मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
UPDATE 39
मे बात करते-करते घूमकर उन्हे हि देखरहा थां। बेडरूम मे दाखिल होने सें ठीक पहले मां एक् समय केँ लिए रुकी, उन्होंने मुड़कर मुझे देखा औऱ हमारी नज़रें फिन सें उलझगईं। उन्होंने अपने चेहरे पर्र एक् ऐसी नशीली औऱ शरारती स्माइल बिखेरि कि मेरादिल फिन सें ज़ोरों सें धड़कउठा।
वो kiss, वोँ जुनून, मोबाइल फोन नें उस सिलसिले कों बीच मे हि तोड़ दिया थां। वो पैशनअब भि हमारे अंदर लावा बनकरखौल रहा थां, बसउसे बाहर् आने कां सही मौका नहि मिलपा रहा थां। मां कि उस एक् नज़रे-करम नें मुझेयाद दिला दिया थां कि वो भि उसी खुमार मे हैं। मे बस किसीतरह उस मोबाइल कॉलआई केँ ख़त्म होने कां इंतज़ार करनेलगा।
जैसे हि नानाजी जी सें बात ख़त्म हुई, मैंने मोबाइल कट किया औऱ करीब-करीब कदमों कों तेज़ करतेहुए बेडरूम कि तरफबढ़ा।
दरवाज़े पर्र पहुँचते हि मेरीनज़र उन पऱ पड़ी। मम्मी सूटकेस खोलकर सारे कपड़े बाहर् निकाल रही थि औऱ उन्हें सलीके सें बेड पर्र सजारही थि। मेरेआने कि आहट पाते हि उन्होंने वही मीठी औऱ जानलेवा मुस्कुराहट फिन सें अपनी होंठो पे भरली। वो झुककर मेरे वाले सूटकेस सें शर्ट्स निकाल रही थि औऱ फिन सीधी होकर उन्हें बेड पर्र रख देती।
मुझे एकटकखड़े देख उन्होंने शरारत सें पूछा, "इतने सारे कपड़ेसंग लाने कि क्याँ ज़रूरत थि?"
मेरेपास इस सादा सें प्रश्न कां कोई जवाब नहि थां, मे बस उन्हे निहारते हुए मुस्कुराता रहा। मम्मी फिन सें उसी झुकी हुई 'Bending position' मे सूटकेस कि ओर झुकी औऱ कपड़े निकालते हुए बोलि, "इनतीन सूटकेस केँ कपड़ों सें तोँ ये पूरी अलमारी हि भर जाएगी। "
मैंने उनकी पतली औऱ नाजुक कमर केँ उस लचकते हुए कर्व कों देखते हुए, आवाज़ मे थोड़ी गहराई लाकरकहा, "कोईबात नहि। अगर ज़रूरत पड़ी, तौ एक् औऱ अलमारी खरीद लेंगे। "
मे वहीं चौखट पऱ टिकाखड़ा थां, पऱ मेरी नज़रें मम्मी पऱ थमी हुई थीं। वो जब झुकती, तोँ उनकेगले मे पड़ा वो मंगलसूत्र नीचे कि ओरझूल जाता, औऱ उनके ब्लाउज़ केँ गले सें झलकती उनकी वो साफ़, गोरी क्लीवेज मेरी आँखों केँ सामने एक् कशिशजगा रही थि। मेराखून तेज़ी सें दौड़ने लगा। मुझे बखूबी अहसास थां कि आजसही माईने मे हमारी सुहागरात हैं। आज कि रात हमेंइस नए रिश्ते कों, इस पावन बंधन कों मुकम्मल करना थां; पति औऱ पत्नि कों एक् होना थां।
मे उन्हे देखते-देखते इन्हीं ख्यालों केँ समंदर मे डूबरहा थां कि तभी मां कों शायद मेरी नज़रों कि तपिश महसूस हुइ। उन्होंने अपनासर उठाया औऱ उनकी आँखों नें मुझसे एक् बेज़ुबान प्रश्न किया— "क्याँ हुआ?वहा खड़े-खड़े इसतरह क्याँ देखरहे हें?"
उस पोज़िशन मे, उनकीउस अदा, उस मासूमियत भरे प्रश्न नें मेरेदिल केँ पार एक् तीर सां चला दिया। मेरेपास कोई शब्द नहि थें, बस एक् खामोश मुस्कुराहट मेरे होंठों पर्र तैर गई। उन्होंने भि अपनी आँखों मे वही अद्भुत खुशी सहेजे, एक् हल्की सि हया केँ संग अपनी नज़रें फेरलीं औऱ दोबारा काम मे जुट गई।
उनके बूब्स कां वो ऊपरी हिस्सा, उनकी वो झुकने कि मुद्रा औऱ वो कातिल अदाएं। मेरामन कररहा थां कि अभि दौड़कर जाऊँ औऱ उन्हे अपनी बाहों केँ घेरे मे भरलूँ। जीचाह रहा थां कि उन्हे बेतहाशा चूमूँ औऱ अपना सारा प्रेम उस पर्र उड़ेलदूँ। मगर.
