मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 36
कैबआकर ठीकघऱ केँ सामने रुकी। मे नीचे उतरा औऱ घूमकर मम्मी कि तरफ कां दरवाजा खोला। मम्मी जैसे हि बाहर् आई, मैंने सारा सामान नीचे उतारा औऱ ड्राइवर कों किराया देकर विदा किया। मम्मी उत्सुकता सें घऱ केँ आस-पास कां माहौल देखरही थि।
मे दो सूटकेस खींचते हुए दरवाजे कि तरफबढ़ा। तभी मम्मी नें तीसरा सूटकेस उठाने कि कोशिश कि। मैंने उन्हें प्रेम सें मना किया औऱ पास जाकर एक् हाथ सें सूटकेस खींचते हुए, दूसरे हाथ सें बड़ी सहजता केँ संग उनकाहाथ थाम लिया। मैंने धीरे-धीरे सें कहा—"चलो."
मम्मी नें बस एक् प्यारी सि मुस्कुराहट दि औऱ शर्माकर अपनी पलकें झुकालीं। मे उनकाहाथ पकड़ेहुए दरवाजे कि तरफ बढ़नेलगा। हम् दोनों हि खामोश थें, पऱ जब भि हमारी नज़रें मिलतीं, वोँ मुस्कुराहटें हमारे प्रेम कि गवाही दे देतीथीं। मां जबचलरही थि, तोँ उनके पायलों कि मीठी झंकार सन्नाटे कों औऱ भि खुशनुमा बनारही थि।
मैंने चाबी निकालकर दरवाजा खोला औऱ फिन मां कि तरफ देखा। मैंने धीरे-धीरे सें कहा—"नई बहू केँ घऱ मे कदम रखने सें पहले, यहा उनका स्वागत करने केँ लिएकोई औऱ तौ नहि हैं."
इतना कहकर मे थोड़ाठहर गय़ा। मम्मी मुझेदेख रही थि औऱ उनके होंठों पर्र एक् मीठी सि हंसीखेल रही थि। उन्होंने मुड़कर स्वयं हि घऱ केँ अंदरकदम बढ़ाना चाहा, पर्र मैंने उन्हें रोक लिया।
"रुक जाइए."
मम्मी नें पलटकर मेरीतरफ देखा। मैंने उनकी आँखों मे आँखें डालकर जैसे उनकेमन कि गहराई कों छूना चाहा, औऱ फिन बिल्कुल पास जाकर फुसफुसाया— "कोई नहि हैं तोँ क्याँ हुआ, मे स्वागत करूँगा। "
मां हैरानी भरी नज़रों सें मुझे देखती रही औऱ फिन मुस्कुराकर मेरेइस 'पागलपन' मे शरीक हौ गई। जब वो हंसी, तौ उनके गुलाबी होंठों केँ पीछे सें मोतियों जैसे चमकते दांतनज़र आए—वोउस लम्हा बला कि हसीनलग रही थि।
मेरादिल जैसे पिघलकर उनके कदमों मे बिछ गय़ा।
मे फुर्ती सें घऱ केँ अंदर गय़ा औऱ मां केँ सामने आकरखड़ा होँ गय़ा। वो अब भि समझ नहि पारही थि कि आखिर मेरेमन मे चल क्याँ रहा हैं औऱ मे उनका स्वागत किसतरह करने वाला हूं। मे दौड़कर अंदर कमरे मे गय़ा, एक् कलश कों चावलों सें लबालब भरा औऱ उसे लाकरघऱ कि दहलीज पऱ, ठीक उनके पैरों केँ पासरख दिया।
फिन, मे अपना दायां घुटना ज़मीन पर्र टिकाकर वहीं दरवाजे केँ पासबैठ गय़ा। मैंने अपना दाहिना हाथआगे बढ़ाया औऱ हथेली कां पिछला हिस्सा फर्श पऱ रख दिया, जबकि बायां हाथ मां कि तरफबढ़ा दिया। मेरी आँखों मे बेपनाह मुहब्बत थि औऱ चेहरे पऱ एक् चैनभरी मुस्कान।
मम्मी अपनी बड़ी-बड़ी आँखों मे हैरानी औऱ सरप्राइज लिएबस मुझे देखेजा रही थि। मे खामोश थां, पऱ मेरी खामोशी सभीकुछ कहरही थि। तभी अचानक मां कि आँखें भरआईं।
उनके होंठों पर्र एक् ऐसी मुस्कान खिली जोँ प्रेम औऱ अहसानमंदी सें भरी थि। देखते हि देखते उनकी पलकें भीगने लगीं औऱ होंठ धीरे-धीरे सें कांपने लगे। मे समझ गय़ा थां कि उनके भीतर भावनाओं कां कोई सैलाब उमड़पड़ा हैं, जिसकी गवाही उनकी वोँ नम आँखें औऱ कांपती हुइ मुस्कुराहट देरही थि।
मैंने बिल्कुल धीमी औऱ बेहद प्रेम भरी आवाज़ मे कहा—"आओ। "
ये सुनते हि मां नें अपना दाहिना हाथ उठाकर होंठों पऱ रख लिया। वो अपनी खुशी केँ आँसुओं कों छिपाने कि नाकाम कोशिश कररही थि, पर्र मेरी नज़रों सें कुछ भि छिप नहि पाया। मैंने एक् गहरी औऱ चैनभरी मुस्कान केँ संग माहौल कों हल्का किया औऱ फिन सें दोहराया— "आओ। "
