मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 44
मे बाथरूम मे नहारहा थां औऱ बाहर् मम्मी अपने हि दिल औऱ जज्बातों मे घिरी अपनी एक् अलग हि दुनिया मे थि
आगे मां
हितेश अंदर नहाने चलेगए हें औऱ मे यहा खिड़की केँ पासखड़ी बाहर् कि हलचलदेख रही हूं। नीचेसड़क पर्र लोग अपनी-अपनी धुन मे यहा-वहा जारहे हें। किसेखबर थि कि आजइसघऱ कि चारदीवारी केँ पीछे एक् मम्मी औऱ उसकेसगे बेटे कि सुहागरात हैं।
'सुहागरात'। ये शब्दज़हन मे आते हि मेरे अंदरकुछ हलचल होने लागी हैं।
मुझेयाद हैं जब मम्मी नें हितेश सें विवाह कि बात छेड़ी थि, तौ मेरे पैरों तले ज़मीन निकल गई थि मेरेलिए अपने हि बेटे सें विवाह कों 'हाँ' कहना दुनिया कां सबसे मुश्किल काम थां। पऱ एक् बाततय थि—हितेश कि आँखों मे मेरेलिए जौ समंदर थां, वोँ केवल प्रेम कां थां। मैंने उन नज़रों मे कभी 'वासना' कि वोँ गंदीभूख नहि देखी। शायद उसकेइसी पाक औऱ साफ़ सुथरे इरादों नें मुझे उसकाहाथ थामने कां हौसला दिया।
मैंने उसेदिल सें अपना पति मान लिया हैं, पर्र फिन भि। दिल केँ किसी अंधेरे कोने मे एक् डर बैठा हैं। मे उम्र मे उससेबड़ी हूं, आज तोँ सभी हसीन हैं, पऱ कलजबयह फासला चेहरे पऱ दिखने लगेगा, तब क्याँ होगा?
क्याँ मे उसकासंग निभा पाऊँगी? मेरी पहली विवाह बहोत कम उम्र मे हौ गई थि, इसलिये तकनीकी तौर पऱ फासला ज़्यादा नहि हैं, फिन भि यह सामाजिक डर पीछा नहि छोड़ता।
पऱ फिन स्वयं कों समझाती हूं कि हमारा नाता प्यार केँ धागों सें बुना गय़ा हैं, कोई कागज़ी सौदा नहि। फिनयह उथल-पुथल कैसी?
औऱ हितेश। उफ़! कितने शरारती होँ गए हें वोँ। कैसी बहकी-बहकी बातें औऱ हरकतें करनेलगे हें। वोँ 'किस' (Kiss)। उसकी तपिश अभि भि मेरी साँसों मे शहद कि तरह घुली हुईँ हैं। अगर मां कां मोबाइल नहि आता, तौ न् जाने हम् कितनी देर तक उसमें खोए रहते। छी! छी! मे भि क्याँ-क्याँ सोचने लगी हूं।
अब मुझे स्वयं कों पूरीतरह बदलना होगा। एक् मां केँ रोल सें बाहर् निकलकर 'पत्नि' कां रूप लेना होगा। पऱ क्याँ उस मम्मी कों मार पाऊँगी मे? क्याँ उस ममता कां गला घोंटकर सिर्फ़ एक् पतिव्रता पत्नि बन पाऊँगी? कुछसमझ नहि आता। शायदसभी कुछ टाइम पर्र छोड़ देना हि बेहतर हैं। वक़्त नें हि तौ हमेंयहा तक पहुँचाया हैं, वही मार्ग भि दिखाएगा।
वोँ कितना तड़परहे हें मुझे छूने केँ लिए। औऱ मे? क्याँ मे भि वहीचाह रही हूं? सच तोँ यह हैं कि 'हाँ'। इतने बरसों केँ बाद.कोई मुझे एक् 'महिला' समझकर प्रेम करेगा। औऱ वोँ कोईगैर नहि, मेरा अपना हि बेटा, मेरा हितेश हैं जोँ अब मेरा पति बन चुका हैं।
माँ भि तोँ वोँ इशारे कररही थि। कि अब जल्द मां बन जाऊँ। मे जानती हूं उनकेमन मे क्याँ हैं। बढ़ती उम्र केँ संग मम्मी बनने कि राह मुश्किल होती जाती हैं। क्याँ सभीकुछ ठीक होगा?हे भगवान, यह क्याँ-क्याँ सोचरही हूं मे!
