबजबजीभ सें चाटता वोँ मुझेदेख केँ बहोत खुस होती उसकी आँखो मे वासना दिखरही थि )
शुभम:(बीच मे रुककर, ऊपर देखते हुए) "मज़ा आँ रहा हैं नं? तौ अब मुझे गालीदे। बोल कि मे कितना नीच हूं जौ अपनी मां कि सहेली केँ संगयह सभीकर रहा हूं। "
रेशमा: (हैरान होकर) "नहि शुभम। मे केसे."
शुभम: (हल्के सें उसकेगाल कों थपथपाते हुए)"यही तौ खेल हैं। बोल, मुझे गालियां दे ताकि मेराजोश औऱ बढ़े। बोल कि तेरानया मालिक कितना बड़ा हरामी हैं। "
रेशमा: (नशे मे चूर होकर)"हाँ। तुँ बहोत बड़ा कुत्ता हैं शुभम! तूने अपनी चाची जैसी सहेली कों अपनी दासीबना लिया। तुँ कितना बड़ा छिनाल कां जाया हैं जौ अपनी मां कों छोड़कर अब मुझेचाट रहा हैं। औऱ चाट मेरे मालिक, अपनीइस बेगम कों अपनी जुबान सें गंदाकर दे!"
रेशमा
शुभम नें औऱ भि शिद्दत सें अपनी जुबान कां काम जारीरखा। रेशमा कां पूरा जिस्म पसीने सें भीग गय़ा थां। वो कभीउसे 'मालिक' कहती, तोँ कभी शुभम कि दि हुई शर्तों केँ मुताबिक उसे गालियां देती। कमरे मे मात्र रेशमा कि सिसकारियों औऱ शुभम कि जुबान केँ चलने कि आवाजें गूँजरही थीं। रेशमा नें अपनीरस छोड़ दिया थां शुभम चपड़ चपड़ करकेरस चाट औऱ चूसरहा थां अहह उम्म
रेशमा: "शुभम.अब औऱ बर्दाश्त नहि होता। मुझेउठा औऱ बेड पऱ लेँ चल। मुझे वोँ गालियां दे जौ कल तूने सुमन कों दि थीं। मुझे 'भोसड़ी कि' बोल औऱ मुझमें समाजा!"
शुभम नें रेशमा कों खाट पऱ पटका औऱ स्वयं उसकेऊपर शेर कि तरहचढ़ गय़ा। रेशमा केँ भारी औऱ गोरे बूब्स उसकी आंखों केँ सामने थिरकरहे थें। शुभम नें बिनादेर किए एक् हाथ सें उसकागला हल्का सां दबाया औऱ दूसरे हाथ सें उसके एक् बूब्स कों बुरीतरह भींच दिया।
शुभम:"बड़ी अकड़ थि न् इन बूब्स मे जब तुँ कल खिड़की सें देखरही थि? अबबोल, कौन चूसेगा इन्हें?"
रेशमा: (तड़पते हुए)"अहह। आप् चूसोगे मालिक। चूसो अपनीइस कुतिया केँ थन। इन्हें अपना गुलाम बनालो!"
शुभम नें अपनीभूख मिटाने केँ लिए उसके एक् निप्पल कों मुँह मे लिया औऱ पागलों कि तरह चूसने लगा। चपड़-चपड़ कि आवाज़ें पूरे कमरे मे गूँजने लगीं। रेशमा कां हाथ शुभम केँ बालों मे थां, वो उसे औऱ जोर सें अपने सीने सें चिपका रही थि।
शुभम: (मुँह हटाकर, गाली देतेहुए) "साली रंडी, कितना दूधभरा हैं इनमें? तेरेउस बुजदिल शौहर नें कभी इन्हें ऐसे निचोड़ा थां क्याँ? भोसड़ी कि, आज तौ मे इन्हें लालकर दूँगा। "
रेशमा: (नशे मे झूमते हुए) "नहि बाबू। उसने तौ कभीहाथ भि नहि लगाया ढंग सें। तुँ हि मेरा असली मर्द हैं। काट लेँ मुझे। अपने दांतों केँ निशान छोड़दे इन पर्र, ताकिजब मे आईना देखूँ तौ मुझेयाद रहे कि मे किसकी अमानत हूं। काट बाबू। औऱ जोर सें काट!"
शुभम नें उसकीबात मानते हुए उसके निप्पल पऱ एक् गहरा औऱ हल्का दर्दनाक कटाव दिया। रेशमा केँ मुँह सें चीख निकली, पऱ वो चीख दर्द कि नहि, बेइंतहा मजे कि थि।
शुभम: (एक् शातिर मुस्कान केँ संग) "अच्छा? काटने मे बहोत मज़ा आँ रहा हैं? तोँ अब मेरी एक् औऱ 'घिनौनी' शर्तसुन। अगर तुम्हे मेरी पक्की स्लेव बनना हैं, तौ तुम्हें यह करना हि होगा। "
रेशमा: (हाँफते हुए) "बोलिये मालिक। आपकीहर गंदगी मुझे मंजूर हैं। "
शुभम: "शर्तयह हैं कि जब मे औऱ मां (सुमन)संग होंगे, तोँ तुम्हे हमारा बचाहुआ खानां खानां होगा। औऱ अगर मेरामन किया, तौ तुम्हारी तरफ मेरा थूकाहुआ भि चाटना पड़ेगा। बोल, मानेगी यह घिनौनी बात?"