तभी मां नें अपने दाएंपेर सें उसकलश कों धीरे-धीरे सें धकेला, जिससे उसमें भरे चावल जमीन पर्र बिखरगए। भारतीय संस्कृति मे एक् विवाहित महिला कां प्रवेश इसीतरह होता हैं—माना जाता हैं कि उनकेयह कदम ससुराल मे खुशहाली लाते हें औऱ वो घऱ कि 'लक्ष्मी' बनती हैं। मम्मी अब मेरी औऱ मेरेघऱ कि लक्ष्मी थि, मेरी पत्नि थि, तोँ उनका गृह-प्रवेश भि तौ इसी गरिमा केँ संग होना थां।
उन्होंने अपनाहाथ आगे बढ़ाकर मेराहाथ थाम लिया। जैसे हि मैंने उनकी उंगलियों कों अपनी गिरफ्त मे लिया, मां नें अपना पांवआगे बढ़ाया औऱ मेरी हथेली पर्र रख दिया।
उस लम्हा मैंने मन हि मनशपथ खाई—मे अपनी ज़िंदगी मे कभी उनके कदमों केँ नीचेकोई काँटा नहि आने दूँगा। अपने प्रेम सें उनकाहर मार्ग गुलाब कि पंखुड़ियों जैसाबना दूँगा। इसी अटूट वादे केँ संग मैंने उनकाघऱ मे स्वागत किया।
जैसे हि मम्मी घऱ केँ अंदरआई, मे खड़ा हौ गय़ा औऱ उनकाहाथ छोड़ दिया। वो अब भि एक् अद्भुत औऱ गहरे प्रेम भरी नज़रों सें मुझे हि निहारे जारही थि। उन्हें थोड़ासहज महसूस करवाने केँ लिए मैंने मुस्कुराते हुएकहा—
"Welcome, Mrs। Manju Hitesh Patel!"
मेरे बोलने केँ इस अंदाज़ पर्र उनकी गीली आँखें एक् प्यारी सि मुस्कान केँ संगचमक उठीं औऱ उन्होंने झेंपकर अपनी नज़रें झुकालीं। मे बाहर् गय़ा, सारा लगेज अंदर लाया औऱ दरवाज़ा बंदकर दिया। आज सें यही मम्मी कां घऱ थां, उनका छोटा सां संसार। उनके पति कां घऱ।
मां बस खामोशी सें खड़ी मुझेयह सभी करतेहुए देखरही थि। उनकी नज़रें घऱ केँ सामान पऱ नहि, बल्कि मुझ पऱ टिकीथीं। शायद वो भि मेरीइन नई अदाओं कों देखकर मुझे एक् नएरूप मे स्वीकार कररही थि। मुझेइस तरहदेख कर उनके चेहरे पर्र एक् सुखद आश्चर्य थां; यकीनन उनकेमन केँ भीतर भि मजा कां एक् तूफ़ान चलरहा होगा।
मैंने उनकी आँखों मे आँखें डालकर एक् धीमी मुस्कान दि औऱ आहिस्ता उनके लगभगबढ़ा। हमारी नज़रें एक्-दूसरे सें उलझी हुइ थीं औऱ हम् दोनों हि इसनए अहसास कि खुशी मे डूबेजा रहे थें। जब मे उनके बिल्कुल लगभग पहुंचा, तौ उनकी बड़ी-बड़ी आँखों मे वही बेपनाह प्रेम छलकरहा थां।
मैंने अपनी सारी हिम्मत बटोरी औऱ अपनाहाथ बढ़ाकर उनके दोनों कंधेथाम लिए। फिन उन्हें हल्के सें अपनीओर घसीटकर अपनी बाँहों मे भर लिया। मम्मी नें कोई विरोध नहि किया, बल्कि उन्होंने भि स्वयं कों पूरीतरह मुझ पऱ छोड़ दिया औऱ कसकर मुझेपकड़ लिया। उन्होंने अपनासिर मेरी छाती पऱ टिका दिया औऱ अपने दोनों हाथ मेरीपीठ पऱ लपेटलिए।
मैंने भि उन्हें अपनी बाहों केँ घेरे मे मज़बूती सें जकड़ लिया। हम् दोनों हि एक्-दूसरे केँ दिल कि तेज़ धड़कनों कों साफ़ महसूस करपारहे थें। कुछदेर हम् यूँ हि खामोश, एक्-दूसरे केँ आगोश मे सिमटे रहे। जैसे-जैसे लम्हा बीतरहे थें, हमारी साँसों कि रफ़्तार तेज़ होनेलगी।
मैंने झुककर, अपने होंठ उनकेकान केँ पास लेँ जाकर धीमे सें कहा— "I LOVE YOU। "
मम्मी मेरी बाँहों मे जैसे पूरीतरह पिघल सि गई औऱ बहोत हौले सें फुसफुसाकर बोलीं— "I LOVE YOU to। "
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 37
हम् दोनों केँ जिस्मों केँ बीच कि दूरियाँ अबमिट चुकीथीं। मैंने उन्हें अपनी बाहों केँ घेरे मे इतनी शिद्दत सें भींचा कि उनके शरीर पे उभरे बूब्स कि नरमी कों अपनी छाती पर्र महसूस करपारहा थां। उस छुअन केँ असर सें मेरा लौड़ा एक् बेलगाम घोड़े कि तरह मचलने लगा—जैसे जींस केँ अंदरकोई आतिशबाज़ी होँ रही होँ। हमारी उंगलियाँ एक् दूसरे कि पीठ पऱ एक् अनकही इबारत लिखरही थीं।
मैंने झुककर, उनके कानों केँ पास अपनी भारी होती आवाज़ मे फुसफुसाया, "अब भि वक़्त नहि आया क्याँ?"
