Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
अपने कमरे केँ भीतरआकर अभिमन्यु नें दरवाजा लॉक किया औऱ उसी दरवाजे सें अपनीपीठ रगड़ते हुए नीचे फर्श पऱ बैठ जाता हैं। तत्पश्चात उसने अपने दाएंहाथ मे पकड़ी अपनी मां कि काली कच्छी जोर सें फर्श पर्र दे मारी औऱ अपने दोनों हाथ सें अपना चेहरा ढ़ांक कुछ वक्त पीछेघटे पूरे घटनाक्रम पऱ सोचने-विचारने लगता हैं।
"वो बिलकुल सही कहती हैं, मे एक् निहायती बेशर्म औऱ घटिया इंसान हूं" वो स्वयं कों कोसते हुए बुदबुदाया।
वैशाली कां स्वभाव हमेशा उसके गर्व कां कारणरहा थां, उसकेसंग हि उसकी मां नें उसकी बड़ी बेहन कि भि एक्--सि परवरिश कि थि, कभीकोई अंतर नहीं। हाँ ये ज़रूर थां कि बेटा घऱ कां चिराग माना जाता हैं औऱ इसवजह उसे भि अपने माँ-बाप कां अतिरिक्त स्नेह प्राप्त थां पर्र इसकाये अर्थकतई नहीं कि उन्होंने अपनी बिटिया कों कभी अनदेखा किया हौ, बल्कि अनुभा कि भव्य विवाह कि गूंज सालभर बाद भि घऱ कि चारदीवारी मे सुनाई देती थि।
पिता मणिक चंद्र जैन! जिसे कभी-कभार अभिमन्यु औऱ अनुभा माणिकचंट गुटखा केँ नाम सें भि संबोधित कर देते थें मगरतब, जब दोनों भइया-बेहन एकांत मे वार्तालाप कररहे हों वर्ना तौ पिता केँ गुस्स केवल सें हि दोनों कों अक्सर दस्तलग जाया करते थें। वैशाली कों जब अपने पति केँ बिगड़े हुएनाम कां पताचला तौ अपने बच्चों पऱ क्रोध करने सें पहले वो भि दिल खोलकर हँसी थि औऱ जब हँसते-हँसते उसकेपेट मे बलपड़ गय़ा तब वो चाहकर भि उन्हें डांट नहींपाई क्योंकि अधेड़ उम्र कि वो हँसमुख मम्मी स्वयं अपने बच्चों कि शैतानी मे शामिल हौ गई थि।
सिलसिला आगे बढ़ा औऱ देखते हि देखते कब अनुभा अपने ससुराल रुखसत होँ गई, घऱ मे बाकीबचे तीनो सदस्यों कों पता हि नहींचल पाया। मणिक सरकारी नौकर थां, बीटीसी कां एक् पीजीटी प्रॉफेसर जिसे अक्सर ट्रेनिंग प्रोग्राम्स केँ चक्करों मे अन्य सरकारी विभागों मे आनां-जानां होता थां। पहले-पहल इन विजिटों सें उसेकोई लगाव नहीं थां, अॉफिस सें सीधेघऱ, घऱ पर्र उसकी खूबसूरत--सि पत्नि औऱ दो प्यारे बच्चे, मानोयही उसका पारिवारिक औऱ सामाजिक संसार थां। अनुभा कि महंगी विवाह कां खर्च औऱ घऱ कां लोन दोनों सें जूझते मणिक कों नये पाठ्यक्रम मे एकाएक येखबर लगी कि बीटीसी केँ ट्रेनिंग प्रोग्राम कि हर छोटी-बड़ी विजिट पऱ अबअलग सें खर्च मिलेगा। टीएडीए, खानां-रहना खर्चा पहले सें ज्यादा थां औऱ फर्जी बिल भि जौ कि करीबहर सरकारी विभाग मे मान्य होँ जाते हैं, मणिक नें तब सें एक् भि विजिट अपनेहाथ सें नहीं जाने दि औऱ पिछले सात-आठ महीनों सें वो लगातर केवल कमाई करने मे व्यस्त थां।
बेटी कि विदाई औऱ पति कि कमाई सें घऱ सूना सां रहनेलगा, सही मायने मे अबघऱ मे केवल मम्मी औऱ बेटे हि बचे थें। वैशाली कों पति केँ प्रेम कि असलकमी भि तभी खलनी शुरुआत हुई जब मणिक केँ बगैर उसकी रातें बैड पर्र महज करवट बदलते रहने मे बीतने लगीं। हर विजिट पऱ जाने सें पहले पत्नि कां मुंह लटकते देख चुदाई केँ शौकीन मणिक कां भि कुछयही हाल थां मगर शर्मवश कि सिर्फ चुदाई केँ चलते वो हाथआए पैसे कमाना छोड़दे, वैशाली नें उसके आने-जाने पर्र कभीकोई रोक नहीं लगाई औऱ मणिक भि पत्नि कि इस समझदारी कों समझ संतोष कर गय़ा। वाकई मणिक पऱ बहोत कर्जा हौ चुका थां, उसकाआधा जीपीएफ भि उसने अपनी सेवानिवृत्ति सें पहले हि निकाल लिया थां।
चार सें बचेतीन औऱ तीन सें बचेदो, जब मम्मी-बेटे घऱ पऱ अकेले रहगएतब वैशाली कां पूरा ध्यान अपने बेटे कि देखरेख पऱ केन्द्रित होँ गय़ा औऱ तभी सें उसे अभिमन्यु कि गलत हरकतों केँ विषय मे पता चलनेलगा, गलत हरकतें क्याँ वही जवान होतेहर मर्द कि नई-नवेली ख्वाहिशें औऱ उन ख्वाहिशों कि खानापूर्ती केँ जरिए कों खोजने कि हर संभव तलाश।
जल्द हि वैशाली कों बेटे केँ रोजाना क्रम सें मुट्ठ मारने कि भनकलगी, नहाने केँ बाद वो अक्सर लापरवाही सें अपने अंदरूनी कपड़े गीले हि बाथरूम केँ फर्श पऱ छोड़ जाया करता थां औऱ जिन्हें धोते वक़्त वो हमेशा हि उन्हें चिपचिप--सां होते पाती थि। उसकेखाट कि बेडशीट औऱ ओढ़ने कि चादर पऱ भि उसे पीले-पीले गाढ़े दागलगे नजरआते थें जिसकी सत्यता आसानी सें समझना उस विवाहित महिला केँ लिएकोई बड़ी समस्या नहीं थि। समस्या थि तौ मात्र अभिमन्यु केँ नियम सें मुट्ठ मारने कि गंदीआदत जौ कि बीतते वक़्त केँ संग स्वयं भि तीव्रता सें बढ़ती हि जारही थि।
एक् रोज वैशाली नें मल्टी कि छत पर्र उसे पड़ोस कि कामवाली केँ नंगे मम्मे दबाते हुए रंगे हाथों पकड़ लिया पऱ बेटे कों समझाने केँ अलावा वो ठीक सें डांट तक नहींसकी। उसकी जवान उम्र कि प्यास औऱ दोनो मेल-फीमेल कि रजामंदी नें उस क्रोधित मम्मी केँ क्रोधित मुंह कों एकाएक मानो सिल--सां दिया थां औऱ परेशान सि वो वापस अपने फ्लैट मे लौटआई थि। कुछ दिनों बादउस कामवाली नें खुद वैशाली सें शिकायत कि कि अभिमन्यु उसेराह चलते छेड़ता हैं, जबतब उसके गुप्तांगों कों बुरीतरह सें मसलना शुरुआत कर देता हैं औऱ एक्-दो दिन हि पहले पैसों कां लालच देकर चुदाई करवाने कां प्रस्ताव भि उसने उसके समक्ष रखा, वो कामवाली यहीं नहीं रुकी बल्कि खुली धमकी देकर गई कि अगलीबार परेशान करने पर्र वो अभिमन्यु कि सीधे पुलिस कमप्लेन कर देगी। उस सारीरात वैशाली अपनेबैड पऱ लेटी केवल रोतीरही थि, बेटे सें इस अश्लील विषय मे बात करने मे उसे बेहद संकोच हौ रहा थां औऱ अंतत:ये बात भि आई-गई सि होँ गई।
