मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 30
पूजा औऱ मंत्रों केँ बीच, पवित्र अग्नि केँ सामने, जब हम् दोनों नें एक्-दूसरे कों वरमाला पहनाई, तौ इसनए रिश्ते मे हम् माँ बेटे नें अपनी सम्मति जताई। पंडितजी नें हमें बैठने कां निर्देश दिया। मे अपनेआसन पऱ बैठ गय़ा, औऱ मां आहिस्ता मेरीबगल मे रखेहुए आसन पऱ बैठने केँ लिएआगे बढ़ीं।
जब मैंने अपनी नज़र नीचे कि, तौ देखा कि मां नें कदम बढ़ाया, औऱ उनके लहंगे केँ नीचे सें उनकी मेहंदी सें सजेहुए, रसीले औऱ गुलाबी पैरों कि झलक मुझे नज़रआई। वेपेर, जैसे नन्ही कली कि तरह सुन्दर औऱ कोमल, इस लम्हा कि पवित्रता कों औऱ भि गहराकर रहे थें। उनकेहर कदम मे एक् अनजाना आकर्षण औऱ एक् नयी दुल्हन कां अंदाज़ दिखाई देरहा थां, जिससे मेरामन औऱ भि अधिक गहराई सें उनकीओर खिंचने लगा।
उनके पैरों पऱ लगीलाल नेल पॉलिश नें उनके पांव कों औऱ भि आकर्षक औऱ मोहकबना दिया, जिससे मेरेमन मे उन्हें अपने होंठों सें चूमने कि ख़्वाहिश जागउठी। तभी मेरी नज़र उनके पैरों मे बंधी पायल पर्र पड़ी। मैंने उनकेलिए विशेष रूप सें पायल खरीदकर अलमारी मे रखी थि, मगर उन्होंने आज दुल्हन केँ भेष मे वो पायल पहनकर मेरेमन कि मुराद पूरीकर दि थि।
ये अहसास मेरे अंदर गहराई तक उतर गय़ा कि ये सुन्दर, सुंदर लड़कीआज सें मात्र मेरी होँ गई हैं। मेरामन एक् अनकही चाहत मे डूबने लगा, औऱ भीतर सें उन्हें पाने कि तृष्णा तीव्र होतीचली गई। इसभाव नें मेरे पूरेबदन मे एक् सनसनी फैला दि, जोँ दिल सें होतेहुए मेरे लोड़े तक पहुंची, औऱ मेरे कुर्ते केँ भीतरउस भाव कां असर महसूस होनेलगा। मेरा लंड भीतर सें सख्त होताचला गय़ा।
नाना धीरे धीरे मम्मी केँ पास जाकर उनकेपास मे बैठगए, औऱ नानीजी आकर मेरेपास वालेआसन मे बैठीं। पण्डितजी नें पूजा कां क्रमफिन सें शुरुआत किया, औऱ विवाह कि रस्में अब विधिवत चलने लगीं।
नाना पण्डितजी केँ संग मिलकर मंत्रोच्चारण करनेलगे औऱ सारे रीति-रिवाजों कां पालन करतेहुए अपना कर्तव्य निभाने लगे। उन्होंने अपनी बेटी कां कन्यादान किया। मां वहानई दुल्हन कि तरहसिर झुकाए, नजरें नीचीकिए बैठीथीं।
मे उस पूरे पवित्र माहौल मे भि एक्-एक् बार मम्मी कों चुपके सें देखने कि कोशिश करतारहा, जबकि नाना पूरी श्रद्धा सें अपने पिता कां फर्ज निभारहे थें।
कन्यादान केँ दौरान नाना नें शास्त्र सम्मत तरीके सें अपनी बेटी, जौ उनकेघऱ कि लक्ष्मी हैं, कों मुझे समर्पित कर दिया। जब नाना नें मेरीओर देखा, उनकी आँखों मे अपनी बेटी कों मेरी सुरक्षा मे सौंपते वक़्त जौ ख़्वाहिश औऱ प्रेम थां, वो स्पष्ट झलकरहा थां। मैंने भि अपनी आँखों कि भाषा औऱ होठों कि हल्की मुस्कान सें उन्हें भरोसा दिलाया कि मे उनकी बेटी कों ताजिंदगी बेहद प्रेम औऱ खुशियाँ देकर संभालकर रखूंगा।
