♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
Behad hi shandaar aur jabardast update bhay.
bhut khoob superb.
tm too maar hi daloge bhay.
Itna khatarnaak update bhay.
halanki mzaaaa aa gya bhay waah.
Flashback Ko Yun hi sath hi लेकर aage badho bhay parantu flashback थोड़ा juldi nipta Dena bhay.
Vidhi के saath joo bi हुआ बहुत hi sharmnak हुआ.
Kya iska pta Viraj ko nhin lagega ??
Kya o apni vidhi kaa badla nhin lega ??
aur isilye,
Aage kaa intjar
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 30 》
अब तक,,,,,,,,,
"क्याँ तुम्हें मेरा यहाॅ आनां अच्छा नहि लगा विजय?" प्रतिमा नें दुखीभाव कां नाटक करके कहा___"क्याँ मे यहाॅ नहि आँ सकती?"
"न् नहि भाभीऐसी कोईबात नहि हैं। " विजय नें हड़बड़ाकर कहा___"मे बसइसलिए ऐसाकह रहाहूॅ क्योंकि तेज़धूप औऱ गर्मी बहोत हैं। ऐसे माहौल कि आपकोआदत नहि हैं नां?"
"देखो विजय तुम् भि नैना कि तरह मुझे तानामत मारने लग जानां। " प्रतिमा नें कहा__"तुम् सभी मुझेऐसा कहकर दुखी क्यूं करते होँ? मेरा भि दिल करता हैं कि मे भि तुम् सबकीतरह यहसभी करूॅ। मगर तुम् सभी अपनीइन बातों सें मुझेयह सभी करने हि नहि देते। मे हि पागलहूॅ जोँ बेकार मे इस हवेली केँ लोगों कों अपना मानती हूॅ औऱ चाहती हूॅ कि सभी मुझे भि अपना समझें। "
"यह आप् क्याँ कहरही हें भाभी?" विजय हैरान परेशान सां बोला___"भला हम् सभी आपकेलिए ऐसा क्यूं सोचेंगे? माॅ बाबूजी केँ बाद आप् दोनो हि तौ हम् सबसे बड़ी हें इसलिए हम् सभीयही चाहते हें आप् कुछ नां करें बल्कि आहिस्ता बैठकर खाइये औऱ हम् छोटों कों सेवा करने कां क़िस्मत प्रदान करें। "
"बस बससभी समझती हूॅ मे। " प्रतिमा नें तुनकते हुए कहा__"अब क्याँ यहीं पऱ खड़े रहेंगे याँ अंदर भि चलेंगे? चलिए अंदर औऱ हाॅ हाॅथमुह धोकर जल्द सें आइये। तब तक मे थाली लगाती हूॅ। "
"जी ठीक हैं भाभी। " विजय नें कहा औऱ बाहर् कि तरफबढ़ गय़ा। जबकि प्रतिमा अंदर कि तरफबढ़ गई।
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अबआगे,,,,,,,,,,,
फ्लैशबैक आगे_______
थोड़ी हि देर मे विजय सिंह हाॅथमुह धोकरआया औऱ जैसे हि वो अंदर एक् बड़ेहाल सें होतेहुए एक् कमरे मे दाखिल हुआ तौ बुरीतरह चौंका। कारण कमरे केँ अंदर प्रतिमा लकड़ी कि एक् बेन्च पर्र झुककर टिफिन सें खानां निकाल निकाल करउसे अलगअलग करकेरख रही थि। लेकिन झुकने कि वजह सें उसकी साड़ी कां आॅचल कंधे सें खिसककर ज़मीन पर्र गिराहुआ थां। उसने आॅचल कों आलपिन केँ सहारे ब्लाउज पऱ फसाया हुआ नहि थां। ऐसा उसने जानबूझ कर हि किया थां। ताकि वो जब चाहे बड़ी आसानी सें झुककर अपना आॅचल गिराकर विजय कों अपनी खरबूजे जैसी बड़ी बड़ी लेकिन ठोस चूचियाॅ दिखासके। उसने जौ ब्लाउज पहना थां वो बड़ेगले कां थां, पीठ पऱ भि बहुत अधिक खुलाहुआ थां। अंदर ब्रा नाँ होने केँ कारण उसकीआधे सें ज़्यादा चूचियाॅ दिखरही थि। वो जानती थि कि विजयहाथ मुह धोकर आँ चुका हैं औऱ अब वो कमरे केँ दरवाजे केँ पास उसके द्वारा दिखाए जाने वाले हाहाकारी नज़ारे कों देख एकदम सें बुतबन गय़ा हैं।
प्रतिमा बिलकुल भि ज़हिर नहि कररही थि कि वोँ यहसभी जानबूझ कररही हैं। बल्कि वो यही दर्शा रही थि कि उसे अपनी हालत कां पता हि नहि हैं। उसने एक् बार भि सिरउठा कर दरवाजे पऱ खड़े विजय कि तरफ नहि देखा थां। बल्कि वो उसीतरह झुकी हुईँ टिफिन सें खानां निकाल करअलग अलगरख रही थि।
विजय सिंह मुकम्मल मर्द थां लेकिन उसमें शिष्टाचार औऱ संस्कार कूटकूट करभरे हुए थें। उसे अपने सें बड़ों कां आदर सम्मान करना हि आता थां। अपनी पत्नि केँ अलावा वो किसी भि महिला पर्र ऐसी नज़र नहि डालता थां। खेतों पऱ काम करने वालीहर ऊम्र कि औरतें भि थि मगर मजाल हैं जौ विजय सिंह नें कभीउन पऱ गंदी नज़र डाली हौ। यह तौ फिन भि उसकीसगी भाभी थि। कहते हें बड़ी भाभीमाॅ समान होती हैं, उस पऱ गंदी दृष्टि डालना पाप हैं।
