Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
कुछ क्षणों तक रसोई केँ बर्तनों कि मिथ्या ध्वनि सें स्वयं कों वहॉल मे बैठे अभिमन्यु कों भ्रमित करने कां सफल अभिनय करती वैशाली जोरदार हंपाई लेतीरही, अपनेसगे जवान बेटे केँ मुंह सें यूं खुल्लम-खुल्ला अपनी अश्लील प्रशंसा सुनना संसार कि किस मम्मी कों हंपाई सें नहीं भरेगा? अपनी प्रशंसा पर्र प्रसन्न हौ उठना तौ औरत स्वभाव कां पहला प्रमुख गुण हैं मगर प्रसन्न होने केँ संग हि उसपरलजा भि जानां, ये ज़रूर औरत विशेष कि अत्यंत मर्यादित छवि कों प्रदर्शित करता हैं। वैशाली उन चुनिंदा स्त्रियों मे सें एक् हैं जिसकी मर्यादित छवि केँ कारण उसकी शर्म उसकी प्रसन्नता पर्र सदैव भारी पड़नी चाहिए औऱ ऐसा वो प्रत्यक्ष महसूस कर भि रही थि।
"हाँ मुझेपता कि तुम् अपनी मां, अपनीसगी मां, जिसने तुम्हें पैदा किया अपनीउसी सगी मम्मी केँ नाम कि मुट्ठ मारते होँ। तुम् इतने बेशर्म केसे हौ सकते हौ मन्यु? अपनी मां केँ विषय मे सोच अपने लन्ड सें खेलते हुए क्याँ तुम्हें जरा सि भि लज्जा नहींआती बेटा?" रसोई कि स्लैब पर्र अपने दोनोहाथ टिकाए खड़ीउस मर्यादित, संस्कारी मां केँ अनैतिक बोलउस समयउसे औऱ भि ज़्यादा सरम सें भर देते हैं जब चलचित्र कि भांति चहुंओर उसे मुट्ठ मारता हुआ उसका जवान बेटा अभिमन्यु हि नजरआने लगता हैं। मां शब्द कि रट लगाए जोरदार सिसकियां भरताहुआ वो अपने दोनो हाथों सें अपने अत्यंत खूबसूरत वतनेहुए लन्ड कों तीव्रता सें मुठिया रहा थां जिसके काल्पनिक चित्रण केवल नें कब वैशाली कि शर्म कों उसकी कामुत्तेजना मे परिवर्तित कर दिया, वो नहींजान सकी।
अपने आप् वो स्लैब पर्र झुक गई, कपकपती टांगें फैलने लगीं, दायां हाथ बिना किसी अतिरिक्त रुकावट केँ टागों कि जड़ सें जोंक--सां चिपक गय़ा, उंगलियां मैक्सी समेत कच्छी कों चूतमुख पर्र बलपूर्वक घिसने लगीं, सूखा मुंहनमी तलाशने हेतुखुल गय़ा, कमर धनुषाकर तनउठी, पेर केँ पंजे फर्श मे धंसने लगे औऱ अंततः इनसब लक्षणों सें जोड़ सें वैशाली कों समझ आँ गय़ा कि जिंदगी मे दूसरी बार वो यूं खुलेआम मुट्ठ मारने लगी थि। अभिमन्यु हॉल मे हैं औऱ रसोई कां दरवाजा भि खुला हैं, पुनः बेटे द्वारा रंगे हाथों पकड़े जाने कां भय औऱ उसभय सें पैदा होता असीमित रोमांच जैसे तत्काल उस कामुक मां कों अधिकाधिक उत्साह सें भरनेलगा थां।
"हायरे रे बेशर्म, आखिरकार तुम् अपनी मम्मी सें भि तुम्हारे नाम कि मुट्ठ मरवाने मे सफल होँ गए। हाय! आओ उन्ह!आओ मन्यु, स्वयं अपनी आँखों सें देखलो। अब हमारे बीचकोई अंतर नहींरहा, आहऽऽऽऽ! तुम्हारी मां, उन्ह! तुम्हारी अपनी मम्मी भि तुम्हारी हि तरह बेशर्म, अहह!सफा बेशर्म बन चुकी हैं मन्युऽऽ" अपने जबड़ों कों भींच अपने स्वर दबाने कि प्रयासरत वैशाली अगले हि क्षण स्खलन केँ चर्मोत्कर्ष कों पाने लगती हैं, उसके पापी काल्पनिक चित्रण मे अभिमन्यु भि उसकेसंग हि झड़रहा थां। अंतरबस इतना--सां कि वो खुद केँ स्खलन कों महसूस भरकर सकती थि मगर बेटे केँ लन्ड केँ फूलेहुए सुपाड़े सें लगातार बाहर् आती उसके वीर्य कि लंबी-लंबी धारें वो स्पष्ट देखपा रही थि, मानो प्रत्यक्ष उसका बेटा उसके समक्ष हि स्खलित हौ रहा हौ।
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अपने कमरे केँ अटैच बाथरूम मे बंद शॉवर केँ नीचे खड़ा अभिमन्यु अब सें कुछसमय पहले बीती घटना पर्र बड़ी गंभीरता सें गौरकर रहा हैं। फिरभी अपनी मां केँ रसोई मे जाते हि वो भि जल्दी कुर्सी सें उठकर खड़ा होँ गय़ा थां, वो खुद वैशाली केँ पीछे जानां चाहता थां मगर चाहकर भि अपनाकदम आगे नहीं बढ़ा पाया औऱ इसकेठीक उलट अपने कमरे केँ भीतरलौट आया थां।
"तुम् बदल गई हौ माँ, सचमुच बदल गई हौ" अपने दाएंहाथ कि मुट्ठी मे कैद वो अपनी मम्मी कि कच्छी कों घूरते हुए बड़बड़ाया औऱ फिन एकाएक मुट्ठी खोलने केँ पश्चात कच्छी कों सीधे अपनीनाक सें सटाकर बारम्बार गहरी-गहरी सांसे लेने लगता हैं।
"उफ्फऽऽ! कहीं मे पागल नाँ होँ जाऊँ" अपनी मम्मी केँ शरीर कि सच्ची मादकता सें परिचित होकर अभिमन्यु चहकउठा थां, कच्छी मे रची-बसी वैशाली केँ तन कि सुगंध सूंघते हुए वो बाएंहाथ सें अपने पत्थर समान कठोर लन्ड कों तीव्रता सें मुठियाने लगता हैं। बीते चार-पांच घंटो सें उसकी जवानी लगातार उससेरहम कि भीख मांगरही थि, अब वो चाहकर भि अपनेबदन केँ भीतर निरंतर उबलरहे लावे कों औऱ ज्यादा उपेक्षित नहींकर सकता थां।
"मे जानता हूं मां कि येगलत हैं, बिलकुल गलत हैं पर्र मे तुम्हारे इल्जाम कों झूठा साबित नहीं होने दूंगा, आईएम सॉरी माँ" अपनीइसी सोच केँ संग कामलुलोप अभिमन्यु जल्दी अपनी मम्मी कि कच्छी कों उत्तेजना कि मार सें थरथराते अपने लन्ड केँ इर्द-गिर्द लपेटकर, अत्यंत आक्रमकता सें मुट्ठ मारना शुरुआत कर देता हैं। अपनेसूख चुके होठों पऱ तेजी सें जीभ फिरते हुए वो अपने बाएंहाथ सें, गाढ़े वीर्य सें लबालब भरे अपने टट्टों कों भि सहलाने लगा थां।
कहते हें पाप करना औऱ पाप मे भागीदार बनना, दोनो कि एक् सि सजा होती हैं। एक् तरफ वैशाली हैं जौ खुलेआम रसोई केँ भीतरपाप करने मे व्यस्त थि औऱ ठीकउसी वक़्त दूसरी तरफ अभिमन्यु हैं जौ एकांत मे बाथरूम केँ अंदरउसी पापी कृत्य मे लिप्त हैं, सबसे बड़ी समानता ये कि दोनो हि अबोध नहीं बल्कि पूर्ण समझदार पापी हें। मम्मी-बेटे केँ लिएहाथ सें मिलने वालासुख नितांत अनूठा हैं मगर संभोग कि तृप्ति महज हाथों सें मिलने लगे तौ कोई पापी हि क्यूं बने?