तभी पंडितजी केँ एक् सहायक नें आकर मेरी शेरवानी केँ स्कार्फ़ केँ संग मां केँ दुपट्टे कां कोना बाँध दिया।
पंडितजी मंत्रोच्चारण करतेहुए पूजा संपन्न कररहे थें, औऱ वहा उपस्थित सबलोग उन मंत्रों केँ बीच गुलाब कि पंखुड़ियाँ औऱ चावल हम् दोनों पऱ बरसाकर हमें अपना आशीर्वाद औऱ शुभकामनाएँ देरहे थें। इसकेबाद, पंडितजी नें हमेंइस बँधेहुए कपड़े केँ संग अग्नि केँ चारों ओर परिक्रमा करने कां निर्देश दिया।
मे औऱ मां अब दोनों खड़े हौ गए थें। पंडितजी मंत्रों कां उच्चारण करतेरहे, औऱ हम् अग्नि केँ चारों ओर परिक्रमा करने केँ लिए धीरे धीरेकदम बढ़ाने लगे। इस पवित्र अग्नि कि परिक्रमा करतेहुए, हम् अपनेआने वाले जिंदगी कों एक् संग जीने कि प्रतिज्ञाएँ करनेलगे। तभीफिन सें चारों ओर सें गुलाब कि पंखुड़ियों औऱ चावल कि बारिश हम् दोनों पर्र होनेलगी।
मे आगे-आगे चलरहा थां औऱ मम्मी मेरे पीछे धीरे धीरे मुझे अनुसरण कररही थीं। उस पवित्र बारिश केँ बीच, हम् अग्नि कि परिक्रमा करतेरहे, औऱ हरकदम केँ संग हमारे जिंदगी कां बंधन औऱ मजबूत होता गय़ा। मां कां चेहरा मुझे नहि दिखरहा थां, क्योंकि उन्होंने अपनासिर झुकारखा थां, मगर उनकीहर चाल मे समर्पण औऱ भरोसे कि भावना साफ़झलक रही थि। वो अब अपनेमन औऱ तन कों मुझे सौंपकर, मुझे पति कां अधिकार देकर, जिंदगी कों ख़ुशी औऱ खुशी सें भरने कि शपथखा रहीथीं।
इस दौरान मेरी नज़र नानाजी-नानीमा सें मिली। उनकी आँखों मे चैन औऱ संतोष कि झलक थि। वे अपनी प्यारी बेटी कों मुझे सौंपकर, हमें एकसाथ देखकर आशीर्वाद देरहे थें, औऱ अपने प्यार कां इज़हार करतेहुए हम् पऱ फूल औऱ चावल बरसारहे थें।
अग्नि कि परिक्रमा ख़त्म होते हि, पंडितजी केँ निर्देशानुसार मे औऱ मां फिन सें अपने-अपने आसनों पर्र बैठगए। हमारे कपड़े बंधे होने केँ कारणअब हमें एक्-दूसरे कां सहारा लेतेहुए चलनापड़ रहा थां, ठीकउसी तरह जैसेअब सें हमें जिंदगी कि हरराह पर्र एक्-दूसरे कां संग देना होगा। हर कदम पऱ एक्-दूसरे कां ख्याल रखतेहुए, हम् हर लम्हा एक्-दूसरे केँ संग रहेंगे। पंडितजी कां हवन औऱ पूजा अभि भि चलरही थि।
तभी उन्होंने धीरे-धीरे सें नानीजी सें कुछ पूछा, औऱ नानीजी नें बहोत हल्के स्वर मे उन्हें जवाब दिया। इसकेबाद पंडितजी नें पूजा कि थाली सें मंगलसूत्र उठाया औऱ मुझे सौंप दिया।
मे अपनाहाथ बढ़ाकर उनसे वो मंगलसूत्र लेँ लिया। जैसे हि मैंने इसे पकड़ा, मेराहाथ हल्का-हल्का काँपने लगा। मेरेमन मे एक् अनूठी खुशी, उत्तेजना, औऱ कुछ असामान्य सां अनुभव उमड़ने लगा, जिसे शब्दों मे बयाँ करना कठिन थां। ये एक् ऐसा लम्हा थां जिसने मेरे अंदर कि भावनाओं कों चरम पर्र पहुँचा दिया थां, मानो सारी दुनिया मेरे औऱ मां केँ इस रिश्ते मे समाहित होँ गई हौ।
