♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
हैलो दोस्तो, केसे हें आप् सभी????
आज इस साइट कों क्याँ होँ गय़ा थां? मैनेकई बार विजिट कियामगर साइट ओपेन हि नहि हौ रही थि। ख़ैर, शुकर हैं कि अब होँ गई ओपेन।
मैने आप् सबसेकहा थां कि आज आपके सामने भाग हाज़िर करूॅगा, इसलिए आपके सामने भाग जल्द हि हाज़िर होँ जाएगा।
कुछ हि देर मे भाग आप् सबके सामने हाज़िर होँ जाएगा दोस्तो। आशा करताहूॅ कि आप् सबकोआज कां एपसोड अवश्य मनपसंद आएगा।
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
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♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 46 》
अब तक,,,,,,,,
ऐसे हि हम् हल्दीपुर गाॅव सें बाहर् आँ गए औऱ उसनहर केँ पुल केँ पास सें हम् लोग पूर्व दिशा कि तरफ मुड़गए। करीब-करीब बीस मिनटबाद हम् सभी दिदी केँ फार्महाउस पऱ पहुॅच गए। दिदी कों यह भि पताचल चुका थां कि मेरेसंग करुणा चाची औऱ उनके बच्चों कों भि मुम्बई जानां थां मगरइस सबके होँ जाने सें उन्होंने मेरे मोबाइल सें करुणा चाची कों मोबाइल करकह दिया थां कि मे आज नहि जारहा बल्कि वोँ अपने भइया केँ संग यहीं पऱ आँ जाएॅकल।
फार्महाउस पर्र पहुॅच कर दिदी नें एम्बूलेन्स सें सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स केँ जाने केँ बाद हम् सभी अंदर कि तरफबढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम मे हि सोफे पऱ बैठी नैना फूफी पर्र मेरी नज़र पड़ी तोँ मे हल्के सें चौंका। नैना फूफी मुझे देखते हि सोफे सें उठकर भागते हुए मेरेपास आईं औऱ झटके सें मुझे अपने सीने सें लगा लिया। उनकी ऑखों मे ढेर सारेऑसू आँ गए थें मगर उन्होने उन्हें छलकने नहि दिया। अपने जज़्बातों कों बड़ी मुश्किल सें दबाया हुआ थां उन्होंने। शायद दिदी नें उन्हें सबकुछ बता दिया थां औऱ समझा भि दिया थां कि मुझसे मिलकर वोँ ज़्यादा रोयें नहि।
ख़ैर, ऐसे माहौल मे हम् सभी बेहद दुखी थें इसलिए उसरात किसी नें अन्न कां एक् दाना तक अपनेमुख मे नहि डाला। रात मे मेरेसंग बेड पऱ मेरे एक् तरफ रितू दिदी थीं तौ दूसरी तरफआशा दिदी। सारीरात किसी भि ब्यक्ति कों नींद नहि आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके सें बहोत समझाया थां। तब जाकर मुझेकुछ होशआया थां। बेड पर्र मे अपनी दोनो बहनों केँ बीच लेटाऊपर घूमरहे पंखे कों देखता रहा। सारीरात ऐसे हि गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय मे मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनीतरफ सें छुपकाए यूॅ हि लेटीरह गईं थि। आने वाली सुभह मेरे जिंदगी मे औऱ केसेदुख दर्द कि भूमिका बनाएगी इसके बारे मे वक़्त केँ सिवाकोई नहि जानता थां।
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अबआगे,,,,,,,,
उधर, दोपहर सें साम औऱ साम सें रात हौ गई मगरअजय सिंह औऱ शिवा कों अपनेउन आदमियों कां कहींकोई सुराग़ तक न् मिलसका जिन आदमियों नें उन्हें विराज केँ आने कि ख़बर दि थि। कहने कां मतलबयह कि भीमा औऱ मंगलआदि मे सें कोई भि अजय सिंह कां भरोसेमंद व्यक्ति अजय सिंह कों नं मिला। इस बात सें दोनो बाप बेटे बेहद परेशान होँ चुके थें। उनकीसमझ मे नहि आँ रहा थां कि उसके व्यक्ति एक् संग सारे केँ सारे केसे गायब होँ गए?
अजय सिंह केँ बाॅकी केँ व्यक्ति तोँ उसे मिलेमगर उन लोगों कों नां तौ विराज कां कोई सुराग़ मिला थां औऱ नां हि उन्हें यहपता थां कि भीमा औऱ मंगल केँ संगसंग रहे बाॅकी व्यक्ति कहाॅ औऱ केसे गायब होँ गए? हैरान परेशान दोनो बाप बेटे वापस अपनेनये वाले फार्म हाउस पऱ लौटआए थें। अपने बाॅकी बचे आदमियों कों शख्त आदेश भि देआए थें कि विराज केँ संगसंग अपनेउन गायबहुए आदमियों कि भि खोज ख़बर करते रहें।
इस समयअजय सिंह औऱ शिवा अपने फार्महाउस केँ ड्राइंगरूम मे रखे सोफों पर्र चिंतित व परेशान हालत मे बैठे थें। उन दोनो केँ सामने वाले सोफे पर्र प्रतिमा भि बैठी हुई थि। उसकी नज़रें दोनो बाप बेटों केँ चेहरों पऱ उभरेहुए भावों पऱ थि। उसे समझते ज़रा भि देर नं लगी थि कि दोनो बाप बेटे शिकस्त खाकरआए हें। पर्र जाने क्यूं प्रतिमा कों इसबात कां पहले सें हि अंदेशा थां कि ऐसा हि कुछ होगा।
"यह तोँ कमाल हि हौ गय़ा नं अजय। " प्रतिमा नें अजीबभाव सें कहा___"तुम्हारे इतने सारे हट्टे कट्टे आदमियों नें एक् बारफिन सें तुम्हें नीचा दिखा दिया। तुम्हारी बड़ी बड़ी वोँ बातें महज कोरी बकवास केँ सिवाकुछ नं थि। तुमने औऱ तुम्हारे आदमियों नें आज तक वोँ काम किया हि नहि जिसकाम कों 'फतह' केँ नाम सें जानां जाता हैं। हरबार तुम् अपने मंसूबों पऱ नाकामयाब हि हुए हौ अजय। तुम्हारे पास पिछला ऐसाकोई काम नहि हैं जिसका हवाला देकर तुम् यहकहसको कि तुमने उसकाम कों सफलतापूर्वक किया थां। "
प्रतिमा कि इन बातों पऱ दोनो बाप बेटों केँ चेहरे झुक सें गए थें। ऐसालग रहा थां जैसेउन दोनो मे सें किसी मे भि बोलने कि हिम्मत शेष न् होँ। यहअलग बात थि कि अजय सिंह केँ चेहरे पऱ भूकंप केँ सें भाव अनायास हि गर्दिश करते नज़रआते औऱ फिन वोँ लुप्त होँ जाते।
"एक् अदने सें लड़के कों पकड़ने गए थें तुम्हारे व्यक्ति औऱ स्वयं हि सारे केँ सारेगधे केँ सिर सें सींग कि तरह गायब हौ गए। " प्रतिमा नें फिन कहना शुरुआत किया___"इस बात कों कौनहजम कर पाएगा अजय? क्याँ तुम् स्वयं हजमकर पारहे हौ कि तुम्हारे इतने सारे आदमियों केँ रहतेहुए भि वोँ विराज कों पकड़ने कि तौ बातदूर बल्कि स्वयं अपना हि ख़याल नहि रखसके? क्याँ तुम् यह कल्पना कर सकते होँ कि अकेले विराज नें तुम्हारे इतने सारे आदमियों कों इसतरह सें गायबकर दिया कि तुम् दोनो बाप बेटे उनकापता भि नहि लगासके?"
"यकीनन प्रतिमा। " सहसाअजय सिंह नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"यह सच हैं कि इस सबकी कल्पना तक नहि कि जा सकती। यह सभी जोँ कुछ भि हुआ हैं औऱ जैसे भि हुआ हैं उसके बारे मे कोईसोच भि नहि सकता थां। मगर, इस सभी मे अकेले विराज बस कां हाॅथ नहि होँ सकता। "
"क्याँ मतलब हैं तुम्हारा?" प्रतिमा हल्के सें चौंकी थि।
"मतलबसाफ हैं प्रतिमा। " अजय सिंह नें सोचने वाले अंदाज़ सें कहा___"मेरे इतने सारे आदमियों कों एक् संग गायबकर देनाकोई आसानबात नहि हैं। मगरयह भि सच हैं कि ऐसा हि हुआ हैं। इसलिए इसकाम कों विराज स्वयं अकेले नहि कर सकता। इस काम मे अवश्य उसकी किसी नें सहायता कि हैं। तुम् स्वयं सोचो प्रतिमा कि मेरे बारह मुस्टंडे जैसे आदमियों कों परास्त करना याँ उन्हें उस हालत पर्र लेँ आनां कि वोँ अधमरे हि हों जाएॅयह काम कितना मुश्किल होँ सकता हैं? नहि प्रतिमा नहि, मे किसी सूरत मे नहि मान सकता कि यहसभी अकेले विराज नें किया हैं। "
"चलोमान लिया कि यहसभी अकेले विराज नहि कर सकता। " प्रतिमा नें कहा___"बल्कि इसकाम मे किसी नें उसकी सहायता कि, मगर प्रश्न यह हैं कि किसने कि उसकी सहायता? यहाॅ पऱ ऐसाकौन हैं जोँ इस तरीके सें विराज कि सहायता कर सकता हैं?"
"मुझे लगता हैं कि इस बारे मे हमें शुरुआत सें सोच विचार करना चाहिए। " अजय सिंह नें कहने केँ संग हि शिगार सुलगा लिया___"हाॅ प्रतिमा, हमेंइस बारे मे शुरुआत सें विचार विमर्ष करना होगा, वोँ भि बड़ी बारीकी सें। ग़लती तोँ यकीनन हुइ हैं हमसे। हमने शुरुआत सें हि विराज कों बहोत छोटा समझा थां। हमारे मन मे यहबात बैठी हुई थि कि वोँ यहसभी कर हि नहि सकता। हमने हमेशा उसकी औकात पऱ प्रश्न उठाया, शायदइसी कां यह परिणाम हैं कि हम् शुरुआत सें हरबात मे नाकामी कां स्वाद चखरहे हें। मगरअब हमेंसमझ आँ चुका हैं डियर। हमेंसमझ आँ चुका हैं कि हमारे संगयह सभी एक् खेल हि हौ रहा हैं शुरुआत सें। एक् अच्छा खिलाड़ी वही होता हैं जोँ अपने प्रतिद्वंदी कों कभी भि कम करके नं ऑके, बल्कि उसे भि अपनीतरह हि उच्च कोटि कां खिलाड़ी समझे। तभी हमेंसमझ आता हैं कि अब हमेंकिस तरह कि अब हमेंकिस तरह कि चाल चलना चाहिए? मगरयह सभी बातें मैनेकभी भि सोचने कि जहमत नहि कि। "
"शुकर हैं अजय। " प्रतिमा नें कहा___"कि तुम्हें यहबात समझ मे आँ गई कि तुम्हारा हमेशा सें विराज कों तुच्छ समझना सरासर ग़लत औऱ नासमझी थि। हलाॅकि इस बारे मे मैने तुम्हें पहले भि कहा थां कि विराज कों तुच्छ समझना निहायत हि ग़लतबात हैं। क्योंकि मौजूदा हालात मे अगर तुम्हारा कोई दुश्मन हौ सकता थां तौ मात्र विराज। ख़ैर, अब जबयहबात तुम्हारी समझ मे आँ हि गई हैं तोँ अब क्याँ सोच विचार करना चाहोगे इस बारे मे तुम्?"
"सोच विचार करने केँ लिए बहोत सारी बातें हें। " अजय सिंह नें शिगार कां गहराकश लेकर उसकाधुऑ ऊपरहवा मे छोंड़ते हुए कहा___"पऱ बात चूॅकि शुरुआत सें सोच विचार करने कि हैं इसलिए शुरुआत सें हि शुरुआत करते हें। मे प्रश्न खड़ा करूॅगा औऱ तुम् उस पर्र अपनीराय ब्यक्त करना। "
"ओके आईएम तैयार। " प्रतिमा नें सम्हल कर बैठते हुए कहा___"यू मे प्रोसीड। "
"हमारे संगयह खेल फैक्ट्री मे आग लगने सें शुरुआत हुआ थां। " अजय सिंह नें सोचते हुए कहा___"इसमें कई प्रश्न हें, पहलायह कि फैक्ट्री मे आग केसेलगी याँ किसने लगाई थि? दूसरा प्रश्न यह कि फैक्ट्री मे बनेउस गुप्त तहखाने केँ अंदर मौजूद मेरा वोँ ग़ैर कानूनी सामान रितू द्वारा छानबीन करने पऱ क्यूं नहि मिला? वोँ सारा सामान उस गुप्त तहखाने सें किसने गायब किया? यहाॅयह प्रश्न नहि पैदा होँ सकता कि वोँ सभी चीज़ें बमों केँ धमाके सें लगी भीषणआग मे जल गई होंगी, क्योंकि जली हुईँ चीज़ केँ अवशेष अवश्य मिलते हें औऱ फाॅरेंसिक जाॅच सें यहबात भि पताचल जाती हैं कि जौ चीज़जली थि वोँ असल मे क्याँ थि? ख़ैर, मे यहकहरहा हूॅ फैक्ट्री मे लगीआग केँ बारे मे औऱ तहखाने सें उन सारी चीज़ों केँ गायब हौ जाने केँ बारे मे तुम्हारी क्याँ राय हैं?"
"सबसे पहलीबात तौ यह हैं कि फैक्ट्री मे लगीआग कां मामला ज़रा पेंचीदा थां। " प्रतिमा नें बेचैनी सें पहलू बदलते हुए कहा___"पेंचीदा इसलिए क्योंकि उसमें किसी केँ भि बारे मे कोईठोस निष्कर्श नहि निकल सकता थां। घुमा फिराकर बात मात्र विराज पऱ हि आकर रुकती थि। हलाॅकि यहबात ग़लत हौ ऐसाकम हि लगता थां। मगर मेरे ज़हन मे एक् बातयह भि हैं कि जिस वक़्त फैक्ट्री मे आग लगने कां मामला आया थां उसी वक़्त तुम्हारे पार्टनर सक्सेना नें भि पार्टनरशिप तोड़ने कि बात कि हि नहि बल्कि तोड़ हि दि थि। सक्सेना नें पार्टनरशिप तोड़ने कि वजहयह बताई थि कि वोँ विदेश मे सेटल होना चाहता हैं औऱ वहीं पऱ अपनाकोई बिजनेस करना चाहता हैं। इसबात पर्र कितना इत्तेफाक़ रखाजा सकता हैं?"
