♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो, अभि मैने अपनी दूसरी किस्सा राज-रानी (बदलते रिश्ते) कां भाग दिया हैं। उस एपसोड केँ अंत मे मैने बताया कि क्याँ हुआ थां मेरेसंग।
आप् तौ जानते हें दोस्तो कि हिन्दी मे लिखने मे बड़ा टाइम लगता हैं। मैनेउस स्टोरी कां भाग करीब पूरा हि लिख लिया थां, फिन मुझेकाम सें जानां पड़ गय़ा। जब मैने दुबारा उसे ओपेन किया तौ स्लाइड करते वक़्त ग़लती सें मेरी उॅगली रिप्लाई केँ ऑप्शन पऱ टच होँ गई। इससेहुआ यह कि रिप्लाई केँ ऑप्शन पर्र उॅगली रख जाने सें एक् बंदे कां कमेंट ब्रैकेट मे आँ गय़ा औऱ जौ एपसोड मैनेउस ब्रैकेट मे लिख छोंड़ा थां वोँ सभी रिमूव होँ गय़ा। इस क्रिया सें मेरा बहोत हि ज़्यादा दिमाग़ ख़राब हुआ दोस्तो। साला इतनी मेहनत सें भाग लिखा औऱ उसमें भि सारे ड्रमभर कां पानीउलट गय़ा। क्रोध तौ इतनाआया कि लगा कि फोनपटक दूॅ। फिन सोचा इसमेफोन कि भला क्याँ ग़लती हैं, ग़लती तोँ उस उॅगली कि हैं जौ रिप्लाई केँ ऑप्शन पर्र रख गई थि।
दोस्तो इसकेबाद मैनेफिन सें वोँ सारा एपसोड लिखा, मुझेयाद हि नहि रह गय़ा थां कि पहले मैने कहाॅ पर्र क्याँ क्याँ औऱ किसकिस तरीके सें लिखा थां। ख़ैर, नये तरीके सें लिखना पड़ा। जोँ यादआया उसे भि डालता गय़ा औऱ आजउसे पूरा करके पोस्ट कर दिया।
उस एपसोड केँ चक्कर मे हि इस किस्सा कां एपसोड नहि दे पाया दोस्तो। अब आप् लोगों कों इसकेलिए जोँ भि सज़ा देनी हौ मुझे तौ दे दीजिए।
Aapki saja yahi he kee iss kahani mai bi juldi say update dedo or iss update mai viraj or usaki premika kaa milan karwa hi do. Waitung 4 next update
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद जीतू भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया औऱ शानदार रिव्यू केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
एपसोड.《 44 》
अब तक,,,,,,,
कैब ड्राइवर हम् लोगों सें इतनाडरा हुआ थां कि वोँ हमसे रुपया भि नहि लेँ रहा थां। एक् हि बातबोल रहा थां कि हम् उसे जानेदें। वोँ हमारी कोई भि बातकभी भि किसी सें नहि कहेगा। मगर मैनेउसे समझाया कि डरने कि कोई ज़रूरत नहि हैं। ख़ैर, हम् लोगों कों उतारकर उसनेकैब कों वहीं पऱ किसीतरह बैक करके वापसी केँ लिए मोड़ा औऱ वहाॅ सें चंपत होँ गय़ा। मुझे यकीन थां कि वोँ रास्ते मे कहीं भि रुकने वाला नहि थां।
पवन केँ घऱ केँ अंदर जैसे हि हम् तीनोआए तौ पवन नें जल्द सें घऱ कां मुख्य दरवाजा बंदकर उसमें कुण्डी लगा दि थि। पवन सिंह मेरे बचपन कां यार थां। ग़रीब थां औऱ बिना बाप कां थां। उससे बड़ी उसकी एक् बेहन थि। जौ मेरी भि मुहबोली बेहन थि। वोँ मुझे अपनेसगे भइया सें भि अधिक मानती थि। अभि तक उसकी विवाह नहि हौ सकी थि। इसकीवजह यह थि कि पवन केँ पास रुपये पैसे कि तंगी थि। आजकललोग दहेज कि माॅग बहोत अधिक करते हें। पवन कि माॅ बयालिस साल कि विधवा स्त्री थि। लेकिन स्वभाव सें बहोत अच्छी थि। वोँ मुझे अपने बेटे कि तरह हि प्रेम करती थि।
हम् लोग चलतेहुए बैठक मे पहुॅचे औऱ वहाॅ एक् तरफ किनारे पऱ रखी एक् चारपाई पऱ बैठगए। जबकि पवन अंदर कि तरफचला गय़ा थां। आदित्य इधरउधर बड़े ग़ौर सें देखरहा थां। कदाचित यहदेख रहा थां कि यहाॅ गाॅव मे कच्चे खपरैलों वाले घर-मकान बनेहुए थें। जबकि उसनेआज तक ऐसे घर-मकान केवल फिल्मों मे हि देखे होंगे कभी।
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अबआगे,,,,,,,,,
उधरअजय सिंह, प्रतिमा औऱ शिवा अपनेनये फार्महाउस मे पहुॅच चुके थें। तीनों केँ चेहरे खिलेहुए थें। यहसोच कर कि बहोत दिनों बादकुछ अच्छा सुनने कों मिला थां उन्हें। जिनकी तलाश मे स्वयं अजय सिंह औऱ उसके व्यक्ति जाने कहाॅ कहाॅभटक रहे थें वोँ स्वयं हि चलकर यहाॅआया औऱ उसके आदमियों केँ द्वारा बहोत जल्दउसे पकड़कर उसके सामने उसे हाज़िर कर दिया जाएगा। उसकेबाद वोँ जैसे चाहेगा वैसे विराज केँ संग सुलूक कर सकेगा।
"डैड मैने तोँ सोच लिया हैं कि मे क्याँ क्याँ करूॅगा?" फार्महाउस केँ अंदर ड्राइंगरूम मे रखे सोफे पऱ बैठे शिवा नें कहा___"उस विराज केँ हाथ लगते हि बाॅकी केँ जबसभी भि हमारे पास आँ जाएॅगे तब मे अपनी पसन्द चीज़ों कां जीभर केँ मजा लूटूॅगा। सबसे पहले तौ उस हरामज़ादी करुणा कों पेलूॅगा वोँ भि उसके पति केँ सामने। उसी कि वजह सें चाचा नें मुझे कुत्ते कि तरह धोया थां। इस फार्महाउस पऱ सभी औरतों औऱ उनकी लड़कियों कों नंगा करूॅगा मे। "
"चिंता मतकरो बेटे। "अजय सिंह नें शिगार कों सुलगाते हुए कहा___"जौ कुछ तूँ सोचे बैठा हैं न् वहीसभी मैने भि सोचाहुआ हैं। बहोत तरसाया हैं इन लोगों नें मुझे। सबसे ज़्यादा उस कमीनी गौरी नें। पता नहि क्यूं पऱ उससेदिल लग गय़ा थां बेटा। मे चाहता थां कि वोँ अपनेमन सें अपनासभी कुछ मुझे सौंपदे, इसीलिए तोँ कभी उसकेसंग ज़ोर ज़बरदस्ती नहि कि थि मैने। मगर अब नहि। अब तौ बलात्कार होगा बेटे। ऐसा बलात्कार कि दुनियाॅ मे उसके बारे मे किसी नें नाँ तौ सोचा होगा औऱ नां हि सुना होगा कहीं। इस फार्महाउस मे उन दोनो औरतों कों औऱ उन दोनो लड़कियों कों जन्मजात नंगी करके दौड़ाऊॅगा। "
"अभि दो लड़कियों कों आप् भूलरहे हें डैड। " शिवा नें कमीनी मुस्कान केँ संग कहा___"आपकी दोनो लड़कियाॅ औऱ मेरी प्यारी प्यारी मगर मदमस्त बहनें। "
"उनका नंबर भि आएगा बेटे। "अजय सिंह नें गहरी साॅस ली___"मगर इन लोगों केँ बाद। पहलेइन लोगों केँ संग तौ मज़ेकर लें। इन सबको इतना बजाएॅगे कि सभी कि सभी साली पनाह माॅग जाएॅगी। उसकेबाद इन सबको रंडियों केँ बाज़ार मे लेँ जाकर मुफ़्त मे बेंच देंगे। "
"यहसही सोचा हैं डैड। " शिवा नें ठहाका लगाते हुए कहा___"रंडियों केँ बाज़ार मे बेंचने सें यहसभी जिंदगी भर लोगों कों मजा देती रहेंगी। मगरडैड मेरी बहनों कों मत बेंच देना। वोँ केवल हमारी रंडियाॅ बनकर रहेंगी जिंदगी भर। हम् दोनो हि उनकेसभी कुछ रहेंगे। "
"सहीकहा बेटे। "अजय सिंह नें कहा__"हम् अपनी बेटियों कों नहि बेचेंगे। वोँ तोँ हमारी हि रंडियाॅ बनकर रहेंगी अपनीमाॅ केँ संग। क्याँ कहती होँ डार्लिंग?"
आखिरी वाक्य अजय सिंह नें चुपचाप बैठी प्रतिमा कों देखकर कहा थां। प्रतिमा जौ इतनीदेर सें बाप बेटे कि बातें सुनकर मन हि मन हैरान औऱ चकित हौ रही थि वोँ अचानक हि अजय सिंह केँ इस प्रकार कहने पऱ चौंक पड़ी थि। जल्दी उससेकुछ कहते नं बन पड़ा थां। बल्कि अजीबभाव सें वोँ दोनो बाप बेटों कों देखती रह गई थि। यहदेख करअजय सिंह औऱ शिवा दोनो हि ठहाका लगाकर हॅस पड़े थें।
"क्याँ हुआ प्रतिमा?" अजय सिंह हॅसने केँ बाद बोला___"किन ख़यालों मे गुम होँ भई? हमारी बातों पर्र ध्यान नहि हैं क्याँ तुम्हारा?"