"आहऽऽ! इतना आनंद तोँ उसभैन कि लौड़ी सुधा कि कच्छी भि नहींदे पाई थि जितना मज़ा तुम्हारी कच्छी देरही हैं मम्मी। आईएम सॉरी माँ, ओह!आईएम सॉरी" कपकपाती टांगें बीच मे कहीं उसकासंग नाँ छोड़दें इस कारण अभिमन्यु दीवार सें टिक गय़ा थां, रह-रहकर उसकी सुर्ख आँखों मे उसकी मां कि लाल ब्रा केँ भीतरकैद उसके गोल-मटोल अधनंगे मम्मे घूमने लग जाते जिसके प्रभाव सें उसका दायां हाथ औऱ तेजी सें उसके लन्ड कों पीटने लगता।
"मे लाऊँगा तुम्हारे लिएनई ब्रा औऱ कच्छी, उन्ह! उन्ह! तुम् उन्हें पहनोगी नां मां? आहऽऽऽऽ पहनोगी मां, तुम् उन्हें जरुर आहऽऽऽऽऽऽ!" अभिमन्यु कि नीच ख़्वाहिश केँ समर्थन मे तत्काल उसके बेहद सूजे बैंगनी रंगत केँ सुपाड़े नें गाढ़े वीर्य कि लंबी-लंबी फुहार उगलनी शुरुआत कर दि औऱ जोँ तीव्रता सें सीधे सामने कि दीवार सें टकराने लगती हें। उसकी आंखों केँ समक्ष जैसे पलभर कों अंधेरा सां छा गय़ा थां, निचला धड़ एक् मंत्रमुग्ध कर देने वाली ऐंठन सें जकड़ा हुआ औऱ संग हि लगातार लगतेहर झटके पऱ उसके टट्टे पहले सें कहीं ज़्यादा मात्रा वगति सें वीर्योत्सर्जन करने लगते। ग्लानिस्वरुप जोँ वो बार-बार अपनी मम्मी सें माफी मांगे जारहा थां इस मनभावन स्खलन कों पा लेने केँ उपरान्त आरामसे उसकातन औऱ मन दोनो हि शांत होतेजा रहे थें।
ओह! तुम्.तुम् जरूर उन्हें पहनोगी मां" जोरदार हंपाई लेतेहुए अभिमन्यु नें एक् आखिरी नजर अपने अधसिकुड़े लन्ड औऱ उसके घेरे पऱ लिपटी वैशाली कि कच्छी पर्र डाली तोँ अपने आप् उसके चेहरे पर्र पूर्व संतुष्टि केँ भाव उमड़आते हें। कच्छी कि काली रंगत पर्र उसके सफेद वीर्य कि बूंदे उसे चांद पर्र दाग समाननजर आती हें जबकि असलियत मे चांद सफेद औऱ उसपरलगा दाग काला होता हैं।
"हेहे। हाहा.हू हू" अपनी मूर्ख तुलना पऱ अजीब-अजीब आवाजों मे जोर सें हँसता हुआ वो पागल अपने पूरीतरह सें सिकुड़ चुके लन्ड कों अपनेउसी दाएंहाथ सें गोल-गोल घुमते हुए जल्दी नाचना शुरुआत कर देता हैं।
नहा-धोकर धुले कपड़े पहन अभिमन्यु बेझिझक सीधा वैशाली केँ कमरे केँ खुले दरवाजे केँ भीतर प्रवेश कर गय़ा। पलंग कि पुश्त सें अपनासिर टिकाए लेटी उसकी मम्मी केँ माथे पऱ उसके दाएंहाथ कि उलटी कलाईरखी देख, वो अपने चलायमान कदमों कि गति मे परिवर्तन लाया औऱ हौले-हौले कदमों सें ठीक उसकेबगल मे जाकर खड़ा होँ जाता हैं। उसकी मम्मी ख्यालों मे गुम थि, उसके ख्यालों कि गहराई वो इसवजह सें माप गय़ा कि वो उसकेबैड केँ बेहद लगभग खडा़ थां औऱ उसकी मां कों अबतक इसकीभनक तक नहींलग पाई थि।
"मम्मी! मे थोडी़ देर कों बाहर् चला जाऊं, वक्त सें लौट आऊँगा" अभिमन्यु नें ज्यों हि कहा वैशाली चौंकते हुएउठ बैठी, आखिर वो क्यूं नां चौंकती? जिसके दिल मे चोरबसा हौ उसका बात-बेबात चौंकना कोई विशेष बात नहीं औऱ ये भि सत्य थां कि चौंकने सें पूर्व वो अपने बेटे केँ हि ख्यालों मे गुम थि।
क.क्यूं?" वैशाली नें हकलाते हुए पूछाफिन एकाएक अपनी मैक्सी कि अस्त-व्यस्त हालत कों सुधारने मे अपनी हकलाट कों छुपाने लगती हैं।
"कुछ नोट्स लेने हें औऱ बाइक मे पेट्रोल भि भरवाना थां वर्ना कल कॉलेज वक्त सें नहीं पहुँच पाऊंगा" अभिमन्यु नें बताया।
"केसे नोट्स? औऱ पेट्रोल केँ लिए तौ मे तुम्हें करीब-करीब रोज हि पैसे देती हूं। कहीं नहीं जानां, जाओ अपने कमरे मे वापस" वैशाली अपने दाएंहाथ कि प्रथम उंगली कां इशारा कमरे केँ खुले दरवाजे कि ओर करतेहुए क्रोधित स्वर मे बोलि, अब चौंकाने कि बारी उसके बेटे कि थि। फिरभी ये उसका झूठ-मूठ कां गुस्सा थां, वो अभिमन्यु कों जताना चाहती थि कि भले हि उनके रिश्ते केँ बीच अमान्य--सां खुलापन आया थां मगर इसका प्रभाव बेटे कि सजा पऱ जरा सां भि नहीं पड़ा थां।
"कमअॉम मां, मे कोई छोटा बच्चा नहीं जिसे तुम् इस बुरीतरह डांटोगी" अपनी मम्मी कि गुस्स पऱ अभिमन्यु केँ तेवर भि एकदमबदल गए औऱ वो वैशाली कों पुनः चौंका देता हैं।
"सॉरी मम्मी, रियली सॉरी। मे तौ बस हमारे लिए रिजर्वेशन करवाने जारहा थां" उसने पिछले कथन मे जोड़ा, इसबार उसका स्वर शांत थां।
"कैसा रिजर्वेशन? हम् कहां जारहे हें?" वैशाली नें तत्काल पूछा, ये तीसरी बार थां जौ वो लगातार चौंकी थि।
"आज मेरीतरफ सें ट्रीट हैं, पिज्जा हट मे" अभिमन्यु मुस्कुराते हुए बोला औऱ बैड पऱ बैठ जाता हैं।
"ओह! पैसे मिले नहीं कि बर्बादी शुरुआत" बात वैशाली कि समझ मे आते हि वो भि मुस्कुरा उठी, जाने कितना अरसाबीत गय़ा थां जब वो अंतिम बार बाहर् किसी रेस्तरां मे खानां खाने गई।
मे माणिकचंद जी केँ पैसों सें तुम्हें ट्रीट नहींदे रहा, मे तुम्हारे हि पैसों कों तुम्हारे संग शेयर करना चाहता हूं। मेरी पॉकेटमनी हैं पाँच हजार औऱ तुमने लेट इंटरेस्ट लगाकर मुझे दियेसात हजार, तुम् कितनी बड़ी मक्खीचूस होँ मां मे अच्छे सें जानता हूं। ये एक्सट्रा दो हजार तुम्हारे जोड़े हुए पैसे हें औऱ जोँ पता नहीं तुमने मुझे क्यूं देदिए?" अभिमन्यु कुछ मजाक औऱ कुछ प्रेम मिश्रित स्वर मे बोला, जानना तौ वो भि चाहता थां कि हमेशा पाई-पाई जोड़ने वाली उसकी मम्मी नें अपने स्वयं केँ जोड़ेहुए पैसे आखिरउसे क्यूं देदिए।
"इधरआओ, कान मे बताती हूं" वैशाली प्रेमपूर्वक उसे अपनेपास आने कां इशारा करतेहुए बोलीं तोँ जल्दी अभिमन्यु अपना दायां अपनी मां केँ लगभग लेँ आता हैं।
"मेरे पति कि बेज्जती, मेरे हि मुंह पऱ बेशर्म औऱ मे कंजूस। हम्म!" बेटे केँ कान मे कुछ कहने कि बजाए वैशाली उसकाकान मोरोड़ते हुए बोलीं।
"आहऽऽ मां छोड़ोऽऽ" अभिमन्यु दर्द होने कां नाटक करतेहुए कराहा जबकि उसकी मम्मी नें उसकाकान उतना हि मरोड़ा थां जितना वो आहिस्ता सह सकता थां।
"सबकुछ तौ तुम्हारा हि हैं मन्यु। येघऱ, जायजाद, पैसा-रुपया सबकुछ तुम्हारा हैं बेटा" कहकर वैशाली उसके मरोड़े हुएकान कों पटापट चूमने लगती हैं, उसकी उंगलियां हौले-हौले बेटे केँ बालों मे घूमरही थीं।