विजय सिंह कों जल्दी हि होशआया। वो एकदम सें हड़बड़ा गय़ा औऱ संग हि उसके अंदर अपराध बोझ सां बैठता चला गय़ा। उसकामन भारी होँ गय़ा। अपने ज़हन सें इस दृष्य कों जल्दी हि झटक दिया उसने। मन हि मन ईश्वर सें हज़ारों बार तौबा कि उसने। उसकेबाद वो बेवजह हि खाॅसते हुए कमरे केँ अंदर दाखिल हुआ। उसका खाॅसने कां तात्पर्य यही थां कि उसकी भाभी उसके खाॅसने कि आवाज़ सें अपनी स्थिति कों सम्हाल लें। मगर विजय कि हालतउस टाइम ख़राब हौ गई जब उसके खाॅसने कां प्रतिमा पऱ कोईअसर हि नं हुआ। बल्कि वो तौ अभि भि यही ज़ाहिर कररही थि कि उसे अपनी हालत कां पता हि नहि हैं। उसने तौ जब विजय कों देखा तौ बसयही कहा___"लो विजय मैने तुम्हारा लजीज भोजनअलग अलग करकेलगा दिया हैं। चलो शुरुआत होँ जाओ, देख लो अभि गरमा गर्म हैं। "
विजय कों सिर झुका चुपचाप बेन्च केँ इसतरफ हि रखी कुर्सी पर्र बैठ गय़ा औऱ चुपचाप खानां खानेलगा।
"स्स्स विजय यहाॅ खेतों मे इस गर्मी मे भि कितनी मेहनत करते होँ तुम्। " प्रतिमा नें अहह सि भरतेहुए कहा___"पऱ शायद तुम्हारी इस सबकीआदत होँ गई हैं। इसलिए तुम् पऱ जैसेकुछ फर्क हि नहि पड़ता। मेरा तौ गर्मी केँ मारे बुराहाल हुआजा रहा हैं। ऐसा लगता हैं जैसे सारे कपड़े उतारकर फेंकदूॅ अभि। "
प्रतिमा कि इसबात सें विजय सिंह कों ठसकालग गय़ा। वो ज़ोर ज़ोर सें खाॅसने लगा।
"अरे क्याँ हुआ धीरे-धीरे खाओ विजय। " प्रतिमा मन हि मन मुस्कुराई थि।
उसे खाॅसता देख प्रतिमा जल्दी हि एक् तरफ मटके मे रखे पानी कों ग्लास मे भरकर ग्लास विजय केँ मुह सें लगा दिया। विजय कि नज़र एक् बारफिन सें प्रतिमा केँ खरबूजों पर्र पड़ गई। इसबार तोँ वो उसके बहोत हि पास थि। उसके खरबूजे विजय कि आॅखों सें बस एक् फुट हि दूर थें। इतनेपास सें वो उन्हें स्पष्ट देखरहा थां। गोरे गोरे खरबूजों पऱ एक् एक् लेकिन छोटा सां तिल जोँ उन्हें औऱ भि ज़्यादा रसदार व हालत कों खराब करने वालाबना रहा थां। प्रतिमा इस सारी क्रिया मे यही दर्शा रही थि कि उसे अभि भि अपनी हालत कां कुछपता नहि हैं। औऱ इसबार तोँ जैसे वो फिक्रवश ऐसाकर रही थि।
बड़ी मुश्किल सें विजय केँ गले सें पानी नीचे उतरा। उसे कुछसमझ नहि आँ रहा थां कि वो क्याँ करे?आज पहलीबार वो ऐसी सेचुएशन केँ बीच फॅसा थां। विजयजब पानीपी चुका तौ प्रतिमा नें भि उसकेमुख सें ग्लास हटा लिया, हलाॅकि यह उसकी मजबूरी हि थि। क्योकि अगर वोँ ऐसा नं करती तोँ विजय कों शक भि होँ सकता थां कि वो इसतरह उसके इतनेपास झुकी क्यूं हैं?
लेकिन विजय सिंह पर्र रहम तोँ उसने अभि भि नहि किया। वो अभि भि अपना आॅचल गिराए हुए हि थि। अंदाज़ वहीं थां जैसेउसे इसकापता हि नं होँ। वो जानती थि कि विजयउसे इसतरह देखकर बहोत अधिक असहज महसूस कररहा हैं।
उसकेमन मे आया कि कहीं विजययह नं सोच बैठे कि मुझे अपनी हालत कां इतनेदेर सें पता क्यूं नहि होँ रहा? याँ फिनऐसा मे जानबूझ करउसे दिखारही हूॅ। अगर विजय कों यहशक होँ गय़ा याँ उसनेऐसा महसूस कर लिया तोँ काम पहले हि ख़राब होँ जाएगा। जबकि मुझेयह सभी बहोत आगे तक करना हैं। शुरुआत मे इतना ज़्यादा दिखावा ठीक नहि होगा। यह सोचकर हि वो सम्हल गई।
"हायरे दैया। " उसने चौंकने औऱ सकपकाने कि बड़ी शानदार ऐक्टिंग कि___"मेरा आॅचल केसेगिर गय़ा। "
इतनाकह कर उसने जल्द सें अपने आॅचल कों पकड़कर उसे अपने खरबूजों ढॅकते हुए कंधे पऱ डाल लिया। फिन जैसे उसने माहौल कों बदलने कि गरज सें विजय सें कहा___"कल सें मे तुम्हारे लिएदूध भि लें आया करूॅगी विजय। "
"ज जी,,,,। " विजय बुरीतरह चौंका थां___"दू दूध.मगर किसलिए भाभी?"
"तुम् भि हद करते होँ विजय। " प्रतिमा नें कहा___"खेतों मे रातदिन इतनी मेहनत करते होँ औऱ रूका सूखा खाओगे तौ कमज़ोर नहि पड़ जाओगे? इसलिए मेहनत केँ हिसाब सें उसतरह कां आहार भि लेना चाहिए। "
"भाभी, इसकीकोई ज़रूरत नहि हैं। " विजय नें झिझकते हुए कहा___"औऱ वैसे भि मुझेदू दूध पसन्द नहि हैं। "
"क्याऽऽ????" प्रतिमा नें चौंकने कां नाटक किया___"हे ईश्वर! केसे व्यक्ति होँ तुम् विजय? तुम्हें दूध नहि पसन्द?? अरेदूध केँ लिए सारी दुनियाॅ पागल हैं। "
"क्याँ मतलब???" विजय गड़बड़ा गय़ा, बोला___"भला इसकेलिए सारी दुनियाॅ केसे पागल हौ सकती हैं???"
"तुम् भि नां बुद्धू केँ बुद्धू हि रहोगे। " प्रतिमा नें बुरा सां मुह बनाया___"यह बताओ कि आजकलदूध केँ बिना किसी कां गुज़ारा हैं क्याँ? नहि नां? सुभह उठते हि सबसे पहलेदूध कि हि बनीगरम चाय चाहिए होती हैं। औऱ इतना हि नहि बल्कि एक् दिन मे कम सें कमचार बार व्यक्ति गरमचाय पीता हैं। बाॅकी बहोत सि चीज़ें जौ दूध सें हि बनती हें उनका तोँ हिसाब हि अलग हैं। अबजबयही दूध किसी कों नं मिलो तौ सोचो दुनिया पागल होँ जाएगी कि नहि?"