अकेले रात नहींकाट सकने कि अपनी गंभीर बीमार कां इलाज वैशाली कों भि जल्द सें जल्द ढ़ूंढ़ना थां औऱ इस मर्ज कि दवाउसे मिली उसके बेटे कि पॉर्न देखने कि दूसरी नियमित गंदीआदत सें। पढ़ी-लिखी वैशाली जबतबघऱ केँ इकलौते कम्प्यूटर पऱ गेमआदि खेलकर अपना उबाऊ टाइम काटा करती थि औऱ संग हि इंटरनेट पर्र खानां बनाने कि नई रेसेपीज देख्ना भि उसे बहुत मनपसंद थां। एक् रोज दोपहर मे वो एकदम सें दौड़कर रसोई सें बाहर् आई औऱ बीतेदिन देखी करेले कि व्यंजनविधि कम्प्यूटर कि हिस्ट्री मे तलाशने लगी, जल्दबाजी मे वो येभूल गई थि कि बीतीदेर रात तक कम्प्यूटर कों अभिमन्यु नें यूज किया थां। रसोई मे बनते करेले जलकरखाक हौ गए औऱ वैशाली कों रेसेपी कि स्थान दर्जनों पॉर्न वेबसाइट्स कि लिंक देखने मिली, कौतुहल औऱ जिग्यासावश वो उन पॉर्न वेबसाईट्स कों देखने सें स्वयं कों रोक नहींपाई औऱ तभी सें उसे भि मुट्ठ मारते टाइम अपनेफोन पर्र हरतरह कां पॉर्न देखने कि आदत सि हौ गई। इसी केँ जरिए अभिमन्यु पऱ उसकी जासूसी शुरुआत हुई जोँ अबतक जारी थि, उसेपता चल चुका थां कि उसके बेटे कों 'एमआईएल एफ' औऱ 'बीबी डब्ल्यू' पॉर्न देखने मे 'टीन' पॉर्न सें कहीं अधिक रुचि हैं।
आगे एक् रोज वो हॉल मे बैठा खुलेआम मुट्ठ मारते हुए पकड़ा गय़ा थां मगर वैशाली नें अपनेआगे बढ़ते कदमों कों रोक बिनाकोई हलचलकिए जल्दी वापसी कि राह पकड़ली थि। इसके अलावा बीतेकुछ महीनों सें उसे संदेह थां कि अभिमन्यु उसके एकांत कार्यों कों छुप-छुपाकर देखने कां उद्दंड करनेलगा थां, बाथरूम मे नहाते टाइम उसनेबंद दरवाजे कि निचली सांस सें किसी शख्स केँ पैरों द्वारा अवरुद्ध होती रोशनी सें ये अनुमान लगाया थां औऱ उसकेसंग घऱ मे मात्र उसका बेटा हि रहता हैं तोँ ऐसे मे संदेह करने कि तोँ अबकोई गुंजाइश हि नहीं गई थि। यही नहीं अपने बेडरूम केँ भीतर भि उसनेउसे लगातार तांका-झांकी करतेहुए देखा थां, पहले गुस्सा फिन लज्जा औऱ अंत मे टूटकर वैशाली उसकी हरकतों कि जैसे आदी-सि होँ जाती हैं।
हाल-फिलहाल मे बीते पिछले बीस दिनों पहले वैशाली कि सबसे अभिन्न औरतयार मिसिज मेहता अचानक सें उसकेघऱ आँ धमकी औऱ उसने वैशाली कों अभिमन्यु कि एक् नई घ्रणित करतूत सें परिचित करवा दिया कि उसकेघऱ हालचाल पूछने कां एक्सक्यूज़ बनाकर वो बाथरूम सें उसकी कच्छी चुराकर लेँ गय़ा हैं। अपने बेटे केँ बचाव मे मिसिज मेहता सें उसकी बहुत तूतू-मैंमैं होँ गई थि मगरअंत तक उसने मिसिज मेहता कि शिकायत कों अपना विश्वास नहीं दिया थां बल्कि उल्टे वो अपनी सबसे अच्छी मित्र पऱ हि बेगैरत होने कां इल्जाम लगा देती हैं। फिरभी उसने तत्काल अपने बेटे कि पॉकेटमनी पऱ रोकलगा दि थि, उसका कॉलेज केँ अलावा कहीं औऱ घूमने-फिरने जानां भि तब सें बिलकुल बंद थां औऱ आज सुभहजब सफाई केँ दौरान उसे अभिमन्यु केँ स्टडी ड्रॉअर सें वाकई मिसिज मेहता कि कच्ची बरामद होँ गई अत्यंत जल्दी वो स्वयं कि हि परवरिश पऱ शर्मिंदा होँ जाती हैं।
मणिकउस वक़्त घऱ पऱ मौजूद थां, वैशाली नें निर्णय लिया कि आज वो अपने बेटे कि सब गंदी करतूतों कों अपने पति केँ संग सांझा करके हि रहेगी क्योंकि पानीअब सिर केँ पारजा चुका थां। कुछयही सोचते हुए वो तेजी सें अपने बेडरूम कि दिशा मे चल पड़ीमगर चाहकर भि बेडरूम केँ भीतरकदम नहींरख पाती औऱ इसकेदो मुख्य कारण थें :-
१) मणिक केँ घोर गुस्से सें अभिमन्यु कहीं कां नहीं रहता, क्याँ पताआज वो अपने लाडले कों एक् आखिरी बार देखती? याँ तोँ उसका पति उसके बेटे कों जान सें हि मार देता याँ फिन हमेशा-हमेशा केँ लिएउसे घऱ सें बेदखल कर देता।
२) अभिमन्यु कों बिगाड़ने मे सबसे बड़ाहाथ स्वयं वैशाली कां हि थां। यदि वक्त रहते वो अपने बेटे पऱ सख्ती करती, उसे उसके पिता कां झूठाभय दिखाती याँ खुद भि उसकी पिटाई कर सकती थि मगरइन तीनों मे सें वैशाली नें कुछ नहीं किया बल्कि बेटे कि देखादाखी स्वयं भि रोजाना नियम सें मुट्ठ मारने लगी औऱ पॉर्न तोँ जैसेअब उसकी रग-रग मे बस चुका थां। जैसे वो अबतक अपने बेटे कि जासूसी करतीआई हैं अब वक़्त बदल गय़ा थां, उल्टा अभिमन्यु अपनी मम्मी कि जासूसी करनेलगा थां औऱ एक् तरह सें उसकी जासूसी मे वैशाली कि सहमति भि शामिल थि वर्ना अबतक याँ तौ वो पूरीतरह सें नंगी होकर मुट्ठ मारना छोड़ चुकी होती याँ ठीकउसी पूर्ण नंगी हालत मे उसने बाथरूम केँ भीतर नहाना बंदकर दिया होता।
मणिक केँ घऱ सें चले जाने केँ बाद वैशाली नें रोजमर्रा केँ सबकाम निबटाए औऱ स्वयं केँ लिएदो परांठे बनाकर, कम्प्यूटर पऱ पॉर्न देखते हुए उन्हें खानेलगी। अभिमन्यु अपना दोपहर का खाना कॉलेज मे हि करता थां तौ घरपर उसकेलिए केवलरात कां खानां बनाया जाता थां। मिसिज मेहता कि पेंटी वाकई बेटे द्वारा चुराए जाने कों लेकर औऱ पति केँ इसबार पिछले टूर सें भि लंबेटूर पर्र चले जाने सें परेशान वैशाली बिनाहॉल कां दरवाजा चैककिए अपने बेडरूम मे आँ गई। ये सोचकर कि हॉल कां दरवाजा बंद हैं, बिना अपने बेडरूम कां दरवाजा लगाए उसने अपनी पेंटी कों उतरकर जल्दी अपनी गीली बुर सें खेलना शुरुआत कर दिया। अगर अभिमन्यु अचानक सें बीच मे नहींआता तौ कुछ हि पलोंबाद हमेशा केँ जैसे वैशाली कां पूरीतरह सें नंगी होकर मुट्ठ मारने कां इरादा थां औऱ जौ एकाएक बाधा उत्पन्न होँ जाने केँ कारण अधूरा रह गय़ा थां।