"औऱ मां तुम्?" अभिमन्यु नें एकाएक अपना चेहरा मोड़ते हुए पूछा, जिसके नतीजतन उसकी मम्मी केँ होंठ उसकेकान सें फिसलते हुए उसके दाएंगाल औऱ होंठों केँ अंत पर्र आकरठहर जाते हें। ये नां बेटे नें जानबूझकर किया थां औऱ नां हि उसकी मम्मी नें, तोँ उतने जल्द दोनो संभल भि नहीं पाते।
कहो नाँ मां, औऱ तुम्?" इसीबीच अभिमन्यु नें पुनः अपना सवाल दोहरा दिया, जिसे पूछते टाइम उसकी गर्म सांस केँ झोंके सीधे वैशाली कि नाक केँ बाएं नथुएे केँ भीतर प्रवेश कर जाते हें।
"वीको वज्रदंती? मीटू" जाने क्यूं औऱ केसे अकस्मात् वैशाली नें स्वयं कों संभाला औऱ अपना चेहरा बेटे केँ चेहरे सें दूर लें जातेहुए बोलि।
"हाहाहा हा" बेडरूम एकसाथ दोनो कि खिलखिलाहट सें गूंज उठता हैं।
"नौटंकी नहीं मम्मी, प्लीज आन्सर मी नां" अभिमन्यु नें अपनी रुकाय नां रूकने वाली हँसी कों जबरन रोकने कि कोशिश करतेहुए कहा, मानो जैसेकोई जिद पकड़ गय़ा होँ। कुछदेर तक तोँ वैशाली अपनेपेट पर्र हाथरखे जोरों सें हँसती रहीमगर जब अचानक हि उसके बेटे नें हँसना बंदकर दिया, वो खुद उसकी आँखों मे झांकने लगती हैं।
"जवाबदो मां, औऱ तुम्?" अभिमन्यु कां वही सवाल जारी थां। अपनापेट पकड़कर हँसने केँ कारण वैशाली कि आँखें नम हौ गई थि औऱ उसके खुलेबात तितर-बितर होने सें उनकीकुछ लटें उसके चेहरे पऱ भि लटकआई थीं। अभिमन्यु कों तौ जैसे सांप सूंघ गय़ा, वो अपलकबस अपनी मां केँ अक्लपनीय सौन्दर्य कों हि घूरने लगा थां। उसकी मम्मी उसे सुंदरता कि मूरत हि नहीं बल्कि साक्षात कामदेवी नजरआने लगी थि औऱ ज्यों हि उसकी मां नें अपने बालों कि एक् लंबीलट अपने चेहरे केँ बाएंभाग सें हटाई, घबराकर वो झटके सें अपना दायां हाथ सीधे अपने धड़कना भूलगए दिल पऱ रख देता हैं।
"मे.अम्मऽऽ" अपने बेटे कि तात्कालिक स्थिति कि प्रत्यक्ष गवाह वैशाली कि अधेड़ आँखें बिन बोले हि सबकुछ समझ गई थीं औऱ मुस्कुराकर वो भि अपना दायां हाथ अपनेदिल पऱ रख लेती हैं।
"हाँ मम्मी तुम्?" दिल मे उठे दर्द सें बेहाल अभिमन्यु नें अब भि हार नहीं मानी थि, अत्यंत जल्दी पूछता हैं। अपने बेटे कि उत्सुकता नें वैशाली कों अंदर तक हिलाकर रख दिया थां पऱ वो परिपक्व औरत अपने अंतर्मन कां हाल अपने चेहरे पऱ कतई नहींआने देती। एकपल कों उसने सोचा क्यूं नाँ बेटे कों वही सुनादे जिसे सुनने कों वो इतना बेकरार थां मगर चाहकर भि वो स्वयं कों तोड़ नहीं पाती।
"मे हूं अपने पति माणिकचंद जी कि" कहकर एक् बारफिन सें वैशाली नें हँसना शुरुआत कर दिया औऱ टूटेदिल केँ संतोष केँ संग अभिमन्यु भि झूठी हँसी हँसने लगता हैं। उसकी मम्मी नें कुछगलत कहां कहा, वो सचमुच अपने पति कि हि तौ थि औऱ ऐसा सोचकर वो तेजी सें खाट सें नीचेउतर जाता हैं।
"तुम् रेडी रहना मम्मी, मे घंटेभर मे आँ जाऊंगा" कहकर अभिमन्यु बिना अपनी मम्मी केँ चेहरे कों देखे उसके बेडरूम सें बाहर् निकल जाता हैं, वो जानता थां कि यदिकुछ लम्हा औऱ वो वहा रुकता तौ पक्का रो देता। शायदयही सोचकर वैशाली नें भि उसे नहीं रोका वर्ना उसका बेटा जरूर उसकी आखों सें झर-झर बहनेलगे आँसुओं कों देख लेता।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
घऱ केँ मुख्य द्वारा सें बाहर् निकलकर अभिमन्यु सीधे अपनी बाइक केँ पास पहुंचा औऱ उसपरबैठ क्षणिक पलों तक कुछ सोचने-विचारने मे लगा रहता हैं, उसके दोनोहाथ उसकीसोच केँ संग हि हिलने-डुलने लगे थें जैसे उसकीसोच सें मूक वार्तालाप कररहे हों।
"हम्म!ये मस्त रहेगा, बिलकुल ठीक। हाँ यही मस्त रहेगा" वो अचानक सें बड़बडा़या औऱ सहसा उसके मायूस चेहरे पर्र पुनः मुस्कान लौटआती हैं। तत्पश्चात उसने बाइक दौड़ा दि, यकीनन उसकीसोच पूरी होँ चुकी थि।
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अपने बेडरूम केँ बैड पऱ बैठी वैशाली बहुतदेर तक अपने आँसुऔं मे ड़ूबी रही, उसे इसबात पर्र रोना नहीं आँ रहा थां कि उसने अभिमन्यु कि चाह कों अपना समर्थन नहीं दिया थां बल्कि वो इसलिये दुखी थि कि पलभर मे केसे एक् बेटा अपनीसगी मम्मी कि ओर इतनी गम्भीरता सें आकर्षित हौ गय़ा थां? स्त्रियां तौ ऐसेलघु आकर्षणों पर्र फूली नहीं समातीं, काश! कि वो मात्र एक् महिला हि होती तौ कितना अच्छा होतामगर औरत होने केँ संग-संग एक् विवाहित मां होने कां भि गौरवउसे प्राप्त थां औऱ ऐसे मे उसका बेटा चाहे कितना भि ज़्यादा उसकीओर आकर्षित होँ जाता, रहता तोँ वो एक् पराया मर्द हि।
"मां भि तुम्हारी हैं अभिमन्यु क्योंकि वो भि इसघऱ कि जायजाद मे शामिल हैं औऱ जिसके इकलौते वारिस तुम् हि होँ बेटा, केवल तुम् हि होँ" स्वयं सें ऐसा बारम्बार कहतेहुए वैशाली तत्काल अपने आँसुओं केँ पोंछ लेती हैं, निश्चित उसके शब्दों सें उसके ममतामयी दिल कां वो बोझकम होनेलगा थां कि जाने-अंजाने जिंदगी मे पहलीबार उसनेखुद अपने बेटे कां दिल तोड़ा थां।
चेहरे पर्र टूटी-फूटी मुस्कान लिए वैशाली जल्दी खाट सें नीचे उतरी औऱ सर्वप्रथम उसनेघऱ केँ मुख्य दरवाज़ा कों लॉक किया, फिन वापस अपने बेडरूम मे लौटकर सीधे अटैच बाथरूम केँ भीतरघुस जाती हैं। अभिमन्यु नें उसे रेडी रहने कों कहा थां औऱ पिछला आधा घंटा वो अपनीसोच मे हि बिता चुकी थि। अच्छे सें मुंहहाथ धोकर वो अपने
वार्डरोब मे भरी पड़ी साड़ियों मे सें अपनी सबसे पसंदीदा साड़ी कां चुनाव करने लगती हैं औऱ जल्द हि उसनेउस मेहरुन रंगत कि साड़ी कों चुन लिया जिसे बीते मदर्स डे पऱ उसे उसकी बेटी अनुभा नें तोहफे मे दिया थां।
"ओह हौ! इस साड़ी कां पेटीकोट तोँ मैच हि नहीं होँ रहा औऱ फिन पहनने कों साफ-सुथरी कच्छी भि तौ नहींबची" वैशाली पेटीकोट कां रंग साड़ी केँ रंग सें हल्का पाकर मायूसी सें बुदबुदाई, उसने सहसागौर किया कि केसेअब वो 'कच्छी' जैसे देशी शब्द कां स्वतः हि उच्चारण करनेलगी थि। शर्माते हुए पेटीकोट कों खाट पऱ फेंक उसने मैक्सी अपने गदराए जिस्म सें अलगकर दि औऱ ड्रेसिंग टेबल केँ सामने जाकर खडी़ होँ जाती हैं।
