मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-15
उसरात कि खामोशी जैसे मेरे औऱ शुभम केँ बीच केँ किसी गहरेराज कि गवाह बनने वाली थि। मैंने किचन कां साराकाम निबटाया, बर्तनों कों धीरे-धीरे सें रखा ताकि आवाज़ नं हौ। रमेशजी केँ कमरे कि लाइटबुझ चुकी थि औऱ नीतू केँ कमरे सें उसके खर्राटों कि हल्की आवाज़ आँ रही थि। वोँ नटखटदिन भर कि भाग-दौड़ केँ बाद गहरी नींद मे थि।
मैंने अपने कमरे मे जाकर अपनी साड़ी केँ पल्लू कों ठीक किया, बालों कों संवारा औऱ अपनेदिल कि धड़कनों कों थामने कि कोशिश कि। आज मैंने तयकर लिया थां कि रेशमा कों अबहरबात नहि बताऊँगी। कुछ बातें इतनी मुकद्दस (पवित्र) औऱ निजी होती हें कि उन्हें किसी तीसरे केँ कान तक पहुँचाना भि गुनाह लगता हैं। आज कि रात केवल मेरी औऱ मेरे आशिक शुभम कि थि।
मे दबेपैर उसके कमरे कि तरफबढ़ी। दरवाजे कि झिरी सें हल्की सि रोशनी बाहर् आँ रही थि। मैंने धीरे-धीरे सें कुंडी धकेली। शुभममेज पऱ सिररखे कुछसोच रहा थां, मुझे देखते हि उसके चेहरे पर्र ऐसीचमक आई जैसे अंधेरी रात मे चाँद निकलआया हौ।
शुभम: "मां? आप् अभि तक जागी हें? मे तोँ बस आपके हि बारे मे सोचरहा थां। "
मे उसकेपास गई औऱ उसकी कुर्सी केँ बगल मे फर्श पऱ बैठ गई। उसने मेराहाथ थामना चाहा, पर्र मैंने अपनाहाथ पीछे खींच लिया। वो थोड़ा हैरान हुआ।
मे: (गंभीरता औऱ प्रेम भरे लहजे मे) "शुभम। मुझे तुझसे कुछ कहना हैं। अब तक मे तुझेही 'तुँ' कहकर बुलाती थि, क्योंकि मुझेलगा कि ममता कां यही लहजा होता हैं। पऱ अब.अबजब तुँ मेरासभी कुछबन चुका हैं, मेरा आशिक, मेरा हमसफर। तोँ मेरामन तुम्हें 'तुँ' कहने कि इजाजत नहि देता। जब हम् अकेले होंगे, मे आपको 'आप्' कहूँगी। सबके सामने 'तुम्' कह सकती हूं, पऱ अकेले मे आपका ओहदा मेरेदिल मे खुदा सें भि ऊँचा हैं। "
शुभम कि आँखों मे नमीतैर गई। उसने मुझे जबरदस्ती उठाकर अपनेपास बिठाया।
शुभम: "आप् मुझे इतना सम्मान क्यूं देरही हें? मे तौ बस आपकावही छोटा सां शुभम हूं जिसे आपने उंगली पकड़कर चलना सिखाया। "
मे: "नहि। अब आप् वोँ छोटे शुभम नहि रहे। अब आप् वोँ मर्द हें जिसने एक् महिला कि रूह कों पहचान दि हैं। 'आप्' कहना मेरी इश्क कां एक् तरीका हैं। अच्छा, अबयह बताइये। आप् कहरहे थें नं कि हम् कहींदूर घूमने चलेंगे? कहां लेँ जारहे हें अपनीइस दीवानी कों? मुझेइस घऱ कि दीवारों सें, इस समाज कि नजरों सें दूर कहींचैन कि सांस लेनी हैं। "
शुभम नें मुझे अपनी बाहों केँ घेरे मे लेँ लिया। उसकी सांसें मेरे माथे कों छूरही थीं।
शुभम: "मैंने सभीसोच लिया हैं। बनारस सें कुछदूर एक् शांत सां पहाड़ी इलाका हैं। वहां मेरे एक् मित्र कां पुरानां फार्महाउस हैं। वहां नं कोई हमें पहचानने वाला होगा, नं कोई टोकने वाला। वहांबस पहाड़ होंगे, ठंडीहवा होगी औऱ हम् दोनों। मे चाहता हूं कि वहां मे आपको एक् मम्मी कि तरह नहि, बल्कि अपनी दुनिया कि सबसे हसीन स्त्री कि तरह निहारूँ। "
उसकी बातों नें मेरे अंदर एक् अजीब सि तड़प पैदाकर दि। मैंने अपनासिर उसके कंधे पऱ टिका दिया।
मे: "सच? वहां हम् अकेले होंगे? मुझेडर लगता हैं शुभम.अगर नीतू कों शकहुआ याँ आपके बापू नें पीछे सें कुछ बवालकर दिया तोँ? वोँ खड़ूस चुप जरूर हें, पऱ उनकी खामोशी मुझे डराती हैं। "
शुभम: "आप् फिक्र मत कीजिये। मैंने नीतू कों कह दिया हैं कि कॉलेज केँ प्रोजेक्ट केँ सिलसिले मे मुझे बाहर् जानां हैं औऱ आपकोसंग लेँ जानां जरूरी हैं क्योंकि आपकी तबीयत कुछ दिनों सें ठीक नहि लगरही। वोँ मान गई हैं। हम् अगले हफ्ते निकलेंगे। "
उसरात हमने घंटों बातें कीं। वोँ प्रेम, वोँ सम्मान औऱ वोँ आने वालेसफर कां रोमांच। मुझेऐसा लगरहा थां जैसे मे १८साल कि कोई लड़की हूं जौ अपने पहले प्रेम केँ संग भागने कि तैयारी कररही हैं। मैंने शुभम कि आँखों मे झांका औऱ मुझे वहांबस अपनेलिए दीवानगी दिखी।
मैने धीरे-धीरे सें कहा—
अब 'तूँ' सें 'आप्' तक कां यहसफर तय करना हैं,
आपकी बाहों मे हि अब मुझे जीना औऱ मरना हैं।
दुनिया कहेगी जौ भि, उसे कहनेदो 'शुभम',
मुझे तौ बस आपके मोहब्बत केँ रंग मे संवरना हैं।
शुभम नें मेरे हाथों कों चूम लिया। उस रात कमरे कि वोँ मद्धम रोशनी गवाह थि कि एक् मां कि ममताअब पूरीतरह सें एक् प्रेमिका केँ जुनून मे बदल चुकी थि। हम् दोनों उसआने वाले'सफर' केँ ख्वाबों मे खोगए, जहाँ मात्र 'आप्' औऱ 'मे' होने वाले थें।
जब मे उसके कमरे सें बाहर् निकली, तोँ सुभह कि पहली किरण फूटने हि वाली थि। मेरादिल हल्का थां, पर्र एक् अनजाना सां रोमांच रगों मे दौड़रहा थां।
सारादिन आमतरह सें हि बितारात जब हुईँ (वैसेसब कों हमनेबता दिया थां आज दोपहर कों हि नीता नें बोला थां खानां वोँ बना दिया करेगी औऱ अपने मित्र रिया केँ यहाचली जाया करेगी अकेले घऱ मे मन नहि लगेगा जब तक आप् लोगवहा सें आँ नहि जाते )
बनारस कि उसरात मे एक् अलग हि बेचैनी थि, पऱ वो बेचैनी डर कि नहि, उम्मीद कि थि। कल सुभह हमें निकलना थां। घऱ केँ सभीलोग सो चुके थें, पऱ शुभम केँ कमरे मे हम् दोनों इससफर कि तैयारी मे जुटे थें। सूटकेस खुलापड़ा थां औऱ मे पागलों कि तरहढेर सारे कपड़े निकाल रही थि।
मेरामन आज किसी 18 साल कि नटखट लड़की जैसा हौ गय़ा थां। मे एक्-एक् करके साड़ियां निकालती औऱ शुभम केँ सामने धर देती।
मे: "एजी, सुनिए नं। ये वाली पहनूँ याँ वोँ लखनऊ वालीलाल साड़ीरख लूँ? औऱ सुनिए, पहाड़ों पऱ ठंड होगी तोँ क्याँ मे आपका वोँ काला स्वेटर भि रखलूँ?"
मे अभि औऱ कपड़े निकालने केँ लिए अलमारी कि तरफबढ़ी हि थि कि शुभम नें मेराहाथ पकड़कर मुझेबैड पऱ बिठा दिया। उसनेबड़े अधिकार सें मेरेहाथ सें साड़ीछीन ली।
शुभम:"बस कीजिये सुमनजी! पैकिंग मे कर लूँगा। आप् तौ आधे सें अधिकघऱ समेटने पऱ तुली हें। हम् वहां रहनेजा रहे हें, बसने नहि। "
मे: (मुँह फुलाकर, बच्चों कि तरह पांव पटकते हुए) "तौ क्याँ हुआ? मुझे हसीन दिखना हैं आपकेलिए। वहांकोई 'ख़ुशबू' याँ 'विनीता' तोँ होगी नहि, तोँ कम सें कम मे तौ अच्छे सें सजूँ।
शुभमहंस पड़ा। उसने सूटकेस बंद किया औऱ फर्श पर्र मेरे पैरों केँ पासबैठ गय़ा। उसने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों मे लिए।
शुभम: "आप् तोँ सच मे बिल्कुल बच्ची बन गई हें। 'एजी' कहना कहां सें सीखा? औऱ सुनिये, वहां आपको सजने कि जरूरत नहि होगी। पहाड़ों कि वोँ धुंध औऱ आपकीयह सादगी हि मुझे पागल करने केँ लिए बहुत हैं। "
मे: (शरमाते हुए, अपनी उंगली सें उसका कंधा सहलाते हुए) "बताइये न्, हम् कहां जारहे हें? आपने अभि तक स्थान कां नाम नहि बताया। बसकहरहे हें कि पहाड़ हें। क्याँ वहां बहोत शांति होगी? क्याँ वहां मे आपको 'आप्' कहकर पुकारूँगी तौ पहाड़ मेरी आवाज़ दोहराएंगे?"
शुभम: "हम् उत्तराखंड कि उन वादियों मे जारहे हें जहाँ सिर्फ़ चीड़ केँ पेड़ों कि सरसराहट सुनाई देती हैं। वहां एक् छोटा सां कस्बा हैं—'कौसानी'। वहां केँ उस फार्महाउस कि खिड़की सें हिमालय दिखता हैं। औऱ हाँ, वहां आप् जितनी बार चाहें मुझे 'आप्' कहियेगा, वहां रोकने वालाकोई नहि होगा। "
मैंने अपनासिर उसके मजबूत कंधे पऱ टिका दिया।
मे: "शुभम। मुझे यकीन नहि होँ रहा कि हम् सच मे जारहे हें। कलजब हम् स्टेशन पर्र होंगे, तोँ मुझे लगेगा कि मे अपनी पुरानी जीवन पीछेछोड़ रही हूं। पर्र सुनिए। अगर नीतू नें सुभह उठकरकोई प्रश्न किया तोँ? औऱ वोँ खड़ूस (रमेशजी), अगर उन्होंने आपकेबैग कि तलाशी ली तौ?"
शुभम:"सभी इंतजाम हौ गय़ा हैं। नीतू कों मैंने कल हि नई किताबें औऱ कुछ पैसे दिलादिए हें, वोँ अपनी सहेलियों केँ संग व्यस्त रहेगी। औऱ पिताजी। वोँ अब अपनी हि हार केँ बोझतले दबे हें। वोँ कुछ नहि कहेंगे। "
उसरात पैकिंग केँ बहाने हम् दोनों नें ढेरों शरारतें कीं। कभी मे उसकी शर्ट केँ बटन खींच देती, तौ कभी वोँ मेरी लटों सें खेलने लगता। मैंने उसे 'आप्' कहकर संबोधित किया, तोँ वो खिलखिला उठा।
मे: "आप् बहोत जिद्दी होँ गए हें। पैकिंग स्वयं कररहे हें, मुझेहाथ भि नहि लगाने देरहे। एजी, सुनिए तोँ। वहांगरम चाय आप् बनाएंगे याँ मे?"
शुभम: "वहांसभी मे करूँगा। आप् बस बैठियेगा औऱ मुझे देखियेगा। "
उस कमरे कि मद्धम रोशनी मे, बिखरे हुए कपड़ों केँ बीच, एक् नई किस्सा कि शुरुआत हौ रही थि। ४०० पन्नों कि इस पुस्तक मे बनारस कां अध्याय अब पीछेछूट रहा थां औऱ पहाड़ों कि ठंडी वादियों मे 'आप्' औऱ 'मे' कि एक् नई दुनिया बसने वाली थि।
सुभह केँ चारबजे थें। हमने अपनेबैग उठाए। मैंने मुड़कर एक् बार सोती हुई नीतू औऱ रमेशजी केँ बंद कमरे कों देखा। एक् लम्हा केँ लिए ममता नें कचोटा, मैंने उसकेसर पे हाथ फेरा प्रेम सें उसके माथे कों चूमा, मैंने नीतू कों जगा केँ बता दिया कि हम् लोगजा रहे लाडो, जल्द आएंगे औऱ तेरेलिए एक् बढ़िया सि ड्रेस लेके आएँगे वोँ खुस होँ गई, पऱ अगले हि लम्हा शुभम नें मेराहाथ थामा औऱ उस छुअन नें सारे संशय मिटादिए।
हम् घऱ कि दहलीज पारकर गए। स्टेशन कि भीड़ मे भि हम् एक्-दूसरे केँ इतने लगभग थें कि दुनिया ओझललग रही थि।
ट्रेन कि पटरियों कि धक-धक केँ संग मेरादिल भि जैसे किसीतेज रफ़्तार ट्रेन पर्र सवार थां। बनारस पीछेछूट रहा थां औऱ मेरी पुरानी पहचान भि। ट्रेन केँ कूपे मे हम् आमने-सामने बैठे थें। नीतू औऱ रमेशजी सें झूठ बोलकर निकलना, उस खड़ूस कि नजरों सें बचकर आनां.ऐसा लगरहा थां जैसे हम् कोई बहोत बड़ा जुर्म कररहे हों, पऱ उस जुर्म मे जोँ नशा थां, वोँ किसी इबादत सें कम नहि थां।
शुभम खिड़की केँ बाहर् उड़तेहुए पेड़ों कों देखरहा थां। मैंने धीरे-धीरे सें उसकेपेर कों अपने पांव सें छुआ।
मे: (फुसफुसाते हुए)"एजी, सुनिए नं। अब तोँ बनारस बहोत पीछेरह गय़ा। अब तौ बताइये कि आपको कैसालग रहा हैं? मुझे तौ ऐसालग रहा हैं जैसे मे पिंजरे सें छूटीकोई चिड़िया हूं। "
शुभम मुड़ा औऱ उसकी आँखों मे जोँ शरारत थि, उसने मेरा कलेजा धड़का दिया। उसने कूपे कां पर्दा थोड़ा औऱ गिरा दिया।
शुभम: "मुझेऐसा लगरहा हैं जैसे मैंने दुनिया कि सबसे कीमती अमानत चुराली हैं। औऱ सुमनजी। 'एजी' कहना आप् पऱ बहोत जचरहा हैं। पऱ यहा ट्रेन मे थोड़ा संभलकर, कहीं आपकीयह नटखट अदाएं किसी औऱ कि नजर मे न् आँ जाएं। "
मे खिलखिला करहंस पड़ी।
काठगोदाम स्टेशन पर्र उतरते हि पहाड़ों कि ठंडीहवा नें मेरा स्वागत किया। वहां सें कौसानी तक कां कैब कां सफर। वोँ घुमावदार रास्ते, चीड़ केँ घने जंगल औऱ हरमोड़ पर्र शुभम कां मेराहाथ थाम लेना। जब कैब किसी गहरीखाई केँ पास सें गुजरती, तौ मे डरकर उसके औऱ लगभग होँ जाती।
मे: "उफ़!एजी, देखिये नं कितना गहरा हैं नीचे। मुझेडर लगरहा हैं!"
शुभम: (हंसते हुए मुझे अपने कंधे सें लगाते हुए)"जब तक मे हूं, आपको डरने कि जरूरत नहि हैं। औऱ वैसे भि, अब हम् अपनी दुनिया मे पहुँचने हि वाले हें। "
साम ढलते-ढलते हम् उस फार्महाउस पर्र पहुँचे। वोँ लकड़ी कां बनाहुआ एक् हसीनघऱ थां, जिसके चारों तरफसेब औऱ आड़ू केँ पेड़ थें। दूर बर्फ सें ढकी हिमालय कि चोटियाँ गुलाबी धूप मे चमकरही थीं। केयरटेकर चाबी देकरचला गय़ा। अब वहां मात्र मे थि, शुभम थां औऱ पहाड़ों कां सन्नाटा।
अंदर जाते हि मैंने अपना सैंडल उतारा औऱ नंगे पांवउस लकड़ी केँ ठंडे फर्श पऱ चलनेलगी। शुभम नें सामान एक् तरफरखा औऱ मुझे पीछे सें आकरथाम लिया।
मे: "एजी, यहा कितनी शांति हैं! ऐसालग रहा हैं जैसे पूरा पहाड़ मात्र हमारी बातें सुनने केँ लिएखड़ा हैं। क्याँ यहासच मे कोई नहि आएगा? नीतू कां मोबाइल तौ नहि आएगा न्?"
शुभम:"यहा नेटवर्क बहोत कमआता हैं सुमन। औऱ मैंने नीतू सें कह दिया हैं कि प्रोजेक्ट कि वजह सें मे मोबाइल बंद रखूँगा। अबसात दिन तक। केवल आप् औऱ मे। "
उसने मेरा चेहरा अपनीतरफ घुमाया। पहाड़ों कि ठंडक केँ बीच उसकी सांसों कि गर्माहट मुझे पिघलाने लगी।
मे: (शरमाते हुए)"आज रात खानां मे बनाऊँगी। आपकेलिए आपकी मनपसंद कां वोँ बनारसी पुलाव औऱ पहाड़ी तड़का। पऱ शर्तयह हैं कि आप् मुझे सब्जियां काटने मे सहायता करेंगे। "
शुभम: "सहायता? आज तोँ मे आपको किचन मे जाने हि नहि देना चाहता थां। मेरामन थां कि बसइस बालकनी मे बैठकर आपको डूबते सूरज कि रोशनी मे देखूँ। पर्र आपकीजिद हैं तौ चलिए."
किचन मे हम् दोनों संग थें। मे चावलसाफ कररही थि औऱ वोँ पासखड़ा लकड़ियाँ जलारहा थां। मैंने जानबूझकर एक् टमाटर उसकीतरफ उछाला।
मे: "एजी, देखिये तोँ सही! आप् तोँ लकड़ियाँ जलाने मे हि पसीने-पसीने होँ गए। बड़े आए थें सेवा करने वाले!"
शुभम: "अच्छा! अब मेरा मजाक उड़ाया जारहा हैं?"
उसने दौड़कर मुझेपकड़ लिया। मेरेहाथ मे हल्दी लगी थि, जौ उसकेगाल पर्र लग गई। हम् दोनों बच्चों कि तरहउस छोटी सि किचन मे हंसने लगे। वोँ हँसी, वोँ चैन। बनारस केँ उस घुटनभरे घऱ मे कभी नहि मिला थां।
रात हुई। बाहर् पारागिर चुका थां। शुभम नें हॉल मे अंगीठी जला दि थि। मे अपनीऊनी शॉलओढ़े खिड़की केँ पासखड़ी थि। शुभम पीछे सें आया औऱ उसनेदो कप गरमा-गर्म गरमचाय मेरीतरफ बढ़ाई।
शुभम: "सुमन। क्याँ सोचरही हें?"