"शिटमैन! कितना बड़ागधा हूं मे जौ जानबूझकर मम्मी केँ प्राइवेट मोमेन्ट कों तबाह करने उनके बेडरूम मे चला गय़ा थां। शिट!शिट! शिट!" अपने कमरे केँ बंद दरवाजे सें टिककर नीचे फर्श पऱ बैठा अभिमन्यु स्वयं कों लताड़ते हुए बोला।
"क्याँ सोचरही होंगी वो मेरे बारे मे, वैसे भि मे पहले सें हि अपनी बहुत इज्जत उनकी आँखों मे खो चुका हूं औऱ आज तौ मैंने हद हि कर दि" उसने पुनः अपना चेहरा अपने दोनों हाथों सें ढांक लिया।
ये बिलकुल सत्य थां कि अभिमन्यु केँ मन-मस्तिष्क मे अपनी मां केँ प्रति कोईगलत भावना नहीं थि, बस जबतबउसे वैशाली कों देख अपनी सबसे पसंदीदा 'एमआईएल एफ' विक्की वेट्टे कि याद आँ जाती थि। हाँये जरूर सत्य थां कि उसकी मां कां अत्यंत कामुक नंगा शरीर उसकेदिल केँ भीतर तक घऱकर चुका थां मगर इसके बावजूद उसने वैशाली पर्र कभीकोई जबरदस्ती नहीं कि थि, बल्कि उसके मुट्ठ मारने याँ नहाने केँ अद्भुत दृश्य कों छुप-छुपाकर देखने केँ उपरान्त वो भि अपनी तृष्णा कों अपने मनमाने ढ़ंग सें शांतकर लिया करता थां।
"उनके तलवे कों अपने खड़े लन्ड पर्र रगड़ा, उनकी टांगें चौडा़ईं ताकि उन्हें औऱ शर्मिंदा कर सकूं, उन्हें अच्छा-बुरा कह जबकि वो मे मां हें औऱ तौ औऱ उनकी पेंटी तक चुराली मैंने" अपनी गलतियों कों सोचकर वो बेहद गंभीर व भावुक होँ चुका हैं।
"मेरे सामने नंगी होकररहो मां, छि! खुल्लम-खुल्ला मेरे सामने मुट्ठ भि मारो क्योंकि हम् बैस्ट फ्रेंड हें" स्वयं कि निकृष्ट इच्छाओं पऱ अबउसे गुस्सा भि आनेलगा थां।
"बिच, मेरी मम्मी बिच। अच्छा तौ फिन मे क्याँ हूं? एक् कमीना, बड़ा हरामखोर बेटा" उसकासिर दर्द सें फटनेलगा हैं।
"दूरी, हाँ दूरी। बस यही मेरीसजा हैं कि मे अब उनसे दूरीबना लूं ताकि उन्हें मेराये बेशर्म चेहरा दोबारा नाँ देख्ना पड़े" वो फर्श सें उठकर सीधे अपनेबैड पऱ जा गिरा, उसे एक् लंबीव गहरी नींद कि सख्त आवश्यकता थि औऱ चंद पलों मे वो सो भि गय़ा थां।
इस चूतिया सें समाधान कों ठीकउसी कि उम्र केँ नौजवान निकाल सकते हैं क्योंकि एक् हि घऱ मे रहतेहुए वो अपनी मम्मी सें औऱ कितनी ज्यादा दूरीबना सकता थां।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
अभिमन्यु केँ आँखों सें ओझल होने केँ पश्चात वैशाली भि पलंग सें नीचे उतरने लगती हैं कि सहसा उसकीनजर बेडशीट केँ उस बड़े--सें गीले धब्बे पर्र पडी जोँ उसके कामरस केँ उसकी साड़ी व पेटीकोट सें रिसने केँ बाद बेडशीट पर्र अंकित हुआ थां। खैरये कोई विशेष बात नहीं कि उसके स्खलन नें आज सुभह हि उसके द्वारा बदली गई नई बेडशीट कों इतने जल्द गंदाकर दिया थां, बल्कि वैशाली कों अचरजइस बात पऱ हुआ कि इसतरह केँ लंबेव अधिकाधिक रिसाव केँ स्खलन उसे उसकी बीती हुइ जवानी मे हुआ करते थें। चूंकि अब वो जवानी कि दहलीज पारकर एक् अधेड़ उम्र कों पा चुकी हैं फिन क्याँ कारणरहा जोँ एकाएक उसके स्खलन नें पुनःउसे उसकी बीती हुइ जवानी मे वापस पहुंचा दिया थां?
"इन्सेस्ट होता हौ याँ नाँ होता हौ मगर उसकाअसर जरूर होता हैं" वो धीरे-धीरे सें फुसफुसाते हुए स्वयं सें बोलि औऱ अपने हि व्यभिचारिक कथन पर्र बुरीतरह सें लजा जाती हैं। वो इतनी नादान व अपरिपक्व महिला नहीं थि जोँ येजान नां सके याँ मान नाँ सके कि उसकेइस मनभावन स्खलन औऱ अधिकाधिक रिसाव कां एकमात्र कारण उसका अपनासगा जवान बेटा थां। बेटे कि मौजूदगी मे यूं खुल्लम-खुल्ला मुट्ठ मारना सचमुच एक् ऐसा विचित्र रोमांचकारी क्षण थां जिसकी अकल्पनीय रोमांचकता कों दुनिया कि कोई भि मां नकार नहीं सकती थि औऱ फिनये कार्य सर्वदा अनुचित भि तोँ थां, स्वयं वैशाली कि बुर झड़ने केँ उपरान्त अब भि कुलबुला रही थि जैसे दोबारा उसे अभिमन्यु कि प्रत्यक्ष उपस्थिति मे झड़ने कां बेसब्री सें प्रतीक्षा होँ।
अपने चेहरे पऱ लज्जा औऱ कामुकता केँ मिलेजुले भावलिए वो दो अत्यंत हसीन जवान बच्चों कि अधेड़ मां अपनी अस्त-व्यस्त साड़ी कों संभालते हुए अपने बेडरूम केँ अटैच बाथरूम केँ भीतरघुस जाती हैं। उसने तीव्रता सें स्वयं कों नग्न किया औऱ फिन सीधे शॉवर केँ नीचेआकर खड़ी हौ गई, ठंडे पानी कि फुहार उसके तपते शरीर पऱ गिरते हि मानो भाष्प मे तब्दील होनेलगी थि। किसी अमुक विद्वान नें बिलकुल
सहीकहा हैं कि तन कि ज्वाला, काम कि अग्नि सें अधिक ज्वलनशील अन्यकुछ भि नहीं, जिसने अच्छे-अच्छे ब्रह्मचारी, ऋषि-मुनियों केँ वर्षों केँ तप कों भि पलभर मे जलाकर राखकर दिया। फिन वैशाली तौ एक् औरत हैं, हालात कि मारी एक् ऐसी तिरस्कृत औरत जिसकी कामग्नि बीतेकई महीनों सें शांत नहीं होँ पाई थि, जौ पति केँ जीवित होतेहुए भि किसी विधवा कि भांति बैड पर्र करीब अपना पूरादिन बिता देने कों बाध्य थि।