Esac ap dedication, ap kaa iss story k prati samarpan sarahaniy h .ap ne devnagari fonts mai likha or saath mai Vo poora shaadi ka scene ap ne visually joo khada kia h vo sarahaniy h shukriya ji
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 31
मैंने मां कि ओर देखा, जहाँ वो अपने होठों पऱ एक् हल्की सि मुस्कराहट केँ संग, नज़रें झुकाए बैठीथीं।
पंडितजी नें मंत्रोच्चारण आरंभ किया औऱ अपनेहाथ केँ संकेत सें मुझे मां केँ गले मे मंगलसूत्र बांधने कां निर्देश दिया। मे आहिस्ता मम्मी कि ओर मुड़ा औऱ सावधानी सें दोनों हाथों मे थामे मंगलसूत्र कों उनकेगले कि ओर बढ़ाने लगा। मेरी निगाहें कहीं औऱ नहि जा रहींथीं, मे मात्र मां कों हि देखरहा थां।
जैसे हि मेरेहाथ उनकेगले केँ लगभग पहुँचे, मां नें मेरे संकेत कों समझा औऱ बिना नज़रें उठाए, अपनासिर मेरीओर हल्के सें घुमा दिया, ताकि मुझे मंगलसूत्र बाँधने मे आसानी होँ सके। मे धीरे धीरे मंगलसूत्र कों उनकेगले मे डालकर पीछे कि ओर लेँ गय़ा, दोनों छोरों कों बाँधने केँ लिए। उसी क्षण, एक् लेडीआगे बढ़कर मां केँ दुपट्टे कों उनकी गर्दन केँ पास सें हल्का सां उठाकर, मुझे उनकी सहायता करतेहुए मंगलसूत्र पहनाने मे सहारा देनेलगी।
मैंने धीरे धीरे अपने हाथों सें उनकी गर्दन केँ पास मंगलसूत्र बाँधना शुरुआत किया। मेरेहाथ हल्के-हल्के काँपरहे थें, औऱ दिल कि हर धड़कन जैसे उनकेदिल केँ संग संगमकर रही थि। जौ भावनाएं मेरे भीतर उमड़रही थीं, मुझे यकीन थां कि वही अनुभूति शायद उनकेदिल मे भि दौड़रही होगी। मंत्रों केँ बीचजब मैंने मंगलसूत्र कों बाँधकर अपनेहाथ वापस खींचे, तोँ मे फिन सें अपनेआसन पऱ सीधाबैठ गय़ा। मां नें भि अपनी गर्दन कों घुमाकर पहले कि तरह अपनी स्थान लें ली। उनकेगले मे सजते मंगलसूत्र कों देखकर, ऐसा प्रतीत होँ रहा थां जैसे पहलीबार देखरहा हूं। औऱ उस क्षण, उन्हें देखते-देखते मेरेदिल मे उनके प्रति एक् नया, अनकहा प्यार पनपने लगा।
पंडितजी नें एक् शख्स कों कुछ निर्देश दिए, औऱ वो जल्दी हमारे पास आँ गय़ा। वो व्यक्ति वहाआकर एक् डिब्बा खोला औऱ उसमें सें एक् धातु केँ सिक्के सें थोड़ी सिंदूर निकालकर मेरेहाथ मे रख दि।
इस आखिरी रस्म केँ संग, मे मां कों अपनी पत्नि केँ रूप मे पूरीतरह स्वीकार करनेजा रहा थां। मैंने नानीमा कि ओर देखा, जिनकी आँखों मे खुशी कि चमक थि औऱ जिन्होंने मुझे एक् इशारा किया।
पंडितजी केँ मंत्रोच्चारण केँ बीच, मैंने धीरे धीरे सिंदूर मां केँ सिर कि ओर लें जानां शुरुआत किया। एक् औरत नें मां केँ घूंघट कों थोडा हटाया औऱ उनकी मांग सें सोने कि बिंदी कों साइड किया, ताकि मुझे सहायता मिलसके। मैंने एक् हाथ सें उनकी मांग मे सिंदूर भर दिया।