रेशमा ये सुनकर समयभर केँ लिए रुकी, फिन अचानक खिलखिलाकर हंसने लगी। उसकी हंसी मे एक् अलग हि दीवानगी थि।
रेशमा: "बस इतनी सि बात? बाबू, तूँ मुझे अपनी गंदगी खिलादे, मुझे वोँ भि हलवे जैसी लगेगी। मे तेरीथूक कों अपना इत्र समझूँगी। तेरीहर गंदी शर्त मेरेलिए इबादत हैं। तुँ मुझे जितना गंदा करेगा, मे उतनी हि तेरी होती जाऊँगी। "
शुभम: "कमीनी कहीं कि! सच मे तूँ तोँ मां सें भि बड़ी छिनाल निकली। "
रेशमा: "केवल आपकी बाबू। केवल आपकी!अब बातें बंदकरो औऱ अपनीइस बेगम कि फाड़ केँ रखदो। मुझे वोँ गालियां दो जौ रूह तक पहुँचें। "
शुभम नें दोबारा उसके बूब्स कों अपने मुँह मे भर लिया औऱ उसे पलंग पऱ रगड़ना शुरुआत कर दिया। रेशमा अब पूरीतरह सें शुभम केँ शिकंजे मे थि, हर अपमान औऱ हर घिनौनी शर्त कों वो अपना सौभाग्य मानरही थि।
रेशमा पर्र दीवानगी सवार हौ गई। वो शुभम केँ गले सें ऐसे लिपटी जैसेकोई प्यासा बरसों बाद पानी सें मिला होँ।
शुभमउसे गाली देने औऱ शर्तें सुनाने कि कोशिश कररहा थां, पऱ रेशमा नें उसके होंठों कों अपने मुँह मे भर लिया। वो पागलों कि तरहउसे किसकरने लगी। उसकीजीभ शुभम केँ मुँह केँ हर कोने कों टटोलरही थि।
शुभम:(किस केँ बीचदबी आवाज़ मे) "उफ़्फ़। रेशमा। छोड़। सांस तोँ लेनेदे."
मगर रेशमा सुनने कों रेडी नहि थि। उसने अपने दोनों हाथ शुभम कि गर्दन केँ पीछेकस लिए थें। वो अपनी पूरी ताकत सें शुभम कों अपनीओर खींचरही थि। रेशमा नें शुभम केँ नीचे वाले होंठ कों अपने दांतों मे पकड़ लिया औऱ उसे अपनीतरफ खींचने लगी।
शुभम: "बाबू.छोड़ दो.अहह। लगरही हैं। छोड़दो बाबू!"
शुभम नें उसे अपने सें दूर धकेलने कि कोशिश कि, पर्र रेशमा कां जुनून चरम पऱ थां। वो शुभम केँ होंठों कों चूसते हुए अजीब सि आवाजें निकाल रही थि—लपड़-चपड़, चूस-चूस।
रेशमा: (होंठ छोड़ते हि, हाफते हुए) "नहि छोड़ूँगी! आज तुम्हारी तरफइस सहेली कि तड़प मिटानी होगी। तुँ जितना 'छोड़ो' बोलेगा, मे उतना हि तेरी जकड़ूँगी। "
रेशमा नें फिन सें उसे अपनी बाहों मे भींच लिया। उसके नाखून शुभम कि पीठ मे गड़रहे थें। वो अपनी जाँघें शुभम कि कमर केँ चारों ओर लपेट चुकी थि।
शुभम: "तुँ तौ पागल होँ गई हैं! मेरी गर्दन तोड़ देगी क्याँ?"
रेशमा: "हाँ, तोड़ दे मुझे!आज तूँ मेरा मालिक हैं न्? तोँ झेल अपनीइस स्लेव कि हवस कों! बाबू, मुझे छोड़ना मत.बस चूसते रहो मुझे। "
रेशमा नें शुभम कां हाथ पकड़कर फिन सें अपने बूब्स पऱ रख दिया औऱ स्वयं उसके चेहरे कों पकड़कर अपनी छाती मे दबा लिया। वो किसी छोटे बच्चे कि तरह शुभम कों स्वयं सें चिपकाए हुए थि, जैसेउसे डर हौ कि शुभमभाग जाएगा।
शुभम: "साली छिनाल। इतनाजोर लगाएगी तौ रात तक केसे चलेगी?"
रेशमा: "तुँ बसमार मुझे। पऱ दूरमत जा। तेरी खुशबू मुझे पागलकर रही हैं। "
शुभम नें देखा कि रेशमा कि आँखों मे आँसू थें औऱ चेहरे पर्र एक् अजीब सि मुस्कान। वो सच मे अपनी गरिमा औऱ लज्जा सभीकुछ पीछेछोड़ चुकी थि।
रेशमा अभि भि हाँफरही थि, उसकी साँसें शुभम केँ चेहरे पऱ गर्महवा कि तरह टकरारही थीं।
शुभम: (एक् शातिर मुस्कान केँ संग) "रेशमा, एक् बातसुन। आज मे तुम्हें चोदूँगा तौ सही, पर्र एक् शर्त हैं। "
रेशमा: (दीवानगी मे) "क्याँ मालिक? आप् जौ कहेंगे, वही होगा। बस देरमत कीजिये। "
शुभम: "तूँ ये बुरखा फिन सें पहनेगी। मे तुझेही नंगा नहि, बल्कि इस काले बुरखे केँ अंदर हि ठोकना चाहता हूं। "
रेशमा: (हैरान होकर) "बुरखा? पऱ क्यूं बाबू?अब तोँ मे पूरीतरह तुम्हारी हूं, फिनयह पर्दा क्यूं?"