"मन्यु क्याँ सोचरहा होगा मेरे बारे मे? कहीं वो मेरी पेंटी कों अपने लन्ड पऱ लपेटकर मुट्ठ तोँ नहीं मारने लगा होगा? वैसे लड़का हैं तोँ बड़ा बेशर्म, बद्तमीज! अपनीसगी मां कों कुतिया कहकर बुलारहा थां" अपनी बुर औऱ उसके आसपास उगी बड़ी-बड़ी घुंघराली झांटों कों धोतेसमय भि वैशाली केवल अपने बेटे केँ हि विषय मे सोचरही थि। एक् अजीब--सि संनसनाहट भरा अहसास कि अपने कामरस कों छुटाते हुए भि उस मां कां ध्यान अपने जवान बेटे पर्र सें हट नहींपा रहा, उस मम्मी कि मर्यादित छवि केँ लिए कितना ज्यादा लज्जातृन थां।
"क्याँ कोई मां अपनी नंगी बुर कों छूने केँ दौरान कभी अपने बेटे कां ख्याल अपने मन-मस्तिष्क मे ला सकती हैं?" अचानक स्वयं सें ऐसा अशिष्ट सवालपूछ वैशाली कि आँखें मुंद जाती हें औऱ सर्वप्रथम जोँ चेहरा उसकीबंद पलकों मे उभरा, उस चेहरे औऱ उसपर व्याप्त हँसी कों देखते हि वो तेजी सें अपनाहाथ अपनी नंगी बुर सें दूरझटक देती हैं। उसने अपनी मुंदी आँखें भि तत्काल खोललीं, निरंतर मलतेहुए उन्हें ठंडे पानी सें धोयामगर खुली आँखों सें भि चहुंओर उसे अपने बेटे अभिमन्यु कां हि हँसता हुआ चेहरा नजर आँ रहा थां।
"तुँ अब उसकी मां नहींरही वैशाली। तेरी स्थिति वाकई तेरे बेटे केँ नीच संबोधन, मार्ग कि उस बेबस बूढ़ी कुतिया समान होँ गई हैं जिसे जवान होकर जबतब उसका अपना पिल्ला हि चोद जाया करता हैं। तेरी उच्चतम पदवी, शीर्शतम नाता, मान औऱ सम्मान जैसे सबकुछ तूनेखुद हि अपनी बेशर्मी सें गंवा दिया। आज
अभिमन्यु नें तेरे मुंह पर्र प्रत्यक्ष तुम को कुतिया कहकर पुकारा हैं, वो दिनदूर नहींजब भविष्य मे तुम्हारी तरफ रंडी कहकर भि पुकारेगा" अतिशीघ्र वैशाली अपने दोनों हाथ बलपूर्वक अपने दोनों कानों पर्र दबा देती हैं। ये उसके अंतर्मन कि वही आंतरिक आवज थि जिसने उस वक़्त भि उसे कचोटा थां जब मुट्ठ मारते हुए वो बेटे केँ मुंह सें, अपने प्रति उसके अंदरूनी गंदेव निषिद्ध विचारों कों जानने कि इच्छुक थि। वैशाली उससे वर्जित पऱ वर्जित प्रश्न पूछेजा रही औऱ अपनी मम्मी केँ समान हि बेशर्म बनकर अभिमन्यु उसे अनैतिक सें अनैतिक उत्तर देतेहुए बारंबार अपनी पापी इच्छाएं भि उसे बेझिझक बतलाए जारहा थां।
"कुछ.कुछ गलत नहींहुआ, केवल एक् छोटा--सां बदलाव हि तोँ आया हैं। पहले वो छुप-छुपाकर मुझे मुट्ठ मारते हुए देखा करता थां, आज प्रत्यक्ष देख लिया। उसनेसही कहा थां कि हम् अडल्ट हें, एक्-दूसरे केयसभी रहस्यों सें पूर्ण परिचित फिन छुप्पन-छुपाई कां ये बचपना खेल कबतक खेलते रहेंगे?" वैशाली नें अपने अंतर्मन सें तर्क-वितर्क करना शुरुआत कर दिया।
"माना उसकी मम्मी होकर मे उसकी एकमात्र ख़्वाहिश कां समर्थन नहींकर सकती, उसे कतई उचित नहीं ठहरा सकती, जरा--सां भि स्वीकार नहींकर सकतीमगर अपनी धूमिल छवि मे जरूर सुधार कर सकती हूं। हाँ! मुझे उसकी दोस्ती केँ प्रस्ताव पर्र गहराई सें विचार करने कि आवश्यकता हैं औऱ बसअब मे स्वयं कों उसीनये रूप मे ढा़लने कि कोशिश करूंगी" अपने अंतर्मन कों अपना आखिरी व निर्णायक निर्णय सुनाकर वो बिनाकुछ औऱ सोचे, बेहद शांति सें अपना नहाना पूरा करती हैं औऱ बाथरूम मे पहले सें हि मौजूद तौलिए कों अपने अधगीले मांसल नंगे शरीर पऱ लपेटकर बाथरूम सें बाहर् निकल जाती हैं।
अपने बेडरूम केँ पूर्व सें खुलेहुए दरवाजे कों देख सहसा वैशाली कि हँसीछूट जाती हैं कि केसे वो एक् छोटे--सें तौलिए कों अपने गदराए अध्उघड़े जिस्म पर्र लपेटे सरेआम अपनी निजता कों खुद तारतार कररही हैं। अभिमन्यु घऱ पऱ मौजूद हैं औऱ ये जानते हुए भि अबतक संस्कारी रही उसकी मम्मी यूं खुल्लम-खुल्ला
अपने अधनंगे शरीर कां निर्भीक प्रदर्शन कररही हैं, जैसेउसे इसबात कां कोईडर नहीं कि उसके बेडरूम कां दरवाजा खुलाहुआ हैं औऱ उसका जवान बेटा किसी भि क्षण उसके कमरे केँ अंदर सरलतापूर्वक झांककर उसे उसकीइस अधनंगी कामुक हालत मे देख सकता हैं।
"हमें अपनी न्यूडिटी कों कोईखास वैल्यू नहीं देनी चाहिए माँ। ऐसी गंदीसोच रखने वाले गंदे लड़के, हाय! जिसने तुम्हें पैदा किया, अपनीउसी सगी मम्मी कों पूरीतरह सें नंगी देखकर तुम्हें लज्जा नहीं आएगीभला?" अपने स्वयं केँ विध्वंशक सवाल पऱ लंबी सीत्कार भरतेहुए वैशाली जल्दी अपना तौलिया अपने अधनंगे शरीर सें अलगकर देती हैं, तत्पश्चात पूर्णरूप सें नंगी होँ चुकी भव्य यौवन कि स्वामिनी वो विवाहित मम्मी अपनेउस छोटे--सें तौलिए कों एक् बहोत हि निम्न स्तर कि बेहुदा अदा केँ संग नीचे फर्श पर्र गिराकर, तत्काल अपने बेडरूम केँ खुले दरवाजे कों निहारने लगती हैं।
"तुम्हारी घटिया बात कों मानकर तुम्हारी मां सचमुच नंगी होँ गई मन्यु। मौका हैं बेटा, देखसको तौ देखलो" ओछी हँसी हँसते हुएइस अश्लील कथन कों कहकर वैशाली नें अपने लंबे काले बालों कों जोर सें झटका, जिसके प्रभाव सें एकाएक उसके पूर्णविकसित मम्मे भि जोरों सें उछल पड़ते हें। अपने बूब्ज़ कि अत्यंत हसीन बनावट पऱ उसे शुरुआत सें गुमान रहा थां, करीबहर महिला कि भांति उसे भि अपने मम्मो कां बेहद फूलाव तराशा हुआ गोलाईयुक्त आकार हमेशा सें भाताआया थां। अपने दाएंहाथ कों सीधे अपने धुकनी समान धड़कते दिल पऱ रखकर वो हौले-हौले बेडरूम केँ खुले दरवाजे कि ओर अपने कंपकपाते कदम बढ़ाने लगती हैं, अपने जवान बेटे कि घऱ मे मौजूदगी केँ कारण उसकी मंत्रमुग्ध कर देने वालीचाल सामान्य सें कहीं ज़्यादा मादकव मतवाली होँ चुकी थि। उसकी गदराई मांसल गांडकुछ इसतरह सें थिरकरही थि जैसे मांस कि नहीं पारे कि बनी हौ औऱ संग हि ज्यों-ज्यों वो खुले दरवाजे केँ नजदीक आतीजा रही थि, उसकी बुर सें निरंतर बाहर् उमड़ता कामरस बहकर उसकी हृष्ट-पुष्ट जांघों कों भिगोने लगा थां।
