मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 33
नानाजी-नानीमा ट्रेन मे चढ़ने सें पहले मुझे औऱ मम्मी कों बार-बार गले सें लगारहे थें। मे औऱ मां, एक् संग झुककर पति-पत्नि केँ रूप मे उनकेचरण छूकर आशीर्वाद लेनेलगे। नाना नें मुझे एक् बारअलग सें गले लगाया औऱ कुछदेर तक थामेरखा, जैसे वो मौन शब्दों मे कहरहे हों, "मैंने अपनेघऱ कि लक्ष्मी तुम्हें सौंपी हैं, बेटा। अबइसे तुम्हीं संभालना। "
फिन उन्होंने मम्मी कों गले लगाकर मायूसी औऱ मुस्कान केँ संग विदाई दि। उनकी आँखों मे एक् पिता कि चिंता औऱ प्रेम थां, जोँ अपनेदिल केँ टुकड़े कों जिंदगी कि नईराह पर्र भेजरहा होँ।
नानीमा नें मम्मी कों फिन सें गले सें लगाया औऱ उसके चेहरे कों अपने दोनों हाथों सें थामकर उसकी आँखों मे देखा। उनकी अपनी आँखें भीगी हुईँ थीं, मगर एक् मुस्कान केँ संग उन्होंने मम्मी कों आशीर्वाद देतेहुए कहा, "सदा सुहागन रहो, बेटी। " नानाजी-नानीमा केँ चेहरे पऱ साफ़दिख रहा थां कि वे अपनी प्यारी बेटी कों विदाकर रहे हें।
मे औऱ मम्मी, एक् संग खड़े, बस उन्हें समझाने औऱ उनके ख्याल रखने केँ लिए कहनेलगे। आज तक मम्मी उनकेसंग थि, उनके जिंदगी कां हिस्सा, मगरअब वे दोनों वास्तव मे अकेले रह जाएंगे। ये विचार मेरेमन कों भि भारीकर रहा थां।
लेकीन, क्याँ कियाजाए? शायद जिंदगी कां यही अर्थ हैं।
मे औऱ मां एक् संग प्लेटफार्म पऱ खड़े थें। ट्रेन आहिस्ता चलनेलगी।
नानाजी-नानीमा नें खिड़की सें हमें देखकर हाथ हिलाया औऱ एक् स्नेहिल मुस्कान केँ संग अपना प्रेम जताया। जैसे-जैसे ट्रेन नें गति पकड़ी, मां कि आँखें भरआईं। ट्रेन अब प्लेटफार्म कों छोड़दूर जानेलगी थि, औऱ तभी मैंने महसूस किया कि मां नें अपने दोनों हाथ उठाकर मेरे बाजू कों थाम लिया हैं।
मैंने उनकीओर देखा—वो अब भि जातेहुए ट्रेन कों देखरही थि, उनकी आँखें आँसुओं सें भरीथीं, पर्र वो अपना ध्यान मुझसे हटाकर उसी दिशा मे लगाएहुए थि।
मम्मी केँ हाथ धीरे धीरे मेरे बाजू कों कसकर पकड़ने लगे। मेरेमन मे विचारों कां सैलाब उमड़ पड़ा—अब तक वो अपने माँ-पिताजी केँ साये मे, उनके प्रेम औऱ सेफटी मे जिंदगी बितारही थि। उन्होंने मां कि देखभाल, उनका पालन-पोषण बड़े प्रेम सें किया थां। मगरअब, इस लम्हा सें, मां मेरी संगिनी हैं, मेरी पत्नि हैं, औऱ उनकी देखभाल, उनकी रक्षा कां दायित्व अबमुझ पर्र हैं।
उसकेइस सहज, अनजाने सि पकड़ सें जैसे उन्होंने मेरे भीतरइस नए रिश्ते कि जिम्मेदारी कां एहसास जगा दिया हौ। मानो वो मेरे बाजू कों थामकर, बिना एक् शब्दकहे, मुझेये यादकरा रही होँ कि अब सें मे हि उनका पति हूं—उनका दोस्त, उसका रक्षक।
विवाह केँ टाइमजब मैंने कसमें खाईं, तब ये वादा किया थां कि मे जीवनभर मम्मी कां ख्याल रखूँगा—उनकी हर ख़्वाहिश कों पूरा करूँगा, उनकीहर चाहत कों अपने प्रेम, देखभाल औऱ ईमानदारी सें पूरा करूँगा। मे उन्हे हर मुश्किल औऱ तकलीफ़ सें बचाकर, अपनी मजबूत बाँहों कां सहारा दूँगा, ताकि वो मेरी बाहों मे चैनभरी नींद लें सके। औऱ आज, इस लम्हा सें, मेरेउस कर्तव्य कां पालन शुरुआत हौ गय़ा हैं।
मै उन्हे देखरहा थां, औऱ मेरेमन मे एक् नई अनुभूति जाग उठी—एक् ऐसा प्रेम, जौ एक् पति अपनी पत्नि केँ लिए महसूस करता हैं। मां केँ लिएये एहसास, ये स्नेह पहलीबार मेरे भीतरजाग रहा थां। इस प्लेटफार्म पर्र, नानाजी-नानीमा कों विदा देकर, हम् दोनों अपनेइस नए रिश्ते कि दहलीज़ पर्र खड़े थें, औऱ मे महसूस कररहा थां कि मे एक् नई जिम्मेदारी केँ संग, मम्मी केँ जिंदगी मे एक् नए प्रेम कि शुरुआत कररहा हूं।
मुझेइस तरह कां प्रेम औऱ भावनाएं पहलेकभी महसूस नहि हुइ थीं। तभी मम्मी नें अपनासिर उठाकर मेरीओर देखा।