मे: "यही कि काशयह सातदिन कभी समाप्त नं हों। काश हम् यहींजम जाएं, इन बर्फ कि चोटियों कि तरह। जी, मुझेडर हैं कि जब हम् वापस जाएंगे, तौ वोँ खड़ूस औऱ समाज हमेंफिन सें अलग करने कि कोशिश करेंगे। "
शुभम नें गरमचाय कां कपमेज पऱ रखा औऱ मेराहाथ अपनेदिल पर्र रख दिया।
शुभम: "वापस तौ जानां होगा, पर्र जोँ यादें हम् यहा सें लेकर जाएंगे, वोँ हमेंउस समाज सें लड़ने कि ताकत देंगी। औऱ याद रखिये। आप् अब केवल मेरी मां नहि हें, आप् मेरी वोँ रूह हें जिसे मैंने इन पहाड़ों कि गवाही मे अपना माना हैं। "
उसरात, कौसानी कि उस बर्फीली खामोशी मे, अंगीठी कि चटकती लकड़ियों केँ बीच
खानां बन चुका थां मैंने औऱ शुभम नें खानां खा लिया थां। फिन थोड़े देर बाहर् टहलने कां मनहुआ, तौ शुभम कां एक् हाथ पकड़ केँ टहलरहे थें
कौसानी कि वोँ रात औऱ भि ठंडी होतीजा रही थि। बाहर् बर्फ़ीली हवाएं चलरही थीं औऱ फार्महाउस कि लकड़ी कि दीवारें जैसेउस ठंड कों अंदर बुलारही थीं। अंगीठी कि आगअबबस अंगारों मे बदल चुकी थि। मैंने अपनाऊनी कंबल ओढ़ा, संग हि शुभम कां जैकेट उपर सें डाला थां, पऱ कड़ कड़ाती ठंड मेरी हड्डियों तक पहुँच रही थि।
मे - चलिए नां मुझेठंड लगरही आपकीयह जैकेट सें भि ठंड मेरीखतम नहि होँ रही
शुभम् - चलोचलो
हम् दोनों बेड पर्र लेटे थें। शुभम थोडा फासले पर्र थां। मेरामन तोँ ऐसा थां कि बस उसमें समा जाऊं, पर्र वोँ खड़ूस नं जानेआज क्याँ सोचकर दूरी बनाएहुए थां।
मे: (कंबल कों औऱ ऊपर खींचते हुए)"एजी। सुनिए न्! मुझे बहोत ठंडलग रही हैं। यहा केँ रजाई-कंबल भि जैसे पत्थर कि तरह ठंडे हौ गए हें। "
शुभम नें करवट बदली, पऱ लगभग नहि आया।
शुभम: "तौ मे क्याँ करूँ सुमनजी? मैंने तोँ कहा थां कि एक् औऱ स्वेटर पहन लीजिये। अब पहाड़ों पर्र आए हें तौ ठंड तौ लगेगी हि। "
उसकीयह रुखीबात सुनकर मुझेचिढ़ मच गई। मैंने जानबूझकर अपने बर्फीले पांव उसके पैरों सें सटादिए।
शुभम:"उफ़! क्याँ कररही हें आप्? आपकेपेर तौ बिल्कुल पाला (बर्फ) जैसे होँ रहे हें। हटाइये इन्हें!"
मे: (बेशर्मी सें औऱ लगभग खिसकते हुए) "क्यूं हटाऊं? एजी, बड़े जालिम होँ आप्! अपनीइस नाजुक सि जान कों ठंड मे ठिठुरता देखरहे हौ? मे तोँ चिपकूँगी, औऱ बार-बार चिपकूँगी। जबठंड लगरही हैं तौ क्याँ करूँ? दीवार सें चिपक जाऊं क्याँ?"
मैंने अपनासिर जबरदस्ती उसकी बांह पऱ रख दिया। शुभम नें मुझे हल्के सें पीछे धकेला।
शुभम: "सुमन, अभि सो जाइये। कल सुभह जल्द उठना हैं, हिमालय कां नजारा देख्ना हैं नं?"
मे: (मुँह फुलाकर) "नहि देख्ना मुझेकोई हिमालय! मुझे तौ बस आप् देखने हें। एजी, आप् तोँ ऐसेबन रहे हें जैसे लखनऊ वाली 'ख़ुशबू' पास लेटी हौ। मेरी कद्र हि नहि हैं आपको। इतनीदूर इसीलिए लाए थें कि मे यहाजम कर कुल्फी बन जाऊं?"
मेरीइस नटखट जिद्द पर्र शुभम कि हंसीछूट गई। उसने अपनाहाथ मेरे माथे पर्र रखा।
शुभम: "आप् सच मे किसी छोटी बच्ची सें कम नहि हें। कल तक तोँ बड़ी-बड़ी बातें कररही थीं कि मे 'आप्' कहूँगी, सम्मान दूँगी। औऱ अब देखो, बंदरिया कि तरह चिपकरही हें। "
मे: "हाँ, हूं मे बंदरिया! अपनी पसन्द केँ पेड़ सें नहि चिपकूँगी तोँ क्याँ पड़ोस केँ चीड़ केँ पेड़ पऱ जाऊंगी? एजी, यह 'सम्मान' अपनी स्थान हैं औऱ यह'ठंड' अपनी स्थान। आप् बस चुपचाप मुझे अपनी बाहों मे लें लीजिये, वरना मे रातभर ऐसे हि बड़बड़ाती रहूँगी। "
मैंने अपना चेहरा उसके गर्दन केँ पास टिका दिया। उसकीखाल कि गर्माहट पाकर मुझेचैन मिलने लगा। मैंने धीरे-धीरे सें उसकेकान केँ पास फुसफुसाया।
मे: "एजी, अब कैसालग रहा हैं? अभि भि लगरहा हैं कि मे 'बच्ची' हूं? मेरी धड़कनें सुनिए, यह आपकीवजह सें हि इतनीतेज भागरही हें। "
शुभमअब हारमान चुका थां। उसने अपनी मजबूत बाहें मेरे चारों तरफ लपेटलीं औऱ मुझेकस कर अपने सीने सें लगा लिया।
शुभम:"ठीक हैं बाबा, हार गय़ा मे। अबसो जाइये मेरी शरारती सरकार। आपकीयह बातें समाप्त नहि होंगी तोँ सुभह कि गरमचाय कौन बनाएगा?"
मे: (खिलखिलाकर) "गरमचाय? एजी, आपने हि तौ कहा थां कि यहासभी आप् करेंगे। मे तौ बस महारानी कि तरह बैठूँगी। अब चुपचाप मुझेऐसे हि थामे रखिये, अगर आपनेहाथ ढीला किया तौ मे फिन सें 'एजीएजी' चिल्लाना शुरुआत कर दूँगी। "
वो रात बहोत लंबी औऱ रूहानी थि। उस कमरे मे न् कोई मर्यादा थि, नं कोई समाज, बस दो जिस्मों कि गर्माहट औऱ पहाड़ों कां मौन म्यूज़िक थां। शुभम नें मेरे बालों कों सहलाते हुए धीरे-धीरे सें कहा, "सो जाओ सुमन, तुम् मेरी होँ, केवल मेरी। "
मैंने उसकी शर्ट कां बटन अपनी उंगली मे फंसाया औऱ अपनी आँखें मूंदलीं
कौसानी कि वोँ सुभह इतनी ठंडी थि कि रजाई केँ बाहर् कि दुनिया किसी बर्फीले नरक जैसीलग रही थि। कमरे कि खिड़की केँ शीशों पर्र ओस कि बूंदें जमीथीं। शुभम गहरी नींद मे थां, पर्र मे। मे तौ जैसे उसकी कायल होँ चुकी थि। नींद मे भि मे उसकेऊपर इसकदर चिपकी हुइ थि, जैसेअगर एक् समय केँ लिए भि अलग हुईँ तोँ मेरी सांसें हि थम जाएंगी। मेरा चेहरा उसके सीने पऱ थां औऱ मेरेहाथ उसकीकमर कों कसकर जकड़े हुए थें।
सूरज कि एक् पतली सि किरण पर्दे केँ बीच सें आई औऱ शुभम कि आँखों पऱ पड़ी। उसने हल्की सि कराहभरी औऱ हिलने कि कोशिश कि, पर्र मे तौ चिपकने कि 'प्रोफेसर' बनी हुईँ थि।
शुभम: (नींदभरी भारी आवाज़ मे) "उफ़। सुमन। क्याँ कररही होँ? छोड़ो, सांसरुक रही हैं मेरी। तुम् तोँ ऐसे लिपटी हुइ होँ जैसेकोई बेलपेड़ सें चिपक जाती हैं। "
मैंने अपनी आँखें नहि खोलीं, बस अपना चेहरा उसके सीने मे औऱ जोर सें रगड़ दिया।
मे: (नींद मे बुदबुदाते हुए) "नहि छोड़ूँगी। बिल्कुल नहि। एजी, आप् तौ हीटर सें भि अधिक गर्म हौ रहे हें। अगर मे अलग हुईँ तौ जमकर पत्थर होँ जाऊंगी। औऱ वैसे भि, आपके बिना मेरी सांसें चलती हि कहां हें? आप् हि तोँ मेरा ऑक्सीजन होँ। "
शुभम नें हंसते हुए मेरा माथा चूमने कि कोशिश कि, पर्र मे औऱ ऊपर खिसकआई।
शुभम:"अरे बाबा, सुभह हौ गई हैं। देखो, बाहर् हिमालय कि चोटियाँ सोने कि तरहचमक रही होंगी। चलो, उठो, मे गरमचाय बनाता हूं। "
मे: (अपनीपकड़ औऱ मजबूत करतेहुए) "भाड़ मे गय़ा हिमालय! मुझे नहि देखनी कोई चोटी। मुझे तोँ बसइसी रजाई केँ अंदर आपकेपास सोना हैं। औऱ गरमचाय? गरमचाय तौ तब पियूँगी जब आप् मुझे अपनी बाहों मे उठाकर रसोई तक लें जाओगे। "
शुभम नें हार मानकर अपनाहाथ मेरे बालों मे डाल दिया औऱ उन्हें सहलाने लगा।
शुभम: "तुम् इतनी नटखटकब सें हौ गई? बनारस मे तौ बड़ी गंभीर बनी रहती थि, जैसे पूरी दुनिया कां बोझ तुम्हारे हि कंधों पर्र होँ। "
मे: (आँख खोलकर शरारत सें उसे देखते हुए) "वहां तौ 'माँ' बनना पड़ता थां न्। यहा तोँ मे मात्र आपकी सुमन हूं। औऱ सुनिये, यहा मुझेकोई लज्जा नहि आती। अगर मे चाहूँ तौ सारादिन ऐसे हि आपकेऊपर लेटीरह सकती हूं। आप् मुझे हटाकर तोँ देखिये, मे ज़ोर-ज़ोर सें रोना शुरुआत कर दूँगी। "
मैंने अपना पांव उसके पैरों केँ बीच फंसा दिया औऱ उसकी ठुड्डी पर्र अपनी उंगली फेरने लगी। शुभम कि आँखों मे मेरेलिए बेपनाह प्रेम उमड़आया।
शुभम: "अच्छा? औऱ अगरकोई देख लें तोँ?"
मे: "कौन देखेगा? यहा पहाड़ों केँ भूत? याँ वोँ चीड़ केँ पेड़? देखने दीजिये। उन्हें भि पताचले कि एक् आशिक अपनी दीवानी कों केसे संभालता हैं। वैसे। आप् मुझेआज 'बंदरिया' नहि कहेंगे?"
शुभम: (हंसते हुए)"आज तुम् बंदरिया नहि, आज तुम् मेरी वोँ छोटी सि जिद्दी बच्ची लगरही होँ जिसेबस लाड-प्रेम चाहिए। पऱ सुमन, अब सच मे उठना होगा। देखो, अंग-अंग सुन्न हौ रहे हें मेरे, तुम् इतनी भारी जोँ हौ गई होँ!"
मे: (झूठा क्रोध दिखाते हुए) "क्याँ? मे भारी हूं? एजी, आपकी हिम्मत केसे हुईँ यह कहने कि? अब तौ मे बिल्कुल नहि उठूँगी। अब तोँ मे आपकेऊपर हि ब्रेकफास्ट भि करूँगी। सजा हैं यह आपकी!"
शुभम नें अचानक मुझे गुदगुदी करना शुरुआत कर दिया। मे खिलखिलाकर इधर-उधर भागने लगी, पर्र रजाई केँ अंदर हि। कमरे मे हमारी हंसी औऱ शरारतें गूँजने लगीं। वो लम्हा इतना मासूम औऱ हसीन थां कि लगा जैसेसमय यहींठहर जाए।
मे: (हंसते-हंसते निढाल होकर)"बस। बस.रुक जाइये! मे हार गई। पऱ एक् शर्त हैं। गरमचाय आप् अपने हाथों सें पिलाएंगे, बिल्कुल वैसे जैसे छोटे बच्चों कों पिलाते हें। "
शुभम: "मंजूर हैं सरकार! आप् लेटी रहिये, मे अभि गरमा-गर्म अदरक वालीगरम चाय औऱ बिस्किट लेकरआता हूं। "
शुभमबैड सें उठा, पऱ मैंने उसका पल्लू (शर्ट कां कोना)फिन सें पकड़ लिया।
मे: "जल्द आनां। वरना मे फिन सें चिल्लाना शुरुआत कर दूँगी!"
वो मुस्कुराता हुआ बाहर् चला गय़ा। मे रजाई मे मुंह छुपाकर मुस्कुराने लगी
शुभम मुस्कुराता हुआ किचन कि तरफचला गय़ा। मे रजाई मे दुबककर उसकेआने कां इंतजार करनेलगी। थोड़ी देरबाद कमरे मे अदरक औऱ इलायची कि भीनी-भीनी खुशबू फैल गई। शुभम केँ हाथ मे दो कुल्हड़ थें औऱ चेहरे पऱ वही प्यारी सि मुस्कान।
जैसे हि वोँ बेड केँ पासआया, मैंने शरारत सें अपना मुँह रजाई केँ अंदर पूरीतरह छुपा लिया।
शुभम:"अरे! अभि तोँ बड़ी-बड़ी बातें हौ रहीथीं, अब कहां छुप गई मेरी महारानी? चलोउठो, गरमचाय ठंडी होँ रही हैं। "
मैंने रजाई केँ अंदर सें हि पांव हिलाए औऱ एक् छोटी बच्ची कि तरह आवाज़ निकाली।
मे: "नहि। मुझे नहि पीना। बहोत ठंड हैं बाहर्। आप् स्वयं हि पीलो। "
शुभम: (हंसते हुए) "अच्छा? इतनी मेहनत सें बनाई हैं। ठीक हैं, फिन मे अकेले हि बिस्किट खा लेता हूं। "
बिस्किट कि पैकेट खुलने कि आवाज़ सुनते हि मैंने धीरे-धीरे सें अपनी एक् आँख रजाई सें बाहर् निकाली। शुभम जानबूझकर मजे लेँ-लेकर बिस्किट खारहा थां।
मे: "सुनो। आप् बड़े मतलबी हौ! मुझे नहि दोगे? अकेले-अकेले खारहे हौ?"
मैंने झटके सें रजाई फेंकी औऱ उसके कंधे पर्र झपट पड़ी। शुभम डगमगाया पऱ उसनेगरम चाय संभाल ली।
शुभम:"ओ बाप रे! तुम् तौ बिल्कुल बिल्ली कि तरह झपट्टा मारती होँ। लो, पकड़ो अपना कुल्हड़। "
मे: (मुँहबना कर) "नहि। हाथ नहि निकालूँगी मे। आपने वादा किया थां कि आप् अपने हाथों सें पिलाओगे। सुनिए, भूलगए क्याँ अपना वादा?"
शुभम नें हारमान ली। वोँ बेड पर्र मेरे बिल्कुल पासबैठ गय़ा। उसने कुल्हड़ मेरे होठों सें लगाया। गरमचाय कां वोँ पहला घूँट.उफ़! पहाड़ों कि उसठंड मे जैसेरूह तक गर्म होँ गई।
मे: "वाउ! आप् तौ बड़े अच्छे बावर्ची निकले। पर्र सुनिए। बिस्किट भि तोँ खिलाओ। "
शुभम नें एक् बिस्किट गरमचाय मे डुबोया औऱ मेरे मुँह केँ पास लाया। जैसे हि मैंने उसे खाने केँ लिए मुँह खोला, उसनेहाथ पीछे खींच लिया।
मे: "एऽऽ!यह क्याँ बदतमीजी हैं? दो मुझे!"
मे उसकेहाथ कि तरफ लपकी, पर्र वोँ बिस्किट ऊपर करके हंसने लगा। मे उसकेऊपर चढ़ गई औऱ उसके हाथों कों पकड़ने कि कोशिश करनेलगी। हम् दोनों बेड पऱ लोट-पोट होनेलगे।
शुभम: "अच्छा बाबालो! यहलो, रोनामत अब। "
उसने मुझे बिस्किट खिलाया, तौ मैंने जानबूझकर उसकी उंगली पऱ हल्का सां काट लिया।
शुभम:"अहह! जंगली कहीं कि। यह प्रेम हैं याँ हमला?"
मे: (हंसते हुए औऱ उसकेगले मे बाहें डालकर) "यह मेराहक हैं। औऱ सुनिए, आज पूरेदिन हम् कहीं बाहर् नहि जाएंगे। आप् बसयहा बैठेंगे औऱ मुझे अपनी कहानियाँ सुनाएंगे। औऱ हाँ, मुझेफिन सें वही गुदगुदी वाली शरारत करनी हैं। "
मैंने उसकेपेट मे गुदगुदी करना शुरुआत कर दिया। शुभम खिलखिलाकर पीछे हटनेलगा।
शुभम: "सुमन.रुक जाओ!गरम चायगिर जाएगी। तुम् सच मे 5 साल कि बच्ची बन गई हौ क्याँ?"
मे: (उसकीनाक चूमते हुए)"हाँ, आपकेपास आकर मे सभीभूल जाती हूं। सुनिए, क्याँ हम् हमेशा ऐसे हि नहि रह सकते? जहाँ नं कोई समाज हौ, नं कोई बंधन.बस आप्, मे औऱ यहगरम चाय कि चुस्कियाँ। "
शुभम नें गरमचाय कां कुल्हड़ मेज पऱ रखा औऱ मुझे बहोत कोमलता सें अपने सीने सें लगा लिया। कमरे कि शांति मे केवल हमारी धड़कनें सुनाई देरही थीं।
शुभम: "हम् जहाँ भि रहेंगे, ऐसे हि रहेंगे। तुम् मेरी छोटी बच्ची भि हौ औऱ मेरीजान भि। "
मैंने उसके कुर्ते कां बटन मरोड़ते हुएकहा, "सुनिए, एक् बात बताऊं? जब आप् मुझेऐसे देखते हें नं, तौ मेरामन करता हैं कि मे फिन सें ज़ोर-ज़ोर सें चिल्लाऊं कि 'आप् केवल मेरे हौ'!"
शुभम नें मेरेगाल खींचे औऱ हम् फिन सें उसी रजाई केँ चैन मे खोगए
मे: (उनके बालों कों सहलाते हुए)"अब बस भि कीजिये, कितनी देर तक ऐसे हि चिपकी रहेंगी? देखिये, सूरजअब पूरा निकलआया हैं। "
सुमन नें अपनीपकड़ औऱ मजबूत करली औऱ मेरे कुर्ते केँ धागे सें खेलने लगीं।
सुमन: "आप् कितने निष्ठुर हें। अभि-अभि तोँ गरमचाय पी हैं, अबफिन सें भागने कि बातें करनेलगे? मुझे कहीं नहि जानां। मुझे तौ बसयहा आपकेपास लेटे रहना हैं। "
वोँ मुझे 'आप्' कहकर बुलारही थीं, औऱ यकीन मानिए, उनके मुँह सें यह शब्द किसी म्यूज़िक कि तरहलग रहा थां। 'तुँ' मे जौ अपनापन थां, 'आप्' मे उससे कहीं अधिक सम्मान औऱ समर्पण थां।
मे: "अच्छा बाबा, नहि जारहा कहीं। पऱ देखिये तौ सही, आपकीनाक ठंड सें कितनी लाल होँ गई हैं। बिल्कुल गाजर जैसीलग रही हें आप्। "
सुमन: (खिलखिलाकर हंसते हुए औऱ अपना चेहरा मेरेगले मे छुपाते हुए) "होने दीजिये लाल। आप् हि तौ कहते थें कि मुझे पहाड़ों कि ठंड देखनी हैं। अबदेख ली, अब मुझे गर्मी दीजिये। आप् बस चुपचाप बैठे रहिये औऱ मुझे अपनीकोई पुरानी बात सुनाइये। "
मैंने उन्हें अपनीगोद मे थोड़ा औऱ ऊपर खींच लिया। वोँ बिल्कुल छोटी बच्ची कि तरह मेरी बातें सुनने केँ लिए सजधजकर हौ गईं।
मे: "पता हैं, जब मे छोटा थां औऱ आप् मुझे लोरी सुनाकर सुलाती थीं, तब मे सोचता थां कि बड़ी होकर मेरी पत्नि बिल्कुल आपकीतरह होगी। पऱ मुझे क्याँ पता थां कि क़िस्मत मुझे स्वयं आपके हि इतना लगभग लेँ आएगी कि दुनिया केँ सारे रिश्ते फीकेपड़ जाएंगे। "
सुमन कि आँखों मे अचानक नमीतैर गई। उन्होंने अपनासिर उठाकर मेरी आँखों मे देखा।
सुमन: "शुभम। आप् सचकहरहे हें? आपकोकभी पछतावा तोँ नहि होता? समाज कि नजरों मे मे."