आजादी, उन्मुक्तता, खुलापन आदि शब्दों कां सही अर्थव मूल्य महजवही समझ सकता हैं, जोँ जन्म-जन्मांतर सें बेड़ियों केँ अटूट बंधन मे जकड़ा रहा होँ फिन वो बेड़ी औऱ जकड़न सें भरा उसका अटूट बंधन समाजिक हौ, रिश्तों कां होँ, हैवानियत कां होँ, मर्यादा कां हौ याँ फिन किसी लालसा कां हौ। बीते जिंदगी मे पहलीबार वैशाली खुदउस स्वच्छंदता, खुलेपन कों प्रत्यक्ष महसूस कररही थि, उसेलग रहा थां जैसेइसी स्वतंत्रता कि उसे बरसों सें तलाश थि।
दरवाजे सें बाहर् झांकते टाइम उसका सम्पूर्ण जिस्म गनगना उठा औऱ उसके मुखमंडल पर्र प्रसन्नता हि प्रसन्नता छा जाती हैं, जिंदगी मे प्रथम बार उसने खुलकर आजादी कां स्वाद चखा थां औऱ वो पकड़ी नहीं गई थि। मन बावरा होता हैं, संतोष कि प्राप्ति अमरता केँ वरदान कि तपस्या सें भि कहीं दुर्लभ हैं औऱ वैशाली केँ साथ भि तत्काल कुछऐसा हि हुआ। अपनी सफलता केँ मद मे चूर वो अपने बेडरूम केँ दरवाजे कि निषेध दहलीज कों भि पार करने कां दुस्साहस कर बैठीमगर जाने क्याँ सोचकर वो जल्दी पलटी औऱ बेडरूम केँ भीतरआकर दरवाजे कों लॉक करतेहुए गहरी-गहरी सांसें लेने लगती हैं।
"धत्! तुँ पागल हैं, पूरीतरह सें पागल हैं। पकड़ी जातीतब क्याँ होता?" अपनी गुलाबी जीभ कों अपने मूंगिया रंगत केँ भरेहुए होंठों सें बाहर् निकालकर वैशाली अपनी गलती पर्र अपना माथा ठोकते हुए चहकी।
"कुछ भि बोलोमगर आनंद बहोत आया" किसी नवयुवती समान उछल-कूद करतेहुए वो अपने वॉड्रोब तक आँ पहुँची औऱ रोजमर्रा मे पहने जाने वाले अपने वस्त्रों कों पहनने लगती हैं। लाल ब्रा औऱ बैंगनी कच्छी केँ पश्चात उसने उनकेऊपर अपने हल्के फ्रोजी रंग कि कॉटन कि मैक्सी पहनली। अपने खुले बालों कां जूड़ा बनाकर उसने ड्रेसिंग केँ कांच पर्र पहले सें चिपकी एक् छोटी--सि काली बिंदी कों खींच, उसे अपने माथे केँ बीचोंबीच चिपकाया औऱ मांग मे सिंदूर धारणकर कांच मे अपनी अधेड़छव कों घूरने लगती हैं।
शायद पेटीकोट कि जरूरत पड़ सकती हैं। हुंह! हमेशा तोँ इसे बिना पेटीकोट केँ पहनती आँ रही हैं" कांच केँ सामने गोल-गोल घूमते हुए अचानक वैशाली कों अहसास हुआ जैसे उसकी कच्छी कि बनावट उसकी मैक्सी केँ ऊपर सें नुमाइंदा होँ रही हैं, खास उसकी गदराई गांड कां कामुक उभार उसकी कच्छी समेत मैक्सी केँ ऊपर सें स्पष्ट नजर आँ रहा हैं। एकपल कों उसने मैक्सी केँ भीतर पेटीकोट पहनने कां विचार बनाया मगर अगले हि समय वो अपना विचार त्याग भि देती हैं, ये उसकी दैनिक वेशभूषा थि औऱ एकदम सें उसमे अंतर करनाउसे अपने पागलपन कां शुरुआती लक्षण समझआता हैं।
"मन्यु आज जल्द कॉलेज सें लौटआया थां, क्याँ पता दोपहर का खाना किया भि हैं याँ नहीं" अपनी कामग्नि मे पिछले दो घंटों सें लगातार जलने वाली वो तिरस्कृत औरत सहसा एक् ममतामयी मम्मी मे तब्दील होँ गई औऱ तीव्रता सें अपने बेडरूम केँ बाहर् निकलकर वो अभिमन्यु केँ कमरे केँ बंद दरवाजे पऱ दस्तक देने लगती हैं।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
मन्यु! दरवाजा खोलो बेटा, माँ कितनी देर सें खटखटा रही हैं" जब चार-पाँच बार दरवाजे पऱ थाप देने केँ बावजूद अभिमन्यु नें दरवाजा नहीं खोलातब वैशाली हाथ केँ थापों केँ संगउसे आवाज़ भि देनेलगी।
"वैसे तोँ दिन मे कभी नहीं सोता, जरूर मुट्ठ मारने कि थकान सें नींदलग गई होगी बेचारे कि। हायरे मेरी पेंटी, आज बुरी फंसी तुँ" अपनी हि ठरकीसोच पर्र वैशाली कि हँसीछूट जाती हैं, अबइसे ठरक नहीं कहेंगे तोँ औऱ क्याँ कहेंगे कि बीते पिछले दो-तीन घंटे केँ घटनाक्रमों नें एक् बेहद संस्कारी मम्मी कों कितना ज़्यादा बदल दिया थां। तत्काल वो अपना बायां कान दरवाजे सें चिपका देती हैं ताकिअगर उसका बेटा जानबूझकर दरवाजा नहींखोल रहा हौ तोँ वो कमरे केँ अंदर कि हलचल सुनकर इसबात कां अनुमान लगासके।
"बेटा सोगए क्याँ?" अपनेकान मे कोई हलचल सुनाई नाँ देने केँ उपरान्त वो जल्दी अपने घुटनों केँ बल नीचे फर्श पऱ बैठ गई औऱ कि-होल सें कमरे केँ भीतर कां जायजा लेने लगती हैं, अभिमन्यु बैड पऱ औंधाडला थां। एकपल कों बेटे कि नींद कां ख्याल कर उसनेउसे जगाने कां विचार त्याग दियामगर उसकीभूख केँ विषय मे सोच फर्श पर्र बैठे-बैठे हि वो उसे जोरों सें पुकारने लगती हैं।
"क्याँ हैं माँ, मे सोरहा हूं दोस्त" अभिमन्यु नींद मे कसमसाते हुए बोला, वाकई वो बहोत गहरी नींद मे थां।
"दोस्त केँ बच्चे, दरवाजा खोलो। मुझे तुमसे बात करनी हैं" जवाब मे वैशाली चिल्लाकर बोलि औऱ अपनीउसी चिल्लाहट कि आड़ मे हल्के हाथों सें दरवाजे कां नॉब घुमा देती हैं।
बाद मे माँ, बाद मे" अभिमन्यु पुनः कसमसाया।
"मैंने कहा नाँ मुझे तुमसे बात करनी हैं। अभि, इसी टाइम खोलो दरवाजा" वैशाली नें सहसा क्रोधित होने कां नाटक किया औऱ जिसके असर सें अभिमन्यु जल्दी हि उठकरबैठ गय़ा।
"खोलता हूं, खोलता हूं" एक् लंबी जम्हाई लेतेहुए वो पलंग सें नीचे उतरकर आड़े-टेढ़े कदमों सें दरवाजे केँ समीपआने लगा औऱ तभी वैशाली भि फर्श सें उठकर खड़ी होँ जाती हैं।
"गेट शायद बाहर् सें लॉक हैं मम्मी" वो दरवाजा खींचने कां प्रयास करतेहुए बोला।