उनकीनम आँखों मे अपनों सें दूर जाने कां ग़म थां, संग हि एक् अद्भुत ख़ुशी भि झलकरही थि। वो अपने माँ-पिताजी सें दूर रहकर भि अपनेदिल सें जुड़े किसीखास केँ संग, अपने बेटे केँ संग—जौ अब उनके पति हें—जिंदगी बिताने जारही थीं। उनकेमन मे जोँ मिश्रित खुशी औऱ उत्साह थां, वो उनकी आँखों मे साफरूप सें दिखरहा थां।
हम् दोनों उस भीड़भरे प्लेटफार्म पऱ कुछ लम्हा केँ लिए एक्-दूसरे कि आँखों मे देखते रहे। फिन अचानक, मां मे एक् लज्जा कां अनुभव हुआ, औऱ उन्होंने अपनी आँखें झुकालीं।
शर्माते हुए, उन्होंने अपनेहाथ कों मेरे बाजु सें हटा लिया औऱ अपनीतरफ खींच लिया। मगर उनके होंठों पऱ एक् मुस्कान थि, जौ ये समझारही थि कि चाहे कितनी भि मुश्किलें आएं, वो मेरेसंग, मेरेपास, औऱ मेरेदिल मे रहकर अपने सारे ग़मों कों भुलाकर मुस्कुराकर जिंदगी जी सकती हें।
मैंने अपने जिंदगी केँ एक् नए अध्याय मे प्रवेश किया, औऱ मम्मी कों अपनेसंग लेकर एक् नए रास्ते पर्र चलना शुरुआत किया, जहाँ सिर्फ मे औऱ मेरी मम्मी—यानी मेरी पत्नि—हि थें।
नानाजी-नानीमा साम कि ट्रेन लेकरचले गए, औऱ वो लोग सुभह होने सें पहले हि घऱ पहुँच जाएंगे। मगर हम् दोनो कों M.P। पहुँचते-पहुँचते कलसाम होँ जाएगा। हम् बांद्रा सें छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पऱ पहुँचे, हमारे संगतीन सूटकेस थें। एक् कुली कों सामान देकर, मे औऱ मां मुंबई कि उस भीड़ मे चलनेलगे, एक्-दूसरे केँ संग, एकदमपास रहकर।
मां नें मेराहाथ नहि पकड़ा; वो बस एक् नई दुल्हन कि तरह, अपने पति केँ संग आरामसे कदमों सें चलरही थि। उनकी आँखों मे एक् नयी उम्मीद औऱ उत्साह थां, जैसे वो इसनएसफर कां खुशी लेँ रही होँ। उस भीड़भाड़ मे भि, मे मात्र उन्हें हि देखरहा थां।
वोँ मेरेसंग, कदमों सें कदम मिलाकर चलनेलगी। उन्हे अब पूरी ज़िंदगी बसऐसे हि मेरासंग देना हैं, औऱ मे ये चाहता भि हूं, मन सें, दिल सें। उस भीड़ मे चलते वक़्त, कभी-कभी मम्मी कां बाजु मेरे बाजु सें औऱ उनका कंधा मेरे कंधे सें टकरारहा थां। हरबार मुझे एक् नरम औऱ कोमल छुअन कां एहसास हौ रहा थां।
मां कां शरीर कितना कोमल औऱ नरम हैं; हमारी विवाह सें पहले उनकी एक् झलक मुझे मिली थि, मगरअब उस कोमल औऱ नरम जिस्म केँ स्पर्श सें मेरे अंदर एक् कंपकपी सि दौड़ने लगी। मम्मी केँ एकदमपास रहने सें मुझे उनके जिस्म कि खुशबू भि मिलरही थि, जौ मेरेदिल मे एक् नया उत्साह भररही थि।
उनके बालों कि वो मीठीगंध मुझे भीतर तक महकारही थि। इतनी भीड़ मे भि मेरामन बस उन्हें अपनी बाँहों मे भर लेने कां कररहा थां, मगर न् जाने क्यूं, विवाह केँ बाद मेरे अंदर भि एक् अजीब सि झिझक आँ गई हैं। मे बहोत कुछ सोचकर आया थां, कई योजनाएँ मन मे थीं, पऱ आज मम्मी कों एक् अजनबी स्थान पऱ, हमारे परिचित समाज सें दूर, अकेली पाकर भि, इस भीड़-भाड़ वाले प्लेटफार्म केँ बीच मे, उन्हें छूने कि हिम्मत नहि करपारहा हूं।
मम्मी भि शायद मेरे जैसे हि भावनाओं औऱ विचारों केँ भंवर सें गुजररही हें। वो नं तौ मेरीओर नजरें उठाकर देखरही हें, नं हि सहज होकर मुझसे बातकर रही हें, नं हि मुझे छूने कां प्रयास कररही हें। हम् दोनों, एक्-दूसरे केँ इतने लगभग होतेहुए भि, चाहकर भि, पहलेकदम उठाने कि हिम्मत नहि जुटापा रहे हें।
हमारी ट्रेन आने मे अभि टाइम हैं। हम् प्लेटफार्म केँ एक् कोने मे रखी बेंच पर्र बैठे हें, औऱ हमारा सामान हमारे सामने रखाहुआ हैं।
मम्मी कभीकभी मुझे अपनी नज़रे उठाकर मुस्कुरा करदेख रही थि। माहौल मे एक् अजीब सां मौन हैं, जिसमें सिर्फ हमारी खामोश धड़कनों कि गूँज सुनाई देरही हैं। दोनों हि अपनी स्थान पर्र स्थिर, एक्-दूसरे कि नज़दीकी कों महसूस कररहे हें, मगरबोल नहि पारहे, जैसे शब्द कहींखो गएहों।
बहोत हि सुन्दर औऱ भावनाओं कां जीवंत चित्रण किया हैं आपनेइस भाग मे! एक् दम अद्भुत!
