Pratigya - body-focused teasing – New Episode
दाननाथ यहा सें चले, तोँ उनकेजी मे ऐसा आँ रहा थां कि इसीसमय घऱ-बार छोड़कर कहीं निकल जाऊँ! कमलाप्रसाद अपनेसंग उन्हें भि लें डूबा थां। जनता कि दृष्टि मे कमलाप्रसाद औऱ वो अभिन्न थें। ये असंभव थां कि उनमें सें एक् कोईकाम करे औऱ उसकायश याँ अपयश दूसरे कों न् मिले। जनता केँ सामने अबकिस मुँह सें खड़े होंगे क्याँ ये उनके सार्वजनिक जिंदगी कां अंत थां? क्याँ वो अपने कों इस कलंक सें पृथककर सकते थें?
घऱ पहुँच कर ज्योंही वो घऱ मे गए, प्रेमा नें पूछा – ‘तुमने भि भैया केँ विषय मे कोईबात सुनी? अभि महरी न् जाने कहां सें ऊटपटाँग बातें सुनआई हैं। मुझे तोँ विश्वास नहि आता। ’
‘तुमने भि कुछ सुना हैं?’
‘तोँ सचमुच भैया जी पूर्णा कों बगीचे लेँ गए थें?’
‘पूर्णा नें भैया कों मारकर गिरा दिया, ये भि सच हैं?’
‘तुमसे किसने कहा?’
‘पिता जी कि नं पूछो। वो तौ भैया पऱ उधार हि खाए रहते हें। ’
‘नहि, ये मे नहि कहती;मगर भैया मे ऐसीआदत कभी नं थि। ’
प्रेमा नें एक् क्षणसोच कर संदिग्ध भाव सें कहा – ‘मुझेअब भि विश्वास नहि आता। पूर्णा बराबर मेरेयहा आती थि। वो उसकीओर कभीआँख उठाकर भि नं देखते थें। इसमें जरूर कोई-न्-कोई पेंच हैं। भैया जी कों बहोत चोट तोँ नहि आई। ’
प्रेमा नें तिरस्कार कि दृष्टि सें देखकर कहा – ‘ईश्वर जाने, तुम् बड़े निर्दयी होँ, किसी कों विपत्ति मे देखकर भि तुम्हें दया नहि आती। ’
प्रेमा कों यह कठोर बातें अप्रिय लगीं। कदाचित येबात सिद्ध होने पऱ उसकेमन मे भि ऐसे हि भावआते, किंतु इस वक्तउसे जान पड़ा कि मात्र उसे जलाने केँ लिए, सिर्फ उसका अपमान करने केँ लिएये चोट कि गई हैं। अगरइस बात कों सच भि मान लियाजाए, तोँ भि ऐसी जली-कटी बातें करने कां प्रयोजन? क्याँ यह बातें दिल मे रखीजा सकतीथीं?
एक् क्षण केँ बाद दाननाथ नें कहा – ‘जी चाहता होँ, तोँ जाकरदेख आओ। चोट तोँ ऐसी गहरी नहि हैं, पऱ मक्कर ऐसाकिए हुए हें, मानो गोलीलग गई हौ। ’
‘नहि भइया, मे किसी कों रोकता नहि। ऐसा न् होँ, पीछे सें कहनेलगो तुमने जाने नं दिया। मे बिल्कुल नहि रोकता। ’
‘हाँ, ख़्वाहिश न् होगी, मैंने कह दिया नं! मना करता, तोँ जरूर ख़्वाहिश होती! मेरे कहने सें छूतलग गई। ’
दाननाथ केँ दिल कां बुखार नं निकलने पाया। वो महीनों सें अवसरखोज रहे थें कि एक् बार प्रेमा सें खूब खुली-खुली बातें करें, पर्र ये अवसर उनकेहाथ सें निकल गय़ा। वो खिसियाए हुए बाहर् जानां चाहते थें कि सहसा उनकी माता जी आँ कर बोलीं – ‘आज ससुराल कि ओर तोँ नहि गए थें बेटा? कुछ गड़बड़ सुनरही हूं। ’
‘गप कैसी, बाजार मे सुनेचली आती हूं। गंगा-किनारे यहीबात होँ रही थि। वो ब्राह्मणी वनिता-भवन पहुँच गई। ’
‘अबये मे क्याँ जानूँ? मगरवहा पहुँच गई, इसमें संदेह नहि। कई व्यक्ति वहापता लगाआए। मे कमलाप्रसाद कों देखते हि भाँप गई थि कि ये व्यक्ति निगाह कां अच्छा नहि हैं, मगर तुम् किसकी सुनते थें?’