मैंने उनके होठों पऱ अपनी उंगली रख दि।
मे: "शशश.यहा कोई समाज नहि हैं। यहाबस मे हूं औऱ आप् हें। औऱ मेरेलिए आप् दुनिया कि सबसे पवित्र औऱ खूबसूरत औरत हें। "
सुमन नें मुस्कुराकर मेरी हथेली कों चूम लिया औऱ फिन सें शरारत पऱ उतरआईं।
सुमन: "अच्छा, तोँ मे खूबसूरत हूं? तोँ फिन आप् मुझे बाहर् बर्फ मे खेलने क्यूं नहि लेँ जारहे? मुझे बर्फ केँ गोले बनाकर आपपर फेंकने हें। देखूँ तौ सही, आप् कितनी दूर तक भाग पाते हें। "
मैंने हंसकर उन्हें खाट सें उठाने कि कोशिश कि, पऱ वोँ फिन सें बैड पऱ लेटगईं औऱ जोर-जबरदस्ती करने लगीं।
सुमन: "नहि-नहि! पहले आप् मुझेगोद मे उठाइये, फिन मे जाऊंगी। वरना मे यहीं लेटी रहूँगी औऱ खानां भि नहि खाऊँगी। "
उनकीयह बच्चों जैसीजिद
कौसानी केँ बाहर् बर्फीली चादर बिछी थि।
सुमन बच्चों कि तरहउछल रहीथीं।
उन्होंने मुझे ज़बरदस्ती बाहर् खींच लिया।
सुमन: "आप् जल्द आइये नं! देखिये कितनी खूबसूरत बर्फ हैं। "
वोँ झुककर बर्फ केँ गोले बनाने लगीं।
उनकी चूड़ियाँ बर्फ कि सफेदी मे खनकरही थीं।
अचानक उन्होंने एक् गोलामुझ पऱ दे मारा।
मे: "अच्छा! अब आपकी इतनी हिम्मत?"
मे उन्हें पकड़ने केँ लिए दौड़ा।
सुमन खिलखिलाकर भागीं औऱ बर्फ मे लुका-छिपी करने लगीं।
मे तेज़ रफ़्तार सें उनकीओर बढ़ा।
तभी पांव फिसला औऱ मे एक् ढलान सें नीचेजा गिरा।
एक् नुकीले पत्थर सें मेरा घुटना टकरा गय़ा।
मे: "अहह! मां." (दर्द केँ मारे मेरे मुँह सें चीख निकल गई)
सुमन कि हंसी एक् लम्हा मे गायब हौ गई।
उनका चेहरा सफेदपड़ गय़ा।
वोँ पागलों कि तरह चीखते हुए मेरीतरफ दौड़ीं।
सुमन: "शुभम! शुभम! आपको क्याँ हुआ? आप् ठीक तोँ हें न्?"
वोँ मेरेपास बर्फ मे घुटनों केँ बलबैठ गईं।
उनका पूरा जिस्म कांपरहा थां।
मेरे घुटने सें खून निकलता देख वोँ सुबकने लगीं।
सुमन:"हे ईश्वर! यहसभी मेरीवजह सें हुआ। मे मर क्यूं नहि गई!"
उन्होंने बिना सोचे अपना रेशमी दुपट्टा फाड़ा।
वोँ मेरे जख्म पऱ पट्टी बांधने लगीं।
उनके आंसू मेरेघाव पर्र गिररहे थें।
मे: "सुमन, शांत होँ जाइये। बस मामूली खरोंच हैं। "
पर्र वोँ कुछ नहि सुनरही थीं।
उन्होंने मुझे सहारा देकर उठाने कि कोशिश कि।
उनकीपकड़ इतनी मजबूत थि जैसे वोँ मुझे दुनिया केँ हर खतरे सें बचा लेना चाहती हों।
सुमन:"चुप रहिये आप्! अब एक् शब्दमत बोलिए। "
वोँ मुझे करीब घसीटते हुए फार्महाउस केँ अंदर लेँ आईं।
खाट पऱ बिठाकर उन्होंने मेरेपेर अपनीगोद मे रखलिए।
वोँ पागलों कि तरह मेरे जख्म कों चूमरही थीं औऱ रोरही थीं।
सुमन: "आपकोकुछ हौ जाता तौ मेरा क्याँ होता? आप् जानते हें नं, आप् मेरी अंतिम सांस हें?"
उससमय उनकी आँखों मे 'मां' कि ममता औऱ 'प्रेमिका' कां डर एक् संगदिख रहा थां।
वोँ बार-बार मेरे सीने सें चिपकरही थीं, जैसे तसल्ली कररही हों कि मे ज़िंदा हूं।
मम्मी कां pov
शुभम पलंग पर्र लेटा थां, उसकाबदन बुखार कि तपिश मे भट्टी कि तरहजल रहा थां। मैंने उसकेसिर केँ पास ठंडे पानी कां कटोरा रखाहुआ थां। मे बार-बार पट्टियाँ बदलरही थि औऱ मेरी आँखों सें आँसू थमने कां नाम नहि लें रहे थें।
मे पागलों कि तरह बड़बड़ा रही थि, जैसे खुदा सें लड़रही होऊं।
मे: "क्यूं किया मैंने ऐसा? क्यूं बाहर् लें गई मे आपको? मेरी हि जीभजल गई होती जौ मैंने बर्फ मे खेलने कि जिद कि। ईश्वर, मेरे शुभम कों ठीककर दो, बदले मे मेरीजान लें लो। "
शुभम नें धीरे-धीरे सें अपनी आँखें खोलीं औऱ कांपते हुएहाथ सें मेराहाथ थामना चाहा।
शुभम: "सुमन। सुनिए। मे ठीक हूं। आप् इतनामत."
मे: (झटके सें उसकाहाथ हटाते हुए औऱ डांटते हुए)"चुप! एकदमचुप! एक् शब्द भि मत बोलिए आप्। बहोत शौक हैं न् आपको बहादुर बनने कां? देखिये अपनी हालत। अब जब तक बुखार नहि उतरता, आप् अपनी जुबान नहि खोलेंगे। "
मैंने फिन सें ठंडी पट्टी उसके माथे पर्र रखी। मेराहाथ थरथरा रहा थां।
मे: (फिन सें बड़बड़ाते हुए)"अगर आपकोकुछ हौ गय़ा, तोँ मे इसी पहाड़ सें कूद जाऊंगी। लोग कहते हें पाप हैं, पर्र मेरा सबसेबड़ा पुण्य तौ आप् हें। आप् हि चलेगए तौ इस पापिनी कां क्याँ होगा? रमेश औऱ नीतू कि दुनिया तौ चल जाएगी, पऱ मेरी दुनिया तोँ आपकीइन बंद आँखों मे बसी हैं। "
शुभम नें फिन सें कुछ कहने केँ लिए होंठ फड़फड़ाए, जैसे वोँ मुझे दिलासा देनाचाह रहा हौ।
शुभम: "सुमन। रोइये मत। मुझे दर्द."
मैंने उसके होठों पर्र अपनी उंगली रख दि। मेरी आँखों केँ आंसू उसके गालों पर्र गिररहे थें।
मे: "कहा न् चुप रहिये! आपका दर्द मे महसूस कररही हूं। यहचोट आपके घुटने पर्र नहि, मेरे कलेजे पर्र लगी हैं। खबरदार जौ अब बोलने कि कोशिश कि। बस मुझे देखते रहिये औऱ जल्द सें ठीक होँ जाइये। "
पूरीरात मे वहीँ बैठीरही। हरदो मिनट मे पट्टी बदलती, कभी उसकेहाथ सहलाती तौ कभी उसके तपते माथे कों चूम लेती। अँधेरे कमरे मे मेरी सिसकियाँ औऱ "आप् ठीक हौ जाएंगे" कि बड़बड़ाहट गूँजती रही
रात कां अंतिम पहर थां।
शुभम कां बुखार अब आहिस्ता उतररहा थां।
पऱ मेराडर अभि भि वैसा हि थां।
मे उसकी रजाई केँ एक् कोने कों पकड़कर फर्श पऱ हि बैठीरही।
पट्टियां बदलते-बदलते मेरीकमर अकड़ गई थि, पर्र मुझेहोश नहि थां।
बड़बड़ाते हुए नं जानेकब मेरीआँख लग गई औऱ मेरासिर शुभम केँ उसी जख्मी पेर केँ पासटिक गय़ा।
सुभह कि पहली किरणजब कमरे मे आई, तौ शुभम कि आँख खुली।
उसने देखा कि मे उसके पैरों केँ पास सिमटी हुई सोरही हूं।
मेरी पलकें आँसुओं सें अभि भि गीलीथीं।
शुभम नें धीरे-धीरे सें अपनाहाथ मेरेसिर पर्र रखा।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे) "सुमन.ओ पागल सुमन। उठिये। "
मे झटके सें जागी।
जैसेकोई सपनाटूट गय़ा होँ।
मैंने जल्दी उसका माथाछुआ।
मे: "एजी! आप् उठगए? बुखार कैसा हैं? दर्द होँ रहा हैं क्याँ? मे डॉक्टर कों बुलाऊँ?"
शुभम मुस्कुराया। उसकी मुस्कान मे थोड़ी कमजोरी थि, पर्र बहोत सारा प्रेम थां।
शुभम: "मे ठीक हूं। आप् पूरीरात जागीरही हें? देखिये अपनी आँखें, कैसीसूज गई हें। "
मैंने अपनासिर उसके सीने पऱ रख दिया।
मे फिन सें बच्चों कि तरह सुबकने लगी।
मे: "मुझेडरा दिया थां आपने। दोबारा ऐसीजिद नहि करूँगी। आप् बस मेरेपास रहिये, ठीक होकर। "
शुभम नें मुझे घसीटकर अपने लगभग लिटा लिया।
वो बार-बार मेरेसिर कों चूमरहा थां।
शुभम:"अब रोनाबंद कीजिये। देखिये, बाहर् धूप निकलआई हैं। आज हम् कहीं बाहर् नहि जाएंगे। बस यहीं लेटे रहेंगे। "
मे: (लाड़ सें) "हाँ, औऱ आप् हिलेंगे भि नहि। मे स्वयं आपको अपने हाथों सें दलिया खिलाऊँगी। औऱ खबरदार जोँ आपनेमना किया। "
शुभम हंसा औऱ उसने मेराहाथ कसकरपकड़ लिया।
कौसानी कि वोँ सुभहधूप सें ज़्यादा हमारे प्रेम कि गरमाहट सें भरी थि।
ऐसालग रहा थां जैसेइस चोट नें हमें एक्-दूसरे केँ औऱ भि लगभगला दिया
दलिया कि कटोरी हाथ मे लिए मे शुभम केँ पासबैठ गई। मेरामन अभि भि कलरात केँ डर सें भरा थां, मगरअब उसमें एक् अजीब सि ज़िद औऱ दीवानगी भर गई थि। मे चाहती थि कि वोँ पूरीतरह मुझ पर्र आश्रित हौ जाए।
शुभम नें जैसे हि चम्मच देखा, उसने मुँहबना लिया।
शुभम: "सुमन.यह दलिया? बिल्कुल फीकालग रहा हैं। मेरामन नहि हैं खाने कां। "
मैंने एक् चम्मच भरा औऱ उसके होठों केँ पास लेँ गई। मेरी आँखों मे एक् अजीब सि चमक थि।
मे: "चुपचाप खाइए। आप् बीमार हें, औऱ बीमारों कों नखरे शोभा नहि देते। "
शुभम नें अनिच्छा सें मुँह खोला। जैसे हि उसने एक् घूँटभरा, थोडा सां दलिया उसके होठों केँ कोने सें बहकर उसकी ठुड्डी पर्र गिर गय़ा।
मैंने उसे पोंछने केँ लिए रुमाल नहि उठाया। बल्कि, मैंने अपनी उंगली सें उस गिरेहुए दलिए कों उठाया औऱ उसे वापस मेरे मुँह मे डालने कि कोशिश कि।
शुभम: (हैरानी औऱ घिन सें) "सुमन!यह क्याँ कररही हें आप्? हटाओइसे, यह गंदा हैं। "
मे: (पागलों कि तरह मुस्कुराते हुए) "गंदा? आपका झूठा मेरेलिए गंदा केसे हौ सकता हैं? आपकेबदन सें निकली हरचीज़ मेरेलिए प्रसाद हैं। "
मैंने वही उंगली अपने मुँह मे डालली। शुभम कां चेहरा पीलापड़ गय़ा। उसे शायद मुझमें वोँ 'मम्मी' अब बिल्कुल नहि दिखरही थि, बल्कि एक् ऐसी महिला दिखरही थि जौ उसके प्रेम मे मानसिक संतुलन खो चुकी थि।
शुभम: "सुमन, आप्। आप् अजीब बर्ताव कररही हें। रहने दीजिये, मे स्वयं खा लूँगा। "
मे: (गुस्से मे उसकाहाथ झटकते हुए) "नहि! आप् नहि खाएंगे। मे खिलाऊँगी। औऱ अगर आपने मुँह मोड़ा, तोँ मे यह पूरी कटोरी अपनेसिर पऱ उड़ेल लूँगी। "
मैंने चम्मच मे दलिया भरा औऱ उसे अपने मुँह मे लेकर चबाया, फिनउसे शुभम केँ मुँह केँ पास लेँ गई।
मे: "लीजिये, अबयहनरम हौ गय़ा हैं। खाइएइसे। "
शुभम कि आँखों मे खौफसाफ दिखरहा थां। वो बैड पर्र पीछे कि ओर खिसकने लगा। उसे लगा कि पहाड़ों कि इस तन्हाई नें औऱ कलरात केँ डर नें मुझे किसी अंधेरी राह पर्र धकेल दिया हैं।
शुभम: "सुमन, बस कीजिये! मुझे उल्टी आँ रही हैं। आप् ऐसी तोँ नहि थीं."
मे: (हंसते हुए, उसकी आँखों मे आँखें डालकर) "मे ऐसी हि हूं। आपकी दीवानी। आपकेखून, आपके जख्म औऱ आपके झूठे सें मुझे नफरत नहि, मुहब्बत हैं। खाइएइसे, वरना मे रोना शुरुआत कर दूँगी। "
कमरे मे एक् अजीब सि भारी औऱ घुटनभरी खामोशी छा गई।
। मेरी दीवानगी उस दहलीज पर्र थि जहाँ नफरत औऱ मुहब्बत कां फर्कमिट जाता हैं।
शुभम: (रुँधे हुएगले सें) "सुमन। आप् होश मे तोँ हें? देखिये आप् क्याँ कररही हें। येसभी। ये बहोत डरावना हैं। "
मैंने दलिया कि कटोरी मेज पर्र पटक दि। उसकी आवाज़ सें शुभम सिहरउठा। मैंने उसके चेहरे कों अपने दोनों हाथों मे कसकर पकड़ा। मेरी उंगलियों पऱ अभि भि उस लिसलिसे दलिए केँ निशान थें।
मे: (पागलों कि तरह बुदबुदाते हुए) "डरावना? आपको मे डरावनी लगरही हूं? कलरात जब आप् बुखार मे उतावलापन रहे थें, तब मे खुदा सें आपकी ज़िंदगी कि भीख मांगरही थि। तब मे आपकी मम्मी थि, आपकी तीमारदार थि। औऱ अब.अबजब मे आपमें पूरीतरह घुल जानां चाहती हूं, तोँ मे गंदी हौ गई?"
मैंने उसकी आँखों मे अपनी आँखें गड़ादीं।
मे: "सुनिए। आप् मेरे हें। आपकी गंदगी भि मेरी हैं। मे तौ चाहती हूं कि मे आपका वोँ सारा दर्दपी जाऊँ जोँ उसचोट सें निकलरहा हैं। क्याँ आपको बुरा लगेगा अगर मे आपकेउस जख्म कों अपनी ज़ुबान सें साफकर दूँ?"
शुभम नें झटके सें अपना पांव पीछे खींचा। उसकी आँखों मे अब प्रेम नहि, दहशत थि।
शुभम:"बस! बहोत हौ गय़ा। मुझे वापस जानां हैं। मुझे बनारस जानां हैं। आप्। आप् वोँ सुमन नहि रहीं जिसे मे जानता थां। आप् तौ किसी साये कि तरहलग रही हें। "
वो लंगड़ाते हुएबैड सें उठने कि कोशिश करनेलगा। उसकाये मुझसे दूर दौड़ना मेरे कलेजे कों चीर गय़ा। मे उसके पैरों सें लिपट गई।
मे: (चीखते हुए) "नहि! आप् कहीं नहि जाएंगे। आप् वापसउसी खड़ूस रमेश केँ पास जानां चाहते हें? उस नीतू केँ पास? जौ आपको मुझसे छीन लेगी? मे ऐसा नहि होने दूँगी!"