"मे तुम् दोनो कि तरह ख़याली पुलाव नहि बनाती अजय। " प्रतिमा नें स्वयं कों सम्हालते हुए कहा___"मुझे इस सबमें खुशीतब होगीजब ऐसा सचमुच मे होताहुआ अपनी ऑखों सें देखूॅगी। "
"अरे अवश्य देखोगी मेरीजान। " अजय सिंह नें हॅसते हुए कहा___"औऱ बहोत जल्द देखोगी। बसकुछ हि देर कि बात हैं। मेरे व्यक्ति उस हराम केँ पिल्ले कों घसीटते हुए लाते हि होंगे। उसकेआने केँ बाद उसके बाॅकी चाहने वालों कों भि बहोत जल्द आनां पड़ेगा मेरेपास। "
"इसीलिए तौ चुपचाप उसकेआने केँ इन्तज़ार मे बैठीहूॅ मे। " प्रतिमा नें कहा___"ज़रा मोबाइल करकेपता तोँ करो कि तुम्हारे व्यक्ति उसे लिये कहाॅ तक पहुॅचे हें अभि? अपने आदमियों सें बोलो कि ज़रा जल्दआएॅ यहाॅ। "
"जोँ हुकुम डार्लिंग। " अजय सिंह नें शिगार कों ऐश ट्रे मे मसलते हुए कहा___"मे अभि भीमा कों मोबाइल करताहूॅ औऱ उसे बोलता हूॅ कि भइया जल्द लेकर आँ उस हरामज़ादे कों। "
कहने केँ संग हि अजय सिंह नें अपनेकोट कि जेब सें फोन निकाला औऱ उस पऱ भीमा कां नंबर डायलकर फोन कों कान सें लगा लिया। मगर उसे अपनेकान मे यह वाक्य सुनाई दिया कि___"आपने जिस एयरटेल नंबर पऱ मोबाइल लगाया हैं वोँ इससमय उपलब्ध नहि हैं याँ अभि बंद हैं। "
यह वाक्य सुनते हि अजय सिंह कां दिमाग़ घूम गय़ा। उसनेकाल कों कट करकेफिन रिडायल कर दियामगर फिन सें उसे कानो मे वही वाक्य सुनाई दिया। अजय सिंहकई बार भीमा केँ नंबर पर्र मोबाइल लगाया मगरहर बारवही वाक्य सुनने कों मिलाउसे।
"क्याँ हुआडैड?" शिवा जौ अजय सिंह कि हि तरफदेख रहा थां बोल उठा___"क्याँ भीमा कां नंबर नहि लगरहा?"
"हाॅ बेटे। "अजय सिंह नें सहसा कठोरभाव सें कहा___"इन सालों कों कभीअकल नहि आएगी। ऐसे टाइम मे भि साले नें मोबाइल बंद करकेरखा हुआ हैं। "
"तोँ किसी दूसरे व्यक्ति कों मोबाइल लगाकर पता कीजिए डैड। " शिवा नें मानो ज्ञान दिया।
"हाॅ वहीकर रहाहूॅ। " अजय सिंह नें नंबरों कि लिस्ट मे मंगल कां नंबरखोज करउसे डायल करतेहुए कहा।
मंगल कां नंबर डायल करने केँ बाद उसनेफोन कों कान सें लगा लिया। मगर इस नंबर पऱ भि वही वाक्य सुनने कों मिलाउसे। अबअजय सिंह कां भेजा गर्म हौ गय़ा। फिन जैसे उसने स्वयं केँ गुस्से कों सम्हाला औऱ अपने किसी अन्य व्यक्ति कां नंबर डायल किया। मगर परिणाम वहीढाक केँ तीनपात वाला। कहने कां मतलबयह कि अजय सिंह नें एक् एक् करके अपनेसब आदमियों कां नंबर डायल कियामगर सबकसभी नंबर याँ तोँ उपलब्ध नहि थें याँ फिनबंद थें।
अजय सिंह कों इसबात नें हैरान कर दिया औऱ वो सोचने पर्र मजबूर होँ गय़ा कि ऐसा केसे होँ सकता हैं? यह तौ उसे भि पता थां कि उसके व्यक्ति इतने लापरवाह हौ हि नहि सकते क्योंकि सभी उससे बेहद डरते भि थें। लेकिन इस वक़्त सब केँ नंबरबंद होने कि वजह सें उसका माथा ठनका। मन मे एक् हि विचार आया कि कुछ तोँ गड़बड़ हैं। किसी गड़बड़ी केँ अंदेशे नें अजय सिंह कों एकाएक हि चिंता औऱ तकलीफ़ मे डाल दिया।
"क्याँ बात हैं अजय?" सहसा प्रतिमा उसके चेहरे केँ बदलते भावों कों देखते हुएबोल पड़ी___"यह अचानक तुम्हारे चेहरे पऱ चिन्ता व तकलीफ़ केँ भाव केसेउभर आए?"
"बड़ी हैरत कि बात हैं प्रतिमा। " अजय सिंह नें कहा___"मैने एक् एक् करके अपनेसब आदमियों कों मोबाइल लगाकर देख लिया, मगर उनमें सें किसी कां भि मोबाइल नहि लगरहा। सबकेसभी बंदबता रहे हें। इसका क्याँ मतलब होँ सकता हैं?"
"ऐसा केसे हौ सकता हैं डैड?" शिवा नें भि हैरानी सें कहा___"एक् संग सबके मोबाइल केसेबंद होँ सकते हें? कुछ तोँ बात अवश्य हैं। हमें जल्द सें जल्दइस सबकापता लगाना चाहिए डैड। "
"शिवासही कहरहा हैं अजय। " प्रतिमा नें कहा___"हमारे व्यक्ति इतने लापरवाह नहि हौ सकते कि ऐसे माहौल मे वोँ सभी अपना मोबाइल हि बंदकर लें। अवश्य कोईबात हुइ हैं। वरनाअब तक तौ उनमें सें किसी नें तुम्हें मोबाइल करकेयह अवश्य बताया होता कि उन लोगों नें विराज कों अपने कब्जे मे लेँ लिया हैं औऱ अब वोँ सीधा यहीं आँ रहे हें। मगरऐसा कुछ नहि हुआअब तक। इसका मतलबसाफ हैं कि कोई गंभीर बात हौ गई हैं। "
"मुझे भि ऐसा हि लगता हैं। " अजय सिंह नें चिंतित भाव सें कहा___"कोई तोँ बात हुइ हैं। मगर प्रश्न यह हैं कि ऐसी क्याँ बात हौ सकती हैं भला?उन पर्र किसी प्रकार केँ संकट केँ आने कां प्रश्न हि नहि हैं क्योंकि वोँ स्वयं भि कई सारे एक् संग थें औऱ स्वयं दूसरों केँ लिए संकट हि थें। "
"असलियत कां पता तोँ तभी चलेगा अजयजब तुम् इस सबकापता करने यहाॅ सें जाओगे। " प्रतिमा नें कहा___"यहाॅ पर्र बातों मे वक्त गवाॅने कां कोई मतलब नहि हैं। "
"माॅमठीक कहरही हें डैड। " शिवा नें कहा__"हमें जल्दी हि इस सबकापता लगाने केँ लिए यहाॅ सें निकलना चाहिए। वरना कहींऐसा न् होँ कि हम् जिस सुनहरे मौके कि बातकर रहे थें वोँ हमारे हाॅथ सें निकलजाए। "
"यूआर अब्सोल्यूटली राइट। "अजय सिंह नें कहा__"चलो चलकर देखते हें कि क्याँ बात होँ गई हैं?"
"तुम् दोनोजाओ। " प्रतिमा नें कहा__"मे यहीं पऱ तुम् दोनो कां इंतजार करूॅगी। "
प्रतिमा कि बात समाप्त होते हि दोनो बाप बेटे सोफों सें उठकर बाहर् कि तरफचल दिये। बाहर् आकरअजय सिंह अपनी गाड़ी कां ड्राइविंग डोरखोल कर उसमें बैठ गय़ा, जबकि शिवा उसकेबगल वालीशीट पर्र बैठ गय़ा। वाहन कों स्टार्ट करअजय सिंह नें गाड़ी कों झटके सें आगे बढ़ा दिया। उसकी वाहनऑधी तूफान बनी सड़कों पऱ घूमने लगी थि।
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इधरपवन केँ घऱ मे मे औऱ आदित्य नहाधो कर फ्रेश हौ गए थें औऱ अब हम् सभी खानां खाने केँ लिए बैठेहुए थें। पवन नें अपनीमाॅ औऱ बेहन दोनो कि मेरेआने कां पहले हि बता दिया थां। बसयह नहि बताया थां कि उसने मुझे यहाॅकिस लिए बुलाया थां? उनसेयही कहा थां कि मे बस घूमने आयाहूॅ।
पवन कि माॅ कों मे भि माॅ हि बोलता थां शुरुआत सें हि। मेरी नज़र मे माॅ सें बड़ा औऱ पवित्र नाताकोई नहि होँ सकता थां। वोँ मुझे शुरुआत सें हि बहोत चाहती थि औऱ प्रेम व स्नेह देतीथीं। पवन कि बेहनआशा दिदी मुझसे औऱ पवन सें उमर मे बड़ी थि। उनका स्वभाव पिछले कुछ सालों तक हॅसमुख औऱ चंचल थां लेकिन अब वोँ अधिक किसी सें बात नहि करती थि। उनके चेहरे पऱ हर टाइम गंभीरता विद्यमान रहती थि। इसकीवजह समझना कोई बड़ीबात नहि थि। हरकोई समझ सकता थां कि उनके स्वभाव मे यह तब्दीली किसवजह सें आई हुइ थि।
खानां पीना सें फुर्सत होकर हम् सभी बाहर् बैठक मे आँ गए। मेरेमन मे इस वक़्त कुछ औऱ हि चलरहा थां। इसलिए मे बैठक सें उठकर अंदरमाॅ केँ पासचला गय़ा। मैने देखामाॅ औऱ आशा दिदी हम् लोगों कि खाई हुइ थालियाॅ ऑगन मे एक् स्थान रखरही थि।
मुझेऑगन मे आयादेख माॅ केँ होठों पर्र मुस्कान आँ गई। आशा दिदी भि मुझेदेख कर हल्का सां मुस्कुराई। फिन वोँ वहीं पर्र बैठकर थालियाॅ धोनेलगी। जबकि माॅ मेरेपास आँ गईं।
"चल आजा मेरेसंग। " माॅ एक् तरफ कों बढ़ती हुइ बोलीं___"मुझे पता हैं तुम्हें मेरी गोंद मे सिररख कर सोना हैं। कितना टाइम होँ गय़ा मैने भि तुम्हे वैसा प्रेम औऱ स्नेह नहि दिया। समय औऱ हालात ऐसेबदल जाएॅगे ऐसाकभी सपने मे भि नहि सोचा थां। बुरे लोगों कां एक् दिन अवश्य नाश होता हैं बेटा। बस थोडा वक़्त लग जाता हैं। अजय सिंह कों उसके बुरे कर्मों कि सज़ा परमेश्वर अवश्य देगा। "
माॅ यहसभी बड़बड़ाती हुई अंदर कमरे मे आँ गईं। मे भि उनके पीछे पीछे आँ गय़ा थां। कमरे मे रखी चारपाई पऱ माॅ पालथी मारकर बैठगईं औऱ फिन मेरीतरफ देखकर मुझे अपनेपास आने कां इशारा किया। मे खुशी सें उनकेपास गय़ा औऱ चारपाई केँ नीचे हि उकड़ू बैठकर अपनासिर उनकी गोंद मे रख दिया।
"अरे नीचे क्यूं बैठ गय़ा बेटे?"माॅ नें मेरेसिर पऱ प्रेम सें हाथ फेरते हुए कहा___"ऊपर आजा औऱ फिनठीक सें वैसे हि लेटजा जैसे पहलेलेट जाया करता थां मेरी गोंद मे। "
"नहि माॅ, मे ऐसे हि ठीकहूॅ। " मैनेसिर उठाकर उनकीतरफ देखते हुए बोला__"मुझे आपसेकुछ बात करनी हैं माॅ। "
"हाॅ तोँ कह नाँ। " माॅ नें मेरे चेहरे कों एक् हाथ सें सहलाया___"तुझे हीकोई भि बात करने केँ लिए मुझसे पूछने कि क्याँ ज़रूरत हैं? ख़ैर, बता क्याँ बात करना हैं तुम्हारी तरफ?"