"तुम् आख़िर कहना क्याँ चाहती हौ?" अजय सिंह कां दिमाग़ मानो चकरा सां गय़ा थां।
"मे यह कहना चाहती हूॅ कि सक्सेना नें पार्टनरशिप तोड़ने कि जोँ वजह बताई थि उसमें कितनी सच्चाई थि?" फिन प्रतिमा नें कहा___"तुम्हारे अनुसार उसेयह पता नहि थां कि फैक्टरी मे कोई गुप्त तहखाना हैं जहाॅ पर्र तुम् अपनागैर कानूनी सामान छुपाकर रखते थें। जबकि ऐसा भि तोँ होँ सकता हैं कि यहसभी उसे किसीतरह सें पताचल हि गय़ा रहा होँ। उस सूरत मे वोँ डर गय़ा होँ कि ऐसेकाम मे वो किसीदिन तुम्हारे संगसंग स्वयं भि न् कानून कि गिरफ्त मे आँ जाए। इस लिए उसने तुमसे पार्टनरशिप तोड़ लेने मे हि अपनी भलाई समझी हौ, लेकिन उसेलगा होगा कि पार्टनरशिप तोड़ने कि कोई माकूल वजह भि होनी चाहिए तभीउसे अपना सारा रुपया तुमसे मिल सकता थां। "
"मगर इसमें ऐसा तोँ नहि हौ सकता थां न् कि सारा हिसाब पुस्तक चुकता होने केँ बाद सक्सेना मेरी फैक्ट्री मे आगलगा देता। "अजय सिंह नें कहा___"सीधी सि बात हैं डियर, तुम्हारे अनुसार सक्सेना कों कानून कां डर सताया इसलिए उसने मुझसे पार्टनरशिप तोड़ी औऱ अपना हिसाब पुस्तक चुकता कर लिया। मगर इस सबकेबाद वोँ भला मेरी फैक्ट्री मे आग क्यूं लगाएगा? उसेजिस चीज़ कां डर थां वोँ तौ पार्टनरशिप टूटते हि दूर हौ गय़ा थां। अगर तुम् यह समझती होँ कि फैक्ट्री मे आग सक्सेना नें लगाई थि तौ मे इसबात सें सहमत नहि हूॅ। "
"इसका मतलब तुम् इस मामले मे सक्सेना कों क्लीन चिटदे रहे हौ?" प्रतिमा नें गहरी नज़र सें देखाउसे।
"बेशक। "अजय सिंह नें पूरे आतमविश्वास केँ संगकहा।
"औऱ कोई दूसरा ऐसाकर हि नहि सकता?" प्रतिमा नें कहा___"मेरा मतलब तुम्हारे किसी बिजनेस कम्पटीटर सें हैं। "
"यस आफकोर्स। " अजय सिंह नें कहा___"मेरा ऐसाकोई बिजनेस कम्पटीटर हि नहि हैं जोँ मेरी फैक्ट्री मे आगलगा कर मेरा इतना बड़ा नुकसान करदे। "
"तोँ फिनबचा कौन?" प्रतिमा नें कहा।
"क्याँ मतलब??"अजय सिंह एकाएक हि चौंक पड़ा।
"अरे डियर, हम् हर चीज़ केँ बारे मे विचार विमर्ष कररहे हें न्?" प्रतिमा मुस्कुराई।
"ओहहाॅ। " अजय सिंह नें गहरी साॅस ली___"ख़ैर, तौ फिनबचा कौन कां क्याँ मतलब हैं तुम्हारा?"
"तुम्हारी लाइफ मे तुम्हारा सबसे बड़ा दुश्मन कौन हैं?" प्रतिमा नें पूछा थां।
"विराज औऱ उसकीमाॅ बेहन। "अजय सिंह केँ भाव बड़ी तेज़ी सें कठोर हौ गए थें।
"बिलकुल सही। " प्रतिमा नें कहा___"विराज एक् ऐसा आदमी हैं जोँ मौजूदा समय मे तुम्हारे संगकुछ भि कर सकता हैं। इसलिए अगर फैक्ट्री मे लगीआग मे केवल औऱ केवल विराज कां हि हाॅथ हैं तोँ इसमें कोई आश्चर्य कि बात नहि हैं। "
"मगर प्रश्न यह हैं कि उसने इतना बड़ा अविश्वसनीय काम किया केसे होगा?"अजय सिंह केँ माथे पऱ सोच केँ भावउभर आए___"दूसरी औऱ सबसे महत्वपूर्ण बातयह कि उसे केसेपता कि फैक्ट्री मे कोई गुप्त तहखाना हैं औऱ उस तहखाने केँ अंदर मैने एक् अलग हि जुर्म कि दुनियाॅ बनारखी हैं?"
"किसीतरह उसनेइस सबकापता तौ कर हि लिया होगामाई डियर हस्बैण्ड। " प्रतिमा नें कहा___"काम जबऐसे बड़े बड़े करने होते हें नं तौ उसके बारे मे अपनेपास हर चीज़ कि जानकारी कां होना भि ज़रूरी होता हैं। "
"यही तोँ प्रश्न हैं डियर। "अजय सिंह नें कहा__"भला उसेइस बात कि जानकारी केसे हौ गई कि फैक्ट्री केँ अंदर मैने क्याँ क्याँ चीज़ें छुपाई हुईं हें? जबकि यह भि सच हैं कि वो कभी मेरी फैक्ट्री मे गय़ा हि नहि थां। फिन केसेयह सभीपता हौ सकता हैं उसे? दूसरी बात, वोँ तोँ मुम्बई मे हैं फिन वोँ वहाॅ सें यहकाम केसेकर सकता हैं?"
"संभव हैं कि विराज उस टाइम मुम्बई सें यहाॅआया रहा होँ। " प्रतिमा नें तर्क दिया।
"अगर वोँ मुम्बई सें यहाॅआता तौ क्याँ वोँ मेरे आदमियों कि नज़र मे नहि आँ जाता?"अजय सिंह बोला__"आज भि तौ वोँ मेरे व्यक्ति भीमा कि नज़र मे आँ हि गय़ा थां। "
"ऐसा भि तोँ हौ सकता हैं कि उसने तुम्हारे आदमियों कों चकमादे दियारहा हौ उस वक्त। " प्रतिमा नें पुनः तर्क दिया___"क्योंकि बिना उसके यहाॅआए वो हमारी फैक्ट्री मे केसेआग लगा देता? याँ फिनऐसा हौ सकता हैं कि उसके इशारे पऱ यहकाम उसके हि किसी दोस्त नें किया होगा। "
"हाॅ ऐसा हौ सकता हैं। " अजय सिंह केँ मस्तिष्क मे जैसे झनाका सां हुआ, बोला___"यह यकीनन होँ सकता हैं प्रतिमा। बचपन सें जवानी तक वोँ इस गाॅव मे रहा हैं, इसलिए ऐसा तौ होँ हि नहि सकता कि यहाॅ पऱ उसकाकोई घनिष्ठ साथी याँ दोस्त नं बना हौ, बल्कि अवश्य बना होगा। सबकाकोई नं कोई घनिष्ठ साथी अवश्य होता हैं, उसका भि कोईऐसा हि खास दोस्त होगा यहाॅ। इस लिएयह संभव हैं कि विराज नें यहकाम अपने किसीऐसे हि यार द्वारा करवाया हौ सकता हैं। इस बारे मे तौ हमें पहले हि सोचना चाहिए थां डियर। वोँ भले हि मुम्बई मे हैं मगर अपने किसीखास मित्र केँ द्वारा वोँ अवश्य हमारी लम्हा समय कि ख़बर लेतारहा होगा। अब भि लेँ रहा होगा। "
"आपने बिलकुल सहीकहा डैड। " सहसा इतनीदेर सें चुप बैठा शिवाकह उठा___"उस कमीने केँ कई साथी हें यहाॅ। मगर एक् साथी तोँ उसका बहोत हि खास हैं। मे उसे अच्छी तरह जानता हूॅ। कई बार मैने उसकेयार कों उसकेसंग देखा भि थां। उसकेउस यार कां नाम शायदपवन हैं, यस डैड.पवन सिंह। यही नाम हैं उसके मित्र कां। "
"वैरीगुड। " अजय सिंह केँ चेहरे पऱ बड़ी मुद्दत केँ बाद राहत केँ भाव उभरे, बोला___"इसका मतलब वोँ हरामज़ादा अपनेउस मित्र पवन केँ ज़रिये यहसभी करवारहा थां। नहि छोंड़ूॅगा उस मादरचोद कों। उसके सारे खानदान कां नामो निशान मिटा दूॅगा मे। "
"तुम्हें क्याँ लगता हैं अजय?" प्रतिमा नें सहसा अजीबभाव सें कहा___"यह कि विराज महामूर्ख हैं?"
"व्हाट डूयूमीन?" अजय सिंह कि ऑखें फैली।
"जिस विराज नें अपने मित्र कों इतने बड़ेकाम कों करने केँ लिएकहा होगा उसने क्याँ अपने मित्र औऱ उसके परिवार कि सुरक्षा कां ख़याल नहि रखा होगा?" प्रतिमा एक् हि साॅस मे कहतीचली गई___"यह तोँ विराज कों भि पता हैं कि अगर वोँ किसी केँ द्वारा अपनाकोई काम करवाएगा तोँ देर सवेर तुम्हें इसकापता चल हि जाएगा। उस सूरत मे तुम् उसकेसंग क्याँ सुलूक करोगे इसका अंदाज़ा उसने पहले हि लगा लिया होगा। हाॅ अजय, विराज यहकभी नहि चाहेगा कि उसकेकाम कि वजह सें उसके साथी केँ संगसंग उसके मित्र केँ परिवार वालों कि ज़िंदगी भि ख़तरे मे पड़जाए। इसलिए मेरा ख़याल यही हैं कि विराज नें अपनेयार औऱ उसके परिवार कि सुरक्षा केँ बारे मे सोचते हुएकुछ तौ ऐसा अवश्य किया होगा जिससे तुम्हारा क़हरउन पऱ नं टूटने पाए। "
"तुम्हारी इसबात मे यकीनन सच्चाई कि झलकदिख रही हैं प्रतिमा। " अजय सिंह नें कहा___"मगर एक् बारपता तौ करना हि चाहिए हमें। क्योंकि अगर एक् लम्हा केँ लिएयह मान लें कि वैसाकुछ किया हि नहि होगा विराज नें जैसे कि तुम् बातकर रही हौ तोँ इस वक़्त अवश्य उसका मित्र इसी गाॅव मे अपनेघऱ पर्र होगा। मे एक् बारइस बात कि पक्के तौर पर्र जाॅच करवा लेना चाहता हूॅ। "
"अवश्य जाॅच करवाओ अजय। " प्रतिमा नें अजीबभाव सें कहा___"मगर मेरा अनुमान यही हैं कि तुम्हारे हाथकुछ नहि लगने वाला। "
"माॅमयह आप् क्याँ कहरही हें?" शिवा केँ स्वर मे नाराज़गी थि, बोला___"क्याँ आप् चाहती हें कि हमारे हाॅथकुछ नं लगे?"
"बात यह नहि हैं बेटे कि मे चाहती नहि हूॅ। " प्रतिमा नें शख्तभाव सें कहा___"बात यह हैं कि अब तक हाॅसिल भि क्याँ हुआ हैं? हरबार तौ नाकामी हि हाॅथलगी हैं हमें औऱ अब तोँ यहआलम हौ गय़ा हैं कि किसी भि चीज़ केँ हाॅसिल होने कि उम्मीद हि नहि होती। "
"मे तुम्हारे जज़्बातों कों समझ सकताहूॅ माई स्वीट डार्लिंग। " अजय सिंह नें कहा___"मे जानता हूॅ कि हरबार मिली नाकामी सें तुम् उदास हौ गई हौ। मगर यकीन मानो डियर, हमेशा ऐसा नहि होता हैं। एक् दिनऐसा अवश्य आता हैं जब हमें कामयाबी भि मिलती हैं। तुम् देख्ना कि जिसदिन हमें कामयाबी मिलीउस दिन हम् अपनीउस कामयाबी कों किसकिस तरीके सें सेलीब्रेट करेंगे?"
अजय सिंह कि बात कां प्रतिमा नें कोई जवाब नं दिया। वोँ बसअजय सिंह कों अजीबभाव सें देखती रही। जबकि अजय सिंह नें उसके चेहरे सें नज़रहटा कर शिवा सें पवन सिंह केँ घऱ केँ बारे मे पहले पूॅछा फिन अपनीकोट कि पाॅकेट सें फोन निकाला। फोन पऱ उसने किसी कों मोबाइल लगाया। दूसरी तरफ सें काल रिवीव किये जाने केँ बादअजय सिंह नें उसेपवन सिंह केँ घऱ कां पता बताया औऱ उससे जल्द सें जल्दपवन सिंह कां पता लगाने कां हुक्म दिया। उसकेबार उसनेकाल कट करकेफोन कों अपने सामने रखी टेबल पर्र रख दिया।
"तौ डिबेट कों आगे बढ़ाएॅ डियर?"अजय सिंह नें प्रतिमा कि तरफदेख कर कहा___"मैने अपने एक् व्यक्ति कों पवन सिंह कां पता करने केँ लिएबोल दिया हैं। वोँ जल्द हि इस बारे मे हमें सूचित करेगा। तब तक हम् अपनी डिबेट कों आगे बढ़ते हें। "
"ठीक हैं जैसी तुम्हारी मर्ज़ी। " प्रतिमा नें भावहीन स्वर मे कहा___"शुरुआत करो। "
"यहाॅ पऱ इनसभी बातों कों संक्षेप मे यह निर्णय निकालते हें कि बाहरी कोई भि ब्यक्ति मेरेसंग यहसभी नहि कररहा हैं। " अजय सिंह नें गहरी साॅस लेकर कहा__"बल्कि यहसभी करने वाला मात्र एक् हि आदमी हैं औऱ वोँ हैं विराज। पवन सिंह कां नाम जुड़ने सें जौ बात सामने आई वोँ यह हैं कि मुम्बई मे रहतेहुए विराज नें अपने साथी केँ द्वारा यहसभी करवाया। लेकिन यहाॅ प्रश्न यह हैं कि विराज केँ इसकाम मे उसके औऱ कितने यार शामिल थें? क्योंकि यहकाम मात्र एक् व्यक्ति सें तौ होँ नहि सकता। इस लिएयह जानना ज़रूरी हैं उसनेकिस किस कों अपनेइस काम पर्र लगाया हुआ हैं?"