मैंने अपने नाखूनों सें अपने हि हाथ कों खरोंच लिया। खून कि एक् पतली लकीरउभर आई।
मे: "देखिये! अगर आप् गए, तोँ मे अपनागला काट लूँगी। फिन आप् मेरेइस खून सें तिलक लगाकर बनारस चले जानां। क्याँ तब आपकोघिन नहि आएगी
बहोत हि गरमागरम कामुक औऱ उत्तेजना सें भरपूर कामोत्तेजक एपसोड हैं भइया मज़ा आँ गय़ा
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-16
शुभम कि आँखों मे समयभर केँ लिए जौ दहशत थि, वोँ अचानक एक् गहरे, थके हुए समर्पण मे बदल गई। उसने अपनी आँखें मूँदलीं औऱ एक् लंबी साँस छोड़ी। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि वो मुझसे जीत नहि सकता, औऱ शायद वो अब हारना हि चाहता थां।
उसने अपनाहाथ आगे बढ़ाया औऱ मेरे चेहरे पर्र फैलीउस दलिए कि गंदगी कों अपनी उंगलियों सें छुआ।
शुभम: (धीमी औऱ भारी आवाज़ मे) "ठीक हैं सुमन.अगर आपकी मुहब्बत यही हैं, तौ मे भि यहीं हूं। मे कहीं नहि जारहा। अगर आपको मेरी गंदगी मे हि चैन मिलता हैं, तौ मुझे भि आपकीइस सनक सें कोई ऐतराज़ नहि। मे पूरीतरह आपका हूं। जैसे चाहें वैसे रखिए मुझे। "
शुभम कां ये समर्पण देखकर मेरा रोम-रोम खिलउठा। मेरी आँखों मे एक् विचित्र सि चमक आँ गई। मे पागलों कि तरह हंसने लगी औऱ उसकेगले सें लिपट गई।
मे: (उसकेकान केँ पास फुसफुसाते हुए)"अब हुई न् बात!अब लगरहे हें आप् मेरे अपने। आपकोपता हैं, बनारस कि उस किचन मे जब मे आपके झूठे बर्तन मांजती थि, तोँ मेरामन करता थां कि मे उन्हें कभीसाफ़ हि न् करूँ। मे उन बर्तनों पर्र लगी आपकी जूठन कों घंटों निहारती थि। "
मैंने उसकेहाथ कों अपने मुँह केँ पास लिया औऱ उसकी उंगलियों कों चूसने लगी, जैसे वोँ कोई अमृत हौ।
मे: "मेरी फैंटेसी जानते हें क्याँ हैं? मे चाहती हूं कि आप् राजा कि तरह बैठेरहे, औऱ मे आपकी तीमारदारी करूँ। मे चाहती हूं कि आप् अपनीहर ज़रूरत केँ लिएमुझ पर्र निर्भर रहें। यहा तक कि आप् जौ पानी पिएं, वोँ भि पहले मेरे मुँह सें होकर आप् तक जाए। मुझे अच्छा लगता हैं जब मे आपके पसीने कों अपनी त्वचा पऱ महसूस करती हूं। मुझे वोँ महक मनपसंद हैं जोँ आपके शरीर सें आती हैं जब आप् थककर सोते हें। "
शुभमबस बुतबना मुझेदेख रहा थां।
लोगइसे घिनौना कहेंगे, पर्र मेरेलिए यह एक् इबादत हैं। मे चाहती हूं कि आपकेबदन कां हर एक् कतरा, हर एक् निशान मात्र मेरा हौ। मे आपकोचबा जानां चाहती हूं शुभम, ताकि आप् कभी मुझसे अलग न् हौ सकें। "
मैंने दलिया कि वोँ कटोरी फिन उठाई औऱ अपने हाथों सें मलकरउसे एक् अजीब सां लेपबना दिया। फिन मैंने उसे शुभम केँ चेहरे औऱ गर्दन पर्र मलना शुरुआत किया। (यह गांधी केवल मुझे पसन्द हैं )
मे: "अब आपमें सें मेरीगंध आएगी। अब कोई 'ख़ुशबू' याँ 'नीतू' आपकेपास आने कि हिम्मत नहि करेगी। आप् मात्र मेरे 'खिलौने' बनकर रहेंगे इस कमरे मे। "
शुभम नें विरोध नहि किया। उसने अपनासिर पीछे टिका दिया औऱ इस घिनौनी हकीकत कों स्वीकार कर लिया
मन पऱ सिर्फ़ एक् हि धुन सवार थि—कि शुभम कों पूरीतरह, कानूनी औऱ रूहानी तौर पर्र अपनाबना लूँ ताकि दुनिया कां कोई भि नाता हमारे बीच नं आँ सके।
मैंने शुभम केँ कॉलर कों झटके सें पकड़ा औऱ उसे अपनीओर खींचा।
मे: (पागलों कि तरह हंसते हुए) "सुनिए। मुझेअब 'मम्मी' बनकर नहि रहना। मुझे घुटन होती हैं इस शब्द सें। मुझे आपकी पत्नि बनना हैं। अभि। इसी वक़्त! इस पहाड़ कों गवाह मानकर हम् फेरे लेंगे। "
शुभम कां चेहरा सफेदपड़ गय़ा थां, पर्र उसने विरोध नहि किया। उसका समर्पण अब एक् ठंडी खामोशी मे बदल चुका थां।
शुभम: "सुमन.यहा कोई पंडित नहि हैं, कोई अग्नि नहि हैं। आप् क्याँ कहरही हें?"
मे: "अग्नि हैं नं! यह अंगीठी जलरही हैं। औऱ पंडित? हमारा यह पागलपन हि सबसेबड़ा गवाह हैं। उठिये!"
मैंने उसेबेड सें सहारा देकेखड़ा किया। मैंने सिन्दूर कि डिबिया निकाली, जौ मे हमेशा अपनेसंग रखती थि। मैंने उसकाहाथ पकड़ा औऱ ज़बरदस्ती उसकी उंगली सिन्दूर मे डुबो दि।
मे: (हुक्म देतेहुए) "भरिये मेरी मांग! औऱ कहिये कि आज सें मे आपकी अर्धांगिनी हूं। "
शुभम केँ कांपते हाथों नें मेरी मांग मे वोँ सुर्ख लाल सिन्दूर भर दिया। वोँ सिन्दूर मेरे माथे सें बहकर मेरीनाक तक आँ गय़ा, पर्र मुझे वोँ किसी श्रृंगार जैसालगा। हमने अंगीठी केँ सात चक्कर लगाए। हर चक्कर केँ संग मे एक् वचन दोहरा रही थि—कि मे आपकोकभी आज़ाद नहि करूँगी, कि मे आपकीरूह तक कों पी जाऊंगी।
विवाह पूरी होते हि मैंने कमरे कि कुंडी चढ़ा दि। बाहर् बर्फ कां तूफान तेज़ हौ गय़ा थां।
मे: (एक् जंगली मुस्कान केँ संग)"अब। अब हमारी सुहागरात होगी। आज न् कोई मर्यादा हैं, न् कोई नाता। आज केवल एक् प्यासी महिला हैं औऱ उसका शिकार। आपकोडर लगरहा हैं? मत डरिये। मे आपको इतना प्रेम करूँगी कि आप् अपनी सुध-बुध खो देंगे। "
मैंने बिजली कां स्विच बंदकर दिया। अब कमरे मे सिर्फ़ अंगीठी कि लाल लपटें नाचरही थीं। मैंने अपनी साड़ी कां पल्लू नीचे गिरा दिया। मेरा रोम-रोम कांपरहा थां, पऱ वोँ ठंड सें नहि, बल्कि उस उत्तेजना सें थां जौ बरसों सें मेरे अंदरदबी हुईँ थि।
मे: "आजरात आप् मेरे कैदी हें शुभम। आज रात मे वोँ हर घिनौनी औऱ हसीन हरकत करूँगी जौ मैंने सपनों मे सोची थि। आपकायह शरीर, यह ज़ख्म, यह धड़कन.सभी आज मेरा हैं। "
मे अंधेरे मे उसकीओर बढ़ी
तभी शुभम कों क्याँ हुआ उसने मेरेगाल पे एक् खीच केँ तमाचा लपेट दिया
कमरे कि वोँ पागलपन भरी खामोशी अचानक टूट गई। मेरी आँखों केँ सामने जैसेकोई पर्दा हटा औऱ मुझे अपनी हि हरकतों पर्र ग्लानि होनेलगी। मैंने शुभम कों देखा—वोँ असहाय, औऱ थकाहुआ मेरीओर देखरहा थां। मेरा कलेजा मुँह कों आँ गय़ा।
मैंने झटके सें अपनी साड़ी संभाली औऱ उसके पैरों मे गिरपड़ी।
मे: (फफक-फफक कर रोतेहुए) "मुझेमाफ़ कर दीजिये शुभम। मुझेमाफ़ कर दीजिये! मे पागल हौ गई थि। मे क्याँ सें क्याँ कर बैठी। "
मैंने उसे सहारा देकरबैड पऱ बिठाया औऱ उसकासिर अपनीगोद मे रख लिया। मेरा रोनाथम नहि रहा थां। मैंने धीरे-धीरे सें उसके होठों केँ पास अपना आँचलरखा। उस लम्हा सारी वासना औऱ घिनौनापन धुल गय़ा, बस एक् रूहानी तड़परह गई।
मैंने उसे अपने सीने सें लगा लिया, बिल्कुल वैसे जैसे बरसों पहलेउसे छोटा होने पर्र लगाती थि।
मे: (सिसकते हुए) "आप् जानते हें शुभम। आप् क्याँ हें मेरेलिए? जब आप् छोटे थें औऱ पहलीबार 'मां' कहा थां, तब मुझेलगा थां कि मेरा जिंदगी सफल होँ गय़ा। पऱ जब आप् जवानहुए औऱ आपकी आँखों मे मेरेलिए वोँ चाहत देखी, तौ मे अंदर हि अंदरमर गई थि। मैंने रातों-रात जागकर खुदा सें जंगलड़ी हैं कि मुझेइस पाप सें बचा लें। "
शुभम खामोश थां, बस मेरी धड़कनें सुनरहा थां। मैंने उसके सूखे होठों कों सहलाया औऱ उसे अपना ममताभरा स्पर्श दिया।
मे: "कितनी रातें मैंने रोतेहुए काटी हें। बनारस कि उस किचन मे जब मे खानां बनाती थि, तौ मेरी आँखों केँ आंसूदाल मे गिरते थें। मे डरती थि कि कहीं मेरीयह तड़प पूरी दुनिया कों न् दिखजाए। मैंने स्वयं कों बहोत कष्ट दिया।
हैं, भूखीरही हूं, ताकियह आगबुझ जाए। पऱ यहआग तोँ आपकी दि हुई थि, यह केसे बुझती?"
मैंने उसे सहलाते हुए अपनी आपबीती सुनाई—केसे मे रमेश केँ पास होकर भि हर लम्हा शुभम कां हि अक्स ढूँढती थि।
मे: "शुभम, मैंने आपको पाने केँ लिए अपनासभी कुछ दांव पऱ लगा दिया। वोँ लोक-लाज, वोँ इज्जत। सभी मिट्टी मे मिला दि। आज जौ मे पागल हौ गई थि, वोँ उसी बरसों कि तड़प कां नतीजा थां। मुझेलगा अगर मे घिनौनी नहि बनूँगी, तोँ आप् मुझे छोड़कर चले जाएंगे। मे डरती हूं कि कोई जवान लड़की आपको मुझसे छीन न् लेँ। "
उसरात कौसानी कि उस कोठरी मे, अंगीठी कि मद्धम रोशनी मे, मे उसे अपनी ममता औऱ अपनी छाती केँ साटन सें बेपनाह इश्क कां रस पिलारही थि। वोँ केवल एक् जिस्मानी जुड़ाव नहि थां, वोँ मेरीरूह कां उसके अस्तित्व मे विलीन होना थां
मे: (उसके माथे कों चूमते हुए) आप् मेरे अंदर रचे-बसे हें। मे मर भि जाऊं, तौ मेरादूध आपकी रगों मे बनकर दौड़ेगा। बस मुझे छोड़कर मत जाइयेगा। मे बहोत अकेली हूं शुभम। बहोत अकेली आज सें मे आपकी मम्मी केँ संगसंग अर्धांगनी भि हूं
अबवहा सिर्फ़ एक् बेपनाह, दर्दभरी ममता औऱ अटूट समर्पण बचा थां। मैंने शुभम कां सिर अपनी छाती सें लगा लिया थां, बिल्कुल वैसे हि जैसे बरसों पहलेउसे लोरी सुनाते समय लगाती थि।
मेरी आँखों सें आँसू लगातार बहरहे थें औऱ शुभम केँ बालों कों भिगोरहे थें। मैंने उसे अपनी बाहों केँ घेरे मे ऐसेभर लिया थां जैसेउसे दुनिया कि हर बुरीनज़र सें छुपा लूँगी।
मे: (सिसकते हुए औऱ उसे पुचकारते हुए) "मेरा बच्चा। मेरा शुभम। क्यूं इतना तड़पाया आपने मुझे? देखिये, इस ममता कों पाने केँ लिए मे कितनी दर-दर भटकी हूं। लोगइसे पाप कहते हें, पर्र उन्हें क्याँ पता कि यह प्यास कितनी पुरानी हैं। "औऱ दूध पिलाने लगी अपना
मैंने धीरे-धीरे सें उसे अपने जिस्म सें औऱ लगभगकर लिया। उस समय मे कोई कामुक औरत नहि थि, मे बस उसकी वोँ 'सुमन' थि जोँ अपना सर्वस्व उसे सौंप देना चाहती थि। जब उसने एक् नन्हे बच्चे कि तरह मेरी ममता कां रस लेना शुरुआत किया, तौ मेरे मुँह सें एक् गहरी'अहह' निकल गई। वोँ अहह दर्द कि नहि, एक् रूहानी चैन कि थि।
मे: (रोतेहुए औऱ उसकेसिर कों सहलाते हुए)"अहह। शुभम! धीरे-धीरे। आप् जब अपनीपकड़ मजबूत करते हें, तौ मेरीरूह कांप जाती हैं। काटिये। मुझे दर्द दीजिये। जब आप् मुझेऐसे छुएंगे, तौ मुझे अहसास होगा कि आप् सच मे मेरेपास हें। मुझेमज़ा आएगाउस दर्द मे, क्योंकि वोँ दर्द आपका दियाहुआ हैं। "
मेरी आवाज़ भर्रा गई थि। मैंने अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उस अहसास मे डूब गई।
मे: "कितनी रातें मैंने इसी लम्हा कां सपने देखा थां। बनारस केँ उस सूनेखाट पऱ मे तकिए कों सीने सें लगाकर रोती थि कि काश मेरा शुभम मेरेपास होता। आज यह पहाड़ गवाह हें कि मैंने अपनी ममता औऱ अपनी इश्क कां सारा कर्ज उतार दिया हैं। पी लीजिये। मेरा सारा वजूदपी लीजिये, ताकि मेरेखून केँ संग मेरा प्रेम भि आपकी रगों मे हमेशा केँ लिएबस जाए। "
शुभम भि जैसे किसी गहरी समाधि मे थां। वो निश्छल होकरउस ममता रूपी मम्मों कों ग्रहण कररहा थां। कमरे मे सिर्फ़ मेरी सिसकियों औऱ उसकी सांसों कि आवाज़ गूँजरही थि।
मे: "अबकोई डर नहि हैं शुभम। अब कोई रमेश, कोई नीतू हमारे बीच नहि हैं। आजरात मे मम्मी भि हूं औऱ आपकी प्रेमिका भि। औऱ पत्नि भि मुझेऐसे हि अपनेपास रखिये, मुझे छोड़िएगा मत। वरना मे सच मे मर जाऊंगी
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
UPDATE-17
अब तक मे शुभम कों दूध पिलारही थि, मुझे बहोत अच्छा लगरहा थां कि मेरा बच्चा फिन सें मुझेमिल गय़ा हैं, मे उठ खड़ी हुई औऱ मे सीधा बालकनी मे जा केँ बैठ गई,
तभी शुभम मेरे पीछे-पीछे आयातब मे —
सुमन (मां)
शुभम, यहा कितनी शांति हैं नं?" मैंने धीरे-धीरे सें कहा।
शुभम नें मेरे कंधे पऱ हाथरखा। "हाँ मम्मी, औऱ आप् इस नज़ारे मे औऱ भि हसीनलग रही होँ। "
मे थोड़ा शर्मा गई। "चुप करिए, कुछ भि बोलते हें। "
"सचकहरहा हूं, " शुभम नें मेराहाथ थाम लिया। "आज मुझे दुनिया कि परवाह नहि हैं। "
मैंने उनकी आँखों मे देखा। "मुझेडर लगता हैं शुभम, लोग क्याँ कहेंगे?"
शुभम नें उसकेबाल पीछेकिए। "जब हम् संग हें, तोँ किसी औऱ कि बात क्यूं सोचनी? बसइससमय कों जीलो। "
मैंने अपनासिर उसके कंधे पऱ टिका दिया। "आपने मुझे जीना सिखा दिया हैं। "
शुभम नें धीरे-धीरे सें उसके माथे कों चूमा। "अभि तौ पूरी जीवन बाकी हैं, सुमन
"सुनिए बाबू, मेरीतरफ देखिए न्, " उन्होंने बड़े प्रेम सें, मगरहक जताते हुएकहा। उनकेहाथ मेरीकमर पर्र कसगए थें।
"सुमन। आप् क्याँ कररही हें? कोईदेख लेगा, " मैंने लड़खड़ाती आवाज़ मे कहा औऱ पीछे हटने कि कोशिश कि, पऱ उन्होंने मुझे मजबूती सें पकड़रखा थां।
"देखने दीजिए। आप् मेरे हें, औऱ मे अपनीचीज पर्र पूराहक जताना जानती हूं, " उन्होंने फुसफुसाते हुए मेरेकान केँ पासकहा। उनकी उंगलियां अब मेरी टी-शर्ट केँ अंदर रेंगने लगीथीं। "सोनू, क्याँ आपको मेरी जरूरत महसूस नहि होती? मेराबदन आपके बिनाजल रहा हैं। "
"प्लीज, रुकिए। येठीक नहि हैं, " मैंने उनके हाथों कों रोकने कि कोशिश कि, पऱ उनकीपकड़ औऱ भि दीवानी होँ गई थि।
उन्होंने अपनी गर्दन मेरी छाती सें सटा दि। "आप् जितना मना करेंगे, मेरामन उतना हि मचलने लगेगा। आपकीयह नां मुझे औऱ भि अधिक उकसारही हैं। "
मैंने महसूस किया कि उनकी सांसें अब बेकाबू होँ रहीथीं। उन्होंने अचानक मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों मे लिया औऱ मेरी आँखों मे बड़ी गहराई सें झांका। "आजरात आप् कहीं नहि जा सकते। आपको केवल मेरा होकर रहना होगा। पूरीतरह सें। "
कमरे कां तापमान जैसे अचानक बढ़ गय़ा थां। सुमन कि वोँ ललचाई हुइ आँखें औऱ उनकी सांसों कि गर्मी नें आखिरकार मेरे संयम कां बांधतोड़ हि दिया। मैंने भि हारमान ली औऱ उनके लगभग खिंचता चला गय़ा।
"सुनिए बाबू, अब दूरमत जाइए, " उन्होंने फुसफुसाते हुए मेरे होंठों पर्र अपनी उंगली रखी। उनकी आँखों मे जीत कि चमक थि।
जैसे हि मैंने उन्हें अपनी बाहों मे कसा, सुमन पागल सि होँ गईं। उन्होंने मेरे चेहरे कों दोनों हाथों सें जकड़ लिया औऱ पागलों कि तरह चूमने लगीं। सड़प-सड़प कि गीली आवाजें खामोश कमरे मे गूँजने लगीं। उनके होंठ मेरे होंठों पऱ, गर्दन पऱ औऱ कानों केँ पास पूरी शिद्दत सें चिपकरहे थें।
"उफ़। सोनू, आप् कितने गर्म हें, " उन्होंने मेरी गर्दन पऱ दांत गड़ाते हुए सिसकी भरी। गीलेपन कां अहसास मेरी त्वचा पऱ साफ़ महसूस हौ रहा थां।
मैंने भि अपनीपकड़ उनकीकमर पऱ मजबूत कर दि। "सुमन। आप् बहोत अधिककर रही हें। "
"करने दीजिए, " उन्होंने करीब-करीब हाफते हुएकहा। उनकीजीभ मेरेकान केँ पास रेंगरही थि, जिससे एक् अजीब सि गीली औऱ लसलसी आवाज़ निकलरही थि। "आप् मेरे हें, मेरामन कररहा हैं आपको पूरा निगल जाऊं। "
उनकी हरकतें अब औऱ भि बेकाबू होँ रहीथीं। वोँ मेरी शर्ट केँ बटन नोंचने लगीं औऱ बीच-बीच मे पागलों कि तरह मेरेगले औऱ छाती कों चूमती जारही थीं। हर चुंबन केँ संग वोँ गीली, चिपचिपी आवाज़ें औऱ तेज होतीजा रहीथीं, जोँ हमारे बीच कि उस बढ़तीहवस कों औऱ भि गहराकर रहीथीं।
सुमन नें अपनी आँखें बंदकर लीथीं औऱ वोँ बस मुझमें खोई हुई थीं, जैसे उन्हें दुनिया कि कोईसुध हि न् होँ।
सुमन नें अपनी पकड़ मेरी गर्दन पर्र इतनी मजबूत करली थि कि मुझे भागने कां कोई मार्ग नहि दिखरहा थां। उनकी आँखों मे छाई वोँ लस्टअब पूरीतरह बेकाबू हौ चुकी थि।
"सुनिए बाबू.इधर देखिए, " उन्होंने फुसफुसाते हुए मेरा चेहरा ऊपर उठाया औऱ अपनीजीभ मेरे होंठों पऱ फेर दि। "अपना मुँह खोलिए न् सोनू। मुझे आपको पूरा महसूस करना हैं। "
जैसे हि मैंने थोडा सां मुँह खोला, उन्होंने अपनीजीभ गहराई तक मेरे मुँह मे डाल दि। स्लरप। चप-चप। सड़प-सड़प कि गीली आवाजें पूरे कमरे मे गूँजने लगीं। वोँ पागलों कि तरह मेराथूक चूसरही थीं, जैसेकोई प्यासा बरसों बाद पानीपी रहा होँ।
"अहह। उम्मम। सुमन, " मेरे मुँह सें दबी हुईँ कराह निकली।
"जीभमत निकालिए। सभी मेरा हैं। आपकायह स्वाद केवल मेरा हैं, " उन्होंने मदहोश होकरकहा। उनके चुंबन इतने गहरे औऱ गीले थें कि लार हमारे ठुड्डियों सें होकर नीचेगिर रही थि। स्लरप। उम्मम। अहह!