"सबसे पहलेयह बताइये कि मे आपका बेटा हूॅ कि नहि?" मैनेमाॅ केँ चेहरे कि तरफ देखते हुएकहा।
"यह कैसा प्रश्न हैं बेटा?" माॅ केँ चेहरे पऱ नां समझने वालेभाव उभरे___"तुँ तोँ मेरा हि बेटा हैं। जैसेपवन मेरा बेटा हैं वैसे हि तुँ भि मेरा बेटा हैं। "
"अगर मे आपका बेटा हूॅ तौ मुझे भि आपका बेटा होने कां हर फर्ज़ निभाना चाहिए न्?" मैने भोलेपन सें कहा थां।
"यह तौ बेटों कि सोच औऱ समझदारी पऱ निर्भर करता हैं बेटा। " माॅ नें हल्का सां मुस्कुराते हुए कहा___"कि वोँ अपने माता पिता व परिवार केँ लिए कैसा विचार रखते हें? पर्र हाॅ नियम औऱ संस्कार तोँ यही कहते हें कि हर ब्यक्ति कों अपना कर्तब्य व फर्ज़ सच्चे दिल सें निभाना चाहिए। जैसे माता पिता अपने बच्चों केँ लिएहर फर्ज़ सच्चे दिल सें निभाते हें। "
"मे औऱ तौ कुछ नहि जानता माॅ। " मैने कहा___"मगर इतना अवश्य समझता हूॅ कि एक् बेटे कों हमेशा ऐसाकाम करना चाहिए जिससे कि उसके माता पिता कों अपनेउस बेटे पर्र गर्व हौ। वोँ अपने बेटे केँ हरकाम सें खुश हौ जाएॅ। इस लिएमाॅ, मे भि अब वोँ फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ। "
"यह तोँ बहोत अच्छी बात हैं बेटा। " माॅ नें खुश होतेहुए कहा___"तुम्हें ऐसा करना भि चाहिए। मुझे खुशी हैं कि तूने इतनी मुश्किलों औऱ परेशानियों मे भि अपने अच्छे संस्कारों कां हनन नहि होने दिया। तूँ अब बड़ा हौ गय़ा हैं, इसलिए तुम्हे अब अपने कर्तब्यों औऱ फर्ज़ों कि तरफ ध्यान देना चाहिए। तेरीमाॅ औऱ बेहन नें बहोत दुख दर्द झेला हैं बेटा। मे चाहती हूॅ कि तूँ उन्हें हमेशा खुशरखे। "
"वोँ दोनोअब खुश हि हें माॅ। " मैने कहा__"मगर मे अब अपनी दूसरी माॅ कां बेटा होने कां भि फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ। "
"क्याँ मतलब?"माॅ नें मेरीइस बात सें हैरान होकर मेरीतरफ देखा___"यह तुँ क्याँ कहरहा हैं बेटा?"
"हाॅमाॅ। " मैने कहा___"आप् मेरी दूसरी माॅ हि तोँ हें औऱ मे आपका बेटा हूॅ। इस लिए मे आपका बेटा होने कां फर्ज़ निभाना चाहता हूॅ। आशा दिदी कि विवाह बड़े धूमधाम सें किसी बड़ेघऱ मे किसी अच्छे लड़के केँ संग करना चाहता हूॅ। आज आशा दिदी केँ मुरझाए हुए चेहरे कों देखकर मुझे कितनी तक़लीफ़ हुई यह मे हि जानता हूॅमाॅ। कितनी बदल गई हें वोँ, हर वक़्त बिंदास औऱ चंचल रहने वाली मेरीआशा दिदी नें आज स्वयं कों गहन उदासी औऱ गंभीरता कि चादर मे ढॅककर रख लिया हैं। मे उन्हें इसतरह नहि देख सकतामाॅ। वोँ मेरी सबसे प्यारी बेहन हें। मे चाहता हूॅ कि उनके चेहरे पऱ फिन सें पहले जैसी चंचलता औऱ खुशियाॅ हों। इस लिएमाॅ, मैने फैंसला कर लिया हैं कि अब मे वही करूॅगा जौ मुझे करना चाहिए। "
"पऱ बेटा यहसभी.। " माॅ नें कुछ कहना चाहामगर मैने उनकीबात काटकर कहा__"मे आपकीकोई भि बात नहि सुनूॅगा माॅ। अगर आप् मुझेसच मे अपना बेटा मानती हें तोँ मुझे मेरा फर्ज़ निभाने सें नहि रोकेंगी। "
मेरीइस बात सें माॅ मुझे देखती रहगईं। उनकी ऑखों मे ऑसूॅभर आए थें। मैनेउठ करमाॅ कों अपने सें छुपका लिया औऱ फिन बोला___"आप् स्वयं कों दुखीमत कीजिए माॅ। देख लेना, आपकायह बेटा सभीकुछ ठीककर देगा। "
"मुझे खुशी हैं कि तूँ मेरा बेटा हैं। " माॅ नें मुझसे अलग होकर मेरे माथे पर्र हल्के सें चूमते हुए कहा___"मगर बेटा तुम्हें अंदाज़ा नहि हैं कि विवाह ब्याह मे कितना रूपया रुपया खर्च करना पड़ता हैं। तेरेपास भला इतना पैसा रुपया कहाॅ सें आएगा कि तुँ अपनी दिदी कि विवाह करसके?"
"आपकेइस बेटे केँ पास इतना रुपया हैं माॅ कि वोँ चाहे तोँ पूरे हल्दीपुर कों खड़े खड़े खरीद लेँ। " मैने मुस्कुराते हुए कहा___"जिस मिल्कियत कों पाने केँ लिए मेरे बड़े बापू नें हमारे संगयह सभी किया हैं नं उससे कहीं अधिक मेरेपास आज केँ टाइम मे मिल्कियत हैं। "
"क्याँ????" माॅ कि ऑखें आश्चर्य सें फट पड़ी थि, फिन सहसा अविश्वास भरेभाव सें बोलीं___"पर्र बेटा तेरेपास इतना रुपया कहाॅ सें आँ गय़ा?"
"सभी कुदरत केँ करिश्मे हें माॅ। " मैने सहसा गंभीर होकर कहा___"ईश्वर अगर किसी कों दुख तक़लीफ़ें देता हैं तोँ एक् दिनउसे उसदुख तक़लीफ़ सें मुक्त भि कर देता हैं। मेरे अपनों नें मेरेसंग क्याँ कियायह तोँ आप् जानती हें माॅमगर किसी ग़ैर नें अपनाबन कर मेरेलिए क्याँ कियायह आप् नहि जानती हें। वोँ ग़ैर मेरेलिए फरिश्ता क्याँ बल्कि ईश्वर बनकरआया औऱ आज मुझेहर दुख दर्द सें मुक्त कर दिया। "
"यह तुँ क्याँ कहरहा हैं बेटा?" माॅ नें गहन आश्चर्य केँ संग कहा___"मेरी समझ मे तेरीयह बातें नहि आँ रही। "
मैनेमाॅ कों संक्षेप मे सारी किस्सा बताई। उन्हें बताया कि मुम्बई मे मे जिस मल्टीनेशनल कंपनी मे काम करता थां उस कंपनी केँ मालिक जगदीश ओबराय मुझसे प्रभावित होकर मुझे क्याँ क्याँ काम दिया औऱ फिन केसे उनकेदिल मे मेरेलिए प्रेम औऱ स्नेह जागा। केसे उन्होंने मुझे अपना बेटा बना लिया औऱ फिन केसे उन्होंने अपनी सारी प्रापर्टी जोँ करोड़ों अरबों मे थि उसे मेरेनाम कर दिया औऱ आज मे अपनीमाॅ औऱ बेहन केँ संग उनके हि अलीशान बॅगले मे रहताहूॅ। मैनेमाॅ कों यह भि बताया कि कुछदिन पहलेअभय चाचा भि मुझे ढूॅढ़ते हुए वहाॅ पहुॅचे थें। पवन केँ बताने पऱ मे उनको रेलवे स्टेशन सें अपने बॅगले मे लेँ गय़ा औऱ अब वोँ भि मेरेसंग हि वहाॅ पर्र हें। सारी बातें सुनने केँ बादमाॅ मुझेइस तरह देखने लगी थि जैसे मेरेसिर पऱ अचानक हि उन्हें दिल्ली कां कुतुब मीनार खड़ाहुआ नज़रआने लगा हौ।
"अब आपकायह बेटा करोड़ क्याँ बल्कि अरबपति हैं माॅ। " मैनेमाॅ कों उनके कंधों सें पकड़ते हुए कहा___"इस लिए आप् इसबात कि बिलकुल भि चिंता मत कीजिए कि आशा दिदी कि विवाह मे केसेक पाऊॅगा?"