"तुम् एक् बातभूल रहे हौ अजय। " प्रतिमा नें कहा__"वोँ यह कि फैक्ट्री मे आग लगने सें पहले भि एक् खेल तुम्हारे संग खेला गय़ा थां। याद हैं, वोँ विदेशी ब्यापारी। जौ अपनी पत्नि केँ संगआया थां औऱ उसने तुम्हें भारी मात्रा मे कपड़ा रेडी करने कों कहा थां। डील पक्की होने केँ बादजब डिलीवरी कां वक़्त आया तोँ उस विदेशी ब्यापारी कां कहींकोई पता हि नहि थां। अगलेदिन अख़बार मे ख़बरछपी कि शहर केँ मशहूर बिजनेस मैनअजय सिंह कों किसी विदेशी ब्यक्ति नें करोड़ों कां चूना लगाया। "
"ओहहाॅ दोस्त। " अजय सिंह कि ऑखों केँ सामने दो विदेशी पति पत्नि कि शक्लघूम उठी___"उसका तौ मुझे ख़याल हि नहि रहा थां। "
"होना चाहिए अजय। " प्रतिमा नें कहा___"क्योंकि तुम्हारे संगखेल खेलने कां आग़ाज़ तोँ वहीं सें शुरुआत हुआ थां नं? ख़ैर, मेरा ख़याल यह हैं कि वोँ विदेशी ब्यक्ति कोई औऱ नहि स्वयं विराज हि थां औऱ उसकी पत्नि केँ रूप मे स्वयं उसकी हि बेहन निधी थि। "
"व्हाऽऽऽट???" अजय सिंहउछल पड़ा___"ऐसा तुम् यकीन सें केसेकह सकती होँ?"
"नायकीनी कि भि कोईवजह बतादो मुझे?" प्रतिमा नें बड़े आत्मविश्वास सें कहा___"तुम् यकीनइस लिए नहि करपारहे क्योंकि तुम् अब भि यही समझते हौ कि विराज किसी ढाबे याँ होटल मे कप प्लेट धोरहा होगा औऱ उसकी औकात नहि कि वोँ यहसभी अफोर्ड करसके। मगर मे इसबात कों अलगतरह सें सोचती हूॅअजय। मे यह सोचती हूॅ कि विराज एक् पढ़ा लिखा लड़का हैं। वोँ बचपन सें हि पढ़ने लिखने मे सब बच्चों सें आगे थां। उसका माइंड बड़ा शार्प थां। कहने कां मतलबयह कि जितना वोँ पढ़ा लिखा थां उससेउसे कोईजॉब मिल जानां कोई मुश्किल काम नहि थां। संभव हैं कि उसेकोई ऐसीजॉब मिल गई होँ जिसके तहत वोँ इतना तोँ अफोर्ड कर हि सके कि वोँ तुम्हारे संगऐसा खेलखेल सके। अगर तुम् इस एंगल सें सोचोगे अजय तौ तुम्हें भि लगने लगेगा कि हाॅ वोँ लड़काऐसा कर सकता हैं। "
प्रतिमा कि इनसभी बातों सें अजय सिंह कों भि एहसास हुआ कि प्रतिमा कि बात मे सच्चाई हैं। इसबात कों उसे भि स्वीकार करना हि पड़ा कि विराज सब बच्चों मे सबसे ज़्यादा पढ़ने मे तेज़ थां। उसेयह भि मानना पड़ा कि उसेकोई ऐसीजॉब अवश्य मिल गई रही होगी जिससे वोँ यहसभी करसके। अजय सिंह कि ऑखों केँ सामने शिवा कां वोँ अधमरी हालत मिलना घूम गय़ा। इसबात सें यहसाफ ज़ाहिर होता हैं कि विराज़ केँ मन मे इन लोगों केँ प्रति आक्रोश औऱ बदले कि भावना हैं। इसलिए उसका तौ यह हमेशा प्रयास रहेगा कि वोँ अपनेसंग हुए अत्याचार कां बदला लें सके।
अजय सिंह केँ मनो मस्तिष्क मे यहसभी बातें बड़ी तेज़ी सें चलनेलगी थि, जिसका असरयह हुआ कि उसनेइस सभी कों स्वीकार कर लिया कि यहसभी कुछ विराज नें हि किया हौ सकता हैं। फिन चाहे उसका वोँ विदेशी बनना हौ याँ फिन फैक्ट्री मे आग लगाना। अभि अजय सिंहयह सभीसोच हि रहा थां कि सामने टेबल पऱ रखा उसकाफोन बजनेलगा। उन तीनों ध्यान एक् संगफोन पऱ गय़ा।
अजय सिंह नें हाॅथ बढ़ाकर फोन उठाया औऱ उस पऱ आँ रहीकाल कों रिसीव करउसे कान सें लगा लिया। उस तरफ सें कुछदेर तक वोँ कुछ सुनता रहा उसकेबाद उसनेयह कहकरकाल कटकर दिया कि___"अपने सभी आदमियों सें बोलो कि वोँ सभीउन लोगों कां पता लगाएॅ। मुझेहर हाल मे उन सबकापता चाहिए। "
"क्याँ बात हुइ तुम्हारी अपनेउस व्यक्ति सें?" प्रतिमा नें पूछा।
"तुम्हारा कहना बिलकुल सही थां प्रतिमा। " अजय सिंह नें गहरी साॅस ली___"विराज नें सच मे अपनेउस यार औऱ उसके परिवार कि सुरक्षा कां ख़याल रखाहुआ थां। "
"आख़िर क्याँ बताया तुम्हारे व्यक्ति नें?" प्रतिमा नें कहा___"पूरी बातसाफ साफ मुझे भि बताओ। "
"मेरा व्यक्ति पवन सिंह केँ घऱ पऱ गय़ा थां। " अजय सिंह नें बताना शुरुआत किया___"लेकिन जब वोँ पवन नें घऱ केँ दरवाजे पर्र पहुॅचा तोँ देखा कि वहाॅ बड़ा सां तालालगा हुआ थां। उसकेबाद मेरेउस व्यक्ति नें आसपास वालों सें पवन औऱ उसकेघऱ वालों केँ बारे मे पूछा तोँ कुछ लोगों नें उसे बताया कि साम कों पवन केँ घऱ केँ सामने एक् एम्बूलेन्स आई थि। उस एम्बूलेन्स मे घऱ केँ अंदर सें कुछ सामान लाकररखा गय़ा थां औऱ फिनउस एम्बूलेन्स मे पवन, पवन कि विधवा माॅ औऱ उसकी एक् बेटी बैठगईं थि। इन लोगों केँ संगदो व्यक्ति औऱ थें। वोँ दोनो भि उस एम्बूलेन्स मे बैठगए थें। एम्बूलेन्स केँ आगे हि एक् जीप खड़ी थि। उसजीप केँ चलते हि वोँ एम्बूलेन्स भि चल पड़ी थि। इसकेबाद वोँ लोग कहाॅगए इसका किसी कों कोईपता नहि। "
"ओह इसका मतलबउन लोगों कों पता थां कि तुम्हें देर सवेरयह पताचल हि जाएगा कि विराज मुम्बई सें आने केँ बादपवन केँ घऱ पर्र हि ठहरा थां। " प्रतिमा नें सोचने वालेभाव सें कहा___"इस लिए, इससे पहले कि उन लोगों तक तुम्हारे व्यक्ति पहुॅचें वोँ पहले हि वहाॅ सें कूचकर गए। ख़ैर, अब तोँ तुम्हें यकीन आँ गय़ा न् कि विराज नें हि यहसभी किया हैं?"
"वोँ सभी तोँ ठीक हैं डियर। "अजय सिंह केँ चेहरे पर्र गहनसोच केँ भाव थें, बोला___"मैंने मान लिया कि यहसभी विराज नें हि किया होगा। मगर सोचने वालीबात हैं कि यहसभी उसने कितना शातिराना ढंग सें किया हैं। पवन औऱ उसकीमाॅ बेहन कों वोँ वहाॅ सें एम्बूलेन्स जैसेकार सें लें गय़ा। कोईसोच भि नहि सकता कि एम्बूलेन्स केँ अंदरकोई मरीज़ नहि बल्कि यहसभी मौजूद हौ सकते हें। मगर यहाॅ पर्र दो चीज़ें हें जोँ समझ मे नहि आँ रहीं। "
"कौन सि दो चीज़ें डैड?" शिवा नें चकितभाव सें पूॅछा थां।
"पहली चीज़यह कि विराज केँ पास एम्बूलेन्स कहाॅ सें आई?"अजय सिंह नें कहा___"साधारणरूप सें यहाॅ पऱ उसकेलिए एम्बूलेन्स कां मिलना असंभव नहि तौ नामुमकिन बात तोँ हैं हि। दूसरी चीज़यह कि एम्बूलेन्स केँ आगे जौ जीप थि वोँ किसकी थि औऱ उसमें कौन बैठा थां? यहबात मेरे व्यक्ति कों पूछने पऱ भि किसी नें नहि बताई कि उसजीप पर्र कौनकौन बैठाहुआ थां? इसका मतलब तोँ यहीहुआ कि पवन सिंह केँ अलावा भि कोई औऱ हैं जोँ विराज कि सहायता कररहा हैं। "
"विराज कों एम्बूलेन्स केसेमिल गई यह तोँ चलो साधारण बात होँ सकती हैं। " प्रतिमा नें भि मानो अपने दिमाग़ केँ घोड़े दौड़ाए___"हौ सकता हैं कि उसने ज़्यादा पैसे देकर एम्बूलेन्स कां जुगाड़ कर लिया होगा। मगर सोचने वालीबात तौ उसजीप कि हैं। यकीनन यह एक् नया प्वाइंट हैं अजय। तुमने सही पकड़ा। पवन केँ अलावा भि कोई हैं जौ इस वक़्त विराज कि सहायता कररहा हैं। पर्र कौन होँ सकता हैं ऐसा ब्यक्ति? इस गाॅव मे ऐसाकौन हैं जिसके पास स्वयं कि जीप हौ सकती हैं?"
"तुम्हारा मतलब हैं कि इस गाॅव मे जिसके पास स्वयं कि जीप होगी। "अजय सिंह नें चौंकते हुए कहा___"वही विराज कि सहायता कररहा हैं?"
"हाॅ बिलकुल। " प्रतिमा नें झट सें कहा___"क्याँ ऐसा नहि होँ सकता?"
"हौ तौ सकता हैं डियर। "अजय सिंह नें कहा___"मगर यह भि तोँ हौ सकता हैं कि विराज नें वोँ जीप किराये पर्र हायर कि हुइ हौ। "
"अगर विराज कों अलग सें कोईजीप हायर हि करना थां तोँ पवन औऱ उसकीमाॅ बेहन केँ संग स्वयं भि एम्बूलेन्स सें इस गाॅव सें निकलने कि क्याँ ज़रूरत थि?" प्रतिमा एक् हि साॅस मे कहतीचली गई___"याँ तोँ वोँ किराये पर्र ली गई जीप सें हि सबकोसंग लेँ जाता याँ फिन मात्र एम्बूलेन्स केँ द्वारा हि सबको यहाॅ सें लेँ जाता। दो अलगअलग कारसंग मे रखने कां क्याँ मतलब हौ सकता हैं?"
"बात तोँ तुम्हारी सही हैं डियर। "अजय सिंह नें कहा___"मेरे व्यक्ति नें बताया कि विराज सबको लेकर एम्बूलेन्स मे हि बैठ गय़ा थां, ऐसा मेरे व्यक्ति केँ पूछने पर्र कुछ लोगों नें उसे बताया हैं। जबकि दूसरी जीप मे कौन बैठा थां यहपता नहि चला। इसका मतलब शायदयह भि हौ सकता हैं कि पवन केँ अलावा जौ दूसरा ब्यक्ति विराज कि सहायता कररहा हैं वहीउस जीप मे थां। एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलने कां भि यही मतलब होँ सकता हैं कि वोँ विराज एण्ड जश्न कों सुरक्षापूर्वक गाॅव सें बाहर् निकाल देना चाहता थां। अब प्रश्न यह हैं कि वोँ जीप वाला दूसरा ब्यक्ति विराज एण्ड जश्न कों लेकर कहाॅ गय़ा हौ सकता हैं? शहर याँ फिन अपनी हि किसी सुरक्षित स्थान पऱ?"
"प्रश्न तौ यह भि हैं अजय कि विराज मुम्बई सें यहाॅआया किसलिए थां?" प्रतिमा नें कहा___"यहाॅ पऱ उसकाऐसा क्याँ ज़रूरी काम थां जिसके लिए उसने अपनीजान कों भि ख़तरे मे डाल दिया? विराज कि माॅ गौरी नें उसे यहाॅआने कि इजाज़त केसेदे दि होगी उसको?"
"संभव हैं कि वोँ अभय केँ पत्नि बच्चों कों लेने यहाॅआया होँ। " अजय सिंह नें संभावना ब्यक्त कि थि।
"अगर उसकेआने कि यहीवजह थि तौ वोँ यहाॅ नहि बल्कि सीधाअभय कि ससुराल जाता। " प्रतिमा नें कहा___"करुणा तौ अपने बच्चों केँ संग अपने मायके मे हि हैं। विराज सीधा वहीं जाता, औऱ हमें उसकेआने कां पता भि नहि चल पाता। मगर ऐसाहुआ नहि बल्कि वोँ यहींआया हैं। इसका मतलबयही हुआ कि वोँ जिस किसी भि काम सें यहाॅआया थां वोँ कोई दूसरा हि काम थां। "
"अब इसकापता तोँ स्वयं विराज हि बता सकता थां याँ फिन उसका मित्र पवन। "अजय सिंह नें एक् नया शिगार सुलगाते हुए कहा___"मेरे व्यक्ति उनकीखोज मे लगे हें। देखते हें क्याँ नतीजा सामने आता हैं? ख़ैर, तब तक हम् डिबेट कों आगे बढ़ाते हें। "
"अब कैसी डिबेट अजय?" प्रतिमा केँ माथे पर्र बल पड़ता चला गय़ा___"यह बात तोँ क्लियर हौ हि गई न् उस सबमें विराज कां हि हाॅथ थां। उसने हि अपने साथी कि सहायता सें वोँ सभी किया थां। फिनअब किसबात कि डिबेट?"