अभि तौ हमें.उफ़! केसेकर पाऊँगी मे वोँ सभी?जब वोँ मुझे। नहि, कितनी लज्जा आँ रही हैं सोचकर भि। दिलइस कदर ज़ोरों सें धड़करहा हैं जैसे सीने सें बाहर् निकल जाएगा।
पऱ नं जाने क्यूं, इस बेचैनी केँ बीच एक् नई सि उमंग, एक् नईलहर जागरही हैं। आज मे फिन सें सुहागन बन गई हूं। फिन सें सुहागन! शायद हि दुनिया मे कोईऐसी महिला होगी, जोँ अपने हि सगे बेटे कि सुहागन बनती होगी। मगर अबइन बातों कों सोचने कां क्याँ हासिल? अब तौ मे उनकी हौ चुकी हूं। वोँ तमाम प्यारे रंग जोँ मेरी ज़िंदगी केँ दामन सें छूटगए थें, हितेश उन्हें फिन सें वापस लें आए हैं। हितेश। मेरा बेटा, मेरे पति, मेरेसभी कुछ!
पर्र क्याँ मे आज कि रात उनकासंग दे पाऊँगी? न् जाने कितने हसीन ड्रीम्स सजाए होंगे उन्होंने, कितने अरमान होंगे उनकेदिल मे—क्याँ मे उन उम्मीदों पऱ खरीउतर पाऊँगी? क्याँ वोँ समझ पाएंगे मेरेदिल कि उलझन? एक् अड़चन कहीं नं कहींअब भि दिल मे खटकती हैं।
पऱ छोड़ो। देखते हें क्याँ होगा। मुझे यकीन हैं कि वोँ मेरी ख़ामोशी कों भि पढ़ लेंगे। वोँ मुझे पूरा टाइम देंगे अपनेइस नएरूप मे ढलने केँ लिए। सच तोँ यह हैं कि मेरादिल भि बेकरार हैं उनकी बाहों मे समा जाने केँ लिए, पऱ एक् अनजाना सां ख़ौफ़ भि हैं।
कल तक मे माँ-बापू कि पनाह मे थि, औऱ आज मुझे मेरा अपनाघऱ मिल गय़ा। मेराघऱ। मेरे हितेश कां घऱ। 'हमारा' घऱ। अबयही मेरानया संसार हैं। इस टाइम जोँ सुखद अहसास मुझे हौ रहा हैं, उसे लफ़्ज़ों मे बयान करना मुमकिन नहि। मां पिताजी सें दूर होने कां मलाल ज़रूर हैं, पर्र आज मुझेयह भि महसूस होँ रहा हैं कि मे फिन सें 'पूरी' हौ जाऊँगी।
वोँ सुख, जौ मुझे हितेश केँ बापू नें दिया थां, जिसे मे अरसों पहलेभूल चुकी थि। वोँ ख़ुशी, जौ हर नारी कि तमन्ना होती हैं औऱ उसे मुकम्मल होने कां अहसास दिलाती हैं—वोँ सुखअब मुझे मेरा हितेश देगा। कितना 'Handsome' हैं वोँ, बिल्कुल किसी हीरो कि तरह।
ऐसा लगता हैं जैसेऊपर वाला स्वयं हितेश केँ रूप मे मेरेलिए आँ गय़ा हौ। अब मे फिन सें ख़्वाबों कि वादियों मे उड़ूँगी, मेरी कामनाओं कों फिन सें पंखमिल जाएँगे। मेरी बेरंग ज़िंदगी मे फिन सें बहार आएगी। अब कोई हैं जौ मुझेथाम लेगा, मुझे एक् नई दिशा देगा, अपनी बेपनाह इश्क सें मुझे सराबोर कर देगा। मेरा हितेश मुझेफिन सें मुकम्मल कर देगा।
नं जाने क्यूं, मेरे लबों पऱ अचानक यहगीत थिरकने लगा हैं.