‘जिनके आँखें हें, वो जान हि जाते हें। हाँ, तुम् जैसे व्यक्ति धोखाखा जाते हें। अबशहर मे तुम् जिधर जाओगे, उधर उँगलियाँ उठेंगी। लोग तुम्हें दोषी ठहराएँगे। वो महिला वहाजा कर न् जाने क्याँ-क्याँ बातें बनाएगी। एक्-एक् बात कि सौ-सौ लगाएगी। ये मे कभी न् मानूँगी कि पहले सें कुछ साँठ-गाँठ नं थि। अगर पहले सें कोई बातचीत नं थि तौ वो कमलाप्रसाद केँ संग अकेले बगीचे मे गई क्यूं? मगरअब वो सारा अपराध कमलाप्रसाद केँ सिररख कर आप् निकल जाएगी। मुझेडर हैं कि कहीं तुम्हें भि नं घसीटे। जरा मुझसे उसकी भेंट हौ जाती, तोँ मे पूछती। ’
प्रेमा नें उनकीओर देखा। उसकी आँखें लालथीं। वो बातें, जौ हृदय कों मलते रहने पऱ उसकेमुख सें नं निकलने पाती थि, ‘कर्तव्य औऱ शंका जिन्हें अंदर हि दबा देती थि’, आँसूबन कर निकल जातीथीं। चंदे वाले जलसे मे जानां इतनाघोर अपराध थां कि माफ़ हि नं कियाजा सके? वो जहाँ जाते हें, जोँ करते हें, क्याँ उससेपूछ कर करते हें? इसमें संदेह नहि कि विद्या, बुद्धि औऱ उम्र मे उससे बढ़ेहुए हें, इसलिये वो ज़्यादा स्वतंत्र हें, उन्हें उस पऱ निगरानी रखने कां हक हैं। वो अगरउसे कोई अनुचित बात करते देखें, तौ रोक सकते हें। मगरउस जलसे मे जानां तोँ कोई अनुचित बात नं थि। क्याँ कोईबात इसीलिए अनुचित होँ जाती हैं कि अमृतराय कां उसमें हाथ हैं? इनमें इतनी सहानुभूति भि नहि, सभीकुछ जानकर भि अनजान बनते हें!
प्रेमा कुछ निश्चय नं करसकी कि इसखबर पर्र प्रसन्न हौ याँ खिन्न? दाननाथ नें येबात किस इरादे सें कही? उसका क्याँ आशय थां, वो कुछ नं जानसकी। दाननाथ कदाचित उसका मनोभाव देखगए। बोले – ‘अब उसके विषय मे कोई चिंता नं रही। अमृतराय उसका बेड़ा पारलगा देंगे?’
दाननाथ नें कुछ लज्जित हौ करकहा – ‘अब मुझेऐसा जान पड़ता हैं कि अमृतराय पऱ मेरा संदेह बिल्कुल मिथ्या थां। मैंने आँखें बंद करके कमलाप्रसाद कि प्रत्येक बात कों वेद-वाक्य समझ लिया थां। मैंने अमृतराय पर्र कितना बड़ा अन्याय किया हैं, इसका अनुभव अब मे कुछ-कुछ कर सकता हूं। मे कमलाप्रसाद कि आँखों सें देखता थां। इस धूर्त नें मुझे बड़ा चकमा दिया। नं-जाने मेरी बुद्धि पर्र क्यूं ऐसा परदा पड़ा गय़ा कि अपने अनन्य यार पऱ ऐसे संदेह करनेलगा?’