"हाॅयह तौ हैं। " विजय नें कहा।
"इसी लिए कहतीहूॅ। " प्रतिमा नें कहा__"कल सें तुम्हारे लिएदूध लाया करूॅगी औऱ फिन मे स्वयं हि तुम्हें दूध पिलाऊॅगी। देखूॅगी केसे नहि पियोगे तुम्?"
विजय सिंह कि हवाशंट। वो हैरान परेशान सां प्रतिमा कों देखने लगा। जबकि उसकीइस हालत कों देखकर प्रतिमा मन हि मनहॅस रही थि। लेकिन प्रत्यक्ष मे यही दिखारही थि वोँ यहसभी उसकी सेहत कां ध्यान मे रखकरकह रही थि। पऱ चूॅकि इन बातों मे उसकेदो अर्थ निकलरहे थें जोँ विजय सिंह कों असमंजस मे डालकर असहजकर रहे थें।
"क्याँ हुआचुप क्यूं हौ गए विजय?" प्रतिमा नें कहा___"दूध कि बातों सें तौ नहि घबरागए तुम्?"
"नं न् नहि तोँ। " विजय सकपका गय़ा।
"देखो विजय। " प्रतिमा नें कहा___"तुम् जौ मेहनत करते हौ उसकेलिए दूधघी कां सेवन करना बहोत ज़रूरी हैं। वरना बुढ़ापे मे किसीकाम केँ नहि रह जाओगे तुम्। आज गौरी कों भि बोलूॅगी कि तुम्हारे खाने पीने कां अच्छी तरह सें ख़याल रखाकरे। अभि जब तक बच्चों कि छुट्टियाॅ हें तब तक मे रोज़ाना तुम्हें स्वयं अपनेहाथ सें टिफिन सजधजकर करके लाऊॅगी। "
"आँ आप् तौ बेवजह परेशान हौ रही हें भाभी। " विजय नें बेचैनी सें कहा___"मे रोज़ाना मज़ेदार औऱ फायदेमंद भोजन हि करताहूॅ। "
"वोँ तौ मुझेदिख हि रहा हैं। " प्रतिमा नें देखकर देखा विजय सिंह कों, बोलि___"अगर वैसा हि भोजन करते तौ अपने जिस्म कि ऐसी हालत नहि बना लेते तुम्। "
"ऐसी हालत????" विजय नें चौंकते हुए कहा___"क्याँ हुआभला मेरी हालत कों?? अच्छा भला तोँ हूॅ भाभी। "
"बस बस रहनेदो तुम्। " प्रतिमा नें कहा__"पोज तोँ ऐसेदे रहे होँ जैसे दारा सिंह तुम्हीं हौ। "
विजय सिंह कों समझ नं आया कि वोँ क्याँ कहे? दरअसल उसे अपनी भाभी सें ऐसीबात करने कां यह पहला अवसर थां। विवाह केँ बादकभी ऐसे मधुर संबंध हि नहि रहे थें कि वोँ अपनी प्रतिमा भाभी सें कभीबात करता याँ घुलता मिलता। ख़ैर विजय सिंह नें किसीतरह खानां खाया औऱ सीघ्र हि उठकर कमरे सें बाहर् चला गय़ा। कमरे सें बाहर् जब वो आयातब उसने जैसे राहत कि साॅसली। वो बाहर् भि रुका नहि बल्कि खेतों कि तरफ तेज़ तेज़ करमों सें बढ़ता चला गय़ा। जबकि कमरे सें भागते हुए बाहर् आई प्रतिमा नें जब विजय कों दूर खेतों पऱ जाते देखा तौ उसके होठों पर्र कमीनी मुस्कान रेंग गई।
"आज तौ इतना हि बहुत थां विजय। " प्रतिमा नें अजीबभाव सें कहा___"मगर इतने सें डोज मे हि तुम्हारी यह हालतबता रही हैं कि तुम् अधिक दिनों तक मेरे सामने टिक नहि पाओगे। मेरेइस खूबसूरती केँ जाल मे जल्द हि फॅस जाओगे। ओह विजय, थोडा जल्दफॅस जानां मेरीजान क्योंकि ज़्यादा देर तक बर्दास्त नहि कर पाऊॅगी मे। "
यहीसभी बड़बड़ाती हुईँ प्रतिमा वापस कमरे मे गई। औऱ बेन्च सें टिफिन वालेसभी बर्तन इकट्ठा करके वो कमरे सें बाहर् आँ गई। कमरे केँ दरवाजों कों ढुलका कर वो घर-मकान सें बाहर् आँ गई औऱ फिन हवेली कि तरफबढ़ चली। मन मे कईतरह केँ ख़याल बुनेजा रही थि वो।
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इधर हवेली मे दोपहर कों हरकोई अपने अपने कमरे मे होता थां। बच्चों कों भि दोपहर कि धूप मे कहीं बाहर् नहि जाने दिया छाता थां। माॅ बाबूजी हमेशा कि तरह नीचे वाले हिस्से पर्र बने अपने कमरे मे हि रहते थें। बाबूजी कों महाभारत पढ़ने कां बड़ाशौक थां। वोँ खाली वक़्त मे महाभारत कि मोटी सि पुस्तक लेकर आरामदायी कुर्सी पऱ बैठ जाते थें अपने कमरे मे। जबकि माॅजी खाट पड़ी रहती। उनके घुटनों मे बात कि शिकायत थि इसलिए वोँ ज़्यादा चलती फिरती नहि थि।