"ईश्वर कां लाखलाख शुकर हैं बेटा कि उसनेतुझ पऱ इतनी अनमोल कृपा कि। " माॅ नें खुशी सें छलकआई अपनी ऑखों कों पोंछते हुए कहा___"दिन रात मे यही सोचती रहती थि कि किसहाल मे होगा तुँ वहाॅ पर्र औऱ किसतरह तुँ अपनीमाॅ बेहन कों अपनेसंग रखाहुआ होगा?मगर तेरीयह बातें सुनकर मेरेमन कां बोझ हल्का होँ गय़ा हैं। मेरा बेटा इतना बड़ा व्यक्ति बन गय़ा हैं इससे ज़्यादा खुशी कि बात एक् माॅ केँ लिए क्याँ हौ सकती हैं?"
"सभी आपकी दुवाओं औऱ आशीर्वाद कां फल हैं माॅ। " मैने कहा___"माॅ कि दुवाओं मे बहोत असर होता हैं। ईश्वर माॅ कि दुवाओं कों कभी विफल नहि होनेदे सकता। "
मेरीयह बात सुनकर माॅ नें मुझे अपनेगले सें लगा लिया। मेरेसिर पर्र प्रेम सें हाॅथ फेरती रहीं वोँ। फिन मे उनसेअलग हुआ औऱ बोला___"माॅ मे दिदी सें भि मिललूॅ। उनके चेहरे पऱ फिन सें मुझे पहले वाली खुशियाॅ देख्ना देख्ना हैं। "
"ठीक हैं जामिल लें उससे। "माॅ नें कहा__"तेरे समझाने सें शायद वोँ खुश रहनेलगे। "
"वोँ अवश्य खुश रहेंगी माॅ। " मैने कहा__"मे उनके चेहरे पऱ वही खुशी लाऊॅगा। उनकायह भइया उनकी दामन मे हरतरह कि खुशियाॅ लाकरडाल देगा। "
मेरीबात सुनकर माॅ कि ऑखेंभर आईं जिन्हें उन्होंने अपनी सफेद सारी केँ ऑचल सें पोंछ लिया। मे उनकेपास सें चलकर कमरे सें बाहर् आया औऱ आशा दिदी केँ कमरे कि तरफबढ़ गय़ा। दिदी केँ कमरे कां दरवाजा हल्का सां खुलाहुआ थां। मैने दरवाजे पऱ लगी साॅकल कों पकड़कर बजाया। लेकिन अंदर सें कोई प्रतिक्रिया नं हुइ। मैने बाहर् सें हि आवाज़ लगाई उन्हें तब जाकर अंदर सें दिदी कि आवाज़ आई। वोँ कहरही थि कि आजाराज दरवाजा तौ खुला हि हैं।
मे अंदर गय़ा तौ देखा दिदी चारपाई केँ किनारे पऱ बैठी हुईँ थि। उनकासिर नीचे झुकाहुआ थां। मे उनकेपास जाकर उनकेबगल सें बैठ गय़ा औऱ उनके कंधे पर्र हाॅथरखा। दिदी नें सिरउठा कर मेरीतरफ देखा तौ मे चौंक गय़ा। उनका चेहरा ऑसुओं सें तर थां। उनकीइस हालत कों देखकर मेरादिल प्यास उठा।
"यह क्याँ दिदी?" मैने कहा___"मेरी इतनी प्यारी दिदी कि ऑखों मे इतने सारेऑसू?"
मेरीबात पूरी भि न् हुई थि कि आशा दिदी झपटकर मुझसे लिपट गई औऱ फूटफूट कर रोनेलगी।
मुझे उनकेइस तरहफूट फूटकर रोने सें बड़ादुख हुआ। मगर मैने उन्हें रोने दिया। शायदयह उनके अंदर कां गुबार थां। जिसका बाहर् निकल जानां बेहद ज़रूरी थां। मे उनकेसिर पऱ बड़े प्रेम व स्नेह भाव सें हाॅथ फेरता रहा।
सहसा मुझे उनकेसंग बिताए हुएकुछ खुशियों भरेसमय याद आँ गए। मे, पवन औऱ आशा दिदी हमेशा ऊधम मचाते थें इसघऱ मे। माॅ हमारी शैतानियाॅ देखकर खुस्सा करती, हलाॅकि हम् तीनों जानते थें कि हम् तीनों कां यह प्रेम देखकर माॅ स्वयं भि अंदर हि अंदरखुश हुआ करती थि। मगर प्रत्यक्ष मे माॅ हमेशा दिदी कों डाॅटने लगती। कहती कि वोँ तौ हम् दोनो सें बड़ी हैं फिन क्यूं हमारे संग बच्ची बन जाती हैं। माॅ केँ डाॅटने सें दिदी मुह फुलाकर बैठ जाती। उसकेबाद मे औऱ पवन उन्हें मनाने लगते। हम् दोनो केँ पास उन्हें मनाने कां बड़ा हि साधारण औऱ सुंदर सां तरीका होता थां। इससमय वही तरीका मेरे ज़हन मे आया तौ बरबस हि मेरे होठों पऱ मुस्कान उभरआई।
"दुनियाॅ मे सबसे हसीनकौन?" मैने दिदी कों अपने सें छुपकाए हुए हि प्रेम सें कहा।
"केवल मे। " मेरीबात सुनते हि दिदी कों पहले तोँ झटका सां लगाफिन उसी हालत मे बोल पड़ी थि।
"दुनियाॅ मे सबसे प्यारी कौन?" मैनेफिन सें कहा।
"केवल मे। " दिदी नें लरजते स्वर मे कहा।
"दुनियाॅ मे सबसे चंचलकौन?" मैने पूछा।
"केवल मे। " दिदी नें भारी स्वर मे कहा।
"दुनियाॅ मे सबसे नटखटकौन?" मैने पूछा।
"मात्र मे?" दिदी कि आवाज़ लड़खड़ा गई।
"औऱ दुनियाॅ मे सबसे शैतान कौन?" मैने सहसा मुस्कुरा कर पूछा।
"मात्र मे। " दिदी नें कहा तोँ मे चौंक पड़ा। उन्हें स्वयं सें अलगकर उनके चेहरे कि तरफ बड़े ध्यान सें देखा मैने।
आशा दिदी कां दूध सां सफ़ेद चेहरा ऑसुओं सें तर थां। नज़रें झुकी हुईँ थि उनकी। मे हैरान इसबात पर्र हुआ थां कि मेरे पूछने पर्र कि "दुनियाॅ मे सबसे शैतान कौन" कां जवाब भि उन्होंने यही दिया कि "मात्र मे"। जबकि अक्सर यही होता थां कि इस प्रश्न पर्र वोँ यही कहती कि शैतना तुम् दोनो हि होँ। मे तौ मासूम हूॅ। मगर आज उन्होंने स्वयं कों हि शैतान कह दिया थां।
"यह तोँ कमाल होँ गय़ा दिदी। " मैने मुस्कुराते हुए कहा___"आज आपने स्वयं कों हि कह दिया कि आप् हि सबसे शैतान होँ। आज आपनेयह नहि कहा कि मे औऱ पवन हि सबसे ज़्यादा शैतान हें। आप् तोँ मासूम हि हें। "
"हाॅ तोँ क्याँ हुआ?" दिदी नें सहसा तुनककर कहा___"आज मे शैतान बन जातीहूॅ। तुम् दोनो मासूम बनजाओ। "
मे उनकीइस बात कों सुनकर मुस्कुराया। दिदी नें यहबात बिलकुल वैसे हि अंदाज़ मे कही थि जैसा अंदाज़ उनकाआज सें पहलेहुआ करता थां। दिदी कों भि इसबात कां एहसास हुआ औऱ फिन एकाएक हि उनकी रुलाई फूट गई।
"अरेअब क्याँ हुआ दिदी?" मैने उनको अपने सें छुपका कर कहा___"देखो अब रोना नहि। मुझे बिलकुल पसन्द नहि कि आप् मेरी इतनी प्यारी सि दिदी कों बातबात पर्र इसतरह रुलादो। चलोअब जल्द सें रोनाबंद करो औऱ अपनीवही मनमोहक मुस्कान औऱ नटखटपना दिखाओ मुझे ताकि मेरेमन कों चैनमिल जाए। "
"अब तूँ आँ गय़ा हैं नं तोँ अब मे नहि रोऊॅगी राज। "आशा दिदी नें कहा___"तुम्हे पता हैं मे तुझेही कितना मिस करती थि। हम् तीनो कां वोँ बचपन जाने कहाॅगुम होँ गय़ा थां? तुम् दोनो मेरे खिलौने थें जिनके संग मे हॅसती खेलती रहती थि। "
"मे जानता हूॅ दिदी। " मैने उन्हें स्वयं सें अलग करतेहुए कहा___"मगर आप् तोँ जानती हें कि वक्त हमेशा एक् जैसा नहि रहता। वक्त केँ संगसंग सभीकुछ बदल जाता हैं। ख़ैर, छोंड़िये यहसभी औऱ मुझसे वादा कीजिए कि अब सें आप् हमेशा खुश रहेंगी। अपने चेहरे पर्र वोँ उदासी औऱ किसी भि तरह केँ दुख केँ भाव नहि आने देंगी। "
"हम्म। " दिदी नें हाॅ मे सिर हिलाया।
"अब बताइये आपको अपनेइस भइया सें क्याँ तोहफ़ा चाहिए?" मैने मुस्कुराते हुए पूछा।
"तुँ आँ गय़ा हैं मेरेपास। " दिदी नें मेरे चेहरे कों अपनेहाथ सें सहलाकर कहा___"इससे बड़ा तोहफ़ा मेरेलिए औऱ क्याँ होगा?"
"पऱ मे तौ आपकेलिए आपकी पसंद चीज़ लेकर हि आयाहूॅ। " मैने कहा__"अब अगर आपको नहि चाहिए तौ ठीक हैं मे उसे किसी औऱ कों दे दूॅगा। "
"ख़बरदार अगर किसी औऱ कों दिया तौ। " दिदी नें ऑखें दिखाते हुए कहा___"ला दे मेरी चीज़ मुझे। वैसे क्याँ लेकरआया हैं राज?"
"सोचिये। " मैने मुस्कुराते हुए कहा___"क्याँ हौ सकती हैं वोँ चीज़?"
मेरीयह बात सुनकर आशा दिदी सोच मे पड़गईं। मैने देखा कि इससमय उनके चेहरे पऱ वही चंचलता औऱ वही बिंदासपन आँ गय़ा थां। उनका चेहरा एकदम सें अब खिला खिलालग रहा थां।
"सोच लिया मैने। "आशा दिदी एकदम सें उछलते हुए बोलीं___"कि तुँ मेरेलिए कौन सि चीज़ लेकरआया हैं?"