"अभि तौ बहोत कुछ बाॅकी हैं माई डियर। "अजय सिंह नें शिगार कां गहराकश लिया, बोला___"विचार विमर्ष केँ लिए औऱ भि कई बातें शेष हें। "
"अब औऱ क्याँ बातें शेष हें?" प्रतिमा नें पूछा।
"अभि तोँ एक् प्रश्न ऐसा भि हैं डियर जिसे हम् नज़रअंदाज़ नहि कर सकते। "अजय सिंह बोला___"जैसा कि हमारी डिबेट पर्र यह नतीजा निकला कि फैक्ट्री मे आग विराज नें हि लगाई याँ लगवाई हौ सकती हैं। इसमें भि दो बातें हें, पहलीयह कि क्याँ विराज कों यह भि पता थां कि फैक्ट्री मे कोई गुप्त तहखाना हैं जिसके अंदर ग़ैर कानूनी चीज़ों कां ज़खीरा मौजूद हैं? अगरहाॅ तौ, क्याँ उसी नें उस ग़ैर कानूनी ज़खीरे कों गायब किया याँ करवाया? याँ फिन दूसरी बातयह कि इस सबमें किसी औऱ कां भि हाॅथ थां? क्योंकि प्रश्न इसी सें निकलरहा हैं कि विराज कों यहबात केसेपता चली कि फैक्ट्री केँ अंदरकोई गुप्त तहखाना हैं जिसके अंदर मेरी ग़ैर कानूनी चीज़ें मौजूद हें?"
"तुम् कहना क्याँ चाहते होँ अजय?" प्रतिमा नें उलझनपूर्ण भाव सें पूछा थां।
"बहोत साफबात हैं डियर। "अजय सिंह नें कहा__"अगर यहमान कर चलें कि विराज मुझसे बदला लेना चाहता हैं तौ उस सूरत मे वोँ मेरी फैक्ट्री मे यकीनन आगलगा सकता हैं औऱ उसआग मे फैक्ट्री केँ अंदर कां सभीकुछ जलकर ख़ाक़ मे मिल जाएगा। उसेइस बात सें कोई मतलब नहि होगा कि इस सबमें मेरा क्याँ क्याँ औऱ कितना नुकसान हौ जाएगा? बदला लेने केँ रूप मे यह एक् नेचुरल बात हौ गई। मगर, तहखाने सें उनसभी चीज़ों केँ गायब होँ जाने सें एक् नई औऱ सोचपूर्ण बात सामने आती हैं कि विराज नें उस सबको क्यूं गायब किया औऱ उस सबके बारे मे उसेपता केसेचला? मतलबसाफ हैं डियर कि विराज कों इसबात कां अच्छी तरह सें पता थां कि फैक्ट्री केँ अंदर एक् गुप्त तहखाना हैं औऱ उस तहखाने केँ अंदर मेरी एक् ग़ैर कानूनी दुनियाॅ मौजूद हैं। अब प्रश्न यह उठता हैं कि विराज कों इस सबका केसेपता थां? क्योंकि वोँ तौ कभी फैक्ट्री गय़ा हि नहि थां, दूसरी बात वोँ मौजूदा वक़्त मे यहाॅ थां भि नहि तौ केसेउसे इतनी गुप्त बात कां पताचल गय़ा? इसका मतलब तोँ यहीहुआ कि कोईऐसा ब्यक्ति उसे मिला जिसने उसे फैक्ट्री केँ अंदर कि इतनी बड़ी गुप्त बात बताई। वरना क्याँ उसेकोई ख़्वाब चमका थां जिसमें उसनेयह सभीदेख लिया होगा?"
"यकीनन तुम्हारी इसबात मे प्वाइंट हैं। " प्रतिमा नें प्रभावित होने वालेभाव सें कहा___"यह एक् ज़बरदस्त प्वाइंट हैं अजय। फैक्ट्री मे आग लगने वाले हादसे कि कड़ियाॅ ऐसी हौ सकती हें____ विराज कों सभीकुछ पहले सें हि किसी केँ द्वारा पताचल चुका थां कि फैक्ट्री केँ अंदर मौजूद तहखाने मे तुम्हारे द्वारा ग़ैर कानूनी धंधा भि किया जाता हैं। इसलिए उसनेउस हिसाब सें हि प्लान बनाया। मतलबयह कि फैक्ट्री मे आग लगाने सें पहले हि उसने तहखाने सें वोँ सभी चीज़ें निकाल कर अपने कब्जे मे कि, उसकेबाद उसने तहखाने मे समयबम स्लिम किया। कुछ वक्तबम उसने फैक्ट्री केँ अंदरउन जगहों पर्र भि स्लिम किये जहाॅ पर्र कपड़ों कां स्टाॅक थां औऱ मशीनें थि। सारेसमय बमों केँ फटने कां वक्त एक् हि थां। सारी क्रिया करने केँ बाद वोँ फैक्ट्री केँ अंदर सें बड़ी हि आसानी सें बाहर् निकल गय़ा। उसकेबाद क्याँ हुआयह सबकोपता हि हैं। "
"बिलकुल यहीहुआ थां। " अजय सिंह नें कहा___"अब प्रश्न यही हैं कि ऐसा वोँ कौन व्यक्ति थां जिसने विराज कों तहखाने सें संबंधित जानकारी दि? तहखाने केँ बारे मे मेरे अलावा किसी कों भि पता नहि थां। इसबात केँ पता होने कां तोँ प्रश्न हि नहि उठता कि उसके अंदर क्याँ मौजूद हैं। "
"कोई तोँ ऐसा ब्यक्ति अवश्य थां अजय। " प्रतिमा नें सोचने वालेभाव सें कहा___"जिसने विराज कों इतनी बड़ी गुप्त जानकारी दि। एक् मिनट अजय.जिस दिन फैक्ट्री मे वोँ हादसा हुआ थां उसीदिन याँ रात कों तुम्हारा भूतपूर्व पार्टनर विदेश जाने केँ लिए प्लेन मे बैठा थां। एक् बारइस बारे मे फिन सें सोचो डियर, क्याँ ऐसा नहि हौ सकता कि सक्सेना कों पताचल गय़ा होँ कि फैक्ट्री केँ अंदर तहखाना भि हैं औऱ उस तहखाने मे तुम् क्याँ धंधा करते होँ? ऐसा बिलकुल हौ सकता हैं अजय, सक्सेना केँ पास दूसरी कोईठोस वजह नहि थि यहाॅ सें रफूचक्कर हौ जाने कि। वोँ तोँ तुम्हारा जिगरी दोस्त भि थां, ऐसा जिगरी कि उससे हमारे बड़े गहरे संबंध थें। उसकी पत्नि तौम्हारे नीचे औऱ तुम्हारी यह पत्नि यानी कि मे उसके नीचे। हम् सभी एक् संग कितना इन सबमें एन्ज्वाय करते थें। ऐसे मज़ेदार रिश्तों कों अनायास हि छोंड़ कर विदेश चले जाने कां दूसरा औऱ क्याँ मतलब हौ सकता हैं भला?"
"तुम् यह कहना चाहती होँ कि सक्सेना कों फैक्ट्री केँ अंदर मौजूद तहखाने सें संबंधित सबकुछ पता थां। " अजय सिंह बोला___"उसके बाद वोँ मुझसे पीछा छुड़ाने केँ लिएकोई जुगत लगाने लगा। औऱ फिन संयोग सें उसकी मुलाक़ात विराज सें हुइ। उसने विराज कों सभीकुछ बता दिया औऱ फिन वो मुझसे अपना हिसाब पुस्तक करके यहाॅ सें रफूचक्कर हौ गय़ा?"
"मेरा मतलब यकीनन यही हैं डियर हस्बैण्ड मगर इसमें बातइस तरह नहि हुई जैसी कि तुमने सोचकर बयां कि हैं। " प्रतिमा नें कहा___"बल्कि ऐसी हुईँ हैं, मेरी थ्योरी यह हैं ____विराज कों तुमसे किसी भि तरह सें बदला लेना थां यह एक् सचबात हैं। मगर उसने सोचा कि तुमसे अपना बदला लेने कि उसमें क्षमता नहि हैं। इसलिए उसने दिमाग़ लगाया। उसने तुमको अंदर सें कमज़ोर करने कां प्लान बनाया। सबसे पहले उसने अपनी बेहन केँ संगमिल कर विदेशी बिजनेस मैन कां गेटअप बनाया औऱ फिन तुमसे वोँ डील कि। बाद मे डिलीवरी केँ टाइम वोँ गायब होँ गय़ा। इसका नतीजा यहहुआ कि भारी मात्रा मे सजधजकर किया गय़ा कपड़ा बिक नहि पाया औऱ जौ तुमने उसे सजधजकर करवाने मे रुपया लगाया वोँ वसूल नहि हौ पाया। इससे तुम्हें बहुत नुकसान हुआ। इसका एक् नुकसान यह भि हुआ कि बिजनेस केँ क्षेत्र मे इसतरह किसी विदेशी केँ हाॅथों धोखाखा जाने सें तुम्हारी रेपुटेशन पऱ इसका बुराअसर पड़ गय़ा। उसकेबाद फैक्ट्री मे आगलग जाने सें जोँ भारी नुकसान हुआ उससे तुम् पूरीतरह हिलगए। इतनाकुछ होने केँ बाद भि तुम् यह नहि समझपाए कि यहसभी तुम्हारे क्यूं औऱ कौनकर रहा हैं? मगर विराज नें अपनीतरफ सें तुम्हारे लिए एक् क्लू भि छोंड़ा, वोँ क्लूयह थां कि तहखाने केँ अंदर सें उसने तुम्हारी सारी ग़ैर कानूनी चीज़ें गायबकर दि। यहाॅ उसने तुम्हें यहजता दिया कि ऐसा केसे औऱ कौनकर सकता हैं? यहअलग बात हैं कि यहबात तुम् आज समझे होँ। ख़ैर, इस बार तोँ वोँ स्वयं हि यहाॅआया औऱ तुम्हारे इतने सारे आदमियों कों आश्चर्यजनक रूप सें पता नहि कहाॅ औऱ केसे गायबकर दिया?"
"ओह वैरीगुड। " अजय सिंह मुस्कुराया___"यकीनन इस थ्यौरी मे दम हैं डियर। अब यह भि बतादो कि विराज नें तहखाने सें मेरी वोँ सभी ग़ैर कानूनी चीज़ें क्यूं गायब कि? उनसेउसे क्याँ फायदा होँ सकता हैं भला?"
"कमाल करते हौ अजय। " प्रतिमा चौंकी___"इतनी सि बात कां मतलब पूछते हौ मुझसे। स्वयं सोचो कि विराज नें वोँ सभी क्यूं गायब किया होगा? सीधी सि बात हैं अजय, वोँ सभी चीज़ें तुम्हारे काले कारनामों कां पुख्ता सबूत हें। विराज अगर चाहे तौ आज तुम्हें उनसभी चीज़ों केँ आधार पर्र जेल पहुॅचवा सकता हैं। तुम्हें यह बताने कि ज़रूरत नहि हैं कि ग़ैर कानूनी धंधा करने केँ जुर्म मे कानून तुम्हें कितनी बड़ी सज़ा सुना सकता हैं? कहने कां मतलबयह कि तुम्हारी स्वतंत्रता विराज केँ हाॅथों मे हैं। वोँ अगर चाहे तोँ तुम् कानून कि गिरफ्त सें दूर रहोगे औऱ अगर वोँ चाहे तोँ आजइसी वक़्त तुम् कानून केँ शिकंजे मे फॅसजाओ। मगर चूॅकि अब तक उसनेऐसा कुछ नहि किया हैं इसलिए अभि तुम् कानून कि पहुॅच सें बाहर् होँ। मगर इसका मतलबयह नहि हैं भविष्य मे भि ऐसा हि रहेगा। संभव हैं कि विराज किसीऐसे टाइम पर्र यहसभी करेजब उसेलगे कि यहीसही वक़्त हैं। दैट्स इट। "
प्रतिमा कि यह बातें सुनकर अजय सिंह केँ समूचे शरीर मे झुरजुरी सि दौड़ गई। बगल सें हि सोफे पऱ बैठे शिवा कि ऑखों केँ सामने उसके बाप केँ दोनो हाॅथ कानून कि हथकड़ी मे बॅधे नज़रआए। इस दृष्य केँ घूमते हि शिवा कि धड़कने एकाएक हि बढ़चली थि। अभि यहसभी यहलोग सोच हि रहे थें कि तभी एक् बारफिन सें अजय सिंह कां फोनबज उठा। हड़बड़ा करअजय सिंह नें फोन कि काल कों रिसीव करफोन कों कान सें लगा लिया।
".। " उधर सें कुछदेर तक कुछकहा गय़ा। जिसेसुन करअजय सिंह केँ चेहरे पर्र चौंकने केँ भाव उभरे। उधर कि बातें सुनने केँ बादअजय सिंह नें यहकहकर मोबाइल रख दिया कि____"ठीक हैं, तुम् अपनेकुछ आदमियों कों गुनगुन रेलवे स्टेशन जाने कों बोलदो औऱ बाॅकी केँ लोगआस पास केँ क्षेत्र कि अच्छे सें छानबीन करतेरहो। "
"क्याँ कहा तुम्हारे व्यक्ति नें?" अजय सिंह केँ मोबाइल रखते हि प्रतिमा नें पूछा थां।
"उसने जौ कुछ भि मुझे बताया हैं। " अजय सिंह नें अजीबभाव सें कहा___"उसे जानकर मुझे यकीन नहि होँ रहा हैं प्रतिमा। "
"क्याँ मतलब??" प्रतिमा केँ चेहरे पर्र सोचने वालेभाव उभरे___"किस बात कां यकीन नहि हौ रहा तुम्हें?"