राज औऱ गुड़िया अधिकतर अपने चाचा चाची केँ पास हि रहते थें। करुणा उन दोनो कों पढ़ाती थि। राज सें उसे बड़ा प्रेम थां। हवेली मे सबका अपना अपना हिस्सा थां। हलाॅकि उस वक़्त बटवारा नहि हुआ थां मगर तीनो रहतेउसी तरह थें अलगअलग। जबकि खानां पीना सबकासंग मे हि होता थां। उस वक्त हवेली मे ऐसा थां कि अंदर सें हि सबके हिस्से मे जायाजा सकता थां। उसकेलिए हर पार्टिशन मे एक् बड़ा सां दरवाजे थें जौ अधिकतर खुले हि रहते थें। विजय सिंहजिस हिस्से पऱ रहता थां उसी हिस्से मे माॅ बाबूजी भि नीचे रहते थें। विजय औऱ गौरी कां रूमऊपर वाले फ्लोर पर्र थां। सबका खानां भि यहीं पर्र बनता थां। नैनाअजय सिंह वाले हिस्से पऱ रहती थि। क्योंकि वोँ विद्यालय केँ वक्त पऱ खाली हि रहता थां इसलिए वो उस हिस्से मे हि अकेली रहती थि। हलाॅकि उसकेसंग बच्चों मे सें कोई भि रोज़ सोने केँ लिएचला जाता थां।
विजय सिंहदिन मे खेतों पऱ हि रहता थां औऱ फिनरात मे हि हवेली आता थां। लंचउसे पहुॅचा दिया जाता थां। हप्ते मे एक् दोदिन वो खेतों पऱ भि रात मे रुक जाता थां। पर्र यहतभी होता थां जब रुकने कि ज़रूरत हौ अन्यथा नहि।
प्रतिमा केँ जाने केँ कुछदेर बाद हि अजय सिंहबेड सें उठा औऱ कमरे सें बाहर् आँ गय़ा। इससमय वो अपने हिस्से कि तरफ हि थां। उसेपता थां कि उसकी छोटी बेहन नैना उसके हिस्से पर्र हि ऊपर अपने कमरे मे हैं। वो कमरे सें निकलकर ऊपर जाने केँ लिए सीढ़ियों कि तरफबढ़ गय़ा। सीढ़ियाॅ चढ़ते हुए वो ऊपर नैना केँ कमरे केँ पास पहुॅचा। उसनेबंद दरवाजे पर्र आहिस्ता सें हाॅथरखा औऱ उसे कमरे कि तरफपुश किया। लेकिन रूम अंदर सें बंद थां। अजय सिंह नें झुककर दरवाजे केँ कि-होल सें अपनी दाहिनी आॅखसटा दि। कमरे केँ अंदर नैनाबेड पऱ लेटी हुइ दिखीउसे। उसके हाॅथ मे कोई मोटी सि पुस्तक थि जिसे वो मन हि मनपढ़ रही थि। यहदेख अजय सिंह नें राहत कि साॅसली औऱ फिनदबे पाॅव वो नीचेउतर आया।
नीचेआकर उसने पार्टीशन वाले दरवाजे केँ पास पहुॅचा। लेकिन उससे पहले वो बाएॅ साइड केँ पार्टीशन वाले दरवाजे कि तरफ भि देखा। उसनेयह दरवाजा बंदकर दिया थां ताकिउधर सें कोईइधर कां देख न् सके। बाएॅ साइड वाला हिस्सा अभय सिंहव करुणा कां थां, तथा दाएॅ साइड विजय सिंह कां जबकि बीच कां हिस्सा अजय सिंह कां थां।
दाएॅतरफ वाले हिस्से केँ पार्टीशन पर्र लगे दरवाजे कों पारकर वो दबे पाॅवऊपर कि तरफ जाने केँ लिए सीढ़ियों कि तरफ बढ़ा। उसे पता थां कि सीढ़ियों केँ पास जाने केँ लिएउसे माॅ बाबूजी केँ कमरे केँ सामने सें होकर हि गुज़रना पड़ेगा। उसकादिल अनायास हि धड़कने लगा थां। माॅ बाबूजी केँ कमरे केँ पास सें होकर वो दबे पाॅव हि सीढ़ियों केँ पास पहुॅचा। उसकेबाद आहिस्ता सें सीढ़ियाॅ चढ़ता चला गय़ा वो।
ऊपरआकर वो दाहिने साइड चौड़ी बालकनी सें होतेहुए गौरी केँ कमरे केँ पास पहुॅचा। धाड़ धाड़ बजती धड़कनों कों काबू मे रखने कि असफल कोशिश भि कररहा थां वो। लेकिन कहते हें नां कि चोर कां दिल बेहद कमज़ोर होता हैं, वहीहाल अजय सिंह कां थां। कमरे केँ पास पहुॅच कर उसने दरवाजे पऱ हाॅथरख करउसे कमरे कि तरफ धकेला। रूम बेआवाज़ अंदर कि तरफपुश हौ गय़ा।
यहदेख करअजय सिंह कि आॅखें चमक उठीं। उसने दरवाजे बहोत हि आहिस्ता सें थोडा औऱ अंदर कि तरफ धकेला ताकि वो थोड़ी सि झिरी सें हि पहले कमरे केँ अंदर कि वस्तुस्थिति कां पतालगा सके। ख़ैर, झिरी केँ बनते हि अजय सिंह नें कमरे केँ अंदरउस थोड़ी सि झिरी सें देखा। अंदर एक् कोने कि तरफरखे बेड पऱ गौरी दूसरी तरफ कों करवटलिए पड़ी थि। ऊपरछत पऱ पंखा मध्यम स्पीड सें घूमरहा थां जिसकी हवा सें उसकी साड़ी कां एक् सिराहिल रहा थां। गर्मी केँ दिन थें इसलिए गौरी नें साड़ी कों अपने जिस्म केँ ऊपरी हिस्से सें हटाया हुआ थां। ऊपर केवल ब्लाउज हि थां। गर्दन केँ नीचेपीठ कि तरफ वाला एक् तिहाई भागदिख रहा थां तथा नीचेकमर दिखरही थि। कमर केँ नीचे उसका पिछवाड़ा थां जोँ कि साड़ी सें ढॅकाहुआ हि थां। उसके नीचे उसकी साड़ी पेटीकोट सहित उटनों तक ऊपर खिसकी हुइ थि जिसके कारण उसकीदूध सि गोरी पिंडिलियाॅ स्पष्ट दिखरही थि। पैरों मे मोटी सि लेकिन घुंघुरूदार पायल थि।
