मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-13
विनीता कि वो कुटिल मुस्कान औऱ उसकेहाथ मे चमकता हुआफोन। मुझेलगा जैसे किसी नें मेरे सीने मे गर्मतेल डाल दिया होँ। वो करमजली हमें ब्लैकमेल करने कि हिम्मत कररही थि! शुभम केँ चेहरे पऱ भि क्रोध साफदिख रहा थां, पर्र उसने स्वयं कों काबू मे रखा।
शुभम: "विनीता, ये क्याँ तमाशा हैं? तुम् यहा हमारा पीछा करतेहुए आई होँ?"
विनीता: "पीछा नहि शुभम, सच कां पर्दाफाश करनेआई हूं। आंटी नें कल मुझे बहोत खरी-खोटी सुनाई थि न्? अब देखूँगी कि जबये वीडियो अंकल औऱ मोहल्ले वाले देखेंगे, तोँ किसकी इज्जत नीलाम होगी। "
उस कमीनी कि हिम्मत तौ देखो! मेराजी चाहा कि वही गंगा कि लहरों मे उसकासिर डुबोदूँ। मगर शुभम नें मेराहाथ थाम लिया।
शुभम: (ठंडी आवाज़ मे) "तुम्हें जोँ करना हैं करो विनीता। पर्र याद रखना, अगर मेरी मम्मी पऱ एक् भि आंचआई, तौ मे भूल जाऊंगा कि तुम् एक् लड़की होँ। चलो मम्मी। "
हम् वहां सें चलेआए, पर्र मेरे पांव कांपरहे थें। घऱ कां मार्ग काटते हुए मेरामन धक-धककर रहा थां। घऱ पहुँचे तौ देखा नीतू आँगन मे बैठी सुबकरही थि। रागिनी किचन मे ऐसेजमी हुइ थि जैसे बरसों सें उसी कां राज हौ।
मे: (नीतू केँ पास जाकर) "क्याँ हुआ लाडो? क्यूं रोरही हैं?"
नीतू: (गुस्से मे मेराहाथ झटकते हुए)"सभी आपकीवजह सें हौ रहा हैं माँ! पिताजी कहरहे हें कि आप् औऱ भैया केँ बीचकुछ। कुछऐसा हैं जोँ सही नहि हैं। क्याँ सच मे? क्याँ आप् औऱ भैया."
वो अपनीबात पूरी नहि करपाई औऱ फिन सें रोनेलगी। मेरी बेटी कि आँखों मे अपनेलिए शक देखकर मेरा कलेजा छलनी होँ गय़ा। उस कसाई रमेश नें मेरी अपनी औलाद केँ कानभर दिए थें।
मे: "नीतू! अपनी मम्मी पर्र भरोसा नहि हैं तेरी? वोँ कुलक्षणी महिला घऱ मे आई हैं औऱ तुँ अपनी मम्मी पर्र कीचड़ उछालरही हैं?"
तभी रमेशजी कमरे सें बाहर् निकले। उनके चेहरे पर्र एक् घिनौनी जीत कि चमक थि।
रमेश: "भरोसा? सुमन, भरोसा तौ तूनेउसी दिन तोड़ दिया थां जब तूने ममता कि मर्यादा लांघी थि। रागिनी सही कहती थि, तुँ शुरुआत सें हि चालाक हैं। "
शुभमआगे बढ़ा, पर्र मैंने उसेरोक दिया। आज मुझे लड़ना थां।
साम कों मे फिन रेशमा केँ यहा गई। मेरामन इतना भारी थां कि लगाअगर किसी सें नहि कहा तौ दम निकल जाएगा।
रेशमा: (हैरान होकर)"यह क्याँ सुनरही हूं सुमन? रमेश भइया साहबउस महिला कों घऱ लेँ आए? औऱ विनीता केँ पास वीडियो हैं? तूँ तोँ चारों तरफ सें घिर गई हैं। "
मे: "रेशमा, मे क्याँ करूँ? मेरा शुभम। वोँ मुझसे दूर जाने कि बातकर रहा हैं ताकि हम् संगरह सकें। पऱ नीतू? वोँ मुझे नफरतभरी नजरों सें देखरही हैं। मुझेसमझ नहि आता कि मे मां हूं याँ प्रेमी? जब शुभमपास आता हैं तौ रूह कों सुकून मिलता हैं, पर्र जब समाजखड़ा होता हैं तौ लगता हैं जहरखा लूँ। "
रेशमा: "देख सुमन, बात अबहाथ सें निकलरही हैं। वोँ रागिनी इतनी आसानी सें नहि जाएगी। औऱ विनीता। वोँ कमीनी शुभम कों पाना चाहती हैं, इसीलिए तुम को रास्ते सें हटारही हैं। तेरीकुछ ऐसा करना होगा कि सांप भि मरजाए औऱ लाठी भि नं टूटे। "
मे: "क्याँ करूँ? वोँ विनीता। वोँ करमजली वीडियो दिखाने कि धमकीदे रही हैं। "
रेशमा: "उसकी कमजोरी ढूंढ। बनारस छोटाशहर हैं, हर किसी कां कोई नं कोईराज होता हैं। तूँ बस अपने शुभम कों थामेरख। अगर वोँ तेरेसंग हैं, तौ तुँ दुनिया जीत लेगी। "
मे घऱ वापसआई। रात कां सन्नाटा पसरा थां। रमेश औऱ रागिनी अपने कमरे मे थें। नीतू केँ कमरे सें सिसकियों कि आवाज़ आँ रही थि। मे दबेपैर शुभम केँ कमरे मे गई। वो अंधेरे मे बैठा खिड़की सें बाहर् देखरहा थां।
मे उसकेपास फर्श पऱ बैठ गई औऱ अपनासिर उसके घुटने पर्र रख दिया।
मे: "शुभम। तुँ मुझसे नफरत तोँ नहि करेगा न्? तेरी बेहन मुझे क्याँ-क्याँ कहरही हैं। मेराजी चाहता हैं कि मे अपनीजान देदूँ। "
शुभम नें अंधेरे मे हि मेरा चेहरा ऊपर उठाया। उसकी उंगलियां मेरे आंसुओं कों पोंछरही थीं।
शुभम: "नीतू अभि छोटी हैं मम्मी, उसे भड़काया जारहा हैं। औऱ जान देने कि बातमत करना। अगर आपकोकुछ हुआ, तोँ मे इसशहर कों आगलगा दूँगी। आप् बस मेरासंग दो। "
उसने मुझे धीरे-धीरे सें ऊपर खींचा औऱ अपनेपास बैड पर्र बिठा लिया। कमरे मे बस हमारी सांसों कि आवाज़ थि।
मे: (तड़पते हुए) "शुभम। मे तुम को बताना चाहती हूं। बरसों सें यहबात मेरे सीने मे दफन हैं। जब तुँ पैदाहुआ थां, तभी सें मुझेलगा कि तूँ मेरा बेटा नहि, मेरा वजूद हैं। जैसे-जैसे तुँ बड़ाहुआ, मेरी ममता। एक् स्त्री कि चाहत मे बदलने लगी। मे। मे तुम्हारी तरफ प्रेम करती हूं शुभम। सिद्दत वाला प्रेम। "
मैंने अपनी आँखें बंदकर लीं, डर थां कि अब वोँ मुझे धिक्कारेगा। पऱ शुभम खामोश रहा। उसने धीरे-धीरे सें मेराहाथ अपनेदिल पर्र रखा। उसकी धड़कनें बेकाबू थीं।
शुभम: "मुझेपता हैं मम्मी। मे भि। मे भि उसीआग मे जलरहा हूं। इसीलिए तोँ विनीता सें दूर भागता हूं, इसीलिए तोँ बापू कि आँखों मे आँखें डालकर बात करता हूं। हम् दोनों एक् हि कश्ती केँ मुसाफिर हें। "
उसरात, उस अंधेरे कमरे मे, ४००पेज कि इस दास्तान कां सबसे गहरा औऱ डरावना राज पूरीतरह खुल चुका थां। हम् मां-बेटा नहि, दोऐसे प्रेमी बन चुके थें जिन्हें दुनिया कि नजर मे 'अपराधी' कहा जाता।
तभी दरवाजे पऱ एक् दस्तक हुइ।
नीतू कि आवाज़ आई— "भैया, क्याँ मम्मी आपके कमरे मे हैं?"
मेरी सांसें फंसगईं। अगर नीतू नें हमेंइस हाल मे देख लिया, तौ क्याँ होगा?
नीतू कि आवाज़ सुनकर मेरे जिस्म कां साराखून जैसेजम गय़ा। मे झटके सें शुभम सें अलग हुइ औऱ अपने अस्त-व्यस्त पल्लू कों संभालने लगी। शुभम नें फुसफुसाते हुए मुझसे कहा, "शांतरहो मम्मी, मे देखता हूं। "
उसनेबड़ी सहजता सें दरवाजा खोला। बाहर् नीतूखड़ी थि, उसकी आँखें सूजी हुई थीं औऱ चेहरा उतराहुआ।
शुभम:"हाँ नीतू, क्याँ हुआ? मम्मी यहीं हें, मुझे समझारही थीं कि पिताजी कि बातों कां बुरा नं मानूँ। "
नीतू नें अंदर झांककर मुझे देखा। उसकी नजरों मे अब भि वोँ चुभन थि, पऱ वोँ कुछ बोलि नहि।
नीतू: "मां। वोँ रागिनी, जोँ पिताजी केँ कमरे मे हैं। वोँ पिताजी सें कहरही थि कि कल वोँ हमारे घऱ केँ जेवर औऱ कागजात कहीं लेँ जाने वाली हैं। मैंने अपनी आँखों सें उसे पिताजी कि अलमारी कि चाबी लेते देखा हैं। "
यह सुनकर मेरी ममता औऱ जलनसभी एक् तरफरह गई। वोँ कमीनी रागिनी हमारे घऱ कों लूटने कि तैयारी मे थि!