शुभम: (उसकेगाल कों सहलाते हुए) "क्योंकि मेरामन हैं। मुझेउस काले पर्दे केँ अंदर छिपी हुई अपनी 'बेगम' कों जलील करने मे ज़्यादा मज़ा आएगा। जब तूँ बुरखे मे चिल्लाएगी औऱ मे उसेऊपर उठा-उठा कर तुम्हारी तरफ धक्के मारूँगा, तोँ मुझे असली मालिक होने कां अहसास होगा। मुझे तेरी वोँ 'शरीफ'छवि बिगाड़नी हैं। "
रेशमा: (मुस्कुराते हुए) "आप् बहोत बड़े खिलाड़ी होँ शुभम। आपको मेरी शरीफ वाली पहचान कों अपनीहवस सें गंदा करना हैं। मुझे मंजूर हैं। "
रेशमा उठी औऱ उसने जमीन पऱ पड़ा अपना काला बुरखा फिन सें पहन लिया। उसने नकाब नहि लगाया, ताकि शुभम उसका चेहरा देखसके। फिन वो वापसबेड पर्र लेट गई औऱ शुभम कां सिर पकड़कर अपनी भारी छाती केँ बीचदबा लिया।
शुभम: (रेशमा कि छाती मे चेहरा छुपाते हुए) "उफ़्फ़.इस बुरखे कि गंध औऱ तेरे शरीर कि गर्मी। क्याँ कॉम्बिनेशन हैं। "
रेशमा: "चूसो बाबू। बुरखे केँ ऊपर सें हि मेरे बूब्स कों अपने मुँह मे भरलो। मुझे महसूस होना चाहिए कि मेरा मालिक मुझेइस लिबास मे भि नहि छोड़रहा। "
शुभम नें बुरखे केँ कपड़े केँ ऊपर सें हि उसके निप्पल कों अपने दांतों मे पकड़ा औऱ जोर सें खींचा। रेशमा केँ मुँह सें कराह निकली औऱ उसने शुभम केँ सिर कों औऱ जोर सें भींच लिया।
शुभम: (घुटती हुईँ आवाज़ मे) "साली छिनाल। आजइस बुरखे कों फाड़कर हि दम लूँगा। "
रेशमा: "फाड़दो बाबू! अपनीइस सादगी कों अपनी गंदगी सें भरदो। आज यह बुरखा हि मेराकफ़न बनेगा औऱ आपकी बाहें मेरी जन्नत। "
शुभम नें बुरखे कों आहिस्ता ऊपर सरकाना शुरुआत किया। कमरे मे अब मात्र कपड़े कि सरसराहट औऱ उन दोनों कि भारी होती साँसें सुनाई देरही थीं।
रेशमा नें चड्डी औऱ ब्रा नहि पहनी थि सिर्फ़ बुरखा पहनाहुआ थां शुभम् नें बुरखा उपर उठाया शुभम नें रेशमा केँ बुरखे कों कमर तक ऊपर समेट दिया। नीचे रेशमा कां सफ़ेद शरीर काले रेशम केँ बीचचमक रहा थां। शुभम नें उसकी जांघों कों पूरी ताकत सें फैलाया। रेशमा नें बेड कि चादर कों मुट्ठी मे जकड़ लिया।
शुभम: "रेडी हैं न् अपनी तबाही केँ लिए, भोसड़ी कि?"
रेशमा: (पागलपन मे) "हाँ मालिक। फाड़ डालो अपनीइस बेगम कों!"
शुभम नें एक् झटके मे अपना पूरावेग रेशमा केँ अंदर उतार दिया।
रेशमा: "आआआहहह! उईईई मम्मी! मर गई!"
रेशमा कि आँखें फटी कि फटीरह गईं। शुभम नें उसे संभलने कां मौका भि नहि दिया। उसने मशीन कि तरह धक्के मारने शुरुआत करदिए। धप-धप। चटाक-चटाक! मांस सें मांस केँ टकराने कि आवाज़ पूरे कमरे मे गूंजने लगी।
शुभम:"बोल छिनाल, कैसालग रहा हैं? अपने सहेली केँ बेटे कां डंडा बर्दाश्त करपारही हैं?"
रेशमा: (सिसकते हुए) "ओह्ह। बहोत गहराजा रहा हैं। शुभम बाबू, तुम् तौ सच मे जानवर होँ! औऱ मारो। औऱ जोर सें!"
शुभम कि मर्दाना खुशबू औऱ पसीने कि महक नें रेशमा कों मदहोश कर दिया थां। शुभम नें उसके बुरखे वाले हिस्से कों मुँह मे दबाया औऱ पागलों कि तरह झटके मारने लगा। हर धक्के केँ संग रेशमा कां बदनबेड पऱ ऊपर कि ओरउछल रहा थां।
शुभम: "साली रंडी, कल रात सें उतावलापन रही थि नं? लेँ, अपनी प्यास बुझा!यह लें। औऱ यह लें!"
रेशमा: "हाँ मालिक। अहह। औऱ गालियां दो! मुझे गंदाकहो! मुझे अपनी जूती समझो!"
शुभम नें उसके बालों कों जकड़ लिया औऱ उसका चेहरा पीछे कि ओर घसीटकर उसके होंठों कों काट लिया। रेशमा कां जिस्म धनुष कि तरहतन गय़ा थां। शुभम केँ धक्कों कि रफ्तार अब औऱ तेज हौ गई थि।
शुभम: "तेरी बुर तौ बहोत तंग हैं, जैसे किसी कुंवारी कि हौ! उस ठरकी शौहर नें कुछ नहि किया क्याँ?"
रेशमा: "उसने। उसनेकभी ऐसे नहि छुआ.अहह! शुभम। तुम् तौ फाड़ दोगे! मुझे अपनी दासीबना लो। हमेशा केँ लिए!"
शुभमअब बेकाबू होँ चुका थां। उसकी रगों मे दौड़ता खूनउसे औऱ क्रूर बनारहा थां। उसने रेशमा कों पलट दिया। अब वो बुरखे मे लिपटी हुई घुटनों केँ बल थि। शुभम नें पीछे सें उसे दबोचा औऱ बिजली कि रफ्तार सें प्रहार करनेलगा।
रेशमा: "ओह्ह खुदा.मर गई! शुभम बाबू.बस। अहह, औऱ मारो! अपनीइस गुलाम कों पूरीतरह समाप्त करदो!"
कमरे कां तापमान बढ़ चुका थां। रेशमा कि चीखें अब सिसकियों मे बदलरही थीं। शुभम नें उसके कूल्हों पर्र एक् जोरदार थप्पड़ मारा—चटाक!