अजय सिंह दरवाजे पर्र खड़ा नं रहसका। वो आहिस्ता सें दरवाजे कों खोला औऱ अंदरदबे पाॅव कमरे केँ अंदर दाखिल होँ गय़ा। अंदरआकर वो दबे पाॅव हि बेड कि तरफ बढ़ा। उसकेदिल कि धड़कनें पूरीगति सें दौड़रही थि जिसकी धमक किसी हॅथौड़े कि तरहउसे अपनी कनपटियों पऱ स्पष्ट बजती सुनाई पड़रही थि।
बेड केँ बेहद लगभग पहुॅच करअजय सिंहरुक गय़ा। कमरे मे खिड़की सें आताहुआ प्रकाश फैलाहुआ थां जिसकी वजह सें कमरे मे मौजूद हर चीज़ स्पष्ट दिखाई देरही थि। बेड केँ लगभग पहुॅच करअजय सिंह नें देखा कि गौरी दूसरी तरफ करवटलिए पड़ी थि। उसने अपना बायाॅ हाॅथ मोड़कर अपनी बाॅई कनपटी केँ नीचेरखा हुआ थां जबकि दाहिना हाॅथ उसकेपेट केँ आगेबेड पर्र टिकाहुआ थां। अजय सिंह धड़कते दिल केँ संगझुक कर गौरी केँ चेहरे कि तरफ देखा तोँ उसेपता चला कि गौरी कि आॅखें बंद हें। अजय सिंह कों यकीन करना मुश्किल थां कि गौरीसो रही हैं याँ फिन उसनेयूॅ हि अपनी आॅखें बंद कि हुइ हें।
गौरी केँ चाॅद जैसे चेहरे पर्र इस वक़्त ज़माने भर कि मासूमियत थि। आजकल उसकी तबीयत ज़रा नाशाद थि इसलिए उसके चेहरे पर्र वोँ नूर नहि दिखरहा थां जोँ हमेशा रहता थां। लेकिन अजय सिंह कों तौ जैसेऐसा चेहरा भि किसीनूर सें कम नं थां। वो यहमान चुका थां कि गौरी दुनियाॅ कि सबसे सुंदर स्त्री हैं। उसकी स्वयं कि पत्नि भि हुस्न मे कम नं थि मगर गौरी केँ सामने उसकी हुस्न जैसे फीकीपड़ जाती थि। परिवार कि हर महिला हुस्न मे एक् दूसरे कों मातदे रही थि। मगरअजय सिंह कां दिल गौरी केँ लिए धड़कता थां। वो समझ नहि पारहा थां कि यह वो गौरी कि हुस्न पऱ हवस कि वजह सें आकर्शित थां याँ फिनउसे गौरी सें प्यार थां।
अजय सिंह नें थोडा औऱ आगे कि तरफझुक कर देखा तोँ एकाएक हि उसकेमन मे म्यूज़िक सां बजउठा। गौरी केँ सीने केँ दोनो बड़े बड़े उभारआपस मे दबे होने कि वजह सें उसकी ब्लाउज सें बाहर् झाॅकरहे थें। अजय सिंह जैसे उनमें हि खो गय़ा। तभी वो बुरीतरह डर भि गय़ा। क्योंकि उसीसमय गौरी नें एक् गहरी साॅस लेतेहुए पहले तौ हल्की सि अॅगड़ाई ली औऱ फिन सीधीलेट गई। अजय सिंह कि धड़कन जौ बुरीतरह बढ़ गई थि वोँ अबइस दृश्य कों देखकर जैसेरुक हि गई। गौरी सीधीलेट गई थि। जैसा कि बताया जा चुका हैं कि गौरी नें गर्मी केँ चलते अपनी साड़ी कों अपने ऊपरीभाग सें हटाया हुआ थां। इसलिए उसके सीधा लेटते हि ब्लाउज मे कैद उसकी भारी छातियाॅ एकदम सें तन गई थि। नीचेदूध सां गोरा नंगापेट औऱ उस पऱ उसकी गहरी नाभी। अजय सिंह कि हालत एक् लम्हा मे खराब होँ गई। उसकाजी चाहा कि वो जल्दी झुककर गौरी केँ पेट औऱ नाभी कों अपनीजीभ सें चूसना चाटना शुरुआत करदे लेकिन वो ऐसाकुछ चाहकर भि नहि कर सकता थां।
गौरी कि छातियाॅ बिना ब्रा केँ किसी कुतुब मीनार कि तरहतनी हुईँ थि। अजय सिंह कि नापाक नज़रें गौरी केँ पूरे शरीर कों जैसे स्कैन सां कररही थीं। उसका सुंदर चेहरा औऱ बिना लिपिस्टिक केँ हि लाल सुर्ख होंठ थें उसके। जिन्हें अपने होंठो मे भर लेने केँ लिए जैसेउसे आमंत्रित कररहे थें। औऱ अजय सिंह नें उस निमंत्रण कों स्वीकार भि कर लिया। वो मानो सम्मोहित सां हौ गय़ा थां। वो सम्मोहित सां होकर हि आहिस्ता आहिस्ता गौरी केँ चेहरे कि तरफ झुकने लगा। उसके हृदय कि गति प्रतिपल रुकती हुई महसूस होँ रही थि। वो गौरी केँ चेहरे केँ बेहद लगभगझुक गय़ा। उसके नथुनों मे गौरी कि गरम साॅसें पड़ी। उसकी साॅसों कि गंध सें जैसे वो मदहोश सां होनेलगा। उसकी साॅस भारी हौ गई। उसने गहरी साॅस घसीटकर उसे तेज़ी सें हि बाहर् छोंड़ा औऱ जैसे यहीं पऱ उससे बड़ी भारी ग़लती होँ गई। एक् तौ गहरी साॅस लेने कि आवाज़ औऱ दूसरी तेज़ी सें हि उस लम्बी साॅस कों नाक केँ रास्ते बाहर् निकालने सें गौरी केँ चेहरे पऱ गरम साॅस कां तीब्र वेग सें स्पर्श हुआ। जिससे गौरी कि नींदटूट गई। उसने पलकें झपकाते हुए अपनी आॅखें खोल दि औऱ.औऱ अपने चेहरे केँ इतने लगभग किसी कों झुकेदेख वो बुरीतरह डर गई संग हि हड़बड़ा भि गई। इधरअजय सिंह कों भि जैसे साॅप सां सूॅघ गय़ा। वो बड़ी तेज़ी सें सीधा खड़ा हौ गय़ा। लेकिन तब तक देर हौ चुकी थि।