मन कि इस बेताब ख़्वाहिश औऱ उन्हे पूरा करने केँ साहस केँ बीच एक् महीन सि झिझकखड़ी थि। हम् पति-पत्नि तोँ बनगए थें, मगर हमारे बीच कां जौ सगे मम्मी-बेटे एक् गहरा नाता थां, वो आज भि हमारे ज़हन कि परतों मे कहींदबा हुआ थां। शायद इसीलिए न् मां, नं मे—हम् मे सें कोई भि अभि पूरीतरह उस दायरे सें आज़ाद नहि होँ पारहे थें। हम् दोनों हि अपनेमन कि चाहत पूरी करने केँ लिएकदम आगे बढ़ाने सें कतरारहे थें।
चाहत दोनों तरफ़ बराबर थि, बस एक् सूक्ष्म सि लकीर थि जौ इस हकीकत औऱ उस ख़्वाब कों अलगकर रही थि। हम् जानते थें कि वक़्त हि इस झिझक कों मिटाएगा, औऱ सच तौ ये हैं कि हम् दोनों हि उसघड़ी कां बड़ी बेसब्री सें इंतज़ार कररहे थें।
अंदर केँ इस तूफ़ान कों दबाते-दबाते मेरागला सूखने लगा थां। दिल कि छटपटाहट औऱ बाहर् सें स्वयं कों शांत दिखाने कि इस जद्दोजहद नें प्यास बढ़ा दि थि। मैंने एक् गहरी साँसली औऱ भारी कदमों सें रसोई कि तरफबढ़ गय़ा, ताकिउस बढ़ती हुईँ बेचैनी कों पानी केँ दो घूँटों सें शांतकर सकूँ।
रसोई मे पानी भरतेहुए मे अपने नसीब कि अद्भुत लिखावट केँ बारे मे सोचरहा थां। महज़ 20 साल कि उम्र औऱ मे एक् शादीशुदा मर्द थां। हमारी विवाह वैसी नहि थि जैसी अक्सर दुनिया दिखती हैं—नं मेहमानों कां हंगामा, नं तोहफों कां अंबार, नं हि कोई नाच-गाना। पर्र इन सबके बिना भि हम् दुनिया केँ सबसे हसीन, नायाब औऱ सच्चे रिश्ते मे बंध चुके थें।
पानी पीकर मे एक् बोतलहाथ मे लिए बेडरूम कि तरफबढ़ा। जैसे हि दरवाज़े केँ पास पहुंचा, परदों केँ बीच कि खाली स्थान सें मेरीनज़र अंदरपड़ी। मां खुली हुइ अलमारी केँ दोनों पल्ले थामेजड़ खड़ी थि। उनके चेहरे केँ हाव-भाव औऱ बदन कि मुद्रा बतारही थि कि वो कितनी हैरान हैं। एक् ऐसी खुशी उनके चेहरे पऱ छारही थि जिसे उन्होंने शायद बरसों सें स्वयं सें दूररखा थां।
मे वहीं ठिठक गय़ा। उन्हे इसतरह देख मेरेदिल मे एक् गहरीटीस उठी। मां नें अपनी पूरी ज़िंदगी मे एक् पति केँ संग गृहस्थी बसाने कां वो असलीसुख कभीचखा हि नहि थां। ज़िंदगी कि वे छोटी-छोटी चीज़ें जौ हमें मुस्कुराने कि वजह देती हें, वो उनसे हमेशा महरूम रही। आज अचानक ज़िंदगी केँ इसनएमोड़ पऱ सभीकुछ नए सिरे सें पाकर वो स्वयं केँ अंदर हि जैसे सिमटरही थि।
भाग्य नें उन्हे अपने पुराने, बेरंग जिंदगी कों त्यागकर एक् नए औऱ रंगीन जिंदगी कों जीने कां जोँ मौका दिया थां, उसमें वो स्वयं कों दुनिया कि सबसे खुशकिस्मत महिला समझरही थि। शायद इसीलिए, आज अलमारी मे सजीवे छोटी सि चीज़ें भि उनके भीतर केँ दबाएहुए इमोशंस कों बाहर् खींचलाई थीं। मे दूरखड़ा मन हि मन स्वयं सें वादाकर रहा थां कि मे ताउम्र मम्मी कों इसीतरह खुशियों केँ साये मे रखूँगा।
मे धीरे-धीरे सें कदम बढ़ाकर कमरे केँ अंदर गय़ा। मम्मी किसी विस्मय (Awe) मे डूबी अलमारी केँ भीतरसजी उन साड़ियों, गहनों औऱ छोटी-छोटी ज़रूरतों केँ सामान कों देखरही थि जौ मैंने उनकेलिए बड़ी हसरत सें खरीदे थें। मेरी मौजूदगी कां अहसास होते हि वो धीरे-धीरे सें मुड़ी औऱ मुझे देखा।
उन्होंने कभी कल्पना भि नहि कि होगी कि मे उनकेलिए गुपचुप यहसभी कुछ जुटारहा हूं। विवाह सें पहले मोबाइल पर्र मैंने घऱ कि जौ बातें बताईथीं, उनमें इन सरप्राइजेज कां कोई ज़िक्र नहि थां। आजजब उन्होंने मेरेउस छिपेहुए प्रेम कों इन चीज़ों केँ रूप मे अपने सामने देखा, तोँ वो जैसे भावनाओं केँ सैलाब मे बहनेलगी।
उन्हे इतनाखुश देख मेरे अंदर भि प्रेम कां एक् नया ज्वार उमड़ने लगा। मम्मी नें बिनापलक झपकाए कुछ लम्हा मुझे देखा, जैसे वो यकीन करनाचाह रही हौ कि येसभी हकीकत हैं। फिन उन्होंने एक् ऐसी मीठी औऱ रूहानी मुस्कान दि, जिसने उनकेदिल कां साराहाल मेरे रोम-रोम मे उतार दिया।
मैंने पानी कि बोतलपास पड़ीमेज़ पर्र रखी औऱ अपने धीमे, सधे हुए कदमों सें उनकीओर बढ़नेलगा।
मां अलमारी केँ दोनों पल्लों कों थामे, गर्दन घुमाकर मुझेदेख रही थि। उनकीउस रूहानी मुस्कान कां जवाब मैंने एक् चौड़ी स्माइल सें दिया औऱ उनके बिल्कुल लगभगजा पहुंचा। मे उन्हे ये 'Surprise' देना चाहता थां, औऱ उनकी आँखों कि चमकबता रही थि कि मेरा मकसद पूरा हौ गय़ा।
मे उनके इतना लगभगखड़ा थां कि हम् एक्-दूसरे कि साँसों कि गर्माहट महसूस कर सकते थें। मां अपनी हैरानी, खुशी औऱ लज्जा कों एक्-दूसरे मे समेटे हुए थि। उन्होंने मुझे एक् ऐसीनज़र सें देखा जिसने सीधे मेरेदिल पऱ दस्तक दि, औऱ फिन धीरे-धीरे सें अपनी पलकें झुकालीं। हम् दोनों खामोश थें, बसउस लम्हे कि गहराई कों जीरहे थें।
कुछ पलोंबाद, मैंने झुककर उनकेकान केँ पास अपनी आवाज़ कों एक् सरगोशी (Whisper) मे बदला औऱ पूछा, "तुम्हें मनपसंद नहि आयायह सभी?"