जिंदगी मे दूसरी बारउसे अपने शरीर मे एक् अजीब-सां बदलाव नजर आँ रहा थां, ठीक वैसा बदलाव जैसा उसने अपनी बीती जवानी मे महसूस किया थां जब वो अपने कुंवारेपन सें मुक्त होने कों समय-समय तड़पा करती थि। आज पुनःउसी तड़प सें उसका सम्पूर्ण शरीरटूट रहा हैं, उस बेचैनी केँ टूटने कि इंतज़ार मे आजफिन उसका अंग-अंग बिनछुए हि फड़कने लगा हैं मानो किसी जवान, बलिष्ठ मर्द केँ नीचेदब जाने कि उसकी ख़्वाहिश दोबारा जीवंत हौ गई होँ जिस ख़्वाहिश केँ तहत उसनेकभी अपने भावी पति कि कल्पना कि थि।
कांच मे अपने अक्स कों देख वो अपने बाएंहाथ कि उंगलियां ब्रा केँ भीतरकैद अपने गोल-मटोल स्तन केँ ऊपरी फुलाव पर्र घुमाने लगती हैं, उसे तत्काल वो क्षणयाद आँ गय़ा जब डाइनिंग टेबल पऱ बैठा अभिमन्यु कितनी बेशर्मी केँ संग उसके स्तन केँ इसी फुलाव कों खा जाने वाली नजरे घूरेजा रहा थां।
"मां केँ बूब्ज़ पऱ बेटे कां हक नहीं होगा तोँ क्याँ किसी माणिकचंद कां होगा?" स्वयं केँ हि प्रश्न पर्र वैशाली हँसने लगी, अपने दोनोहाथ पीठ पऱ लें जाकर उसने अपनी ब्रा कां हुकखोल दिखा औऱ उसे हाथों सें बाहर् निकाल बैड पऱ उछाल देती हैं।
ऐसेमत ताड़बिच, अब तेरी हि बारी हैं" कांच मे देखते हुए वो अपने शरीर पऱ बचे अंतिम वस्त्र, अपनी कच्छी सें बोलि औऱ बड़ीअदा केँ संग जल्दी उसे सकराकर नीचे फर्श पर्र गिरने केँ लिएछोड़ दिया।
"बेशर्म निगोड़ी तुँ हैं मेरा मन्यु नहीं, मरोड़ना तेरी चाहिए उस बेचारे कां कान नहीं। पूरेदिन सें बहरही हैं, मेरी तीनो कच्छियों कों गंदाकर डाला। अब क्याँ पहनूं पेटीकोट केँ नीचे? तेरे कारणआज पहलीबार मुझे बिना कच्छी पहनेघऱ कि चौखट केँ बाहर् कदम रखना पड़ेगा" अपने अश्लील कथन अनुसार हि वैशाली नें अपने दाएंहाथ केँ अंगूठे औऱ प्रथम उंगली केँ बीच दिनभर सें निरंतर रिसरही अपनी चिपचिपी बुर केँ दोनो स्पंदनशील होंठ एकसाथ भींचलिए औऱ सिसियाते हुए बलपूर्वक उन्हें मरोड़ने लगती हैं, मानो सत्यता मे हि उन्हें सजादे रही हौ। उसकी कामुक हँसी कां तोँ कोई पारावार शेष नां थां, किसी भयानक मनोविकार सें ग्रस्त पागल कि भांति लगातार खिखियाते हुए पूरे जोशो-खरोश सें वो अपनी बुर केँ अत्यंत खूबसूरत मुख कों तीव्रता सें उमेठे जारही थि।
"उन्ह! उन्ह! तेरी गलती भि नहीं मुनिया। हाय! रो-रोकर तुँ.तुँ तौ बस अपनी स्वभाविक चाहजता रही हैं, गूंगी जौ हैं ठहरी। उन्ह!बोल नहीं सकती नाँ कि तेरी एक् मोटे औऱ लंबे--सें लन्ड सें चुदने कि ख़्वाहिश हैं मगर किसके लन्ड सें? तेरा मालिक माणिचंद तोँ यहा हैं नहीं, फिन किसके? बोल!बोल! किसके?" जोँ विध्वंशक, पापी शब्दउस मर्यादित मम्मी नें अपने सम्पूर्ण बीते जिंदगी मे कभी अपने होंठों पऱ नहींआने दिए थें, सहसा उनके एकाएक मुंह सें बाहर् आते हि वैशाली अपने बाएंहाथ केँ अंगूठे औऱ प्रथम उंगली केँ बीच अपने वास्तविक होंठों भि कसकर जकड़ लेती हैं। ये सोचकर कि अब उसकेऔरत बदन केँ वो दोनो मुख्य अंग उसनेहर संभवतरह सें दबादिए हें हमेशा जिनके हि कारणये धरती अनगिनत बार लहुलुहान हुइ थि, मगरमन कां क्याँ? वो तौ पूर्व स्वतंत्र हैं।
आहऽऽ! अभिऽऽमन्युऽऽऽऽ" अपने चंचलमन केँ हाथों विवश सचमुच पापी बनने कों उत्सुक, चुदाई कि प्यासी वो अत्यंत कामलुलोप मां दिन मे तीसरी बार अपनेसगे बेटे केँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष स्मरण केवल सें हि स्खलित होने लगती हैं।
कहते हें कि पहलीबार कोई पापी कृत्य करने केँ उपरान्त मनुष्य ग्लानी भाव सें तड़प उठता हैं, दूसरी बार मे उसकी ग्लानी कुछकम हौ जाती हैं औऱ जब वो बारम्बार पाप करने कां आदि हौ जाएतब उसके भीतर किसी भि प्रकार कि कोई ग्लानी शेष नहीं रहती। अपनी कच्छी सें अपनी स्खलित बुर कां गाढ़ा रस पोंछते हुए वैशाली कां मन-मस्तिष्क बेहद शांत थां बजाए इसके कि वो रोए, दुखी हौ; वो पूर्णरूप सें संतुष्ट, निश्चिंत बिलकुल मस्त मलंग थि।
धुली ब्रा, ब्लाउज औऱ बिना कच्छी केँ पेटीकोट पहनकर वैशाली अपनीनई महरुन साड़ी भि पहन चुकी थि, पेटीकोट कां हल्का रंग साड़ी कों एक् नयाव बहुत शानदार फेन्सी लुकदे रहा थां। अपने प्राकृतिक हसीन चेहरे केँ श्रृंगार केँ नाम पऱ ज्यादातर वो काजल औऱ मैचिंग लिपस्टिक कां हि प्रयोग करती थि, अपनी अत्याकर्शक बड़ी-बड़ी आँखों मे काजल लगाकर उसने मूंगिया रंगत केँ अपनेभरे हुए होंठ गहरे महरुन रंग कि लिपस्टिक सें रंगलिए। तत्पश्चात वार्डरोब केँ लॉकर सें उसने अपनेउन गहनों कां बॉक्स बाहर् निकाला जिन्हें उसने अपनी बेटी अनुभा कि विवाह मे खुद केँ लिए बनवाया थां, खैर अधिककुछ उस बॉक्स मे नहीं थां, मणिक कि आर्थिक हालत कों देख एक् जिम्मेदार पत्नि होने कां फर्ज निभाते हुए उसने महिला मोह कि मुख्य वस्तु कां सिरे सें त्याग कर दिया थां। पूर्व सें अपनी दायीं नाक केँ नथुए मे जड़ी लौंग कि स्थान उसने उसमे सोने कां छल्ला पहन लिया, अपने कानों केँ टॉप्स बदलकर सोने कि लटकनदार बालियां भि धारणकर लीं, शायद इसलिये क्योंकि ये छल्ला औऱ बालियां अभिमन्यु केँ विशेष आग्रह पर्र उसने बनवाए थें। पूरीतरह सें रेडी होकर एक् नजर कांच मे स्वयं कों निहारने केँ उपरान्त उसने अपनी मैक्सी व अन्य कपड़ो कों यथोचित जगह पर्र रख दिया औऱ बेडरूम सें बाहर् निकल जाती हैं।
वैशाली कों हॉल केँ सोफे पऱ बेठे-बैठे तयशुदा टाइम सें पैंतालीस मिनट अधिकबीत चुके थें मगर अभिमन्यु अबतक नहीं लौटा थां नाँ हि देरी होने केँ संबंध मे उसकाकोई मोबाइल आया थां औऱ वो स्वयं अपने बेटे कों कॉलआई करना नहीं चाहती थि। वो नहीं चाहती थि कि अभिमन्यु अपनी मां कि बेसब्री कां ज्ञाता हौ जाए, वो जान नां लें कि उसकी मां उसकेसंग ट्रीट पर्र जाने केँ लिएमरी जारही थि।
पैंतालीस मिनट सें एक् घंटा औऱ होते-होते ढ़ाई घंटेबीत गए पर्र अभिमन्यु कि वापसी केँ विषय मे उसेकुछ भि पता नहींचल पाया थां। लम्हा-समय दीवार घड़ी कों ताकती वैशाली कि नम आँखें नां जाने कितनी बारबह जाने कि कगार पऱ पहुँच चुकीथीं मगर एक् आस कि उसका बेटा उसे ट्रीट पऱ जरूर लें जाएगा औऱ कहीं आँसू बहकर उसकीआँख केँ काजल कों धो नां दें, वो जरा भि नहींरोई थि मगर उसका धैर्य अब जवाब देनेलगा थां। अपने बेटे कि रश ड्राइविंग कि जानकर वो मम्मी अकस्मात घड़ी सें अपनीनजर हटाकर सामने कि टेबल पर्र रखे अपनेफोन कों घूरने लगी।