शुभम:"चुप रह छिनाल! अभि तौ खेल शुरुआत हुआ हैं। तेरी तौ आजरात तक यही पड़े रहना हैं। "
रेशमा कां पागलपन अपनीचरम सीमा पऱ थां। वो अपने हाथों सें स्वयं केँ बूब्स कों मसलरही थि औऱ शुभम कि गालियों पर्र झूमरही थि। शुभम नें उसेफिन सें सीधा किया औऱ उसके पैरों कों अपने कंधों पर्र रख लिया।
शुभम:"अब देख तेरा मालिक तुम्हारी तरफ केसे ठिकाने लगाता हैं। "
शुभम नें अपनी पूरी ताकत बटोरी औऱ अंतिम दौर केँ जोरदार धक्के मारने शुरुआत किए। रेशमा कां बदन कांपने लगा। उसकी आँखों केँ सामने अंधेरा छानेलगा थां। वो डिस्चार्ज होने केँ लगभग थि।
रेशमा: "बाबू। मे जारही हूं। अहह! शुभम। मेरे मालिक। मुझे लेँ चलो!"
शुभम नें एक् दहाड़ मारी औऱ अपना सारा लावा रेशमा कि गहराई मे उड़ेल दिया। दोनों एक्-दूसरे सें लिपटे हुएबेड पऱ गिर पड़े। रेशमा बुरीतरह हांफरही थि, उसकी छाती ऊपर-नीचे हौ रही थि
दोनों पसीने सें तर-बतर बैड पर्र पड़े हाँफरहे थें। रेशमा कां बुरखा तहस-नहस हौ चुका थां औऱ कमरे मे केवल उनकी भारी सांसों कि आवाज़ थि। तभी साइड टेबल पर्र शुभम कां मोबाइल वाइब्रेट हुआ। स्क्रीन पऱ 'माँ' चमकरहा थां।
शुभम नें हाथ बढ़ाकर मोबाइल उठाया औऱ स्पीकर ऑनकर दिया।
सुमन: (दूसरी तरफ सें शरारती लहजे मे) "हाँ बेटा, क्याँ हाल-चाल हें? बिजली ठीक हौ गई रेशमा केँ घऱ कि याँ अभि भि अंधेरा हि हैं?"
रेशमा नें शुभम कि बांह कों कसकरपकड़ लिया औऱ इशारे सें मना किया कि अभि मत बताना।
शुभम: (गहरी सांस लेतेहुए) "मां, फॉल्ट बहोत गहरा थां। अभि तौ बसआधा कामहुआ हैं। लगता हैं आज पूरीरात यहीं रुकना पड़ेगा। "
सुमन: (खिलखिलाकर हंसते हुए)"ओह, मुझेपता थां कि फॉल्ट इतना आसान नहि होगा। ठीक हैं, अपनी सहेली कां ख्याल रखना। उसे 'अकेलेपन' सें बहोत डर लगता हैं। रातभर जागकर काम पूराकर लेना, कल सुभह हि घऱ आनां। "
रेशमा: (सुमन कि आवाज़ सुनकर मोबाइल कि तरफ झुकी) "सुमन। तूने अपना हीरा मेरेपास भेज दिया, तेरा धन्यवाद केसे करूँ?"
सुमन:"अरे पगली, अब वोँ तेरा भि तोँ हैं। शुभम, सुन रहे हौ नं? रेशमा अब तुम्हारी जिम्मेदारी हैं। उसे शिकायत कां मौकामत देना। "
शुभम: "फिक्र मतकरो मां। इसे तोँ सुभह तक चलने लायक भि नहि छोड़ूँगा। "
मोबाइल कटते हि रेशमा नें शुभम केँ ऊपर चढ़करउसे फिन सें बाहों मे भर लिया।
रेशमा: "सुना तुमने? सासू मां नें स्वयं इजाजत दे दि हैं। आज कि रात मात्र मेरी औऱ तुम्हारी हैं। आजकोई पर्दा नहि, कोई लज्जा नहि। "
शुभम:"बड़ी जल्द रिकवर होँ गई तूँ? अभि तौ तुँ मररही थि। "
रेशमा: "तुम्हारी गालियों नें मुझमें जान फूँक दि हैं मालिक। अब बताओ, रात कां क्याँ प्रोग्राम हैं? मुझे अभि औऱ गंदा होना हैं। "
शुभम: "तोँ सुन छिनाल, रात कि पहली शर्त। तुँ अभि जाएगी, रसोई सें थोड़ातेल लेकर आएगी औऱ मेरे पूरेबदन कि मालिश करेगी। वोँ भि बिल्कुल नंगी होकर, मात्र यह पट्टा पहनकर। "
रेशमा: (मुस्कुराते हुए) "जोँ हुक्म मेरे शौहर कां। मे अभि तेल लेकरआती हूं। औऱ मालिश केँ बाद। क्याँ मुझेफिन सें वोँ बुरखा पहनना पड़ेगा?"