इस दौरान, मम्मी थोड़ी कांपउठी औऱ मुझे भि एक् अदृश्य कम्पन कां अनुभव हुआ। इस प्रकार, शास्त्रों केँ अनुसार, हमने पति-पत्नि केँ रूप मे अपनेनए रिश्ते कि शुरुआत कि।
आज सें हम् दोनों महज़ मम्मी - बेटा नहि रहे; हम् पति-पत्नि केँ पवित्र बंधन मे बंधगए। मम्मी केँ गले मे मंगलसूत्र औऱ मांग मे सिंदूर केँ संग उनका एक् नयारूप सामने आया।
वो अब इतनी प्यारी औऱ सुंदर लगने लगीं कि मैंने कभी कल्पना भि नहि कि थि। मे बसयही चाहता हूं कि अगलेसात जन्मों तक इस सुंदर औऱ प्यारी लड़की कों, मेरी मम्मी कों, अपनी पत्नि केँ रूप मे पाऊं। विवाह कि सब रस्में पूरी होँ चुकी हें। इसकेबाद, सात विवाहित महिलाएँ मम्मी केँ पासआकर उनकेकान मे फुसफुसाकर शुभकामनाएँ देने लगीं। मां कां चेहरा खुशी सें खिलउठा।
मम्मी नें तब भि अपनी नज़र नहि उठाई। पण्डितजी नें अब हमें, दूल्हा-दुल्हन कों, अपने-अपने बड़े-बुजुर्गों कों प्रणाम करके आशीर्वाद लेने केँ लिएकहा। मे मां केँ संगताल मिलाकर आरामसे उठा औऱ नाना केँ पास जाकर उनके पांवछुए।
उन्होंने अपने दोनों हाथ हमारे सिर पर्र रखकर हमें आशीर्वाद दिया। इसकेबाद, हम् नानीजी केँ पासगए औऱ उनकेपेर छुए। नानीजी नें हमें आशीर्वाद दिया औऱ खड़े होते हि हमें एक् संगगले लगा लिया। नानाजी-नानीमा कि आँखें थोड़ी नम हौ गईं, जैसे उनकी बेटी अब एक् नएघऱ मे, अपने पति केँ घऱजारही हौ। मगरअब तौ मां कां मायका औऱ ससुराल एक् हि हैं। हमने पण्डितजी कों प्रणाम किया औऱ वहा मौजूद सब लोगों सें शुभकामनाएँ औऱ आशीर्वाद लिया।
दूसरे हॉल मे रिसोर्ट वालों नें विवाह केँ उपलक्ष्य मे उपस्थित सब लोगों केँ लिए दोपहर का खाना कां आयोजन किया थां। हम् सब वहां पहुँचे औऱ बुफे व्यवस्था सें दोपहर का खाना करनेलगे। मे, मम्मी, औऱ नानाजी-नानीमा एक् हि टेबल पर्र बैठे थें। मैनेजर साहब हमारे लञ्च कि व्यवस्था कां ध्यान रखरहे थें, औऱ टेबल पर्र दो वेटर नें लञ्च सर्व करना शुरुआत किया। नानाजी औऱ नानीमा केँ लिए अलग-अलग प्लेटें थीं, जबकि मेरी औऱ मां कि एक् हि प्लेट थि। विवाह कि परंपरा केँ अनुसार, नए-नवेले दूल्हा-दुल्हन कों पहला खानां एक् हि प्लेट मे साझा करके खानां होता हैं।
इसलिये, मे औऱ मां एक्-दूसरे केँ पास, नजदीक चेयर पर्र बैठे थें। वो अभि भि सीधे तरीके सें मुझे नहि देखरही थीं। एक्-दो बार हमारी नजरें चुपके सें मिलीथीं। अब उनके अंदर भि एक् प्रकार कि लज्जा थि औऱ मेरे अंदर भि, जिसके कारण हम् सीधे तरीके सें एक्-दूसरे कों देख नहि पारहे थें।
उनकोइस नए दुल्हन केँ रूप मे देखने केँ लिए मेरा ध्यान हर लम्हा उनकीओर आकर्षित हौ रहा थां। हमने एक् हि प्लेट सें पहले एक्-दूसरे कों खिलाया, उसकेबाद आरामसे हम् खानां शुरुआत करनेलगे। हमारे हाथ प्लेट पर्र बार-बार टच हौ रहे थें, औऱ हमारे कंधे एक्-दूसरे सें छूरहे थें। हमारे बदन कि गर्मी औऱ प्रेम कां अहसास सिर्फ हम् दोनों हि महसूस कररहे थें।