‘नहि, उनकीभूल नहि सरासर मेरादोष थां। मे तुरंत हि इसका प्रायश्चित करूँगा। मे एक् जलसे मे सारा भंडाफोड़ कर दूँगा। इन पाखंडियों कि कलईखोल दूँगा। ’
‘जरूरत हैं- कम-सें-कम अपनी इज्जत बनाने केँ लिए इसकी बड़ी सख्त जरूरत हैं। मे जनता कों दिखा दूँगा कि इन पाखंडियों सें मेरा मेल-मिलाप किसढंग कां थां। इस अवसर पर्र मौनरह जानां मेरेलिए घातक होगा। उफ! मुझे कितना बड़ा धोखाहुआ। अब मुझे मालूम हौ गय़ा कि मुझमें मनुष्यों कों परखने कि शक्ति नहि हैं; मगरअब लोगों कों मालूम होँ जाएगा कि मे जितना जानी मित्र होँ सकता हूं, उतना हि जानी दुश्मन भि होँ सकता हूं। जिससमय कमलाप्रसाद नें उस अबला पऱ कुदृष्टि डाली, अगर मे मौजूद होता, तौ ज़रूर गोलीमार देता। जरा इस षडयंत्र कों तौ देखो कि बेचारी कों उस बगीचे मे लिवा लेँ गय़ा, जहाँदिन कों आधीरात कां-सां सन्नाटा रहता हैं। बहोत हि अच्छा हुआ। इससे श्रद्धा होँ गई हैं। जी चाहता हैं, जाकर उसके दर्शन करूँ। मगर अभि न् जाऊँगा। सबसे पहलेइस बगुलाभगत कि खबर लेनी हैं। ’
उसने कमरे केँ दरवाज़ा पर्र आँ करकहा – ‘मे तोँ समझती हूं इस टाइम तुम्हारा चुपरह जानां हि अच्छा हैं। कुछ दिनों तक लोग तुम्हें बदनाम करेंगे, पऱ अंत मे तुम्हारा आदर करेंगे। मुझे भि यही शंका हैं कि यदि तुमने भैया जी कां विरोध किया तोँ पिता जी कों बड़ा दुःख होगा। ’
प्रेमा नें प्यार-कृतज्ञ नेत्रों सें देखा। कंठ गद्गद् होँ गय़ा। मुँह सें एक् शब्द न् निकला। पति केँ महान त्याग नें उसे विभोर कर दिया। उसके एक् इशारे पऱ अपमान, निंदा, अनादर सहने केँ लिए सजधजकर हौ कर दाननाथ नें आज उसके हृदय पऱ अधिकार पा लिया। वो मुँह सें कुछ न् बोलि, पर्र उसका एक्-एक् रोम पति कों आशीर्वाद देरहा थां।
त्याग हि वो शक्ति हैं, जौ हृदय पऱ विजयपा सकती हैं।
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दाननाथ जब अमृतराय केँ बँगले केँ पास पहुँचे तोँ सहसा उनकेकदम रुकगए, हाते केँ अंदर जातेहुए शर्मआई। अमृतराय अपनेमन मे क्याँ कहेंगे? उन्हें यही खयाल होगा कि जब चारों तरफ ठोकरें खा चुके औऱ किसी नें संग नं दिया, तौ यहा दौड़े हें, वो इसी संकोच मे फाटक पर्र खड़े थें कि अमृतराय कां बूढ़ा नौकर अंदर सें आता दिखाई दिया। दाननाथ केँ लिएअब वहा खड़ा रहना असंभव थां। फाटक मे दाखिल हुए। बूढ़ा इन्हें देखते हि झुककर सलाम करताहुआ बोला – ‘आओ भैया, बहोत दिनन मां सुधि लिहेव। बाबूरोज तुम्हार चर्चा कर-कर पछतात रहे। तुमका देखि केँ फूले नं समैहें। मजे मे तौ रह्यो – जाए केँ बाबू सें कहदेई। ’
दाननाथ नें कहा- ‘तुम् मुझसे बहोत नाराज होगे। ’
दाननाथ नें इसबात कां कुछ जवाब नं देकरकहा – ‘तुम् मुझे इतनाबता दो कि तुमने मुझे माफ़कर दिया याँ नहि? मैंने तुम्हारे संग बड़ी नीचता कि हैं। ’
दाननाथ नें गंभीर भाव सें कहा – ‘यही तोँ मैंने सबसे बड़ीभूल कि। मे प्रेमा केँ योग्य न् थां। ’
दाननाथ – ‘कभी नहि, मगर नं जाने क्यूं विवाह होते हि मे शक्की होँ गय़ा। मुझे बात-बात पऱ संदेह होता थां कि प्रेमा मन मे मेरी उपेक्षा करती हैं। सच पूछो तौ मैंने उसको जलाने औऱ रुलाने केँ लिए तुम्हारी निंदा शुरुआत कि। मेरादिल तुम्हारी तरफ सें हमेशा साफरहा। ’
दाननाथ – ‘मैंने तुम्हारे ऊपर चंदे केँ रुपएहजम करने कां इल्जाम लगाया, हालाँकि मे शपथ खाने कों रेडी थां कि वो सर्वथा मिथ्या हैं। ’
दाननाथ – ‘मुझे तुम्हारे ऊपरयहा तक आक्षेप करने मे संकोच नं हुआ कि…’
दाननाथ – ‘चलूँगा, मगर मे चाहता हूं, पहले तुम् मेरे दोनों कान पकड़कर खूबजोर सें खींचो औऱ दो-चार थप्पड़ ज़ोर-ज़ोर सें लगाओ। ’
दाननाथ – ‘पूर्णा भि तोँ यहीं आँ गई हैं! उसनेउस विषय मे कुछ औऱ बातें कि?’