“ओ बेख़बर, ओ बेकदर। बेताबियाँ, बेचैनियाँ हें जवान, मेरी नज़र ढूँढे तुम्हें, तूँ कहां. आँ तुझको मे आँखों कां काजलबना लूँ.ओ बेख़बर!”
मे कहींखो गई हूं। अब मुझेसड़क पऱ चलने वालेलोग नहि दिखरहे। यहगीत, यहधुन मुझे मेरे हितेश केँ औऱ लगभग लेँ जारही हैं। स्वयं पऱ सें मेरा काबू समाप्त होताजा रहा हैं। मे बस उनका इंतजार कररही हूं.
उफ़! कितना समय लगाते हें यह नहाने मे!
आगे मे
मेरे कानों मे मम्मी कि पायल कि वोँ खनक गूँजना बंद हौ गई औऱ मे अचानक अपनी यादों केँ भँवर सें बाहर् निकलआया। शावरबंद करजब मे बाथरूम सें बाहर् आया, तौ देखा मम्मी अभि भि खिड़की केँ पासखड़ी बाहर् कि तरफदेख रही थि—शायद अपनी हि किसी दुनिया मे खोई हुईँ।
अब मुझसे औऱ इंतजार नहि हौ रहा थां। हमारे बीच कां यहकुछ कदमों कां फासला मुझे सदियों जैसालग रहा थां। मे दबे पाँव उनके लगभग बढ़ता गय़ा। औऱ लगभग। इतना कि मेरा मेरा शरीर उनसे सें जासटा, जीहाँ मे अपनि हि मां केँ बदन सें सटा थां।
जैसे हि मेरेबदन कि गर्मी नें उन्हे छुआ, मैंने महसूस किया कि मम्मी केँ मुँह सें एक् दबी हुईँ सिसकी निकल गई। उनके पूरे जिस्म मे एक् सिहरन (vibration) दौड़ गई। मुझे यकीन थां कि उन्होने अपनी आँखें मूँदली होंगी। उस लम्हा हम् जिस परमानन्द 'Ecstasy' सें गुज़ररहे थें, उसे सिर्फ़ हम् दोनों हि समझ सकते थें। हमारी धड़कनें इतनीतेज़ थीं, मानोदो दिलआपस मे कोई गहरिबात कररहे हों।
मेरा लण्डउस समय इतना सख्त 'Hard' औऱ फुलाहुआ 'Tense' हौ गय़ा थां कि उसमें हल्का सां दर्द होनेलगा थां। मम्मी कों मेरे लौड़े कि उस बेताबी कां पूरा अहसास होँ रहा होगा।
मैंने धीरे-धीरे सें अपनेहाथ उनके कंधों पऱ रखे। उनकी रसीले स्किन केँ नीचे मचतीउस हलचल कों मे साफ महसूस करपारहा थां। मैंने धीरे धीरे अपनेहाथ नीचे सरकाते हुए उनकी बाँहों कों छुआ।
मां कि दोनों मुट्ठियाँ कसी हुई थीं, जैसे वोँ अपनी घबराहट कों रोकने कि कोशिश कररही होँ। मगर जैसे हि मेरी उँगलियों नें उनकी हथेलियों कों छुआ, उनकी मुट्ठियाँ खुलगईं। मैंने अपनी उँगलियाँ उनकी उँगलियों मे फँसादीं। हम् दोनों केँ हाथफिन सें एक् संग मुट्ठियों मे बंद होँ गए। ये सिर्फ़ हाथों कां मिलना नहि थां, यह हमारे प्यार कां वोँ वादा थां जिसने हमें एक्-दूसरे कों पूरा करने कि मंज़िल पर्र खड़ाकर दिया थां।
मां केँ बालों कि वोँ भीनी-भीनी खुशबू 'Fragrance' मेरी साँसों मे उतरने लगी। मे अपना चेहरा उनके भीगे बालों मे फेरने लगा।
मुझे महसूस हुआ कि वोँ थोड़ा औऱ पीछे कि तरफ झुकी औऱ पूरीतरह मुझ सें सट गई। उनके बालों कि खुशबू पीतेहुए मे धीरे-धीरे सें उनकी गर्दन तक पहुंचा। अब मां कि साँसें तेज़ हौ चुकीथीं, औऱ मेरी हालत भि उससेअलग नहि थि।