"तुँ तौ ऐसेकर रही हैं जैसेये कोई आम--सि ट्रीट नहीं बल्कि तेरी पहलीडेट होँ" अपनीसोच केँ समर्थन मे फीकी हँसी हँसते हुए वैशाली नें तत्काल कपड़े बदल लेने कां निश्चय किया, चूंकि उसकादिल भि खट्टा हौ चुका थां औऱ आगामी प्रतीक्षा उसकी सहनशक्ति सें बाहर् थां मगर अपने बेडरूम मे जाने सें पहले वो एकबार अभिमन्यु सें बात ज़रूर करना चाहती थि ताकिजान सके कि ऐसा कौन--सां जरूरी कामआन पड़ा थां जोँ वो अपनी मां सें झूठ बोलकर घऱ सें बाहर् गय़ा थां। उसेये चिंता भि थि कि कहीं वो किसी मुसीबत मे नाँ पड़ गय़ा होँ, उसने टेबल सें अपनाफोन उठाया औऱ बेटे कां नम्बर डायलकर देती हैं।
सॉरी! सॉरी! सॉरी! सॉरी!बस दो मिनट, बस दो मिनट" पहली हि घंटी मे कॉलआई रिसीव की कर अभिमन्यु नें बिना हैलो बोले सीधे माफी मांगनी शुरुआत कर दि औऱ फिन जल्दी फोनकट भि कर देता हैं। करीब-करीब दस मिनटबाद घऱ कि बैलबजी तौ वैशाली झूठे गुस्सा केँ संग दरवाजे कि ओरबढ़ गई, जबकि सत्य तोँ ये थां कि एकाएक उसका रोम-रोम खिलउठा थां।
"मे खानां बनाने जारही हूं" बेटे केँ हॉल मे प्रवेश करते हि वैशाली गुस्से सें बोलीं औऱ मुड़कर रसोई कि दिशा मे चलनेलगी।
"मम्मी मे इस तोहफा कि तलाश मे लेट हौ गय़ा। आईएम सॉरी, माफ करदो प्लीज" अपनी मां केँ गुस्सा कों समझ अभिमन्यु उसे रोकते हुए बोला।
"कैसा तोहफा? औऱ किसके लिए?" क्षणिक वक़्त भि नहीं बीता कि वैशाली नें झटके सें पलटते हुए पूछा, अभिमन्यु भि तबतक उसके लगभग आँ चुका थां।
"अरोजफॉर द मोस्ट ब्यूटिफुल एण्ड केयरिंग मदरअॉफ दिस वर्ल्ड" वो जल्दी अपने घुटनों पऱ बैठते हुए बोला, अपने दोनो हाथों मे पकड़ा लाल गुलाब उसने अपनी मां कि ओर बढ़ा दिया थां।
"इसकी। तलाश मे तुम्हें पूरे साढ़े तीन घंटेलग गए?" वैशाली कां नकली गुस्स जारी थां, गुलाब कों अपनेहाथ मे लेने कि बजाय वो अपने दोनोहाथ कैंची केँ आकार मे ढ़ालकर उन्हें अपनी अपनी छाती केँ ऊपर रखतेहुए पूछती हैं।
"ऐसा हैं औऱ नहीं भि मां, गुलाब तुम्हारी टक्कर कां मिलसके इसी कारण मुझे देरी होँ गई। वैसे एक् औऱ तोहफा भि लिया हैं मैंने" अभिमन्यु बेहद शरारती अंदाज मे बोला, अपनी मम्मी केँ भीतरआए बदलाव कों समझने मे अब वो बहुत तेजी सें परिपक्व होताजा रहा थां।
अपनी मम्मी कि टक्कर कां, हुंह! लज्जा करो लज्जा पाखंडी कहीं केँ" वैशाली तुनकते हुए बोलि तभी सहसा उसकीनजर उसके बेटे केँ बगल सें नीचे फर्श पर्र रखे पॉलीबैग पर्र पड़ी, जिसपर भूल सें पहले उसनेगौर नहींकर पाया थां।
"उसमें क्याँ हैं मन्यु?" उसने जल्दी उत्सुकता सें पूछा।
"लड़कियों कि यही गंदीआदत मुझे बिलकुल अच्छी नहीं लगती माँ, तोहफा मे भि हमेशा साइज कों हि प्रिफ्रेंस देती हैं" अभिमन्यु मायूसी सें भरतेहुए बोला, वो जानबूझकर अपनी मां कों एक् लड़की कि संज्ञा देता हैं औऱ जिसका प्रभाव भि उसने जल्दी देखा, उसकी मम्मी सचमुच किसी नवयुवती कि भांति चहकउठी थि।
"तुम् जैसे लफंगों कों मे अच्छी तरह सें जानती हूं जिन्हें बात-बात पर्र बात निकालना आता हैं। लाओइसे मुझेदो औऱ अगर तुम्हारी नौटंकी ख़त्म होँ गई हौ तौ मे अब जाऊँ रसोई मे" वैशाली गुलाब कों छीनते हुए बोलि, खैर थां तौ ये उसका नाटक सिर्फ। जिंदगी मे पहलीबार किसी मर्द नें उसे अपने घुटनो पऱ बैठते हुए गुलाब भेंट किया थां औऱ जिसके नतीजन भीतर हि भीतर उसकी प्रसन्नता कां कोई पारावार शेष नां थां। एकाएक वो गुलाब कि सुगंध सूंघने केँ लिएउसे अपनीनाक केँ लगभग लेँ जानेलगी मगर ज्यों हि अभिमन्यु सें उसकी नजरें टकराईं, वो अपनेहाथ कों तीव्रता सें वापस नीचे लें आती हैं।
"इतना प्रतीक्षा तौ कभी मुझे तुम्हारे पिताजी नें भि नहीं करवाया औऱ तुम्हारी चिंता सें घिरीरही सोअलग" वो पिछले कथन मे जोड़ती हैं। अभिमन्यु कों अपनी मम्मी केँ मुंह सें जौ विशेष बात सुनने कि चाह थि, वो चाह अपने-आप् वैशाली नें पूरीकर दि थि।
"चलोठीक हैं, गुलाब केँ लिए धन्यवाद नहींकहा तौ कोईबात नहींमगर ये दूसरा उपहार मेरेदिल केँ बेहद लगभग हैं माँ" पॉलीबैग कों पकड़कर अभिमन्यु फर्श सें खड़ा होँ जाता हैं, उसने अपने प्रेम भरे शब्दों सें वैशाली कि उत्सुकता कों बहुत ज्यादा बढ़ा दिया थां।
पहले तुम् बेशर्म थें, फिन पाखंडी, लफंगे औऱ अब आशिकाना अंदाज मे बात करनेलगे हौ, जरूरइस पॉलीबैग मे कुछ तोँ अजीब हैं" कहकर वैशाली पॉलढीबैग कों घूरकर देखने लगीमगर उसकारंग गहरा नीला थां तोँ वो कोईखास अनुमान नहींलगा पाती हैं।
"स्वयं हि देखलो इसमेऐसा क्याँ हैं माँ जौ तुम्हारे बेटे केँ दिल केँ इतना लगभग हैं" करीब-करीब अपने पिछले कथन कों हि पुनः दोहराते हुए अभिमन्यु पॉलीबैग अपनी मम्मी केँ सुपुर्द कर देता हैं औऱ उसकेहाथ सें गुलाब स्वयं नें लेँ लिया। वैशाली पहले पॉलबैग कों ऊपर सें टटोलने लगी, उसके हल्के वजन सें उसे अहसास हुआ जैसे उसके भीतरकोई वस्त्र थां। साड़ी कां विचार मन मे आते हि वो तत्काल उसे नकार देती हैं क्योंकि साडी़ पहनने वालीहर औरत कों उसके विषय मे बारीक सें बारीक जानकारी रहती हैं। फिन इसमे क्याँ होँ सकता हैं? वो अपने हि प्रश्न पऱ थोड़ा झल्ला सि गई औऱ अंततः पॉलीबैग कां मुंह खोलकर उसके भीतर झांकने लगती हैं।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी – New Episode
नहीं! नहीं! नहीं! नहीं!ये नहीं, बिलकुल.ये बिलकुल नहीं मन्यु" पॉलीबैग केँ भीतर झांकते हि वैशाली मानो उछल--सि पड़ती हैं औऱ जल्दी पॉलीबैग केँ खुले मुंह कों उसने करीब चीखते हुएबंद कर दिया थां।
"तुमने दिन मे कहा थां कि तुम्हारी ब्रा औऱ क.क्च.कच्छियों कों पहनने मे तुम्हें दिक्कत होती हैं, कुछ साइज इश्यू केँ बारे मे बताया थां तुमने" अभिमन्यु पूरा साहस जुटाते हुए कहता हैं पर्र फिन भि 'कच्छी' शब्द कां उच्चारण करने मे वो हल्का--सां हकला हि जाता हैं। चलो एक् बात कि तसल्ली तौ उसे जरूर हुई थि कि उसकी मम्मी नें एकाएक उसे थप्पड़ नहीं मारा वर्ना संसार कि ऐसीकौन सि मम्मी होगी जोँ बेटे द्वारा तोहफे मे दिएगए अंतर्वस्त्रों कों हँसकर कबूलकर लें।