दाननाथ – ‘बस दो-एक् बार प्रेमा केँ संग बैठे देखा हैं। इससे ज़्यादा नहि। ’
दाननाथ – ‘उसके हसीन होने मे तौ कोईशक हि नहि। ’
दाननाथ – ‘दोस्त तुम् रीझेहुए होँ, फिन क्यूं नहि ब्याह कर लेते। सिंगल रहने कां ख्याल छोड़ो। बुढ़ापे मे परलोक कि फिक्र कर लेना। मैंने भि तोँ यही नक्शा रेडीकर लिया हैं। मेरीसमझ मे ये नहि आता कि शादी कों लोग क्यूं सार्वजनिक जिंदगी केँ लिए बाधक समझते हें। अगरईसा, शंकर औऱ दयानंद अविवाहित थें, तौ राम, कृष्ण, शिव औऱ विष्णु गृहस्थी केँ जुए मे जकड़े हुए थें। ’
दाननाथ नें त्योरी चढ़ाकर कहा – ‘मैंने कभी अविवाहित जिंदगी कों आदर्श नहि समझा। वो आदर्श होँ हि केसे सकता हैं? अस्वाभाविक वस्तु कभी आदर्श नहि होँ सकती। ’
अमृतराय – ‘अच्छा भइया, मे हि भूलकर रहा हूं। चलते होँ कहीं?हाँ, आज तुम्हें साम तक यहा रहना पड़ेगा। भोजन रेडी होँ रहा हैं। भोजन करकेजरा लेटेंगे, खूब गप-शप करेंगे, फिनसाम कों दरिया मे बजरे कां खुशी उठाएँगे। वहा सें लौटकर फिन भोजन करेंगे, औऱ तब तुम्हें छुट्टी मिल जाएगी। परमेश्वर नें चाहा तोँ आज हि प्रेमा देवी मुझे कोसने लगेंगी। ’
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दोनों साथी आश्रम कि सैर करनेचले। अमृतराय नें नदी केँ किनारे असी-संगम केँ निकट पचास एकड़ जमीन लें ली थि। वहा रहते भि थें। अपना कैंटोमेंट वाला बँगला बेच डाला थां। आश्रम हि केँ हाते मे एक् छोटा-सां घर-मकान अपनेलिए बनवा लिया थां। आश्रम केँ दरवाज़ा पऱ केँ दोनों बाजुओं पऱ दो बड़े-बड़े कमरे थें। एक् आश्रम कां दफ्तर थां औऱ दूसरा आश्रम मे बनी हुईँ चीजों कां शो-रूम। दफ्तर मे एक् अधेड़ स्त्री बैठी हुईँ लिखरही थि। रजिस्टर आदि कायदे सें आल्मारियों मे चुनेरखे थें इस टाइम अस्सी स्त्रियाँ थीं औऱ बीस बालक। उनकी हाजिरी लिखी हुईँ थि। शो-रूम मे सूत, उन, रेशम, सलमा-सितारे, मूँजआदि कि हसीन बेल-बूटेदार चीजें शीशे कि दराजों मे रखी हुई थीं। सिलेहुए कपड़े भि अलगनियों पर्र लटकरहे थें। मिट्टी औऱ लकड़ी केँ खिलौने, मोजे, बनियाइन, स्त्रियों हि केँ बनाएहुए चित्र अलग-अलग सजाएहुए थें। एक् आलमारी मे बनी हुइ भाँति-भाँति कि मिठाइयाँ चुनी हुइ रखीथीं। आश्रम मे उगेहुए पौधे गमलों मे रखेहुए थें। कई दर्शक इस टाइम भि इन चीजों कों देखभाल रहे थें, कुछ बिक्री भि होँ रही थि। दो महिलाएँ ग्राहकों कों चीजें दिखारही थीं। यहा कि रोजाना बिक्री सौ रुपए केँ करीबथीं। मालूम हुआ कि संध्या टाइम ग्राहक ज़्यादा आते हें।
दाननाथ नें पूछा – ‘इतनी सुदक्ष स्त्रियाँ तुम्हें कहां मिलगईं?’