मैंने उनकी गर्दन केँ उस कोमल हिस्से कों चूम लिया। उस गहरे अहसास केँ बीच मेरे लबों सें स्वयं-ब-स्वयं निकलपड़ा— "I LOVE YOU."
शायद बहोत हि हल्की आवाज़ मे, मम्मी नें भि फुसफुसाते हुएकहा— "I LOVE YOU to."
मेरे तड़पते हुए कानों नें उन अल्फ़ाज़ों कों पकड़ लिया। आज मुझे वोँ अधिकार 'Legal Right' मिल गय़ा थां अपनी मां कों छूने कां, उन्हे टूटकर प्रेम करने कां औऱ उन्हे फिन सें मुकम्मल करने कां।
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मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
मुझेसमझ नहि आँ रहाअगर ये किस्सा पहले हि Complete हौ चुकी हैं तौ भाग लाने मे इतनासमय क्यूं लगरहा हैं?
इस kahani केँ Presentator नें नाँ हि कोई kahani मे बदलाव किए हैं, मात्र Photos औऱ Gifs डालकर कहानी लिखने मे इतना टाइम क्यूं?
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 45
मेरे तड़पते हुए कानों नें उन अल्फ़ाज़ों कों पकड़ लिया। आज मुझे वोँ अधिकार 'Legal Right' मिल गय़ा थां अपनी मम्मी कों छूने कां, उन्हे टूटकर प्रेम करने कां औऱ उन्हे फिन सें मुकम्मल करने कां।
अबआगे।
मैंने उनकेकान केँ पास झुककर बहोत हि मद्धम आवाज़ मे पुकारा, "मंजू!"
"हम्म." उनके लबों सें एक् कांपती हुई आवाज़ निकली।
"तुम् बहोत हसीन हौ."
अब मे उन्हे मात्र अपनी मम्मी कि तरह नहि, बल्कि अपनी 'पत्नि' कि तरहदेख रहा थां। कल तक जिस ज़बान सें हमेशा 'आप्' निकलता थां, आजउस पऱ 'तुम्' कितनी आसानी सें निकल गय़ा थां। मे महसूस कर सकता थां कि इस टाइम मम्मी केँ दिल मे जज्बातों कि कैसी आँधियाँ चलरही होंगी। आज मैंने अपने पिता कि स्थान लेँ ली थि, आज मैंने उनके पति, हमसफर औऱ उनके हमराज़ कि स्थान लें ली थि। मे उनके लगभग जाने केँ लिए बेचैनी रहा थां, पर्र संग हि मुझे स्वयं पऱ काबू (Control) भि रखना थां। इसी संयम औऱ इज़्ज़त कि बुनियाद पर्र हमारा प्रेम परवान चढ़ने वाला थां।
जब मां नें कोई जवाब नहि दिया, तोँ मे फिनबोल पड़ा, "आज मे बहोत खुश हूं मंजू। मुझे दुनिया कि सबसे हसीन औऱ 'बेहद सेक्सी' पत्नि मिली हैं। "
मेरीबात सुनकर मां नें लज्जा सें अपनी गर्दन झुकाली। मैंने उनकी सुराहीदार गर्दन पर्र अपने ज़बान फेरना शुरुआत कर दिया। उनकी सिहरन मेरी बेताबी औऱ बढ़ारही थि।
"झूठ कहते हें आप्." उन्होंने लजाते हुए फुसफुसाकर कहा।
"यह तौ केवल मे जानता हूं कि सच क्याँ हैं, " मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। "इधर आओ."