हर बारजब वोँ अपनीजीभ मेरे मुँह केँ अंदर घुमातीं, एक् लसलसी औऱ गीली आवाज़आती। उनकी सिसकियाँ अब औऱ तेज होँ गई थीं। "सोनू। आप् कितने मीठे हें। अहह। मुझे औऱ चाहिए। औऱ गहराई सें!"
उन्होंने सिसकते हुए मेरी शर्ट पूरीतरह खोल दि औऱ फिन सें मेरे होंठों कों जकड़ लिया। चप-चप। स्लरप। उनकीजीभ मेरे तालू सें टकरारही थि औऱ वोँ पागलों कि तरह मेरादम घोंटने कि हद तक मुझेचूम रहीथीं।
"उम्मम। आअह। सुनिए नं बाबू। छोड़िएगा मतआज, " उन्होंने हांफते हुए मेरेकान मे फुसफुसाया औऱ फिन सें मेरे होंठों पर्र अपनी गीलीपकड़ मजबूत करली
अब शुभम भि पूरीतरह सें अपनी सुध-बुध खो चुका थां। सुमन कि उस पागलकर देने वाली लस्ट नें उसे अपने आगोश मे जकड़ लिया थां। कमरे मे केवल गीली आवाज़ें औऱ भारी सांसें गूँजरही थीं।
"उम्मम। अहह। सुमन, " शुभम नें उनके बालों कों मुट्ठी मे भरतेहुए अपना चेहरा औऱ लगभगकर लिया।
सुमन नें अपनीजीभ शुभम केँ मुँह केँ औऱ गहराई मे डाल दि। स्लरप। चप-चप.सड़प! लार उनके होंठों केँ कोनों सें बहकर नीचे गर्दन तक जारही थि। सुमन पागलों कि तरह शुभम कां थूकचूस रहीथीं, जैसे वोँ कोई अमृतपी रहीहों।
"सुनिए बाबू। उम्म। मुझे अपनीजीभ दीजिए। अहह, " सुमन नें हाँफते हुएकहा औऱ फिन सें उनके होंठों कों जोर सें भींच लिया। उम्मम। स्लरप। उनकी जीभों कि आपस मे रगड़ सें एक् लसलसी औऱ गीली आवाज़ पैदा होँ रही थि जोँ सन्नाटे कों चीररही थि।
शुभम कि हल्की चीख निकल गई, "अहह। सुमन। आप् तौ पागलकर रही हें."
"हाँ। मे आपकेलिए पागल हूं सोनू, " सुमन नें सिसकते हुए उनकेकान केँ पास फुसफुसाया, "आपका साराथूक। आपकीहर सांस। मात्र मेरी हैं। अहह। उम्मम!"
सुमन नें फिन सें शुभम कां निचला होंठ अपने दाँतों मे दबाया औऱ उसे चूसने लगीं। चप-चप। स्लरप। उनकी सिसकियाँ औऱ कराहने कि आवाज़ें (अहह.उह। उम्मम) अब औऱ भि कामुक हौ गई थीं। शुभम नें महसूस किया कि सुमन कां बदन उनकेऊपर पूरीतरह हावी हौ चुका थां, औऱ वोँ किसी शिकारी कि तरहउसे अपनाबना रहीथीं।
"सुनिए न् बाबू.आज रात मुझे स्वयं मे समा लीजिए। अहह। स्लरप!"
सुमन कि हवस औऱ दीवानगी सें भर चुकी थि। उन्होंने शुभम कों बैड पर्र पीछे कि ओर धकेल दिया औऱ स्वयं उसकेऊपर शेरनी कि तरह सवार हौ गईं।
"मेरे शोना। मेरे बाबू, " सुमन नें हाँफते हुए शुभम केँ कान केँ पास फुसफुसाया। उनकीगरम साँसें शुभम कि खालजला रहीथीं। हूं। अहह। उम्म!
सुमन नें अपनीनाक शुभम कि गर्दन पर्र रगड़ी औऱ ज़ोर सें सूंघने लगीं। सुप-सुप। "अहह, बाबू। आपकी खुशबू मुझे पागलकर रही हैं। जी चाहता हैं आपको कच्चा चबा जाऊं। "
फिन उन्होंने अपनीजीभ निकाली औऱ शुभम केँ गले सें लेकर ठोड़ी तक एक् लंबी लकीर खींच दि। लप-लप। स्लरप। गीली औऱ लसलसी आवाज़ कमरे मे गूँजउठी।
"सुमन.उह। बेबी, यह क्याँ कररही हें आप्?" शुभम नें आँखें बंदकर लीं।
"चुप रहिए मेरे बच्चा। बस मुझे अपनाकाम करने दीजिए, " सुमन नें सिसकते हुएकहा औऱ फिन सें शुभम केँ मुँह पर्र झपट पड़ीं। चप-चप। स्लरप। उम्मम! इसबार उन्होंने अपना पूराथूक शुभम केँ मुँह मे धकेल दिया। थू। स्लरप। थूक केँ बहने औऱ चूसने कि आवाज़ें (गड़प-गड़प) अब औऱ भि गंदी औऱ कामुक हौ चुकीथीं।
"अहह। उम्म। शोना, चूसिए मुझे। अपनी सुमन कों चूसिए, " वोँ बेकाबू होकर कराहने लगीं। अहह। उह.उह। उनकी सिसकियाँ अब चीखों मे बदलरही थीं।
सुमन नें अपनी उंगलियां शुभम केँ बालों मे फंसादीं औऱ उसके चेहरे कों बुरीतरह चाटने लगीं, जैसेकोई भूखा जानवर अपने शिकार कों चाटता हैं। स्लरप। सड़प। उनके चेहरे पर्र शुभम कां थूक औऱ पसीना मिल चुका थां।
"बेबी। आप् केवल मेरे हें। अहह। सुनिए न् बाबू। मुझे औऱ गहराई सें महसूस कीजिए, " सुमन नें हाँफते हुए (हफ़-हफ़)कहा औऱ शुभम कि छाती पऱ अपनी गीलीपकड़ औऱ मजबूत करली।
"मेरे नन्हे बाबू। मेरे शोना, " सुमन नें हांफते हुए (हफ़-हफ़)कहा औऱ अपनीगरम जीभ शुभम कि छाती पर्र फेर दि। लप-लप। स्लरप! शुभम कां पूरा शरीर कांपउठा। "अहह। सुमन। बेबी, बस कीजिये। उह!"
"अभि तोँ शुरुआत हैं मेरे बच्चा, " सुमन नें सिसकते हुएकहा औऱ फिन सें शुभम केँ मुँह कों अपने मुँह मे भर लिया। चप-चप। सड़प-सड़प। स्लरप! इसबार उनके चुंबन औऱ भि गीले औऱ आवाज़ करने वाले थें। थूक कि एक् पतली लकीर उनके होंठों सें बहकर शुभम कि छाती पर्र टपकरही थि। टप.टप.
सुमन पागलों कि तरह शुभम केँ गले कों चूसने लगीं। उम्मम। अहह.उह! उनकी सिसकियां कमरे केँ सन्नाटे कों चीररही थीं। "सुनिए बाबू। आप् केवल मेरे हें। किसी औऱ नें आपकोछुआ तोँ मे उसेजान सें मार दूंगी। अहह। उम्मम!"
उन्होंने शुभम केँ कान कि लौ कों अपने दांतों केँ बीच दबाया औऱ उसेजोर सें चूसने लगीं। स्लरप। स्लरप। "अहह। शोना। बोलिये कि आप् मेरे हें। बोलिये!"
शुभम भि अब पूरीतरह उनकेवश मे थां। "हाँ.अहह। सुमन। मे। मे मात्र आपका हूं। उम्मम!"
सुमन नें अपनीजीभ फिन सें शुभम केँ मुँह मे डाल दि औऱ पागलों कि तरहउसे अंदर-बाहर् करने लगीं। गड़प-गड़प। सड़प। उनके थूकने औऱ चाटने कि आवाज़ें अब औऱ भि गंदी औऱ कामुक हौ गई थीं।
"अहह। मेरे बेबी.उह। उह.अहह!" सुमनअब पूरीतरह सें बेकाबू होकर शुभम केँ ऊपरगिर पड़ीं, उनकी सांसें किसी इंजन कि तरहतेज चलरही थीं
"अहह। सुमन। उम्म। आप्। आप् मेरीजान लेँ लेंगी। "
"लेने दीजिए न् बच्चा। आपकीजान पर्र मात्र मेराहक हैं, " सुमन नें मदहोश होकरकहा औऱ फिन सें एक् गहरा, गीला औऱ लसलसा चुंबन शुरुआत कर दिया। स्लरप। चप-चप.अहह। उम्मम!
सुमन नें अपनीनाक शुभम कि गर्दन कि हड्डी पर्र रगड़ी। "अहह। उह। आपकीयह महक। मुझे पागलकर रही हैं।
चप-चप। उम्मम। अहह! "मेरे शोना। मेरा प्यारा बाबू, " सुमन नें फुसफुसाते हुए अपना साराथूक शुभम केँ होंठों पऱ छोड़ दिया
आज आपकोकोई नहि बचाएगा। आपकीयह सुमन आपको पूरापी जाएगी। अहह। उम्मम!
"सुनिए बाबू.इधर देखिए मेरीतरफ, " उन्होंने फुसफुसाते हुए शुभम कां चेहरा कसकर पकड़ लिया।
उन्होंने अपनी गीलीजीभ निकाली औऱ सीधे शुभम कि नाक केँ नथुने मे डाल दि। सड़प। स्लरप.
शुभम सिहरउठा। "अहह। सुमन.यह क्याँ। उह!"
सुमन नहि रुकीं। चप-चप। लप-लप। वोँ पागलों कि तरहनाक केँ अंदरजीभ घुमाने लगीं।
फिन उन्होंने अपनी उंगलियों सें शुभम कि एक् आँख कों जोर सें खोल दिया।
सुमन कां चेहरा बिल्कुल लगभग थां। उनकीगरम सांसें शुभम कि पुतली पऱ महसूस होँ रहीथीं।
उन्होंने अपनी लंबीजीभ निकाली औऱ शुभम कि आँख केँ सफेद हिस्से (Sclera) पर्र फेर दि। लप। स्लरप.
"अहह। उम्मम। मेरे शोना। कितना स्वाद हैं इसमें, " सुमन नें मदहोश होकरकहा।
शुभम कि आँख सें पानीआने लगा, पर्र सुमनउसे भि चाटने लगीं। सड़प। चप-चप.
"उह। बेबी.बस। दर्द हौ रहा हैं, " शुभम नें कराहते हुएकहा। अहह.उह.
"चुप रहिए मेरे बच्चा। मुझेसभी चखना हैं, " सुमन नें फिन सें आँख केँ कोने कों चूसना शुरुआत किया। स्लरप। स्लरप.
गीली औऱ लसलसी आवाज़ें कमरे केँ सन्नाटे कों चीररही थीं। चप-चप। उम्मम। अहह!
सुमन कि जीभ शुभम कि आँख केँ सफेदभाग पऱ रेंगरही थि। लप-लप.
"अहह। उह। सुनिए नं बाबू। आप् केवल मेरी मिल्कियत हें, " उन्होंने हाँफते हुए (हफ़-हफ़) कहा।
उनके मुँह सें लार टपककर सीधे शुभम केँ गालों पर्र गिररही थि। टप। स्लरप.
सुमनअब पूरीतरह सें जानवर बन चुकीथीं। अहह। उम्मम। उह.
सुमन नें शुभम् कां पेंट उतार दिया शर्ट कों उतार केँ फ़ेक दिया शुभम् हसनेलगा
उम्मचुप !
सुमन नें शुभम केँ चेहरे कों कसकर पकड़ लिया। उनकी आँखों मे जुनून थां।
"सुनिए बाबू, अब कोई स्थान नहि छोड़ूँगी, " सुमन नें फुसफुसाया। हफ़-हफ़.अहह!
उन्होंने शुभम केँ माथे सें शुरुआत कि। लप-लप। स्लरप!
"अहह। सुमन। बेबी। बहोत मज़ा आँ रहा हैं, " शुभम कि कराह निकली।
सुमन नें अपनीजीभ शुभम कि आँखों औऱ पलकों पऱ फेरी। सड़प। सड़प!
"उम्मम। मेरा प्यारा बच्चा, " उन्होंने शुभम केँ गालों कों जोर सें चूसा। चप-चप। मुआह!
सुमन कि नाकअब शुभम कि गर्दन पर्र थि। सुप-सुप। वोँ पागलों कि तरहउसे सूंघरही थीं।
"अहह। बेबी। आपकी खुशबू। उह!" शुभम नें अपनी गर्दन पीछे झुका दि।
सुमन नीचे उतरीं औऱ शुभम कि छाती कों चाटना शुरुआत किया। लप-लप। स्लरप। उम्मम!
"अहह। शोना। रुकिए मत। बहोत अच्छा लगरहा हैं, " शुभम नें कराहते हुएकहा।
सुमन कि जीभअब शुभम केँ पेट केँ घेरे मे थि। चप-चप.सड़प!
"अहह.उह। सुमन। उम्मम!" शुभम कां पूरा शरीर कांपरहा थां।
सुमन घुटनों केँ बल नीचे सरकती गईं। उन्होंने शुभम कि जांघों कों सूंघा। सुप.सुप.
"मेरे बाबू। आप् मात्र मेरे हें, " सुमन नें हाँफते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
वोँ अब शुभम केँ पैरों तक पहुँच चुकीथीं। लप-लप.
उन्होंने शुभम केँ पांव कां अंगूठा अपने मुँह मे भर लिया। गड़प-गड़प। स्लरप!
"अहह.उह। बेबी। अंगूठा मत चूसिए। उम्मम!" शुभमतड़प उठा।
सुमन नें अंगूठे कों जोर सें चूसा औऱ सड़प कि आवाज़ निकाली। सड़प। चप-चप। स्लरप!
"अहह। आनंद आँ गय़ा। सुमन। बेबी। औऱ। अहह!" शुभम मदहोश होँ चुका थां।
सुमन कि लार शुभम केँ पैरों पर्र बहरही थि। टप.टप। स्लरप!
"सुनिए बाबू.ऊपर सें नीचे तक आप् मात्र मेरे हें, " सुमन नें कराहते हुए(अहह। उह)कहा
"सुनिए बाबू, अब यहा कि बारी हैं, " सुमन नें फुसफुसाते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
"नहि सुमन। बेबी, वहा नहि। वोँ गंदा हैं, " शुभम नें उनके कंधे पकड़कर पीछे धकेलना चाहा।
"चुप रहिए मेरे बच्चा! आपकीहर चीज़ मेरी हैं, " सुमन नें गुर्राते हुए शुभम केँ हाथों कों झटक दिया।
उन्होंने अपनीनाक शुभम कि नाभि मे गड़ा दि। सुप-सुप। सूं.
"अहह। उह। सुमन.मत कीजिये, वहांमेल हैं। छी!" शुभम नें कराहते हुए अपनापेट सिकोड़ा।
सुमन नें जबरदस्ती अपनीजीभ निकाली औऱ नाभि केँ गहरे गड्ढे मे डाल दि। सड़प। स्लरप!
"उम्मम। अहह। मेरे शोना, " उन्होंने पागलों कि तरह नाभि कों चाटना शुरुआत किया। लप-लप। चप-चप!
सुमन कि जीभ नाभि केँ अंदरजमा पसीने औऱ मेल कों कुरेदने लगी। गड़प। स्लरप। सड़प!
"अहह। बेबी.उह। बहोत अजीबलग रहा हैं, " शुभम कि हल्की चीख निकली।
सुमन नें अपनीजीभ सें सारामेल निकाला औऱ उसेबड़े चाव सें चूस लिया। चप-चप। स्लरप!
"अहह। उम्मम। इसमें भि आपका स्वाद हैं बाबू, " उन्होंने हाँफते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
शुभम नें उन्हें रोकने कि कोशिश कि, पऱ सुमन नें उनकापेट अपने दाँतों सें काट लिया। अहह!
"मनामत कीजिये। मुझेसभी खानां हैं, " सुमन नें फिन सें नाभि कों अपनीलार सें भर दिया। टप। स्लरप.
गीली औऱ लसलसी आवाजें कमरे मे गूँजरही थीं। सड़प-सड़प। चप-चप!
"अहह। सुमन.उह। आप् तोँ पागल होँ गई हें। उम्मम!"
सुमन नें एक् अंतिम बारजोर सें नाभि कों चूसा। गड़प! औऱ फिन अपना चेहरा ऊपर उठाया।
उनके होंठों पऱ शुभम कि नाभि कि गंदगी औऱ लारलगी हुइ थि। अहह.उह। उम्मम!
सुमन हसनेलगी
मम्मी आप्
सुमन -shhh मम्मी नहि “सुमन “औऱ आप् नहि” तुँ “
शुभम् - हा सुमन तूँ यह घिनौने काम क्यूं कररही
सुमन - क्युकी मुझे आनंद आँ रहा मे बचपन सें मुझे घिनौने चीजो मे सौकरहा हैं मे जब टट्टी किया करती थि तोँ अपने हि टट्टी कि गंध कों सूंघा किया करती थि
अच्छा बेबी एक् बात आपसे बोलू तोँ आप् मानोगे ?
शुभम् - तुँ बोल तौ सही, बस एक् बार बोल.जान हाजिर हैं तेरे खातिर
सुमन-आपकी जान मेरी हैं समझे आपके मरने सें पहले मुझे मारना हैं जब मे मारू तोँ आप् मेरेसंग रहना चाहिए
शुभम् - अरे पगली तुँ यहसभी क्याँ सोचरही
सुमन - यहीसच सच हैं, छोड़िये मे कुछ मांगने वाली थि आपसे तोँ बताओये देंगे आप्
शुभम् हाहा क्यूं नहि
सुमन। नें शुभम् केँ कान मे कुछ बोला
शुभम नें बोला नहि यहसभी मतलब तुम् ऐसा मुझेसोच केँ हि बेकार सां लगरहा हैं
घिनौना हैं
सुमन नें शुभम कां चहरा पकड़ा औऱ किस करतेहुए उम्हाआप् कों मानना पड़ेगा आप् मुझे माना नहि कर सकतेइधर देखिए मेरी आँखोउधर क्याँ देखरहे
आपको करना होगा मेरी फैंटिसी हैं बस
शुभम नें भि हामीभर दि
शुभम - बेबीलेट जाओअब मे तुमको सुख देता हूं
सुमन -बाबू ज्या आप्… चाटोगे मेरे भि बाबू मेरा बहोत मन करता हैं कि कोई मेरीचुत चाटे उसका पानीपिए रहा आपको मे पूरासूख दूँगी जब तक ज़िंदा रहूँगी
सुभम - जान मे भि तुम्हें पूरासुख दूँगा चलो अच्छी बच्ची कि तरहबेड पे लेटजाओ, मुझे अपनाकाम करने
सुमनबेड पे लेट गई
शुभम कां सब्रअब पूरीतरह टूट चुका थां। उसने झटके सें सुमन कों पलंग पऱ गिरा दिया।
"अब मेरी बारी हैं, सुमन, " शुभम नें भारी आवाज़ मे कहा। हफ़-हफ़.अहह!
उसने एक्-एक् करके सुमन केँ सारे कपड़े जिस्म सें अलगकर दिए। सुमन बिल्कुल नंगी उसके सामने थि।
"अहह। सुनिए बाबू। क्याँ कररहे हें?" सुमन कि सिसकी निकली। उम्मम.