"उससे तुम्हें कोई मतलब नहीं होना चाहिए अभिमन्यु" वैशाली अपनेपेट मे एकदम सें उठनी शुरुआत हुई मरूढ़ कों दबाते हुए बोलीं। वो सकते मे तौ थि मगर जाने क्यूं अंदरूनी तौर पर्र उसे जरा--सां भि गुस्सा नहीं आँ रहा थां, कोई ग्लानी महसूस नहीं औऱ नाँ हि भय, घबराहट याँ झिझक कां कोई अतिरिक्त अहसास। यकीनन ये उसके लगातार तीनबार प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप सें अपने हि सगे बेटे केँ बारे मे सोचते हुए मुट्ठ मारने कां भीषण परिणाम थां जोँ अनाचार कि ओर तेजी सें अग्रसित होतीजा रहीउस मम्मी केँ भीतर सिवाय लज्जा केवल केँ कोई अन्यभाव बिलकुल उत्पन्न नहीं हौ रहा थां।
"अगर मेरा वाकई उससेकोई मतलब नहीं होता तौ तुम् मुझसे ऐसाझूठ कभी नहीं बोलती" अपनी मम्मी कि ओर सें मिले सकारात्मक संकेत कों महसूस कर अभिमन्यु दुष्ट हँसी हँसते हुए बोला। जाने कितने अरसेबाद उसकी मम्मी नें अपनीनाक औऱ कान मे अपने बेटे केँ सबसे पसंदीदा आभूषण पहने थें जिन पर्र सें अपनी नजरें हटा पाना उसकेबस सें बाहर् हौ चला थां।
कैसाझूठ? म.मे क्यूं बोलने लगी तुमसे झूठ" वैशाली हकलाते हुए पूछती हैं, जितनी हैरतउसे बेटे केँ इस अश्लील तोहफे पऱ नहीं हुईँ थि उससे कहीं ज़्यादा वो उसकेकथन कों सुनकर चौंक पड़ी थि।
"मे उसी साइज कि ब्रा औऱ कच्छी केँ तीनसेट खरीदकर लाया हूं मम्मी जिस साइज केँ फिलहाल तुम् पहनरही हौ। तुम्हें तौ झूठ बोल्ना नहींआता मम्मी" अभिमन्यु जल्दी उसेआँख मारते हुए बोला, अब वो पूरीतरह सें भय मुक्त हौ चुका थां।
"तुम् जैसे बेशर्म लोगों कि सबसेखास बातयही हैं मन्यु कि वो बात-बात पर्र बात पकड़ते हें। अभि इसी वक़्त जाओ औऱ इन्हें वापस करकेआओ, अपनी मां कों उसका बेटा इसतरह कां गंदा तोहफा कभी नहीं दिया करता" अपनी चोरी पकड़ी जाने पऱ वैशाली लाज सें दोहरी होती हुईँ बोलीं औऱ पॉलीबैग जल्दी बेटे कि ओर बढ़ा देती हैं।
"मम्मी अबयह रिटर्न नहीं होंगे, डायरेक्ट एनामोर केँ आउटलेट सें लाया हूं" अभिमन्यु नें बताया।
"एनामोर? इतनी ब्रांडेड कंपनी? कहीं तुमने सारे पैसे तौ खर्च नहींकर दिए?फिन पॉलीबैग क्यूं बदला?" वैशाली नें एकसाथ कई सवालों कि झड़ी लगाते हुए पूछा। वो इस महंगे ब्रांड सें तब परिचित हुइ थि जब अनुभा नें अपने ससुराल जाने सें पहले अपनेनये अंडरगारमेंट्स एनामोर सें हि खरीदे थें, वो अपनी बेटी केँ संगवहा मौजूद थि औऱ केवलचार सेट कां कैश मेमो करीब साढ़े आठ हजार कां बना थां वर्ना इससे पहले दोनो मां-बेटी कोई भि सस्ते अंडरगारमेंट्स पहन लिया करतीथीं जैसे मिडिल क्लास कि हर महिला पहनती हैं।
तुम्हें बिलीव नहीं होगा मां, आउटलेट मे बायटू गैटवन फ्री कां अॉफरचल रहा थां औऱ उसमे भि थर्टीफाइव परसेंट अॉफ थां। तीनसेट मात्र ट्वेंटी सेवन हंड्रेड मे, हैं नाँ कूल? औऱ हाँ मैंने पॉलीबैग इसलिये बदला ताकि एकदम सें तुम्हारी मार नां खा जाऊँ औऱ फिनये जालिम समाज, ये मल्टी वाले मुझे बेशर्म नहीं समझते जोँ मे अपनी हि मम्मी केँ लिए ब्रा-कच्छी खरीदकर लें लें जारहा थां" कहते वक़्त अभिमन्यु कि शैतानी अदा देखने लायक थि, उसका अपने दांत बाहर् निकालकर बेहूदगी सें खिखियाना उसकी मम्मी कों हया सें गड़ा देता हैं। उसने एक् नजरऊपर सें नीचे तक बेटे कों देखा औऱ पाया कि उसकी जींस केँ भीतरकैद उसका लन्ड पूरी कठोरता सें तनकर खड़ा होँ चुका थां, जिसके नतीजतन उसकी जींस केँ ऊपर एक् बड़े--सें तम्बू कां निर्माण होँ गय़ा थां।
वैशाली क्षणभर मे कांपउठी, पहलीबार प्रत्यक्ष वो अभिमन्यु केँ खड़े लन्ड कों इतने नजदीक सें देखरही थि। भले हि उसके बेटे कां लन्ड अभि उसकी जींस केँ भीतर छुपाहुआ थां मगरफिन भि अपने पूर्णविकसित आकार सें उसने, अपने पति सें तिरस्कृत चुदाई कि इच्छुक उस कुंठित मम्मी कों जल्दी सिरहन सें भर दिया थां। दिन मे तीनबार स्खलित होँ चुकने केँ बावजूद एकाएक वो अपनी बुर मे एक् औऱ नई बेचैनी महसूस करने कों विवश हौ जाती हैं। उसे अपनी स्वयं कि स्थिति बहोत दयनीय नजरआने लगीजब वो चाहकर भि अपनी आश्चर्य सें फट पड़ी आँखें अपने बेटे कि जींस केँ तम्बू सें हटा नहीं पाती।
"कुछ भि हौ मन्यु तुम्हारी मम्मी होने केँ नाते मे तुम्हारे इस तोहफे कों नहीं लेँ सकती औऱ रिटर्न ये होगा नहीं। अब एक् हि मार्ग बचा हैं कि इसे मे अपनी होनेवाली बहू केँ लिए संभालकर रखलूं, ताकि अभि नहीं तौ कम सें कम फ्यूचर मे इसकायूज हौ जाए" एकसाथ सरम, क्रोध, निराशा औऱ अनियंत्रित कमुत्तेजना सें अभिभूत वैशाली नें जैसे-तैसे अपने बेटे केँ तम्बू सें चिपकी अपनीनीच नजरों कों हटाते हुएकहा औऱ तीव्रता सें पलटकर अपने बेडरूम कि ओरचल देती हैं।
माँ इफ मेरी वाइफ कां जिस्म तुम्हारे शरीर कि तरह। वो क्याँ कहते हैं? हाँ छरहरा नहींहुआ तोँ" कहतेहुए अभिमन्यु भि अपनी मां केँ पीछे चलने लगता हैं।
"प्लीज मां इकसेप्ट करलो नाँ मेरे तोहफा कों, कितने प्रेम सें लाया हूं" वैशाली केँ उसे ध्यान नां देने केँ बावजूद वो बोलता रहा।
"रुको तोँ मां, अच्छा हम् इस सब्जेक्ट पऱ बैठकर बात करें?" उसने चलते-चलते पूछा, दोनो मम्मी-बेटे बेडरूम केँ अंदर प्रवेश कर चुके थें।
"मम्मी आई रियली लवयू, बहोत प्रेम करता हूं तुमसे। मेरीकोई गर्लफ्रेंड नहीं हैं, पहलीबार किसी लड़की कों उपहार देरहा हूं। अब इसमे मेरा क्याँ फॉल्ट कि तुम् मेरी मां हौ, मेरी फीलिंग्स कों कम सें कमऐसे तोँ न् तोड़ो। प्लीज माँ प्लीज" अभिमन्यु खाट केँ पास पहुँचकर रुक जाता हैं, वैशाली अपना वार्डरोब खोल चुकी थि मगर जाने क्यूं वो पॉलीबैग शेल्फ मे रख नहीं पाती। अपने बेटे केँ मुंह सें ऐसी मार्मिक बातें सुनना उसे अच्छा नहींलगा थां, ये ज़रूर थां कि स्वयं केँ लिए अभिमन्यु केँ प्रेम कों वो बरसों सें देखती आँ रही थि औऱ अब सें थोड़ीदेर पहले उसने उसकी आँखों मे खुद केँ लिए एक् मर्द रूपी प्रेम भि साफ महसूस किया थां जब वो उसके लगातार एक् हि सवाल पऱ अटके रहने केँ उपरान्त उसे अपना सच्चा जवाब देने कि वजह सें रोनेलगी थि।