शुभम: "बिल्कुल। मे तुम को बुरखे मे हि किचन केँ स्लैब पर्र बैठाकर फिन सें ठोकूँगा। मुझे देख्ना हैं कि जब तुँ बर्तन मांजने केँ बहाने झुकेगी, तोँ मेरी गालियां तुम्हे कितनी आग लगाती हें। "
रेशमा: "बाबू। तुम् सच मे मुझे पागलकर दोगे। मे अभि आई। "
रेशमा खुशी-खुशी कमरे सें बाहर् भागी। शुभम पलंग पर्र लेटाहुआ अपनीनई स्लेव कि दीवानगी देखरहा थां। उसकी मोटीभरी गांडआय हाय थप्पड़ थापड़ बजादु इसकी तोँ टट्टी करतेसमय इसकी गांड मारूँगा
उसेपता थां कि येरात बहोत लंबी होने वाली हैं औऱ रेशमा केँ जिस्म कां एक्-एक् इंचआज शुभम केँ नाम होने वाला हैं।
रात कां सन्नाटा गहरा गय़ा थां। रेशमा किचन सें सरसों केँ तेल कि कटोरी लेकर कमरे मे दाखिल हुइ। उसने बुरखा उतार फेंका थां, अब उसकेगले मे मात्र वो काला पट्टा थां जोँ शुभम नें उसे पहनाया थां। शुभम पलंग पर्र औंधे मुंह लेटाहुआ थां।
रेशमा: "मालिक, आपकी दासी हाजिर हैं। तेल सजधजकर हैं। "
शुभम: (बिना मुड़े, भारी आवाज़ मे) "देरलगा दि तूने। रेंगते हुएपास आँ औऱ शुरुआत कर। "
रेशमा घुटनों केँ बल रेंगती हुईँ खाट पऱ चढ़ी। उसने अपने हाथों मे तेल लिया औऱ शुभम कि चौड़ीपीठ पर्र मलना शुरुआत किया। शुभम केँ मजबूत शरीर कि छुअन सें रेशमा कि उंगलियां कांपरही थीं।
रेशमा: "बाबू। आपकीपीठ कितनी सख्त हैं। कलरात सुमन नें बहोत सेवा कि होगी आपकी, हैं नं?"
शुभम: (करवट लेकरउसे घूरते हुए) "तूँ जलरही हैं क्याँ? खबरदार जोँ अब अपनी सहेली कां नाम लिया। अभि तुँ मेरी खिदमत मे हैं। "
शुभम नें अचानक रेशमा कां हाथ पकड़ा औऱ उसे झटके सें अपनेऊपर खींच लिया। तेल कि कुछ बूंदें रेशमा कि छाती पऱ गिरगईं।
शुभम:"यह तेल बेकार नहि जानां चाहिए। अपनी जुबान कां इस्तेमाल कर औऱ इसेसाफ कर। "
रेशमा कि आँखें चमक उठीं। उसने झुककर स्वयं केँ जिस्म पर्र गिरेतेल कों अपनी जुबान सें चाटना शुरुआत किया, जबकि उसकी नजरें शुभम कि आँखों मे गड़ीथीं।
रेशमा: "देखरहे हौ मालिक? मे कितनी वफादार कुतिया हूं आपकी? जौ आप् गिराओगे, वही मेरा खानां होगा। "
शुभम: (हंसते हुए) "बेशर्म कहीं कि! चल, अब मेरा पांवदबा। आज तुझेही वोँ जिल्लत दूंगा जोँ तूनेकभी सोची भि नहि होगी। "
शुभम नें उसे फर्श पऱ बैठने कां इशारा किया। रेशमा नीचेबैठ गई औऱ उसकेपेर दबाने लगी। शुभमउसे लगातार गालियां देरहा थां—'रंडी', 'भोसड़ी कि', 'छिनाल'। रेशमा हर गाली पर्र मुस्कुराती औऱ उसके पैरों कों चूम लेती।
रेशमा: "बाबू, एक् बात बोलूं? आजरात मुझे बांधदो। मुझे वोँ सभी करना हैं जोँ मैंने आज तक मात्र फिल्मों मे सुना थां। मुझे अपनी बेगम नहि, अपनी पालतू बनाकर रखो। "
शुभम: "सब्ररख छिनाल। अभि तौ रात शुरुआत हुई हैं। पहले तेरी नहलाऊंगा, फिन बुरखा पहनाऊंगा, औऱ फिन चाँदनी रात मे तुम्हे अपनीछत पर्र लेँ जाकर पूरी दुनिया केँ सामने जलील करूँगा। "
आधीरात कां सन्नाटा हैं। कमरे मे पसीने, तेल औऱ जिस्मानी महक कां भारी सैलाब उमड़रहा हैं। शुभमखाट पऱ शहंशाह कि तरह बैठा हैं। रेशमा नग्न हालत मे उसके पैरों केँ पास रेंगरही हैं। उसकेगले कां पट्टा फर्श पऱ घिसटरहा हैं।
शुभम:(पेर सें उसका चेहरा उठाकर) "चलउठ भोसड़ी कि! बहोत शौक थां न् तुझेही पालतू कुत्तिया बनने कां? रेंगते हुए बाथरूम तक चल। "
रेशमा: (जीभ बाहर् निकालकर, हांफते हुए)"जी मालिक। आपकीयह हरामखोरनी हाजिर हैं। "
रेशमा घुटनों केँ बल चलती हुई बाथरूम पहुंची। शुभम नें उसे शावर केँ नीचेपटक दिया। ठंडा पानी गिरते हि रेशमा कां सफ़ेद जिस्म कांपउठा। शुभम नें अपनापेर उसकी छाती पर्र रखा।
शुभम:"सुन मादरचोद, आज तुम्हे साफ नहि, गंदा होना हैं। अपनी जुबान बाहर् निकाल औऱ मेरे पैरों केँ तलवों कि गंदगी चाट। "
रेशमा नें बिना हिचकिचाहट अपनीजीभ निकाली। वो शुभम केँ पैरों कि उंगलियों केँ बीच कां मैल औऱ पसीना चाटने लगी। चप-चप कि आवाजें गूंजरही थीं।
शुभम: "कैसा स्वाद हैं छिनाल? तेरेउस निक्कमे शौहर नें कभी अपनी गंदी जुबान यहा तक पहुँचाई थि?"
रेशमा: (मुँह मे मैललिए हुए) "नहि मालिक। उफ़्फ़.यह स्वाद तौ जन्नत हैं। आपकी गंदगी हि मेरा असली इत्र हैं। "
शुभम नें अचानक अपनागला साफ किया औऱ रेशमा केँ चेहरे पर्र थूक दिया। गाढ़ा थूक रेशमा कि नाक औऱ होंठों पऱ चिपक गय़ा।
शुभम:"चाट इसे! एक्-एक् कतरासाफ कर अपनी जुबान सें। तुँ इसी लायक हैं भड़वी!"