शुभम नें अपनीजीभ निकाली औऱ सुमन केँ माथे सें शुरुआत किया। लप-लप। स्लरप!
उसने सुमन कि पलकों कों अपने होंठों मे भर लिया। मुआह। चप-चप!
"अहह। शोना.उह। बहोत गर्म हें आप्, " सुमन नें आँखें बंदकर लीं।
शुभम नीचे उतरा औऱ सुमन कि गर्दन केँ गड्ढे कों जोर सें चूसने लगा। सड़प। सड़प!
गले पर्र गीले निशान बननेलगे। स्लरप। उम्मम!
"अहह.उह। बेबी। औऱ नीचे.अहह!" सुमन कां जिस्म धनुष कि तरहतन गय़ा।
शुभम नें सुमन कि छाती पर्र अपना मुँहमार दिया। गड़प-गड़प। चप-चप!
शुभम नें सुमन कि भरी थानों कों जोड़ सें मिसने लगा एक् देन कों चूसने लगा
अहह बाबू थोडा ज़ोर सें मसलिए यहकब सें इनके मालिक केँ लिएतरस रहे थें
शुभम उनको काटने लगा भूरी निप्पल कों मुंहभर केँ रबड़ जैसे खिचने
शुभम - बाबू मे इन्हें नोचनोच केँ लालकर दूँगा
सुमन - बच्चा आप् इनके मालिक होँ यहअब आपके आदेश नुसार काम करेंगे मुझेदूध नहि आता अभि मुझे वोँ सुखफिन सें प्राप्त करना हैं बाबू
वोँ पागलों कि तरह उन्हें चूसने औऱ चाटने लगा। स्लरप। लप-लप.अहह!
"उम्मम। सोनू.अहह। रगड़िए मत.उह!" सुमन कि सिसकियाँ औऱ तेज हौ गईं।
शुभम नें अपनीजीभ सुमन कि नाभि मे घुमा दि। सड़प। स्लरप। चप-चप!
वहा कि लार औऱ पसीने कां स्वाद उसे पागलकर रहा थां। अहह.उह। उम्म!
वोँ औऱ नीचे सरका औऱ सुमन कि जांघों केँ अंदरूनी हिस्से कों चाटने लगा। लप-लप.सड़प!
"अहह। बाबू। वहांमत। उह.अहह। मज़ा आँ रहा हैं!" सुमन बेकाबू होकर कांपने लगी।
शुभम नें सुमन केँ घुटनों औऱ पिंडलियों कों भि नहि छोड़ा। स्लरप। मुआह। चप-चप!
पूरे कमरे मे केवल चाटने औऱ चूसने कि गीली आवाजें गूँजरही थीं। सड़प-सड़प। उम्मम। अहह!
शुभमअब पूरीतरह सें सुमन केँ बदन कां मालिक बन चुका थां। हफ़-हफ़.अहह। उह!
शुभमअब पूरीतरह सें सुमन केँ पैरों पर्र झुक गय़ा थां।
"सुनिए बाबू.मत कीजिये। उह.अहह!" सुमन नें अपनेपेर खींचने कि कोशिश कि।
शुभम नें उनके टखनों कों मजबूती सें पकड़ लिया। "आज नहि सुमन, आज सभी मेरा हैं। "
उसने सुमन केँ पैरों केँ तलवों कों अपनीजीभ सें चाटना शुरुआत किया। लप-लप। स्लरप!
"अहह.उह। सोनू.मत कीजिये। मुझेपाप लगेगा, " सुमन सिसकने लगीं।
शुभम नें उनकीबात अनसुनी कर दि औऱ उनके नाखूनों कों अपनीजीभ सें सहलाने लगा। सड़प। सड़प!
उसने एक्-एक् उंगली कों मुँह मे लिया औऱ जोर सें चूसने लगा। गड़प-गड़प। चप-चप। स्लरप!
"अहह। उम्मम। बेबी.रुक जाइए.अहह!" सुमन कां जिस्म बिजली कि तरह कांपरहा थां।
शुभम् पैरो मे लगीरेड नेल पॉलिश कों ध्यान सें देखने लगा पागलों कि तरह सूंघने लगा। सुप-सुप। सुप!
"आपके पैरों कि खुशबू। उह.अहह। मुझे पागलकर रही हैं सुमन। "
सुमन कि आँखों सें आँसू बहनेलगे। "बाबू। सुनिए न्। मुझे आपके पांव छूने हें। छुआने नहि। उह.अहह!"
वोँ रोतेहुए शुभम केँ सिर कों हटाने कि कोशिश कररही थीं। "प्लीज बच्चा। ऐसामत कीजिये। अहह। उम्मम!"
शुभम नें उनके अंगूठे कों दांतों सें हल्का सां दबाया। कट! औऱ फिनउसे जोर सें चाटा। लप-लप। स्लरप!
"अहह.उह। सोनू। मेरादम निकल जाएगा। उम्मम। अहह!"
पूरे कमरे मे चूसने औऱ सुमन केँ रोने-कराहने कि मिली-जुली आवाज़ें गूँजरही थीं। चप-चप। स्लरप। अहह.उह!
सुमन बेबस होकरखाट पर्र हाथपटक रहीथीं, पर्र शुभम उनके नाखूनों कों अपनीजीभ सें कुरेदने मे लगा थां। सड़प.सड़प। उम्मम!
"आप् केवल मेरी देवी हें। औऱ मे आपका पुजारी, " शुभम नें हाँफते हुए उनके पैरों पऱ अपना माथाटेक दिया। हफ़-हफ़.अहह
शुभम नें सुमन केँ हाथों कों पकड़कर ऊपर कि ओर खींच लिया।
"सुनिए बाबू.अब क्याँ कररहे हें आप्। अहह!" सुमन नें बेबसी मे कहा।
शुभम नें उनकी एक्-एक् उंगली कों मुँह मे लेना शुरुआत किया। गड़प। स्लरप!
वोँ लालनेल पेंटलगी उंगलियों कों किसी कुल्फी कि तरह चूसने लगा। चप-चप.सड़प!
"उम्मम। यहलाल रंग। औऱ आपका स्वाद। अहह!" शुभम मदहोश थां।
उसकीजीभ सुमन केँ नाखूनों पऱ रेंगरही थि। लप-लप। स्लरप!
"अहह.उह। सोनू। बच्चा। मत चूसिए। उम्मम!" सुमन कां पूरा शरीरमचल रहा थां।
फिन शुभम नें सुमन केँ हाथऊपर करके उनकी कांख (armpit) मे अपना चेहरा घुसा दिया।
"नहि। बाबू नहि। वहां बहोत गुदगुदी होती हैं। अहह!" सुमन जोर-शोर सें हंसने औऱ कराहने लगीं।
शुभम नें वहां पागलों कि तरह सूंघना शुरुआत किया। सुप-सुप। सुप!
"अहह। यहा कि खुशबू तौ सबसे तीखी हैं सुमन.उह। उम्मम!"
उसने अपनीजीभ निकाली औऱ कांख केँ गहरे हिस्से कों चाटने लगा। लप-लप। स्लरप। सड़प!
"अहह। उह.उह। सोनू। छोड़िए। वहांमेल हैं। पसीना हैं। छी!" सुमनतड़प उठीं।
शुभम नें वहांजमा हल्का सां मेल औऱ पसीना अपनीजीभ सें खुरच दिया। गड़प। स्लरप!
"छी नहि सुमन.यह तौ बहोत नमकीन औऱ जायकेदार हैं। अहह!" उसने स्वाद लेतेहुए कहा।
चप-चप। सड़प-सड़प! गीली औऱ लसलसी आवाजें कमरे मे गूँजरही थीं।
"उम्मम। अहह। बेबी। आप् तौ मुझे कच्चा चबा जाएंगे। उह.अहह!"
सुमन कि सिसकियां अब चीखों मे बदलरही थीं। अहह। उह। उम्मम। सड़प!
शुभम पागलों कि तरह वहां अपनीजीभ फेरता रहा, जैसेउसे कोई खजाना मिल गय़ा हौ। लप-लप। स्लरप। अहह!
सुमन पेंटी औऱ बड़ा मे बेड मे लेती थि शुभम् नें ब्राखिच केँ निकाल दि औऱ उसेफेक दि सुमन हसनेलगी
सुमन कों नें चुम्मा देने वाला मुंह बनाया मगर सुभम.
उसने सुमन केँ स्तनों कों अपने दोनों हाथों सें दबोच लिया।
"सुनिए बाबू.अहह! जोर सें मत.उह!" सुमन नें हल्की चीखभरी।
शुभम नें अपनीजीभ निकाली औऱ उन्हें पागलों कि तरह चाटना शुरुआत किया। लप-लप। स्लरप। सड़प!
फिन उसने अपनी पूरी ताकत सें उन्हें मुँह मे भर लिया। गड़प-गड़प। चप-चप!
"अहह। उम्मम। सोनू। धीरे-धीरे। उह!" सुमन कां जिस्म खाट पर्र तड़पने लगा।
अचानक शुभम नें अपने दाँतगड़ा दिए। कट!
"आआह्ह!" सुमन कि चीख निकल गई। "बाबू.खून। उह!"
शुभम नें वहां एक् हल्का थप्पड़ जड़ दिया। चटाक!
सुमन कां चेहरा लालपड़ गय़ा, पर्र उसकी आँखों मे गजब कि दीवानगी थि।
"अच्छा किया मेरे मालिक। इनकेसंग यही होना चाहिए, " सुमन हाँफते हुए (हफ़-हफ़) बोलीं।
"बहोत नौटंकी करते थें यह.अब सुधरेंगे आपके हाथों सें। अहह.उह!"
शुभम नें फिन सें वहीं दाँत गड़ाए जहाँ सें हल्का खूनरिस रहा थां। कट.सड़प!
उसनेउस खून कों अपनीजीभ सें चाटना शुरुआत किया। स्लरप। चप-चप। स्लरप!
"अहह। उम्मम। मेराखून पी जाइये सोनू.सभी आपका हैं। अहह!"
शुभम नें दूसरे मम्मों पऱ भि थप्पड़ मारा। चटाक! औऱ फिनउसे जोर सें चूसने लगा। गड़प-गड़प। सड़प!
गीली औऱ लसलसी आवाजें कमरे केँ सन्नाटे कों चीररही थीं। चप-चप। स्लरप। मुआह!
"अहह। उह। बेबी। औऱ जोर सें। उम्मम। अहह!"
सुमनअब दर्द औऱ लस्ट केँ बीच पूरीतरह पागल हौ चुकीथीं। अहह.उह। उह.सड़प!
शुभम पागलों कि तरह उन्हें काटरहा थां औऱ चूसरहा थां। स्लरप। चप-चप.अहह
शुभम् नंगा सुमन कि छाती पे बैठा थां तभी,,,
सुमन नें थरथराते हाथों सें शुभम कां हाथ पकड़कर अपनेगाल पऱ रख दिया। उसकी आँखों सें आँसूबह रहे थें, पर्र चेहरा लस्ट सें दहकरहा थां।
"सुनिए बाबू। मेरे चेहरे पऱ थूको, " सुमन नें हाँफते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
"नहि सुमन। मे यह केसे." शुभम कां हाथ कांपरहा थां।
"आपको मेरीशपथ हैं सोनू। थूकिए मुझ पऱ। इसे मलिए, " सुमन रोने लगीं। उह। उह.अहह!
शुभम नें बेबसी मे उनके चेहरे पर्र थूका। थू। स्लरप!
उसने अपने हाथों सें उसथूक कों सुमन केँ पूरे चेहरे पर्र मल दिया। लप-लप। चप-चप!
"अहह। उम्मम। अब मारिए बाबू। थप्पड़ मारिए मुझे, " सुमन चिल्लाई।
शुभम नें नाँ चाहते हुए भि हल्का हाथ चलाया। चटाक!
"अहह। उह!यस बाबू। औऱ मारिए। मेरा मुंहलाल कर दीजिए, " सुमन नें कराहभरी।
शुभम नें अब ज़ोर सें थप्पड़ जड़ा। चटाक! चटाक!
सुमन कां गाललाल हौ गय़ा। "अहह.उह। थैंकयू मेरे बच्चा। उम्मम!"
हर थप्पड़ केँ बाद सुमन झपटकर शुभम केँ होंठों कों चूम लेती। मुआह। स्लरप। चप-चप!
"अहह। बेबी। औऱ। एक् औऱ। अहह!" चटाक!
सुमन केँ आँसू औऱ लार मिलकर चेहरे पऱ बहरहे थें। टप.टप। स्लरप!
"अहह। सोनू। मे आपकी दासी हूं। मारिए मुझे.उह। उह!"
शुभमअब जुनून मे थां। चटाक! चटाक! थप्पड़ों कि आवाज़ कमरे मे गूँजरही थि।
सुमन पागलों कि तरह कराहरही थीं। "अहह। उम्मम। जी बाबू.अहह। उह!"
"सुमन। आप् पागलकर रही हें मुझे!" शुभम नें हाँफते हुए उनके होंठों कों फिन सें जकड़ लिया। स्लरप। सड़प!
"अहह। उह। बच्चा। मारिए औऱ चूमिए। अहह। उम्मम। सड़प!"
सुमन केँ रोने औऱ सिसकने कि आवाज़ें (उह.उह.अहह) लस्ट केँ संगमिल गई थीं
सुमन कां चेहरा थप्पड़ों सें लाल होँ चुका थां औऱ आँखें आँसुओं सें भरी हुई थीं। वोँ पागलों कि तरह शुभम केँ सीने सें चिपक गई।
"सुनिए बाबू.उह। उह। मेरीबात सुनिए, " सुमन सुबकते हुए बोलने लगी।
"सुमन, अब शांत हौ जाइए। बहोत होँ गय़ा, " शुभम नें उसेचुप कराने कि कोशिश कि।
"नहि सोनू। मुझे बोलने दीजिए। अहह.उह!" सुमन नें उसकेहाथ कसकर पकड़लिए।
"आप् मुझेकभी छोड़ेंगे तोँ नहि न्? बोलिए बाबू!" सुमन कि आवाज़ कांपरही थि।
"पागलमत बनो सुमन, सो जाओअब, " शुभम नें उसके माथे कों सहलाया।
"मे मर जाऊँगी। सच मे मर जाऊँगी आपके बिना.उह। उह!" सुमन औऱ ज़ोर सें रोनेलगी।
उसके आँसू शुभम कि छाती पर्र गिररहे थें। "आप् मेरे मालिक हें। मेरेसभी कुछ हें। "
"चुप। एकदमचुप, " शुभम नें उसके होंठों पर्र उंगली रखी।
"नहि बच्चा। मुझेडर लगता हैं। लोगछीन लेंगे आपको.अहह। उम्मम!"
सुमन नें रोते-रोते शुभम केँ हाथों कों चूमना शुरुआत कर दिया। मुआह। मुआह.
"कोई कहीं नहि जारहा, बसअब रोनाबंद करो, " शुभम नें उसे अपनी बाहों मे भींच लिया।
"शपथ खाइए। अपनी सुमन कि शपथ खाइए.अहह। उह!" सुमन कि हिचकी बंध गई थि।
"हाँ, शपथ खाता हूं। अबसोजाओ, " शुभम नें उसे सांत्वना दि।
"मे आपकी दासी बनकर रहूँगी। बसदूर मत करना.उह। अहह। बाबू!"
सुमन कां रोना औऱ सिसकना (उह.उह.अहह) रात केँ सन्नाटे मे गूँजता रहा
शुभम् लेट गय़ा मगर सुमनऐसे उसे लेटने नहि देना छाती थि आज उनकी सुहाग रात हैं
सुमन नें अपनीलाल औऱ सूजी हुईँ आँखों सें शुभम कि तरफ देखा। सुमन केँ चेहरे पर्र थप्पड़ों केँ निशान थें, मगर उनकीचमक कम नहि हुईँ थि।
"सोनू। अभि सोइएमत। अहह, " सुमन नें फुसफुसाते हुए उसकाहाथ अपने शरीर पर्र रखा।
"सुमन, बहोत होँ गय़ा, तुम्हारी हालत देखो, " शुभम नें उसे रोकना चाहा।
सुमन नें अपनी गर्दन पीछे झुका दि। "बाबू.यह निशान तोँ मेरेलिए गहने हें। "
उसने शुभम कि आँखों मे झाँका। "क्याँ अपनी सुमन कों ऐसे हि प्यासा छोड़ देंगे?"
"तुम्हें दर्द हौ रहा हैं सुमन, मे औऱ चोट नहि दे सकता, " शुभम कां गलाभर आया।
"यह दर्द हि तौ मेरी खुराक हैं बच्चा। अहह.उह!" सुमन नें उसकेहाथ कों चूम लिया।
उसने शुभम केँ कान केँ पास अपनीगरम सांसें छोड़ीं। "आज कि रात सुहागरात हैं बाबू। "
"दुनिया जिसेगलत कहती हैं, उसेआज हम् मुकम्मल करेंगे, " सुमन कि आवाज़ मे एक् नशा थां।
"सुनिए बाबू। मुझे पूरा समाप्त कर दीजिए। अपनी प्यास बुझा लीजिए, " उसने सिसकते हुएकहा।
शुभम कां दिल ज़ोर सें धड़कने लगा। "तुम् सच मे यही चाहती हौ?"
"हाँ मेरे मालिक। अपनी दासी कों आज अपनाबना लीजिए। पूरीतरह, " सुमन नें उसे उकसाया।
उसकी वोँ पॉसेसिव औऱ ललचाई आवाज़ नें शुभम केँ मन केँ सारे तालेतोड़ दिए।
"ठीक हैं सुमन.अब जोँ होगा, उसकी जिम्मेदार तुम् होगी, " शुभम कि आवाज़ भारी होँ गई।
"मे रेडी हूं बाबू.अहह। उम्मम। जल्द कीजिये!" सुमन नें खुशी सें अपनी आँखें बंदकर लीं।
शुभम नें फिन सें उसकीकमर कों दबोच लिया। हफ़-हफ़.अहह। उह!
कमरे मे फिन सें सिसकियों औऱ गीलेपन कि आवाज़ें गूँजने लगीं। स्लरप। चप-चप.अहह
शुभम घुटनों केँ बल सुमन केँ पैरों केँ बीच आँ गय़ा। उसकी नज़र सुमन कि भीगी हुइ पेंटी पर्र टिकी थि।
उसने अपना चेहरा लगभग किया औऱ पेंटी केँ ऊपर सें हि सूंघने लगा। सुप-सुप। सुप!
"अहह। सुमन। क्याँ मादक खुशबू हैं ये, " शुभम मदहोश होकर बुदबुदाया।
पेंटी केँ कपड़े पर्र भीनी-भीनी महक औऱ एक् चिपचिपा, गाढ़ा रस फैलाहुआ थां।
शुभम बार-बार अपनीनाक वहां रगड़ता औऱ लंबी सांसें खींचता। हफ़-हफ़.अहह!
"बाबू.उह। अहह.अब तड़पाइए मत, " सुमन पलंग पर्र हाथ-पैर मारने लगी।
"चाट लीजिए इसे सोनू। अपनी सुमन कों साफकर दीजिए। अहह। उम्मम!"
शुभमउसे तड़पते देख स्वयं भि बेकाबू हौ रहा थां। उसने एक् बारफिन ज़ोर सें सूंघा। सुप!
"अहह। बेबी। प्लीज। चाटिए नं!" सुमन कि सिसकारियां चीखों मे बदलरही थीं।
आखिरकार शुभम नें अपनीजीभ निकाली औऱ पेंटी केँ कपड़े केँ ऊपर हि फेर दि। लप-लप। स्लरप!
"आहह्ह्ह!" सुमन कां शरीर बिजली कि तरह तड़पा। वो जैसे स्वर्ग मे पहुँच गई।
शुभम नें उस चिपचिपे रस कों कपड़े केँ ऊपर सें हि चूसना शुरुआत किया। गड़प-गड़प। चप-चप!
सुमन नें पागलों कि तरह शुभम केँ सिर केँ बालों कों अपनी उंगलियों मे जकड़ लिया। नोच-नोच!