मे: "क्याँ? उस कलमुंही कि इतनी हिम्मत? रमेश तोँ उसकी मुहब्बत मे अंधा हौ गय़ा हैं, पर्र मे उसे अपनाघऱ नीलाम नहि करने दूँगी। "
मैंने नीतू कां हाथ पकड़ा। उस लम्हा नीतू कों मुझमें फिन सें वही अपनी पुरानी मम्मी दिखी, जौ घऱ कि रक्षा केँ लिए किसी भि करमजली सें भिड़ सकती थि।
शुभम: "मम्मी, रुकिए। अभि रात बहोत हौ गई हैं। अगर हम् अभि शोर करेंगे, तौ पिताजी फिन सें आप् पर्र हि इल्जाम लगाएंगे। हमेंउसे रंगे हाथों पकड़ना होगा। "
पूरीरात हम् तीनों—मे, शुभम औऱ नीतू—जागते रहे। पहलीबार नीतू हमारे संग थि, पऱ उसकेमन कां संदेह पूरीतरह समाप्त नहि हुआ थां। वोँ बार-बार मुझे औऱ शुभम कों अजीब नजरों सें देखरही थि। सुभह केँ चारबजे थें, जबघऱ केँ पिछले दरवाजे सें किसी केँ निकलने कि आहट हुइ।
हम् तीनों दबेपैर पीछे कि ओरगए। देखा तोँ रागिनी एक् बड़ा सां झोलालिए दबेपैर गली कि तरफबढ़ रही थि। तभी अचानक वहां एक् औऱ सायाआया।
वोँ विनीता थि!
विनीता: (धीरे-धीरे सें रागिनी सें) "सभी लेँ लिया नं? शुभम कां वोँ वीडियो मेरेपास हैं, उसकी मम्मी कों तौ मे जेल भिजवाकर हि मानूँगी। बस तुम् यह जेवर लेकर निकलो। "
मेरी आँखों केँ सामने अंधेरा छा गय़ा। यह दोनों हरामजादियाँ मिली हुई थीं! वोँ विनीता मात्र शुभम केँ पीछे नहि थि, वोँ रागिनी केँ संग मिलकर हमारे घऱ कों खोखला कररही थि।
मे: (चिल्लाते हुए) "पकड़ोइन कौड़ियों कों! भागने न् पाएं!"
शुभम बिजली कि फुर्ती सें झपटा औऱ उसने रागिनी कां हाथ मरोड़ दिया। झोला नीचेगिर गय़ा औऱ सोने केँ कंगन फर्श पर्र बिखरगए। हंगामा सुनकर रमेशजी भि बाहर् आँ गए, बनियान औऱ लुंगी मे।
रमेश:"यह। यह क्याँ हौ रहा हैं? रागिनी, तुम् यहा क्याँ कररही हौ?"
शुभम:"देख लीजिये पिताजी! आपकीयह 'महान मुहब्बत' आपकाघऱ साफ करकेजा रही थि। औऱ यह विनीता। यह भि इसकेसंग मिली हुईँ हैं। "
विनीता घबरा गई। उसने जल्दी अपना मोबाइल निकाला।
विनीता: "अंकल, यह सभीझूठ हैं! मेरेपास देखिये क्याँ हैं। आपकी पत्नि औऱ आपके बेटे कां सच!"
उसने वीडियो प्ले करने कि कोशिश कि, पर्र शुभम नें झटके सें उसका मोबाइल छीनकर जमीन पऱ पटक दिया औऱ अपने जूतों सें उसे चकनाचूर कर दिया।
शुभम: "बहोत खेल लिया तूने कमीनी! अब निकलयहा सें, इससे पहले कि मे पुलिस बुलाऊँ। "
विनीता वहां सें भाग निकली, पऱ रागिनी पकड़ी गई। रमेशजी कां चेहरा देखने लायक थां। उनकी तथाकथित 'रागिनी' जिसे वोँ १९साल सें यादकर रहे थें, एक् मामूली चोरनी निकली।
घऱ मे शोर शांतहुआ, पुलिस रागिनी कों लेँ गई। रमेशजी सिर पकड़कर हॉल मे बैठगए। नीतू रोते-रोते थककरसो गई थि। घऱ मे फिन सें सन्नाटा छा गय़ा, पर्र यह सन्नाटा पहले जैसा नहि थां।
मे किचन मे पानी पीने गई, तौ शुभम पीछे सें आया। उसने मुझे पीछे सें अपनी बाहों मे भर लिया।
शुभम:"अब कोई कांटा बीच मे नहि रहा मम्मी। पिताजी अबकभी सर नहि उठा पाएंगे। "
मैंने उसकाहाथ थाम लिया। मेरामन एक् तरफ तोँ खुश थां कि घऱबच गय़ा, पर्र दूसरी तरफ एक् भारीबोझ महसूस होँ रहा थां।
मे: "शुभम। हमनेउन औरतों कों तौ हरा दिया, पऱ अपने अंदर कि उसतड़प कां क्याँ करेंगे? नीतूअब भि शक करती हैं। औऱ तेरे बापू। वोँ भले हि टूटगए हों, पऱ मरे नहि हें। "
शुभम: "मम्मी, कल जौ हुआ.उस अंधेरे कमरे मे। वोँ कोई सपना नहि थां। मे सच मे आपसे प्रेम करता हूं। औऱ अब मे किसी विनीता याँ रागिनी कों हमारे बीच नहि आने दूँगी। "
अगलेदिन, मे फिन रेशमा सें मिलने गई। उसेसभी बताया।
रेशमा: "सुमन, तुँ जीत तौ गई, पर्र यहजीत बड़ी महंगी पड़ेगी। अब रमेश भइया साहब तुम को औऱ शुभम कों एक् समय केँ लिए भि अकेला नहि छोड़ेंगे। उनकी नजरें अब गिद्ध कि तरह तुम् दोनों पऱ टिकी रहेंगी। औऱ यह जौ शुभम कां प्रेम हैं। यहअब औऱ भि खतरनाक मोड़ लेगा। "
मे: "होनेदे रेशमा। अब मैंने डरनाछोड़ दिया हैं। जबघऱ कि इज्जत बचाने वाली भि मे हूं, तौ अपनी खुशियों कों क्यूं मारूँ? मे अब शुभम कि होकर रहूँगी, चाहे इसकेलिए मुझे स्वयं पाप कि देवी क्यूं न् बननापड़े। "
घऱ लौटी तोँ देखा रमेशजी घऱ केँ मंदिर केँ सामने बैठे थें। उनकी आँखों मे ग्लानि थि याँ कोईनई साजिश, पता नहि। पर्र शुभम अपनी किताबों केँ बीच बैठा मुझे हि ताकरहा थां।
सावन कां अंतिम सोमवार आने वाला थां। बनारस कि गलियां शिव कि भक्ति मे डूबने वालीथीं। पर्र हमारे घऱ मे एक् ऐसी पूजा शुरुआत होने वाली थि, जिसका देवता मेरा अपना बेटा थां
घऱ मे रागिनी औऱ विनीता केँ जाने केँ बाद जैसे एक् भारी कोहरा छंट गय़ा थां। रमेशजी अब बहोत चुप-चाप रहनेलगे थें। उनकी अकड़ जैसेउस टूटेहुए मोबाइल केँ संग हि चकनाचूर होँ गई थि। पर्र सबसे बड़ा बदलाव नीतू मे आया। जब उसेपता चला कि उसकी मां नें घऱ केँ जेवर बचाए हें, तौ उसका साराशक जैसेधुल गय़ा—कम सें कम अभि केँ लिए तौ यहीलग रहा थां।
अगलेदिन सुभह-सुभह किचन मे गरमचाय बनरही थि। मैंने देखा नीतू अपनी पुरानी शरारतों केँ संग वापस आँ गई हैं। वो दबेपैर किचन मे घुसी औऱ पीछे सें आकर मेरेपेट मे गुदगुदी कर दि।
नीतू: "हुर्रर्र! मेरी प्यारी औऱ जांबाज मां! कल तोँ आपनेउस कलमुंही रागिनी कि जोँ क्लास लगाई, मज़ा आँ गय़ा। एकदम फिल्मी स्टाइल मे!"
मे चौंक गई औऱ हाथ सें करछुल गिरते-गिरते बचा।
मे: "चलहट नटखट कहीं कि! डरा दिया मुझे। औऱ यह क्याँ तरीका हैं मां सें बात करने कां?"
नीतू: (हंसते हुए औऱ काउंटर पर्र बैठते हुए)"अरे, अब तौ आप् मेरी हीरोइन होँ। औऱ भैया? भैया तोँ जैसे 'सिंघम' बनगए थें। वैसे मां, एक् बात बताऊं? भैया आपको लेकरकुछ ज़्यादा हि 'पजेसिव' नहि हें? विनीता कां मोबाइल ऐसे तोड़ा जैसे उसमें कोईबम होँ!"
नीतू नें मजाक मे कहा, पऱ मेरे कलेजे मे एक् हूक सि उठी। मैंने बात संभालते हुएकहा—
मे: "वोँ तेरी मम्मी कि इज्जत कां प्रश्न थां लाडो। औऱ शुभम तौ शुरुआत सें हि ऐसा हैं, अपने परिवार केँ लिए किसी सें भि भिड़ सकता हैं। "
तभी शुभम कमरे सें बाहर् आया। उसने सफेद कुर्ता पहना थां, जिसमें वोँ साक्षात बनारस कां सबसे हसीन युवकलग रहा थां। उसे देखते हि नीतू कूदकर उसकेपास गई औऱ उसकाहाथ पकड़कर झूलने लगी।
नीतू:"ओहो! भैया, आज तौ आप् बड़े 'चिकने' लगरहे होँ! क्याँ बात हैं? कहीं किसीनई 'विनीता' सें मिलने कि तैयारी तोँ नहि?"