इस एहसास सें मेरा पूरा शरीर खुशी औऱ उत्साह केँ कारण बीच-बीच मे कांपरहा थां। सब केँ बीच बैठकर भि, मे मात्र अपनी दुल्हन रूपी मम्मी, जोँ अब मेरी पत्नि भि बन चुकी हैं, कों हि देखता रहा औऱ मन हि मन मे उनको एकांत मे मेरी बाँहों मे भरने केँ सही वक्त कां इंतजार करनेलगा।
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 32
पहले सें डिसाइड किएहुए प्लान केँ अनुसार, नानाजी-नानीमा अहमदाबाद चले जाएंगे, जबकि मे मां कों लेकर एमपीचला जाऊंगा। मैंने इसी केँ मुताबिक टिकट भि बुक कि थि। मां औऱ मेरी विवाह केँ बाद हम् सबने लञ्च किया औऱ फिन अपने-अपने कॉटेज मे पहुँच गए। हमें विवाह केँ जोड़े आदि खोलकर सजधजकर होना थां। मां नानीजी केँ कमरे मे चलीगईं, जहाँ उनका सारा सामान रखाहुआ थां, जबकि मे नाना केँ कमरे मे गय़ा।
मैंने अपनी शेरवानी उतारकर बाथरूम मे जाकर मुँह, हाथ औऱ पांव धोनेलगा। सिर पऱ लगी हुई घी, चंदन औऱ गुलाल कि तिलक कों साबुन सें साफ करतेहुए स्वयं कों तरोताजा करनेलगा।
फिन मैंने अपने सूटकेस सें एक् जीन्स औऱ पोलो टी-शर्ट निकालकर पहनली।
फिरभी मैंने सोचा कि सूटकेस मे रखानया कुरता औऱ पाजामा पहनलूं, मगर मुझेलगा कि ऐसा करने पर्र मे एकदमनए दूल्हे कि तरह दिखूँगा, जोँ मुझे थोडा शर्मिंदगी कां एहसास कराने लगा। इसलिये मैंने जीन्स पहनकर क्यूज़ल रहने कि कोशिश कि।
मां औऱ मेरी विवाह होँ चुकी हैं, फिन भि दोनों केँ अंदर नानाजी-नानीमा केँ सामने एक् लज्जा कां भाव अभि भि बनाहुआ थां। मैंने अपने बाकी कपड़े औऱ सामान पैक करना शुरुआत किया। तभी नाना कमरे मे आए औऱ उन्होंने भि अपने कपड़े बदलने केँ लिए बाथरूम मे जाने कां फैसला किया। हम् दोनों जल्द मे सजधजकर हौ गए, जबकि दूसरे कॉटेज मे वे दोनों अभि भि नॉर्मल कपड़ों मे आने मे टाइम लेँ रहे थें।
नानीजी तौ बस अपनी साड़ी बदल लेंगी, मगर मां कों दुल्हन केँ लेहेंगा-चोली कों बदलने मे वक़्त लगेगा। वे अपने चेहरे सें मेकअप साफ़ करेंगी औऱ फिन मांग मे भरा सिन्दूर ठीक सें लगाएंगी, जिससे बहुत टाइम लगेगा। इससभी मे लगभगदो घंटेबीत गए।
जब हम् अपने-अपने कॉटेज सें सामान लेकर निकले, तब मैंने मां कों इस ड्रेस औऱ इसरूप मे पहलीबार देखा।
उनके हाथों कि मेहंदी औऱ कंगन देखकर सभीसमझ जाएंगे कि उनकीनई विवाह हुईँ हैं। उन्हें इसरूप मे देखकर मेरे अंदर उनके प्रति एक् गहरी चाहतउठी, औऱ मे बहोत होर्नी महसूस करनेलगा।