प्रतिमा केँ पूछने पऱ अजय सिंह नें जल्दी कोई जवाब नहि दिया। बल्कि चेहरे पर्र गंभीरता लिए उसने एक् नया शिगार सुलगाया औऱ दोतीन जल्द जल्दकश लेने केँ बाद उसने नाॅकव मुह सें ढेर सारा धुआॅ उगला। प्रतिमा औऱ शिवा दोनो हि उसकेमुख सें जवाब सुनने केँ लिए बेचैन सें होनेलगे थें। लेकिन अजय सिंह नें शिगार पी लेने केँ बाद भि कोई जवाब नहि दिया। वोँ किसी गहरीसोच मे डूबा नज़रआया। प्रतिमा उसके चेहरे पऱ इसतरह सोच केँ भावदेख कर चौंकी। उसनेअजय सिंह कों आवाज़ देकरसोच केँ सागर सें निकाला। हक़ीक़त कि दुनियाॅ मे आकरअजय सिंह नें गहरी साॅसली औऱ एक् झटके सें सोफे पर्र सें उठकर खड़ा होँ गय़ा। उसने शिवा औऱ प्रतिमा दोनो कों हवेली चलने कों कहा औऱ बाहर् कि तरफ बढ़ता चला गय़ा। दोनोमाॅ बेटा भौचक्के सें देखते रहगए थें अजय सिंह कों।
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उधर रितू दिदी केँ फार्महाउस पऱ!
सुभह हुईँ औऱ एक् नयेदिन तथा एक् नये जिंदगी कि शुरूआत हुइ। सबके प्रेम नें औऱ सबके समझाने कां असरयह हुआ थां कि पिछले दिन कि अपेक्षा आज मेरी हालत मे बहुतहद तक सुधार थां। कल तौ मे सदमे मे हि डूबाहुआ थां। किसी सें कोई मतलब हि नहि थां औऱ नां हि किसी सें कोईबात करने कां दिलकर रहा थां। मगरआज मे बहुतहद तक नार्मल थां।
जब मेरी नींद खुली तौ मैने देखा मेरे दोनोतरफ मुझसे छुपकी हुईँ मेरी दोनो बहनें चैन सें सोरही थि। उन दोनो केँ हसीनतथा मासूम सें चेहरों कों देखकर हि मेरामन खुश सां हौ गय़ा। वोँ दोनो मुझसे ऐसे छुपकी हुईँ थि मानो उन्हें डर हौ कि मे उन्हें छोंड़ कर कहींदूर चला जाऊॅगा। मे बहुतदेर तक उन दोनो कों एकटक देखता रहा। आशा दिदी कि तोँ ख़ैरबात हि अलग थि लेकिन रितू दिदी कि बात सबसे जुदा थि। वोँ इसलिए क्योंकि बचपन सें लेकरअब तक मे उनकेमुख सें राज याँ भइया सुनने कों तरस गय़ा थां। वोँ मुझे देख्ना तक गवाॅरा नहि करती थि बात करने कि तौ बहोत दूर कि बात हैं। मगरआज मेरीवही रितू दिदी मुझसे छुपकी हुईँ सोरही थि। उनकेदिल मे मेरेलिए बेपनाह प्रेम व स्नेह थां।
उन्हें इसतरह चैन सें सोतेदेख जाने क्यूं मेरी ऑखों मे ऑसूभर आए। मेरेदिल मे दर्द कि एक् तेज़लहर सि दौड़ गई। अभि मे इसलहर सें ब्यथित हुआ हि थां कि सहसा रितू दिदी केँ सम्पूर्ण शरीर मे हरकत हुईँ औऱ देखते हि देखते उनकी ऑखेंखुल गईं। उनकी नज़र सबसे पहलेमुझ पर्र हि पड़ी। मेरी ऑखों मे ऑसू देखते हि वोँ बेचैन सि नज़रआने लगीं। उन्होंने अपना हाॅथ बढ़ाकर मेरे चेहरे कों सहलाया औऱ सिर कों नाँ मे हिलाते हुए मुझे इशारा किया कि मे दुखी नं होऊॅ।
इधर आशा दिदी कि भि ऑखेंखुल गई थि। सिर कों ऊपर कि तरफउठा कर उन्होंने मुझे देखा औऱ मेरी ऑखों मे ऑसू देखते हि उन पर्र भि वही प्रतिक्रिया हुइ जौ रितू दिदी पऱ हुईँ थि। दोनो नें एक् संगऊपर कि तरफ खिसककर मेरे माथे पर्र हल्के सें चूमा। मे अपनी दोनो बहनों कां यह प्रेम देखकर अंदर हि अंदर गदगद सां होँ गय़ा। मुझे एक् अलग हि तरह कां एहसास हुआ। ऐसा लगा कि अब मे यहाॅ पऱ अकेला नहि हूॅ बल्कि यहाॅ भि मेरे अपने हें, जोँ मुझेइस हद तक प्रेम करते हें।
"तूँ इसतरह अबकभी दुखीमत होनाराज। " रितू दिदी नें गंभीरता सें कहा___"मे मानती हूॅ कि अभि जोँ कुछ भि हुआ उससे तुम्हे गहरा सदमालगा हैं। मगर तेरी स्वयं कों सम्हालना होगा मेरे भइया। तूँ मुझे भइया केँ रूप मे मिल गय़ा हैं इसलिए मे चाहती हूॅ कि मेरा भइया हमेशा खुशरहे। तेरेपास किसी भि प्रकार कां दुख दर्द नं आए। मैने भि ठान लिया हैं कि मे तुम्हारी तरफकभी भि दुखी नहि होने दूॅगी, औऱ इसकेलिए मे किसी भि हद तक गुज़र जाऊॅगी। "
"रितूसही कहरही हैं राज। "आशा दिदी नें कहा__"अब सें हम् दोनो बहनें तुम कोकभी भि दुखी नहि होने देंगे। उसकेलिए चाहे हमें जौ भि करना पड़े हम् करेंगे। "
"इसकी ज़रूरत नहि पड़ेगी दिदी। " मैने हल्के सें मुस्कुरा कर कहा___"क्योंकि जिसके पास आप् जैसी इतना प्रेम करने वालीदो दो बहनें हों उसकोकोई दुख तक़लीफ केसे होँ जाएगी? आप् चिन्ता मत कीजिए धीरे-धीरे धीरे-धीरे सभीठी होँ जाएगा। "
"यह हुई न् बात। " रितू दिदी नें मुस्कुरा कर कहा__"मुझे पता हैं कि मेरा स्वीट सां भइया कितना समझदार हैं। ख़ैर, चल अब तुँ फ्रेश हौ लें। हम् दोनो भि फ्रेश हौ जाते हें, उसकेबाद नास्ता करेंगे संग मे। मुझे भि थाने जानां पड़ेगा न्। "
"मुबारक हौ दिदी। " मैने कहा___"आप् पुलिस ऑफीसर बन गई हें। मुझेपता हैं आपका शुरुआत सें हि यह सपना थां कि आप् एक् दिन पुलिस ऑफिसर बनो। इस लिए इसकेलिए आपकोढेर सारी बॅधाईयाॅ दिदी। "
"थैंक्स राज। " दिदी नें कहा___"मगर मेरे माॅमडैड कों मेरा पुलिस ऑफीसर बनना बिलकुल मनपसंद नहि आँ रहा हैं। आएदिन इस बारे मे कोई नं कोईबात होती रहती हैं घऱ मे। मैने भि फैंसला कर लिया हैं कि अबयह पुलिस कि जॉब छोंड़ दूॅगी। "
"अरेऐसा क्यूं दिदी?" मैने चौंकते हुए कहा___"नहि नहि आप् ऐसा बिलकुल नहि करेंगी। पुलिस ऑफीसर बनना आपका ख़्वाब थां औऱ जबयह ख़्वाब पूरा हौ हि गय़ा हैं तोँ इसेइस तरह छोड़कर अंदर हि अंदर हमेशा केँ लिए दुखी रहने वालाकाम मत कीजिए। रहीबात बड़े बापू औऱ बड़ीमाॅ कि तोँ मुझेपता हैं वोँ ऐसा क्यूं चाहरहे हें?"
"अच्छा क्याँ पता हैं तुम्हें?" रितू दिदी नें मुस्कुरा कर पूछा___"ज़रा मे भि तोँ सुनूॅ। "
"जिनके हाॅथखून सें रॅगेहों। " मैने कहा___"औऱ जौ जुर्म कि दुनियाॅ सें ताल्लुक रखता हौ, वोँ तौ पुलिस औऱ कानून सें डरेगा हि। आप् तोँ वैसे भि एक् तेज़ तर्रार पुलिस ऑफीसर हें। उन्हें भि पता हैं कि आपकोअगर यहपता चलजाए उनकेडैड जुर्म कि दुनियाॅ सें ताल्लुक रखते हें तौ आप् सेकण्ड भर कां भि टाइम नहि लगाएॅगी उन्हें कानून कि गिरफ्त मे लेने मे। इसलिए वोँ नहि चाहते हें कि आप् पुलिस कि जॉब करें। "
मेरीयह बातें सुनकर रितू दिदी हि नहि बल्कि आशा दिदी भि बुरीतरह उछल पड़ी थि। रितू दिदी मुझेइस तरहदेख रहीथीं जैसे मे कोई अजूबा हूॅ।
"तुँ यहबात इतने यकीन सें केसेकह सकता हैं कि मेरेडैड जुर्म कि दुनियाॅ सें ताल्लुक रखते हें?" रितू दिदी नें चकितभाव सें पूछा थां।
"मुझे उनके बारे मे हर चीज़पता हैं दिदी। " मैने गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"औऱ मे यह भि जानता हूॅ कि आप् भि अपनेडैड केँ बारे मे बहोत कुछजान चुकी हें। "
"क्याँ मतलब????" रितू दिदी कि ऑखें आश्चर्य सें फैल गईं___"मे बहोत कुछ क्याँ जान चुकीहूॅ?"
"जाने दीजिए दिदी। " मैने पहलू बदलने कि गरज़ सें कहा___"उन सभी बातों कों ज़ुबाॅ पऱ लाने कां कोई मतलब नहि हैं। आप् यह पूछिये कि मुझे केसेपता कि आप् भि हुतकुछ जानती हें?"
"हाॅहाॅ बता न् राज। " रितू दिदी केँ आश्चर्य कां कोई ठिकाना नहि थां, बोलीं___"मे जानना चाहती हूॅ कि यहसभी तुम्हारी तरफ केसेपता हैं?"