bhay update de kyon nahee rahe hu It 's a nice kahani itni khamoshi thick nahee ayese lagta h ap kahani complete nahee krna chahte hu
yeh too mr/mrs patel kee kahani h bus image's add kardi h bro bahut pahle padi thi yeh iska end bi bahut achaa hain halanki tune yeh kahani complete nahee kee galt baat hain
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 34
मम्मी औऱ मे एक्-दूसरे केँ बेहद लगभग थें। इतनी लगभग कि स्टेशन केँ उस हंगामा-शराबे औऱ अनाउंसमेंट केँ बीच भि हम् शायद एक्-दूसरे कि धड़कनें महसूस करपारहे थें। पर्र इस नजदीकी केँ बावजूद, हमारे बीच एक् अनकही सि दूरी थि—एक् हिचकिचाहट।
कुछदेर कि उस भारी खामोशी कों तोड़ते हुए मैंने मां कि तरफ देखा औऱ बस इतना हि पूछ पाया, "पानी पियोगी?"
उन्होंने बस एक् समय केँ लिए मेरी आँखों मे झाँका, फिन जल्दी अपनी नज़रें फेरलीं। उन्होंने बिनाकुछ बोलेबस धीरे-धीरे सें गर्दन हिलाकर 'हाँ'कह दिया। वो कोशिश कररही थि—कोशिश उस पुराने रिश्ते कों पीछे छोड़ने कि, मेरी ज़िंदगी मे मेरी पत्नि कि स्थान स्वयं कों स्लिम करने कि औऱ इसनए रिश्ते मे सहज होने कि।
वहीं दूसरी तरफ, मे भि स्वयं कों समझारहा थां। मे अपनेमन कों सजधजकर कररहा थां कि अब मम्मी कों उसीहक औऱ उसीनज़र सें देखूँ जोँ एक् पत्नि कां होता हैं।
मे उठा औऱ सामने वाले स्टाल सें पानी कि एक् बोतल लेँ आया। ढक्कन खोलकर मैंने बोतल मम्मी कि तरफ बढ़ाई, पर्र उन्होंने लेने मे थोड़ी झिझक दिखाई। शायद बोतल पूरीभरी हुई थि औऱ उन्हें डर थां कि पीतेसमय पानीछलक कर उनके कपड़ों पर्र न् गिरजाए। उनकीइस छोटी सि उलझन कों देखकर मेरे चेहरे पर्र एक् मुस्कुराहट आँ गई। मैंने बोतल वापसली, स्वयं एक् घूँट पानी पिया औऱ फिन उन्हें थमा दि।
मम्मी नें मेरीतरफ देखा, एक् हल्की सि स्माइल दि औऱ बिना किसी हिचकिचाहट केँ उसी बोतल सें पानी पीनेलगी। अहमदाबाद वाले हमारे घऱ मे मैंने बचपन सें देखा थां कि कोई किसी कां 'जूठा' पानी नहि पीता, पऱ आज मम्मी नें वो सारी दीवारें गिरा दि थीं। मेरे जूठे पानी कों पी लेना शायद उनका मुझे अपनाने कां एक् मौन तरीका थां।
उनकेगले कां मंगलसूत्र, मांग मे सजा वोँ गहरा सिंदूर औऱ हाथों कि मेहंदी—वो बिल्कुल एक् नई दुल्हन कि तरह शर्मा रही थि। उनकेइस बदलाव कों मे अपनेदिल कि गहराई सें महसूस कररहा थां। मेरामन बसयही कहरहा थां कि अबइसदिल मे उनके सिवा किसी औऱ केँ लिएकोई स्थान नहि बची।
मे थोड़ा नर्वस थां, इसलिये बार-बार अपनी स्थान सें उठकर इधर-उधर टहलने लगता। शायद मे स्वयं कों 'नॉर्मल' दिखाने कि कोशिश कररहा थां ताकि उन्हें असहज महसूस न् हौ। मगरहर बारजब मे वापसआता, तोँ देखता कि मां बस मेरा हि इंतजार कररही हैं। मुझे देखते हि वो अपनी पलकें झुका लेती औऱ उनके होंठों पऱ वो जानी-पहचानी शर्मिली मुस्कान आँ जाती।
उनकीउस मुस्कुराहट मे एक् अजीब सां चैन थां। हैरानी होती थि ये देखकर कि महज़कुछ पलों केँ लिए भि अगर मे उनकी नज़रों सें ओझल होता, तौ उनकी आँखों मे एक् अजीब सि बेचैनी औऱ इंतजार साफ दिखने लगता थां। शायद वो अबहरसमय मुझे अपनेपास हि चाहती थि।
तभी ट्रेन कां वक़्त हौ गय़ा। प्लेटफ़ॉर्म पर्र अचानक भीड़ औऱ हंगामा बढ़नेलगा। हम् दोनों खड़ेहुए, मे सामान उठाने केँ लिए किसी कुली कों ढूंढने लगा। जैसे हि मैंने कुली तलाशने केँ लिएदो कदमआगे बढ़ाए, पीछे सें एक् बेहद धीमी औऱ रेशमी सि आवाज़आई— "सुनिए नां."