मेरेबदन मे एक् अद्भुत अनुभूति हौ रही हैं। मे मां कि तरफजब भि देखरहा हूं, तभी उनके जिस्म केँ हर कोने कों मेरे प्रेम भरे गर्म होठो कां स्पर्श देकर उनको प्रेम करने केँ लिए मेरामन पागल होँ रहा थां, वो मेरी मम्मी हैं। मे अपनी मां सें, जोँ अब मेरी पत्नि हैं, गहरे प्रेम सें बंधाहुआ महसूस कररहा हूं। उनकेसंग हरसमय जीने कि, हर सांस उनकेसाथ बिताने कि ख़्वाहिश मेरे अंदर उमड़रही हैं। मे चाहूँगा कि उनके जिंदगी कां साराग़म, सारे कष्ट, औऱ जौ भि अभाव उन्होंने झेले हें, उन्हें भुलादूँ।
मे उन्हें अपनी बाहों मे भरकर, जीवनभर ख़ुशी औऱ मजा केँ संग संभालकर रखना चाहता हूं। ये संकल्प, ये भावनाएँ मेरेदिल केँ हर कोने मे गहराई सें बसी हुइ हें, औऱ मे इसनए रिश्ते मे उन्हें हरसुख प्रदान करना चाहता हूं।
मां नें कॉटेज सें बाहर् निकलने केँ बाद सें मुझे एक् बार भि नहि देखा। मे बार-बार कोशिश कररहा थां, पऱ हमारी नज़रें कभी नहि मिलीं। वो औऱ नानीमा, एक्-दूसरे कों थामे, पूरे रास्ते कैब मे बैठी रहीं। आज सब थोड़े गुमसुम थें, अपने-अपने विचारों मे खोएहुए।
नानाजी-नानीमा कों अपनी बेटी कों, जोँ अब तक उनकेसंग रही, जाने देनापड़ रहा थां। इसीग़म मे सबकी बातें कमथीं, मगर कभी-कभी कुछ मज़ेदार लम्हों पऱ हंसी भि गूंजरही थि। फिन भि, माहौल पहलेदिन कि खुशियों जैसा नहि रहा।
साम ढलने कों हैं औऱ हम् चारों बांद्रा टर्मिनस केँ प्लेटफार्म पऱ एक् बेंच पऱ शांत बैठे हें। नाना बेंच केँ एक् किनारे पर्र बैठे हें, उनकेसंग नानीजी, फिन मम्मी औऱ आखिर मे मे, बेंच केँ दूसरे सिरे पर्र। नानीजी नें मम्मी कों अपनेपास सटाकर पकड़ा हुआ हैं, मानो उन्हें थामे रखना चाहती हों। आसपास कि दुनिया अपनी रफ्तार मे भागरही हैं, जबकि हम् चारों अपनी-अपनी गहरी भावनाओं केँ संगइस चुप्पी मे डूबे हें।
मुंबई कि व्यस्तता केँ बीच, हर कोई अपनी-अपनी जद्दोजहद मे लगा हैं, हमारे अंदर कि हलचलइस भीड़ मे भि अलग-थलग महसूस हौ रही हैं।
हमारे मनों मे इस वक्त भावनाओं कां अजीब संगमचल रहा हैं, एक् बूढ़ी मां अपनी एकलौती बेटी कों अपने हि नाती केँ हाथों मे सौंप चुकी हैं। आज उसने अपनी इकलौती बेटी केँ लिए अपने हि नाती कों दामाद केँ नए रिश्ते मे स्वीकारा हैं, औऱ मन हि मन वो इसनए रिश्ते कि सफलता केँ लिएऊपर वाले सें प्रार्थना कररही हैं। उसकी दुआओं मे सिर्फ उनके खुशहाल जिंदगी कि उम्मीद हैं।
वहीं एक् बूढ़े पिता, जिन्होंने अपने परिवार केँ सब सदस्यों कि भलाई केँ लिएआज ये अनूठा कदम उठाया हैं, अपने हि नाती कों अब दामाद केँ रूप मे स्वीकार कर चुके हें। उनकी आँखों मे एक् अजीब संतोष हैं, जैसे वो इसनए रिश्ते कों पूरी ईमानदारी औऱ दिल सें निभाने कां इरादा कर चुके हें।
औऱ मां। मम्मी, जिसने अब तक अपने जिंदगी कां सारा प्रेम औऱ ममता देकरउस बेटे कों पाल-पोसकर बड़ा किया, अपने आँचल कि छांव देकरउसे व्यक्ति बनाया, आज स्वयं कों उसकी पत्नि बन चुकी हैं। एक् अनकहा नाता बनाकर उसनेउसे अपने तन-मन पऱ अधिकार दे दिया हैं।