"बड़ी सीधी सि बात हैं दिदी। " मैने कहा___"सबसे पहले तौ यही कि आपका मेरे प्रति इतना प्रेम हि यह ज़ाहिर कर देता हैं कि आपको उनकी असलियत केँ बारें मे कुछ तौ ऐसापता चला हि जिसके तहत आपकेदिल मे मेरे प्रति प्रेम जाग गय़ा। दूसरी बातयह कि आप् इस फार्महाउस मे नैना फूफी केँ संगरह रही हें। इससे साबित होँ जाता हैं कि आपको अपने माॅमडैड केँ बारे मे कुछ तौ ऐसापता चल हि चुका हैं। वरना नैना फूफी कों संगलिए यहाॅ रहने कां क्याँ कारण हौ सकता हैं? तीसरी बात, मेरे साथीपवन सें कहकर मुझे विधी सें मिलाने केँ लिए मुम्बई सें बुलाना। पवन औऱ विधि केँ द्वारा भि आपकोकुछ तोँ ऐसापता चल हि चुका होगा जिससे आपकोयह लगनेलगा कि मे औऱ मेरीमाॅ बेहन इतने बुरे नहि होँ सकते जितना आपको बताया गय़ा थां बचपन सें। "
रितू दिदी मेरीयह बातें सुनकर हैरान रहगईं। फिन सहसा उनके चेहरे पऱ प्रशंसा केँ भावउभर आए। होठों पर्र हल्की सि मुस्कान भि फैल गई।
"यकीनन तूने बड़ी हुस्न सें इनसभी बातों कां अंदाज़ा लगाया हैं राज। "फिन उन्होंने कहा___"औऱ यहसच हैं कि मुझे अपने माॅमडैड कि असलियत केँ बारे मे पताचल चुका हैं। लेकिन अभि भि कुछ बातें हें जिनका मुझे शायदपता नहि हैं। "
"डोन्ट वरी दिदी। " मैने कहा___"जब इतनाकुछ पताचल गय़ा हैं तोँ बाॅकी कां भि आपकोपता चल हि जाएगा। "
"चलठीक हैं मेरे प्यारे भइया। " रितू दिदी नें मेरे चेहरे कों प्रेम सें सहलाया___"मे तोँ बसइसबात सें हि खुशहूॅ कि मुझे मेरा वोँ भइयामिल गय़ा हैं जोँ सच मे मुझे अपनी दिदी मानता हैं औऱ मेरी इज्ज़त करता हैं। आने वाले वक्त मे क्याँ होने वाला हैं यह तोँ समय हि बताएगा। मे बसयह चाहती हूॅ कि जितने दिन तुँ यहाॅ हैं उतनेदिन तक तुझ पऱ किही भि तरह केँ ख़तरे कों नं आनेदूॅ। "
"आप् फिक्र मत कीजिए दिदी। " मैने मुस्कुरा कर कहा___"आपका यह भइयाकोई दूध पीता बच्चा नहि हैं जिसेकोई भि चोंट पहुॅचा देगा। इतना तोँ अब मुझमें सामर्थ हैं कि मे अपनी सुरक्षा स्वयं कर सकूॅ। "
"हाॅ मुझेपता हैं। " रितू दिदी हॅसकर बोलि___"मुझे पता हैं कि मेरे भइया नें दो मिनट केँ अंदर मेरेडैड केँ उतने सारे आदमियों कां खात्मा कर दिया थां। "
"वोँ तोँ बस हौ गय़ा दिदी। " मैने कहा___"पऱ आपके सामने तोँ कुछ भि नहि हूॅ मे। आपने भि तोँ मेरी सुरक्षा केँ लिए क्याँ कुछ नहि किया हैं। मे सोच भि नहि सकता थां कि आप् मेरेलिए इतनाकुछ कर सकती हैं। "
"तेरेलिए तोँ अबकुछ भि कर सकतीहूॅ मेरे भइया। " दिदी कि आवाज़ भारी होँ गई___"बचपन सें लेकरअब तक मैने तेरेसंग क्याँ किया हैं यहसोच कर हि मुझे स्वयं सें घृणा होने लगती हैं। इसलिए अब मे तेरेलिए औऱ अपने भइया केँ लिएकुछ भि करूॅगी। "
मैने देखा कि यहसभी कहतेहुए दिदी कि ऑखों मे ऑसू आँ गए थें इसलिए मैने उन्हें स्वयं सें छुपका लिया। वोँ स्वयं भि मुझसे किसी जोंक कि तरह चिपक गई थि।
"तुम् दोनो कां हौ गय़ा हौ तोँ मेरा भि कुछ ख़याल करलो। " सहसाआशा दिदी नें कहा___"मुझे तोँ भुला हि दिया तुम् दोनो नें। "
"क्याँ आप् सोच सकती हें दिदी कि हम् आपको भुला देंगे?" मैनेआशा दिदी कों स्वयं सें छुपकाते हुएकहा थां।
ऐसे हि कुछदेर तक हम् तीनो भइया बेहन एक् दूसरे सें छुपके रहेफिन हम् तीनोअलग हुए। रितू दिदी नें मुझे फ्रेश हौ जाने कां कहा औऱ स्वयं भि फ्रेश होने केँ लिएआशा दिदी कों लेकर कमरे सें बाहर् निकलगईं। उन दोनो केँ जाने केँ बाद मे कुछदेर यूॅ हि बेड पर्र लेटा किसीसोच मे डूबारहा फिन मे उठकर बाथरूम मे चला गय़ा।
नास्ते कि टेबल पर्र सभीकोई संग मे हि बैठकर नास्ता कररहा थां। किचेन मे हरिया काका कि पत्नि बिंदिया औऱ पवन कि माॅ नें नास्ता रेडी किया थां। मे अपनी नैना फूफी सें ठीकतरह सें मिला। उन्होंने मुझे अपने सीने सें लगाकर बहोत प्रेम दिया औऱ हमेशा खुश रहने कि दुवाएॅ दि।
रितू दिदी नें बताया कि आज करुणा चाची भि बच्चों केँ संग यहीं आँ रही हें। उनको सुरक्षा पूर्वक यहाॅ पर्र लाने कि जिम्मेदारी स्वयं रितू दिदी नें हि ली। हलाॅकि मैने उन्हें समझाया भि कि आप् धीरे-धीरे ड्यूटी जाइये, मे औऱ आदित्य करुणा चाची कों उनके बच्चों केँ संग सुरक्षित यहाॅ लेँ आएॅगे, मगर दिदी नहि मानी। इस लिए मैने भि अधिक ज़ोर नहि दिया। दिदी नें मुझे यहीं पर्र आराम करने कि सलाह दि थि। हलाॅकि मे चाहता थां कि मे एक् बार विधी केँ घऱ जाऊॅ औऱ उसके माॅमडैड कां हालचाल देखलूॅ मगर रितू दिदी नें कहा कि वोँ सभीदेख सुन लेंगी।
नास्ता करने केँ बाद रितू दिदी अपनी पुलिस जिप्सी मे बैठकर थानेचली गईं। नैना फूफी, आशा दिदी औऱ पवन कि माॅयह तीनो एक् संग हि बातें करने मे लगगईं। जबकि मे पवन औऱ आदित्य फार्महाउस केँ बाहर् कि तरफ आँ गए। मैने देखा कि फार्महाउस बहुत लंबा चौड़ा थां। बाहर् फ्रंट गेट पऱ दो बंदूखधारी खड़े थें। गेट केँ बगल सें हि एक् छोटी सि चौकीबनी हुईँ थि। जौ शायदउन दोनो बंदूखधारियों केँ आराम करने केँ लिए थि।
हम् तीनो एक् संग बाॅईतरफ बढ़गये। उसतरफ एक् खूबसूरत सां पेड़ थां जिसके नीचेहरी हरीघास उगी हुई थि तथा पेड़ केँ पास हि स्टील कि बड़ी बड़ीदो तीन बेंचरखी हुईँ थि बैठने केँ लिए। हम् तीनो जाकरउन बेंचों पर्र बैठगए। कल विधी वाले मैटर केँ बाद सें हम् तीनोकुछ बुझे बुझे सें थें। मुझेरह रहकर विधी केँ बारे मे वोँ सभीयाद आँ जाता थां जिसकी वजह सें मेरादिल दुखने लगता थां।
"वैसे विराज। " सहसा आदित्य नें कहा___"हम् यहाॅ सें कब निकलने वाले हें? यह जौ कुछ भि हुआ वोँ यकीनन बहोत दुखदहुआ हैं मगरयह भि सच हैं मित्र कि हमें जिंदगी मे आगे बढ़ना हि होता हैं। यहसभी तुम्हीं नें मुझसे कहा थां न्? इसलिए साथी विधी कि हसीन यादों कों दिल मे हि दबा केँ रखो औऱ आगे बढ़ो। "
"मे जानता हूॅ आदित्य। " मैने भारीमन सें कहा___"मुझे पता हैं कि इस सबको लेकरबैठ जाने कां कोई मतलब नहि निकलने वाला हैं। मगर एक् दोदिन मे यहींरह कर स्वयं कों औऱ अपनेदिल कों शान्त कर लेना चाहता हूॅ। मे नहि चाहता कि मेरे चेहरे पऱ छाई उदासी याँ किसीदुख केँ भाव कों देखकर मुम्बई मे मेरीमाॅ औऱ बेहन कों कुछपता चलजाए। वोँ मुझे किसी भि कीमत पऱ दुखी नहि देख सकती हें। "
"बात तोँ तुम्हारी ठीक हैं मित्र। " आदित्य नें कहा__"पर्र यह भि तोँ सोचो कि यहाॅ पर्र ज़्यादा दिन तुम्हारा रुकना ठीक नहि हैं। तुम्हारी जान कों हर टाइम ख़तरा बना रहेगा। "
"मे किसी ख़तरे सें नहि डरता आदित्य। " सहसा मेरे चेहरे पर्र कठोरता आँ गई___"पहले मुझेकुछ पता नहि थां औऱ मे किसी दूसरे उद्देश्य सें यहाॅआया थां इसलिए मे अजय सिंह याँ उसके आदमियों सें उलझना नहि चाहता थां। मगरअब मुझे किसी कि कोई परवाह नहि हैं। मे भि तोँ देखूॅ कि अजय सिंह केसे मेराबाल बाॅका करता हैं?"
"यहसभी तुम् आवेश मे कहरहे होँ यार। " आदित्य नें कहा___"जबकि तुम् भूलरहे हौ कि इस वक़्त तुम्हारी कई कमज़ोरियाॅ तुम्हारे संगसंग हें। अगर तुम् अकेले होते तौ मान सकता थां कि तुम् धड़ल्ले केँ संगउन सबका मुकाबला कर लेतेमगर इस वक़्त तुम् अकेले नहि हौ। पवन औऱ उसकीमाॅ बेहन भि तुम्हारे संग हें औऱ तुम्हारे अभय चाचा केँ पत्नि बच्चे भि तुम्हारे संग तुम्हारी कमज़ोरी केँ रूप मे जुड़ जाएॅगे। उस सूरत मे तुम् स्वयं कि सुरक्षा करोगे याँ उन लोगों कि जोँ इससमय तुम्हारे संग जुड़गए हें?"
"आदित्य सहीकह रहा हैं राज। "पवन नें भि हस्ताक्षेप किया___"इस समय तुम् किसी सें उलझने कि पोजीशन मे नहि होँ। दूसरी बातयह भि हैं कि मानलो अगर तुम्हारे बड़े पिताजी कों यहपता चल गय़ा कि तुम्हारे हरकाम मे तुम्हारी सहायता रितू दिदी भि कररही हें तौ सोचो क्याँ होगा?अरे रितू दिदी केँ लिए भि उनका ख़तरा होँ जाएगा। भलाअजय चाचा यह केसे बरदास्त कर पाएॅगे कि उनकी बेटी उनके सबसे बड़े दुश्मन कां संगदे रही हैं? जिसतरह कां कैरेक्टर तुम्हारे बड़े बापू कां हैं उससेयही बात सामने आती हैं कि वोँ यहसभी जानने केँ बाद अपनी बेटी कों किसी भि सूरत मे क्षमा नहि करेंगे। "
"मे पवन कि इसबात सें पूरीतरह सहमतहूॅ। " आदित्य नें कहा___"तुम् अपनीवजह सें भला अपनी रितू दिदी कि जान कों भि संकट मे केसेडाल सकते हौ? उनकेहित केँ बारे मे सोचना तुम्हारा सबसे बड़ा फर्ज़ होना चाहिए यार। उन्होंने तुम्हारी सुरक्षा केँ लिए क्याँ कुछ नहि किया हैं?"
"कभीकभी टाइम औऱ हालात केँ हिसाब सें भि कोई फैंसला लेना चाहिए राज। "पवन नें कहा___"विधी केँ जाने कां दुख हम् सबको हैं मगर स्वयं विधी भि यह नहि चाहेगी कि तुम् पर्र याँ तुम्हारी वजह सें किसी औऱ पर्र कोईऐसा संकटआए। इसलिए मे यही कहूॅगा कि जितना जल्द हौ सके हमें यहाॅ सें निकल जानां चाहिए। मे तुम्हें जंग केँ लिए नहि रोंकरहा भइया, वोँ तौ तसल्ली सें औऱ सबको सुरक्षित करने केँ बाद भि कि जा सकती हैं। "
"ठीक हैं दोस्त। " मैनेउन दोनो कि बातों पऱ विचार करतेहुए कहा___"जैसा तुम् दोनो कहोगे मे वैसा हि करूॅगा। हम् सभीकल हि यहाॅ सें मुम्बई केँ लिए निकलेंगे। सबकी टिकटों कां इंतजाम करवाता हूॅ मे। "
"उसकी ज़रूरत नहि हैं मित्र। " आदित्य नें कहा__"सबकी टिकटों कां इंतजाम होँ गय़ा हैं। मैनेकल हि सर(जगदीश ओबराय) सें बात कि थि। उन्हें मैने यहाॅकुछ बातें संक्षेप मे बताई थि, औऱ यह भि कहा थां कि वोँ हम् सबकी टिकटों कां इंतजाम करवादें। आज सुभह मेरेफोन पऱ उन्होंने सबकी टिकट कि रिसीव की व्हाट्सएप पर्र भेज दि हें। "
"चलोयह अच्छा हुआ। " मैने कहा___"मगर एक् बात अभि भि सोचने वाली हैं। वोँ यह कि देर सवेरअजय सिंह कों यहपता चल भि सकता हैं कि रितू दिदी मेरीहर तरह सें सहायता कररही थि। इसलिए अगरऐसा हुआ तोँ रिते दिदी केँ लिए भि ख़तरा हौ सकता हैं। "
"तौ तुम् अब क्याँ चाहते हौ?" आदित्य नें पूछा।
"मे तोँ यही चाहूॅगा दोस्त कि रितू दिदी पर्र कोई संकट नं आए। " मैने कहा___"हलाॅकि वोँ एक् पुलिस ऑफिसर हें औऱ किसी भि ख़तरे सें निपटने केँ लिए वोँ स्वयं हि सक्षम हें मगरफिन भि उन्हें यहाॅ अकेला छोंड़ देने कां मेरादिल नहि करता हैं। दूसरी बात उनकेसंग नैना फूफी भि तोँ हें। रितू दिदी केँ संग वोँ भि तोँ अजय सिंह केँ लपेटे मे आँ सकती हें। "
"मेरे ख़याल सें इस मे इतनासोच विचार करने कि ज़रूरत नहि हैं राज। "पवन नें कहा___"रितू दिदी केँ रहतेयह सभी होँ जाने कां चान्स बहोत हि कम हैं। फिन भि अगर उन्हें लगेगा कि उन दोनो पर्र ख़तरा हैं तौ वोँ अपनी सुरक्षा केँ लिए अपनेआला अधिकारियों सें पुलिस प्रोटेक्शन भि लेँ सकती हें। मुझे यकीन हैं कि अजय चाचा उस सूरत मे उनका औऱ नैना फूफी कां कुछ नहि बिगाड़ सकेंगे। "
"यसपवन इज राइट। " आदित्य नें कहा___"इस लिए तुम्हें रितू दिदी औऱ नैना फूफी कि फिक्र नहि करनी चाहिए। "
"ठीक हैं भइया। " मैने गहरी साॅस ली___"तोँ फाइनल होँ गय़ा कि हम् सभीकल यहाॅ सें मुम्बई केँ लिए निकल लेंगे। "