रेशमा नें अपनी जुबान सें पूरे चेहरे कों साफ किया। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि चमक थि। वो पूरीतरह सें बीDSM केँ नशे मे डूब चुकी थि। शुभम नें उसे बालों सें पकड़ा औऱ झटके सें बाहर् निकाला।
शुभम:"अब चलछत पऱ। इस बुरखे कों गले मे लपेट, पर्र पहनना नहि हैं। बस अपनी लज्जा कों ढकने कां नाटककर। "
छत पऱ ठंडीहवा चलरही थि। शुभम नें रेशमा कों मुँह केँ बल दीवार कि तरफ झुका दिया। उसने रेशमा केँ हाथ पीछे बांधदिए। रेशमा कां पिछवाड़ा अब पूरीतरह शुभम केँ निशाने पर्र थां।
शुभम:"बोल कुत्तिया, क्याँ चाहिए तुम्हारी तरफ?"
रेशमा: "मुझेतोड़ दो मालिक! मुझे गालियाँ दो, मुझे मारो! मुझे अपनी पालतू कुत्तिया बनालो!"
शुभम नें अपनी भारी जांघों केँ बीच सें उसे एक् ज़ोरदार पाद दिया, जिसकी आवाज़ सन्नाटे मे गूँज गई।
शुभम: "सूंघइसे! यह हैं तेरे मालिक कि असली मर्दानगी। बता कैसी खुशबू हैं?"
रेशमा: (नाक सिकोड़कर, पर्र दीवानगी मे) "अहह। भारी हैं। गंदी हैं। पऱ मुझेयही बदबू पसन्द हैं मालिक! मे आपकीहर गंदगी कों अपनी सांसों मे भरना चाहती हूं। "
शुभम नें अब बर्दाश्त नहि किया। उसने रेशमा कों पीछे सें दबोचा औऱ बिना किसीरहम केँ बिजली कि रफ्तार सें चुत पर्र प्रहार शुरुआत करदिए। धप-धप। चटाक! वो उसे 'गड़वी' औऱ 'छिनाल' कहकर पुकार रहा थां।
रात कां तीसरा पहर हैं। छत कि ठंडी मुंडेर केँ पास शुभम नें रेशमा कों बिल्कुल किनारे पऱ झुका दिया हैं। नीचेगली सूनी हैं, पर्र कोई भि राहगीर ऊपरनजर उठा सकता हैं। डर औऱ हवस कां येमेल रेशमा कि रूह कंपारहा हैं।
शुभम:"झुक जा भोसड़ी कि! नीचेदेख, अगरकोई आँ गय़ा तोँ तेरायह काला बुरखा औऱ तेरी इज्जत, दोनों नाली मे बह जाएंगे। "
रेशमा: (कांपती आवाज़ मे) "अहह। शुभम बाबू.कोई देख लेगा। बहोत डरलगरहा हैं। पऱ औऱ आनंद आँ रहा हैं!"
शुभम नें बिना किसीरहम केँ, थूक लगाकर अपना पूरावेग रेशमा केँ पीछे केँ संकरे रास्ते (गांड) पर्र टिका दिया। एक् जोरदार झटके केँ संग उसने अंदर प्रवेश किया।
रेशमा: "ओह्ह्ह्ह माँआआआ! मर गई! उईईई.अहह। शुभम। फाड़ दिया!"
रेशमा कि चीख सन्नाटे कों चीरने हि वाली थि कि शुभम नें उसका मुँह अपनेहाथ सें जोर सें भींच दिया।
शुभम:"चुप रह छिनाल! आवाज़ निकाली तौ यहीं सें नीचे फेंक दूंगा। चुपचाप सहइस डंडे कों!"
शुभम नें कमर पकड़कर मशीन कि तरह धक्के मारने शुरुआत किए। धप-धप। चटाक!हर धक्के केँ संग रेशमा कां पिछवाड़ा मुंडेर सें टकरारहा थां।
रेशमा: "उंह्ह। उंह्ह। (मुँहदबा होने केँ कारणदबी हल्की चीख).अहह। मालिक। बहोत गहरा। बहोत दर्द। पऱ औऱ। औऱ तेज!"
शुभम: "साली पालतू कुत्तिया! देख नीचे, लाइटजल रही हैं पड़ोस मे। अगर किसी नें खिड़की खोली तौ तेरीयह नंगीपीठ औऱ मेरायह प्रहार सबको दिखेगा। बोल, औऱ जोर सें मारूँ?"
रेशमा: (पागलपन मे) "हाँ। मारो! सबको देखने दो कि सुमन कि सहेली अपने हि भतीजे जैसे लड़के सें गांड मरवारही हैं! मे रंडी हूं। भोसड़ी कि हूं। अहह!"
शुभम नें उसकी गर्दन केँ पट्टे कों नीचे कि तरफ खींचा औऱ उसे घुटनों केँ बल बैठा दिया, चेहरा गली कि तरफ। वो पीछे सें लगातार प्रहार कररहा थां। रेशमा कि लारटपक कर नीचेगिर रही थि। उसकी आँखों मे खौफ थां कि कहींकोई देख न् लें, पऱ नीचे कां हिस्सा आगउगल रहा थां।
शुभम: "लें औऱ लेँ भोसड़ी कि! कलरात सुमन चिल्लाई थि, आज तेरी बारी हैं। तेरी बुर कि आगआज मे हि बुझाऊंगा। "
रेशमा: (दीवार पऱ सिर पटकते हुए)"हाँ। औऱ जोर सें। फाड़दो मुझे! मे आपकी रंडी हूं शुभम। मुझे बर्बाद करदो!"