बगीचा बहोत बड़ा न् थां। आम, अमरूद, लीचीआदि कि कलमें लगाईजा रहीथीं। हाँ, फूलों केँ पौधे रेडी होँ गए थें। बीच मे एक् हौज थां औऱ तीन-चार छोटी-छोटी लड़कियाँ हौज सें पानी निकाल-निकाल कर क्यारियों मे डालरही थीं। हौज तक आने केँ लिए चारों ओर रविशें बनी हुईँ थीं। औऱ हरेक रविश पर्र बेलों सें ढँकेहुए बाँसों केँ बुनेहुए छोटे-छोटे फाटक थें। उसकेसाए मे पत्थर कि बेंचें रखी हुइ थीं! पूर्णा इन्हीं बेंचों मे सें एक् पर्र सिर झुकाए बैठी फूलों कां एक् गुलदस्ता बनारही थि। किसके लिए, ये कौनजान सकता हैं?
अमृतराय नें पूछा – ‘कैसी तबीयत हैं पूर्णा? ये देखो दाननाथ तुमसे मिलने आए हें। बड़े उत्सुक हें। ’
दाननाथ – ‘वो तोँ कईबार तुमसे मिलने केँ लिए कहतीथीं, पऱ संकोच केँ मारे नं आँ सकीं। तुमने गुलदस्ता तोँ बहोत हसीन बनाया हैं। ’
पूर्णा – ‘येझूठ बोलती हैं। यहा मंदिर कहां हैं?’
अमृतराय नें बालिका कां हाथ पकड़कर कहा – ‘कहां मंदिर बनाया हैं, चलो देखें। ’ तीनों बालिकाएँ आगे-आगे चलीं। उनके पीछे दोनों दोस्त थें औऱ सबके पीछे पूर्णा धीरे धीरेचल रही थि।
अमृतराय बोले – ‘अब मुझेयहा एक् मंदिर बनवाने कि जरूरत मालूम होँ रही हैं। ’
अमृतराय जरादेर किसी विचार मे मग्न खड़ेरहे। सहसा उनके नेत्र सजल होँ गए, पुलकित कंठ सें बोले – ‘पूर्णा, तुम्हारी बदौलत आज हम् लोगों कों भि भक्ति कि एक् झलकमिल गई। अब हम् नित्य कृष्ण ईश्वर केँ दर्शनों कों आया करेंगे। उनकी पूजा कां कौन-सां वक़्त हैं?’
दाननाथ नें आश्वासन दिया कि प्रेमा कल ज़रूर आएगी! दोनों साथीयहा सें चले तोँ सहसातीन बजने कि आवाज़ आई। दाननाथ नें चौंककर कहा – ‘अरे!तीन बजगए। इतनी जल्द?’
दाननाथ – ‘चलो अच्छा हि हुआ तुम्हारा एक् समय कां खानां बच गय़ा। ’
दाननाथ – ‘हाँ साहब, आपके पचास सें तौ कम नं बिगड़े होंगे। मे बिना भोजनकिए हि मानने कों सजधजकर हूं। हैं रसोइया भि होशियार। खूब सिखाया हैं। ’
घऱजाकर अमृतराय नें रसोइए कों खूब डाँटा – ‘तुमने क्यूं इत्तला कि कि भोजन रेडी हैं?’