मेरीइस बात सें पवन औऱ आदित्य मुस्कुरा कररहगए। मैंने इधरउधर नज़रें घुमाई तोँ मेरी नज़र फार्महाउस केँ गेट पऱ खड़े दोनो बंदूखधारियों पर्र पड़ी। वोँ दोनोहॅस हॅस केँ कुछ बातें कररहे थें। एक् ब्यक्ति दूसरे वाले कि पीठ भि ठोंकरहा थां। मुझेसमझ नं आया कि यह दोनोऐसी कौन सि बात पर्र हॅसरहे हें औऱ दूसरा उसकीपीठ ठोंकरहा हैं।
ख़ैर, कुछ देर तक हम् वहीं बेंच पर्र बैठेरहे। उसकेबाद हम् तीनोउठे औऱ वापस अंदर कि तरफ बढ़ने लगे। अभि मे दोचार क़दम हि आगे बढ़ा थां कि उनदो बंदूखधारियों मे सें एक् उससेकुछ बोला औऱ फिन एक् बार हम् तीनों कि तरफ सरसरी नज़र सें देखा। उसकेबाद वोँ मुस्कुराते हुए हि फार्महाउस केँ बाएॅ साइडबने एक् अलग दरवाजे कि तरफबढ़ गय़ा। मेरी नज़र बराबर उसी पऱ थि, वोँ व्यक्ति उस दरवाजे केँ पास पहुॅच कर एक् बार पहले वाले व्यक्ति कि तरफ मुस्कुरा कर देखा उसकेबाद दरवाजे केँ अंदर दाखिल होँ गय़ा। मेरेमन मे उसकीइन सभी क्रियाओं सें संदेह पैदा होँ गय़ा।
मुख्य दरवाज़ा केँ पास पहुॅचते हि मैनेपवन औऱ आदित्य कों अंदर जाने कां कह दिया औऱ स्वयं बाहर् हि थोड़ी देर बैठने कां बोलकर वहीं खड़ारह गय़ा। मेरे कहने पर्र पवन औऱ आदित्य दोनो नें मुझे अजीबभाव सें देखा तोँ मैने अपनी पलकें झपकाकर उन्हें तसल्ली रखने कां इशारा किया। मेरेइस इशारे सें वोँ दोनो अंदर कि तरफबढ़ गए। उनके जाने केँ कुछदेर बाद हि मैंने पहले वाले कि तरफ देखा तौ वोँ मुझेगेट केँ पासबनी चौकी कि तरफ मुड़कर हाॅथों मे खैनी मलता नज़रआया। मे बड़ी तेज़ी सें उस दरवाजे कि तरफबढ़ गय़ा जिसतरफ वोँ दूसरा व्यक्ति गय़ा थां।
दरवाजे केँ पास पहुॅच कर मैने आहिस्ता सें दरवाजे कों अंदर कि तरफ धकेला तौ वोँ हल्की सि आवाज़ केँ संगखुल गय़ा। दरवाजे केँ खुलते हि मे उसके अंदर दाखिल होँ गय़ा। अंदरआते हि मैनेइधर उधर देखा तोँ मुझे दाईंतरफ एक् गैलरी दिखी तौ मे उस गैलरी मे आगे कि तरफबढ़ चला। कुछ हि दूरी पऱ मुझे एक् रूम नज़रआया जिसका दरवाजा हल्का सां खुलाहुआ थां। मे उस खुलेहुए दरवाजे केँ पास पहुॅच कर उसके खुलेहुए भाग सें अंदर कि तरफ कां मुआयना किया औऱ फिन दरवाजे कों खोलकर अंदर कि तरफ दाखिल होँ गय़ा।
इस कमरे मे मध्यम सि रोशनी थि। बाईंतरफ एक् ऐसा दरवाजा नज़रआया जैसा कि वोँ किसीऐसे वोल्ट कां हौ जिसके अंदर सरकार कां बहोत सारा गोल्ड रखा गय़ा होँ। यहदेख कर मेरे चेहरे पऱ नासमझने वालेभाव उभरे। उत्सुकतावश मे उस दरवाजे कि तरफबढ़ गय़ा। दरवाजे केँ पास पहुॅच कर मैने ध्यान सें उस दरवाजे कों देखा तौ पताचला कि यह दरवाजा किसी मोटे लोहे सें बना बहोत हि मजबूत दरवाजा हैं। लेकिन मैने देखा कि एक् हि तरफ खुलने वालेउस दरवाजे पर्र भि हल्की सि झिरी थि। इसका मतलब वोँ व्यक्ति जौ अंदरआया थां वोँ इसके अंदर हि गय़ा हैं।
मेरादिल नें अनायास हि किसी अंजानी आशंकावश ज़रा तेज़ी सें धड़कना शुरुआत कर दिया थां। मैनेउस झिरी पर्र अपनेकान सटा दिये। मे अंदर कि आवाज़ सुनने कि कोशिश कररहा थां मगर मे उस वक़्त चौंका जब अंदर सें किसी केँ ज़ोर सें चीखने कि आवाज़ आई। अंदर कि तरफ किसी चीख़ कि आवाज़ सें मेरा दिमाग़ घूम गय़ा। मैंने बिनाकुछ सोचे समझे दरवाजे कों हाथ बढ़ाकर खोल दिया औऱ अंदर कि तरफ बढ़ा हि थां कि अचानक हि मे एकदम सें रुक गय़ा। कारण दरवाजे केँ अंदरतीन फुट कि दूरी पर्र हि सीढ़ियाॅ बनी हुइ थि जोँ कि नीचे कि तरफजा रही थि। इसका मतलबयह कोई तहखाना थां।
इस फार्महाउस पऱ किसी तहखाने केँ मौजूद होने कां देखकर हि मे सोच मे पड़ गय़ा। ख़ैर, मैने स्वयं कों सम्हाला औऱ नीचे कि तरफजा रही सीढ़ियों पर्र उतरता चला गय़ा। नीचे तहखाने मे एक् अलग हि नज़ारा दिखा मुझे। जिसेदेख कर मे भौचक्का सां रह गय़ा थां।
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उस वक़्त दोपहर केँ एक् बजरहे थें जब रितू अपनी पुलिस जिप्सी मे बैठी हवेली पहुॅची थि। यहाॅ पर्र वोँ आनां तौ नहि चाहती थि लेकिन वोँ यह नहि चाहती थि कि उसके न् आने सें उसके माॅमडैड उसके बारे मे कोईअलग धारणा बना बैठें। वोँ इसबात कों बखूबी समझती थि कि बहोत जल्दऐसा कुछ होने वाला हैं जिससे हवेली कां हर ब्यक्ति दहल जाएगा। वोँ आने वालेउस टाइम केँ लिए स्वयं कों पूरीतरह सजधजकर कर चुकी थि।
जिप्सी सें उतरकर रितू हाॅथ मे पुलिसिया रुललिए मुख्य दरवाज़ा कि तरफबढ़ चली। दरवाजे केँ पास पहुॅच कर उसनेबंद दरवाजे कों उसकी कुंडी सें पकड़कर बजाया। कुछ हि देर मे दरवाजा खुला तोँ उसे अपने सामने शिवा खड़ा नज़रआया। शिवा पऱ नज़र पड़ते हि उसके चेहरे पर्र अप्रिय भाव उभरेमगर जल्दी हि उसनेउन भावों कों दबाकर दरवाजे केँ अंदर कि तरफबढ़ गई।
कुछ हि पलों मे वोँ ड्राइंगरूम मे पहुॅच गई। ड्राइंगरूम मे इससमय अपनेडैड अजय सिंह कों बैठेदेख वोँ मन हि मन चौंकी। बगल केँ सोफे पर्र प्रतिमा भि बैठी थि। रितू नें स्वयं कों एकदम सें नार्मल दर्शाते हुए एक् अलग सोफे पऱ बैठकर अजय सिंह कि तरफ देखा, फिन बोलि__"केसे हें डैड?आज आप् फैक्ट्री नहि गए?"
"हाॅ वोँ आज ज़रा थोडा लेट हि जानां थां नं। " अजय सिंह नें कहा___"इस लिए सुभह नहि गय़ा। ख़ैर, छोड़ो यह बताओ तुम्हें भि हमारी कुछ ख़ैर ख़बर रहती हैं कि नहि?"
"आप् ऐसा क्यूं कहरहे हें डैड?" रितू नें हैरानी ज़ाहिर करतेहुए कहा___"भला आपकी ख़ैर ख़बर क्यूं नहि होगी मुझे?"
"अब यह तौ तुम् हि जानो बेटा। " अजय सिंह नें अजीबभाव सें कहा___"क्योंकि पिछले कुछ वक्त सें हर चीज़ बदली हुई नज़र आँ रही हैं मुझे। पता नहि पऱ जाने क्यूं ऐसा लगता हैं मुझे कि मेरे जोँ अपने हें वही मुझसे दूरजा रहे हें। "
"क्याँ मतलबडैड??" रितू नें मन मे एकाएक हि हैरत केँ भाव उभरे थें___"यह आज आप् कैसी बातेकर रहे हें? कहीं आप् उसदिन कि बात पऱ तौ ऐसा नहि कहरहे जब मैने शिवा कों दो बातें सुना दि थि?"
"वोँ सभी तौ नार्मल बात हैं बेटा। " अजय सिंह नें बेचैनी सें पहलू बदला___"तुमने अपने भइया सें जोँ कुछकहा वोँ बड़ी बेहन होने केँ नाते तुम्हारा हक़ थां। "
"तोँ फिन औऱ क्याँ बात हैं डैड?" रितू नें कहा___"मुझे बताइये कि आपकीऐसा क्यूं लगरहा हैं कि आपके अपने आपसेदूर जारहे हें? अगर आपका इशारा मेरीतरफ हैं तोँ यह मेरेलिए लज्जा कि हि बात होगी कि मेरीवजह सें आपकोऐसा लगा औऱ आपकेमन कों ठेस पहुॅची हैं। प्लीज़ डैड बताइये न् कि मुझसे ऐसा क्याँ हौ गय़ा हैं जिससे आपको मेरे बारे मे ऐसालग रहा हैं?"
"शायद तुम्हें इसबात कां एहसास नहि हैं बेटा कि मे तुम् सबसे कितना प्रेम औऱ दुलार करताहूॅ। " अजय सिंह नें सहसा भारी आवाज़ मे कहा___"बचपन सें लेकरअब तक हर वोँ चीज़ तुम् सबके क़दमों मे लाकररखी जिन चीज़ों कि तुम् लोगों नें मुझसे फरमाईश कि थि। इसके बावजूद मेरे प्रेम मे क्याँ कमीरह गई कि आज मेरी बेटी अपने हि माॅ बाप औऱ भइया कों बेगाना समझने लगी हैं?"
अजय सिंह कि इसबात सें रितू तोँ चौंकी हि मगरअलग अलग सोफों पर्र बैठे दोनोमाॅ बेटा भि चौंक पड़े थें। दोनोकल सें पूॅछरहे थें कि क्याँ बताया थां मोबाइल पऱ उस व्यक्ति नें मगरअजय सिंह नें उन दोनो केँ प्रश्न पऱ अब तक अपने होंठ सिलेहुए थें। कदाचित वोँ यहसभी रितू केँ आने केँ बाद हि उससे कहना चाहता थां।
"यह आप् क्याँ कहरहे हें डैड?" रितू नें चकितभाव सें कहा___"भला मे ऐसा क्यूं समझने लगूॅगी? मे तौ इस बारे मे सोच भि नहि सकती समझने कि तोँ बात हि दूर हैं। "
"मुझे भि ऐसा हि लगता थां बेटी। " अजय सिंह नें दुखीभाव सें कहा___"मे भि यही सोचा करता थां कि मेरे बच्चे ऐसाकभी सोच भि नहि सकते। मगर.मगर मेरी सारीसोच औऱ सारी उम्मीदों कों तोड़ दिया हैं तुमने। "
"नहि डैडऐसा मत कहिए प्लीज़। " रितू कि ऑखेंभर आईं____"अगर आपको मेरा पुलिस कि जॉब करना अच्छा नहि लगता हैं तौ मे इसजॉब कों छोंड़ दूॅगी डैड। आपकी खुशी मे हि मेरी खुशी हैं। "
"बात तुम्हारी जॉब कि नहि हैं बैटा। "अजय सिंह नें कहा___"मुझे तुम्हारी पुलिस कि जॉब सें कोई तकलीफ़ नहि हैं। यहाॅ पऱ बात होँ रही हैं भरोसे कि, विश्वास कि। मुझे बहोत भरोसा थां कि मेरे बच्चे कभी भि मेरे खिलाफ़ नहि जा सकते। मगर मेरीयह भरोसा उसीतरह टूटकर बिखर गय़ा जैसेकीई आईनाटूट कर बिखर जाता हैं। "
"आख़िर आप् कहना क्याँ चाहते हें डैड?" रितू नें गंभीरता सें कहा___"मैने ऐसा क्याँ कर दिया हैं जिससे आपका भरोसा टूट गय़ा हैं? मुझे बताइये डैड, अगर मुझसे कहींकोई ग़लती हुईँ हैं तौ मे उसे सुधार लूॅगी। "
"यहबात तौ तुम्हें भि पताचल हि गई होगी। "अजय सिंह नें रितू केँ चेहरे कि तरफ ज़रा गहरी नज़र सें देखते हुए कहा___"कि हमारा सबसे बड़ा दुश्मन विराज यहाॅ हल्दीपुर आयाहुआ थां?"
"वि विराज??" रितू नें चौंकने कि लाजवाब ऐक्टिंग कि, बोलीं___"विराज यहाॅआया? यह आप् क्याँ कहरहे हैं डैड?भला वोँ कमीना यहाॅकिस लिए आएगा?"
"ओह, हैरत कि बात हैं। " अजय सिंह नें फीकी सि मुस्कान केँ संग कहा___"मतलब कि इस बारे मे तुम्हें कुछपता हि नहि हैं। जबकि मेरे व्यक्ति कां स्पष्ट रूप सें कहना हैं कि कलसाम जिस एम्बूलेन्स मे बैठकर विराज, उसका मित्र, पवन औऱ पवन कि माॅ बेहन अपनेघऱ सें निकले थें उस एम्बूलेन्स केँ आगेआगे एक् जीप भि चलरही थि। "
"यह आप् क्याँ कहरहे हें डैड?" रितू अंदर हि अंदर बुरीतरह घबरा गई थि, लेकिन प्रत्यक्ष मे स्वयं कों सम्हालते हुए कहा___"मेरी तोँ कुछसमझ मे नहि आँ रहा। "
"मे जिसजीप कि बातकर रहाहूॅ बेटा। " अजय सिंह नें सहसा शख्तभाव सें कहा___"वोँ जीपअसल मे तुम्हारी पुलिस जिप्सी हि थि। इस गाॅव मे हमारे अलावा किसी औऱ केँ पासऐसी कोईजीप हैं हि नहि। हमारे आदमियों कां अपनीजीप मे बैठकर विराज कि उस एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलने कां कोई प्रश्न हि पैदा नहि होता। फिन वोँ जीप किसकी हौ सकती थि? हल्दीपुर मे ऐसीकोई जीप पुलिस थाने मे केवल तुम्हें मिली हुईँ हैं। अब तुम् सचसच बताओ कि तुम्हारा एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलने कां क्याँ मतलब थां?"
"यह तोँ हद हौ गई डैड। " रितू कि ऑखों सें ऑसूछलक पड़े____"आप् सरासर अपनी बेटी पर्र इल्ज़ाम लगारहे हें कि उस एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलरही जीप मे मे थि। जबकि आप् अच्छी तरह जानते हें कि ऐसाकुछ करने केँ बारे मे मे सोच भि नहि सकतीहूॅ। सबसे पहलीबात तोँ मुझेयही पता नहि थां कि वोँ कमीना विराज यहाॅआया हुआ हैं जिसने कुछ वक्त पहले मेरे भइया शिवा कों बुरीतरह मारा थां। अगरपता होता तौ मे उसेखोज कर सबसे पहले अपने भइया कि मार कां बदला लेती उससे। उसकेबाद उसे आपके हवाले कर देती। औऱ आप् कहरहे हें कि मे वोँ जीप मेरी थि जोँ उस एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलरही थि। इसका मतलब तौ यहहुआ डैड कि आप् यहसमझ रहे हें कि मे उस विराज कि पुलिस प्रोटेक्शन देरही थि। ओह माँ गाड.ऐसा केसेसोच सकते हें आप्? आप् मुझे अपनेउस व्यक्ति सें मिलवाइये डैड जिसने आपकोयह ख़बर दि हैं। मे उससे पूछूॅगी कि उसनेयह केसेसमझ लियाउस जीप मे थि?"