मम्मी नें शरमाकर अपना चेहरा मेरी छाती मे औऱ गहराई सें छुपा लिया। उनकी मद्धम सि आवाज़आई, "कौन सां वक़्त?"
उनके जिस्म कि गर्माहट मेरे रोम-रोम मे उतररही थि। मैंने उन्हें स्वयं मे औऱ समेटते हुएकहा, "तुम् हमेशा हरबात पर्र कहती थि नं—वक़्त आने दीजिये। तोँ क्याँ वोँ वक़्तअब भि दूर हैं?"
मम्मी ख़ामोश थि, पऱ उनकी वो ख़ामोशी हज़ारों शब्दकह रही थि। उन्होंने जवाब देने केँ बजाय मुझे औऱ कसकरथाम लिया, मानो वो मुझमें हि कहीं विलीन होँ जानां चाहती हौ।
मैंने उनके अहसास कों अपनीरूह तक महसूस करतेहुए, प्रेम औऱ बेइंतहा जुनून केँ संगफिन सें पुकारा, "कहो नं मंजु."
कुछ लम्हों तक वक़्त जैसेठहर सां गय़ा। फिन उन्होंने हौसले जुटाए औऱ अपना चेहरा मेरी छाती सें थोड़ाअलग किया। मे महसूस करपारहा थां कि उनका पूरा वजूद एक् अनजानी सिहरन सें काँपरहा हैं। मेरे भीतर भि भावनाओं कां एक् तूफ़ान उमड़रहा थां, जिसने मेरे लौड़े कों फूलाकर एक् दम बड़ाकर दिया औऱ उसे गर्मी व उत्तेजना सें भर दिया थां।
मम्मी नें आहिस्ता अपनी गर्दन ऊपर उठाई। उनकी पलकें कसकरबंद थीं औऱ साँसें तेज़, जैसे किसी कशमकश मे हों। मे बस एकटक उन्हें निहार रहा थां—उनकी वो मासूमियत औऱ वो समर्पण। मेरा जिस्म अब शरीर कि गर्मी मे तपरहा थां। उन्होंने अपना चेहरा धीरे-धीरे धीरे-धीरे ऊपर करना शुरुआत किया, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थें।
उन होंठों पर्र हया औऱ चाहत कि एक् अनोखी जंगसाफ़ दिखरही थि। उन्होंने मेरे प्रश्न कां लफ्ज़ों मे कोई जवाब नहि दिया, बल्कि अपना चेहरा मेरीओर ऊपर उठाकर स्वयं कों पूरीतरह मुझे समर्पित कर दिया।
इस वक़्त मेरादिल किसी हथौड़े कि तरह सीने कि दीवारों पर्र चोटकर रहा थां। नसों मे दौड़ता पूराखून जैसे मेरे लौड़े मे ठहरकर जम गय़ा होँ, औऱ उसे किसी लोहे कि रोड सें भि सख्तबना रहा हौ। पूरी दुनिया बसउन थरथराते होंठों पऱ सिमटआई थि।
मम्मी अब पूरीतरह मेरे सामने सरेंडर कर चुकी थि। वो मात्र मेरी मां नहि, अब मेरी पत्नि भि थि। मैंने अपनाहाथ उनकीपीठ पऱ टिकाया औऱ उन्हें धीरे-धीरे सें अपनीओर खींचते हुए अपने होंठ उनके लगभग लेँ जानेलगा। मैने अपने एक् हाथ सें उनके चेहरे कों थाम लिया औऱ अपने अंगूठे उसे उनके गालों सें होतेहुए उनके होंठो कों छूनेलगा। जैसे हि हमारे चेहरे एक्-दूसरे केँ एकदमपास आए, हम् एक्-दूसरे कि गरम साँसों कों एक् दूसरे केँ चेहरों पऱ महसूस करपारहे थें।
मेरे अंदर एक् अजीब सि घबराहट औऱ बेचैनी थि, जिसने मुझे औऱ आगे बढ़ने केँ लिए उकसाया। औऱ फिन, मैंने अपने होंठ मम्मी केँ होठों पर्र रखदिए।
टच होते हि मम्मी कां पूरा जिस्म एक् झटके केँ संग काँपउठा। मेरी बाहों मे सिमटे उनकेउस कोमल औऱ हल्के जिस्म कि सिहरन मेरे सीने तक महसूस हौ रही थि। मेरे भीतर भि एक् तूफ़ान सां उठनेलगा। मैंने बहोत आहिस्ता सें अपना मुँह खोला औऱ उनके होठों कि नमी कों चूसने लगा। जब मेरे होठों कां गीलापन उनके होठों पे लगा, तोँ उन्होंने भि धीरे-धीरे सें अपना मुँहखोल दिया औऱ मुझे मार्ग दिया।