उन्होंने धीरे-धीरे सें अपनी नज़रें मेरी आँखों मे डालीं। उनके होंठों पर्र एक् ऐसी मुस्कान थि जोँ केवलवही दे सकती थि। उन्होंने बड़ी नज़ाकत सें अपनासिर हिलाया औऱ बहोत धीमी आवाज़ मे बोलि, "बहोत."
फिन उन्होंने अपनी नज़रें थोड़ीफेर लीं औऱ उनकी आवाज़ मे एक् हल्की सि उदासी घुल गई, "मैंने ड्रीम्स मे भि नहि सोचा थां कि। मुझे अपनी लाइफ मे कभीऐसा प्रेम मिलेगा। "
ये कहते-कहते वो रुक गई, जैसे अपने भीतर उमड़ते जज्बातों कों काबूकर रही होँ। फिन वो स्वयं हि अपनी हालत पऱ मुस्कुरा दि औऱ चुपचाप खड़ीरही। मे देखपा रहा थां कि मम्मी इस प्रेम औऱ तवज्जो (Attention) कों पाकर अंदर हि अंदरमोम कि तरह पिघलरही थि। उनकी बाईं उँगली अलमारी केँ दरवाज़े पर्र आहिस्ता रगड़रही थि—ये उनकी बढ़ती हुई बेचैनी औऱ उस अनजानी सिहरन कां इशारा थां जौ उनके पूरे वजूद मे दौड़रही थि।
मैंने औऱ पास जाकर अपनासिर धीरे-धीरे सें उनकेसिर सें टिका दिया। मेरेइस हल्के सें स्पर्श (Touch) सें मम्मी कां पूरा शरीर अचानक काँपउठा। वो कंपन इतना 'Prominent' थां कि मे अपनी आँखों सें उन्हे महसूस करपारहा थां। उस एक् झटके नें मेरे भीतर कि दबी हुइ चाहत औऱ उत्तेजना कों फिन सें सुलगा दिया।
मेरी साँसें अब भारी औऱ गरम हौ रहीथीं औऱ सीने केँ भीतर एक् अजीब सि खलबली मची थि। मेरा लण्डफिन सें सख्त होकर अपनी मौजूदगी कां अहसास करारहा थां। मैंने धीरे-धीरे सें अपनीनाक उनके बालों सें छुआई औऱ उनकी खुशबू कों अपनी साँसों मे गहराई तक भर लिया।
मेरेहाथ आरामसे ऊपरउठे औऱ मैंने उनकीउस नाज़ुक, पतलीकमर सें होतेहुए उनकी मखमली पीठ कों अपनी गिरफ्त मे लेँ लिया। मेरेहाथ उनकी ब्रा स्ट्रैप पर्र, उनकीपीठ कि उस मखमली औऱ रसीले स्किन कों छूगए। छूते हि मैंने महसूस किया कि मां कि साँसें अब बेतरतीब होकरतेज़ चलनेलगी हें।
Kl Klpd karwa diye na bhay Waise too bhut dino baad kisi kahani ko padh raha ho usme bi KLPD hu gyaa Ab phir sahi dusra dhudhna padega.
bhay itne saal baad update diya. Toh ma bete kaa milan kara diya hotha. Ab milan k liye ptaa nahee kitne saal the page refresh karte rehna padega
aabhar bhay.mummy kee mamta or bete kee kamukta kaa milan, apne asli rishta ko yad rakhkar or pukarte huye, behad romanchak hoga.plz update soon.