शुभम नें हंसकर नीतू केँ कान खींचे।
शुभम: "बंदरिया, अपनी पढ़ाई पऱ ध्यान दे। औऱ यह क्याँ सुभह-सुभह मां कों तंगकर रही हैं? जा, जाकर सजधजकर हौ, आजसाम कों तुम कोघाट पर्र मलाईयो खिलाने लेँ चलूँगा। "
नीतू खुशी केँ मारे नाचने लगी। वो शुभम केँ इतने लगभग थि, उसकाहाथ पकड़े हुए थि, उसे झकझोर रही थि। ये देखकर मेरे अंदर वोँ 'हल्की सि जलन'फिन सें सिर उठाने लगी। मे जानती थि वोँ उसकी बेहन हैं, पऱ मेरामन कहता थां कि शुभम कि बांहों पऱ, उसके वक्त पऱ, उसकी मुस्कुराहट पर्र मात्र मेराहक हौ।
मैंने तवे पर्र रोटीजोर सें पटकी।
मे: "नीतू! छोड़उसे, कपड़े गंदे होँ जाएंगे उसके। औऱ तूँ शुभम, यहा बैठ, गर्म पराठे लाती हूं। "
शुभम नें मेरी आँखों मे देखा। वो समझ गय़ा कि मेरी आवाज़ मे यह थोड़ी सि कड़वाहट क्यूं आई हैं। उसने धीरे-धीरे सें नीतू कों अलग किया औऱ मेज पऱ बैठ गय़ा।
नीतू: "मां, आप् भि न्! हमेशा टोकती रहती होँ। भैया मेरे भि हें, मात्र आपके नहि!"
उसनेजीभ चिढ़ायी औऱ भागकर कमरे मे चली गई गाना गातेहुए। किचन मे अब मे औऱ शुभम अकेले थें।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे) "मम्मी। आप् अभि भि जलती होँ? वोँ छोटी हैं, उसकी बातों कां बुरामत मानाकरो। "
मे: "मे क्यूं बुरा मानूँगी? पर्र मुझे अच्छा नहि लगताजब कोई तुझेही बेमतलब मे छूता हैं। चाहे वोँ नीतू हि क्यूं न् होँ। तूँ केवल मेरा हैं शुभम.यह बात मेरे अंदर पत्थर कि लकीरबन गई हैं। "
शुभम नें मेज केँ नीचे सें मेराहाथ पकड़ लिया। उसकी उंगलियां मेरी हथेलियों कों सहलारही थीं।
शुभम: "मे आपका हि हूं मम्मी। नीतू तोँ बस एक् चंचललहर हैं, पर्र आप् मेरा पूरा समंदर हौ। आजसाम कों जब मे उसे बाहर् लेँ जाऊंगा, तौ आपकेलिए आपकी पसन्द कि वोँ नीली कांच कि चूड़ियां लेकर आऊंगा। पहनोगी न्?"
मेरे चेहरे पर्र एक् शर्मीली मुस्कान आँ गई। 39 साल कि उम्र मे मुझे अपनी हि बेटी जैसी लज्जा महसूस हौ रही थि।
दोपहर कों रेशमा आई। उसने देखा कि मे गुनगुना रही थि।
रेशमा: "वाउ सुमन!आज तौ बड़ी रौनक हैं चेहरे पऱ। क्याँ बात हैं? शुभम नें कोईनई 'डिग्री' हासिल करली क्याँ?"
मे: "डिग्री नहि रेशमा, उसनेआज मुझसे ऐसीबात कही कि मेरामन बाग-बाग हौ गय़ा। वोँ मेरेलिए चूड़ियां लाएगा। देखरही हैं? उसे मेरी छोटी-छोटी मनपसंद कां कितना ख्याल हैं। "
रेशमा: (चिंता सें) "सुमन, नीतूअब बड़ी हौ गई हैं। उसकी चंचलता केँ पीछे एक् तेजमन भि हैं। अभि वोँ रागिनी केँ चक्कर मे बहक गई थि, पऱ जिसदिन उसे तेरा औऱ शुभम कां असली 'प्यार' समझआया, उसदिन यह चुलबुलापन मातम मे बदल जाएगा। संभलकर खेलयह खेल। "
मे: "अरे तूँ हमेशा डराती रहती हैं। देख नहि रही, घऱ कितना खुश हैं? रमेशजी भि अब अपने कमरे मे पड़े रहते हें। नीतू अपनी शरारतों मे मस्त हैं। बस मे औऱ शुभम."
साम हुइ। शुभम नीतू कों लेकर बाहर् गय़ा। घऱ मे फिन सें वही सन्नाटा थां, पर्र इसबार इसमें डर नहि, एक् प्रतीक्षा थां। मे सज-धजकर बैठी थि। मैंने हल्के गुलाबी रंग कि साड़ी पहनी थि औऱ बालों मे एक् छोटा सां गजरा लगाया थां।
रात केँ 9 बजे दरवाजे कि घंटीबजी। नीतू अंदरआई, उसकेहाथ मे गुब्बारों कां गुच्छा थां औऱ वोँ खिलखिला रही थि।
नीतू: "मां! देखो भैया नें मुझे कितने सारे गुब्बारे दिलाए! औऱ हमने वहां कुल्हड़ वालादूध भि पिया। बहोत मज़ाआया!"
शुभम पीछे सें आया। उसके चेहरे पऱ एक् थकानभरी मुस्कान थि। उसने अपनीजेब सें एक् छोटा सां पैकेट निकाला औऱ नीतू केँ सामने हि मेरीतरफ बढ़ाया।
शुभम:"यह लीजिये मम्मी। आपकी फरमाइश। "
मैंने पैकेट खोला। उसमें गहरे नीलेरंग कि कांच कि चूड़ियां थीं, जौ रोशनी मे चमकरही थीं।
नीतू:"अरे! यह तौ बहोत खूबसूरत हें! भैया, मेरेलिए क्यूं नहि लाएऐसी?"
शुभम: "तेरी गुब्बारे औऱ मलाईयो मिल गय़ा न्? यह मम्मी केँ लिए हें। मम्मी नें कल जौ बहादुरी दिखाई, यह उसका इनाम हैं। "
नीतू नें मुस्कुराकर मेरीतरफ देखा।
नीतू:"हाँ, यह तोँ सही हैं। माँ पर्र यहरंग बहोत जचेगा। लाइए माँ, मे पहनादूँ?"
नीतू नें मेराहाथ पकड़कर चूड़ियां पहनाना शुरुआत किया। खन-खन कि आवाज़ पूरे कमरे मे गूँजने लगी। शुभम खड़ा होकर हमेंदेख रहा थां। उस लम्हा मुझेलगा कि शायद नीतू केँ संग मेरा नाता भि सुधर जाएगा, पर्र जैसे हि मेरीनजर शुभम कि आँखों सें मिली, मुझे वहां 'ममता' नहि, एक् मर्द कि 'तड़प' दिखी।
सावन कां अंतिम सोमवार बसदोदिन दूर थां।
Update -
सावन केँ अंतिम सोमवार कि वोँ सुभह बनारस केँ लिए उत्सव थि, पऱ मेरेलिए वोँ किसी अग्निपरीक्षा सें कम नहि थि। आसमान सें हल्की फुहारें गिररही थीं, जैसे महादेव स्वयं धरती कों भिगोरहे हों। घऱ मे सुभह सें हि चहल-पहल थि। नीतू नें पूरेघऱ कों गेंदे केँ फूलों सें सजा दिया थां। वो आज बहोत खुश थि, नीलेरंग केँ सूट मे वो बिल्कुल किसी गुड़िया जैसीलग रही थि।
नीतू: "माँ, जल्द उठिए न्! आज तोँ हमें बाबा विश्वनाथ केँ दर्शन केँ लिए जानां हैं औऱ फिनसाम कों घऱ पर्र भि छोटी सि पूजा हैं। भैया! ओ भैया, उठिए, देखिए मैंने आपकेलिए केसरिया कुर्ता निकाला हैं। "
शुभम अपने कमरे सें बाहर् आया, उसकी आँखों मे नींद कि खुमारी थि, पऱ जैसे हि उसकीनजर मुझ पऱ पड़ी, उसकी आँखें चमक उठीं। मैंने आजवही गुलाबी साड़ी पहनी थि औऱ शुभम कि दि हुई नीली चूड़ियाँ मेरी कलाइयों मे खनकरही थीं।
शुभम: "नीतू, तूँ तोँ आज बहोत चहकरही हैं। मां, आप् आज बहोत। बहोत खूबसूरत लगरही हें। बिल्कुल शांत गंगा कि तरह। "
उसकीबात सुनकर मेरेगाल लाल हौ गए। नीतू नें हमेंगौर सें देखा औऱ खिलखिलाकर हँस पड़ी।
नीतू:"अरे वाउ भैया! आप् तौ माँ कि तारीफों केँ पुल बांधरहे हें। वैसे माँ, भैया सहीकह रहे हें, आज आपमें एक् अलग हि चमक हैं। जैसेकोई नई नवेली दुल्हन होँ!"