"अच्छा तोँ बताइये। " मैनेहॅस कर कहा__"ज़रा मे भि तोँ जानूॅ कि आपने क्याँ सोच लिया हैं?"
"तूँ न् मेरेलिए। " आशा दिदी नें धीरे-धीरे धीरे-धीरे औऱ आराम आहिस्ता कहना शुरुआत किया__"तुँ न् मेरे लिए.एक् प्यारी सि, हसीन सि सोने कि घड़ी लेकरआया हैं। जिसे मे अपनेइस हाॅथ मे पहनूॅगी। अबबता बच्चू, मैंने सहीकहा न्? हाॅ.बोल बोल। "
मे दिदी कि इसबात पऱ औऱ उनकेइस अंदाज़ पर्र मुस्कुरा उठा। उन्होने जोँ कहा वोँ यकीनन सच हि तोँ थां। मे उनकेलिए एक् सोने कि घड़ी लेकर हि आया थां। मुझेयाद हैं जब वोँ मेरेहाथ कि कलाई मे एक् आम सि घड़ी देखती तौ यही कहती कि__"अरे यह तोँ मामूली सि घड़ी हैं बेटा, आशा रानी तोँ अपने हाॅथ मे सोने कि घड़ी पहनेगी एक् दिन। देख लेना। वरना सारीउमर घड़ी हि नहि पहनेगी। मे औऱ पवन उनकीइस बात पऱ अक्सर हॅसने लगते। हमारे हॅसने पऱ उन्हें लगता कि हम् दोनो उनका मज़ाक उड़ारहे हें। इसलिए वोँ मुह फुलाकर एक् तरफबैठ जाती। उसकेबाद हम् दोनोफिन सें उन्हें उसी तरीके सें मनाने लगते औऱ वोँ खुश होँ जाती। ऐसी थि आशा दिदी। वोँ हम् लोगों सें उमर मे तीनचार साल बड़ी थि मगर हमारे संग वोँ हमसे भि छोटीबन जाती थि।
यहसभी सोचकर सहसा मेरी ऑखों सें ऑसूछलक पड़े। आशा दिदी नें मेरी ऑखों सें छलके ऑसूॅ कों देखा तोँ। उन्होंने मुझे स्वयं सें छुपका लिया।
"ओये यह क्याँ हैं अब?"फिन उन्होंने कहा__"अभि तक तौ बड़ा मुजसे कहरहा थां कि अब सें मे स्वयं कों नं रुलाऊॅ औऱ अब तूँ क्यूं रोनेलगा? चल रोना नहि वरना मे भि रो दूॅगी। "
"यह तौ खुशी केँ ऑसू हें दिदी। " मे उनसेअलग होतेहुए बोला___"कुछ यादें ऐसी होती हें जिनके यादआने सें बरबस हि ऑखेंछलक पड़ती हें। ख़ैर, यह लीजिए आपकी घड़ी। देख लीजिए सोने कि हि हैं नं?"
"मुझेपता हैं कि मेरा भइया मेरी कलाई मे सोने केँ अलावा कोई औऱ घड़ी नहि पहनाएगा। " दिदी नें कहा मुस्कुराकर कहा___"उसे पता हैं कि मैने क्याँ प्रण किया थां?"
"आपनेसही कहा दिदी। " मैने कहा__"मे आपके प्रण कों केसे भुला सकताहूॅ? जब मे वहाॅ सें चलने वाला थां तोँ मुझे आपकीयाद आई औऱ फिन सबकुछ यादआया। इसलिए मे गय़ा औऱ ज्वैलरी कि दुकान सें आपकेलिए यह घड़ी खरीद लाया। "
मेरीबात सें दिदी मुस्कुरा दि औऱ फिनउस पैकिट कों खोलने लगी जिसमें मे उनकेलिए घड़ी लेकरआया थां। कुछ हि देर मे पैकेट खोलकर उन्होने उस घड़ी कों निकाल कर देखा। वोँ सचमुच सोने कि हि घड़ी थि। घड़ीदेख कर दिदी कि ऑखेंफिन सें भरआईं।
"राज, आज मे बहोत खुशहूॅ। " फिन उन्होने कहा___"इस लिए नहि कि तूँ घड़ी लेकरआया हैं बल्कि इसलिए कि तूँ यहाॅआया औऱ तुझेही अपनी दिदी केँ प्रण कां ख़याल थां। मुझे खुशी हैं कि तेरे जैसा लड़का मेरा भइया हैं। "
"मुझे भि तौ खुशी हैं दिदी। " मैने कहा__"कि आप् मेरी सबसे प्यारी बेहन होँ। आपको मे गुड़िया(निधी) कि तरह हि प्रेम करताहूॅ। "
"हाॅयह मे जानती हूॅ। " दिदी नें मुस्कुरा कर कहा___"अच्छा राज, इस घड़ी कों तूँ हि पहनादे नं मुझे। "
"ठीक हैं दिदी। " मैने कहा___"जैसी आपकी ख़्वाहिश। "
मैने उनके हाॅथ सें घड़ील। दिदी नें अपने बाएॅहाथ कि कलाई मेरीतरफ बढ़ा दि। मैने उनकी हसीन कलाई पऱ उस घड़ी कों डालकर पहना दि। यहदेख करआशा दिदी खुश हौ गई औऱ एकदम सें मुझसे लिपट गई।
"कितनी अच्छी लगरही हैं नं राज?" वोँ खुशी सें मानो चहकती हुई बोलि___"अच्छा यहबता कि इसके अंदर पानी तोँ नहि जाएगा न्?"
"नहि जाएगा दिदी। " मैने मुस्कुरा कर कहा___"यह फुल वाटरप्रूफ हैं। "
"फिनठीक हैं। " दिदी नें मुझसे अलग होकर कहा___"अब न् मे इसेकभी भि अपनी कलाई सें नहि उतारूॅगी। "
"ठीक हैं दिदी। " मैने कहा___"जैसी आपकी मर्ज़ी। अच्छा दिदी अब मे चलताहूॅ औऱ हाॅयाद हैं नं.अब सें आप् स्वयं कों दुःखी याँ दुखी नहि रखेंगी। "
"हाॅहाॅ याद हैं बाबा। " दिदी नें हॅसकर कहा___"औऱ अब तौ मेरे भइया नें मेरी मनपसंद कि चीज़ भि दे दि। फिनकिस लिए स्वयं कों दुःखी याँ दुखी रखना?"
"यह हुईँ नं बात। " मैने दिदी केँ माथे पऱ हल्के सें चूमा औऱ फिनपलट कर वापस दरवाजे कि तरफचल दिया। अभि मे दो हि क़दम दरवाजे कि तरफ बढ़ा थां कि मेरी नज़र दरवाजे पर्र खड़ेपवन औऱ माॅ पर्र पड़ी। मे उन्हें देखकर पहले तोँ चौंका फिन हौले सें मुस्कुरा दिया। दरवाजे बाहर् आकर मैने दरवाजे केँ दोनो पाटों कों आपस मे सटाकर चल दिया।
मेरे पीछे पीछेपवन औऱ माॅ भि आनेलगे। माॅ केँ कमरे मे आकर मे एक् स्थान बैठ गय़ा।
"तौ बेहन कों खुशकर दिया उसके भइया नें?" माॅ नें ऑखों सें अपनेऑसू पोंछते हुए कहा___"आज बहुत वक़्त बादउसे इतनाखुश औऱ चहकते हुए देखा हैं मैने। "
"अब सें वोँ हमेशा खुश हि रहेंगी माॅ। " मैने कहा___"औऱ हाॅ बहोत जल्द मे उनकेलिए एक् अच्छा सां नाता तलाश करूॅगा। उनकी विवाह एक् ऐसेघऱ मे औऱ एक् ऐसे लड़के सें करूॅगा जौ उन्हें दुनियाॅ कि हर खुशी देगा। "
"अब मुझे उसकी विवाह कि चिंता नहि हैं बेटे। "माॅ नें कहा___"उसका भइया आँ गय़ा हैं तोँ अबसभी वहीं सम्हालेगा। "
मैनेपवन कि तरफ देखा वोँ अपनी ऑखों मे ऑसू लिये एक् तरफ खड़ा थां। मे उसकेपास जाकर उससे बोला___"तूने मुझे बुलाकर बहोत अच्छा किया हैं भइया। मगर आज जोँ कुछ भि रास्ते मे हुआ हैं उस सबसे बहोत जल्द एक् नई मुसीबत सामने आने वाली हैं। बड़े बापू कों पता लगाने मे ज़्यादा वक़्त नहि लगेगा कि वोँ सभी किसने किया उनके आदमियों केँ संग? वोँ यह भि पताकर लेंगे कि मे यहाॅ किसके यहाॅ रुकाहुआ हूॅ। इस लिएअब तुम् यह भि समझलो कि इसघऱ मे रहतेहुए तुममें सें कोई भि सुरक्षित नहि हैं। "
"यह तुम् क्याँ कहरहे हौ बेटा?" माॅ नें चकितभाव सें कहा___"क्याँ हुआ हैं आज रास्ते मे?"