शुभम नें उसकी गर्दन केँ पट्टे कों पीछे खींचा, जिससे रेशमा कां दम घुटने लगा। उसका चेहरा नीलापड़ रहा थां, पऱ मजे कां अहसास उसे पागलबना रहा थां। वो थूक औऱ लार मे सनी हुईँ, फर्श पर्र रेंगते हुए शुभम केँ हर हुक्म कों खुदा कां फरमान मानरही थि।
शुभम: "लें मादरचोद! यह हैं तेरी गुलामी कां इनाम। चूस अबइस मुंडेर कि धूल कों!"
शुभम नें रफ्तार इतनीतेज कर दि कि रेशमा कां बदन बेकाबू होकर कांपने लगा। चप-चप। धप-धप! पसीने औऱ तेल कि महकहवा मे तैररही थि। रेशमा कि गांडलाल हौ चुकी थि, पऱ शुभम रुकने कां नाम नहि लें रहा थां।
रेशमा: "अहह.उआह। शुभम। मे। मे समाप्त हौ रही हूं! मालिक। लेँ चलो जन्नत!"
शुभम नें एक् अंतिम, सबसे तगड़ा झटका मारा औऱ अपना सारा लावा रेशमा कि गहराइयों मे छोड़ दिया। रेशमा निढाल होकर मुंडेर सें चिपक गई। उसकी सांसें तेजचल रहीथीं औऱ आँखें अभि भि गली कि तरफथीं, डर औऱ तृप्ति केँ आंसू एक् संगबह रहे थें।
रात केँ तीसरे पहर कि खामोशी मे रेशमा छत कि ठंडी फर्श पऱ औंधे मुंहपड़ी थि। उसका पूरा जिस्म पसीने, तेल औऱ शुभम कि थूक सें लथपथ थां। शुभम उसकेऊपर किसी खूंखार शिकारी कि तरहखड़ा थां, हाथ मे उसकावही काला पट्टा थामेहुए।
शुभम:"उठ भोसड़ी कि! अभि तोँ रात बाकी हैं। तुम्हे क्याँ लगा, इतने मे हि तेरी छुट्टी हौ जाएगी? रेंग केँ मेरेपास आँ, अपनीजीभ बाहर् निकाल कुत्तिया!"
रेशमा कां जिस्म जवाबदे रहा थां, पऱ उसकामन उस जिल्लत कां भूखा थां। वो घुटनों केँ बल रेंगती हुई शुभम केँ जूतों केँ पासआई।
रेशमा: (लार टपकाते हुए)"जी मालिक। आपकीयह पालतू हाजिर हैं। औऱ गंदा कीजिये मुझे। मुझे अपनीगदं मे डुबो दीजिये। "
शुभम नें अपनी पैंट थोड़ी नीचे कि औऱ रेशमा केँ चेहरे केँ ठीक सामने खड़ा होँ गय़ा। उसने एक् गहरी औऱ बदबूदार पाद सीधे रेशमा कि नाक पऱ मारी। गैस कि सड़न रेशमा केँ फेफड़ों तक उतर गई।
शुभम: "सूंघइसे हरामखोरनी! बता, कैसी खुशबू हैं तेरेइस नए खुदा कि? बोल मादरचोद, चुप क्यूं हैं?"
रेशमा: (खांसते हुए, पऱ जुनून मे) "अहह। भारी बदबू हैं मालिक। सड़न हैं। पर्र यही मेरा इत्र हैं। मुझेयह गदं अपनीरूह मे भरनी हैं। मुझे औऱ गालियाँ दो भड़वीकहो। मे इसी लायक हूं। "
शुभम:"हाँ, तूँ भड़वी हि हैं! अपनी सहेली केँ बेटे केँ पैरों मे पड़ीयह गड़वी महिला! अब अपनी आँखें बंदकर औऱ मुँहखोल। "
शुभम नें अपनागला साफ किया औऱ एक् गहरा, पीला सां बलगम औऱ थूक कां गोला रेशमा केँ मुँह केँ अंदरडाल दिया। रेशमा नें उसे अमृत समझकर निगल लिया। उसकी आँखों सें पानी आँ गय़ा, पर्र उसनेउफ़ तक नहि कि।
शुभम: "कैसालगा छिनाल? अब अपनीजीभ सें मेरे पैरों कि उंगलियों केँ बीच कां पसीना औऱ मैलसाफ कर। एक्-एक् कतराचाट लें। "
रेशमा पागलों कि तरह शुभम केँ पांव चाटने लगी। लपड़-लपड़। चप-चप कि आवाज़ें सन्नाटे कों चीररही थीं। शुभम नें उसके बालों कों जकड़कर उसेऊपर उठाया औऱ फिन सें दीवार सें सटा दिया।
शुभम:"अब देख, असलीचोट किसे कहते हें। तूने सुमन कों ठुकते देखा थां न्? अब महसूस कर कि एक् मर्दजब अपनीहवस पऱ उतरता हैं, तौ महिला कां क्याँ हाल होता हैं। "
शुभम नें पीछे सें एक् ऐसा जोरदार औऱ बेतहाशा धक्का मारा कि रेशमा केँ मुँह सें चीख निकल गई। वो उसे 'रंडी', 'भोसड़ी कि', औऱ 'पालतू कुत्तिया' पुकारते हुए बिजली कि रफ्तार सें ठोकने लगा। हर धक्के केँ संग रेशमा कां बुरखा फर्श पऱ रगड़खा रहा थां।
रेशमा: "ओह्ह.मर गई! शुभम। आआहह! औऱ जोर सें। फाड़दो अपनीइस स्लेव कों! मुझे औऱ गंदाकरो। मुझे अपनीलार मे सानदो!"