मैंने उन्हे अपनी बाहों केँ घेरे मे वैसे हि समेटे हुए, आहिस्ता ड्रेसिंग टेबल केँ उसबड़े सें आईने (Mirror) केँ सामने खड़ाकर दिया।
"देखो सामने."
जैसे हि मम्मी कि नज़र आईने पर्र पड़ी, उन्हे अपना अक्स (Reflection) नज़र आया—औऱ उनकेठीक पीछे, उनके शरीर सें पूरीतरह चिपका हुआ मे। उस मादक मंज़र कों देखकर उन्होंने मारे लज्जा केँ अपनी आँखें मूँदलीं। मे आईने मे उनकेउस रूप कों निहारता रहा, जौ आज मेरा हौ चुका थां।
"देखो नां मंजू."
"क्याँ?" उन्होंने बहोत हि मद्धम स्वर मे पूछा, जैसे उनकी आवाज़ कहींखो गई होँ।
"आँखें खोलकर सामने देखो."
उन्होंने न् मे गर्दन हिला दि। अब मुझे उन्हे मनाना थां, तौ मैंने अपना अंतिम दांवचला— "मेरीशपथ!"
शपथ कां नाम सुनते हि मम्मी नें जल्दी अपनी आँखें खोलदीं। आईने मे मेरी नज़रों सें नज़रें मिलते हि वो चिढ़ते हुए बोलि, "आप् बहोत तंग करनेलग गए हें! शपथ क्यूं दि?"
"औऱ क्याँ करता? तुम् ऐसेमान हि कहां रही थि, " मैंने अपनीपकड़ औऱ मज़बूत करतेहुए कहा। "अब देखो सामने। अपनेइन सुर्ख होंठों कों देखो."
मां शरमाती हुईँ आईने मे स्वयं कों देखरही थि। लज्जा औऱ हया केँ मारे उनकेगाल सुर्ख लाल होँ गए थें औऱ कांपते हुए होंठ थर्रा रहे थें। मैंने उनकेकान केँ लगभग फुसफुसाते हुएकहा—
"यह होंठ। बिल्कुल गुलाब कि पंखुड़ियों कि तरह कोमल, हसीन औऱ रस सें भरेहुए."
मेरीबात सुनकर मम्मी कि सांसें औऱ तेज़ हौ गईं। मैंने उनकी आँखों मे झाँकते हुएआगे कहा, "अपनी आँखें देखो.
बिल्कुल किसी गहरीझील जैसी, जिसमें मेरेलिए प्रेम कां सागर लहरारहा हैं। "
"बस." मम्मी नें बस इतनाकहा औऱ झट सें पलटकर अपनासिर मेरे सीने पऱ रख दिया। उनकीयह मासूमियत मेरादिल जीतरही थि।
"क्याँ हुआ मंजू?" मैंने उनके बालों कों सहलाते हुए पूछा।
"बस कीजिये नाँ." मम्मी शर्माती हुई मेरे सीने सें औऱ चिपक गई।
"क्यूं? मे तोँ अपनी देवी कि इबादत कररहा हूं, उनकी सुंदरता कि पुस्तक पढ़ने कि कोशिश कररहा हूं, " मैंने उनकी धड़कनों कों अपने सीने पर्र महसूस करतेहुए कहा।
"प्लीज बस कीजिये नां। मुझे बहोत लज्जा आँ रही हैं, " उन्होंने दबी आवाज़ मे गुज़ारिश कि।
मैंने मां कों अपनी बाँहों केँ घेरे मे औऱ कस लिया। आज मेरा वोँ बरसों पुरानां सपना हकीकत बन गय़ा थां। मेरी मम्मी, मेरीरूह कां हिस्सा, आज मेरी पत्नि बनकर मेरी बाँहों मे महफूज़ थि। थोड़ीदेर बाद उन्होंने मुझसे अलग होने कि कोशिश कि, पऱ मैंने अपनी 'बाँहों कि कैद' सें उन्हे आज़ाद नहि किया।
"छोड़िये नां." उन्होंने मचलते हुएकहा।
"हम्म हूं." मैंने शरारत सें जवाब दिया।
"प्लीज छोड़िये नाँ."