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 40
मैंने अपनापेर थोडा औऱ आगे बढ़ाया औऱ अपनेबदन कों उनके शरीर केँ संगसटा दिया। वो हमारे बीच बढ़तीउस गर्मी कों महसूस करपारही थि। मैंने दो-तीन बार अपनीनाक कों उनके बालों मे हल्के सें रगड़ा औऱ फिन आरामसे अपना मुँह उनके बाएं कंधे कि ओर लें गय़ा।
जैसे हि मेरे होंठों नें उनकी गर्दन कि उस रेशमी औऱ कोमल त्वचा कों छुआ, उन्हे एक् ज़ोरदार गुदगुदी महसूस हुईँ। मैंने अपनीनाक औऱ होठों कों उनकी सुडौल गर्दन पऱ एक् बारफिन प्रेम सें रगड़ा, तौ वो सिहरउठी। उन्होंने झट सें अपना कंधा सिकोड़ा औऱ खिलखिलाकर हँसपड़ी औऱ मेरीतरफ पीठ करके खड़ी होँ गई। मैंने उनकीकमर पर्र अपने दोनों हाथों कां लॉक बनाकर उन्हे कसकर पकड़ाहुआ थां, इसलिये वो चाहकर भि मुझसे दूर नहि जापाई। वो हँसते हुए औऱ उस मीठी गुदगुदी सें जूझते हुए बोलि—
"अरे। क्याँ कररहे हें आप्? छोड़िये नं। मुझे अभि बहोत साराकाम निपटाना हैं। "
मैंने अपनी हरकतें रोकदीं, पऱ उन्हे अपनी बाहों सें आज़ाद नहि किया। मे बस खामोश उन्हे थामेखड़ा रहा। कमरे मे अब केवल हमारी तेज़ चलती साँसों कि आवाज़ थि। मेरी जींस केँ अंदर मेरा लोंडा इसकदर फड़करहा थां, मानो अभि जींस फाड़कर बाहर् आँ जाएगा। फिन भि, मैंने उनकी ख़्वाहिश कां सम्मान किया औऱ आगेकोई 'बदमाशी' नहि कि।
कुछसमय हम् इसीतरह एक्-दूसरे मे सिमटे रहे। फिन मम्मी नें धीरे-धीरे सें फुसफुसाते हुएकहा, "छोड़िये नाँ। अब मुझेकाम करने दीजिये। "
मे मुस्कुरा दिया। मे समझ गय़ा थां कि मम्मी अभि यहसभी नहि करना चाहती, फिरभी उनकामन भि वहीचाह रहा थां जौ मेरा। ये अहसास मुझे अंदर सें एक् अजीब सि खुशी सें भर गय़ा। मैंने अपनीपकड़ ढीली कि औऱ उन्हे मुक्त कर दिया।
आज़ाद होते हि मां जल्दी वहा सें हटी औऱ जाते-जाते शरारत भरी नज़रों सें मुझे देखकर बोलीं, "चलिए फटाफट जाइये। औऱ मार्केट सें सामान वगैरह लेकर आइये। "
इतना कहकर वो वापस अपने खुलेहुए सूटकेस केँ पास पहुँच गई औऱ कपड़े समेटने मे जुट गई। मे उनकीइस अचानक आई फुर्ती औऱ फरमाइश कों समझ नहि पाया। मैंने उलझन मे उनसे पूछा, "पऱ। क्याँ लेकरआऊं?
मम्मी नें मेरी उलझन कों देखा औऱ मेरी हालत पऱ मुस्कुराते हुए बोलीं, "रात कों डिनर नहि करना हैं क्याँ?"
मैंने तपाक सें जवाब दिया, "तोँ उसकेलिए मार्केट सें क्याँ लाना? मे किसी अच्छे होटल सें खानां मंगवा लेता हूं। "
मेरीबात सुनकर मां केँ हाथठहर गए। उन्होने रुककर बस एक् बार मुझे देखा, फिन अपनी नज़रें झुकाकर काम मे जुट गई। मगरइस बार उनके लहजे मे एक् अलग हि खनक थि, "ओह। तोँ मेरेहाथ कां खानां मनपसंद नहि आएगा आपको?"
उनकी आवाज़ मे एक् ऐसी मासूमियत औऱ हक़ थां कि मे अंदर तक हिल गय़ा। मे उनकीहर छोटी ख्वाहिश मेरेलिए किसी हुक्म सें कम नहि थि। माहौल कों हल्का करने केँ लिए मे मुस्कुराया औऱ फ़ौरनकहा—
"दुनिया केँ तमाम 5 स्टार होटलों कां ज़ायका भि तुम्हारे हाथ केँ खाने केँ सामने फीकापड़ जाएगा। "
मेरीये बात सुनते हि मम्मी झट सें मुड़ी औऱ खिलखिलाकर हँसपड़ी। फिनलाड़ सें बोलीं, "तोँ फिन जाइये! सामान लेकर आइये, तब तक मे येसभी समेटकर रख देती हूं। "
मे बस उन्हे देखता रहा औऱ मुस्कुराता रहा। वो फिन सें अपनेकाम मे मग्न हौ गई। उन्हे इसनएरूप मे देख्ना—मेरी दुल्हन, मेरी पत्नि केँ रूप मे, मेरेलिए किसी हसीन सपने जैसा थां। मे मन हि मन खुशी केँ समंदर मे गोतेलगा रहा थां कि तभी अचानक मुझे ख्याल आया—'आज हमारी सुहागरात हैं!'