गौरी नें जब देखा कि उसके चेहरे पऱ झुकाहुआ व्यक्ति कोई औऱ नहि बल्कि उसका जेठ हैं तोँ उसकी हालत खराब होँ गई। मारे घबराहट केँ उसेसमझ हि नं आया कि क्याँ करे वो। फिन जैसे हि दिमाग़ नें काम किया तोँ उसने हड़बड़ा कर सीघ्रता सें अपनी साड़ी कों अपने शरीर पऱ डाला।
"क्षमा करना गौरी। "अजय सिंह मानोतब तक स्वयं कों सम्हाल चुका थां, इसलिए बड़ी शालीनता बोला___"वोँ मे दरअसल देखने आया थां कि क्याँ हुआ हैं तुम्हें? मैने सुना कि कईदिन सें तुम्हारी तबीयत ठीक नहि हैं इसलिए देखने चलाआया थां। "
गौरी बोलीं तोँ कुछ नं। बोलने वाली हालत मे हि नहि थि वो। अपनेसिर पऱ साड़ी कां घूॅघट डालकर वो तेज़ी सें हि बेड सें नीचेउतर आई थि औऱ अजय सिंह सें दूर जाकर खड़ी होँ गई थि। उसकादिल धाड़ धाड़ करके सरपट दौड़े जारहा थां। अपनी स्थान पर्र खड़ी वो थरथर काॅपरही थि। उसेलग रहा थां कि उसकी काॅपती हुइ टाॅगें उसकाभार ज़्यादा देर तक सह नहि पाएॅगी। वो बड़ी मुश्किल सें स्वयं कों सम्हाले खड़ी थि।
"अरे घबराने कि कोई ज़रूरत नहि हैं गौरी। "उधर अजय सिंह उसकी हालत कां बखूबी अंदाज़ा लगाते हुए बोला___"तुम् मेरी छोटी बेहन केँ समान हौ। मैंने कहा नं कि तुम्हें बस देखने आया थां यहाॅ। तुम् आहिस्ता सोरही थि तोँ मैने तुम्हें जगाना उचित नहि समझा। मे देखरहा थां कि केसे सारे संसार भर कि मासूमियत अपने चेहरे पर्र लिए तुम् सोरही होँ। अगर तुम्हें मेराइस तरह देख्ना अच्छा नहि लगा तोँ क्षमा कर देना अपनेइस बड़े भाई कों। "
गौरी नें इसबार भि कुछ नहि कहा। बल्कि वो पूर्व कि भाॅति हि खड़ीरही। अजय सिंह उसका जेठ थां औऱ यहाॅ कां यह रिवाज़ थां कि जेठ औऱ ससुरजी केँ सामने घूॅघट मे हि रहना हैं औऱ उनसे बोल्ना नहि हैं। यही एक् भारतीय बहू केँ लिए नियम थां यहाॅ गाॅवों मे।
"पता नहि किसशदी मे जीरहे हें यहसभी लोग?"अजय सिंहकह रहा थां___"आज भि वही पुरानी परंपराएॅ औऱ फिज़ूल केँ नियम कानून व रीति रिवाज़ों मे बॅधेहुए हें सभी। शहरों मे यहसभी रूढ़िवादिता नहि हैं औऱ नाँ हि वहाॅ पऱ इस सबको उचित मानता हैं कोई। शहर मे सभीलोग एक् दूसरे सें बोलते हें। किसी केँ ऊपर किसीतरह कि कोई पाबंदी नहि रहती। भारतीय कानून नें भि हर मर्दव स्त्री कों समानता कां अधिकार दियाहुआ हैं। इसलिए यहसभी बेकार कि परंपराएॅ छोड़ो तुम् सभी। इज्जत सम्मान देने केँ लिएयह ज़रूरी नहि होता कि कोईबहू अपने जेठ याँ ससुरजी केँ सामने चारहाथ कां घूॅघट करे औऱ उनसेबात न् करे। बल्कि इज्जत सम्मान यहसभी किये बग़ैर भि दियाजा सकता हैं। "
अजय सिंह कि इनसभी बातों कां भला गौरी क्याँ जवाब देती? हलाॅकि उसे भि पता थां कि शहर मे वहीसभी नियम चलते हें जिसके बारे मे उसका जेठ उससेकह रहा हैं। लेकिन यहसभी नियम कानून गाॅव देहातों मे लागू नहि हौ सकते थें। यहसभी यहाॅ इतना आसान नहि थां बल्कि ऐसा करने वालीबहू कों समाज केँ यहलोग चरित्रहीन कि संज्ञा दे देते हें।
"ख़ैर छोंड़ो यहसभी। " अजय सिंह नें कहा___"गाॅव गांव मे तोँ यहसभी चल हि नहि सकता। पता नहि कब समझेंगे यहलोग? देश समाज कि उन्नति मे बाधाऐसी सोच हि डालती हैं। ख़ैर, मे अभय कों बोल दूॅगा कि तुम्हें शहर लेँ जाए औऱ वहाॅ किसी अच्छे डाक्टर सें तुम्हारा इलाज़ करवादे। चलोजाओ अब तुम् आरामकरो। "
इतनासभी कहकरअजय सिंह कमरे सें बाहर् कि तरफ निकल गय़ा। जबकि गौरी उसके जाने केँ बाद भि बहुतदेर तक बुतबनी खड़ीरही। मन मे यही ख़याल बारबार डंकमार रहा थां कि जेठ जी यहाॅकिस लिएआए थें? क्याँ फिन सें पहले कि तरह बुरी नीयत सें याँ सच मे वोँ उसकी तबीयत केँ बारे मे हि जानने आए थें? वोँ इसतरह मेरे इतने लगभग केसे आँ सकते थें? क्याँ मतलबहुआ इस सबका?