मैनेमाॅ कों संक्षेप मे सबकुछ बता दिया। मेरीबात सुनकर माॅ सकते मे आँ गई। उनके चेहरे पऱ एकदम सें डरवभय केँ भाव गर्दिश करते नज़रआने लगे।
"यह तोँ बहोत बड़ा अनर्थ होँ गय़ा हैं बेटा। " माॅ नें सहमेहुए लहजे मे कहा___"तुमने अजय सिंह केँ आदमियों कों मारकर अच्छा नहि किया। अजय सिंहइस सबका बदला अवश्य लेगा। "
"यह तौ होना हि थां माॅ। " मैने कहा___"आप् स्वयं सोचिए कि अगर मे औऱ आदित्य यहसभी नहि करते तोँ उनके व्यक्ति हमें अपनेसंग लेँ जाकर बड़े पिताजी केँ हवाले कर देते। उस सूरत मे बड़े पिताजी हमारे संग क्याँ करते इसका अंदाज़ा आप् नहि लगा सकतीमाॅ। वोँ मुझे बंधकबना कर मुझसे ज़बरदस्ती मेरीमाॅ बेहन औऱ अभय चाचा कों मुम्बई सें यहाॅ बुलवा लेते। उसकेबाद क्याँ होतायह आप् सोचकर देखिये। "
"राजसही कहरहा हैं माॅ। "पवन नें कहा__"रास्ते मे इसके बड़े पिताजी केँ व्यक्ति इसे पकड़ने केँ लिए हि आए थें औऱ अगर वोँ लोगइसे पकड़कर लेँ जाते तौ सचमुच बहोत बड़ा अनर्थ होँ जाता। इस लिएअजय चाचा केँ आदमियों कों मारने केँ सिवा दूसरा कोई मार्ग हि नहि थां इसकेपास। "
"पर्र इसनेअजय सिंह केँ उतने सारे आदमियों कों केसे ख़त्म कर दिया?"माॅ केँ चेहरे पऱ हैरत केँ भाव थें।
"आपको नहि पतामाॅ। " पवनकह रहा थां___"इसने औऱ आदित्य नें पाॅच मिनट मे उन सबकाकाम तमामकर दिया थां। मैने वोँ सभी अपनी ऑखों सें देखा थां। मुझे यकीन हि नहि हौ रहा थां कि यहवही राज हैं जोँ इतना शान्त औऱ भोला भालाहुआ करता थां। "
"यहसभी छोड़ो। " मैने कहा___"मे यहकहरहा हूॅ कि बड़े बापू कों इसबात कां पता बहोत जल्दचल जाएगा कि मे यहाॅपवन केँ घऱ मे रुकाहुआ हूॅ। इस लिए वोँ आप् सबको भि अपना दुश्मन समझ लेंगे औऱ आप् लोगों केँ संगकुछ भि बुराकर सकते हें। अतःअब आप् लोगों कां यहाॅ रहना किसी भि तरह सें ठीक नहि हैं। "
"बात तौ तुम्हारी ठीक हि हैं भइया। "पवन नें कहा___"मगर हम् तेरे बड़े पिताजी केँ डर सें अपनायह घऱ छोंड़ करभला कहाॅ जाएॅगे?"
"मुम्बई। " मैने कहा___"हाॅ पवन। अब आप् लोगों कां यहाॅ रहना खतरे सें खाली नहि हैं। इसलिए अब आप् लोग मेरेसंग मुम्बई चलोगे। तुम्हें पता हैं, अभय चाचा नें भि मुझे कुरुणा चाची औऱ उनके बच्चों कों मुम्बई लें आने कों कहा हैं। क्योंकि उन्हें भि पता हैं कि करुणा चाची औऱ दिव्या व शगुन सुरक्षित नहि हें। "
"मगर बेटा। " माॅ नें झिझकते हुए कहा___"हम् सभी वहाॅ तेरेलिए बोझबन जाएॅगे। इतने सारेलोग वहाॅ केसेरह पाएॅगे?"
"यहकहकर आपने मुझे पराया कर दियामाॅ। " मैने दुखीभाव सें कहा___"भला आप् ऐसा केसेसोच सकती हें कि मेरेलिए आप् लोगबोझ बन जाएॅगे?"
माॅ कों अपनी ग़लती कां एहसास हुआइस लिए उन्होंने मुझे अपनेगले सें लगाकर कहा___"मेरा वोँ मतलब नहि थां बेटा। मे तोँ बसयह कहना चाहती थि कि वहाॅ पर्र हम् सभी इतने सारेलोग केसे रहेंगे?"
"आप् इसबात कि फिक्र मत कीजिए माॅ। " मैने कहा___"मुम्बई मे जहाॅ मे रहताहूॅ वोँ एक् बहोत बड़ा बॅगला हैं। वहाॅ पर्र सौ व्यक्ति भि रहेंगे न् तब भि स्थान बच जाएगी। "
"क्याँ????" माॅ नें हैरानी सें कहा___"क्याँ इतना बड़ागर हैं वहाॅ?"
"हाॅ माॅ। " मैने कहा__"इसी लिए तोँ कहरहा हूॅ कि आप् रहने कि चिंता मत कीजिए। बस यहाॅ सें जल्दी चलने कि तैयारी कीजिए। आप् सभी अपना ज़रूरी सामान लें लीजिए, औऱ चलने केँ लिए सजधजकर हौ जाइये जल्द। "
"क्याँ हम् आज हि यहाॅ सें चल देंगे?" सहसापवन नें कुछ सोचते हुएकहा थां।
"जितना जल्द होँ सके उतना जल्द हमें सें निकल लेना चाहिए भइया। " मैने कहा__"यहाॅ अधिक वक़्त तक रुकना ठीक नहि हैं। "
"ठीक हैं भइया। "पवन नें कहा___"पर्र हम् यहाॅ सें इतने सारे सामान कों लेकर जाएॅगे केसे?"
"तुँ किसी भि तरह सें किसीऐसे कार कां इंतजाम कर जिसमे सारा सामान भि आँ जाए औऱ हम् सभी उसमें धीरे-धीरे बैठ भि जाएॅ। " मैने कहा___"औऱ यहकाम तुझेही बहोत जल्द करना हैं। "
"ठीक हैं भइया। "पवन नें कहा___"मे कोशिश करताहूॅ ऐसे किसी गाड़ी कों लाने कि। "
यहकहकर पवन कमरे सें बाहर् चला गय़ा। उसके जाने केँ बाद मैनेमाॅ सें कहा कि वोँ भि अपनासभी ज़रूरी सामान इकट्ठा करकेउसे पैककर लें। मेरे कहने पर्र माॅ नें हाॅ मे सिर हिलाया औऱ कमरे सें बाहर् चलीगईं। मे भि बाहर् आकर बैठक कि तरफबढ़ गय़ा।
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उधर हास्पिटल मे एकाएक हि रितू कां फोनबजा। उसनेफोन कों पाकेट सें निकाल कर देखा। स्क्रीन पर्र पवन लिखा आँ रहा थां। यहदेख कर रितू केँ होठों पऱ हल्की सि मुस्कान आँ गई। वोँ फोन कों लिए विधी केँ पास सें उठकर बाहर् कि तरफ आँ गई। फिनफोन पऱ आँ रहीकाल कों रिसीव कर कानो सें लगा लिया उसने।
"हाॅ भइयाकहो। " फिन उसने कहा__"सभी तैयार हैं नं?"
".। " उधर सें पवन नें कुछकहा।
"यह तुम् क्याँ कहरहे होँ पवन?" रितू नें बुरीतरह चौंकते हुए कहा___"तुम् सभीलोग राज केँ संग मुम्बई जाने वाले होँ?"
".। " उधर सें पवनफिन कुछकहा।
"हाॅ मुझेपता चल गय़ा उस बारे मे। " रितू नें कहा___"मेरे आदमियों नें मोबाइल पऱ बताया हैं सभीकुछ। यह भि बताया कि उन लोगों नें डैड केँ आदमियों कों ठिकाने लगा दिया हैं। राज औऱ उसके मित्र नें सबको ख़त्म कर दिया थां। अगरउन दोनो केँ बस कां नं होता तौ मेरे वोँ पुलिस केँ व्यक्ति उन सबको गोलियों सें भूनकर रख देते। मेरा उनकेलिए यही आदेश थां। ख़ैर, सबसे अच्छी बातयही हुईँ कि तुम् लोग सकुशल घऱगए। मगर खतरा अभि टला नहि हैं पवन। डैड अपने आदमियों कि खोज ख़बर लेने अवश्य इधरउधर जाएॅगे। राज नें सही फैसला लिया हैं तुम् लोगों कों अपनेसंग लें जाने कां। मगर उसका क्याँ होगा जिसके लिए मैनेराज कि तुम्हारे द्वारा बुलवाया थां?"