पऱ यहाइस नएशहर मे, हमारे इस आशियाने मे कोई तीसरा नहि थां जौ दूल्हा-दुल्हन केँ लिएसेज सजाता याँ रूम फूलों सें महकाता। यहा जोँ कुछ भि थां, बस हम् दोनों केँ बीच थां। मैंने जल्दी मन हि मन एक् फैसला किया कि अपनीइस पहलीरात कों यादगार बनाने केँ लिए मुझे स्वयं हि इसे सजाना होगा।
मैंने मां पर्र एक् अंतिम प्रेम भरीनज़र डाली औऱ निकलपड़ा। मेरेज़हन मे अब केवलघऱ कां सामान नहि, बल्कि हमारी उस सुनहरी रात कि तैयारी चलरही थि।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बाहर् अंधेरा पसर चुका थां, फिन भि नं जाने क्यूं आसमान मे एक् अजीब सि चमक बाकी थि। स्ट्रीट लाइट कि रोशनी चारों ओरफैल रही थि। गर्मियों कि शामें अक्सर ऐसी हि होती हें—जहाँ एक् अनोखी रोशनी पूरी कायनात कों घेर लेती हैं। उससमय मन मे एक् ऐसी अनुभूति जन्म लेती हैं जोँ शब्दों कि मोहताज नहि होती। कुछ खुशी औऱ गम मिलकर एक् ऐसा एहसास बुनते हें, जौ आपको भीड़ केँ बीच रहकर भि सबसे जुदाकर देता हैं।
बाजार कि ओर बढ़तेहुए मे दुनिया केँ अजीबोगरीब दस्तूरों केँ बारे मे सोचरहा थां। हमारे पास कितनी सारी भौतिक चीज़ें (Materialistic things) हें। हम् एक् चीज़ देकर, उसी केँ बराबर तोलमोल कर दूसरी चीज़ हासिल करते हें। मगर रुपया हर किसी केँ पास एक् जैसा नहि होता, शायद इसीलिए मोलभाव केँ इस चक्कर मे ज़िंदगी कि कई खुशियाँ अधूरी रह जाती हें।
मगर हम् सबकेपास एक् एसी स्थान हैं, जहाँ हम् अपनी मर्ज़ी केँ मालिक हें। वहा सें हम् जितना चाहें, जोँ चाहें, पा सकते हें—औऱ वो स्थान हैं हमारा 'मन'। ये एक् ऐसी स्थान हैं जहाँ भावनाओं, जुनून, प्रेम, वफ़ादारी औऱ ईमानदारी कि कोईकमी नहि हैं। इसीमन केँ बलबूते हम् अपनी मनचाही मंज़िल पा सकते हें, औऱ यह कायनात भि उन्हे दिलाने मे हमारा संग देती हैं।
मम्मी केँ प्रति मेरा प्रेम भि तोँ इसी कां एक् पुख्ता सबूत हैं। शायद जाने-अनजाने मैंने उन्हे इतनी शिद्दत सें चाहा थां कि आज ज़िंदगी केँ इसमोड़ पऱ हम् एक् होँ गए। मम्मी नें भि अपनेमन केँ किसी कोने मे यहीदुआ माँगी होगी, तभी तौ वो आज अपनेसगे बेटे कि ज़िंदगी मे उसकी अर्धांगिनी, उसकी पत्नि बनकर आँ गई। एक् अनदेखे धागे नें हमारे दिलों कों बाँध दिया थां, औऱ अब हम् समाज केँ सामने एक् नए रिश्ते मे बंध चुके थें।
आज हमारी ज़िंदगी कां वो सबसेखास दिन हैं, जोँ हर जोड़े कि ज़िंदगी मे सिर्फ़ एक् बारआता हैं। औऱ इस अनोखे लम्हा कों मे अपनी मम्मी केँ लिए, अपनी पत्नि केँ लिए, दुनिया कां सबसे हसीन औऱ यादगार पल बनाना चाहता हूं।
जब हमारे बाल सफेद हौ जाएँगे, जब हम् शब्दों सें ज्यादा खामोशियों कों महसूस करने लगेंगे औऱ हमारे बच्चों औऱ पोते-पोती आसपास चहकरहे होंगे—तब बालकनी मे हाथ मे हाथ डाले बैठे हम् इसीसाम कों याद करेंगे। आसमान कि ओर देखते हुए हम् उसदिन कों यादकर मुस्कुराएँगे, जब हमने अपनीइस नई ज़िंदगी कि पहलीईंट रखी थि।
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
बाज़ार मे मैंने वो सारा सामान लेँ लिया थां जिसके बारे मे मम्मी सें बात हुइ थि। मगर उन्हे बिना बताए, मैंने एक् औऱ चीज़ खरीदी—ढेर सारे ताज़े गुलाब औऱ उनकी महकती पंखुड़ियाँ।
बाकी सामान केँ संग फूलों कां बड़ा सां पैकेट लेकर मे रिक्शे सें घऱ कि ओरचलपड़ा।
घऱ पहुँचकर मैंने जैसे हि डोरबेल बजाई, मां नें दरवाज़ा खोला। उन्हे देखते हि मेरे सीने मे एक् अजीब सि सिहरन दौड़ गई। ये मम्मी कां एक् औऱ नयारूप थां, जिसे मैंने पहलेकभी नहि देखा थां।
मम्मी मंद मुस्कान केँ संग मुझेदेख रही थि। उन्होने अपने बालों कों समेटकर ऊपर कि ओर एक् 'Casual' सां जूड़ाबना लिया थां। उनकी माँग मे सजा वो सिंदूर कां सुर्ख लालरंग रोशनी मे जगमगा रहा थां। गले कां मंगलसूत्र उनकी रसीले गर्दन सें होताहुआ उनके गोरे औऱ डीप क्लेवेज केँ पास लटका थां, औऱ कंधे पर्र एक् तौलिया रखाहुआ थां।
उन्हे एक् नज़र देखते हि मे समझ गय़ा कि वो नहाने कि तैयारी मे थि। एक् तोँ गर्मी कां मौसम, ऊपर सें कल सें हम् ट्रेन केँ सफ़र मे थें—दिन भर नहाने कां मौका हि नहि मिला थां। इसीलिए अब वो स्वयं कों तरोताज़ा करनेजा रही थि।
मगर उनकेइस रूप नें, उस गोरे शरीर केँ भीगे अहसास कि तैयारी नें, मेरेमन कों पिघला दिया। मेरा लंण्ड एक् बारफिन बेकाबू होकर फुदकने लगा थां।
साफ शब्दों मे कहूँ तौ वो उस टाइम बेहद 'Sexy' लगरही थि। उनकारूप, उनकी अदायें औऱ वो माहौल—सभी कुछ मुझे उनकीओर चुंबक कि तरह खींचरहा थां। मेरे भीतर एक् अजीब सि बेताबी (Eagerness), एक् हवस थि। मे बस उन्हे देखते हुए मुस्कुराता रहा।
मेरे दोनों हाथों मे सामान कां अंबार देखकर मां खिलखिलाकर हँसपड़ी औऱ बोलि, "अरे बाप रे! पूरा बाज़ार हि उठालाए क्याँ?"