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गौरी केँ पास सें आकरअजय सिंह पुनः अपने कमरे मे बेड पर्र लेट गय़ा थां। उसकादिल अभि तक सामान्य नहि हुआ थां। अंदर अभि भि घबराहट केँ निसां शेष थें। बेड पर्र पड़े पड़े वो इन्हीं सभी बातों केँ बारे मे सोचेजा रहा थां। बारबार वो इस ख़याल सें डर जाता थां कि अच्छा हुआ टाइम रहते उसने वस्तुस्थिति कों सम्हाल लिया थां वरनाकुछ भि हौ सकता थां। अपनी बातों सें उसने गौरी कों जता दिया थां कि वोँ मात्र उसकी तबीयत केँ बारे मे हि जानने केँ लिएआया थां उसके कमरे मे। लेकिन उसकेमन मे बारबार यह प्रश्न भि उठ जाता थां कि क्याँ वो अपनी बातों सें गौरी कों संतुष्ट कर पाया थां? कहींऐसा तौ नहि कि गौरी कों उस पर्र अभि भि कोई संदेह हैं? वो किसी निष्कर्श पर्र न् पहुॅचा थां।
अपने कमरे मे वो जाने कितनी हि देर तक इस सबके बारे मे सोचता रहा। उसे होशतब आयाजब उसके कमरे कां दरवाजा खोलकर उसकी पत्नि प्रतिमा अंदर दाखिल हुईँ। धूप औऱ गर्मी सें आने केँ कारण उसकी हालत खराब थि। पसीने सें उसकाबदन चमकरहा थां। पतली सि साड़ी उसके शरापा शरीर सें चिपकी हुईँ थि। कमरे मे आते हि प्रतिमा नें पहले कमरे कां दरवाजा बंद किया उसकेबाद सीधाबेड पऱ आकर चारो खाने चित्त होकरपसर गई। लेटते हि गहरी गहरी साॅसें लेनेलगी वो। बड़ेगले केँ ब्लाउज सें उसकी भारी चूचियाॅ आधे सें अधिकदिख रही थि।
अजय सिंह नें जबउसे इस हालत मे देखा तोँ उससेरहा न् गय़ा। गौरी कों देखकर हि उसके अंदरआग सि लग गई थि औऱ अब अपनी पत्नि कों इसतरह देखा तोँ होशखो बैठा वो। प्रतिमा आॅखें कर गहरी साॅसें लें रही थि जबकि अजय सिंह नें उसेसमय भर मे दबोच लिया। वो इतना उतावला होँ चुका थां कि वो प्रतिमा केँ ब्लाउज कों उसके ऊपरीगले केँ भाग वाले सिरों कों पकड़कर एक् झटके सें फाड़ दिया। नाज़ुक सां ब्लाउज थां बेचारा वो अजय सिंह झटका नहि सहसका। ब्लाउज केँ सारेबटन एक् संग टूटते चलेगए। अजय सिंह पागल सां हौ गय़ा थां। ब्लाउज केँ अलग होते हि प्रतिमा कि भारी भरकम चूचियाॅ उछलकर बाहर् आँ गईं। अजय नें उन दोनो फुटबालों कों दोनो हाथों सें शख्ती सें दबोचकर उनके निप्पल कों अपनामुह खोलकर भर लिया औऱ बुरीतरह सें उन्हें चुभलाने लगा।
प्रतिमा एकाएक हि हुएइस हमले सें हतप्रभ सि रह गई। लेकिन अजय कि रॅगरॅग सें वाकिफ थि इसलिए बस मुस्कुरा कररह गई। अजय सिंह उसकी चूचियों कों बुरीतरह मसलरहा थां औऱ संग हि संग उनको अपने दाॅतों सें काटता भि जारहा थां। वो समयभर मे जानवर नज़रआने लगा थां।
"आहहहहह धीरे-धीरे सें अजय। " प्रतिमा कि दर्द मे डूबी कराह निकल गई___"दर्द हौ रहा हैं मुझे। यह कैसा पागलपन हैं? क्याँ होँ गय़ा हैं तुम्हें?"
"चुपचाप लेटीरह मेरी राॅड। "अजय सिंह मानो गुर्राया___"वरना ब्लाउज कि तरह तेरासभी कुछ फाड़कर रख दूॅगा। "
"अरे तोँ फाड़ नां भड़वे। " प्रतिमा भि उसी लहजे मे बोलि___"लगता हैं गौरी कां भूतफिन सें सवार हौ गय़ा तुम्हारी तरफ। चल अच्छा हुआ, जब जबयहभूत सवार होता हैं तुझ पऱ तबतब तूँ मेरी मस्त पेलाई करता हैं। आहहहह क्या बात है फाड़दे रे.मुझ पऱ भि बड़ीआग लगी हुइ हैं। शशशश आहहहह रंडे केँ जने नीचे कां भि कुछ ख़याल कर। क्याँ चूचियों पर्र हि लगा रहेगा?"
"हरामज़ादी साली। "अजय सिंहउठ कर प्रतिमा कि साड़ी कों पेटीकोट सहित एक् झटके मे उलट दिया। साड़ी औऱ पेटीकोट केँ हटते हि प्रतिमा नीचे सें पूरीतरह नंगी होँ गई।
"साली पेन्टी भि पहनकर नहि गई थि उस मजदूर केँ पास। "अजय सिंह नें ज़ोर सें प्रतिमा कि बुर कों अपने एक् हाॅथ सें दबोच लिया। प्रतिमा कि हल्की चीख गूॅजउठी कमरे मे।
"आहहहह दबोचता क्याँ हैं रंडी केँ जनेउसे मुहलगा करचाट नाँ। " प्रतिमा अपने होशो हवाश मे नहि थि___"उस हरामी विजय नें तौ कुछ न् किया। अरे अगर एक् बार कहता तोँ क्याँ मे उसेखोल करदे न् देती? आहहहऐसे हि चाट.शशशशश अंदर तक जीभडाल भड़वे कि औलाद। "
अजय सिंह पागल सां होँ गय़ा। उसेइस तरह कि गाली गलौज वाला सेक्स बहोत पसन्द थां। प्रतिमा कों भि इससे बड़ाआता थां। औऱ आज तौ दोनो पऱ आग जैसे भड़की हुई थि। अजय सिंह प्रतिमा कि बुर मे मानो घुसाजा रहा थां। उसका एक् हाॅथऊपर प्रतिमा कि एक् मम्मों पर्र जिसे वो बेदर्दी सें मसलेजा रहा थां जबकि दूसरा हाथ प्रतिमा कि बुर कि फाॅकों पऱ थां जिन्हें वो ज़रूरत केँ हिसाब सें फैलारहा थां।
कमरे मे हवसव वासना कां तूफान चालू थां। प्रतिमा कि सिसकारियाॅ कमरे मे गूॅजती हुईँ अजीब सि मदहोशी कां आलम पैदाकर रही थि। अजय सिंह उसकी बुर पऱ बहुतदेर तक अपनीजीभ सें चुहलबाजी करतारहा।
"आहहहह ऐसे हि रे बड़ामजा आँ रहा हैं मुझे। " प्रतिमा बड़बड़ा रही थि। उसकी आॅखें मज़े मे बेद थि। बेड पऱ पड़ी वो बिन पानी केँ मछली कि तरह छटपटा रही थि।
"शशशश आहहहअब उसे छोंड़ औऱ जल्द सें पेल मुझे भड़वे हरामी। " प्रतिमा नें हाॅथ बढ़ाकर अजय सिंह केँ सिर केँ बालों कों पकड़कर ऊपर उठाया। अजय सिंह उसके उठाने पर्र उठा। उसका पूरा चेहरा प्रतिमा केँ बुर रस सें भींगा हुआ थां। ऊपर उठते हि वो प्रतिमा केँ होठों पऱ टूट पड़ा। प्रतिमा अपने हि बुर रस कां स्वाद लेनेलगी इस क्रिया सें।