".। " उधर सें पवन नें कुछकहा।
"अरे मे तोँ चाहती हि हूॅ भइया। " रितू नें ज़ोरदे कर कहा___"तुम् एक् कामकरो, राज कि लेकर यहाॅ आँ जाओ। मे तुम् लोगों कों यहाॅ सें सुरक्षित जाने कां बंदोबस्त कर दूॅगी। "
".। " उधर सें पवन नें फिनकुछ कहा।
"हाॅ ठीक हैं। " रितू नें कहा___"तुम् उसे लेकरआओ। मे अभि किसीकार कां इंतजाम करतीहूॅ। तुम् किसी भि प्रकार कि चिंता मतकरो। बसउसे लेकर आँ जाओ। यहाॅ मैने उसकी सुरक्षा कां सारा इंतजाम कियाहुआ हैं। रास्तों पऱ भि पुलिस केँ व्यक्ति सादे कपड़ों मे मौजूद हें। "
".। " उधर सें पवन नें कुछकहा।
"तुम् बेफिकर रहो भइया। " रितू नें कहा___"उसे कुछ नहि होने दूॅगी मे। अपनीजान पर्र खेलकर भि मे उसकी हिफाज़त करूॅगी। यहाॅआने केँ बाद जोँ कुछ भि होगा उसकी देखभाल भि मे कर लूॅगी। तुम् बसउसे लेकर आँ जाओ। अब इंतजार नहि होता मेरे भइया। जबसे तुमने बताया हैं कि राज आँ गय़ा हैं तब सें उससे मिलने केँ पागल हुई जारही हूॅ मे। दिल तौ करता हैं कि अभि भागकर तुम्हारे घऱ आँ जाऊॅ औऱ अपने भइया कों अपने सीने सें लगाकर खूब रोऊॅ। मगर, उससे मिलने कां सबसे पहलाहक़ विधी कां हैं मेरे भइया। मैनेउसे वचन दिया हैं कि मे उसके महबूब सें उसे मिलाऊॅगी। इसलिए भइया, जल्द सें उसे लेकरआजा। मेरेवचन कि लाजरख लेँ। विधी कों उसके महबूब सें मिलादे जल्द। "
".। " उधर सें पवन नें कुचकहा।
"ठीक हैं भइया जल्द आनां। " रितू नें कहा औऱ फिन मोबाइल कटकर दिया। उसकी ऑखों मे ऑसूभर आए थें। मोबाइल कों पाॅकेट मे डालने केँ बाद वो वापस गैलरी कि तरफचल पड़ी। रास्ते मे एक् तरफउसे श्री कृष्ण कां छोटा सां मंदिर दिखा तौ वो उसीतरफ बढ़ गई। मंदिर केँ पास पहुॅच कर वो घुटनों केँ बलबैठ गई।
"हे कृष्णा अबसभी कुछ आपके हि हवाले हैं। " रितू नें ऑखों मे ऑसूलिए तथा दोनो हाॅथ जोड़े कहा___"सभी कुछठीक कर देना कान्हा। मेरा भइयाजब विधी सें मिले तौ उसकी हालत कों देखकर वोँ स्वयं कों सम्हाल सके। उसकेदिल कों मजबूत बनाए रखना कन्हैया। वोँ अपनी प्रेयसी सें मिलने आँ रहा हैं। उसेहर दुख दर्द सहने कि शक्ति देना कृष्णा। मेरा भइया भि इस टाइम कृष्ण हि हैं जोँ अपनी राधा सें मिलने आँ रहा हैं। "
इतना कहने केँ बाद रितूउठी औऱ कृष्ण कि मूर्ती केँ पास थाली मे रखे फूलों सें कुछफूल उठाकर कृष्ण केँ चरणों मे अर्पण कर दिया।
"सभी कुछ तुम् हि तौ करते होँ कन्हैया। इस संसार मे सभीकुछ तुम्हारे हि इशारे सें हौ रहा हैं। " रितू नें कहा___"यह भि कि मेरा भइया जिसेटूट कर प्यार करता हैं उस लड़की कों ब्लड कैंसर केँ लास्ट स्टेज पऱ पहुॅचा दिया आपने। यह कैसी लीला हैं कृष्णा? लोग कहते हें कि जोँ कुछ भि तुम् करते होँ वोँ सभी अच्छे केँ लिए हि करते होँ, तोँ बताओ मुझे कि ऐसा करकेकौन सां अच्छा कररहे होँ तुम्? मगर ख़ैरकोई बात नहि। मे तुमसे यहाॅइस सबकी शिकायत नहि कररही हूॅ। हाॅ इतनी विनती अवश्य कररही हूॅ कि मेरे भइया कों कभीकुछ नं हौ। वोँ यहाॅआए तौ विधी कि हालतदेख कर वोँ स्वयं कों सम्हाल सके। बस यही प्रार्थना करतीहूॅ तुमसे। "
इतना कहने केँ बाद रितू अपनेऑसू पोंछते हुए कृष्णा कों प्रणाम कर विधी केँ कमरे कि तरफबढ़ गई। उसकामन बहोत भारी हौ गय़ा थां। रहरहकर उसकेमन मे आने वाले टाइम केँ प्रति घबराहट सि बढ़ती जारही थि।
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उधरघऱ मे पवन मुझेलिए बाहर् आया। मैने देखा कि बाहर् एक् मोटर साइकिल खड़ी थि। पवन नें मुझसे कहा कि मे अपने चेहरे कों रुमाल सें ढॅकलूॅ। मे उसकीबात सुनकर चौंका। उससे पूछा कि कहाॅजा रहे हें हम् मगर उसने मुझेकुछ न् बताया। बल्कि मोटर साइकिल मे बैठकर सें स्टार्ट किया औऱ मुझे पीछे बैठने कों कहा। मे उसकीइस आनन फानन वाली क्रिया सें हैरान थां। बड़ा अजीब सां ब्यौहार कररहा थां वोँ।
ख़ैर, उसकेबार बार ज़ोर देने पर्र मे उसके पीछे मोटर साइकिल पर्र बैठ गय़ा। आदित्य दरवाजे पर्र खड़ा हैरानी सें यहसभी देखरहा थां। उसने भि कईबार पवन सें पूछा कि वोँ मुझे लेकर कहाॅजा रहा हैं मगरपवन नें कुछ न् बताया। बल्कि उससेयही कहा कि वोँ यहींरहे, हम् थोड़ी देर मे आते हें। आदित्य बेचारा हैरानी सें देखता रह गय़ा थां उसे। माॅ औऱ आशा दिदी अंदर सामान पैक करने मे लगी हुईं थि। उन्हें इस सबकाकुछ पता हि नहि थां। आशा दिदी कों जबपता चला कि वोँ सभीलोग मेरेसंग मुम्बई चलरहे हें तोँ वोँ बड़ाखुश हुईँ थि।
इधर मेरे बैठते हि पवन नें मोटर साइकिल कों आगे बढ़ा दिया। जहाॅ तक मुझेपता थां पवन केँ पासकोई साइकिल तक नहि थि, इसका मतलब वोँ यह मोटर साइकिल किसीजान पहचान वाले सें माॅगकर हि लाया थां।
"अब तौ बतादे मेरे बाप कि हम् कहाॅजा रहे हें?" रास्ते मे मैनेयह बातपवन सें खीझते हुएकही थि, बोला___"साले तूनेइस प्रश्न पर्र ऐसे अपनामुह बंदकर रखा हैं जैसेअगर तुँ बता देगा तौ क़यामत आँ जाएगी। "
"ऐसा हि समझ लें तूँ। " पवन नें कहा__"अब चुपचाप बैठारह। कितना बोलने लगा हैं तूँ आजकल?"
"क्याँ कहा तूने?" मैने हैरत सें देखते हुएउसे पीछे सें उसकीपीठ पऱ हल्के सें मुक्का मारा, फिन बोला___"मे बहोत बोलने लगाहूॅ। हाॅ, औऱ तुँ जैसे मौनी बाबा हि बन गय़ा हैं न्। "
पवन मेरीइस बात पर्र मुस्कुरा कररह गय़ा। मगर केवल एक् लम्हा केँ लिए। अगले हि समय उसके चेहरे पऱ संजीदगी केँ भाव नुमायाॅ होँ गए। जैसेउसे कोईबात याद आँ गई होँ। मैने एक् बातनोट कि थि कि वोँ जब सें मुझे मिला थां तब सें मैनेउसे संजीदा हि देखा थां। मुझेसमझ नहि आँ रहा थां कि इसकी क्याँ वजह थि। मुझेयाद आया कि उसने मुझे सीघ्र मुम्बई सें आने केँ लिएकहा थां। इसका मतलबयह मुझेउसी काम सें लिएजा रहा हैं। मगर आख़िर किसकाम सें? साला दिमाग़ कां दही हौ गय़ा मगर मुझेकोई वजहसमझ मे नहि आई।
करीब-करीब दस मिनटबाद पवन नें जिस स्थान पर्र मोटर साइकिल रोंकी उस स्थान कों देखकर मे चौंका तोँ अवश्य मगर मुझेसमझ मे नं आया कि पवन मुझे हास्पिटल लेकर क्यूं आया हैं? सहसा मेरे ज़हन मे एक् बारफिन करुणा चाची औऱ उनके बच्चों कां चेहरा नाच गय़ा। मन मे प्रश्न उभरा कि क्याँ करुणा चाची याँ उनके बच्चों मे सें किसी कों कुछ हौ गय़ा थां जौ वोँ यहाॅ हास्पिटल मे शायद एडमिट हें? मगरइस बात कों मुझसे छिपाने कि भला क्याँ ज़रूरत थि?
मोटर साइकिल केँ खड़े होते हि मे उतर गय़ा। मेरेबाद पवन भि उतर गय़ा औऱ मोटर साइकिल कों स्टैण्ड पऱ खड़ाकर वोँ मेरीतरफ देखा औऱ बोला____"तुँ यहींरुक मे आताहूॅ दो मिनट मे। "
"अरेअब कहाॅजा रहा हैं तुँ मुझे यहाॅ पर्र अकेला छोंड़ कर?" मैंने हैरानी सें पूछा।
"मैनेकहा न् यहींरुक। " पवन नें शख्ती सें कहा___"मे आताहूॅ अभि। "
यह तोँ हद हि हौ गई। पवन नें मुझे शख्ती सें रुकने कों कहा थां। मेरा दिमाग़ घूम गय़ा। यह साला हौ क्याँ रहा हैं? मैने देखा कि पवन हास्पिटल कि सीढ़ियाॅ चढ़कर ऊपर वाली सीढ़ी केँ पास जाकररुक गय़ा। उसकेबाद उसने अपने पैन्ट कि जेब सें फोन निकाल कर उससे किसी कों मोबाइल किया। फोन कों कान सें लगाकर उसने सामने वाले सें जाने क्याँ बात कि। एक् मिनट भि नहि लगेउसे बात समाप्त करने मे। फोन कों पुनःजेब केँ हवाले कर उसने मेरीतरफ देखा औऱ मुझे अपनीतरफ आने कां हाथ सें इशारा किया।
उसकेइस इशारे पऱ मे फिन चौंका। मगरकर भि क्याँ सकता थां? मे अपनेमन मे हज़ारों तरह केँ विचार लिए उसकीतरफ बढ़ने लगा। कुछ हि देर मे सीढ़ियाॅ चढ़कर उसकेपास पहुॅच गय़ा।
"साला इतना अधिक सस्पेन्स तोँ किसी जासूसी उपन्यास मे भि मैने नहि देखा जितना तूँ क्रियेट कररखा हैं। " ऊपर उसकेपास पहुॅचते हि मैनेकहा उससे___"मेरे दिमाग़ कां कचूमर निकाल दिया तूनेशपथ सें। अच्छा हैं तूँ किसी जासूसी उपन्यास कां राइटर नहि बन गय़ा। वरना पाठकों केँ दिमाग़ कि नसें हि फट जाती। "
"ज़्यादा बकवास न् कर। " मेरीबात पर्र पवन नें भावहीन स्वर मे कहा___"औऱ अबचल मेरेसंग। "
"जौ हुकुम माँ बाप। " मैनेअदब सें सिर कों झुकाते हुएकहा औऱ चल दिया उसके पीछे।
पवन केँ पीछे चलतेहुए मे हास्पिटल केँ अंदर कि तरफ आँ गय़ा। मेरामन अंजानी आशंका केँ चलते ज़ोर ज़ोर सें धड़कने लगा थां। पता नहि क्यूं पऱ मे मन हि मन ईश्वर सें दुवाकर रहा थां कि यहाहर कोईठीक हि होँ। ख़ैर, पवन केँ संग चलतेहुए मैने देखा कि पवन एक् कमरे केँ सामने आकररुक गय़ा।
कमरे केँ दरवाजे केँ पासरुक करपवन नें कुछसमय कुछ सोचाफिन मेरीतरफ पलटकर कहा___"तूँ जानना चाहता थां न् कि मैने तुझेही इतना जल्द यहाॅआने केँ लिए क्यूं कहा थां?"