"मुझसे दूर होना चाहती होँ क्याँ?"
मम्मी नें 'नां' मे सिर हिलाया।
"फिन?"
"खानां नहि खाएंगे क्याँ? छोड़िये मुझे, मे डिनर लगाती हूं, " उन्होंने अपनी गृहस्थी कि ज़िम्मेदारी याद दिलाते हुएकहा।
"पर्र आज तोँ मेराकुछ औऱ हि खाने कां मन हैं, " मैंने उनकी आँखों मे शरारत सें झाँकते हुएकहा।
"क्याँ?" उन्होंने हैरानी सें पूछा।
"बताऊँ?"
उन्होंने फिन सें नाँ मे गर्दन हिला दि, "प्लीज छोड़िये नां। बहोत भूखलगी हैं। "
उनकीबात सुनकर मेरेहाथ अपने आप् ढीलेपड़ गए। मे स्वयं भूखारह सकता थां, क्योंकि मेरीभूख तोँ सिर्फ़ उनके प्रेम कि थि, पऱ मे अपनी मम्मी कों भूखा नहि देख सकता थां। मे जानता थां कि न् तौ एक् मां अपने बेटे कों औऱ न् हि एक् पत्नि अपने पति कों भूखादेख सकती हैं। औऱ मम्मी तोँ मेरेलिए दोनों थि।
"तुम् रहनेदो, मे बाहर् सें कुछ मंगवा लेता हूं। तुम् थक गई होगी मंजू, आज क्यूं रसोई कि गर्मी मे स्वयं कों थकाना चाहती हौ?"
मां नें मुस्कराकर जवाब दिया, "नहि, इसमें मुझेसुख मिलता हैं। जोँ कल सें करना हि हैं, उनकी शुरुआत आज सें क्यूं नहि?"
अब मेरे मुँह सें यह निकल हि नहि पाया कि आज हमारी सुहागरात हैं, इसलिये मे नहि चाहता कि वोँ रसोई केँ कामों मे उलझे। पऱ उनकी आँखों कि चमक नें मुझेचुप रहने पऱ मजबूर कर दिया।
मां किचन कि तरफबढ़ गई औऱ मे मंत्रमुग्ध सां उनके पीछे-पीछे उन्हें देखने लगा। उनकेहाथ बिजली कि रफ़्तार सें चलरहे थें। खानां तौ उन्होंने पहले हि सजधजकर कर लिया थां, बस उन्हें गर्म करके परोसना बाकी थां। तभी मुझे अचानक ख्याल आया—मुझे तौ अपनी 'सुहाग सेज' रेडी करनी थि!