अगले हि समय, हम् एक्-दूसरे केँ होठों कों अपने होंठो केँ बीच दबाकर उन्हें बड़े प्रेम सें पीनेलगे। ये अहसास वैसा हि थां जैसेशहद कि बनी किसी बेहद नाज़ुक चीज़ कों होंठो सें चूसकर स्वाद लियाजा रहा होँ—इतनी सावधानी सें कि उनकाशेप औऱ साइज़ नं बिगड़जाए, औऱ इतनी शिद्दत सें कि कोई भि कतराछूट न् जाए। हम् बिल्कुल किसी न्यू लवर्स कि तरह एक्-दूसरे कों चख औऱ चूसकर अपना प्रेम जातारहे थें।
मम्मी केँ हाथ जौ अब तक मेरीपीठ पर्र थें, धीरे धीरेऊपर सरककर मेरे कंधों पऱ जमगए। मैंने अपने लेफ्ट हाथ सें उनकीपीठ कों सहलाना शुरुआत किया औऱ राइटहाथ सें उनकीकमर कों थामकर स्वयं कों बैलेंस किया। जुनून बढ़रहा थां; मैंने अपना मुँह औऱ खोलकर उनके पूरे होठों कों अपनी गिरफ़्त मे लें लिया औऱ उन्हें चाटने लगा। मेरीजीभ जब उनके होठों सें टकराई, तोँ उन्होंने भि कोई रेजिस्टेंस नहि दिखाया, बल्कि वो औऱ भि सहज होकर मेरासंग देनेलगी।
मम्मी जिसतरह मुझे "Kiss" कररही थि, वो मेरी लाइफ केँ बेस्ट मोमेंट्स मे सें एक् थां। अक्सर लोग समझते हें कि किस कां मतलब केवल होठों कां मिलना, उन्हें चूसना याँ उन्हें दबाना होता हैं, पर्र आजसमझ आया कि ये उससे कहीं बढ़कर हैं। मैंने सपनों मे नं जाने कितनी बारइसे इमेजिन किया थां, औऱ सपनों पऱ तौ अपना कंट्रोल होता हैं, हम् उन्हें जैसा चाहें वैसाबना सकते हें। पर्र हकीकत मे मम्मी कां ये "Kiss", उन हसीन सें हसीन सपनों सें भि कहीं अधिक गहरा औऱ जादुई थां।
मे तोँ जैसे एक् स्टेचू बनकररह गय़ा थां। कभी सोचा नहि थां कि एक् 'Kiss' मे इतना प्रेम औऱ इतनी शिद्दत हौ सकती हैं। अगर मम्मी केँ केवल चूमने मे इतना चमत्कार हैं, तोँ खुदाखैर करे, आगे तौ शायद मे सच मे किसी दूसरी दुनिया मे पहुँच जाऊँगा। मां केँ शांत स्वभाव केँ पीछे इतना प्रेम औऱ इतना जुनून छिपा हैं, येआज देखने कों मिला।
भले हि उनको बरसों बादये मौका मिला थां, मगर मम्मी कों कोई जल्दबाज़ी नहि थि। वो जिस 'Softness' केँ संग मुझेचूम रही थि, वो किसी कि भि जान लेने केँ लिए बहुत थां—एक् जानलेवा "Kiss"! मेरादिल जैसे चीख-चीख करकहरहा थां कि अपनी आँखें बंदकर लूँ औऱ बसइस अहसास मे डूब जाऊँ।
उनके होंठ मेरे होठों पर्र मक्खन कि तरह फिसलरहे थें। ऐसालग रहा थां जैसे हम् 'दो शरीर, एक् जान'बन गएहों। आज हमारे जिस्म नहि, बल्कि हमारी आत्माएं एक्-दूसरे कों प्रेम रहीथीं। मैंने अपनी ज़बान एक् बार उनके मुँह केँ अंदर डाली, जहाँ वो उनकी ज़बान सें जा टकराई। फिन मम्मी नें अपनी ज़बान मेरे मुँह मे सरकाई औऱ मैंने उन्हें अपने होठों केँ बीच भरकर चूसना शुरुआत किया।
उफ़! क्याँ स्वाद थां। जैसेशहद औऱ रूहानी चैन कां कोईमेल होँ। बहुतदेर तक उनकी ज़बान कां रस पीने केँ बाद मैंने अपनीजीभ उनके मुँह मे डाली। अब मां कि बारी थि, औऱ वो पूरीतरह मग्न होकर चूसचूस कर मेरी ज़बान कां स्वाद लेनेलगी। फिन मैंने अपनीजीभ निकालकर उनकेऊपर वाले होंठ कों चूमना औऱ चूसना शुरुआत किया। हमारा किस लम्हा-दर-समय औऱ भि गहरा (Intense) होताजा रहा थां।
हम् दोनों केँ हाथों कि हलचल एक्-दूसरे कों बतारही थि कि हम् कितने उत्तेजित होँ चुके हें। मेरी ज़िंदगी कां ये पहलाकिस थां, औऱ वो भि मेरी अपनी मम्मी केँ संग! मां भि लगभग 18 सालबाद किसी मर्द कां ऐसा स्पर्श पाकर मेरी बाहों मे मोम कि तरह पिघलरही थि। हमारे बदन केँ बीचअब इतनी भि स्थान नहि बची थि कि हवा गुज़र सके।