उसकीबात सुनकर मेरादिल धड़कउठा। नीतू तोँ मजाककर रही थि, पर्र उसे क्याँ पता थां कि उसके भइया कि नजरों मे मे सच मे वहीजगह पा चुकी हूं। तभी रमेशजी अपने कमरे सें बाहर् निकले। उनका चेहरा पीला पड़ाहुआ थां औऱ चाल मे वोँ पहले जैसी कड़क नहि थि।
रमेश: "तुम् लोगजाओ मंदिर। मेरामन ठीक नहि हैं, मे घऱ पऱ हि रहूँगा। "
रमेशजी कां ये कहना मेरेलिए किसी वरदान जैसा थां। अगर वोँ नहि जारहे, तोँ साम कि पूजा केँ बाद शायद मुझे शुभम केँ संगकुछ समय अकेले मिल जाएं।
हम् मंदिर पहुँचे। भक्तों कि भारी भीड़ थि। "हर-हर महादेव" केँ नारों सें पूरा बनारस गूँजरहा थां। भीड़ इतनी अधिक थि कि धक्का-मुक्की होनेलगी। शुभम नें जल्दी अपना एक् हाथ मेरे कंधे पर्र रखा औऱ दूसरे हाथ सें नीतू कों थाम लिया। वो हमें भीड़ सें बचाते हुएआगे लेँ जारहा थां। जब भि किसी कां धक्का मुझे लगता, शुभम औऱ कसकर मुझे अपनीओर खींच लेता।
उस भीड़ मे, शिव केँ दरवाज़ा पर्र, मुझेकोई पाप महसूस नहि होँ रहा थां। मुझेबस यहलगरहा थां कि मेरा रक्षक, मेरासभी कुछ मेरेसंग हैं।
मंदिर सें लौटते समय नीतू कि एक् सहेली मिल गई।
नीतू: "भैया, मां, आप् लोगघऱ चलो। मे रिया केँ संग उसकेघऱ जारही हूं, साम कि आरती तक वापस आँ जाऊँगी। रिया केँ घऱ भि आज रुद्राभिषेक हैं। "
शुभम नें मेरीतरफ देखा औऱ एक् छोटी सि मुस्कान उसके होठों पर्र तैर गई।
शुभम:"ठीक हैं नीतू, संभलकर आनां। मम्मी, चलिए हम् चलते हें। "
अब हम् दोनों अकेले थें। बनारस कि गलियों मे पैदल चलतेहुए शुभम नें धीरे-धीरे सें मेराहाथ पकड़ लिया।
मे: "शुभम। छोड़दे बेटा, कोईदेख लेगा। यहा सभी जानते हें हमें। "
शुभम:"कोई नहि देखरहा मम्मी। औऱ अगरदेख भि लेँ, तोँ उसेबस एक् बेटा अपनी मां कां हाथ पकड़े दिखेगा। पऱ मुझेपता हैं कि मे किसका हाथ थामेहुए हूं। "
घऱ पहुँचे तोँ रमेशजी अपने कमरे मे सोरहे थें। घऱ मे एक् अजीब सि खामोशी औऱ शांति थि। मैंने किचन मे जाकर पूजा कां प्रसाद बनाना शुरुआत किया। शुभम वहीं दरवाजे पर्र टिका मुझेदेख रहा थां।
शुभम: "मां, आपकोयाद हैं? जब मे छोटा थां, तोँ आप् कहतीथीं कि बड़ा होकर मे आपकी रक्षा करूँगा। आज मुझेलग रहा हैं कि मे मात्र आपकी रक्षा नहि करना चाहता, मे आपको वोँ सभी देना चाहता हूं जोँ इस समाज औऱ बापू नें आपसेछीन लिया। "
वो मेरेपास आया। किचन कि गरमाहट औऱ बाहर् कि बारिश कि नमी। माहौल कों बोझिल बनारही थि। उसने मेरे हाथों सें करछुल लेँ ली औऱ उसेमेज पऱ रख दिया। उसने मेरी हथेलियों कों अपने हाथों मे लिया औऱ उन नीली चूड़ियों कों धीरे-धीरे सें छुआ।
शुभम:"यह चूड़ियाँ आप् पऱ बहोत जचरही हें। पर्र आपकी आँखों मे आज भि एक् डर हैं। क्यूं?"
मे: (तड़पते हुए)"डर इसबात कां हैं शुभम कि यह जौ सुखमिल रहा हैं, यह कहीं छलावा न् हौ। समाज, नीतू, तेरे पिताजी। यहसभी हमेंकभी एक् नहि होने देंगे। मे एक् मां हूं शुभम, औऱ एक् मम्मी कां अपने बेटे केँ लिएऐसा तड़पना। क्याँ परमेश्वर मुझेमाफ करेगा?"
शुभम: (मेरी आँखों मे गहराई सें झांकते हुए) "परमेश्वर नें हि यहदिल बनाया हैं मां, औऱ इसमें उठने वाले जज्बात भि उसी केँ हें। अगर पिताजी कि बेवफाई सच हैं, तोँ मेरा आपके प्रति यह समर्पण भि सच हैं। आप् बसमुझ पर्र भरोसा रखिये। "
उसने धीरे-धीरे सें मेरे माथे कों चूमा। उस लम्हा मुझेलगा जैसे मंदिर कि सारी पवित्रता मेरे अंदरसमा गई हौ।
साम हुई। नीतू वापस आँ गई, अपनीवही चुलबुली बातों केँ संग। हमनेघऱ केँ मंदिर मे छोटा सां दीया जलाया। रमेशजी भि बाहर् आकरबैठ गए, पऱ वोँ बिल्कुल कटे-कटे सें थें।
नीतू: "माँ, आज तोँ मलाई केँ लड्डू बने हें! भैया, जल्द आइये, प्रसाद चखिये। "
रात कां खानां खाने केँ बादसभी अपने-अपने रूम मे चलेगए। बाहर् बारिश तेज होँ गई थि। बिजली कड़करही थि। मे अपनेखाट पर्र लेटी थि, पऱ नींद कहां थि? मन मे बस शुभम कि बातें औऱ उसका वोँ स्पर्श घूमरहा थां।
तभी मेरा दरवाजा धीरे-धीरे सें खुला। साया देखते हि मे समझ गई कि वोँ शुभम हैं।
मे: (फुसफुसाते हुए) "शुभम?यहा क्यूं आए होँ? नीतूजाग जाएगी। "
शुभम: "वोँ सोरही हैं मम्मी। बापू भि सोगए हें। मुझेडर लगरहा थां। आज कि रात बहोत भारी हैं। मुझे आपकेपास रहना हैं। "
वो मेरेखाट केँ पासआकर बैठ गय़ा। अँधेरे कमरे मे उसकी साँसों कि आवाज़साफ़ सुनाई देरही थि। उसने मेराहाथ पकड़ लिया।
शुभम: "मम्मी। क्याँ मे यहींसो जाऊं? आपकेपास? जैसे बचपन मे सोता थां?"
मेरादिल जोर-शोर सें धड़कने लगा।
शुभम कां वो प्रश्न सुनकर मेरे शरीर मे जैसेआग सि लग गई। "क्याँ मे यहींसो जाऊं?"—ये मात्र एक् बेटे कि जिद नहि थि, उस आवाज़ मे एक् ऐसे पुरुष कि बेचैनी थि जोँ अपनी सबसे प्रिय महिला केँ आंचल मे पनाह मांगरहा थां। मैंने धड़कते दिल सें उसेखाट केँ एक् कोने मे स्थान दे दि। वो मेरेपास लेट गय़ा, पर्र हमारे बीच एक् अनकही दूरी थि, जौ समाज औऱ मर्यादा केँ बरसों पुराने खंभों सें बनी थि।
पूरीरात मे बसछत कों ताकती रही। शुभम कि सांसों कि गंध मेरेपास तक आँ रही थि। मेरामन किया कि उसकासिर अपनीगोद मे रखलूँ, पऱ डर थां कि कहीं मे अपनी भावनाओं पर्र काबू नं खोदूँ।
अगली सुभह, जैसे हि सूरज कि पहली किरण खिड़की सें आई, शुभमदबे पैर अपने कमरे मे चला गय़ा। मे उठी, तोँ मेराबदन हल्का महसूस होँ रहा थां, जैसेकोई बड़ाबोझ उतर गय़ा होँ। घऱ केँ काम निपटाकर मे दोपहर मे सीधा रेशमा केँ घऱ भागी। मेराजी फटने कों हौ रहा थां, येराज साझा करने केँ लिए।
रेशमा: (हैरानी सें मेरा चेहरा देखते हुए) "सुमन!आज तोँ तुँ कुछ अधिक हि बहकी-बहकी लगरही हैं। क्याँ हुआकल रात? सावन केँ सोमवार नें कुछ अधिक हि असरकर दिया क्याँ?"
मे: (उसकेहाथ पकड़कर सिसकते हुए) "रेशमा। कलरात वोँ मेरे कमरे मे आया थां। वोँ। वोँ मेरेपास सोया थां। रेशमा, मेरा बेटा अब पूरीतरह मेरा दीवाना हौ गय़ा हैं। उसकी आँखों मे जब मे देखती हूं, तौ मुझे ममता कि छाया नहि, एक् आग दिखती हैं जौ मुझे भस्मकर देना चाहती हैं। "
रेशमा: (गंभीर होकर) "सुमन, तुँ पागल होँ गई हैं क्याँ? वोँ तेरेपास सोया, यह तोँ ठीक हैं, पर्र तूँ जिस'आग' कि बातकर रही हैं, वोँ तुम्हारी तरफ औऱ उसे नर्क मे लेँ जाएगी। क्याँ तुम्हें लज्जा नहि आतीयह सभी कहतेहुए?"
मे: (चिल्लाते हुए) "लज्जा? कैसी लज्जा रेशमा? उस कसाई रमेश केँ संग रहकर मुझे जोँ जिल्लत मिली, क्याँ वोँ शर्मनाक नहि थि? कलरात जब शुभम कां हाथ गलती सें मेरेहाथ सें टकराया, तौ मुझेलगा जैसे मे फिन सें जीउठी हूं। मे तड़परही हूं रेशमा! मे मम्मी तौ हूं, पऱ मे एक् महिला भि तौ हूं। क्याँ मेराहक नहि कि मुझेकोई ऐसा प्रेम करे जैसे शुभम करता हैं?"