"तुम् झूठे हौ मन्यु। अगर तुम्हारी गर्लफ्रेंड नहीं तोँ तुम् वर्जिन क्यूं नहीं होँ?" बिना अपना चेहरा घुमाए वैशाली नें उससे पूछा, उसे मालूम थां कि ऐसी उलझी परिस्थिति मे उसके बेटे कि निजता कों भंग करता उसकाये प्रश्न बिलकुल उचित नहीं ठहराया जा सकतामगर सत्य जानने कि ख़्वाहिश केँ हाथों मजबूर वो पूछ हि लेती हैं।
प्रॉस्टिटूट" अभिमन्यु हौले सें फुसफुसाया, जवाब देते टाइम एकपल कों भि उसने अपने जवाब कि निकृष्टता पऱ विचार नहीं किया थां।
"वॉट!" वैशाली चौंकते हुए अत्यंत जल्दी उसकीओर पलट जाती हैं।
"मे स्वयं कों संभाल नहींपा रहा थां माँ औऱ अगर मुझे किसी स्त्री केँ बदन कां सहारा नहीं मिलता तौ मानो याँ नां मानो, मे पागल हौ जाता। इसकेबाद मे कईबार उसगलत स्थान पऱ गय़ा औऱ आगे भि स्वयं कों रोक नहीं पाऊंगा" कहकर अभिमन्यु पलंग पर्र बैठ गहरी-गहरी सांसें लेने लगता हैं, उसकासिर लज्जा सें नीचेझुक गय़ा थां। अपने दूसरे पहलू कों अपनी मां केँ संग सांझा करने केँ बादउसे ऐसे विचार आनेलगे थें कि काश अपने आप् उसकादिल धड़कना बंदकर दे औऱ वो अपनेइस अजीब सें पागलपन सें पूरीतरह मुक्त हौ जाए।
"ऐसे स्टाइलिश अंडरगारमेंट्स मैंने आज तक नहीं पहने मन्यु" वैशाली नें उसके लगभगआते हुएकहा, पॉलीबैग भि उसकेहाथ मे मौजूद थां।
"तुम्हारे कन्फेशन पऱ हम् जरूरबात करेंगे पऱ पहलेये बताओ कि कच्छी कां कलर तुम् सिलेक्ट करोगे याँ मे करूँ?" उसने अभिमन्यु केँ कंधे कों थपथपा कर पूछा, ये उसके बेटे कि ईमानदारी कां नतीजा थां जौ वो एकबार फिन सें पिघल गई थि।
कहो जल्दकहो फिन तुम् मुझे ट्रीट पऱ भि तौ लें जाओगे औऱ बिना कच्छी पहने मे इसघऱ सें बाहर् जाऊंगी नहीं" अपनेकथन कों पूरा करते हि वो पॉलीबैग कों बैड पऱ उलट देती हैं।
"मे मुंह धोकरआता हूं, तुम् हॉल मे रेडी मिलना मम्मी" अभिमन्यु खाट सें उठतेहुए बोला, वो अपनी मम्मी अश्लील बातों सें अकस्मात् झेंप सां गय़ा थां।
"पहले अपनी मम्मी केँ लिए कच्छी तौ सिलेक्ट करो, मां पेटीकोट केँ नीचे नंगी हैं मन्यु" वैशाली सीधे उसकी आँखों मे झांकते हुए बोलीं। वो पलंग केँ बिलकुल लगभगआकर खड़ी हुईँ औऱ अभिमन्यु केँ अचानक खाट सें उठकर खड़े हौ जाने सें दोनो मां-बेटे कां बदन आमने-सामने सें बहुतहद तक चिपक गय़ा थां। दोनो एक्-दूसरे कि चढ़ी सांसों कों अपने-अपने चेहरे पर्र साफ महसूस कर सकते थें, दोनो कि छातियां ओर जांघें भि आपस मे सट गई थीं औऱ ठीकउसी समय अपने बेटे केँ थरथराते तम्बू कां स्पर्श अपनी नाभि पाकर वैशाली केँ मन मे एक् ऐसा पापी ख्याल पनप जाता हैं जिसके पूरे हौ जाने केँ पश्चात मम्मी-बेटे कां आगामी भविष्य निश्चित हि बदल जानां थां।
"अॉनयोर नीज़ मन्यु, अभि" अपने जबड़े भींचकर ऐसा कहतेहुए वैशाली अपने दोनोहाथ एकसाथ बेटे केँ कंधों पऱ रखउसे नीचे फर्श पर्र अपने घुटनों केँ बल बैठने केँ लिए, अपने हाथों कि क्रिया केँ संग मौखिक दबाव भि देने लगती हैं। अभिमन्यु ठगा, मंत्रमुग्ध सां अपनी मम्मी केँ हाथों केँ हल्के दबाव सें भि हौले-हौले नीचे बैठने लगता हैं, उसका चेहरा नीचे बैठने केँ दौरान उसकी मम्मी केँ बदन सें बिलकुल सट गय़ा थां औऱ जिसके नतीजन जबतब उसके होंठ भि वैशाली कि साड़ी व निर्वस्त्र जिस्म सें रगड़ खातेजा रहे थें।
सर्वप्रथम उसके होंठों नें उसकी मां केँ गोल-मटोल बूब्ज़ केँ ऊपरी फूले फुलाव कों छुआ औऱ वहा सें फिसलते हुए उसके होंठ मां केँ ब्लाउज पऱ पहुँचे, फिन पुनः होठों कों उसकी मां कि नंगी त्वचा कों छू लेने कां अवसर प्राप्त हुआ। वैशाली केँ चिकने गुदाज पेट नें तौ जवान अभिमन्यु कों जैसे पूरीतरह सें अपनेवश मे कर लिया थां, वो एकाएक इतना ज़्यादा भ्रमित हौ गय़ा कि उसेये भि ख्याल नहींरहा कि उसने अपनी मां केँ नंगेपेट कों चूमना भि शुरुआत कर दिया हैं। मम्मी कि गोल गहरी नाभि कों बारम्बार पटापट चूमने केँ उपरान्त उसके होंठों कां स्पर्श दोबारा वैशाली कि साड़ी सें हुआ औऱ फिन वहीं ठहरकर रह गय़ा, ये उसकी मम्मी कां वो वर्जित जगह थां जिसे याँ तौ बचपन मे उसके नानाजी-नानीमा नें देखा थां याँ विवाह होने केँ बाद उसके पिता नें। अभिमन्यु अब पूरीतरह सें फर्श पऱ बैठ चुका थां औऱ ज्यों हि वो अपने चेहरे कों साड़ी केँ ऊपर सें अपनी मां कि टांगों कि जड़ पऱ दबाता हैं, वैशाली अपना निचला होंठजोर सें अपने दांतों केँ बीच फंसाकर अपनी सिसकी रोकने केँ असफल प्रयास सें झूझने लगती हैं। उसकी टांगें तत्काल कुछइस तरह सें कपकपाने लगी थि मानो वो किसी चालू जनरेटर केँ ऊपर खड़ी हौ, वो केसे भि कर अपने बेटे केँ मुंह कों अपनी बुर केँ ऊपर सें हटाना चाहती थि वर्ना कुछ हि क्षणों मे उसकापतन होँ जानां निश्चित थां।
"बेटा, उन्ह!क.कच्छी, मम्मी साड़ी केँ नीचे.ओह! नीचे नंगी हैं" वैशाली बेटे केँ कंधों कों बलपूर्वक झकझोरते हुए सिसयाई औऱ अभिमन्यु भि झटके सें वर्तमान मे लौटआता हैं। स्वयं कों स्थिर करने हेतुउसे थोडा वक्त मिलना चाहिए थां जौ उसे उसकी मां केँ निंदनीय कथन कों सुनकर नहींमिल पाया थां। उसनेबैड पर्र उसके सबसे नजदीक पड़ी कच्छी पर्र झपट्टा मारा औऱ बिना अपनासिर उठाए कच्छी कों जकड़ने वाला अपना दायां हाथऊपर कर देता हैं।