मेरा लण्ङअब उनके जिस्म पऱ टकराते हुए उन्हें येजता रहा थां कि मे अब औऱ इंतजार नहि कर सकता। मेरा लौड़ा अपनीउस पसंदीदा स्थान पऱ जाने केँ लिए बेताब थां, जहां सें वोँ दुनिया मे आया थां।
जिसकी चाहतहर मर्दहर बेटे कों होती हैं। मम्मी भि मेरेमन कि तड़प औऱ मेरे जिस्म कि ज़रूरत कों बखूबी समझरही थि। वो अब पूरीतरह, तन औऱ मन सें, अपने बेटे औऱ अब पति केँ सामने सरेंडर करने केँ लिए रेडी थि।
जुनून अपनेचरम पर्र थां कि तभी अचानक फोन कि रिंगबजी। पहले तोँ हम् उसनशे मे इतने डूबे थें कि सुनाई हि नहि दिया, पर्र कुछदेर बादउस लगातार बजती घंटी नें हमेंइस जादुई दुनिया सें घसीटकर वापस हकीकत कि ज़मीन पर्र पटक दिया।
DM mai And Don't do this, you can't just post anything too other writers kahaniyan if don't want too read their kahaniyan. This iss your last warning if you do this again I will report you.
मै भि जिन्दा हूं पऱ कोई मुझे पूछता हि नहि. अब तौ पता हि लगरहा मै जिन्दा हूं याँ मर गई
Watch my new kahani https://xforum.live/threads/malkin-%F0%9F%91%B8banne-k-liye-kee-apne-hi-bete-say-shadi-%F0%9F%91%B0%E2%80%8D%E2%99%80.209523/page-3
Kya baat h.mummy or bete main panapti mohabbat ko mukam hasil hu rahaa h.bass ek guzarish h- mummy bete k milan k time bi unki nazar or hoshohawas main bi ye milan mummy-bete kaa hu naa kee miya-biwi kaa.
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) – New Episode
Update 38
नानीमा कां मोबाइल थां। आज मेरी औऱ मां कि ज़िंदगी कां वो पहला 'Kiss' केवल एक् छुअन नहि, एक् रूहानी अहसास थां। हम् उससुख औऱ चमत्कार कि गिरफ्त मे इसकदर खोएहुए थें कि उससे बाहर् आने मे हमें थोडा समयलग रहा थां। फोन कि रिंगटोन कानों मे पड़ तौ रही थि, पऱ ऐसा महसूस हौ रहा थां जैसे वो आवाज़ किसी बहोत दूर कि दुनिया सें आँ रही हौ, जबकि हम् दोनों तोँ कहीं औऱ हि पहुँच चुके थें।
हम् एक्-दूसरे सें इसकदर लिपटे हुए थें कि रूह औऱ शरीर केँ बीच कां फर्कमिट गय़ा थां। आँखें बंदथीं, साँसें तेज़थीं औऱ हम् दोनों केँ भीतर एक् मीठा सां कंपन हौ रहा थां। हमारी पकड़ मे वोँ मज़बूती थि जैसे हम् एक्-दूसरे सें कभी जुदा न् होने कि शपथखा रहेहों। अपनी ज़बान औऱ होठों केँ ज़रिए हम् अपनी बरसों कि दबी हुइ मुहब्बत कां इज़हार कररहे थें। मम्मी केँ उन गुलाबी औऱ मखमली होठों कां नशा मेरेसर चढ़कर बोलरहा थां।
हमारे इस पहले शारीरिक स्पर्श (Physical Touch) सें जौ उत्तेजना पैदा हौ रही थि, उससे कहीं ज्यादा गहरा वो अहसास थां जोँ हमारे दिलों मे एक्-दूसरे केँ लिए थां औऱ वोँ भि क्यूं नं हम् सगे मम्मी बेटे जोँ थें। हम् अपनेइस नए रिश्ते कि बुनियाद उस प्रेम औऱ भरोसे पर्र रखरहे थें, जिसका इंतजार हमें सालों सें थां। मम्मी अब पूरीतरह अपने बेटे, अपने पति केँ सामने सरेंडर कर चुकी थि।
जैसे हि मैंने बहोत भारीमन सें अपने होठों कों उनके होठों सें अलग किया, मम्मी नें धीरे-धीरे सें अपनी पलकें उठाईं। उनकी आँखों मे इश्क औऱ एक् अनकही प्यास साफ़ नज़र आँ रही थि। उनके चेहरे पऱ एक् ऐसी अलौकिक खुशी औऱ नूर थां जिसे शब्दों मे बयान करना नामुमकिन हैं। उन्होंने अब भि मेरे कंधों कों अपनी उंगलियों सें कसकरथाम रखा थां।