उस एक् पुकार नें मेरेदिल मे जैसे खुशियों कां कोई सैलाब ला दिया। मे ठिठककर पीछे मुड़ा। मां बस चुपचाप अपनी गहरी आँखों सें मुझेदेख रही थि। मे वापस उनकेपास आया औऱ बिनाकुछ बोलेबस इशारों मे पूछा कि क्याँ बात हैं।
उन्होंने मेरी नजरों सें अपनी नज़रें मिलाई औऱ बहोत धीरे-धीरे सें बोलीं, "आप् बस मेरेपास रहिए। "
इतना कहकर उन्होंने नज़रें झुकालीं औऱ धीरे-धीरे सें मेराहाथ थामकर मेरे औऱ लगभग आँ गई। अपनी झुकी हुई पलकों केँ संग उन्होंने बिल्कुल फुसफुसाते हुएकहा, "मुझेडर लगता हैं."
उन्होंने अपनासिर धीरे-धीरे सें मेरे कंधे सें टिका दिया। उस समय मेरे अंदर जैसे प्रेम कां कोई दरिया बह निकला। मे बिल्कुल निशब्द खड़ा थां, बस उनकेउस स्पर्श औऱ भरोसे कों महसूस कररहा थां। उस भीड़भाड़ वाले स्टेशन पऱ, मुझेलगा जैसे टाइमथम गय़ा हौ। फिन कुली मिला औऱ हम् अपना सामान लेकरआगे कि तरफबढ़ गए।
मां दरवाजे केँ पासआकर खड़ी हौ गई औऱ ट्रेन मे चढ़ने कि तैयारी करनेलगी। मे जल्दी उनकेपास पहुंचा ताकि उन्हें चढ़ने मे सहायता कर सकूँ। मांग मे सिंदूर औऱ गले मे मंगलसूत्र केँ संग मां बिल्कुल वैसी हि लगरही थि जैसेकोई नई नवेली दुल्हन हौ, जिसकी अभि-अभि विवाह हुइ हौ।
मैंने उनकीतरफ देखते हुए, दिल मे ढेर सारा प्रेम औऱ चेहरे पर्र मुस्कान लिए अपना बायाँ हाथ उनकीओर बढ़ा दिया। उन्होंने मेरीतरफ देखा औऱ उनके चेहरे पऱ एक् सुंदर सि स्माइल तैर गई। उनकी आँखों मे वहीचमक औऱ प्रेम थां जौ एक् नई शादीशुदा लड़की कि आँखों मे अपने पति केँ लिए होता हैं। वो थोड़ा शर्माईं, उनकी मुस्कुराहट औऱ गहरी हुइ, औऱ फिन नज़रें झुकाकर उन्होंने अपना मेहंदी वाला दायाँ हाथ मेरेहाथ मे थमा दिया।
फिन अपने दूसरे हाथ सें साड़ी कों थोड़ाऊपर कि तरफ संभालते हुए वो ट्रेन मे ऊपर चढ़ने लगीं। उन्होंने मीडियम हील वाली स्लिपर पहनी हुई थि। जैसे हि वो चढ़ने केँ लिए बढ़ीं, साड़ी केँ नीचे सें उनके मेहंदी लगे पैरों कां कुछ हिस्सा मुझेनज़र आया।
गोरी गोरी औऱ गोल रसीले स्किन वाला पांव, उसमे पहनी हुइ पायल उनके सुन्दर गुलाबी ऐड़ी कों ओर भि हसीन औऱ सेक्सी बनारही हैं। उसकी एक् झलकदेख कर हि मेरे अंदर अचानक हवस आँ गई। अचानक मेरेबदन मे खून दौडने लगा औऱ मेरे लंड केँ अंदर जाकर भरनेलगा। मां केँ नरम हाथों केँ स्पर्श कों महसुस करनेलगा। उनके मेंहदी लगेहुए सेक्सी पांव औऱ नयी दुल्हन कि तरह शर्माना इससभी केँ कारण मेरे अंदर एक् तूफ़ान चलनेलगा औऱ मेरा लौड़ा अचानक उछल केँ सख्त होनेलगा.
मे बस अपनी भावनाओं कों मन हि मन काबू करतेहुए उन्हें ऊपर चढ़ने मे पूरी सहायता करनेलगा। जैसे हि वो ट्रेन केँ अंदर चढ़ीं, उन्होंने अपनी नज़रें उठाकर सीधे मेरीतरफ देखा।
उन आँखों मे मेरेलिए जोँ प्रेम औऱ वफादारी थि, मुझ पर्र उनकी जौ निर्भरता थि औऱ एक् मुकम्मल समर्पण कां जोँ अहसास थां, वो सभीदेख कर मे निशब्द रह गय़ा। मेरे प्रति उनकी वो फिक्र औऱ उनकेदिल मे छिपी बेपनाह चाहत कों महसूस करउससमय प्लेटफ़ॉर्म पर्र खड़े-खड़े मेरादिल जैसे पूरीतरह पिघलने लगा।
Sir, yeh story bhut pasand aa rahi h.pr ap say ek fariyaad h.kee ap ne is story ko beech mai hi chhod diya h.please isse complete krr dijiye.
koy baat nahee bhay apko achhi Lage toh ap padh sakte hu, mene apne ganit say likhi h. or mein apni life set karne mai laga huwa thaa isi wajah say mein site pr nahee aaya.