रितू कि इसबात सें अजय सिंह कां दिमाग़ चकरा गय़ा। उसेसमझ नं आया कि वोँ किसकी बात पर्र यकीनकरे? अपनेउस व्यक्ति कि बात पर्र याँ अपनी बेटी कि बातों पऱ? यह तोँ सचबात थि कि उसके व्यक्ति कों भि पक्के तौर पर्र यहपता नहि चल पाया थां कि उसजीप मे कौन बैठा थां। उसने भि यहीसोच कर अनुमान मे हि अजय सें बताया थां कि उसजीप मे शायद उसकी बेटी रितू थि। क्योंकि यहाॅ पर्र अजय सिंह केँ अलावा अगर किही औऱ केँ पासकोई जीप थि तोँ वोँ मात्र पुलिस इंस्पेक्टर रितू केँ पास। अजय सिंह केँ व्यक्ति नें यहीसोच करउसे बताया थां। पक्के तौर पऱ उसे भि पता नहि थां। दूसरी बात वोँ स्वयं जानता थां कि रितू विराज कों प्रोटेक्ट करने जैसाकाम कर हि नहि सकती थि क्योंकि वोँ विराज सें कभीकोई मतलब हि नहि रखती थि। विराज कां ज़िक्र आते हि उसके अंदर क्रोध भर जाता थां।
रितू नें यहसभी बातें जिस आत्मविश्वास औऱ भावपूर्ण लहजे मे कही थि उससेअजय सिंह कों यहीलगा कि रितूसच कहरही हैं। मगर उसकेमन मे अपने व्यक्ति कि भि बातें चलरही थि। इसलिए वोँ समझ नहि पारहा थां कि कौनसच बोलरहा हैं?
"इसबात पर्र तोँ मे भि यकीन नहि कर सकतीअजय कि रितू विराज कों प्रटेक्ट करने वालाकाम करेगी। " सहसाइस बीच प्रतिमा नें भि कहा___"मुझे समझ नहि आँ रहा कि तुम् अपने व्यक्ति कि उसबात पर्र यकीन केसेकर सकते हौ? क्याँ उसने अपनी ऑखों सें देखा थां कि उसजीप पर्र रितू हि बैठी थि याँ फिनयह बात किसी नें पक्के तौर पर्र पूछने पर्र किसी नें उसे बताई थि?"
"माॅम, ऐसा संभव हि नहि हैं। " रितू नें अपनीमाॅ कि तरफदेख कर कहा___"मे सिरपटक करमर जानां पसन्द करूॅगी मगरउस कमीने कों प्रोटेक्ट करने केँ बारे मे सोचूॅगी भि नहि। पता नहि केसेउस व्यक्ति कि उन फिज़ूल बातों पर्र यकीनकर लियाडैड नें? क्याँ आपने अपनी बेटी कों इतना हि जानां समझा हैं डैड?"
"पर्र बेटा ग़लत वोँ भि तोँ नहि हैं न्। " अजय सिंह नें बात कों सम्हालते हुए कहा___"उसने यहसभी मात्र इसीलिए कहा क्योंकि इस गाॅव मे हमारे अलावा केवल तुम्हारे हि पास पुलिस कि जीप हैं। इसलिए उसने सोचा कि शायद तुम् हि थि उस एम्बूलेन्स केँ आगे। "
"कमाल हैं डैड। " रितू नें मन हि मन राहत कि साॅस लेतेहुए कहा___"आप् पढ़े लिखे औऱ वकालत कर चुके होने केँ बावजूद भि इतना नहि सोचसके कि अगरइस गाॅव मे किसी केँ पासजीप नहि तौ क्याँ उसे कहीं भि जीप नहि मिलती? ऐसा भि तौ हौ सकता हैं कि उस विराज नें शहर सें हि किसीजीप कों किराये पऱ हायर कियारहा होगा। "
"चलो मान लिया बेटा कि वोँ कमबख्त उसजीप कों शहर सें किराये पर्र लेँ आया होगा। "अजय सिंह नें कहने केँ संग हि शिगार सुलगा लिया थां, बोला___"मगर उसे लाने कि भला क्याँ ज़रूरत थि? जबकि उसेइस बात कां बखूबी अंदाज़ा थां कि जीप मे वोँ कहीं हमारे आदमियों द्वारा पकड़ा जा सकता हैं। एम्बूलेन्स तौ उसकेलिए सबसे बढ़िया औऱ सुरक्षित गाड़ी थां, जिसमें वोँ सबको बैठाकर बड़े आहिस्ता हल्दीपुर सें निकल जाता। तौ फिनअलग सें जीप हायर करने कां क्याँ मतलब हौ सकता हैं भला?"
"आपकीयह बात यकीनन काबिले ग़ौर हैं डैड। " रितू नें सोचने वालेभाव सें कहा___"अलग सें किसीजीप कों हायर करना यकीनन बेवकूफी वालीबात हैं। मगर मौजूदा हालात मे क्याँ वोँ ऐसी बेवकूफी कर सकता हैं?"
"यही तौ सोचने वालीबात हैं बेटा। " अजय सिंह नें शिगार कां कश लेने केँ बाद उसकाधुऑ ऊपर छोंड़ते हुए कहा___"उससे ऐसी बेवकूफी कि उम्मीद हर्गिज़ भि नहि कि जा सकती। मगर यह तौ सच हैं न् कि उसकेआगे आगेजीप चलरही थि। "
"हौ सकता हैं कि ऐसा उसने किसी विशेष प्लान केँ तहत किया होँ डैड। " रितू नें अपने चेहरे पऱ गहनसोच केँ भाव दर्शाते हुए कहा___"यह तोँ आप् भि जानते हें डैड कि वोँ आपसेखुल कर टकराने कि हिम्मत नहि कर सकता। इस लिए उसने सोचा होगा कि वोँ हमारे बीच किसी प्रकार कि दरार याँ अविश्वास पैदाकर देगा। उससे होगायह कि हम् आपस मे हि एक् दूसरे सें उलझने लगेंगे। जबकि वोँ अपनाकाम करके निकल जाएगा। "
"बातकुछ समझ मे नहि आई बेटी। " प्रतिमा केँ माथे पर्र सिलवॅटें उभर आई___"हमारे बीच वोँ भला केसे दरार याँ अविश्वास पैदाकर सकता हैं?"
"ठीक वैसे हि माॅम। " रितू नें कहा___"जैसे अभि कुछदेर पहलेडैड केँ मन मे अपनी बेटी केँ प्रति हौ गय़ा थां। ज़रा सोचिए माॅम___यह तौ उसे भि पता हि थां कि अलग सें जीप हायर करने कां कोई मतलब नहि हैं जबकि एम्बूलेन्स मे वोँ सबको लेकर बड़ी आसानी सें यहाॅ सें निकल हि जाता। मगर इसकेबाद भि उसनेऐसा किया। मतलब कि उसनेअलग सें एक् जीपइस लिए हायर कि ताकिजब आपको उसके यहाॅ सें जाने कां पताचले तौ आपके व्यक्ति उसकापता करके आपको उसके बारे मे विस्तार सें बताएॅ। यानी वोँ आपको बताएॅ कि एम्बूलेन्स मे तोँ वोँ अपनेसंग सबकोलिए बैठा हि थां लेकिन उसकेआगे आगेअलग सें एक् जीप भि चलरही थि। जीप कां सुनकर आप् याँ आपके व्यक्ति यहीसोच बैठेंगे कि जीप तौ आपके अलावा मात्र मेरे हि पास हैं, इसलिए उसजीप मे मे हि थि जोँ उस एम्बूलेन्स केँ आगेआगे चलरही थि। आप् यह जानते हुए भि कि आपकी बेटी ऐसा करने कां सोच भि नहि सकती हैं, ऐसासोच बैठेंगे औऱ बाद मे आप् मुझ पऱ शक़ करतेहुए मुझसे इसके बारे मे ऐसासभी कुछ कहने लगेंगे याँ पूछने लगेंगे। यही उसका प्लान होँ सकता थां डैड। अब आप् हि बताइये क्याँ ऐसा नहि हौ सकता?"
रितू कि बातें सुनकर अजय तौ अजय बल्कि स्वयं कों दिमाग़ कि सूरमा समझने वाली प्रतिमा भि आश्चर्य चकितरह गई थि। दोनो हि मियाॅ पत्नि अपनी इंस्पेक्टर बेटी कि तरफऐसी नज़रों सें देखने लगे थें जैसे रितू केँ सिर पऱ अचानक हि आगरा कां ताजमहल आकर कत्थक करनेलगा होँ। बहुतदेर तक दोनो केँ मुख सें कोईबोल नं फूटा थां। फिन जैसेउन दोनो कों होशआया। वस्तुस्थित कां एहसास होते हि दोनो केँ चेहरों पर्र अपनी बेटी कि बुद्धि पर्र प्रशंसा केँ भावउभर आए।
"अगर वोँ वैसा हि कर सकता हैं जैसा कि तुमने अभि बताया मुझे। "अजय सिंह नें गहरी साॅस ली___"तोँ फिन यकीनन उसके दिमाग़ कि दाद देनी पड़ेगी। हलाॅकि मुझे पहलीबार मे अभि भि यकीन नहि हौ रहा कि वोँ ऐसासोच सकता हैं मगर वर्तमान मे मैने उसके बारे मे जितना विचार किया हैं उससेयही पताचला हैं कि यकीनन वोँ ऐसासोच भि सकता हैं औऱ कर भि सकता हैं। "
"मगरडैड वोँ कमीना यहाॅआया किसलिए हैं?" रितू नें जानबूझ करऐसा प्रश्न किया___"औऱ आपको केसेपता चला कि वोँ यहाॅआया हैं?"
"हमारी हज़ारों ऑखें हें बेटी। " अजय सिंह नें बड़े गर्व सें कहा___"हमें सबकी ख़बर होती हैं। ख़ैर छोंड़ो यहसभी। जाओ तुम् भि आरामकर लो। पता नहि कहाॅ कहाॅ ड्यूटी केँ चक्कर मे घूमती रहती हौ तुम्? बेटा कुछ अपना भि ख़याल रखाकरो। हमेहर वक़्त तुम्हारी फिक्र रहती हैं। "
"जीडैड। " रितू नें कहने केँ संग हि सोफे सें उठकर खड़ी हौ गई___"पर्र आप् तोँ जानते हें नं कि पुलिस कि जॉब कां कोईसमय टेबल नहि होता। इस लिए कहीं नं कहीं तोँ भटकना हि पड़ता हैं। "
यह कहने केँ संग हि रितू लम्बे लम्बे क़दम बढ़ाती हुई अपने कमरे कि तरफबढ़ गई। जबकि वोँ तीनोउसे जातेहुए देखते रहगए। उसके जाने केँ बादअजय सिंह नें एक् नया शिगार सुलगा लिया औऱ उसकेदो तीन गहरे गहरेकश लेने केँ बाद उसकाधुऑ ऊपर कि तरफ उछाल दिया। चेहरे पऱ सोचो केँ भाव गर्दिश करते नज़रआने लगे थें उसके।
"तुम्हें क्याँ लगता हैं अजय?" सहसा प्रतिमा नें उसके चेहरे केँ भावों कों रीड करतेहुए कहा___"रितू कि बातों मे कितनी सच्चाई हैं?"
"मतलब तुम्हें भि इसबात कां शक हैं कि हमारी बेटी हमसे झूॅठबोल रही हैं?" अजय सिंह नें भावहीन स्वर मे कहा___"यह भि कि उसने बड़ी सफाई सें अपनीबात साबित भि कर दि। "
"यहबात तोँ मे तुमसे पूछरही हूॅ डियर। " प्रतिमा नें पहलू बदला___"तुमने हि तोँ उससेकहा थां कि जीप मे वही बैठी थि ऐसा तुम्हारे व्यक्ति नें मोबाइल पर्र तुमसे कहा थां। अब जबकि रितू नें अपनी सफाईदे दि हैं तोँ तुम्हें क्याँ लगता हैं अब?"
"मुझे यकीन तौ नहि होँ रहा प्रतिमा कि रितू नें विराज कों प्रोटेक्ट किया होगा। "अजय सिंह नें कहा___"मगर उसके बदलेहुए बिहैवियर कि वजह सें ऐसा सोचने पऱ मजबूर भि होँ गय़ा हूॅ। उसकी बातों मे कितनी सच्चाई हैं इसकापता लगाना भि ज़रूरी हैं। इसलिए मैनेसोच लिया हैं कि उस पऱ नज़र रखने केँ लिए अपने किसी व्यक्ति कों उसके पीछेलगा दूॅगा। इससेकोई नं कोई सच्चाई तोँ पताचल हि जाएगी हमे। "
"हाॅ यहसही सोचा हैं तुमने। " प्रतिमा नें कहा___"इससे दूध कां दूध औऱ पानी कां पानी हौ जाएगा। ख़ैर, छोंड़ो यहसभी। मेरा तौ इस सबसे बहोत सिर दर्दकर रहा हैं अब। इसलिए मे जारही हूॅ अपने कमरे मे। "
"ठीक हैं डियर। "अजय सिंह नें सोफे सें उठतेहुए कहा___"मे भि फैक्ट्री केँ लिए निकलरहा हूॅ। "
यह कहकरअजय सिंह बाहर् कि तरफबढ़ गय़ा। उसके जाते हि प्रतिमा नें शिवा कि तरफ गहरी नज़रों सें देखा औऱ मुस्कुरा दि। शिवा उसकी मुस्कुराहट कां मतलबसमझ कर स्वयं भि मुस्कुरा उठा। प्रतिमा सोफे सें उठकर अपने कमरे कि तरफबढ़ गई। उसके जाने केँ कुछदेर बाद शिवा भि उसी कमरे कि तरफबढ़ गय़ा थां।
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एपसोड हाज़िर हैं दोस्तो,,,,,,,
आशा करताहूॅ कि आज कां यह एपसोड आप् सबको मनपसंद आएगा औऱ अगर नं आए तौ आप् बेझिझक अपनीराय दे सकते हें,,,,,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
bhut hi khubsurat update bhay। Dono behno kaa pyaar अच्छा laga। too akhi viraj ko tekhane tak pahucha hi दिया tumne। Ab use sachayi bi ptaa lagne दो। Ritu पर ajay ko sak hu gya he। Ab woh अपना एक banda bi laga dega usake peeche। Dekhte he की aage क्या hoga.
Waiting 4 next update
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