मे दबे पाँव वापस कमरे मे आया औऱ कंप्यूटर टेबल केँ नीचे छुपाया हुआ वोँ गुलाब कि पंखुड़ियों कां पैकेट निकाला। बड़ी नज़ाकत सें मैंने पूरे पलंग पऱ लाल गुलाब कि पंखुड़ियाँ बिखेर दीं।
जैसे हि मे इसकाम सें फारिग हुआ, बाहर् सें मम्मी कि सुरीली आवाज़आई—
"आइए, खानां लगा दिया हैं। "
मैंने कमरे कां पर्दा गिराया औऱ बाहर् डाइनिंग एरिया मे आँ गय़ा। मां प्लेट मे खानां निकाल रही थि।
"रुको!" अचानक मेरे मुँह सें निकला।
मम्मी नें सवालिया नज़रों सें मेरीतरफ देखा। इससे पहले कि मे कुछ कहता, वोँ शायद मेरी आँखों कि चमक देखकर समझ गई औऱ शर्माकर चेहरा झुका लिया। उन्होंने मेज़ पर्र सिर्फ़ 'एक्' हि प्लेट रखी औऱ उसी मे खानां परोसने लगी। हम् दोनों बिनाकहे हि एक्-दूसरे केँ दिल कि बातसमझ चुके थें कि आज हम् एक् हि थाली मे खानां खाएंगे।
मेरेमन मे फिन सें एक् शरारत नें सिर उठाया। मे धीरे-धीरे सें चलतेहुए टेबल तक पहुंचा औऱ जैसे हि उनके लगभगहुआ, मैंने महसूस किया कि वोँ सिहर सि गई। उनके शरीर मे उठीउस हल्की सि कँपकँपी नें मेरे चेहरे पऱ एक् विजय वाली मुस्कान ला दि। मम्मी नज़रें झुकाए खड़ी थि, उनका गुलाबी चेहरा शर्म सें औऱ भि लाल होताजा रहा थां।
वहा सिर्फ़ दो कुर्सियाँ औऱ एक् छोटा सां टेबल थां। मैंने जानबूझकर एक् कुर्सी साइड मे कर दि औऱ स्वयं दूसरी पर्र बैठ गय़ा। मां तिरछी नज़रों सें मुझेदेख रही थि आह कितनी शर्मा रही थि मेरी मां। वोँ मेरीइस शरारत कों जल्दी भाँप गई। आखिर मेरी मम्मी थि वोँ, मेरेमन केँ चोर कों पकड़ने मे उन्हें वक़्त नहि लगता थां। सरम सें उनका गुलाबी चेहरा औऱ भि लाल हौ रहा थां, उनकी साँसें तेज़ होँ चलीथीं औऱ धड़कनों कां हंगामा साफ़ सुनाजा सकता थां।
मैंने धीरे-धीरे सें उनकाहाथ पकड़ा। उन्होंने मेरीतरफ देखा—उनकी आँखों मे एक् खामोश इल्तजा (प्रार्थना) थि कि मे आज उन्हें औऱ ज़्यादा न् सताऊँ। पऱ मे कहां मानने वाला थां? आज कां दिन मेरा थां, मेरी अपनी साँसें भि अब बेकाबू होँ रहीथीं। मैंने उन्हें हल्का सां अपनीतरफ खींचा औऱ अपनीगोद मे बैठने कां इशारा किया।
मम्मी नें शर्माकर 'नाँ' मे गर्दन हिला दि। पऱ मैंने उनकाहाथ नहि छोड़ा, बस उन्हें एकटक निहारता रहा, उनकेरूप औऱ मादकता मे खोताजा रहा थां। मेरी आँखों मे छिपीउस बेताबी औऱ प्रेम कों उन्होंने भाँप लिया। वोँ थोड़ी हिचकिचाई, सकुचाई औऱ फिन आहिस्ता कदम बढ़ाकर मेरीगोद मे बैठ गई।
जैसे हि उनकाबदन मेरेबदन सें छुआ, हम् दोनों हि एक् अलग दुनिया मे पहुँच गए। उस मखमली स्पर्श केँ चमत्कार मे हम् ये भि भूलगए कि हम् यहा खानां खाने बैठे थें।
उनके शरीर सें उठती वोँ भीनी-भीनी खुशबू मेरेहोश उड़ाने केँ लिए बहुत थि। मेरा लौड़ा बेताबी सें फुदकरहा थां औऱ मुझे यकीन थां कि उसकीयह सख्ती मां कों ज़रूर महसूस हौ रही होगी। उनकीतेज़ होती हुइ सांसें जैसेहवा मे रोमांस कां कोईनया रागछेड़ रहीथीं।
ऐसालगा जैसे वक़्त कि सुई वहींथम गई होँ। मुझसे अब औऱ काबू नहि हुआ, मेरे होंठ उनके ब्लाउज केँ ठीकऊपर, उनकी रसीले नंगीपीठ सें जा चिपके।
"अअअअहहह." मम्मी केँ लबों सें एक् गहरी, मादक सिसकी निकलपड़ी।
शायद बहोत मुश्किल सें, स्वयं कों संभालते हुए उनके मुँह सें बस एक् हि शब्द निकल पाया— "खानां."