Maaf krna yeh update kaafi time baad post kia h. Life mai kuch iss prakaar uljha diya h kee chahh krr bi site nahee chala ptaa. phir yeh Update post kia h aj, hope you guys will like it
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 35
मुझे अंदर हि अंदरये महसूस हुआ कि मे वाकई बहोत खुशनसीब हूं। मुझे पत्नि केँ रूप मे ऐसी लड़की मिली जोँ बचपन सें आज तक मुझे इतना प्रेम करतीआई हैं औऱ आज भि उनकेदिल मे वही शिद्दत हैं। मे जानता हूं कि वो ज़िंदगी भर मुझेइसी तरह टूटकर चाहेगी। मेरी सिंगल पैरेंट होने कि वजह सें शायद इसीलिए उन्होंने मुझे हमेशा सबसे अधिक प्रेम दिया। उनकेदिल मे हमेशा मेरा हि बसेरा रहा औऱ उनके सारे सुख-दुःख बस मेरे हि इर्द-गिर्द घूमते थें। आज नसीब हमें ज़िंदगी केँ उस मोड़ पर्र लें आया हैं, जहाँ हम् सगे मां - बेटा होने केँ बावजूद दुनिया केँ सबसे मज़बूत औऱ सुंदर बंधन मे बंधगए हें।
मम्मी - बेटे केँ उस अटूट रिश्ते सें तौ हम् पहले हि जुड़े थें, मगरआज इसनए बंधन नें हम् दोनों कों औऱ भि ज़्यादा मजबूती सें एक्-दूसरे केँ संगजोड़ दिया हैं। मां केँ लिए मेरेमन मे जोँ प्रेम थां, उसमें अब एक् पति कां समर्पण भि जुड़ गय़ा थां औऱ मैंने अपनेदिल केँ सारे अहसास निचोड़कर उनकेनाम कर दिया। उन्होंने भि अपनी ज़िंदगी मे जमा कियाहुआ सारा प्रेम अपनेनए पति केँ लिए लुटा दिया। अपने 'बेटे' केँ लिए जौ मुहब्बत थि, उसमें पत्नि वालाहक़ मिलाकर उन्होंने अपनादिल पूरीतरह मेरे सामने खोलकर रख दिया थां।
उन्होंने स्वयं कों, अपने तन-मन औऱ अपनीरूह कों पूरीतरह अपने बेटे, अपने पति केँ पास सरेंडर कर दिया थां। उनके सामने खड़े होकर उसकी आँखों मे देखते हुए मे येसभी कुछ गहराई सें महसूस कररहा थां। उसभीड़ भरे स्टेशन औऱ ट्रेन केँ हंगामा-शराबे केँ बीच, हम् बसकुछ समययूँ हि नज़रें मिलाकर एक्-दूसरे सें दिल कि हज़ारों बातें कहरहे थें।
जब हम् ट्रेन मे चढ़े थें, तौ कंपार्टमेंट मुसाफिरों सें खचाखच भरा थां। लोग जल्द-जल्द अपना डिनर निपटाकर सोगए। मेरा औऱ मां कां बर्थ ऊपर-नीचे थां। मे ऊपर जाकरलेट गय़ा औऱ मां नीचे चादर ओढ़कर सो गई। विवाह केँ बाद एक् पति-पत्नि कि पहलीरात, जौ एक् संग एक् हि छत केँ नीचे गुज़रनी चाहिए थि, वो ट्रेन केँ इन अलग-अलग बर्थ पऱ गुज़ररही थि। शायद हि किसी केँ संगऐसा होता होगा, पऱ हमारे संग तौ खैर बहोत कुछऐसा होँ रहा थां जोँ आम नहि थां।
मैंने एक् बारऊपर सें झुककर नीचे मां कों देखा। वो मुड़कर मेरी हि बर्थ कि तरफ देखते हुए लेटी थि। जैसे हि हमारी नज़रें मिलीं, उनके होंठों पर्र एक् कोमल सि मुस्कान तैर गई। मे बस उन्हें एकटक देखता रहा। उन्होंने अपनी चादर कों थोड़ा औऱ गले तक खींच लिया, जैसेउस गर्माहट मे स्वयं कों समेटना चाहरही होँ, औऱ फिन अपनी आँखें मूंदलीं।
थोड़ी देरबाद जब उन्होंने दोबारा आँखें खोलीं, तोँ हमारी नज़रें फिन सें उलझगईं। माथे पर्र वो लाल बिंदी औऱ होंठों कि वो प्यारी सि मुस्कुराहट—विवाह केँ इसरूप नें उन्हें पूरीतरह बदल दिया थां। वो बिल्कुल उस अल्हड़ औऱ कुंवारी लड़की जैसीलग रही थि जिसकी अभि-अभि विवाह हुई हौ औऱ जोँ अपने पति कों पहलीबार एक् अलगहक़ सें देखरही हौ। फिन उन्होंने अपना चेहरा दाईंतरफ घुमा लिया औऱ आँखें बंद करके सोने कि कोशिश करनेलगी।
अगली सुभहजब हमारी नींद खुली, तौ पिछले स्टेशन पर्र कुछ मुसाफिर पहले हि उतर चुके थें। इसवजह सें कोचअब थोडा खाली औऱ शांतलग रहा थां। हमारे सामने वाली बर्थ पर्र बस एक् अधेड़ उम्र केँ अंकल बैठे थें। तभी ट्रेन मे गरमचाय वालाआया, जोँ गर्म पानी कां फ्लास्क, चीनी केँ पैकेट, मिल्क पाउडर औऱ टी-बैग्स दे गय़ा।
मैंने जैसे हि गरमचाय बनाना शुरुआत किया, मां नें धीरे-धीरे सें टोकते हुएकहा, "लाइए, मुझे दीजिए। मे बनाती हूं। " औऱ वो गरमचाय बनाने लगी। मेरी पत्नि बनने केँ बाद भि, उनके बर्ताव मे वही पुरानी फिक्र औऱ ममता थि जोँ वो बचपन सें मुझे देतीआई थि। मैंने भि मन हि मन स्वयं सें वादा किया कि पति बनने केँ बाद भि उनकेलिए मेरा सम्मान औऱ केयरकभी कम नहि होगी।
हम् गरमचाय कि चुस्कियाँ लेतेहुए बस एक्-दूसरे कों देखकर मुस्कुरा रहे थें। ये वो पहली सुभह थि जौ हर जोड़े कि ज़िंदगी मे मात्र एक् बारआती हैं—विवाह केँ ठीक अगलेदिन कि पहली सुभह। हम् उन बेशकीमती पलों कों अपनेदिल मे कैदकर रहे थें। हमारे सामने बैठे अंकल नें हमसे परिचय किया औऱ जब उन्हें पताचला कि हम् नई-नई विवाह करके मेरी नौकरी वाली स्थान जारहे हें, तौ उन्होंने मुस्कुराते हुएकहा कि हमारी जोड़ी बहोत हसीन हैं।
बातों-बातों मे उन्होंने पूछ लिया, "लव मैरिज हैं याँ अरेंज्ड?"