उनकी आँखों मे डूबेहुए हि, मैंने एक् हाथ सें उनकीपीठ कों सहारा दिया औऱ दूसरे हाथ सें पॉकेट सें फोन निकाला। तब जाकर मां कों समझआया कि मैंने हमारे प्रेम कि इस पहली निशानी, इस पहले kiss कों बीच मे क्यूं रोका थां। बात समझते हि वो लज्जा सें पानी-पानी होँ गई। उन्होंने एक् बार मेरीतरफ देखा, उनकी नज़रों मे हया थि, फिन वो एक् हसीन मुस्कुराहट केँ संग अपनी नज़रें झुकाकर झट सें मुझसे अलग हुइ औऱ दूसरी तरफ मुड़कर जानेलगी।
मैंने स्क्रीन पर्र नानीमा कां नाम देखा औऱ मां कों दूर जातेहुए देख मुस्कुराते हुए मोबाइल कान सें लगाया, "हेलो नानीमा जी। बोलिये। "
मेरी आवाज़ सुनते हि उधर सें नानीमा हँस पड़ीं। मगरयहा मेरादिल तबठहर गय़ा जब मम्मी नें जाते-जाते मुड़कर एक् अंतिम बार मुझे देखा। उनकीउन आँखों मे जौ प्रेम कि झलक थि औऱ होठों कों दबाकर जोँ उन्होंने एक् प्यारी सि स्माइल दि, वो मंज़र मे इस ज़िंदगी मे क्याँ, अगलेसात जन्मों तक नहि भूल पाऊँगा।
उनकी वो अंतिम नज़र मेरे सीने मे किसीतीर कि तरहउतर गई थि। मेरे भीतर जैसे एक् लहर सि उठी औऱ भारी होता मेरा सीनाअब हल्का महसूस होनेलगा। मे अभि भि उनकेउस जादुई असर सें बाहर् निकल हि रहा थां कि उधर सें नानीमा कि हँसती हुईँ आवाज़आई—
"क्याँ अभि भि मे तुम्हारी 'नानीमा' हि बनी रहूँगी?"
उनकीबात सुनते हि मे झट सें हकीकत कि दुनिया मे वापसआया। सिचुएशन कों संभालते हुए मेरे मुँह सें बस इतना निकला, "नहि नहि। एक्चुअली."
मे रुक गय़ा। शब्दों नें जैसे मेरासंग छोड़ दिया थां। समझ हि नहि आँ रहा थां कि क्याँ बोलूँ औऱ अपनीबात कहां सें शुरुआत करूँ। मां, जोँ मुझसे दूर जाकरअब खिड़की केँ पर्दे हटारही थि, उनका पूरा ध्यान मेरी बातों पर्र हि थां। नानीमा केँ सामने मेरीइस हालत कों देखकर उन्हे मज़ा आँ रहा थां। मैंने स्वयं कों संभाला औऱ बात घुमाते हुएकहा—
"हाँ। माँ, बोलिए। "
'माँ' कहतेहुए मुझे थोड़ी सि झिझक औऱ लज्जा महसूस हुईँ। मैंने तिरछी नज़रों सें मम्मी कों देखा, वो अब भि अपनी मुस्कुराहट कों दबाएहुए खिड़की खोलने कि कोशिश कररही थि।
नानीमा नें उधर सें पूछा, "तुम् लोग पहुँच गए क्याँ?"
मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "जी हाँ.बस अभि-अभि घऱ मे एंट्री ली हैं। "
मां कों चूमते वक़्त मेरे अंदर जौ तूफ़ान औऱ जुनून उमड़रहा थां, वो अब आरामसे शांत हौ रहा थां। मेरा लौड़ा, जौ अब तक किसीरोड कि तरह सख्त होकर मेरी पैन्ट मे सें भि मां कों अपनेपेट मे महसूस होँ रहा होगा, अब अपनी सख्ती कमकररहा थां।
उधर मोबाइल पऱ नानीमा, नानाजी कों बतारही थीं कि हम् खैरियत सें पहुँच गए हें। फिन उन्होंने मुझसे पूछा, "जर्नी मे कोई तकलीफ़ तौ नहि हुई नं बेटा? सामान वगैरह लेकरआने मे?"
मैंने उन्हें तसल्ली दि, "नहि मां, ट्रेन भि बिल्कुल वक्त पऱ थि औऱ यहा तक आने मे भि कोई दिक्कत नहि हुई। "
बात करते-करते मैंने गर्दन घुमाकर मां कों देखा। वो पूरेघऱ कों बड़ी गहराई औऱ दिलचस्पी सें निहार रही थि—रसोई, ड्राइंग रूम, डाइनिंग औऱ फिन बेडरूम। उनकी आँखों मे एक् चमक थि; वो शायद अपनेइस नए संसार कों, अपनेइस नए आशियाने कों समझने कि कोशिश कररही थि।
मैंने नानीमा सें पूछा, "बापू क्याँ कररहे हें?"