ये कहतेहुए उन्होने मेरेहाथ सें कुछ पैकेट्स औऱ कैरी-बैग्स लेने केँ लिएहाथ बढ़ाया। मैंने बड़ी सावधानी सें फूलों वाला पैकेट पीछे छिपा लिया औऱ बाकी थोड़ा सामान उन्हे थमा दिया। मे दरवाज़ा बंद करके उनके पीछे-पीछे रसोई कि ओरबढ़ा।
उनकेहर कदम केँ संग एक् हल्की सि 'छन-छन' कि आवाज़ गूँजरही थि। उनकी पायल कि वो आवाज़ मेरेदिल कि धड़कनें बढ़ारही थि। उन्हे पीछे सें चलतेहुए देख्ना अपने आप् मे एक् नशा थां—वो लुभाने वालीचाल औऱ उनके शरीर कि शानऊपर नीचे होते उनके सूडोल हिप्स कां वो आकर्षण मेरे भीतरआग लगारहा थां।
मेरादिल तेज़ी सें धड़करहा थां क्योंकि मे जानता थां कि आजरात मम्मी मेरी बाँहों मे होगी। मेरी पत्नि बनकर वो मुझे एक् पति केँ सारे अधिकार सौंप देगी। उनके जिस्म कों हर स्थान छूने कां, उनके शरीर केँ हर कोने कों चूमने कां औऱ उन्हे अपनी बाहों मे भरकर बेपनाह प्रेम करने कां हक़आज मेरा होगा। आज वोँ उनकातन औऱ मन पूरीतरह अपने बेटे औऱ हमसफर केँ सामने समर्पण कर देगी।
मे इससमय केँ लिए बेताब थां औऱ मुझे यकीन थां कि उनकेमन मे भि कहीं नं कहींयही इंतजार औऱ यही हलचलचल रही होगी।
मम्मी रसोई मे दाखिल हुइ। अंदर जाने सें पहले मैंने फूलों कां वो पैकेट वहींपास कि एक् रैक पऱ छिपाकर रख दिया औऱ फिन उनके पीछे रसोई मे घुस गय़ा।
Aane wale updateds mai sabhi kee ichhao kaa dhyaan rakkha jaega, mummy apni Mamta k sath bete k sath Milan bi karegi or Biwi bankar bi kamukta ko hawa degi.
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 41
आज मां केँ कदमों कि आहट औऱ उनके हाथों कि छाया सें ये पूराघऱ चमकउठा थां। ऐसालग रहा थां मानोये निर्जीव घर-मकान भि, मेरी हि तरह, अपनी मालकिन कि छुअन सें जीउठा होँ। मम्मी बड़ी फुर्ती सें पैकेटों सें सामान निकालकर रखरही थि। तभीकाम केँ बीच उन्होने एक् बार मेरीतरफ देखा औऱ बोलि—
"ज़रा देखिये तौ। ये फ्रिज ऑन क्यूं नहि हौ रहा?"
मे वहींखड़ा उन्हे औऱ इसनए आशियाने कों निहार रहा थां। उनकी आवाज़ सुनकर मे जल्दी होश मे आया औऱ फ्रिज कि तरफ बढ़तेहुए पूछा, "क्यूं? क्याँ हौ गय़ा?"
मैंने झुककर फ्रिज कां दरवाज़ा खोला तौ देखा कि अंदर अंधेरा हैं। मम्मी पीछे सें हि बोलीं, "पता नहि क्याँ बात हैं। स्टेबलाइजर मे तोँ करंटदिख रहा हैं। "
मैंने गौर सें देखा औऱ मेरी हंसीछूट गई। मम्मी नें गर्दन घुमाकर, होंठों पऱ एक् नन्हीं सि मुस्कुराहट सजाए मुझसे पूछा, "अरे! अबहँस क्यूं रहे हें?"
मैंने फ्रिज कां प्लगहाथ मे लेकर उन्हे दिखाते हुएकहा, "जाने वालेदिन सुभह मैकेनिक इसे रिप्लेस करके गय़ा थां। उनकेबाद सें येचला हि नहि, औऱ प्लगतब सें यूँ हि बाहर् पड़ा थां। "
जैसे हि मैंने प्लग लगाया, फ्रिज केँ अंदर कि लाइटजल उठी। मैंने मुस्कुराकर मां कि तरफ देखा। वो वहा सें बाहर् निकलने केँ लिएकदम बढ़ा चुकी थि। चलते-चलते बोलि, "ठीक हैं, इसे चलने दीजिये। मे आकर सामान भरती हूं। "
मुझे बखूबी पता थां कि वो नहाने जारही हैं, फिन भि एक् अजीब सि बेवकूफी—याँ शायद उन्हे थोड़ा औऱ रोकने कि चाहत मे—मेरे मुँह सें निकल गय़ा, "कहां जारही होँ?"
मम्मी मेरेपास तक आई। मुझे क्रॉस करतेहुए वो रुकी, मुड़कर मुझे देखा औऱ मुस्कुरा दि।
उन्होने अपने कंधे सें तौलिया हटाया औऱ उसेबड़े सलीके सें अपनेहाथ पर्र रख लिया। फिन अपनी आँखों मे एक् शरारती चमक औऱ होंठों पऱ उसहया भरी मुस्कान कों दबाते हुए मद्धम आवाज़ मे बोलीं—
"नहाने."