"मैंने हि लॉक किया थां बाहर् सें" वैशाली जवाब मे बोलि।
"क्यूं? फिन क्यूं नींद खराब कि मेरी, जब गेट खोलना हि नहीं थां? जल्दी अभिमन्यु नें चिढ़ते हुए पूछा।
"भइया तुम्हारा क्याँ भरोसा, अंदरकिस हाल मे हौ। कपड़े तौ पहने हें नां तुमने याँ फिन नंगे होँ?" वैशाली नें अपनी रोके नाँ रुकाए हँसी कों काबू मे करने कि कोशिश करतेहुए पूछा, यकीनन अबठरक उसकेसिर चढ़कर बोलरही थि।
"नंगा!" अपनी मम्मी केँ इस अजीब सें सवाल पर्र अभिमन्यु जैसे चौंक सां जाता हैं, उसके हैरत सें खुल चुके मुंह सें केवल इतना हि बाहर् आँ सका।
"अरे दिन मे तुम् कुछ न्यूडिटी-व्यूडिटी कि बातकर रहे थें नां तौ मुझेलगा कि तुम् कहीं." वैशाली नें अपनेकथन कों अधूरा छोड़ते हुएकहा।
"खोलू दरवाजा? सच मे नंगे नहीं होँ नां?" उसने पिछले कथन मे जोड़ा औऱ बेटे केँ जवाब कि इंतज़ार किए बगैर हि झटके सें दरवाजा खोल देती हैं।
हायरे! अपनी मां कि कच्छी कां ये क्याँ हालकर दिया तुमने? पापी!" दरवाजा खुलते हि वैशाली कि नजर सर्वप्रथम नीचे फर्श पर्र पड़ी अपनी कच्छी पर्र गई तोँ उसने तत्काल अपने मुंह पर्र हाथ रखकर आश्चर्य सें भरने कां नाटक करतेहुए पूछा, वो जानबूझकर 'पेंटी' कि स्थान पूर्णदेशी शब्द "कच्छी' कां इस्तेमाल करती हैं औऱ संग हि उसने कच्छी शब्द केँ साथ 'मां' शब्द कों भि जानकर जोड़ा थां।
कुछ नींद कि खुमारी औऱ कुछ अपनी मां केँ प्रश्नों सें हतप्रभ हुए अभिमन्यु कां ध्यान फर्श पर्र पहले सें पड़ी वैशाली कि कच्छी पऱ नहींजा सका थां औऱ अपनी मम्मी केँ तात्कालिक सवाल कों सुनकर तोँ मानो जैसे उसकी सांस हि गले मे फंस जाती हैं।
"वोँ मम्मी.वोँ मे." जवाब देतेहुए वो मिमियाने लगता हैं, उसकाहलक चिपक चुका थां।
"एक् तौ तुमने मां कि कच्छी चुराई, दूसरे उससेमजे किए औऱ जब मज़ा पूरा हौ गय़ा तोँ आखिर मे दुत्कारकर उसे फर्श पर्र फेंक दिया। वाउ रे मर्द! तुम् सभी एक् जैसे होते हौ" वैशाली मनमसोसने कां अभिनय करतेहुए बोलि औऱ एक् लंबीअहह भरकर कमरे सें बाहर् जाने लगती हैं। वहीं अभिमन्यु ठगा सां, एकटक फर्श पऱ पड़ी अपनी मां कि कच्छी कों हि घूरेजा रहा थां, चाहता तौ थां कि वैशाली कों बीती सत्यता सें परिचत करवादे मगर शर्मवश वो ऐसाकर नहीं पाता।
"खानां लगारही हूं, फ्रैश होकर सीधे बाहर् आओ औऱ हाँ!जाओ माफ किया" वैशाली कमरे सें बाहर् जाते-जाते बोलीं। अभिमन्यु नें जल्दी अपनासिर उठाकर उसके चेहरे देखा, पलभर कों मुस्कराकर वो तेजी सें आगेबढ़ गई थि।
कुछआधे घंटे पश्चात दोनो मां-बेटे हॉल कि डाइनिंग टेबल पर्र संग बैठकर खानां खारहे थें। हमेशा बकबक, होँ-हल्ला करने वाले अभिमन्यु कों यूं चुपचाप खानां खातेदेख वैशाली कों दुखहुआ। खाने कों खाने कि तरह खातातब भि ठीक थां, वो तौ जैसे खानां चुगरहा थां।
"मन्यु" जबहॉल मे पसरा मानवीय सन्नाटा वैशाली केँ बस सें बाहर् हौ गय़ा तब वो खुद हि उस सन्नाटे कों भंग करतेहुए बेटे कों पुकारती हैं।
हुं!" जवाब मे अभिमन्यु अपना मुंह तक खोलना मनपसंद नहीं करता, अपनेगले केँ स्वर सें बस इतना हि गुनगुनाकर वो अपनी मां केँ चेहरे कों देखने लगता हैं। उसे एकाएक अचरजतब हुआजब हैरत सें बड़ी होती जाती उसकी आँखों मे झांकते हुए वैशाली अपने बाएं कि उंगलियों कि सहायता सें अचानक अपनी मैक्सी केँ ऊपरीबटन कों खोलने लगती हैं, पहले उसने एक् बटन खोला तत्पश्चात दूसरे कों खोलने लगी।
अभिमन्यु कि घिग्घी बंधीदेख वैशाली कों कुछ संतोष हुआ, संतोष इसलिये नहीं कि उसे अपने बेटे कि तकलीफ़, घबराहट, उसकी मायूसी सें कोई अतिरिक्त खुशीमिल रही थि बल्कि इसलिये कि उसे प्रत्यक्ष प्रमाण मिल चुका कि उसके बेटे कि नजरों मे उसकी इज्जत अब भि बरकरार थि, वो तोँ हालात कां खेल थां जौ एक् हि टाइम मे दोनो मां-बेटे एकसाथ बेशर्म बनगएथै। अपनी मैक्सी केँ दूसरे बटन कों खोलते वक़्त वैशाली नें ये भि स्पष्ट देखा कि भले हि अभिमन्यु नें अत्यंत-जल्दी अपनी आँखें अपनी मम्मी सें हटाकर विपरीत दिशा मे मोड़ दि थींमगर उनकी किनोर सें अब भि वो उसकी उंगलियों कि हरकत पर्र हि गौर फरमारहा थां। मैक्सी केँ दूसरे बटन केँ खुलते हि वैशाली अपनेउसी बाएंहाथ कि उंगलियां हौले-हौले अपने स्तन केँ ऊपरी फुलाव पऱ रगड़ते हुए पहले उन्हें अपनी मैक्सी औऱ फिन सीधे अपनी ब्रा केँ दाहिने खोल केँ भीतर घुसेड़ देती हैं।
"तुम्हारी पॉकेटमनी" वैशाली बेटे कां ध्यान अपनीओर खींचते हुए बोलीं मगर अपना बाएंहाथ उसने अबतक अपनी ब्रा सें बाहर् नहीं निकाला थां। दोनो मम्मी-बेटे कि आँखें आपस मे जुड़ चुकीथीं औऱ फिनकुछ ऐसा जताते हुए कि उसकी ब्रा बेहदतंग हैं, वो अजीब सां आड़ा-टेढ़ा मुंह बनाने लगती हैं।
वोँ बहुत दिनों सें शॉपिंग नहीं कि नाँ तौ थोडा साइज इश्यू हैं" वैशाली अपनी हरकत केँ समर्थन मे बोलि।
"मेरी कच्छियों कां भि यहीहाल हैं" मायूसी सें उसने पिछले कथन मे जोड़ा।
"कोईबात नहीं माँ औऱ वैसे भि मुझे पॉकेटमनी नहीं चाहिए, मेरी पनिशमेंट अभि पूरी नहीं हुई" अपनेठीक सामने बैठी अपनी मम्मी कों उसकीतंग ब्रा सें जूझते देख अभिमन्यु हौले सें बुदबुदाया। वैशाली कि लाल ब्रा उसकी बेवजह कि खींचा-तानी केँ कारण उसकी मैक्सी केँ खुलेगले सें आधी बाहर् निकलआई थि औऱ उसके गोल-मटोल स्तन कां प्रभावशाली ऊपरी उभार अभिमन्यु कों तत्काल उत्तेजना सें भरनेलगा थां। अपनी मम्मी कि बोलीं मे आए खुलेपन सें भि वो थोड़ा सकते मे थां।