रेशमा: "पऱ नीतू?अगर उस बेचारी कों पताचला कि उसकी मम्मी औऱ भइया केँ बीचयह सभीपक रहा हैं, तौ वोँ तौ मर हि जाएगी। "
मे: (थोड़ी जलन केँ संग) "नीतू। वोँ तोँ बस अपनी शरारतों मे मस्त हैं। उसे क्याँ पता कि उसकी मां किस तपिश मे जलरही हैं। औऱ सुन, शुभम नें आज सुभह मुझसे कहा कि वोँ मेरेलिए बनारसी सिल्क कि एक् खास साड़ी लाएगा। वोँ चाहता हैं कि मे उसकेलिए सजूं-धजूं। क्याँ कोई बेटा अपनी मां सें ऐसा कहता हैं?"
रेशमा चुप हौ गई। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि अब मे किसी कि सुनने वाली नहि हूं। मे घऱ लौटी, तोँ देखा नीतूहॉल मे बैठकर अपनी सहेली सें मोबाइल पर्र ज़ोर-ज़ोर सें हंसकर बातें कररही थि।
नीतू:"अरे हाँ रिया! तुम्हारी तरफपता हैं, कलरात भैया नें शायद बहोत अधिक पढ़ाई करली, आज सुभह वोँ मां केँ कमरे सें बाहर् निकलरहे थें। मैंने पूछा तौ बोले कि माँ कां सिर दर्द थां तौ वोँ दवाई देनेगए थें। भैया कितने 'केयरिंग' हें नं!"
नीतू कि यहबात सुनकर मेरे पांवजम गए। तौ उस नटखट नें उसेदेख लिया थां? शुक्र हैं कि उसकी मासूमियत नें इसे केवल 'दवाई देना' समझा। पर्र कब तक?
शुभमसाम कों घऱआया। उसकेहाथ मे एक् बड़ा सां पैकेट थां। उसने वोँ पैकेट सीधा मुझे थमाया।
शुभम: "मां, यह आपकेलिए। नीतू, तूँ इसेमत छूना, यह केवल मां कां हैं। "
नीतू कां मुँहबन गय़ा।
नीतू:"ओहो! भैया, आप् तोँ आजकल माँ केँ हि हौ गए होँ। हमें तौ भूल हि गए। माँ, देखिये तौ सहीइस कमीने भैया कों, अब तोँ बस आपको हि तोहफा मिलते हें!"
नीतू नें मजाक मे 'कमीना' कहा, पर्र मेरादिल धक सें रह गय़ा। शुभम मुस्कुराया औऱ मेरेपास आकरखड़ा होँ गय़ा।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे, केवल मुझे सुनाई दे) "मां, यह साड़ी पहनकर कलरात कि तरह मेरेपास आइयेगा। मुझे आपसेकुछ औऱ भि मांगना हैं। "
उसकी बातों मे जोँ इशारा थां, उसने मेरीरूह तक कपा दि। मेरी तड़पअब बेकाबू होँ रही थि। मे मां होकर भि एक् प्रेमिका कि तरह कांपरही थि।
शुभम कां वो प्रश्न सुनकर मेरे शरीर मे जैसेआग सि लग गई। "क्याँ मे यहींसो जाऊं?"—ये केवल एक् बेटे कि जिद नहि थि, उस आवाज़ मे एक् ऐसे पुरुष कि तड़प थि जौ अपनी सबसे प्रिय महिला केँ आंचल मे पनाह मांगरहा थां। मैंने धड़कते दिल सें उसे पलंग केँ एक् कोने मे स्थान दे दि। वो मेरेपास लेट गय़ा, पऱ हमारे बीच एक् अनकही दूरी थि, जौ समाज औऱ मर्यादा केँ बरसों पुराने खंभों सें बनी थि।
पूरीरात मे बसछत कों ताकती रही। शुभम कि सांसों कि गंध मेरेपास तक आँ रही थि। मेरामन किया कि उसकासिर अपनीगोद मे रखलूँ, पऱ डर थां कि कहीं मे अपनी भावनाओं पऱ काबू न् खोदूँ।
अगली सुभह, जैसे हि सूरज कि पहली किरण खिड़की सें आई, शुभमदबे पैर अपने कमरे मे चला गय़ा। मे उठी, तौ मेरा जिस्म हल्का महसूस होँ रहा थां, जैसेकोई बड़ाबोझ उतर गय़ा होँ। घऱ केँ काम निपटाकर मे दोपहर मे सीधा रेशमा केँ घऱ भागी। मेराजी फटने कों होँ रहा थां, येराज साझा करने केँ लिए।
रेशमा: (हैरानी सें मेरा चेहरा देखते हुए) "सुमन!आज तोँ तूँ कुछ अधिक हि बहकी-बहकी लगरही हैं। क्याँ हुआकल रात? सावन केँ सोमवार नें कुछ अधिक हि असरकर दिया क्याँ?"
मे: (उसकेहाथ पकड़कर सिसकते हुए) "रेशमा। कलरात वोँ मेरे कमरे मे आया थां। वोँ। वोँ मेरेपास सोया थां। रेशमा, मेरा बेटा अब पूरीतरह मेरा दीवाना हौ गय़ा हैं। उसकी आँखों मे जब मे देखती हूं, तौ मुझे ममता कि छाया नहि, एक् आग दिखती हैं जोँ मुझे भस्मकर देना चाहती हैं। "
रेशमा: (गंभीर होकर) "सुमन, तुँ पागल हौ गई हैं क्याँ? वोँ तेरेपास सोया, यह तोँ ठीक हैं, पऱ तूँ जिस'आग' कि बातकर रही हैं, वोँ तुम्हारी तरफ औऱ उसे नर्क मे लें जाएगी। क्याँ तुम्हें लज्जा नहि आतीयह सभी कहतेहुए?"
मे: (चिल्लाते हुए) "लज्जा? कैसी लज्जा रेशमा? उस कसाई रमेश केँ संग रहकर मुझे जोँ जिल्लत मिली, क्याँ वोँ शर्मनाक नहि थि? कलरात जब शुभम कां हाथ गलती सें मेरेहाथ सें टकराया, तोँ मुझेलगा जैसे मे फिन सें जीउठी हूं। मे बेचैनी रही हूं रेशमा! मे मम्मी तौ हूं, पर्र मे एक् महिला भि तौ हूं। क्याँ मेराहक नहि कि मुझेकोई ऐसा प्रेम करे जैसे शुभम करता हैं?"
रेशमा: "पर्र नीतू?अगर उस बेचारी कों पताचला कि उसकी मम्मी औऱ भइया केँ बीचयह सभीपक रहा हैं, तौ वोँ तोँ मर हि जाएगी। "
मे: (थोड़ी जलन केँ संग) "नीतू। वोँ तोँ बस अपनी शरारतों मे मस्त हैं। उसे क्याँ पता कि उसकी मां किस तपिश मे जलरही हैं। औऱ सुन, शुभम नें आज सुभह मुझसे कहा कि वोँ मेरेलिए बनारसी सिल्क कि एक् खास साड़ी लाएगा। वोँ चाहता हैं कि मे उसकेलिए सजूं-धजूं। क्याँ कोई बेटा अपनी मां सें ऐसा कहता हैं?"
रेशमा चुप होँ गई। उसेसमझ आँ गय़ा थां कि अब मे किसी कि सुनने वाली नहि हूं। मे घऱ लौटी, तौ देखा नीतूहॉल मे बैठकर अपनी सहेली सें मोबाइल पऱ जोर-शोर सें हंसकर बातें कररही थि।
नीतू:"अरे हाँ रिया! तुझेही पता हैं, कलरात भैया नें शायद बहोत ज़्यादा पढ़ाई करली, आज सुभह वोँ माँ केँ कमरे सें बाहर् निकलरहे थें। मैंने पूछा तोँ बोले कि माँ कां सिर दर्द थां तौ वोँ दवाई देनेगए थें। भैया कितने 'केयरिंग' हें न्!"
नीतू कि यहबात सुनकर मेरेपेर जमगए। तौ उस नटखट नें उसेदेख लिया थां? शुक्र हैं कि उसकी मासूमियत नें इसे केवल 'दवाई देना' समझा। पर्र कब तक?
शुभमसाम कों घऱआया। उसकेहाथ मे एक् बड़ा सां पैकेट थां। उसने वोँ पैकेट सीधा मुझे थमाया।
शुभम: "मम्मी, यह आपकेलिए। नीतू, तूँ इसेमत छूना, यह केवल मम्मी कां हैं। "
नीतू कां मुँहबन गय़ा।
नीतू:"ओहो! भैया, आप् तोँ आजकल माँ केँ हि होँ गए होँ। हमें तोँ भूल हि गए। मां, देखिये तौ सहीइस कमीने भैया कों, अब तौ बस आपको हि तोहफा मिलते हें!"