औऱ फिनवही जादुई नज़रमुझ पर्र डालते हुए वो रसोई सें बाहर् निकल गई। मेरेउस बेतुके प्रश्न मे उन्हे शायद मेरीवही बेताबी महसूस हुई थि, जिसका जवाब वो अपनी नज़रों सें दे गई। उनकीउस एक् नज़र नें जैसे बिनाकहे कह दिया थां— "अब मे कहां जाऊंगी? अब तौ मे पूरीतरह तुम्हारी हि होँ चुकी हूं, औऱ हमेशा तुम्हारे पास हि रहूँगी। "
उनका वोँ इशारा मेरेदिल कि धड़कनें तेज़कर गय़ा। मैंने देखा, मम्मी बेडरूम कि तरफचली गई। हमारे इसघऱ मे बेडरूम वाला बाथरूम बहुतबड़ा औऱ लग्ज़री हैं, जबकि हॉल वाला थोड़ा छोटा औऱ बेसिक सां हैं।
मे बाहर् आया, रैक सें फूलों वाला वोँ पैकेट उठाया औऱ सीधा बेडरूम कि तरफबढ़ा। कमरे मे घुसते हि मेरी नज़रें चारों तरफ घूमीं—मम्मी नें कितनी जल्दसभी कुछसेट कर दिया थां। कपड़े अलमारी मे सलीके सें सजे थें औऱ हरचीज़ अपनीसही स्थान पऱ थि। मगर जैसे हि मेरीनज़र बेड पऱ पड़ी, मेरे सीने केँ अंदर एक् हलचल सि मच गई। मम्मी नें हमारे नएडबल बेड पर्र एक् ब्रांड न्यू बेडशीट बिछा दि थि, औऱ सिरहाने कि तरफ दोनों तकियों पर्र भि नए कवर्स चढ़ेहुए थें।
यहबैड। आज सें यह मात्र मेरा औऱ मां कां थां।
बेड केँ एक् कोने पऱ मम्मी नें मेरेलिए पजामा औऱ टी-शर्ट निकाल कररखी थि, औऱ पास हि उनकी अपनी साड़ी भि पड़ी थि। वोँ अपनेसंग सिर्फ़ ब्लाउज औऱ पेटीकोट लेकर बाथरूम केँ अंदर गई थि। अंदर सें पानी गिरने कि आवाज़ आँ रही थि औऱ बीच-बीच मे उनकी चूड़ियों कि वोँ हल्की सि 'छन-छन' भि सुनाई देरही थि।
तभी अचानक मेरे मोबाइल कि रिंगटोन बजी। दफ़्तर केँ सीनियर कलीग कां मोबाइल थां। मैंने रिसीव किया औऱ बात करने केँ लिए कमरे सें बाहर् जानेलगा। जाने सें पहले मैंने फूलों वाला पैकेट कंप्यूटर टेबल केँ नीचे सावधानी सें छिपा दिया।
कलीग कां मोबाइल दरअसल कल कि जॉइनिंग कन्फर्म करने केँ लिए थां ताकिकल कां 'Plan of action' सजधजकर कियाजा सके। मैंने उन्हें कह दिया कि मे आज आँ चुका हूं औऱ कल सुभह दफ़्तर पहुँच जाऊँगा। कुछदेर काम कि औऱ इधर-उधर कि बातें हुईं औऱ फिन'बाय' बोलकर मैंने मोबाइल रख दिया।
जब मे वापस बेडरूम मे आया, मम्मी अब भि बाथरूम मे हि थि। मैंने अपनाफोन औऱ पर्स निकालकर मेज़ पर्र रखा। तभी पीछे सें बाथरूम कां दरवाज़ा अनलॉक होने कि आवाज़आई। मे पलटा, तौ देखा मम्मी नें दरवाज़ा हल्का सां खोला थां औऱ वोँ मेरीतरफ हि देखरही थि। हमारी नज़रें मिलते हि हम् दोनों केँ चेहरे पर्र एक् मुस्कुराहट तैर गई।
उन्होने अपने मेहंदी लगेहुए दाएंहाथ सें दरवाज़ा थामरखा थां। दरवाज़ा बस थोड़ा सां खुला थां, जिसकी वजह सें उनका पूरा चेहरा तोँ नहि दिखरहा थां, मगर उनकी भीगी हुईँ ज़ुल्फें उनके गालों पऱ लटकरही थीं। उस छोटी सि 'Gap' सें उनके कंधे कां कुछ हिस्सा नज़र आँ रहा थां—उस गोरी औऱ मखमली स्किन पऱ पानी कि दो-चार बूंदें किसी मोती कि तरहचमक रहीथीं।
उन्होने टॉवल कों अपने आर्म्स केँ नीचे सें लपेटकर बूब्स केँ पास कसकर पकड़ाहुआ थां। वोँ ब्लाउज औऱ पेटीकोट संग तोँ लेकर गई थि, पर्र शायद अभि पहना नहि थां। उनकेउस भीगे औऱ आधे-अधूरे रूप नें मेरे भीतर एक् अजीब सि तड़प औऱ 'Excitement' पैदाकर दि।
मे वहीं खड़ा मुस्कुराते हुए उन्हे निहारे जारहा थां। मम्मी कि आँखों मे जोँ प्रेम औऱ हया कां मेलदिख रहा थां, वोँ किसी कों भि दीवाना करदे। उन्होने धीरे-धीरे सें मुस्कुराते हुएकहा—
"जाइएयहा सें। मुझे बाहर् आनां हैं। "
अब आहिस्ता हम् एक्-दूसरे केँ संगसहज (Comfortable) हौ रहे थें। मेरेमन मे एक् शरारत सूझी। मैंने होठों पऱ एक् हल्की सि बदमाशी वाली मुस्कान ली औऱ वहीं टेबल सें टेक लगाकर खड़ा होँ गय़ा। मम्मी मेरा इरादा समझ गई। उन्होने अपनी आवाज़ मे एक् मीठा सां अनुरोध भरतेहुए, बिल्कुल एक् प्यारी पत्नि कि तरहफिन सें कहा—
"जाइए नाँ आप्!"