एक् बेटा, जिसने अपने बचपन सें हि नानाजी-नानीमा केँ स्नेह औऱ ममता केँ साये मे जिंदगी बिताया, उनके प्रेम औऱ देखभाल मे पला-बढ़ा, आज अपनेदिल कि गहराइयों सें उन्हीं नानाजी-नानीमा कों अपने सांस औऱ ससुरजी मान चुका हैं। औऱ उस महिला, जिसकी ममता नें उसे बचपन सें संवारा, जिसे उसने अपने जिंदगी मे सबसे ज्यादा प्रेम किया, जिसकी तस्वीर हर लम्हा उसकीसोच मे बसीरही, आजवही महिला शास्त्रों केँ अनुसार उसकी धर्मपत्नी, उसकी जीवनसंगिनी, उसकी प्यारी पत्नि बन गई हैं। इस विवाह केँ संग उसनेसब रिश्तों कों एक् नएरूप मे गढ़ दिया हैं।
इतनेनए औऱ उलझेहुए रिश्ते बनगए हें, फिन भि बाहरी दुनिया कों इसकीकोई भनक नहि। समाज, जोँ इन गहरे भावनात्मक बदलावों सें अंजान हैं, बस अपने सम्मान औऱ आदर कि नज़र सें हम् चारों कों देखरहा हैं।
हम् सबकेमन मे आने वालेकल कि उलझनों कां साया मंडरा रहा हैं। अब हमेंइस नये रिश्ते कों अपनी सच्चाई बनाकर, पुराने रिश्तों औऱ पहचान कों भुलाकर आगे बढ़ना हैं। शायद हमारे लिएयही सही होगा कि हम् अपनी पुरानी पहचान, अपनी स्थान औऱ पुराने रिश्तों सें दूरीबना लें, इसमें सबकी भलाई हैं। समय जैसे-जैसे गुजरता जारहा हैं, नानीमा कि आँखें औऱ अधिक गीली होतीजा रही हें। मम्मी, जौ नानीमा केँ स्पर्श मे हैं, उनकेसंग दुःखी होतीजा रही हैं, जैसे उनकामन भि भारी हौ गय़ा होँ।
कुछ हि पलों मे अहमदाबाद जाने वाली ट्रेन आने वाली हैं। नानाजी-नानीमा अपनी एकलौती बेटी कों पहलीबार घऱ सें दूरभेज रहे हें, अपने पति केँ संग, एक् नयी ज़िन्दगी कि शुरुआत करने केँ लिए। उनकादिल जैसे बोझिल होँ रहा हैं, औऱ मे उस दर्द कों गहराई सें महसूस करपारहा हूं। नानाजी-नानीमा कां ये विश्वास भि हैं कि उनकी बेटी कों अब दुनिया कां सारा प्रेम, सारी खुशियाँ मिलेंगी। मगर अपनी बेटी कों विदा करने कां ये दर्द उनकेमन मे कहीं गहरा हैं, औऱ वो दर्द मे भि अपनीदिल केँ किसी कोने मे महसूस कररहा हूं।
मां नानीमा केँ पास चिपककर बैठी हें, उनकेहाथ मे नानीमा कां एक् हाथ थामेहुए। मां औऱ नानीमा केँ बीच कां प्रेम साफरूप सें दिखरहा हैं। मम्मी केँ मन मे नानाजी-नानीमा सें दूर जाने कां दर्द तौ हैं, पऱ उससे कहीं ज्यादा ख़ुशी कां अहसास भि हैं। वो अपने बेटे केँ संग, जोँ अब उनका पति हैं, एक् नई ज़िन्दगी कि ओरबढ़ रही हें। उन्हें ये विश्वास हैं कि दुनिया मे चाहेकुछ भि हौ जाए, उनका पति कभी भि उनकाहाथ नहि छोड़ेगा, औऱ न् हि उन्हें किसी भि प्रकार कां कष्ट भोगने देगा। ये विश्वास उनकी आँखों मे एक् नईचमक औऱ चैनभर रहा हैं, जौ इस लम्हा कों औऱ भि खासबना रहा हैं।