नीतू नें मजाक मे 'कमीना' कहा, पर्र मेरादिल धक सें रह गय़ा। शुभम मुस्कुराया औऱ मेरेपास आकरखड़ा हौ गय़ा।
शुभम: (धीमी आवाज़ मे, मात्र मुझे सुनाई दे) "मम्मी, यह साड़ी पहनकर कलरात कि तरह मेरेपास आइयेगा। मुझे आपसेकुछ औऱ भि मांगना हैं। "
उसकी बातों मे जौ इशारा थां, उसने मेरीरूह तक कपा दि। मेरी बेचैनी अब बेकाबू हौ रही थि। मे मां होकर भि एक् प्रेमिका कि तरह कांपरही थि।
रात कि वोँ खामोशी बनारस कि गलियों मे पसर चुकी थि। गंगा कि लहरों कि आवाज़ भि जैसे धीमी हौ गई थि। घऱ केँ उस सन्नाटे मे मेरादिल किसी नगाड़े कि तरहबज रहा थां। रमेशजी अपने कमरे मे थें—शायद नींद कि गोलियों केँ असर मे याँ अपनीहार केँ गम मे। नीतू भि थक-हारकर सो चुकी थि।
मैंने शुभम कां दियाहुआ वोँ पैकेट खोला। नीले सिल्क कि वोँ साड़ी। इतनी रसीले थि जैसे शुभम कां स्पर्श। मैंने उसे पहना, बालों कों खुला छोड़ा औऱ माथे पर्र एक् छोटी सि बिंदी लगाई। आईने मे स्वयं कों देखा तौ लगा हि नहि कि मे 39 साल कि दो बच्चों कि मम्मी हूं। उसरात मे केवल 'सुमन' थि।
दबेपैर मे उसके कमरे मे गई। शुभमजाग रहा थां, बस मेरीराह देखरहा थां। उसरात जोँ हुआ, जौ उसने मांगा। वोँ सभी मेरे सीने मे दफन थां, जब तक कि अगली दोपहर मे रेशमा केँ पास नहि पहुँची।
रेशमा केँ कमरे कां दरवाजा बंद करते हि मे उसकेखाट पऱ ढह गई। मेरा चेहरा लज्जा औऱ एक् अजीब सि खुशी सें दमकरहा थां।
रेशमा: (मेरी हालत देखकर) "अरे!आज तोँ तुँ पूरीतरह भीगी हुइ लगरही हैं सुमन। कल रातउस नीली साड़ी कां क्याँ चमत्कार चला? औऱ बता, तेरेउस 'दीवाने' नें क्याँ मांग लिया तुझसे?"
मैंने एक् लंबी सांसली औऱ रेशमा कि आँखों मे झांका।
मे: "रेशमा, कलरात उसने मुझसे जोँ मांगा, वोँ सुनकर मेरीरूह कांप गई थि, पऱ मेरा रोम-रोम खिलउठा। उसने मुझसे 'मां' कां ओहदा नहि, बल्कि मेरा 'अस्तित्व' मांग लिया। उसनेकहा— 'मां, आजइस नीली साड़ी मे तुम् मेरी बनारस कि ढलतीसाम लगरही होँ। आजरात मुझे अपनी ममतामत दो, आज मुझे अपना वोँ हकदो जोँ पिताजी नें कभी समझा हि नहि। '"
रेशमा नें दांतों तले उंगली दबाली।
रेशमा: "हायरे अल्लाह! तौ तूने क्याँ किया?"
मे: (शायराना अंदाज मे) "मैंने वही किया जौ एक् प्यासी जमीन बारिश केँ संग करती हैं रेशमा। मैंने उसे अपनी बाहों मे भर लिया। कल रात कि तड़पऐसी थि कि मुझे एक् शेरयाद आँ गय़ा—
वोँ मेरा बेटा भि हैं, मेरा खुदा भि हैं,
मेरेहर गुनाह कि वही एक् रज़ा भि हैं।
मर्यादा कि दीवारें तोँ दुनिया नें बनाईथीं,
मेरेदिल केँ मंदिर मे तौ बस उसकीवफ़ा भि हैं।
उसने मुझसे वादा लिया रेशमा, कि मे अब किसी औऱ केँ बारे मे नहि सोचूँगी। उसने मेरे हाथों कि चूड़ियां खनकाते हुएकहा कि अबइन पर्र केवल उसकी यादों कां पहरा होगा। वोँ बेशरम कलरात मुझसे ऐसी बातें कररहा थां कि मुझे अपनी उम्र कां भि ख्याल नहि रहा। "
रेशमा: "पर्र सुमन, यह तौ गुनाह कि इंतहा हैं। तूनेउसे रोका नहि? कलमुंही, तूनेयह भि नहि सोचा कि नीतूजाग सकती थि?"
मे: "डर तोँ लगरहा थां रेशमा, पऱ उसडर मे जौ नशा थां, वोँ शायद अमृत मे भि नहि। उसनेजब मेरे चेहरे कों अपने हाथों मे लेकरकहा कि 'तुम् आज भि किसी अप्सरा सें कम नहि लगती', तोँ मे सभीभूल गई। वोँ मेरे पैरों केँ पास बैठकर घंटों मुझे निहारता रहा। पर्र सुन। एक् अजीबबात हुई। "
रेशमा: "क्याँ?"
मे: "जब मे उसके कमरे सें बाहर् आँ रही थि, तौ मैंने देखा कि रमेशजी केँ कमरे कां दरवाजा थोड़ा खुला थां। मुझेशक हैं कि उन्होंने हमेंसंग देख लिया हैं याँ कम सें कम मेरीआहट सुनली हैं। पऱ वोँ बोलेकुछ नहि। मुझे उनकीयह खामोशी अबडरा रही हैं। "
रेशमा नें मेराहाथ कसकर पकड़ा।
रेशमा: "सुमन, यह शांति तूफान सें पहले कि हैं। रमेश भइया साहबहार मान लेने वाले इंसान नहि हें। औऱ वोँ विनीता? वोँ कमीनी अभि शांत बैठी हैं, पर्र मुझे पक्का यकीन हैं कि वोँ कोईबड़ा जालबुन रही हैं। तुँ जिसआग मे जलरही हैं, उसका धुआंअब मोहल्ले तक पहुँचने लगा हैं। "
मे घऱ वापसआई। आँगन मे नीतू मोबाइल पर्र तेज़-तेज़ सें हंसरही थि, किसी सें बातकर रही थि, पऱ मुझे उसकी हंसी मे भि अब एक् डर महसूस होनेलगा थां। शुभम कॉलेज सें लौटा, तौ उसने सबकी नजरें बचाकर मुझे एक् कागज़ कां टुकड़ा पकड़ाया।
उसमें लिखा थां—
तुझसे लिपटना जैसे गंगा मे डूब जानां हैं,
ममता कि आड़ मे यह कैसा ठिकाना हैं?
दुनिया कहे जिसेपाप, वोँ मेराचैन हैं,
तूँ केवल मां नहि, मेरा चढ़ताहुआ जूनून हैं।
मेरी धड़कनें फिन सें बेकाबू हौ गईंयह किस्सा अबउसमोड़ पर्र आँ गई थि जहाँ सें वापसी कां कोई मार्ग नहि थां
शुक्रिया भइया मे बता नहि सकता आपका कमेंट पढ़ केँ मुझे कितना अच्छा लगा हैं अगलाभाग जल्द देता हूं
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
भइयालोग मैंने यह किस्सा भि लिखी थि जिसमे हवास नहि थां मात्र प्रेम थां मगरअगर मे प्रेजेंट वाली किस्सा बंद करके न्यू किस्सा लिखता तौ आप् लोग भि मुझे गालिया देते तोँ किसीतरह मुझेयह किस्सा इस स्टोरी मे जोड़ना थां इसलिये पिछले जन्म कां कॉन्सेप्ट यूज किया
मे पागल अपने बेटे केँ लिए – New Episode
Update-14
रेशमा केँ घऱ सें लौटते वक़्त मेरेकदम जमीन पर्र नहि पड़रहे थें। शुभम कि लिखी वोँ पंक्तियां मेरे सीने मे किसी जलतेहुए दीये कि तरहरखी थीं। घऱ पहुँचते हि एक् नईखबर मेरा प्रतीक्षा कररही थि।
नीतू: "मां! मां! जल्द सुनिए। वोँ दूर वाले मौसाजी केँ बेटे कि विवाह तय होँ गई हैं। पूरा परिवार जारहा हैं लखनऊ! हफ्ते भर कां फंक्शन हैं। कपड़े, गहने.सभी रेडी करने होंगे!"
विवाह कां नाम सुनते हि मेरामन उचट गय़ा। रमेशजी केँ संग जानां, वोँ भि लखनऊ। जहाँ उनकी 'रागिनी' कि यादें बसीथीं। पर्र फिन ख्याल आया कि शुभम भि संग होगा। भीड़भाड़, हंगामा-शराबा औऱ उस माहौल मे हम् दोनों। मेरादिल जोर सें धड़कउठा।
लखनऊ पहुँचते हि विवाह वालेघऱ मे मेहमानों कां तांता लगा थां। नीतू तोँ अपनी सहेलियों औऱ कजिन भाइयों केँ संगचहक रही थि। रमेशजी भि पुराने रिश्तेदारों केँ संग बैठक मे जमगए। मुझे मौकामिल गय़ा अपनी मनपसंद कां होने कां। मैंने विवाह केँ मुख्य समारोह केँ लिए एक् सुर्ख लालरंग कि बनारसी साड़ी चुनी थि। खूब सां श्रृंगार किया, आँखों मे गहरा काजल लगाया औऱ बालों मे मोगरे कां गजरा। मे चाहती थि कि उस पूरी महफिल मे शुभम कि नजरें मात्र मुझ पर्र टिकें।
मगरहुआ इसके बिल्कुल उलट।
विवाह केँ हॉल मे शुभम अपने कजिन भाइयों केँ संगखड़ा थां। वोँ कालेरंग केँ शेरवानी सूट मे इतना 'कातिल' लगरहा थां कि मे अपनी पलकें झकाना भूल गई। पऱ वोँ खड़ूस। वोँ मेरीतरफ देख हि नहि रहा थां। कभी वोँ किसी रिश्तेदार सें बात करता, कभी नीतू कि सहेलियों केँ संगहंस देता, पऱ जैसे हि मेरी नजरें उससे टकराने वाली होतीं, वोँ मुँहफेर लेता।
मेराजी जलकरराख हौ गय़ा। पूरी विवाह मे मे उसके आसपास मंडराती रही, कभी पानी मांगने केँ बहाने, कभी खाने कि थाली पकड़ाने केँ बहाने। पऱ उसने एक् बार भि मुड़कर नहि कहा कि "मम्मी, तुम् आज कमाललग रही होँ। "
घऱ (होटल केँ कमरे) लौटते समय मेरी आँखों मे आंसू थें औऱ दिल मे क्रोध। जैसे हि हम् अपने कमरे मे पहुँचे औऱ नीतू दूसरे कमरे मे गई, मैंने शुभम कों वहीं गलियारे मे रोक लिया।
मे: (गुस्से मे उसकाहाथ पकड़कर) "रुक! कहां भागाजा रहा हैं? बड़े नवाबबन रहे थें आज वहां? पूरी महफिल मे सबसेबात कि, बस अपनी मां हि तुम्हें दिखाई नहि दि?"