"वोँ तौ मे तुझसे कब सें पूछरहा हूॅ?" मैने उससे कहा___"मगर तूँ बता हि नहि रहा थां। "
"बताने कि ज़रूरत नहि हैं मेरे दोस्त। " सहसापवन कि आवाज़ भर्रा गई, बोला___"तुँ इस कमरे मे जा औऱ सभीकुछ अपनी ऑखों सें देखसुन लें। मगर उससे पहले तूँ मुझसे वादाकर कि अंदरसभी कुछ देखने सुनने केँ बाद तुँ स्वयं कों सम्हाल कर रखेगा। "
"इसबात कां क्याँ मतलबहुआ?" मैंने सहसा चौंकते हुए कहा___"ऐसा क्याँ हैं अंदर कि मुझेउसे देखकर स्वयं कों सम्हालना पड़ेगा?"
"अबजा तूँ। " पवन नें कहने केँ संग हि मुहफेर लिया मुझसे, दोचार क़दम चलने केँ बाद मेरीतरफ पलटकर बोला___"मे बाहर् हि तेरा इन्तज़ार करूॅगा। "
बस इसकेबाद वोँ एक् समय केँ लिए भि नहि रुका। बल्कि तेज़ तेज़ क़दम बढ़ाते हुए बाहर् कि तरफचला गय़ा। मुझेकुछ समझ न् आया कि यहसभी क्याँ चलरहा हैं यहाॅ?पवन जब मेरी नज़रों सें ओझल होँ गय़ा तौ मे उस कमरे केँ दरवाजे कि तरफ पलटाजिस कमरे केँ अंदर जाने केँ लिएपवन नें मुझसे कहा थां।
कुछ लम्हा तक मे उस दरवाजे कों घूरता रहा। मेरादिल अनायास हि बड़ी तेज़ी सें धड़कने लगा थां। मन मे तरहतरह केँ ख़याल उछलकूद मचाने लगे थें। मैने अपने हाॅथों कों दरवाजे कि तरफ बढ़ाया। मैने देखा मेरे वोँ हाॅथ काॅपरहे थें। पता नहि मगर, इन कुछ हि पलों मे मेरी अजीब सि हालत हौ गई थि। ख़ैर, मैने दरवाजे पर्र हाॅथरख करउसे अंदर कि तरफ आहिस्ता सें धकेला तोँ दरवाजा बेआवाज़ खुलता चला गय़ा।
खुल चुके दरवाजे अंदर कि तरफ मेरी नज़र पड़ी तोँ सामने दीवार केँ पास एक् टेबलरखा दिखा मुझेजिस पर्र कुछ दवाइयाॅ औऱ कुछ पेपर जैसेरखे हुए थें। बाॅकी कुछ नं दिखा मुझे। मेरेमन मे प्रश्न उभरा कि इस कमरे मे ऐसा क्याँ हैं जिसे देखने केँ लिए कदाचित पवन नें मुझे अंदर जाने कों कहा थां?
अपनेमन मे उठे प्रश्न कि खोज केँ लिए मैंने दरवाजे केँ अंदर कि तरफ अपने क़दम बढ़ाए। दो हि क़दमों मे मे कमरे केँ अंदर दाखिल हौ गय़ा। अंदरआकर मैनेइधर उधर देखा तोँ दाहिनी तरफ एक् बेड दिखाजिस पर्र कोई पड़ाहुआ थां। बेड केँ बगल सें हि दो सोफासेट रखेहुए थें लेकिन उन पऱ कोई बैठाहुआ नज़र नं आया मुझे। बाॅकी पूरारूम खाली थां। यहदेख कर मेरा दिमाग़ हैंग सां हौ गय़ा। कुछसमझ न् आया कि यहाॅ मुझे क्याँ दिखाने केँ लिएपवन नें भेजा हैं?
बेड पऱ पड़ेहुए ब्यक्ति पर्र मेरी नज़र पुनः पड़ी। उसका चेहरा दूसरी तरफ थां इसलिए मे जान न् सकाबेड पर्र कौन पड़ाहुआ हैं? लेकिन इतना अवश्य अबसमझ आँ गय़ा थां कि शायदबेड पऱ पड़ेहुए इंसान कों देखने केँ लिए हि मुझेपवन नें यहाॅ भेजा हैं। अतः मे धड़कते हुएदिल केँ संगबेड कि तरफ बढ़ा।
कुछ हि क़दमों मे मे बेड केँ समीप पहुॅच गय़ा। लेकिन बेड पर्र पड़ेहुए ब्यक्ति कां चेहरा दूसरी तरफ थां इसलिए मे इसतरफ सें चलतेहुए उसतरफ उस ब्यक्ति केँ चेहरे कि तरफबढ़ गय़ा। मैने महसूस किया कि कमरेहीं नहि बल्कि पूरे हास्पिटल मे सन्नाटा छायाहुआ थां। ऐसा सन्नाटा कि अगर कहींसुई भि गिरे तोँ उसके गिरने कि आवाज़ किसीबम केँ धमाके सें कम न् सुनाई दे।
बेड पर्र पड़े ब्यक्ति केँ चेहरे कि तरफआकर मेरी नज़रजिस चेहरे पर्र पड़ीउसे देखकर मे बुरीतरह उछल पड़ा। हैरत औऱ आश्चर्य सें मेरी ऑखेंफट पड़ीं। लेकिन फिन जैसे एकदम सें मुझेहोश आया औऱ मेरी ऑखों केँ सामने मेरा गुज़रा हुआ वोँ कल घूमने लगा जिसमें मे थां एक् विधीनाम कि लड़की थि औऱ उस लड़की केँ संग शामिल मेरा प्रेम थां। फिन एकाएक हि तस्वीर बदली औऱ उस तस्वीर मे उसी विधीनाम कि लड़की कां धोखा थां, उसकी बेवफाई थि। उसी तस्वीर मे मेरा वोँ रोना थां वोँ चीखना चिल्लाना थां औऱ नफ़रत मेरी थि। यहसभी चीज़ें मेरी ऑखों केँ सामने कईबार तेज़ी सें घूमती चली गई।
मेरे चेहरे केँ भाव बड़ी तेज़ी सें बदले। दुख दर्द औऱ नफ़रत केँ भाव एक् संगआकर ठहरगए। ऑखों मे ऑसूॅभर आएमगर मैने उन्हें शख्ती सें ऑखों मे हि जज़्ब कर लिया। दिल मे एक् तेज़ गुबार सां उठा औऱ उस गुबार केँ संग हि मेरी ऑखों मे चिंगारियाॅ सि जलने बुझने लगीं।
मेरेदिल कि धड़कने औऱ मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलनेलगी थि। मेरेमुख सें कोई अल्फाज़ नहि निकलरहे थें। लेकिन यहसच हैं कि कुछ कहने केँ लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थें। मुझेऐसा लगरहा थां कि याँ तोँ मे स्वयं कों कुछकर लूॅ याँ फिनबेड पऱ ऑखेंबंद किये धीरे-धीरे पड़ीइस लड़की कों ख़त्म करदूॅ। लेकिन जाने केसे मे कुछकर नहि पारहा थां।
अभि मे अपनीइस हालत सें जूझ हि रहा थां कि सहसाबेड पऱ धीरे-धीरे करवॅट लिए पड़ीउस बला नें अपनी ऑखें खोलीजिस बला कों मैनेटूट टूटकर चाहा थां।
दोस्तो, एपसोड हाज़िर हैं,,,,,,,,,
आज केँ लिए इतना हि। मे जानता हूॅ कि आप् इस आख़िरी सीन सें आगे भि पढ़ना चाहेंगे औऱ इस चैप्टर कों ख़त्म होँ जाने कि आशा करते हें। लेकिन दोस्तो, यकीन मानिए आज मैनेइस भाग कों रेडी करने मे सारादिन लगा दिया। बीच बीच मे मुझेकाम कि वजह सें रुकना भि पड़ा। मगर चूॅकि मैने आपसेकहा थां कि आज एपसोड अवश्य दूॅगा इसलिए इतना हि लिखकर आपके सामने हाज़िर कर देना चाहता हूॅ।
अपने अंदर कि एक् बात आपसे शेयरकर रहाहूॅ, वोँ यह कि ऐसेसीन लिखने मे दिलो दिमाग़ कि हालत ख़राब हौ जाती हैं। आज तौ इतने मे हि हालत ख़राब हौ गई मेरी। अभि इसकेआगे कां आप् स्वयं अंदाज़ा लगाइये कि क्याँ होगा????
हर बात कों औऱ हर चीज़ कों बारीकी सें लिखना मुझे अच्छा लगता हैं। एपसोड लिखने सें पहले मुझेयह अवश्य लगा करता हैं कि दोस्त अब इससेआगे केसे लिखूॅ?? मगरजब लिखना शुरुआत करताहूॅ तोँ हर चीज़ स्वयं हि आसान होतीचली जाती हैं। कदाचित इसका कारणयह हौ सकता हैं कि राइटर उस माहौल मे डूब जाता हैं। उसे लगने लगता हैं कि यहसभी उसकेसंग हि हौ रहा हैं।
मुझेयह बातसमझ आँ गई हैं दोस्तो कि कोई भि चीज़ नामुमकिन नहि होती। मेरेलिए हर एपसोड कों लिखना किसी चैलेंज सें कम नहि होतामगर आप् सबके प्रेम औऱ सहयोग सें हर चैलेंज कों मैंने कबूल किया हैं औऱ उस पर्र फतह हाॅसिल कि हैं।
अगलेभाग मे इस चैप्टर कों समाप्त कर दूॅगा दोस्तो।
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
यहसही कहा आपने दबंग इंस्पेक्टर,,,,, ख़ैरआज कां एपसोड दे दिया हैं,,,,, पेज नंबर263पर,
बहोत बहोत धन्यवाद जीतू भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,, पेज नंबर263पर,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
vah बहुत khubsurat update bhay। halanki aapne pawan की ma और bahen kaa scene कुछ jyada hi लम्बा krr दिया। Use अगर ap iss chepter ko khatam karke bi dete too accha thaa लेकिन आज aapko yeh chapter khatam hi krna thaa और hume yahi umeed bhu thi। halanki chalo अब dekte की कब ap aglaa update dete hu। Ab mai waiti g naji likhunga।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,, पेज नंबर263पर,
बहोत हि सुंदर एवं रोमांचक एपसोड भइया जबरदस्त लेखनी हैं आप् कि इस एपसोड मे आप् कि मेहनत एवं काबिलियत दोनों हि झलकरही हैं ।
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