सच कहूँ तौ उन्हे इसतरह सताने मे मुझे बड़ामज़ा आँ रहा थां। मुझेपता थां कि जब तक मे यहाखड़ा हूं, वोँ बाहर् नहि आएगी, औऱ उन्हे बाहर् आनां भि थां। आखिर वोँ मेरी पत्नि हैं, उन्हे टॉवल मे देखने मे क्याँ हर्ज हैं? यह ख्याल मन मे आते हि मेरे अंदर एक् अजीब सि हलचलमच गई। उन्हे उस भीगेरूप मे, टॉवल लपेटे हुए देखकर मेरी कल्पनाएं औऱ भि गहरी होनेलगी थीं।
हम् पति-पत्नि तौ बन चुके थें, पऱ अभि भि हमारे बीच एक् बारीक सां पर्दा थां। हम् दोनों हि कोशिश कररहे थें कि वोँ दूरी ख़त्म होँ जाए औऱ हम् रूह सें एक् होँ जाएँ। मुझेपता थां कि यह शुरुआती झिझकबस कुछ हि समय कि मेहमान हैं।
जब उन्होने देखा कि मे टस सें मस नहि होँ रहा, तौ मां नें अपनी अदाओं मे औऱ भि नरमी भरतेहुए कहा, "आप् यहाऐसे खड़े रहेंगे तोँ मे बाहर् नहि आँ पाऊँगी। "
मैंने भि चुटकी लेतेहुए धीरे-धीरे सें कहा, "क्यूं? तुमने टॉवल तौ पहना हि हैं, आँ जाओ बाहर्। "
मेरीबात सुनते हि उनका चेहरा लज्जा सें लाल सुर्ख होँ गय़ा। उन्होने अपनी नज़रें झुकालीं औऱ दरवाज़े पऱ रखे अपने मेहंदी वालेहाथ कि उंगलियों कों आरामसे रगड़ने लगी। उन्होने करीब फुसफुसाते हुएकहा—
"नहि। मुझे बहोत लज्जा आँ रही हैं। "
उनकीयह बात सीधे मेरेदिल कों छू गई। मे समझ गय़ा कि मम्मी मेरी पत्नि तोँ बन गई हैं, पऱ मेरे सामने पूरीतरह खुलकर आने मे उन्हे अभि थोड़ासमय चाहिए। अचानक मां सें पत्नि बन जानां उनकेलिए एक् बड़ा बदलाव थां पर्र इसकेलिए उनकी कोशिश साफ दिखती हैं वोँ वाकई मे मेरी पत्नि बनकर रहना चाहती हैं। मुझे अहसास हुआ कि इससफर मे मुझे उनकासंग देना चाहिए, उनकीइस मासूम झिझक कां सम्मान करना चाहिए।
मे मुस्कुराते हुए कमरे सें बाहर् जानेलगा, तभी पीछे सें मां कि धीमी आवाज़आई—
"बाहर् जाकर पर्दा लगा दीजिएगा। "
मैंने पलटकर उन्हे देखा औऱ एक् प्यारी सि स्माइल दि। हमारी नज़रें मिलीं औऱ उनचंद पलों मे उन्होने जैसे अपनी ख़ामोशी सें सभीकुछ कह दिया थां। ऐसालग रहा थां जैसे वोँ कहरही होँ— "सॉरी जानू, मे तुम्हारे संग अपनी लाइफ कां हरपल जीना चाहती हूं, तुम्हारे प्रेम मे डूब जानां चाहती हूं, मगरइस नए रिश्ते मे स्वयं कों तुम्हारी पत्नि केँ रूप मे ढालने मे थोड़ा टाइमलग रहा हैं। please forgive mai."
उनकीउन अनकही बातों नें मेरेदिल कों छू लिया औऱ उनकेलिए मेरी इश्क औऱ भि बढ़ गई। मे बाहर् आया औऱ दरवाज़े कां पर्दा अच्छी तरह घसीटकर बंदकर दिया। बाहर् खड़े-खड़े हि मुझेसमझ आँ रहा थां कि मम्मी बाथरूम सें बाहर् आँ गई हैं। उनकी पायल कि वोँ 'छन-छन' औऱ चूड़ियों कि 'रुनझुन' सें मे उनकीहर हरकत कों महसूस करपारहा थां।
अगर मे चाहता तोँ उस पर्दे कों हटाकर कमरे केँ अंदर दाखिल होँ सकता थां, मगर मे उनका भरोसा नहि तोड़ना चाहता थां। वोँ चाहती तौ स्वयं आकर दरवाज़ा लॉककर सकती थि, पऱ उन्होने केवल पर्दा लगाने कों कहकरमुझ पर्र जोँ 'Trust' दिखाया थां, वही मेरेलिए सबसेबड़ी जीत थि। उस पर्दे केँ पीछे वोँ स्वयं कों सुरक्षित औऱ महफूज़ महसूस कररही थि, औऱ मे उस भरोसे कि दीवार कों कभी गिरने नहि दे सकता थां।
हर रिश्ते कि बुनियाद विश्वास औऱ यकीन केँ पिलर्स पर्र टिकी होती हैं, औऱ हमारा नाता तौ अबउस मुकाम पऱ थां जहाँ बिनाकहे भि सभीसमझ आँ रहा थां।
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) - Next part miss mat karna
Relavant source : click here





