शुभम: (लापरवाही सें हाथ छुड़ाते हुए)"अरे मम्मी, आप् भि नं! वहां कितने लोग थें, सभीदेख रहे थें। मे आपसे चिपककर खड़ा होता तौ क्याँ अच्छा लगता?"
मे: (तड़पकर) "चिपकने कों किसने कहा थां पत्थर दिल? क्याँ एक् बारदेख भि नहि सकते थें? मैंने यहलाल साड़ी, यह श्रृंगार, यह गजरा। किसके लिए लगाया थां? उस कमीने रमेश केँ लिए? याँ उन बूढ़े रिश्तेदारों केँ लिए?"
शुभम खामोश रहा। वोँ बस मुझेदेख रहा थां, पऱ उसकी आँखों मे वोँ गरमाहट नहि थि जिसके लिए मे तरसरही थि।
मे: "बोल न्! आज तुझेही नीतू कि सहेलियां बड़ी अच्छी लगरही थीं? उनकेसंग तोँ बड़े ठहाके माररहा थां। मे तौ जैसे तेरी मां होकरकोई गुनाह कर बैठी हूं। जा। उन्हीं केँ पासजा। मुझे नहि करनी तुझसे बात!"
मे पेर पटकती हुई कमरे केँ अंदर आँ गई औऱ दरवाजा जोर सें बंद करने वाली थि कि तभी शुभम नें अपनापेर बीच मे अड़ा दिया। वोँ अंदरआया औऱ उसने कुंडी चढ़ा दि।
शुभम: (धीमी औऱ भारी आवाज़ मे) "पागल हौ गई हौ क्याँ? चिल्लाओ मत, पिताजी बगल वाले कमरे मे हें। "
मे: (सिसकते हुए) "होनेदे! मुझेअब किसी कां डर नहि। तूनेआज मेरादिल दुखाया हैं शुभम। तुम्हें पता हैं मे वहां कितनी अकेली महसूस कररही थि? मुझेबस तेरी एक् नजर चाहिए थि."
शुभम अचानक मेरे बिल्कुल लगभगआया। उसने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों मे लें लिया। उसकीपकड़ इतनी मजबूत थि कि मे हिल भि नहि पारही थि।
शुभम: "तुम्हें क्याँ लगा, मे देख नहि रहा थां? उसलाल साड़ी मे तुम् वहांआग लगारही थीं। हर कोई तुम्हें हि मुड़-मुड़ करदेख रहा थां। मुझे इतना क्रोध आँ रहा थां कि मनकररहा थां सबकासिर फोड़दूँ। इसीलिए मे तुम्हारी तरफदेख हि नहि रहा थां, क्योंकि अगर देखता। तोँ मे स्वयं पर्र काबू नहि रख पाता। "
उसकीबात सुनकर मेरा क्रोध बर्फ कि तरह पिघल गय़ा।
मे: (कांपती आवाज़ मे) "सच.सचकह रहा हैं?"
शुभम:"हाँ! औऱ वोँ गजरा। उसकीगंध मुझे पूरेहॉल मे मदहोश कररही थि। अबखुश हौ? अब लड़ना हैं याँ अपनीइस तड़प कों थोड़ाचैन देना हैं?"
उसने अपनी उंगलियों सें मेरे काजल कों थोड़ा फैला दिया। उस लम्हा लखनऊ कि वोँ रात बनारस कि गलियों सें भि ज़्यादा हसीन होँ गई थि। पऱ तभी दीवार केँ उसपार सें रमेशजी केँ खांसने कि आवाज़ आई। मे मुंह फुलाते हुए भहार आँ गई
अगली दोपहर, जब हम् वापस बनारस केँ लिए ट्रेन मे थें, मै
मगर अभि मेरा गब्बर बाक़ी थां वोँ ऐसा केसे मुखे नज़रअंदाज़ कर सकता हैं हा नहि तौ
लखनऊ सें वापसी कि ट्रेन मे हि मेरेमन मे जौ क्रोध औऱ प्रेम कां गुबार थां, वोँ बनारस कि धरती पर्र कदम रखते हि फटपड़ा। शुभम आगे-आगे कुली कों मार्ग दिखारहा थां औऱ मे उसके पीछे-पीछे अपना मुँह फुलाए चलरही थि। घऱ पहुँचते हि नीतू तौ अपनेरूम मे सामान पटककर धड़ाम सें लेट गई, पऱ मेरा पारा सातवें आसमान पर्र थां।
जैसे हि शुभम किचन मे पानी पीनेआया, मैंने उसकेहाथ सें गिलास झटक दिया।
मे: "पानीमत पीओ!जाओ, उन्हीं सहेलियों सें जाकर मांगो जिनके संग लखनऊ मे दांत चियार रहे थें। यहा क्यूं आए हौ?"
शुभम: (हैरानी सें) "अरे मम्मी! फिनवही बात?घऱ तौ आनेदो सुकून सें। ट्रेन मे भि आप् खिड़की कि तरफ मुँह करके बैठी रहीं, एक् शब्द नहि बोलीं। "
मे: (चिल्लाते हुए) "बोलूँ क्याँ? तूने मुझे वहां सबके सामने नीचा दिखाया। लोगकह रहे थें—सुमन जी, आपका बेटा तौ बड़ा जवान हौ गय़ा हैं, देखिए कितनी लड़कियां उसके आसपास हें। औऱ तूँ? तुँ तौ जैसे मुझे पहचानता हि नहि थां! जा.मरजा उन्हीं कलमुंहियों पे!"
मेरी आँखों सें टप-टप आंसू गिरने लगे। ये एक् मां कां क्रोध नहि थां, ये एक् उस प्रेमिका कां रोना थां जोँ अपने प्रिय कि अनदेखी बर्दाश्त नहि करपारही थि। मे वहीं किचन केँ फर्श पर्र बैठकर बच्चों कि तरह बिलखने लगी।
शुभम: (घबराकर नीचे बैठते हुए) "मम्मी! मम्मी, चुप हौ जाइये। नीतूसुन लेगी, पिताजी जाग जाएंगे। आप् तौ सच मे बच्चों कि तरहजिद कररही हें। "
मे: (उसे धक्का देतेहुए) "हाँ, मे बच्ची हूं! मे पगली हूं! जौ तेरेलिए रात-रात भर जागकर साड़ियां चुनती हूं, काजल लगाती हूं। तुँ पत्थरदिल हैं शुभम! तूने एक् बार भि नहि कहा कि मे कैसीलग रही हूं। "
शुभम नें अचानक मुझे घसीटकर अपनी बाहों मे भर लिया। मे उसके सीने पऱ अपनी मुट्ठियां मारने लगी—"छोड़ मुझे!छोड़! जा अपनीउन सहेलियों केँ पास!" पर्र उसकीपकड़ इतनी मजबूत थि कि मे बस थककर उसके सीने मे अपना चेहरा छुपाकर सिसकने लगी।
शुभम: (मेरेकान मे फुसफुसाते हुए)"चुप होँ जाओ मेरी पागल मम्मी। आपकोपता हैं, वहां मेरा क्याँ हाल थां? जब आप् उसलाल साड़ी मे किसी कि तारीफ सुनती थीं, तोँ मेराजी करता थां कि वहां मौजूद हर मर्द कि आँखें निकाल लूँ। मे आपसेबात इसलिये नहि कररहा थां क्योंकि मेरी आँखों मे जोँ आपकेलिए 'प्यास' थि, वोँ सबकोदिख जाती। क्याँ आप् चाहती थीं कि पूरी दुनिया हमारा राजजान जाए?"
उसकीयह बात सुनते हि मेरी सिसकियां रुकगईं। मैंने भीगाहुआ चेहरा उठाकर उसे देखा।
मे: "सच? तूँ इसलिये नहि देखरहा थां?"
शुभम: (मुस्कुराते हुए, मेरीनाक घसीटकर) "हाँ मेरी नखरेबाज! औऱ अबयह रोना-धोना बंदकरो। देखो, नाक लाल हौ गई हैं तुम्हारी, बिल्कुल टमाटर जैसीलग रही होँ। "
मे हंसपड़ी। औऱ तुँ भि वहीबोल रहा जोँ लखनऊ केँ होटल मे बोला थां, हा नहि तौ
रोते-रोते हंसने कां वोँ अहसास इतना मीठा थां कि मे सभीभूल गई। मैंने उसे हल्के सें चूँटी काटी औऱ हम् दोनों वहीं फर्श पऱ बैठकर देर तक एक्-दूसरे कों देखते रहे।
अगली दोपहर, जैसे हि मौका मिला, मे भागी-भागी रेशमा केँ पास पहुँची। मेरा चेहरा खुशी सें चमकरहा थां।
मे: "रेशमा! ओ रेशमा! सुन तौ सही, कल क्याँ हुआ!"