उनकीइस आवाज़ सें मेरा ध्यान भंगहुआ औऱ मेरीनज़र सामने रखी खाने कि प्लेट पर्र गई। मैंने उनकेकान केँ पास फुसफुसाकर कहा, "आज तक तुम् मुझे खिलाती आई होँ मंजू, आज मे तुम्हें अपने हाथों सें खिलाऊँगा। "
मां नें पलटकर मुस्कुराते हुए मेरी आँखों मे देखा औऱ धीरे-धीरे सें बोलि, "दोनों एक्-दूसरे कों खिलाएंगे। "
उनकीइस बात नें मुझे एक् अजीब सां चैन दिया। मुझे महसूस हुआ कि उनकी वोँ शुरुआती झिझकअब आरामसे पिघलरही हैं। मेरे चेहरे पऱ एक् गहरी मुस्कान आँ गई।
"मे सामने वाली चेयर पर्र बैठ जाती हूं। ऐसे आपको तकलीफ होगी, " उन्होंने मुस्कुराकर अपनासर झुकाते हुएकहा।
"बिल्कुल नहि, " मैंने उनकीकमर पर्र अपनीपकड़ औऱ मज़बूत करतेहुए कहा। "कल तक मे तुम्हारी गोद मे बैठा करता थां, आज सें तुम् मेरीगोद मे बैठोगी। औऱ हम् रोज़ऐसे हि खानां खाया करेंगे। "
"धत्!" उन्होंने लाड सें मुझे टोका। "आप् बहोत बेशर्म होतेजा रहे हें। "
"अरे, इसमें बेशरमी कहां सें आँ गई? अपनी पत्नि कों अपनीगोद मे बिठारहा हूं, किसी औऱ कों थोड़ी नं, " मैंने चुटकी ली।
"उफ़! बहोत बोलने लगे हें आप्, " उन्होंने हार मानते हुएकहा।
मम्मी नें मुस्कुराते हुए पहला निवाला बनाकर मेरे मुँह मे डाला, तौ मैंने शरारत मे उनकी उँगली कों दाँतों केँ बीच हल्का सां दबा दिया।
"उई!" उनके मुँह सें निकला।
मेरी हँसीछूट गई औऱ वोँ एक् झूठा सां क्रोध दिखाते हुए अपना मुँह बनाने लगी। फिन मैंने एक् निवाला बनाया औऱ प्रेम सें मम्मी कों खिलाया, पऱ उन्होंने भि जल्दी वही हरकत दोहरा दि औऱ मेरी उँगली कों हल्के सें काट लिया।
"उफ़!" इसबार बारी मेरी थि।
वोँ खिलखिलाकर हँसपड़ी।
उनकीउस बेसाख्ता हँसी कि गूँज मे मे जैसे डूबता चला गय़ा। इस खट्टे-मीठे रोमांस औऱ शरारतों केँ बीच, न् जानेकब हमारा खानां समाप्त होँ गय़ा औऱ रात कि वोँ हसीनघड़ी औऱ लगभगआने लगी।
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