सर्वप्रथम उसके होंठों नें उसकी मां केँ गोल-मटोल स्तन केँ ऊपरी फूले फुलाव कों छुआ औऱ वहा सें फिसलते हुए उसके होंठ मम्मी केँ ब्लाउज पर्र पहुँचे, फिन पुनः होठों कों उसकी मम्मी कि नंगी त्वचा कों छू लेने कां अवसर प्राप्त हुआ। वैशाली केँ चिकने गुदाज पेट नें तौ जवान अभिमन्यु कों जैसे पूरीतरह सें अपनेवश मे कर लिया थां, वो एकाएक इतना ज्यादा भ्रमित होँ गय़ा कि उसेये भि ख्याल नहींरहा कि उसने अपनी मां केँ नंगेपेट कों चूमना भि शुरुआत कर दिया हैं। मम्मी कि गोल गहरी नाभि कों बारम्बार पटापट चूमने केँ उपरान्त उसके होंठों कां स्पर्श दोबारा वैशाली कि साड़ी सें हुआ औऱ फिन वहीं ठहरकर रह गय़ा, ये उसकी मम्मी कां वो वर्जित जगह थां जिसे याँ तौ बचपन मे उसके नानाजी-नानीमा नें देखा थां याँ विवाह होने केँ बाद उसके पिता नें। अभिमन्यु अब पूरीतरह सें फर्श पर्र बैठ चुका थां औऱ ज्यों हि वो अपने चेहरे कों साड़ी केँ ऊपर सें अपनी मां कि टांगों कि जड़ पर्र दबाता हैं, वैशाली अपना निचला होंठजोर सें अपने दांतों केँ बीच फंसाकर अपनी सिसकी रोकने केँ असफल प्रयास सें झूझने लगती हैं। उसकी टांगें तत्काल कुछइस तरह सें कपकपाने लगी थि मानो वो किसी चालू जनरेटर केँ ऊपर खड़ी होँ, वो केसे भि कर अपने बेटे केँ मुंह कों अपनी बुर केँ ऊपर सें हटाना चाहती थि वर्ना कुछ हि क्षणों मे उसकापतन होँ जानां निश्चित थां।
मन्यु डूइटनाउ! पहनादो अपनी मम्मी कों कच्छी, जल्दकरो.मां नीचे सें नंगी हैं उसे बहोत लज्जा आँ रही हैं बेटा" वैशाली केँ इसघोर अश्लील कथन नें अभिमन्यु कों अपनीबंद आँखें खोलने पऱ विवशकर दिया औऱ अपनी खुली आँखों सें जोँ कामुक दृश्य उसने प्रत्यक्ष देखा मानो वो अपनेहोश बैठता हैं। बड़ी-बड़ी झांटों केँ बीचों-बीच छुपी उसकी मां कि सांवली रंगत कि अत्यंत खूबसूरत बुर गाढ़े लिसलिसे कामरस सें सराबोर थि, चूंकि उसकी मम्मी केँ पैरों केँ बीचकोई खुलापन नहीं थां तोँ बुर केँ दोनो सूजे होंठआपस मे बुरीतरह चिपके हुए थें। जीवंत फड़कते होंठों केँ ऊपर शुशोभित उसकी मां कां मोटा भांगुर भि उसेखुद फड़फाता हुआ सां प्रतीत होँ रहा थां, पूराजगह हि भीषण अगिन--सि तपन कां अहसास करवारहा थां। अभिमन्यु कों अब अपने किसी भि लम्हा झड़ जाने कां कोईदुख नहींरहा थां, उसका लन्ड तोँ जैसेउसे महसूस भि नहीं हौ पारहा थां इतना प्रचंड तनाव उसमे आँ चुका थां कि अपने-आप् वो शून्य मे परिवर्तित होँ चला थां।
"मम्मी तुम् बहोत.बहोत हसीन होँ औऱ बेहद गीली भि" अभिमन्यु नें अपनासिर ऊपर उठाया औऱ मुस्कुराकर अपनी मम्मी कि सुर्ख लाल आँखों मे झांकते हुएकहा, जोँ बरबसनशे सि खुलती वबंद होतीजा रहीथीं।
"बद्तमीज लड़के, तुम्हारी मां नीचे सें नंगी हैं औऱ तुम्हें मजाकसूझ रहा हैं। अगर मनभरकर वहादेख लिया होँ तोँ अब मां कों उसकी कच्छी पहनादो, मम्मी कों सचमुच लज्जा आँ रही हैं" अपने बेटे केँ संतुष्ट चेहरे कों देख वैशाली भि मुस्कुराते हुए बोलीं, एक् ऐसी संतुष्टता जौ अब संसार कि महजउस अकेली पापिन मां कों हि महसूस हौ सकती थि।
"बेटा, उन्ह!क.कच्छी, मां साड़ी केँ नीचे.ओह! नीचे नंगी हैं" वैशाली बेटे केँ कंधों कों बलपूर्वक झकझोरते हुए सिसयाई औऱ अभिमन्यु भि झटके सें वर्तमान मे लौटआता हैं। स्वयं कों स्थिर करने हेतुउसे थोडा वक़्त मिलना चाहिए थां जौ उसे उसकी मां केँ निंदनीय कथन कों सुनकर नहींमिल पाया थां। उसनेखाट पऱ उसके सबसे नजदीक पड़ी कच्छी पऱ झपट्टा मारा औऱ बिना अपनासिर उठाए कच्छी कों जकड़ने वाला अपना दायां हाथऊपर कर देता हैं।
साड़ी कों साड़ी मे उलझादो माँ औऱ फिनरखो मेरे कंधों पर्र अपने दोनोहाथ, शायद मेरा बीताहुआ बचपन तुम्हें दुबारा याद आँ जाए" कहकर अभिमन्यु साडी़ कों साडी़ केँ भीतर गोल-गोल लपेटने मे अपनी मां कि सहायता करने लगता हैं, ताकिहाथ सें छोड़ देने पऱ साड़ी नीचे न् गिरसके।
"वेटअ मिनट मां, एकबार औऱ तुम्हारे वहादेख लूंफिन पहनाता हूं तुमको कच्छी" वो पुनः अपनी आँखे अपनी मां कि बुर पऱ गड़ाते हुए बोला, वैशाली कों उसका अनैतिक कथन सुनकर एकाएक चक्कर सें आनेलगे थें।
"अरेवाह! मम्मी मे इस वर्ल्ड मे तुम्हारे यहा सें बाहर् निकलकर आया हूं, बिलीव मी! मुझे हम् दोनो पर्र प्राउड फील हौ रहा हैं। तुम् बहोत! बहोत! बहोत! बहोत अधिक खूबसूरत हौ मां, मेरीसोच सें भि ज़्यादा खूबसूरत" चहकते हुए उसने पिछले कथन मे जोड़ा। नासमझी याँ खुशी सें बेहाल वो बुद्धु ये भि स्वीकार कर गय़ा कि वो अपनी मां कि बुर केँ विषय मे सोचा करता हैं औऱ कमालये कि उस पागल कों भान हि नहीं कि गलतीवश वो अपनी मां सें क्याँ अनर्थ कुबूल बैठा थां। जिसे सुनकर वैशाली मन हि मन मुस्कुराने लगती हैं, अपनेसगे बेटेमुख सें अपनी बुर कि प्रशंसा कां हर शब्द लगातार उसके कानों मे रस घोलेजा रहा थां।
"बस मन्यु अबडन, मे अब औऱ देर नंगी खड़ीरह सकती" कहतेहुए वैशाली नें आगे कों झुककर अपने दोनोहाथ बारी-बारी सें अपने बेटे केँ कंधे पर्र रखदिए औऱ अभिमन्यु भि अपनी मां कि ख़्वाहिश कों सहर्ष मान लेता हैं।
अपना सीधापेर उठाओ माँ" उसने वैशाली कों आज्ञा दि, बिलकुल वैसे हि अंदाज मे जैसेहर मम्मी अपने बच्चों कों कपड़े पहनाते वक़्त देती हैं। अपने बेटे कि आज्ञा कों मानते हुए उसकी मां सें अपना दाहिना पांव फर्श सें ऊपर लिया, जल्दी जिसे पकड़कर अभिमन्यु कच्छी केँ दायं निचले छेद केँ भीतरकर देता हैं।
"अब उलटापेर उठाऊं बेटा" बेटे केँ बोलने सें पहले वैशाली नें खुदबोल दिया औऱ एकसाथ दोनो मां-बेटे जोरों सें हँसना शुरुआत कर देते हें। बायां पांव भि अब कच्छी केँ अंदर आँ चुका थां औऱ फिन एक् आखिरी नजर अपनी मम्मी कि चिपचिपी स्पंदनशील बुर पऱ मायूसी सें डा़ल अभिमन्यु कच्छी कों तबतकऊपर चढ़ाता गय़ा जबतक उसकी मां कि नंगी बुर उसकी खुली आँखों सें ओझल नहीं होँ गई। मायूसी इसबात कि कि शायदये पहली औऱ अंतिम बार थां जोँ उसने अपनीअसल जन्मस्थली केँ प्रत्यक्ष दिव्य दर्शन किए थें क्योंकि अपनी मां सें नाँ तोँ किसीतरह कि कोई जबरदस्ती उसनेभूत मे औऱ नाँ हि वो आगामी भविष्य मे कभी करता, अब भविष्य तौ बस उसकी मम्मी केँ अपने निजी निर्णय पऱ टिकारह गय़ा थां।
इसके उपरान्त वैशाली बिनाकुछ कहे सीधे बेडरूम केँ बाथरूम मे चली जाती हैं, अभिमन्यु हॉल मे चलाआया थां औऱ कुछ वक्त पश्चात उसकी मां भि वहा आँ गई औऱ अंततः दोनो मम्मी-बेटे अपनी-अपनी सोच मे गुमघऱ कि चौखट कों पार जाते हें।
Oh maa (completee ) - अश्लील कहानी - Next part mein bada twist
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