प्रतिमा नें स्वयं कों अलगकर बड़ी तेज़ी सें अजय सिंह केँ कपड़ों उतारना शुरुआत कर दिया। कुछ हि समय मे अजय सिंह मादरजाद नंगा होँ गय़ा। उसका हथियार फनफना कर बाहर् आँ गय़ा। प्रतिमा उकड़ू लेटकर जल्दी हि उसे एक् हाथ सें पकड़कर मुह मे भर लिया।
अजय सिंह कि मज़े सें आॅखें बंद होँ गई तथामुह सें अहह निकल गई। वो प्रतिमा केँ बालों कों मजबूती सें पकड़कर उसकेमुह मे अपनीकमर हिलाते हुए अपना हथियार पेलने लगा। वो पूरीतरह जानवर नज़रआने लगा थां। ज़ोर ज़ोर सें वो प्रतिमा केँ गले तक अपना हथियार पेलरहा थां। प्रतिमा कि हालत खराब होँ गई। उसका चेहरा लाल सुर्ख पड़ गय़ा। आॅखें बाहर् कों आनेलग जाती थि संग हि आॅखों सें आॅसू भि आनेलगे। तभीअजय नें उसकेसिर कों पीछे कि तरफ सें पकड़कर अपने हथियार कि तरफ मजबूती सें खींचा। नतीजा यहहुआ कि उसका हथियार पूरा कां पूरा प्रतिमा केँ मुह मे गले तक चला गय़ा। प्रतिमा कि आॅखें बाहर् कों उबल पड़ी। आॅखों सें आॅसू बहनेलगे। साॅस लेना मुश्किल पड़ गय़ा उसे। उसका शरीर झटके खानेलगा। उसकेमुह सें लार टपकने लगी।
प्रतिमा कों लगा कि उसकी साॅसें टूट जाएॅगी। अजय सिंहउसे मजबूती सें पकड़े हुए थां। वो अपनेमुह सें उसके हथियार कों निकालने केँ लिए छटपटाने लगी। अजय कों उसकीइस हालत कां ज़रा भि ख़याल नहि थां, वो तौ मज़े मे आॅकें बंद कियेऊपर कि तरफसिर कों उठाया हुआ थां।
प्रतिमा केँ मुह सें गूॅगूॅ कि अजीब सि आवाज़े निकलरही थि। जब उसने देखा कि अजय सिंहउसे मार हि डालेगा तौ उसने अपने दोनो हाॅथों सें अजय सिंह केँ पेट पऱ पूरी ताकत सें चिकोटी काटी।
"आहहहहहहह। " अजय सिंह केँ मुह सें चीख निकल गई। वो एक् झटके सें उसकेसिर कों छोंड़ करतथा उसकेमुह सें अपने हथियार कों निकाल करअलग हट गय़ा। मज़े कि जिस दुनियाॅ मे वो अभि तक परवाज़ कररहा थां उस दुनिया सें गिरकर वो हकीकत कि दुनियाॅ मे आँ गय़ा थां। बेड केँ दूसरी तरफ घुटनो पर्र खड़ा वो अपनेपेट केँ उस हिस्से कों सहलाए जारहा थां जहाॅ पऱ प्रतिमा नें चिकोटी काटी थि। उसे प्रतिमा कि इस हरकत पऱ बेहद क्रोध आया थां लेकिन जब उसने प्रतिमा कि हालत कों देखा तौ हैरान रह गय़ा। प्रतिमा कां चेहरा लाल सुर्ख तमतमाया हुआ थां। वो बेड पर्र पड़ी अपनी साॅसें बहालकर रही थि।
"तुमको ज़रा भि अंदाज़ा हैं कि तुमने क्याँ किया हैं मेरेसंग?" प्रतिमा नें गुस्से सें फुंकारते हुए कहा___"तुम् अपने मज़े मे यह भि भूलगए कि मेरीजान भि जा सकती थि। तुम् इंसान नहि जानवर होँ अजय। आज केँ बाद मेरे लगभग भि मत आनां वरना मुझसे बुराकोई नहि होगा। "
अजय सिंह उसकीयह बातें सुनकर हैरान रह गय़ा थां। लेकिन जबउसे एहसास हुआ कि वास्तव मे उसने क्याँ किया थां तौ वो शर्मिंदगी सें भर गय़ा। वो जानता थां कि प्रतिमा वो स्त्री थि जोँ उसके कहने पर्र दुनिया कां कोई भि कामकर सकती थि औऱ करती भि थि। यह उसकाअजय केँ प्रति प्रेम थां वरनाकौन ऐसी स्त्री हैं जोँ पति केँ कहने पऱ इसहद तक भि गिरने लगजाए कि वो किसी भि ग़ैर मर्द केँ नीचे अपनासभी कुछखोल करलेट जाए????अजय सिंह कों अपनी ग़लती कां एहसास हुआ। वो जल्दी हि आगेबढ़ कर प्रतिमा सें माफी माॅगने लगातथा उसको पकड़ने केँ लिए जैसे हि उसनेहाथ बढ़ाया तोँ प्रतिमा नें झटक दियाउसे।
"डोन्ट टचमी। " प्रतिमा गुर्राई औऱ फिनउसी तरह गुस्से मे तमतमाई हुई वो बेड सें नीचे उतरी औऱ बाथरूम केँ अंदर जाकर दरवाजा बंदकर लिया उसने। अजय सिंह शर्मिंदा सां उसे देखता रह गय़ा। उसमें अपराध बोझ थां इसलिए उसकी हिम्मत नं हुइ कि वो प्रतिमा कों रोंकसके। उधर थोड़ी हि देर मे प्रतिमा बाथरूम सें मुह हाॅथ धोकर निकली। आलमारी सें एक् नया ब्लाउज निकाल कर पहना, तथा उसी साड़ी कों दुरुस्त करने केँ बाद उसने आदमकद आईने मे देखकर अपने हुलिये कों सही किया। सभी कुछठीक करने केँ बाद वो बिनाअजय कि तरफ देखे कमरे सें बाहर् निकल गई। अजय सिंहसमझ गय़ा थां कि प्रतिमा उससे बेहद नाराज़ होँ गई हैं। उसका नाराज़ होना जायज़ भि थां। भलाइस तरहकौन अपनी पत्नि कि जान लेँ लेने वाला सेक्स करता हैं?? अजय सिंह असहाय सां नंगा हि बेड पर्र पसर गय़ा थां।
दोस्तो एपसोड हाज़िर हैं,,,,,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
What an update bro.
A superb kahani from the pen। Oooopppssss। The keyboard। of a superb storyteller.
The way you describe the events, emotions, characters, action and even the sexual encounters can be compared with only a few other storytellers like sukh, VJ etc। I'm not undermining efforts of others lekin you three are at the top most in my favorite's list.
Keep rocking dear। And please दो check the conversation I have created between us।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Aage kya hua? Next part padhiye
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