"बाबू। मेरे बाबू.अहह। उह। करतेरहो। मत रुकना!" सुमन चिल्ला रही थि।
स्लरप। सड़प-सड़प। चप-चप! गीली औऱ लसलसी आवाजें कमरे मे गूँज उठीं।
"अहह। सोनू। मेरा बच्चा। उम्मम। औऱ गहराई सें। अहह!"
शुभम पागलों कि तरहउस गीले कपड़े कों अपनीजीभ सें रगड़ता रहा। लप-लप। स्लरप। अहह!
सुमन कां पूरा जिस्म पसीने सें भीग चुका थां औऱ वो बस 'बाबू-बाबू' जपरही थि।
शुभम नें एक् झटके मे सुमन कि भीगी हुइ पेंटी नीचे खींच दि।
सुमन कि बुर पूरीतरह सें नंगी औऱ लसलसी होकर सामने आँ गई।
उसकी सुर्खी औऱ उस पऱ फैला गाढ़ा, चिपचिपा रस मद्धम रोशनी मे चमकरहा थां।
"अहह। शुभम। देखिए, " सुमन नें हाँफते हुए अपनी टांगें पूरीतरह फैलादीं। हफ़-हफ़.अहह!
"बाबू, आपकेलिए आज हि इसेसाफ किया हैं। एक् भि बाल नहि हैं, " उसने फुसफुसाया।
शुभम नें देखा, वहां कि खाल मखमल कि तरह चिकनी थि, बस छोटे-छोटे बारीक अंकुर (stubble) महसूस होँ रहे थें।
उसने अपना चेहरा बिल्कुल लगभग किया औऱ उस गर्मभाप कों महसूस किया। सुप-सुप। सूं.
"अहह। सुमन.यह कितनी साफ औऱ रसीली हैं, " शुभम नें अपनीजीभ बाहर् निकाली।
उसने अपनीजीभ कि नोक सें उस कोमल दरार कों ऊपर सें नीचे तक चाटा। लप। स्लरप!
"आहह्ह्ह!" सुमन नें एक् लंबीचीख मारी औऱ शुभम केँ बालों कों मुट्ठी मे भींच लिया।
शुभम नें अब अपना पूरा मुँह वहींजमा दिया औऱ पागलों कि तरह चूसने लगा। गड़प-गड़प। चप-चप!
सुमन नें अपनी योनि कों शुभम केँ मुँह पऱ जोर सें दबा दिया। "खाइए मुझे। पूरा निगल जाइए सोनू!"
शुभम कि जीभजब उन छोटे-छोटे कटेहुए बालों (stubble) सें टकराती, तौ एक् अजीब सि सिहरन होती। सड़प। सड़प!
"उम्मम। अहह। बेबी। वहां। औऱ गहराई सें। अहह!" सुमन नें उसकेसिर कों पागलों कि तरह हिलाया।
स्लरप। चप-चप। लप-लप! योनि केँ गीलेपन औऱ शुभम कि लार कि आवाजें (चप-चप)तेज होँ गईं।
सुमन कां रस शुभम कि ठोड़ी सें बहकर नीचे टपकने लगा। टप। टप। स्लरप!
"अहह। मेरे बच्चा। आप् तोँ मुझे स्वर्ग दिखारहे हें। उह.अहह। उम्मम!"
शुभम नें अपनीजीभ अंदर तक घुसा दि औऱ उस गाढ़ेरस कों चूस लिया। गड़प-गड़प। सड़प!
सुमनबैड पर्र मछ्ली कि तरहतड़प रही थि, उसकेहाथ शुभम केँ बालों कों नोंचरहे थें। अहह.उह। अहह
सुमन कां बदनअब बिजली केँ झटकों कि तरह कांपने लगा थां। उसका पूराबदन अकड़ गय़ा।
"अहह। बाबू। मे। मे होने वाली हूं। अहह!" सुमन नें चिल्लाते हुए शुभम कां सिर मजबूती सें जकड़ लिया।
उसने शुभम केँ मुँह कों अपनी योनि पऱ पूरी ताकत सें दबा दिया। दप। उम्मम!
शुभम कां नाक औऱ मुँह पूरीतरह सुमन कि जांघों केँ बीचफंस गय़ा। वो सांस लेने केँ लिए फड़फड़ाने लगा।
गड़प। गड़प.गड़प! अचानक सुमन कि योनि सें गरमरस कि फुहारें फूट पड़ीं।
"आहह्ह्ह! सोनू। मेरा बच्चा। लें लीजिए। सभीपी जाइए!" सुमन नें बेडशीट कों दांतों सें पकड़ लिया।
शुभम कां दमघुट रहा थां, मगर वो पागलों कि तरहउस गरम पानी कों गटकने लगा। गड़प-गड़प। सड़प!
"उम्म.उह। म्मम." शुभम कि दबी हुइ, घुटी-घुटी आवाज़ें सुमन कि जांघों केँ बीच सें आँ रहीथीं।
उसका चेहरा सुमन केँ रस औऱ लार सें पूरीतरह सन चुका थां। स्लरप। चप-चप!
सुमन अपनीकमर कों ऊपर-नीचे पटकरही थि। "अहह। बाबू। औऱ। सभीपी जाइए.अहह। उह!"
शुभम नें अपनीजीभ सें अंतिम कतरा तक साफकर दिया। सड़प। स्लरप!
सुमन आरामसे ढीली पड़नेलगी, पऱ उसने शुभम कां सिर नहि छोड़ा। "मेरा शोना। मेरा प्यारा बच्चा। अहह!"
शुभम नें हाँफते हुए अपना मुँह बाहर् निकाला। उसका चेहरा गीला औऱ लाल थां। हफ़-हफ़.हफ़!
"सुमन.उह। आपने। मेरादम हि निकाल दिया थां, " शुभम नें हाँफते हुए (हफ़-हफ़)कहा।
"तौ मर जाते न् मुझमें हि। मेरे बाबू, " सुमन नें उसे घसीटकर अपने सीने सें लगा लिया।
उसकी सांसें अभि भि तेजथीं। अहह.उह। उम्मम! पूरे कमरे मे उस मिलन कि महक औऱ गीलापन फैलाहुआ थां।
"आप् बहोत लजीज हें। सुमन, " शुभम नें उसकेगले पर्र अपना गीला चेहरा रगड़ा।
"सभी आपका हैं बच्चा। यहबदन। यहरस.यह जान भि, " सुमन नें रोतेहुए उसेचूम लिया
सुमन नें शुभम कां चेहरा अपने हाथों मे लेँ लिया। उसका चेहरा सुमन केँ रस सें पूरीतरह भीगाहुआ थां।
"ओह मेरे बाबू। मेरा सारा अमृत आपके चेहरे पऱ हैं, " सुमन नें मदहोश होकरकहा। हफ़-हफ़.अहह!
उसने अपनीजीभ निकाली औऱ शुभम केँ गालों कों चाटना शुरुआत किया। लप-लप। स्लरप!
वोँ अपना हि रस शुभम केँ चेहरे सें बड़ेचाव सें चखरही थि। चप-चप.सड़प!
"उम्मम। कितना मीठा हैं न् सोनू? मेरा औऱ आपका स्वाद मिल गय़ा हैं। "
उसने शुभम कि आँखों औऱ नाक पऱ लगीनमी कों भि अपनीजीभ सें साफ किया। स्लरप। स्लरप!
"अहह। सुमन। बेबी.बस कीजिये, " शुभम नें उसकीपीठ सहलाई। उह। उम्मम!
सुमन उसकेऊपर लेट गई औऱ उसकी आँखों मे झाँकने लगी। "सुनिए नं मेरे बच्चा."
"अबकुछ ऐसा करते हें जोँ दुनिया नें कभी सोचा भि न् हौ, " सुमन नें शरारत सें कहा।
"क्याँ चाहती हें आप्? औऱ कितनी हदें तोड़ेंगी?" शुभम नें उसकीकमर सहलाई।
"आप् हि बताइए बाबू। क्याँ घिनौनी चीज़ करूँ? जिसमें आपको सबसे अधिक मज़ाआए, " उसने फुसफुसाया।
"बोलिए मेरे मालिक। आपकी दासी रेडी हैं, " सुमन नें उसकेकान केँ नीचेजीभ फेरी। लप-लप!
शुभम कि सांसें फिन सें भारी होने लगीं। "सुमन। आप् बहोत बिगड़ गई हें। "
"केवल आपकेलिए बिगड़ी हूं शोना। बोलिए, क्याँ करूँ? आपकाथूक पी जाऊँ?" सुमन नें पूछा।
"याँ फिन। आपकी गंदी जुराबें चूसूँ? क्याँ चाहिए मेरे बाबू कों?" सुमन कि आँखों मे लस्टनाच रही थि।
"अहह। सुमन.उह। मुझे आपके पसीने कां एक्-एक् कतरा चखना हैं, " शुभम नें उसे भींच लिया।
"मगर बाबू अभि तोँ हमने पूरा एक् दूसरे कों छाता चूमा हैं रुको मे आपके लन्ड कों चाटती हूं
सुमन शुभम् केँ छाती कों चूमते हुए नीचे गायीफिन
सुमन नें अब शुभम केँ लन्ड कों अपने हाथों मे भर लिया। उसकी आँखों मे एक् अजीब सि भूख थि।
"मेरे बाबू। मेरे शोना.अब इसकी बारी हैं, " सुमन नें फुसफुसाते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
उसने अपना चेहरा नीचे झुकाया औऱ उसे गहरी सांस भरकर सूंघने लगी। सुप-सुप। सुप!
"अहह। सुमन। बेबी.उह!" शुभम कां बदन झटके लेनेलगा।
सुमन नें अपनीजीभ निकाली औऱ नीचे सें ऊपर तक एक् लंबी लकीर खींच दि। लप-लप। स्लरप!
वोँ पागलों कि तरहउसे चारों तरफ सें चाटने औऱ चूमने लगी। मुआह। चप-चप.सड़प!
उसकीजीभ कि रगड़ सें शुभम कि कराह निकल गई। "अहह.उह। सुमन। उम्मम!"
सुमन नें उसे अपने हाथों सें धीरे धीरे ऊपर-नीचे (stroking) करना शुरुआत किया। सर-सर.अहह!
तभी लिंग केँ छेद पऱ एक् पारदर्शी औऱ चिपचिपी बूंद'उभर आई।
सुमन कि नजरें उस पर्र टिकगईं। उसने अपनीनाक वहां रगड़ी। सुप-सुप। "कितनी मादक खुशबू हैं!"
उसने अपनीजीभ कि नोक सें उस बूंद कों बड़ेचाव सें चख लिया। सड़प। स्लरप!
"उम्मम। मेरा प्यारा बच्चा। यह तोँ बहोत नमकीन हैं, " सुमन नें कराहते हुएकहा।
अब उसने अपना पूरा मुँह खोला औऱ लिंग कों अंदरसमा लिया। गड़प। उम्मम!
वोँ उसे किसी कैंडी कि तरह चूसने लगी। चप-चप। गड़प-गड़प। सड़प!
शुभम कां जिस्म अकड़ गय़ा। "अहह.उह। सुमन। बहोत मज़ा आँ रहा हैं। सीसी.!"
सुमन नें शुभम कां हाथ पकड़कर अपनेसिर पऱ रख दिया। "बाबू.इसे अंदर ठूसिए। गले तक!"
शुभम नें उसकेसिर कों पकड़कर धक्का दिया। सुमन नें उसे पूराहलक (throat) तक उतार लिया। गपक। गपक!
उसकी आँखों सें पानीआने लगा, पर्र वोँ नहि रुकी। गड़प-गड़प। सड़प। चप-चप!
गीली, लसलसी औऱ घुटी-घुटी आवाज़ें कमरे मे गूँजरही थीं। स्लरप। मुआह। उम्मम!
"अहह.उह। बेबी। आप् तौ जान लेँ लेंगी। सीसी.अहह!" शुभम बेकाबू होकरखाट कि चादर नोचने लगा
शुभम केँ अंदर कां जानवर अब पूरीतरह जाग चुका थां। उसने सुमन केँ बाल अपनी मुट्ठी मे कसाई कि तरह जकड़लिए।
"बहोत शौक हैं न् तुम्हारी तरफ चूसने कां? लें। अबचूस इसे!" शुभम नें दहाड़ते हुएकहा।
उसने सुमन कां सिर नीचे दबाया औऱ अपना लिंग सीधे उसकेगले केँ अंत तक ठूस दिया। गपक!
सुमन कि आँखें बाहर् कों निकलआईं। उसकादम घुटने लगा। घुट। घुट। उम्मम!
उसका चेहरा नीला पड़नेलगा, पर्र शुभम नें उसे नहि छोड़ा। "हिलमत। चुपचाप पड़ीरह!"
"साली। कुतिया। आज तेरा सारानशा उतार दूँगा, " शुभम नें दांत पीसते हुए गंदी गाली दि।
सुमन केँ गले सें अजीब सि घुटी हुईँ आवाज़ें निकलरही थीं। गक-गक। उह-उह!
शुभम नें उसकेगाल पऱ एक् थप्पड़ जड़ा। चटाक! "कैसालग रहा हैं? बोलअब!"
सुमनबोल नहि पारही थि, पर्र उसकी आँखों मे खुशी केँ आँसू थें। वो यही चाहती थि।
शुभम नें उसका मुँह पकड़कर उसे पागलों कि तरह ऊपर-नीचे करवाना शुरुआत किया। धप-धप। गप-गप!
"रांड कहीं कि। बहोत प्यासी थि नं तूँ? लेँ। पीअबइसे, " उसने एक् औऱ भद्दी गाली दि।
सुमन केँ हलक सें टकराने कि आवाज़ें (धप-धप) कमरे मे गूँजरही थीं। स्लरप। चप-चप!
उसकीलार औऱ आँसू शुभम केँ लिंग पर्र बहरहे थें। लप-लप.सड़प!
"आज तुम्हारी तरफ तेरी औकात बताऊंगा। नीच स्त्री, " शुभम वहशी हौ चुका थां।
सुमन नें हाथ जोड़दिए, पर्र शुभम नें उसकी गर्दन औऱ जोर सें भींचली।
"अहह.उह। म्मम." सुमन कां बदन बेबस होकर कांपरहा थां।
गड़प-गड़प। सड़प। चप-चप! गीली औऱ गंदी आवाज़ों सें रूमभर गय़ा।
"चूसइसे। एक् कतरा भि बाहर् नहि गिरना चाहिए। हरामजादी!" शुभम नें उसे झकझोर दिया।
सुमन सिसकरही थि, पऱ वो शुभम केँ इस वहशीपन पऱ पूरीतरह कुर्बान थि। अहह.उह। उम्मम!
शुभम कां शरीर पूरीतरह अकड़ गय़ा। उसकाचरम बिंदु आँ चुका थां।
"लें। पीइसे। कुतिया!" शुभम नें दहाड़ते हुए लिंग कों सुमन केँ गले मे औऱ गहराई तक ठूँस दिया। गपक!
अचानक, गाढ़ा वीर्य सुमन केँ गले मे फूट पड़ा। गड़प। गड़प.गड़प!
मगर शुभम यहीं नहि रुका। उत्तेजना कि चरम सीमा पर्र उसका नियंत्रण छूट गय़ा औऱ पेशाब (मूत) भि निकलने लगा।
उसने सुमन कां मुँह कसकर दबोचे रखा। गर्म पेशाब कि धार सुमन केँ हलक मे उतरने लगी। गट-गट.सड़प!
सुमन कां दम घुटने लगा। वो तड़पने लगी। उसका चेहरा नीलापड़ गय़ा। उह.घुट। उम्मम!
उसकी आँखों सें पानीबह रहा थां, पर्र वो उस 'अमृत' कों गटकरही थि। गट.गट!
"शुक्रिया। मालिक। उह.अहह!" सुमन कि आँखों मे अजीब सि दीवानगी थि।
शुभम कों दया आँ गई। उसने झटके सें अपना लिंग बाहर् निकाला। पॉप!
सुमनखाट पऱ गिरकर ज़ोर-ज़ोर सें खाँसने लगी। खों-खों। हफ़-हफ़!
उसने अपनागला साफ किया (खाँखरा) औऱ पागलों कि तरह हंसने लगी। "अहह। आनंद आँ गय़ा मालिक!"
शुभम अभि भि हाँफरहा थां। "साली। पागलकर दिया तूने मुझे। हरामजादी!" हफ़-हफ़.अहह!
सुमन नें अपना चेहरा ऊपर उठाया। "बाबू। औऱ। मुझे नहला दीजिए। "
शुभम नें फिन सें पेशाब करना शुरुआत किया। इस बार सीधे सुमन केँ चेहरे औऱ शरीर पर्र। शू.शू.
"अहह। उह। कितना गर्म हैं। उम्मम!" सुमन नें अपना मुँहखोल लिया।
वो उस पेशाब कों अपनीजीभ पऱ लेनेलगी। लप-लप.सड़प!
"पीइसे। तेरीयही स्थान हैं। रांड!" शुभम नें भद्दी गाली दि। चटाक!
सुमन नें उस पेशाब कों गट-गट करके पीना शुरुआत किया। गट-गट.गट!
"अहह.उह। मेरा बच्चा। औऱ। मुझे गंदाकर दीजिए!" सुमन सिसकरही थि।
पूरेखाट पऱ पेशाब औऱ रस कि महकफैल गई। सड़प। चप-चप.अहह!
सुमनउस गंदगी मे नहारही थि औऱ शुभमउसे गालियों सें नवाजरहा थां। उह। उम्मम। सड़प!
(बेड नीचे वाली लेयर वाटर रेजिस्टेंट थि उपर कि बेडशीट हि गीली हुइ थि )
शुभम कां जोश आहिस्ता ठंडापड़ा, मगर सुमन अभि भि उसी गंदीलत मे डूबी हुइ थि। वो पलंग पर्र बिखरे उसतरल कों अपनी उंगलियों सें समेटने लगी।
"बाबू। आपने तोँ मुझे धन्यकर दिया, " सुमन नें लथपथ चेहरे केँ संगकहा। हफ़-हफ़.अहह!
शुभम नें नफरत औऱ प्रेम केँ मिले-जुले भाव सें उसे देखा। "साली, एकदम जानवर हैं तुँ। "
सुमन नें शुभम केँ पैरों कों पकड़ लिया औऱ अपनागाल उसके तलवों पर्र रगड़ने लगी। सर-सर.
"हाँ मालिक। आपकी जानवर। आपकी दासी.अहह!" उसने शुभम कां एक् पांव उठाकर चूम लिया। मुआह.सड़प!
उसकीजीभ अब शुभम केँ पैरों कि उंगलियों केँ बीच फंसी गंदगी औऱ नमी कों चाटने लगी। लप-लप। स्लरप!
"अहह। सुमन.उह। बसकरअब। मर जाएगी क्याँ?" शुभम नें उसकीपीठ पर्र लात मारी। धप!
सुमनउस चोट सें औऱ भि ज़्यादा उत्तेजित हौ गई। "मारिए औऱ मारिए। उह। उम्मम!"
उसने शुभम केँ घुटने कों अपने दाँतों सें काट लिया। कट! "अहह। सोनू!"
शुभम नें उसे बालों सें पकड़कर ऊपर उठाया। "चल.अबसाफ़ कर मुझे। अपनीजीभ सें!"
सुमन नें खुशी सें हल्की चीखभरी। "जी मालिक। एक्-एक् कतराचाट लूँगी। "
वो शुभम केँ पूरे जिस्म पऱ रेंगने लगी, जैसेकोई नागिन हौ। सर-सर। लप-लप!
उसके चेहरे पर्र लगा पसीना, लार औऱ पेशाब अब शुभम केँ सीने पर्र वापसलग रहा थां। स्लरप। सड़प!
"अहह। उह। बेबी। तेरीयह गन्दगी। उम्मम!" शुभम नें उसकी गर्दन दबोचली।
कमरे मे मात्र चाटने औऱ कराहने कि भारी आवाज़ें थीं। चप-चप। स्लरप। अहह.उह!
सुमन नें शुभम कि नाभि मे अपनीजीभ गड़ा दि। गप-गप.सड़प!