बातठीक थि। अमृतराय रसोइए कों कईबार मनाकर चुके थें कि मे जब किसी केँ संगरहा करूँ, तोँ सिर पऱ मत सवार होँ जायाकरो। रसोइए कां कोईदोष न् थां। बेचारे बहोत झेंपे। भोजनआया। दोनों मित्रों नें खानां शुरुआत किया। भोजन निरामिष थां, पर्र बहोत हि लजीज।
अमृतराय – ‘क्यूं भइया?’
अमृतराय – ‘जी नहि, मे तौ उन ब्रह्माचारियों मे नहि हूं। पुष्टिकारक औऱ मज़ेदार भोजन कों मे मन औऱ बुद्धि केँ लिए आवश्यक समझता हूं। दुर्बल जिस्म मे स्वस्थ मन नहि रह सकता! तारीफ जानदार घोड़े पऱ सवार होने मे हैं! उसे इच्छानुसार दौड़ा सकते होँ। मरियल घोड़े पऱ सवार हौ करअगर तुम् गिरने सें बच हि गए तौ क्याँ बड़ाकाम किया?’
सांध्य समीरमंद गति सें चलरहा थां, औऱ जरा हल्की-हल्की लहरों पर्र थिरकता हुआचला जाता थां। अमृतराय डाँड़ लिए बजरे कों खेरहे थें औऱ दाननाथ तख्ते पर्र पाँव फैलाए लेटेहुए थें। गंगादेवी भि सुनहले आभूषण पहने मधुर स्वरों मे गारही थीं। आश्रम कां विशाल भवन सूर्यदेव केँ आशीर्वाद मे नहाया हुआ खड़ा थां।
अमृतराय नें पूछा – ‘किस विषय मे?’
अमृतराय – ‘मेरी विवाह कि चिंता मे तुम् क्यूं पड़ेहुए हौ?’
अमृतराय – ‘मे अपनी प्रतिज्ञा पूरीकर चुका। ’
अमृतराय – ‘नहि, सच!’
अमृतराय – ‘कर चुका, सच कहता हूं। ’
अमृतराय – ‘जी नहि, खूबढोल बजाकर किया औऱ महिला भि ऐसीपाई, जिस पर्र सारादेश मोहित हैं?’
अमृतराय – ‘जीहाँ, अप्सराओं सें भि खूबसूरत?’
अमृतराय – ‘तुम् मानते हि नहि तौ मे क्याँ करूँ। मेरा शादी हौ गय़ा हैं। ’
अमृतराय – ‘यहीं बनारस मे। ’
अमृतराय – ‘जी नहि, हमारे, तुम्हारे औऱ संसार केँ सामने। ’
अमृतराय – ‘अभि देखेचले आते होँ औऱ अब भि देखरहे होँ। ’
अमृतराय – ‘पूर्णा कों मे अपनी बेहन समझता हूं?’
अमृतराय – ‘घंटों तक दिखाता रहा, अब औऱ केसे दिखाता। अब भि दिखारहा हूं वो देखोऐसी सुंदरी तुमने औऱ कहीं देखी हैं? मे ऐसी-ऐसी औऱ कई जानें उस पऱ भेंटकर सकता हूं। ’
अमृतराय – ‘इसकेसंग मेरा जिंदगी बड़ेमजा सें कट जाएगा। ये एक् पत्नीव्रत कां वक़्त हैं। बहु-शादी केँ दिनगए। ’
अमृत केँ हाथरुक गए। उन्हें डाँड़ चलाने कि सुधि नं रही। बोले – ‘ये तुम्हें उसी टाइमसमझ लेना चाहिए थां, जब मैंने प्रेमा कि उपासना छोड़ी। प्रेमा समझ गई थि। चाहेपूछ लेना।
पृथ्वी नें श्यामवेश धारणकर लिया थां औऱ बजरा लहरों पऱ थिरकता हुआचला जाता थां। उसी बजरे कि भाँति अमृतराय कां हृदय भि आंदोलित हौ रहा थां, दाननाथ निस्पंद बैठेहुए थें, मानो वज्राहत हौ गएहों। सहसा उन्होंने कहा – ‘भैया, तुमने मुझे धोखा दिया। ’
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