नानीमा केँ जवाब देने केँ अंदाज़ मे एक् ऐसी खामोशी थि जिसने मुझे जल्दी बेचैन कर दिया। वो बोलीं, "औऱ पूछोमत बेटा." उनकेगले कि उस भारी आवाज़ कों सुनकर मेरादिल बैठ गय़ा। मैंने जल्दी घबराकर पूछा, "क्यूं? क्याँ हुआ?"
पूछते हुए मे थोड़ा सां मुड़ा औऱ मम्मी कि तरफ देखा, पर्र वो तब तक बेडरूम केँ अंदरजा चुकी थि। नानीमा नें आगे बताया, "सुभहजब तुम् लोगों सें मोबाइल पर्र बात हुई तब तौ वो ठीक थें, मगर ब्रेकफास्ट करने केँ बाद अचानक उन्हें उल्टियाँ होने लगीं। "
ये सुनकर मेरे माथे पर्र चिंता कि लकीरें उभरआईं। "अरे! डॉक्टर कों दिखाया कि नहि?" मेरे स्वर मे जौ डर औऱ फिक्र थि, शायदउसे सुनकर मम्मी वापस आँ गई। जब मैंने दोबारा बेडरूम कि तरफ देखा, तौ वो दरवाजे केँ पासखड़ी मुझेदेख रही थि। वो खामोश थि, पर्र उनकी आँखों सें साफ़ थां कि वो हमारी बातचीत कां अंदाज़ा लगाने कि कोशिश कररही हैं।
मे मम्मी कि तरफ देखते हुए नानीमा कि बात सुनता रहा। वो कहरही थीं, "नहि बेटा, डॉक्टर कों नहि बुलाया। थोड़ा आराम करने केँ बाद उन्हें बेहतर लगा तौ बातटाल दि। पिछले तीन-चार दिनों सें तुम् तोँ देख हि रहे हौ कि कितना हेक्टिक शेड्यूल (भागदौड़) रहा हैं, इसलिये आज उन्होंने दिनभर रेस्ट किया। अब बहुत अच्छा महसूस कररहे हें। "
मेरे चेहरे पऱ अपने सासू-ससुरजी (नानाजी-नानीमा) कि सेहत कों लेकर जौ चिंता आई थि, मां नें उसेदूर सें हि पढ़ लिया। वो मेरी बातें सुनकर कुछ-कुछ अंदाज़ा लगा चुकी थि औऱ आँखों मे ढेर सारे प्रश्न लिए शांत कदमों सें मेरीतरफ बढ़नेलगी।
नानीमा अपनीबात जारी रखतेहुए बोलीं, "औऱ मेरीबात कभी सुनते हें क्याँ तुम्हारे नानाजी? कितनी बार डॉक्टर नें सिगरेट केँ लिए सख्ती सें मना किया हैं, पऱ। छुप-छुप करपी हि लेते हें। "
नानीमा अब नानाजी कि शिकायत कररही थीं, औऱ उनकीबात सच भि थि। जब सें नानाजी बीमार पड़े थें, हम् सब उनकी सेहत कों लेकरडरे रहते थें। बातें करते-करते नानीमा इतनी भावुक हौ गई थीं कि वो भूल हि गईं कि अब हमारा नाताबदल चुका हैं, औऱ उन्होंने मेरे सामने पिताजी कों 'नानाजी' कहकर हि संबोधित किया।
मुझेसाफ समझ आँ रहा थां कि जिसतरह मां औऱ मे पति-पत्नि केँ इसनए रिश्ते कों पूरीतरह अपनाने केँ लिए अपनेमन मे एक् कशमकश सें गुजररहे हें, वैसे हि नानाजी-नानीमा केँ लिए भि सालों पुराने रिश्ते कि पहचान बदलना इतना आसान नहि थां। शायद इसीलिए नानीमा केँ मुंह सें नानाजी केँ लिए 'नानाजी' शब्द हि निकला। मे चुपचाप उनकी बातें सुनता रहा।
तभी नानीमा नें पूछा, "मम्मी कहां हैं?" मैंने पासआती मम्मी कि तरफ देखते हुएकहा, "यहीं हैं। "
मां अब मेरे बिल्कुल लगभग आँ गई थि। उनकी मांग मे सजा सिंदूर, गले कां मंगलसूत्र औऱ हाथों कि गहरी मेहंदी—उन्हे इसघऱ मे एक् पत्नि केँ रूप मे चलते-फिरते देख मेरेमन मे खुशी कि एक् अद्भुत लहरदौड़ रही थि। पर्र इस वक़्त उनके चेहरे पर्र एक् प्रश्न केँ संग-संग जौ बेचैनी औऱ फिक्र थि, उसमें मुझेवही पुरानी मम्मी नजर आई—एक् आदर्श बेटी औऱ एक् ममतामयी मम्मी, जिसे मे बचपन सें देखता आया हूं।