वो अपने पति केँ प्रेम कों अब आरामसे महसूस करपारही हें। उनकी आँखों मे गीलापन हैं, फिन भि होठों पऱ ख़ुशी कि एक् आभा झिलमिला रही हैं। मां कों देखकर नानाजी-नानीमा भि सुकून कि सांस लेँ पारहे हें। मम्मी केँ गले मे मंगलसूत्र, मांग मे सिन्दूर, माथे पर्र एक् लाल बिन्दी, औऱ अंग-अंग मे मेहँदी कि रौनक हैं। दोनों हाथों मे कंगन औऱ कुछ साधारण गहनों केँ संग, वो एक् नयी दुल्हन केँ रूप मे निखरउठी हें। वो एक् जवान कुंवारी लड़की जैसीआभा लिए खड़ी हें। उनकीफिट बॉडी मे आज एक् अलग सां आकर्षण नजर आँ रहा हैं, जोँ उन्हें औऱ भि सेक्सी बनारहा हैं।
वो एक् गुलाबी औऱ सुन्हेर रंगों कि हसीन डिजाइन औऱ मीनाकारी कि हुई साड़ी पहनेहुए हें, जिसके संग एक् मैचिंग ब्लाउज़ हैं। उनकी गोरी रंगत औऱ मख़मली बॉडी पऱ ये कपड़ा बेहद सुंदर लगरहा हैं। इससभी मे उनकी उम्र जैसे 18 साल कि लगरही हैं। मे वहा सें उठकर थोडा आगे जाकर साइड मे खड़े होँ गय़ा, रिलेक्स करने केँ लिए। नानीमा मां सें कुछ बातें कररही हें, जबकि नानाजी जी भि नानीमा औऱ मम्मी कों कुछकह रहे हें। अब उनके चेहरे पऱ दुःख औऱ मायूसी केँ भाव धीरे धीरेकम होतेजा रहे हें। मेरी नजरें सबसे ज्यादा सिर्फ मां कों हि देखरही हैं।
आजइसरूप मे मम्मी कों देखकर मुझेये एहसास हुआ कि वास्तविकता कभी-कभी कल्पना कों भि हरा देती हैं। पिछले दो हफ्तों सें मैंने ये सोचा थां कि मेरी पत्नि केँ रूप मे मम्मी कितनी हसीन लगेंगी, औऱ मैंने एक् तस्वीर अपनेमन मे बनाई थि कि नई दुल्हन बनने केँ बाद वो औऱ भि हसीन होँ जाएंगी। मगरआज, जब वो मेरे सामने बैठी हें, तब मैंने महसूस किया कि इस अनुपम सुंदरता कां वास्तविक रूप किसी भि कल्पना सें परे हैं। इस लम्हा मे उनका दीदार करके मेरेमन मे एक् अद्भुत खुशी औऱ संतोष कां भावभर गय़ा हैं। सचमुच, उन्हें पत्नि केँ रूप मे पाकर मे एक् संतुष्ट व्यक्ति केँ रूप मे महसूस कररहा हूं। उनकीये सुंदरता, ये हुस्न, मे ज़िंदगी भर अपने बांहों मे रखूंगा।
मे मां कों मेरेदिल औऱ जिस्म मे महसुस करपारहा थां। मेरीइसी तरह कि फीलिंग्स केँ कारण मेरा लंड भि बारबार सख्त हौ रहा थां।
अब सिर्फ सुहागरात कां इंतजार हैं। फिन भि मे अभि भि मम्मी कों हि देखरहा हूं, हरबार उनकी खुबसुरती औऱ सुंदरता देखकर मे स्वयं कों भाग्यवान समझरहा थां। ऐसी एक् प्यारी लड़की मेरी पत्नि बनेगी मैने सोचा भि नहि थां, पऱ आज वैसे हि एक् लड़की जौ मेरी मम्मी हैं, आज मेरी पत्नि बन गयीँ, हैं। जौ अब मेरेनाम कां सिन्दूर लगाकर मेरे सामने, उनके मां बापू केँ संग बैठि हुई हैं।
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bhut achchhi ja rahi h story. Bass ek guzarish h.suhagraat main agar beta mummy ko mummy samaz or kehkar puri kamukta say chode or mummy bi bete ko beta hi keh or samazkar puri mamta say uskah saath de toh maja aa jaaye.
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