शुभम नें उसकेगले केँ पट्टे कों इतनाजोर सें पीछे खींचा कि रेशमा कि जीभ बाहर् निकलआई। वो दम घुटने औऱ मजे केँ बीचझूल रही थि। शुभम नें अपनी पूरी गंदगी औऱ अपनी सारी मर्दानगी रेशमा कि गहराई मे निचोड़ दि।
रेशमा बेजान होकरछत पऱ गिरपड़ी। उसकी मुँह सें लारबह रही थि, पर्र उसके चेहरे पऱ एक् ऐसी मुस्कान थि जैसे उसने जन्नत पाली होँ।
शुभम:"पड़ी रह यहींरात भर, इसी गदं मे। सुभहजब सुमन आएगी, तब उसे दिखाना कि उसकी सहेली अब मेरी कितनी वफादार कुतिया बन चुकी हैं। "
शुभम् नें उसेवही बाँध दिया औऱ नीचे आँ गय़ा रेशमा वही बैठे आँसू बहतेहुए हस्ते हुए बैठीवही
शुभमजब रात 3 बजेजगा तोँ उसेलगा रेशमा कों देख लें जब वो छत पे गय़ा तोँ रेशमा वही बैठी थि बँधी हुइ वोँ सोनेलगी थि उसे किसी कि चिंता नहि थि उसेबस सकूँ थां कि उसने अपने मालिक कों ख़ुश किया
शुभम् यह देखते हि ख़ुश होँ गय़ा उसने धीरे-धीरे सें रेशमा कों जगाया तौ रेशमा हड़बड़ा गई मालिक, मलिक.क्याँ हुआ
शुभम नें झुककर रेशमा केँ गले मे बंधेउस काले चमड़े केँ पट्टे कि बकल पर्र हाथ डाला। जैसे हि उसने पट्टा खोलने कि कोशिश कि, रेशमा नें तड़पकर शुभम केँ हाथ पकड़लिए। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि विवशता औऱ दीवानगी थि।
रेशमा: (मिन्नत करतेहुए) "नहि मालिक! इसेमत उतारिए। इसे उतार दिया तौ मुझे लगेगा कि मे फिन सें वही पुरानी आजाद औऱ अधूरी रेशमा बन गई हूं। मुझेकैद मे हि रहने दीजिये। "
शुभम: (हैरानी सें) "पागल हौ गई हैं क्याँ भोसड़ी कि? रातभर इस पट्टे मे गलाकट जाएगा तेरा। अब सोजा चुपचाप। "
रेशमा: (रोतेहुए उसके पांव पकड़कर) "नहि बाबू.आज कि रात मुझे सुकून सें नहि सोना। मुझेसजा दीजिये। आप् बेड पऱ धीरे-धीरे सोइये, पर्र मुझे अपनेबेड केँ पाये (पांव) सें इसी पट्टे कि जंजीर सें बांध दीजिये। मे नीचे फर्श पर्र आपकी जूतियों केँ पास पड़ी रहूँगी। "
शुभम: (एक् ठंडी मुस्कान केँ संग) "बड़ी जिद्दी कुत्तिया हैं तुँ। फर्श पर्र सोएगी?"
रेशमा: "सोऊँगी नहि मेरे बादशाह! मे रातभर जागकर आपकेउन पैरों कि चाकरी करूँगी जिन्होंने आज मुझे मेरी औकात दिखाई हैं। मे आपके तलवों कों अपनी जुबान सें सहलाती रहूँगी। जब आप् गहरी नींद मे होंगे, तब आपकीयह पालतू छिनाल आपके चरणों मे अपनाचैन ढूंढेगी। फिनजब थक जाऊँगी, तोँ आपके पैरों पर्र हि सिर रखकरसो जाऊँगी। "
शुभम: (उसके बालों कों सहलाते हुए)"ठीक हैं हरामखोरनी, जैसी तेरी मर्जी। चल अंदर। "
शुभमउसे घसीटते हुए बेडरूम मे लेँ गय़ा। उसने एक् मजबूत रस्सी निकाली औऱ रेशमा केँ गले केँ पट्टे कों बेड केँ लोहे केँ पाये सें कसकर बांध दिया। रस्सी इतनी छोटी थि कि रेशमा केवल शुभम केँ पैरों तक हि पहुँच सकती थि।
शुभम: "लें, अब पड़ीरह यहीं। अगर रात मे पेशाब भि आए, तोँ यहींकर देना, पर्र उठने कि कोशिश मत करना। "
रेशमा: (हंसते हुए, पागलों कि तरह) "धन्यवाद मेरे मालिक! यह बंधन हि मेरा असली निकाह हैं। आप् सो जाइये, मे आपकीमहक औऱ आपके पैरों केँ मैल कां स्वाद लेतेहुए अपनीरात गुजारूँगी। "
शुभमबेड पर्र पसर गय़ा औऱ चादरओढ़ ली। रेशमा नीचे फर्श पर्र दुबक गई। उसने शुभम केँ एक् पेर कों अपने हाथों मे लिया औऱ उसे किसी कीमती चीज कि तरह चूमने लगी। वो धीरे धीरे अपनी जुबान सें शुभम केँ अंगूठे कों चूसरही थि।
रेशमा: (फुसफुसाते हुए)"सो जाओ मेरे शहंशाह। आपकीयह रंडीजाग रही हैं। "
कमरे मे अंधेरा थां, बस रेशमा कि लपड़-चपड़ औऱ शुभम कि गहरी सांसों कि आवाजें गूँजरही थीं। रेशमा कां वजूदअब पूरीतरह उसबेड केँ पाये औऱ शुभम केँ पैरों सें बंध चुका थां।
सुभह——
मे पागल अपने बेटे केँ लिए - Aage kya hua? Next part padhiye
ब बहोत हि गरमागरम कामुक औऱ उत्तेजना सें भरपूर कामोत्तेजक एपसोड हैं भइया मज़ा आँ गय़ा
बहोत हि गरमागरम कामुक औऱ उत्तेजना सें भरपूर कामोत्तेजक एपसोड हैं भइया आनंद आँ गय़ा
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