विवाह केँ बाद मेरी पत्नि बनने पर्र भि उनके भीतर कि वो सादगी औऱ संवेदनाएं वैसी हि थीं। ये देखकर मेरादिल उनकेलिए औऱ भि ज़्यादा पसीजने लगा। तभी दूसरी तरफ सें नानीमा बोलीं, "ज़रा मां कों मोबाइल देना। "
मैंने हाथ बढ़ाकर मोबाइल मां कों थमा दिया। उन्होंने बड़ी फिक्र केँ संग मोबाइल कान सें लगाया औऱ पूछा, "क्याँ हुआ मां?" फिन वो नानीमा सें बात करनेलगी। बात करते-करते वो खिड़की कि तरफबढ़ गई। बाहर् अभि पूरीतरह अंधेरा नहि हुआ थां। गर्मियों कि उस ढलतीसाम कि नारंगी रोशनी चारों तरफ फैली थि, जोँ खिड़की केँ पासखड़ी मम्मी केँ चेहरे कों सहलारही थि।
मे मां कों गौर सें देखरहा थां। जैसे-जैसे नानीमा सें उनकीबात आगेबढ़ी, उनके चेहरे पर्र पसरी चिंता कि स्थान आहिस्ता राहत लेनेलगी। उस ढलतीसाम कि रंगीन रोशनी केँ साये मे मां कां चेहरा किसी अलौकिक सौंदर्य कि तरह निखरउठा थां।
मे कुछदूर खड़ा मां कों नानीमा सें बात करतेहुए देखरहा थां, औऱ सच कहूँ तौ मेरादिल उनकेलिए बेतहाशा प्रेम औऱ खिंचाव सें भरउठा थां। उनकी साड़ी उनकेबदन पऱ इतनी सलीके सें औऱ टाइट लिपटी हुईँ थि कि उनके शरीर केँ हर उतार-चढ़ाव (Curves) मेरी नज़रों केँ सामने पर्वतों कि तरहउभर रहे थें। मे बस वहींखड़ा उन्हे निहारता रहा—जैसे-जैसे वो नानीमा सें बात करतेहुए रिलैक्स हौ रही थि, उनके चेहरे पऱ खिली वो बेफ़िक्र मुस्कान मुझेफिन सें उसी तूफ़ान कि तरफ धकेलरही थि।
खिड़की केँ पास 'Profile' मे खड़ी मां किसी पेंटिंग जैसीलग रही थि। उनके सूडोल बूब्स, तराशा हुआ सपाटपेट, पतलीकमर औऱ उनलीगोल औऱ लुभावनी गांड उनके जिस्म कि सुडौलता नें मेरेमन मे एक् अजीब सि सिहरन (Sensation) पैदाकर दि। मेरे लौड़े कि गर्मी एक् बारफिन अपनीअकड़ दिखाने लगीथीं।
स्वयं कों संभालने केँ लिए मैंने दरवाज़े केँ पासरखे हमारे तीन सूटकेस अंदर लेँ जाने कां फैसला किया। मैंने बड़ा सूटकेस उठाया औऱ उन्हे बेडरूम मे लेँ जाकररखा। फिनजब मे दूसरा सूटकेस लेकरजा रहा थां, तब मेरीनज़र मां पऱ पड़ी। वो अब पहले सें कहीं ज़्यादा खुश औऱ सहजलग रही थि।
जब मे तीसरा औऱ छोटा सूटकेस उठाने केँ लिए झुका, तभी मां कि आवाज़आई, "ठीक हैं। हाँ, देती हूं। "
वो मुस्कुराते हुए मेरीतरफ मुड़ी औऱ पासआने लगी। मैंने भि बिनाकुछ कहेबस एक् प्यारी सि स्माइल उन्हे वापस दि। उन्होंने अपनाहाथ बढ़ाकर मुझे मोबाइल पकड़ाया। मैंने मोबाइल कान सें लगाया औऱ उत्साह मे कहा, "जी माँ, बोलिए। "
तभीउधर सें नानाजी कि भारी आवाज़ गूँजी, "नहि बेटा, मे बोलरहा हूं। "
मेरीइस बेवकूफी औऱ हड़बड़ाहट कों देख मां खिलखिलाकर हँसपड़ी। उनकी वो हँसीउस कमरे मे म्यूज़िक कि तरह गूँज गई।
मे शर्मिंदा सां होकर नानाजी जी सें बात करनेलगा, औऱ इसीबीच मम्मी नें मेरेहाथ सें वो सूटकेस लिया औऱ स्वयं हि उसे खींचते हुए बेडरूम कि तरफचली गईं।
मम्मी औऱ बेटे नें घऱ बसाया(सच्ची घटनाओं पऱ आधारित) - Aage kya hua? Next part padhiye
Mast update h.bass guzarish kaa khayal rakhna.ye milan mummy-bete kaa milan rehne dena unki baaton or smazne main bi na kee miya-biwi kaa milan.mummy kee mamta or bete kee kamukta kaa behtreen sangam karwa dena.plz continue writing
Relavant source : click here
