"बस होँ गय़ा। हाँयह लो, पूरेसात हजार हें" वैशाली नोटों केँ बंडल कों बेटे कि ओर बढ़ते हुए बोलि मगर अपने पिछले कथन पर्र अटल अभिमन्यु जल्दी नां केँ इशारे मे अपनासिर हिला देता हैं।
"पनिशमेंट जारी थि औऱ जारी हि रहेगी, पॉकेटमनी तुम् अपनेपास रख सकते होँ पऱ तुम्हारा घऱ सें बाहर् आनां-जानां बंद हि रहेगा" वो रुपयों कां बंडल टेबल पऱ उसके सामने रखतेहुए बोलीं।
"थेंक्स मम्मी, खालीजेब मुझे कैसाफील होँ रहा थां मे हि जानता हूं" अभिमन्यु अत्यंत जल्दी बंडल पर्र झपटते हुए बोला, बिन पैसों केँ एक् जवान लड़के कि कैसी हालत होती हैं खुद वैशाली कों भि प्रत्यक्ष समझ आँ गय़ा। अपने दोनों हाथ कैंची केँ आकार मे ढा़ल वो उन्हें अपनी अधखुली छाती केँ इर्द-गिर्द लपेटकर बैठ गई थि, जिसका दबाव उसके पुष्ट स्तन केँ निचले भाग पऱ होँ रहा थां। अकस्मात् उसके स्तन कां ऊपरी उभार पहले सें ज्यादा नुमाइंदा होँ गय़ा, जिसके नतीजतन एसी कि मनभावन ठंडक वो अपने तेजी सें ऐंठते जारहे निप्पलों पऱ भि साफ महसूस करनेलगी थि।
मुझे लगता हैं कि मुझे सुधा सें माफी मांगनी चाहिए, आखिरये कोई छोटी-मोटी बात नहीं कि तुमने बहाने सें उसकेघऱ जाकर जानबूझकर उसकी कच्छी कों चुराया थां" अपने बेटे कि चोर नजरों कों बरबस अपने अधनंगे बूब्ज़ पर्र गड़ते देख वैशाली बोलि।
"वो माँ। वो, तुम् उसबात कों भूल क्यूं नहीं जातीं, अबतक तौ मिसिज मेहता भि उसेभूल हि चुकी होंगीं" आंतरिक लज्जा सें बेहाल अभिमन्यु हकलाते हुए बोला, उसकी शर्माहट कां एक् मुख्य विषयये भि थां कि अपनी मम्मी केँ बूब्ज़ कि सुंदरता कों निहारने कां इतना करीबी मौकाउसे पहलीबार प्राप्त हुआ थां ऊपर सें वैशाली कां लगातार देशी भाषा प्रयोग उसे बेहद अटपटा-सां लगरहा थां, रह-रहकर उसके संपूर्ण जिस्म मे फुरफुरी सि छूटती जारही थि।
"तुम्हारी मम्मी होने केँ नातेभूल जाऊँ तौ मे वाकईउसे भूल चुकी हूं औऱ तुम्हें माफ भि कर दिया हैं मगर एक् महिला होकर दूसरी महिला कि बेज्जती केसेसह लूं। तुम्हें पता नहीं मन्यु कि तुम्हारे बचाव मे मैंने उसे क्याँ-क्याँ गलत-शलत नहीं बोला, ये जानते हुए भि कि गलत वो नहीं मेरा अपना बेटा हैं" वैशाली एक् लंबीअहह भरते हुये बोलि, अपना चेहरा नीचे कों झुकाकर वो अपने बूब्ज़ केँ अधनंगे ऊपरी उभार औऱ उनकेबीच कि खुली दरार कां खुद अवलोकन करनेलगी। उस अत्यधिक कामुक मम्मी नें उस टाइम अपने बेटे कों जैसे चौंका हि दियाजब अपने अंगप्रदर्शन कों जानकर भि कोई विशेष महत्व दिए बगैर वो तत्काल अपना चेहरा ऊपर उठाकर पुनः उसकी आँखों मे झांकने लगती हैं।
अगर तुम्हारी हि उम्र कां कोई लड़काइस तरह कि बेहूदगी सें तुम्हारी अपनी मम्मी कि कच्छी कों चुरा लेँ जाएतब तुम्हारी मां केँ दिल पर्र क्याँ बीतेगी, कभी सोचा हैं तुमने? फिन सुधा नें तौ तुम्हारे औऱ उसके अपने बच्चों कि बीचकभी कोई फर्क नहीं किया" वैशाली नें शांत स्वर मे पूछा। अपनी मम्मी केँ कथन मे शामिल सवाल औऱ उसमे उसकाखुद कां उदाहरण देना अभिमन्यु कों स्पष्ट दर्शाता हैं कि वाकई अपनेकथन कों लेकर वो कितनी ज़्यादा गंभीर थि। उसने सहसा निर्णय लिया कि वो अपनी मां कि अधनंगी छाती कों अब औऱ नहीं घूरेगा मगर पलभर भि नहींबीत सका औऱ दोबारा उसकी आँखें उसी उत्तेजक दृश्य पऱ वापसलौट आईं।
"तुम्हें उनसे माफी मांगने कि कोई जरूरत नहीं, गलती मैंने कि हैं तौ माफी भि उनसे मे हि मागूंगा" अभिमन्यु नें जवाब मे कहा, मानो अपनी बीती गलती औऱ तात्कालिक गलती कि वजह सें स्वयं कों लताड़ने कां प्रयास कररहा हौ। स्वतः हि वो ये भि महसूस करता हैं कि उसकीसगी मम्मी केँ प्रति उसके मन-मस्तिष्क मे कितनी ज़्यादा महकभर चुकी हैं औऱ जोँ वो चाहकर भि उसमहक कों मिटा नहीं पाता। जहां संसार इस उदाहरण सें पटा पड़ा हैं कि एक् पुत्र कां सहीजगह सदैव उसकी मां केँ चरणों मे हि होता हैं औऱ एक् पुत्र वो खुद हैं जोँ अपनी मां केँ चरण तौ दूर, रात-दिन बस उसके नंगे शरीर कि हि वर्जित कल्पनाओं मे खोया रहता हैं।
सॉरी आंटी! मैंने आपकी कच्छी चुराई औऱ फिन भि आपसे माफी मिलने कि चाहतलिए आपकेपास आया हूं। क्याँ ये कहोगे उससे?वाट इज रॉंगविद यू मन्यु। माला केँ संग भि तुम् जबरदस्ती कररहे थें, जबकि तुम्हें अच्छे सें पता हैं कि वो मोहल्ले केँ अॉलमोस्ट हरघऱ मे काम करती हैं। तुम्हें पता नहींमगर उसने मुझे स्वयं बताया थां कि तुम् उसकेसंग छेड़छाड़ करते हौ, उसके प्राइवेट पार्ट्स कों छूते होँ औऱ पैसे कां लालच देकर तुमने उससेसंग सैक्स करने कि डिमांड भि कि थि। तुम्हारी मां होकरभला मे कबतब लोगों केँ गंदे-गंदे ताने सुनती रहूँगी? जबकि खोट मेरी परवरिश मे नहीं स्वयं तुममे हैं" कहने कों तोँ वैशाली इतनी विस्फोटक बातें कह गई मगर जल्दी कुर्सी खिसकाकर वो बेटे केँ नजदीक आँ जाती हैं औऱ सीधे उसने अभिमन्यु कां चेहरा अपनी अधनंगी छाती सें चिपका दिया।