ये प्रश्न सुनते हि मां औऱ मे कुछ पलों केँ लिए खामोश हौ गए। उन्हें केसे समझाते कि हमारा नाता क्याँ हैं? मैंने जल्दी बात संभालते हुएकहा, "अरेंज्ड मैरिज हैं। "
मेरीबात सुनकर वो शख्स बोले, "बहोत कम लोगों मे अरेंज्ड मैरिज केँ बाद इतना प्रेम झलकता हैं, जितना आप् दोनों कों देखकर लगरहा हैं। "
मे औऱ मां एक्-दूसरे कों देखने लगे। मन हि मन हमने सोचा कि इन्हें क्याँ पता कि नसीब केँ किन फेरों नें हमेंआज यहा लाकर खड़ा किया हैं। हम् एक् ऐसा जोड़ा थें, जैसा शायद हि दुनिया मे कहीं औऱ मिले। हमारे बीच जोँ प्रेम थां, वो दुनिया केँ किसी भि बंधन सें कहीं ज़्यादा गहरा औऱ मज़बूत थां।
कुछ घंटों केँ सफर केँ बाद हम् मुंबई पहुँच गए—येवही शहर हैं जिसेअब सें हम् अपनाघऱ कहेंगे औऱ यहीं अपनी एक् नई दुनिया बसाएंगे। जैसे हि ट्रेन रुकी, मे औऱ मम्मी प्लेटफॉर्म पर्र उतरे। मैंने मां कों उतरने मे सहायता करने केँ लिएहाथ बढ़ाया, उन्होंने मेराहाथ कसकर पकड़ा औऱ नीचेउतर आई।
उतरने केँ बाद मां केँ चेहरे पर्र वो मुस्कुराहट बरकरार थि, पऱ अचानक कुछयाद करके उन्होंने मेरेहाथ पऱ अपनी ग्रिप ढीलीकर दि। वो थोड़ा शर्माई औऱ मेराहाथ छोड़कर अपनाहाथ पीछे खींच लिया। फिन वो नज़रें घुमाकर प्लेटफॉर्म कि दूसरी तरफ देखने लगी। मे अब भि उन्हें हि देखरहा थां; मां आज बहोत खुशलग रही थि। उनके होंठों पर्र जोँ मुस्कान सजी थि, उसे ताउम्र देखने केँ लिए मे कुछ भि कर सकता हूं।
हमनेकैब मे अपना लगेजलोड किया औऱ अपनेघऱ कि तरफ निकल पड़े—वो घऱ जोँ आज सें 'हमारा' होने वाला थां। प्लेटफॉर्म पऱ मम्मी नें जौ मेराहाथ छोड़ा, उनकेबाद उन्होंने फिन मेराहाथ नहि पकड़ा। मेरादिल चाहरहा थां कि वो मेरा बाज़ू पकड़कर मेरे एकदम लगभग होकरचले, पऱ वो पास होकर भि मेरे स्पर्श सें दूररह रही थि। शायद उनकेमन मे भि मेरे जैसी हि कोई बेचैनी औऱ अनुभूति हौ रही होगी। मेरे हि जैसा एक् तूफ़ान उनके अंदर भि उठा होगा। एक् ऐसा अद्भुत सुख, जोँ नं मैंने कभी पाया औऱ जिसे पाकर भि वो ज़िंदगी मे कभी उसकाठीक सें खुशी नहि लेँ पाई थि—उससुख कों पाने केँ लिए शायद उनकामन भि तरसरहा होगा। औऱ शायद इसीलिए, वो स्वयं कों काबू मे रखने केँ लिए मुझसे थोड़ी दूरी बनाकर रखरही थि।
कैब कि पिछली सीट पऱ मम्मी खिड़की केँ पास बैठकर बाहर् कि तरफदेख रही थि। वो इसनई स्थान औऱ नई ज़िंदगी मे स्वयं कों ढालते हुए, इस नए रिश्ते कों अपनेदिल मे औऱ भि मजबूती सें बसारही थि। रास्ते भर मे उन्हें बताता रहा कि हमें कितनी दूर जानां हैं, मार्केट किसतरफ हैं औऱ मेरा दफ़्तर किधर पड़ता हैं। वो बस बीच-बीच मे एक् मुस्कुराहट केँ संग मेरीतरफ देखती औऱ फिन बाहर् कि तरफ नज़रें घुमा लेती।
खिड़की कि तरफ उनका बायाँ हाथ उनकीगोद मे रखा थां औऱ दाहिना हाथ मेरे औऱ उनकेबीच कि खालीसीट पर्र। मेरामन बुरीतरह मचलरहा थां कि बस उनका वो हाथ अपनेहाथ मे लेँ लूँ। बातों-बातों मे मन मे ये ख्याल तौ सौबार आया, पऱ हिम्मत नहि जुटापा रहा थां। हम् अब पति-पत्नि थें, पर्र फिन भि अंदर एक् अजीब सां संकोच कामकर रहा थां। इतने सालों तक जिस महिला कों मैंने केवल एक् मां कि नज़र सें देखा औऱ छुआ, आज उसे अपनी पत्नि केँ रूप मे देख तोँ रहा थां, मगर छूने मे एक् झिझकआड़े आँ रही थि। शायद उनके अंदर भि अपने बेटे कों अब पति केँ रूप मे अपनाने औऱ छूने मे वैसी हि लज्जा होगी।
अब मुझे एहसास होँ रहा थां कि पिछले 6 सालों सें कल्पनाओं मे उनकेसंग मिलन केँ जोँ ख्वाब मैंने देखे थें, हकीकत कि ज़मीन पऱ आकर उन्हें पूरा करना इतनासहज औऱ आसान नहि थां। मम्मी जितनी बार मेरीतरफ देखती, मेरे सीने केँ अंदर एक् अजीब सि झनझनाहट होने लगती। खिड़की सें आतीहवा कि वजह सें जब वो मेरीतरफ देखती, तौ उनकी हसीन आँखें थोड़ी भिंच सि जातीं। फिन भि उनके चेहरे कि मुस्कान औऱ आँखों मे एक् गहरा प्रेम साफ़झलक रहा थां।