"अहह। उम्मम। बाबू.आज कि रातकभी ख़त्म न् हौ। अहह!"
शुभम नें उसे गालियां देना जारीरखा, औऱ सुमनहर गाली पर्र झूम उठती। "रांड। कुतिया। पीजासभी!"
गट-गट। स्लरप। मुआह! सन्नाटे मे सुमन केँ हलक सें उतरते रस कि आवाज़ गूँजती रही।
"मालिक। उह.अहह। अब मुझे अपनीशरण मे लें लीजिए, " सुमन नें गिड़गिड़ाते हुएकहा। हफ़-हफ़.
शुभम नें उसके गीले बालों कों मुट्ठी मे लपेटा औऱ उसका चेहरा ऊपर कि ओर खींचा। "अभि मन नहि भरा तेरा? सालीनीच महिला!"
उसने सुमन केँ चेहरे पर्र ज़ोर सें थूका। थू। स्लरप!
सुमन नें अपनी आँखें बंदकर लीं औऱ उसथूक कों अपने चेहरे पऱ मलनेलगी। "अहह। उम्मम। औऱ। औऱ गंदा कीजिये मुझे!"
शुभम नें उसे खींचकर पलंग केँ कोने पऱ खड़ा किया। "झुक अब। जानवरों कि तरह!"
सुमन जल्दी घुटनों औऱ हाथों केँ बलझुक गई। धप!
शुभम नें पीछे सें उसके कूल्हों पऱ एक् ज़ोरदार थप्पड़ जड़ा। चटाक!
"आहह्ह! यस बाबू। मारिए। अहह.उह!" सुमन कि चीख मे एक् अजीब सां सुख थां।
शुभम नें उसकीकमर पर्र अपने नाखूनों सें खरोंच दिया। चरर्र। "यह लें। यह हैं तेरा इनाम!"
"अहह। उम्मम। सोनू। मे आपकी दासी हूं। चीर दीजिये मुझे.अहह!"
शुभम नें उसे बालों सें पकड़कर पीछे कि ओर खींचा औऱ उसकेकान मे गंदी गाली बुदबुदाई। "आज तुम्हारी तरफ सोना नहि हैं। आज तेरीबस तड़पना हैं। "
उसने अपनीजीभ सुमन कि रीढ़ कि हड्डी पर्र ऊपर सें नीचे तक फेरी। लप-लप। स्लरप। सड़प!
सुमन कां शरीर धनुष कि तरहतन गय़ा। "अहह.उह। बेबी। आपकीजीभ। उम्मम!"
पूरे कमरे मे चाटने, थप्पड़ों औऱ सुमन कि सिसकियों कां हंगामा थां। चटाक। स्लरप। अहह.उह!
शुभमअब पूरीतरह सें वहशीबन चुका थां। उसने सुमन केँ पैरों केँ बीचफिन सें अपना चेहरा घुसाया। सड़प.सड़प। चप-चप!
"अहह। मालिक। उह.सभी चूस लीजिये। कुछमत छोड़िये। अहह!"
रात ढलरही थि, मगर उनका पागलपन बढ़ता हि जारहा थां। हफ़-हफ़.सड़प। मुआह
"साली.आज तेरीरूह तक कपा दूँगा, " शुभम नें घुर्राते हुएकहा। हफ़-हफ़.अहह!
उसने सुमन केँ पैरों कों चौड़ा किया औऱ उसके घुटनों केँ पीछेजोर सें काटा। कट!
"आआह्ह! बाबू.उह। जान निकल जाएगी। अहह!" सुमन कि चीख गूँजी।
शुभम नें अपनीजीभ सुमन कि जांघों पऱ रगड़ी। लप-लप। स्लरप!
उसने सुमन कि योनि सें बहतेहुए अंतिम रस कों फिन सें चूसना शुरुआत किया। गड़प-गड़प। चप-चप!
"उम्मम। यह गन्दगी। यह स्वाद। अहह!" शुभम नें एक् औऱ थप्पड़ उसके कूल्हों पर्र मारा। चटाक!
"अहह। उह। मारिए मेरे मालिक। अपनी रांड कों औऱ तड़पाइए!" सुमन पागलों कि तरह हंसने औऱ रोनेलगी।
शुभम नें अपने मुँह मे ढेर साराथूक जमा किया औऱ सीधे उसकी योनि केँ छेद पऱ थूका। थू। स्लरप!
फिन उसने अपनी उंगलियां सुमन केँ मुँह मे ठूसदीं। "चाट इन्हें। साफ़कर इसे!"
सुमन नें अपनीजीभ निकाली औऱ शुभम कि उंगलियों कों किसी भूखे जानवर कि तरह चाटने लगी। लप-लप.सड़प। चप-चप!
"अहह। उम्मम। बाबू.उह। अहह!" सुमन कि लार शुभम केँ हाथों पर्र बहरही थि।
शुभम नें फिन सें सुमन कां सिर बालों सें पकड़ा औऱ उसेबैड पर्र पटका। "अब चुपचाप पड़ीरह। हिली तौ जान सें मार दूँगा!"
उसने सुमन केँ जिस्म पर्र चढ़करउसे अपनी बाहों मे इतनीजोर सें भींचा कि उसकी हड्डियां चटकने लगीं। कड़क!
"अहह.उह। बेबी। घुटने दीजिये मेरादम। अहह। उम्मम!"
रात केँ अंतिम पहर मे, दोनों गंदगी, पसीने औऱ थूक सें सनेहुए एक्-दूसरे मे धंसेरहे। स्लरप। चप-चप.अहह। उह!
सुमन शुभम केँ सीने पर्र अपना गीला चेहरा रगड़ती रही, औऱ शुभमउसे गंदी गालियां देतारहा। हफ़-हफ़.अहह। उह!
शुभम नें सुमन कि टांगों कों झटके सें अपने कंधों पऱ रख लिया। उसका लिंग पत्थर कि तरह सख्त औऱ प्यासा थां।
"सुनिए बाबू.अब औऱ इंतजार नहि। उह.अहह!" सुमन नें तड़पते हुए अपनीकमर उठाई।
"साली, बहोत जल्द हैं तुझेही?" शुभम नें उसे घूरते हुए गाली दि। "अभि औऱ तड़पाऊंगा। "
"नहि बच्चा। डालिए। बिना किसीरहम केँ डालिए। अहह!" सुमन कि आँखों मे पागलपन थां।
शुभम नें लिंग कि नोक कों उसकी योनि केँ दरवाज़ा पर्र रगड़ा। सर-सर.सड़प!
"अहह.उह। सोनू। अंदर। पूरा अंदर। सीसी.!" सुमनबैड पऱ हाथ पटकने लगी।
शुभम जानबूझकर पीछेहट गय़ा। "अभि नहि। पहलेभीख मांग इसकेलिए!"
"बाबू। प्लीज। मुझे दर्द चाहिए। फाड़ दीजिये मुझे.अहह। उम्मम!" सुमन रोनेलगी।
शुभम नें एक् गंदी गाली दि औऱ अपनी पूरी ताकत सें एक् हि झटके मे अंदरधंस गय़ा। धप.गपक!
"आआआह्ह्ह्ह!" सुमन कि एक् लंबी औऱ दर्दभरी चीख निकली। "बाबू.उह। अहह.मर गई!"
"कैसालगा? बोल साली। मिला दर्द?" शुभम नें दांत पीसते हुए पूछा। हफ़-हफ़.अहह!
"अहह.उह। बहोत अधिक। उम्मम। औऱ। औऱ जोर सें। सीसी.!" सुमन कां जिस्म कांपरहा थां।
शुभम नें वहशियों कि तरह धक्के मारना शुरुआत किया। धप-धप। चप-चप.धप!
"लेँ। रांड। औऱ लें। यही चाहती थि न् तूँ?" शुभम गालियां देतेहुए उसे जोरों सें चोदने लगा।
हर धक्के केँ संग सुमन कां जिस्म पीछे कि ओर खिसकरहा थां। धप.धप.सड़प!
योनि केँ गीलेपन औऱ टकराने कि आवाजें कमरे मे गूँज उठीं। चप-चप। स्लरप। धप!
"अहह। उह। मालिक। उम्मम। औऱ गहराई तक। अहह.फाड़ दीजिये!"
शुभम नें उसकीकमर पकड़कर उसे अपनीओर खींचा औऱ रफ्तार बढ़ा दि। धप-धप-धप!
"साली.आज तुम को चलने लायक नहि छोड़ूँगा!" शुभम हाँफते हुए बोला। हफ़-हफ़.अहह!
सुमन दर्द औऱ लस्ट केँ इस संगम मे पूरीतरह खो चुकी थि। "अहह.उह। यस बाबू.अहह। उम्मम!"
शुभमअब पूरीतरह सें बेकाबू होँ चुका थां। उसकी आँखों मे खून सवार थां औऱ हरकतें बिल्कुल वहशी।
"लें साली.चख मेरा ज़ोर!" शुभम नें अपनी रफ़्तार कों दोगुना कर दिया। धप-धप-धप-धप!
सुमन कां सिरखाट केँ सिरहाने सें बार-बार टकरारहा थां। ठक.ठक.ठक!
"आहह्ह! बाबू.उह। उम्मम। औऱ। औऱ जोर सें। फाड़दो!" सुमन पागलों कि तरहचीख रही थि।
शुभम नें उसके दोनों हाथ एक् हाथ सें ऊपरजकड़ लिए। "चुप रह हरामजादी। औऱ सहइसे!"
योनि केँ अंदर औऱ बाहर् घर्षण कि आवाज़ें (चप-चप.सड़प) बहोत तेज़ हौ गई थीं। धप। धप। स्लरप!
"अहह.उह। सोनू। मेरादम निकलरहा हैं। अहह। सीसी.!" सुमन कां चेहरा पसीने सें नहा गय़ा थां।
शुभम नें उसे गाली देतेहुए उसके सीने पर्र एक् औऱ थप्पड़ जड़ा। चटाक! "अभि तौ शुरुआत हुआ हैं रांड!"
उसने अपनीकमर कों पूरी ताकत सें झोंक दिया। धप। गपक.धप!
सुमन कि योनि सें सफेदझाग औऱ रस बाहर् निकलने लगा। लप-लप। चप-चप!
"अहह। उह। मालिक। उम्मम। जान लें लीजिये। अहह.उह!"
शुभम केँ धक्के इतने गहरे थें कि सुमन कि आँखों केँ सामने अंधेरा छानेलगा। धप-धप-धप!
"साली.आज तुम्हें याद रहेगा कि किसका पालापड़ा हैं!" शुभम नें दांतों तले अपने होंठदबा लिए। हफ़-हफ़.अहह!
कमरे मे मांस केँ टकराने औऱ सुमन कि सिसकियों कां हंगामा चरम पऱ थां। चप-चप.धप। स्लरप। अहह!
"अहह। उह। बेबी। मे। मे होने वाली हूं। आहह्ह!" सुमन कां जिस्म कमान कि तरहतन गय़ा।
शुभम नें उसकी गर्दन दबोचली औऱ अंतिम कुछ प्रहार बहोत हि बेरहमी सें किए। धप। धप.धप!
"लेँ। पीइसे अब!" शुभम कां बदन झटके लेनेलगा औऱ वो सुमन केँ अंदर खाली होनेलगा। गड़प.गड़प। गड़प!
सुमन नें एक् चीख मारी औऱ निढाल होकरगिर पड़ी। अहह। उह। उम्मम!
दोनों हाँफरहे थें। हफ़-हफ़। हफ़-हफ़। पसीने औऱ रस कि महक पूरे कमरे मे भर चुकी थि।
शुभम कां वहशीपन जैसे हि शांतहुआ, सुमन कां रूप पूरीतरह बदल गय़ा। उसने अपने कांपते हुए पैरों औऱ हाथों सें शुभम केँ भारीबदन कों चारों तरफ सें जकड़ लिया।
"अहह। बस बाबू.बस मेरा बच्चा, " सुमन नें बहोत हि कोमल स्वर मे फुसफुसाया। हफ़-हफ़.उह।
शुभम उसकी बाहों मे बेदम होकर गिरा थां। सुमन नें उसके गीले बालों कों सहलाना शुरुआत किया।
"कुछ नहि बाबू.कुछ नहि हुआ.अब शांत हौ जाओ मेरा बच्चा, " वो उसे किसी छोटे बच्चे कि तरह दुलारने लगी।
सुमन कि आँखों मे अब वो दरिंदगी नहि, बल्कि असीम ममता औऱ प्रेम थां।
"आज मेरे बच्चे नें बहोत काम किया.थक गय़ा मेरा बाबू। उम्मम, " उसने शुभम केँ माथे कों चूम लिया। मुआह!
शुभम कां चेहरा अभि भि सुमन केँ थूक, पसीने औऱ रस सें भराहुआ थां। सुमन नें अपना चेहरा आगे बढ़ाया।
वो शुभम केँ पूरे चेहरे कों अपनीजीभ सें बहोत हि लाड सें चाटने लगी। लप-लप। स्लरप। मुआह।
"यह सभीसाफ कर दूँगी मे। मेरे बाबू कों सुला दूँगी, " उसने शुभम केँ गालों पऱ लगे अपने हि थूक कों चूम-चूम करसाफ किया।
शुभम जोँ अभि तक गालीदे रहा थां, अब सुमन कि इस ममता केँ आगे एकदम निढाल औऱ शांत हौ गय़ा।
"सुमन.उह। मुझेमाफ करदो, " शुभम नें दबी आवाज़ मे कहा।
"शशश। चुप एकदमचुप मेरा बच्चा। मालिक कभी माफी नहि मांगते, " सुमन नें उसके होंठों पऱ अपनी उंगली रख दि।
उसने शुभम कां सिर अपने सीने पर्र रख लिया औऱ उसे थपकियां देनेलगी। टप.टप.
सुमन कि आँखों सें ममता केँ आँसू शुभम केँ गालों पऱ गिररहे थें। "सोजाओ मेरेलाल। तुम्हारी दासी यहीं हैं। "
पूरे कमरे कां माहौल अब कामुकता सें बदलकर एक् अजीब सें चैन औऱ मातृत्व भाव मे ढल गय़ा थां।
"अहह। उम्मम। मेरा प्यारा बच्चा। सोजाओ, " सुमनउसे सहलाते-सहलाते स्वयं भि आँखें मूंदने लगी।
मगर शुभम - सुमन केँ ऊपर सें हटने औऱ बगल मे लेटने कि कोशिश कि, मगर सुमन नें अपनी टांगों औऱ बाहों कां घेरा औऱ भि सख्तकर लिया।
"नहि बाबू। कहीं नहि जानां। यहीं रहिए मेरेऊपर, " सुमन नें उसे मजबूती सें जकड़ते हुएकहा। उह। उम्मम!
"सुमन, मेरावजन तुम् पऱ हैं। तुम्हें दर्द होगा, सोनेदो सुकून सें, " शुभम नें प्रेम सें उसे समझाना चाहा।
"नहि मालिक। मुझेयह बोझ मनपसंद हैं। आप् रोज़, हर रात, मेरेऊपर हि सोएंगे, " सुमन कि आवाज़ मे एक् मीठीजिद थि।
उसने शुभम कां सिर पकड़कर अपने स्तनों केँ बीचदबा लिया। "आप् मेरेदूध मे सिररख कर सोएंगे। बस!"
शुभम नें विरोध करनाछोड़ दिया औऱ सुमन कि नरम छाती पऱ अपना चेहरा टिका दिया। दोनों पूरीतरह नग्न, एक्-दूसरे केँ शरीर कि गर्मी मे लिपटे हुए थें। हफ़-हफ़.अहह!
"मेरा प्यारा बच्चा। सोजाओ अब, " सुमन नें उसके बालों मे अपनी उंगलियां फंसादीं औऱ धीरे धीरे सहलाने लगी। सर-सर.
"बाबू। बाबू। मेरा शोना बाबू." वो मंत्र कि तरह धीमी आवाज़ मे यही दोहराती रही।
शुभम कि सांसें आरामसे स्थिर होने लगीं औऱ वो सुमन कि ममताभरी गोद मे गहरी नींद मे खो गय़ा। हफ़-हफ़.सूं.
सुमन कि आँखों मे नींद कां नामोनिशान नहि थां। वो जागती रही, बस शुभम केँ मासूम चेहरे कों निहारती रही।
वो कभी उसकेकान केँ पीछे चूमती, तोँ कभी उसके बालों कों सहलाती। "आपकी दासी हमेशा आपकेपास हैं मालिक। अहह। उम्मम!"
बाहर् रात गहरारही थि, मगर कमरे केँ अंदर सुमन अपनी पूरी दुनिया कों अपनी बाहों मे समेटे, उसे सुलाने केँ लिए पहरादे रही थि।
सुमन शुभम केँ सोतेहुए मासूम चेहरे कों निहारती रही। उसने धीरे-धीरे सें शुभम केँ चेहरे पऱ अपनी सांसों कि फूँक छोड़ी। फूँ.फूँ.
"मेरा बाबूसो गय़ा। मेरा प्यारा बच्चा, " वो फुसफुसाते हुए उसके बालों कों सहलाने लगी। सर-सर.
उसने शुभम केँ माथे पर्र एक् लंबी औऱ गीली पप्पी ली। मुआह.सड़प!
"सुनिए बाबू। आप् सोरहे होँ पऱ मेरीबात सुनो, " सुमन कि आँखों मे भविष्य केँ ख्वाब चमकने लगे।
"अब हम् यहा सें वापसघऱ जाएँगे। औऱ सबसे पहले मे उस हरामी कों डाइवोर्स दूँगी, " उसने दांत पीसते हुएकहा।
"उसने मुझेकभी नहि समझा.बस नीच हरकतें कीं.अब उसे मेरी जीवन सें जानां होगा। "
सुमन नें शुभम केँ कान केँ पास अपना चेहरा किया। "बाबू.फिन मुझे नीतू कों सभी बताना हैं। "
"केसे बताऊँगी उसे?पता नहि। पऱ बताना तौ पड़ेगा हि न् मेरे शोना?" उसने एक् ठंडीअहह भरी। अहह.
"उसे समझाऊँगी कि हम् एक्-दूसरे केँ बिना नहि रह सकते। वोँ मान जाएगी मेरा बच्चा। "
सुमन नें शुभम केँ गले कों धीरे-धीरे सें चूमा। "फिन मे आपको औऱ नीतू कों लेकर एक् नएशहर चली जाऊँगी। "
"वहा हम् सभीसंग रहेंगे। बिल्कुल एक् खुशहाल परिवार कि तरह। आप्, मे औऱ नीतू। "
"वहा हम् पति-पत्नि कि तरह रहेंगे। कोई समाज, कोई हरामी हमेंनज़र नहि लगा पाएगा। "
उसने शुभम केँ गाल कों अपनी हथेली सें सहलाया। "आप् बिल्कुल चिंता मतकरो बाबू। मे हूं न्!"
"आपकी मम्मी, आपकी प्रेमिका, आपकी दासी.सभी आपकेसंग हैं मेरे शोना। उम्मम!" मुआह!
"अब सोजाओ मेरे राजा बेटा। कल एक् नई सुभह होगी। हमारा नया जिंदगी शुरुआत होगा। "
सुमन नें शुभम कों औऱ कसकर अपनी छाती सें चिपका लिया औऱ उसकी खुशबू लेतेहुए स्वयं भि आँखें मूँदलीं।
"आईलवयू बाबू.सो जाओ.उह। उम्मम.!" हफ़-हफ़.सूं.
शुभम् कां लन्ड बुर मे हि छोटा होँ गय़ा थां यह दोनों पेशाब कि गंदगी वालेबेड मे बुर लन्ड केँ पानी कि भीनी मादक खुश्बू मे ड्रीम्स मे डूबगए…।
मे पागल अपने बेटे केँ लिए - Next part miss mat karna
bhay Reshma ko bi Suman k sath Shivam k niche la do। Jisse Suman or Shivam kee problem kam hongi। or Shivam kee shaadi k liye Reshma kee beti hongi joo sharing mai bharosa rakhegi or neetu bi Shivam kee hu jayegi jisse or majedar kahani hongi।
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