"मे तुम्हारी टीनएज कों नेगलेक्ट नहींकर रही, मुझे सचमुच पता हैं बेटा कि तुम् जवानी केँ किस नाजुक दौर सें गुजररहे होँ। तुम् अपनी मां कों अपना बैस्ट फ्रैंड बनाना चाहते थें तोँ चलो, मैंने तुम्हारा प्रपोजल ऐकसेप्ट कियामगर तुम्हें भि मुझसे प्रॉमिज करना होगा कि तुम् अपनीइस बैस्ट फ्रैंड सें कुछ भि नहीं छुपाओगे। नाउ कमअॉन टेलमी द ट्रुथ, तुम्हारे दिल औऱ मन मे क्याँ चलरहा हैं?" वो प्रेम सें बेटे केँ बालों मे अपनी उंगलियां घुमाते हुए बोलि। माना कि इस मार्मिक क्षण मे भावुकता उत्तेजना पर्र भारी थि मगर कहीं नां कहीं उनके शारीरिक सम्पर्क सें दोनो मम्मी-बेटे रोमांचित भि थें। अपने बूब्ज़ कि गहरी घाटी केँ बीचोंबीच अपने बेटे कि गरम सांसों केँ अहसास सिर्फ सें वैशाली कां दिल जोरों सें थड़कने लगा औऱ
संग हि वो अपनी बुर कि अंदरूनी गहराई मे एकाएक स्पन्दन शुरुआत होता महसूस करने लगती हैं। उनकाये शारीरिक सम्पर्क वो मम्मी तब झटके तोड़ने पऱ मजबूर होँ गई जब अभिमन्यु कि गीलीजीभ कां स्पर्श अचानक सें वो अपने बाएं मम्मे केँ ऊपरी फूले उभार सें होता पाती हैं।
"आईएम। आईएम जस्ट क्यूरियस माँ। जस्ट क्यूरियस, नथिंग एल्स" अभिमन्यु हकलाते हुए बोला, वो भि समझ गय़ा थां कि क्यूं उसकी मां नें एकदम सें उसका चेहरा अपने मम्मो सें दूर ढ़केला थां। उसकी मम्मी कि मैक्सी उसके बाएं कंधे सें करीब पूरी हि सरक चुकी थि औऱ जिसके कारण उसकीलाल ब्रा कां बायां स्ट्रैप भि अब स्पष्ट दिखने लगा थां, यहां तक कि अगर आगामी वक़्त मे वो थोडा--सां भि हिलती-डुलती तोँ उसकी ब्रा कां सम्पूर्ण बाएं हिस्सा जल्दी बेपर्दा होँ जानां थां।
"क्यूरियस अबाउट वाट? अबाउट दिस, हम्म?" अपनेसगे जवान बेटे कि बेशर्म आँखों कों यूं खुलेआम अपने अधनंगे स्तन गडी़ पाकर वैशाली बहोत उत्साहित थि, उसने बिना किसी अतिरिक्त झिझक केँ अपने दाएंहाथ सें सीधे अपने अधनंगे स्तन कि ओर इशारा करतेहुए पूछा।
"मॉऽऽम!" अपनी मम्मी केँ सवाल औऱ उसके दाएंहाथ केँ इशारे कों समझ सहसा अभिमन्यु कुर्सी सें उछल पड़ता हैं, इस पूरे वार्तालाप मे मानो पहलीबार उसे लज्जा महसूस हुईँ थि।
अरे!अरे! अरे!नाउ वाट हैप्पन टूयोर दोज वर्ड्स? वीबोथ आर अडल्ट माँ औऱ अगर हम् साथीबने तौ हमारी लज्जा समाप्त हौ जाएगी" वैशाली हँसते हुए बोलि तोँ संग मे अभिमन्यु भि हँसने लगता हैं।
"तुम् वाकई बहोत गंदे लड़के होँ मन्यु पऱ क्याँ करूं, मेरे इकलौते बेटे होँ तोँ मे ठीक सें तुम्हें डांट भि नहीं पाती" उसने पिछले कथन मे जोड़ा।
"आईनो माँ एण्ड देट्स वाएआई लवयूसो मच। उम्मऽऽ मुआऽऽ" अभिमन्यु नें जल्दी उसकीओर एक् चुम्बन उछाल दिया।
"तोँ मे सही हूं, तुम्हारी क्युरीआसिटी औरतों केँ जिस्म सें हैं" वैशाली नें अंधेरे मे तीर चलाते हुएकहा, फिरभी पूरीतरह सें इसे अंधेरे मे तीर चलाना नहीं कहेंगे मगर उनकेबीच चलतेइस सामान्य सें वार्तालाप कों अब दूसरी दिशा मे मोड़ने हेतुउसे अभिमन्यु कि भि सहमति कि विशेष आवश्यकता थि। एक् ऐसी सहमति जिसमे नां कोई लज्जा होँ, नां कोईहया हौ महज सत्य हि सत्य हौ।
"अब मे बोलूंगा तौ कहोगी मे बेशर्म हूं" अभिमन्यु दांत निकालते हुए कहता हैं। वो तौ इस टाइम कि इंतजार नाँ जानेकब सें कररहा थां, जब उसकी मां औऱ वोँ दोनो हि खुलकर बातचीत कर सकते थें।
"जोँ लड़का किसी मजबूर कामवाली केँ संग जबरदस्ती कर सकता हैं, अपनी मां कि बैस्ट फ्रैंड केँ घऱ सें उसकी कच्छी चुरा सकता हैं औऱ आज तोँ तुमने अपनी मम्मी कि हि कच्छी चुराली। ऐसे बेशर्म कों बेशर्म नहीं बोलूं कों क्याँ शब्बाशी दूं" वैशाली कां स्वर क्रोधित थां मगर उसकेभाव चहकेहुए थें।
मे स्वयं कों बिलकुल नहींरोक पाता माँ, जब एक् बेहद सैक्सी एण्डहॉट एमआईएल एफ दिनभर मेरे लगभग रहती हैं। जौ मुझे अपनीजान सें भि ज़्यादा प्रेम करती हैं, मुझे खानां खिलाती हैं, मेरा ख्याल रखती हैं, मुझेकभी नहीं रोने देती, वक्त सें पॉकेटमनी देती हैं, मेरे गंदे कपड़े धोती हैं, मेरे." वो आगे बोलता हि जातायदि वैशाली बीच मे उसे नहीं टोकती।
"बसबस, बहोत मक्खन लगा लिया तुमने औऱ मे कोईएम आईएल." इसबार अभिमन्यु अपनी मम्मी कों बीच मे टोक देता हैं।
"मुझे बोलने दो मां। जिसेपता हैं कि मे चोरी छिपेउसे नहाते देखता हूं, उसे मुट्ठ मारते हुए देखता हूं। जिसेपता हैं कि मे स्वयं उसकेनाम कि मुट्ठ मारता हूं, जिसेपता हैं कि मे पॉर्न देखता हूं, जिसेपता हैं मे वर्जिन नहीं। जोँ मेरी रग-रग सें वाकिफ हैं मगरफिन भि मेरीहर छोटी-बड़ी गलती कों हमेशा माफकर देती हैं." अपने बेटे केँ अश्लील कथन कों सुनकर अकस्मात् वैशाली कां सम्पूर्ण शरीर कांपउठा, चेहरे पर्र लहूउतर आया, कमर चरमरा गई, निप्पल ऐंठगए, कामरस सें भीगी कच्छी थरथराती बुर केँ मुख सें बुरीतरह चिपक गई औऱ तत्काल वो झटके सें कुर्सी सें उठकर खड़ी होँ जाती हैं। अभिमन्यु अब भि बोले हि जारहा थां, उसकाहर शब्द वैशाली केँ कानों मे पिघले शीशे सां घुसता महसूस हौ रहा थां।
"मुझे.मुझेकाम हैं" कहकर वो सीधे रसोई कि ओरदौड़ पड़ती हैं।
"मैंने केवल फ्रेंडशिप कां प्रपोजल नहींरखा थां मम्मी औऱ भि बहोत सें प्रपोजल थें मेरे। तौ क्याँ मे उन्हें भि मंजूर समझूं?" दौड़ लगती अपनी मम्मी कों देख अभिमन्यु नें जोर सें चिल्लाते हुए पूछा औऱ उसके सवाल कों सुन वैशाली बिना पीछे मुड़े अपने दाएंहाथ सें अपना माथा ठोकते हुए मुस्कुराकर रसोई केँ भीतरघुस जाती हैं।
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