मैंने मन हि मन थोड़ी हिम्मत जुटाई औऱ सामने कि तरफ देखते हुए अपना बायाँ हाथ बढ़ाकर उनके दाहिने हाथ पऱ रख दिया। मेरी उंगलियाँ बस उनकी उंगलियों कों छूभररही थीं। तभी मां नें बाहर् देखते हुए अपनाहाथ थोड़ा अपनीओर खींच लिया। मैंने हार नहि मानी औऱ दोबारा हाथ बढ़ाकर उनकी उंगलियाँ पकड़लीं। अब उन्होंने हाथ हटाया तौ नहि, पर्र उंगलियों कों मुट्ठी कि तरह भींच लिया, जैसे मेरे स्पर्श सें दूर दौड़ना चाहरही हों। मेरेमन मे एक् ज़िद सि आँ गई कि हमारे बीच पति-पत्नि बनने केँ बादये जौ संकोच कि दीवार हैं, वो अभि समाप्त हौ जाए।
मैंने अपनाहाथ उनकेहाथ पर्र मजबूती सें टिका दिया औऱ अपनी ग्रिप मे उनकाहाथ थाम लिया। उन्होंने धीरे-धीरे सें हाथ छुड़ाने कि कोशिश तोँ कि, पर्र घसीटकर लें नहि गईं। मैंने उनकीतरफ मुड़कर देखा। वो अब भि होंठों पर्र मुस्कान लिए बाहर् देखरही थीं। मैंने आहिस्ता अपनी उंगलियाँ उनकी उंगलियों मे फँसाकर (intertwine करके) उन्हें थाम लिया। तभी उन्होंने मेरीतरफ देखा। उनके चेहरे पर्र लज्जा, एक्साइटमेंट औऱ चाहत कां एक् मिला-जुला भाव थां। उन्होंने आँखों हि आँखों मे इशारा करतेहुए मुझे ड्राइवर कि तरफ देखने कों कहा।
फिन एक् बनावटी गुस्से वाला चेहरा बनाया, जैसे वो कहना चाहती हों—"ये क्याँ कररहे हें आप्? आगे ड्राइवर बैठा हैं, मिरर मे देखरहा होगा। छोड़िए, मुझे लज्जा आँ रही हैं। "
उनकाइस तरह शर्माना मुझे औऱ भि मज़ा देनेलगा। मैंने उनकाहाथ छोड़ा तौ नहि, बल्कि अपनी ग्रिप औऱ मज़बूत करतेहुए उनकी उंगलियों कों अपनी मुट्ठी मे औऱ कस लिया। मम्मी नें जल्दी अपनी नज़रें घुमालीं औऱ बाहर् कि तरफ देखने लगी। मेरे चेहरे पऱ एक् शरारती मुस्कान थि औऱ मे बस उन्हें हि निहारे जारहा थां। फिन मैंने उनकाहाथ वैसे हि पकड़ेरखा औऱ अपनी नज़रें सामने कि तरफ घुमालीं।
तभी मुझे महसूस हुआ कि मम्मी अपनी मुट्ठी आहिस्ता खोलरही हैं औऱ अपनी उंगलियों सें मेरी उंगलियों कों थामरही हैं। मैंने नीचे हाथों कि तरफ देखा—हमारी उंगलियाँ एक्-दूसरे मे पूरीतरह उलझी हुइ (intertwined) थीं औऱ हम् दोनों नें एक्-दूसरे कां हाथ कसकरपकड़ रखा थां। मैंने उनकीतरफ देखा, तोँ वो बाहर् देखते हुए भि समझगईं कि मेरी नज़रें उन पर्र हि हें। वो औऱ भि ज़्यादा शर्मा गईं औऱ अपनी हंसी कों होंठों केँ बीच दबाने कि कोशिश करने लगीं। उन्होंने अपने बाएंहाथ कि कोहनी खिड़की पऱ टिकाई औऱ एक् उंगली कों मोड़कर बार-बार अपने होंठों कों छूने लगीं।
मे समझ गय़ा थां कि मां केँ अंदर कि वो झिझकअब ख़त्म हौ रही हैं औऱ वो अपने बेटे केँ संगइस नए रिश्ते मे आहिस्ता स्वयं कों खोलरही हैं। एक् पत्नि होने कां एहसास उनके चेहरे पर्र साफ़ थां औऱ उनकेदिल कि सारी खुशीझलक रही थि। मेरामन किसी बच्चे कि तरह खुशी सें झूमउठा। कैब मे हम् दोनों अलग-अलग तरफदेख रहे थें, मगर एक्-दूसरे कां हाथ पकड़कर हम् जैसे बिनाकुछ कहे वादाकर रहे थें कि ज़िंदगी कि किसी भि परिस्थिति मे येसंग कभी नहि छूटेगा।
मम्मी कि ऐसी अदाएं मैंने पहलेकभी नहि देखीथीं। मे जितनी बार उन्हें देखरहा थां, बसयही दुआकर रहा थां कि येसमय, ये एहसास कभी समाप्त न् हौ। हवा केँ झोंकों केँ संग उनकेबाल उड़कर मेरे चेहरे कों छूरहे थें। मेरेगाल, नाक औऱ आँखों पऱ उनके बालों कां वो हल्का सां स्पर्श मुझे एक् रूहानी खुशीदे रहा थां। उनकी वोँ धीमी हंसी औऱ उनके मोतियों सें चमकते दांत उनकी हंसी कों औऱ लुभावना बनारहे थें। मेरामन कररहा थां कि बस उन्हें अपनी बाँहों मे भरलूँ औऱ जीभरकर प्रेम करूँ। मम्मी औऱ मे एकांत मे एक् दूसरे कों अपनाबना कर पाने कि चाहत मे अंदर हि अंदर उबलने लगे.