रेशमा नें मुझेऊपर सें नीचे तक देखा औऱ गरमचाय कां कपमेज पऱ पटक दिया।
रेशमा: "आँ गई मेरी लैला! लखनऊ सें बड़ा गहरानशा चढ़ाकर आई हैं। बता, क्याँ हुआ? वहां तौ तूँ कहरही थि कि वोँ तेरीदेख भि नहि रहा। "
मे: (शायराना अंदाज मे चहकते हुए)"अरे वोँ तौ उसकीअदा थि रेशमा! वोँ खड़ूस मुझेदेख इसलिये नहि रहा थां क्योंकि उसेडर थां कि उसकी निगाहें मेरासभी कुछलूट लेंगी। कलरात हम् किचन केँ फर्श पर्र बैठकर खूबलड़े। मैंने उसेखूब खरी-खोटी सुनाई, बच्चों कि तरहरोई भि। पऱ जब उसने मुझेगले लगाकर अपनी मजबूरी बताई, तौ मेरा सारा क्रोध कपूर कि तरहउड़ गय़ा। "
रेशमा: "तुँ तौ पूरी पागल होँ गई हैं सुमन। यह नोक-झोंक, यह रूठना-मनाना। यह मां-बेटे कां नहि, यह तौ किसी आशिक औऱ माशूका कां खेललग रहा हैं। "
मे: (हंसते हुए) "हैं हि वैसा रेशमा! सुन, उसने मुझसे क्याँ कहा—
तेरा रूठना भि मुझे कमाल लगता हैं,
जुदा होकर भि तुँ मेरा हि ख्याल लगता हैं।
दुनिया कि नजरों मे तुँ बस मम्मी हैं मेरी,
पर्र मेरेदिल सें पूछ, तूँ मेराहर प्रश्न लगता हैं।
मे तौ बस उसकी होँ गई हूं रेशमा। अब चाहे समाज मुझे गालियां दे याँ पत्थर मारे, मुझे फर्क नहि पड़ता। "
रेशमा: (डरतेहुए) "पर्र नीतू? वोँ तोँ कलघऱ मे कहरही थि कि भैया कों लखनऊ मे खुश्बू बहोत मनपसंद आई हैं। वोँ तौ उन दोनों कि जोड़ी बनाने कि सोचरही हैं। "
रिया कां नाम सुनते हि मेरी हंसी गायब हौ गई। मेरा चेहरा फिन सें गुस्से सें तमतमाने लगा।
मे: "उस करमजली खुश्बू कि इतनी हिम्मत? औऱ नीतू। वोँ चुलबुली अब अपनी सीमापार कररही हैं। मे आज हि शुभम सें कहूँगी कि उस खुश्बू कां मोबाइल तक नं उठाए। "
पऱ यह ख़ुशबू। यहनाम सुनते हि मेरेकान खड़े हौ गए। लखनऊ मे उस मौसी कि बेटी ख़ुशबू नें जिसतरह शुभम केँ आसपास मंडराने कि कोशिश कि थि, उसेयाद करकेआज भि मेराखून खौलता हैं।
बनारस कि उस ढलतीसाम मे, मे बालकनी मे खड़ी शुभम कां इंतजार कररही थि। ठंडीहवा चलरही थि, पर्र मेरे अंदर ईर्ष्या कि लूबहरही थि। तभी नीतू चहकती हुई आई औऱ मेरेपास खड़ी होकर अपनी चोटी घुमाने लगी।
नीतू: "मां, आपकोपता हैं? आज ख़ुशबू दिदी कां मोबाइल आया थां। वोँ पूछरही थीं कि भैया बनारस पहुँच कर उन्हें भूल तौ नहि गए? लखनऊ मे तौ दोनों घंटों छत पऱ बातें कररहे थें। "
मेरेहाथ मे जोँ पानी कां गिलास थां, वोँ थरथराने लगा।
मे: (कड़वाहट दबाते हुए)"छत पऱ बातें? मुझे तौ नहि बताया शुभम नें। औऱ वोँ कलमुंही ख़ुशबू इतनी खाली हैं क्याँ जौ बार-बार मोबाइल कररही हैं?"
नीतू:"अरे मां, आप् तोँ ऐसेचिढ़ रही होँ जैसे वोँ भैया कों चुरा लेँ जाएगी। वैसे भैया भि कम नहि हें, ख़ुशबू दि कि दि हुइ वोँ नीली शर्टआज भि पहनकर कॉलेज गए हें। "
नीतू तोँ अपनी चुलबुली बातों मे यहकहकर चली गई, पऱ मेरे सीने मे जैसे किसी नें गर्म कोयला रख दिया होँ। जैसे हि शुभमघऱ आया, मैंने उसकी वोँ नीली शर्ट देखी। मेराजी चाहा कि उसे वहींफाड़ दूँ।
शुभम कमरे मे गय़ा, मे उसके पीछे-पीछे गई औऱ धड़ाम सें दरवाजा बंदकर दिया।
शुभम: (हैरान होकर) "क्याँ हुआ मां? आजफिन सें 'चंडी'रूप धारणकर लिया?"
मे: (चिल्लाते हुए) "उतारयह शर्ट! अभि उतार!उस करमजली ख़ुशबू कि दि हुईँ खैरात पहनकर बड़े इतरारहे होँ? लखनऊ मे छत पऱ क्याँ खिचड़ी पकरही थि तुम् दोनों केँ बीच?"
शुभम नें एक् गहरी सांसली औऱ धीरे-धीरे सें मेरीतरफ बढ़ा। मे गुस्से मे पीछेहटी, पऱ उसने मेराहाथ पकड़ लिया।
मे: "छोड़ मुझे!जा उसी केँ पास। वोँ जवान हैं, हसीन हैं, नीतू कि फेवरेट हैं। मे तोँ बस एक् बूढ़ी मां हूं नं, जौ मात्र किचन मे अच्छी लगती हैं। "
मेरी आँखों सें फिन सें वही बेबस आंसू बहनेलगे। यह मेरा बचपना थां याँ मेरा पागलपन, मुझे नहि पता। पऱ शुभम नें मुझे अपनी बाहों मे ऐसे जकड़ा कि मेरी सारी ताकत जवाबदे गई।
शुभम: "पागल होँ गई होँ क्याँ? वोँ शर्ट मैंने केवल इसलिये पहनी क्योंकि यह आपने प्रेस करकेरखी थि। मुझे क्याँ पता थां कि यह किसने दि हैं। औऱ छत पर्र। मे मात्र उसेयह समझारहा थां कि मेरादिल अब किसी औऱ केँ नाम होँ चुका हैं। "
उसने मेरा चेहरा ऊपर उठाया। उसकी आँखों मे वोँ गहरानशा थां जोँ मुझे मदहोश कर देता थां।
शुभम: "तुमसे हसीन, तुमसे अधिक चाहने वाला मुझेइस दुनिया मे कोई नहि मिल सकता। तुम् क्यूं उस कमीनी ख़ुशबू सें अपनी तुलना करती हौ? तुम् मेरी वोँ हकीकत हौ जिसे मे पूरी दुनिया सें छुपाकर अपनीरूह मे बसाना चाहता हूं। "
उसने धीरे-धीरे सें मेरेकान केँ पासआकर कहा, "आज रात.यह शर्ट तुम् स्वयं अपने हाथों सें जला देना, अगर तुम्हें इससे इतनीचिढ़ हैं। पऱ बदले मे मुझेवही गुलाबी साड़ी वाली सुमन चाहिए। "
मेरी सारीजलन, सारा क्रोध उसके एक् स्पर्श सें बह गय़ा। मे बच्चों कि तरह उसके सीने सें लग गई।
अगलेदिन जब मे रेशमा केँ यहा पहुँची, तौ मेरीचाल मे एक् अलग हि नजाकत थि।
रेशमा: "ओहो!आज तोँ बड़ी इठलारही हैं। लगता हैं उस ख़ुशबू कि खुशबू उड़ गई?"
मे: (शायराना लहजे मे) "उड़ क्याँ गई रेशमा, मैंने उसे धुएं मे उड़ा दिया। कल रात शुभम नें मेरे सामने वोँ शर्ट उतारकर फेंक दि। उसनेकहा कि उसकेबदन पर्र केवल मेरी मनपसंद कां हक हैं। सुन रेशमा, मुझे एक् बातसमझ आँ गई हैं—
वोँ ख़ुशबू होँ याँ कोई औऱ परी,
मेरे शुभम कि दुनिया तोँ मुझपे हैं ठहरी।
यह जलन नहि, यह मेरा बेपनाह प्यार हैं,
जिसकी गहराई हैं समंदर सें भि गहरी।
रेशमा, वोँ कलरात मुझसे कहरहा थां कि हम् कहींदूर घूमने चलें। जहाँ न् नीतू होँ, न् रमेशजी, औऱ नं यह समाज। "
रेशमा: (चिंता मे) "सुमन, तुँ आग सें खेलरही हैं। यह रोमांस, यहतड़प। यहसभी अबउसमोड़ पर्र आँ गय़ा हैं जहाँ सें कोई वापस नहि आता। अगर रमेश भइया साहब कों इस 'घूमने' वाले प्लान कि भनकलगी, तोँ वोँ तुम्हें जीतेजी मार डालेंगे। "
मे मुस्कुराई। मुझेअब मौत कां डर नहि थां, मुझेबस शुभम कों खोने कां डर थां।
मे: "मरने सें कौन डरता हैं रेशमा? मे तौ बरसों पहलेमर चुकी थि, इस लड़के नें मुझेफिन सें जीना सिखाया हैं।
मे घऱ लौटी, तौ देखा नीतूहॉल मे बैठकर वही ख़ुशबू कां दियाहुआ परफ्यूम लगारही थि। मेरीनाक चढ़ गई, पर्र मैंने कुछ नहि कहा। मेरा शुभम मेरा थां, औऱ यही मेरी सबसेबड़ी जीत थि।
मे पागल अपने बेटे केँ लिए - Aage kya hua? Next part padhiye
vaaah bhay bahut badhiya iss romance k tadke ne ek alag hi agni zhulsadi h. these simultaneous updates were worth waiting. Hope too see the new update very soon
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