पर्र मेरेमन मे उठी एक् छोटी सि फ़िक्र नें अचानक उस पूरी ख़ुशी कों फीकाकर दिया। रात मे भि कुछऐसा हि महसूस हुआ थां, जैसेदिल पऱ किसी नें बोझरख दिया हौ। मां नें शायद मेरी आँखों मे उस बेचैनी कों पढ़ लिया थां। उनकीउस टाइम कि खामोश नज़रों मे एक् गहरा दिलासा थां, जैसेकह रही हौ— "अब आप् अकेले क्यूं दुखी होते हें? आज सें तोँ हरसुख औऱ हरदुख हमारा साझा हैं। हम् मिलकर ज़िंदगी केँ सफर कों आसान बनाएंगे औऱ इसे खुशियों सें भर देंगे। मे हूं नं आपकेपास, हमेशा केँ लिए। "
उनकी आँखों कि वोँ तसल्ली पढ़करतब तोँ मेरामन संभल गय़ा थां, पर्र इससमय वही पुरानी चिंता फिन सें सर उठाने लगी। नानाजी-नानीमा कि कोशिशों औऱ तकदीर केँ खेल नें हमें शास्त्र केँ अनुसार पति-पत्नि तोँ बना दिया थां। मम्मी भि एक् पत्नि केँ रूप मे स्वयं कों ढालकर एक् सुनहरी ज़िंदगी केँ ड्रीम्स देखरही थि। पऱ क्याँ मे उनकी उम्मीदों पऱ खराउतर पाऊँगा? मुझे यकीन हैं कि मम्मी एक् आदर्श पत्नि साबित होगी, पऱ क्याँ मे एक् आदर्श पति बन पाऊँगा? एक् स्त्री केँ दिल मे अपने जीवनसाथी कों लेकर जितने अरमान औऱ ख़्वाब होते हें, क्याँ मे उन सबको मुकम्मल कर पाऊँगा?
यही वोँ प्रश्न थें जोँ रह-रहकर मेरेदिल मे चुभरहे थें। मे जानता हूं कि मे मां कों दुनिया मे सबसे ज़्यादा चाहता हूं औऱ ताउम्र चाहूँगा। उसके सिवा मेरी नज़रों मे कोई औऱ लड़की कभी आएगी हि नहि। वो मेरी ज़िंदगी कां एकमात्र सच हैं। हमारी उम्र केँ फासले कों तोँ हम् हर तरीके सें पाट लेंगे, पर्र जब एक् पति-पत्नि कि सामान्य ज़िंदगी केँ बारे मे सोचता हूं, तोँ वही मायूसी फिन सें घेर लेती हैं।
मे जानता हूं उनकेसंग मेराहर पति पत्नि कि तरह शारीरिक संपर्क होने वाला हैं। हम् मम्मी बेटे केँ रिश्ते कों दिल मे रखकर एक् पति पत्नि कि तरह जिएंगे। वो भि जानती हैं विवाह केँ बाद उनका बेटा अब एक् पति केँ अधिकारो सें उनकेतन औऱ मन कों प्रेम करेगा औऱ वो इसकेलिए जरूर खुदको रेडी भि कि होंगी।
मगर मे जब अपने लोड़े केँ बारे मे सोचता हूं तोँ एक् डरमन मे पैदा होता हैं। मेरा लंड नॉर्मल सें थोडा बड़ा औऱ मोटा तोँ हैं हि, पऱ जब वोँ उत्तेजना सें खड़ा होता हैं, तब उसकाकैप एक् दम बड़े सें बॉल जैसाबन जाता हैं।
क्याँ मे, मम्मी केँ संगठीक तरह सें शारीरिक सम्बन्ध बना पाउँगा?? क्याँ मे उनको बिना दर्ददिए वोँ प्रेम कर पाउँगा जौ हर पत्नि अपने पति सें चाहती हैं? क्याँ मे उन्हें पूर्ण संतुष्टि दे पाऊंगा?
मे उनसे बेइंतहा इश्क करता हूं। उनके सिवा किसी औऱ केँ संग मिलन कि कल्पना नं मैंने कभी कि हैं, औऱ नं कभी करूँगा। मेराबस एक् हि अरमान हैं—उन्हें हर मुमकिन खुशी देना औऱ दुनिया कां साराचैन उनके कदमों मे लाकररख देना।
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) - Next part miss mat karna
ब बहोत हि शानदार लाजवाब औऱ जबरदस्त अद्भुत मनमोहक एपसोड हें भइया आनंद आँ गय़ा
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