leela key rasleela ( + ) (incest special) (adultery special) – New Episode
अध्याय ६
अगलेदिन सुभह लीला थोड़ी देर सें उठी। रात भरउसे ठीक सें नींद नहि आई थि, उसका शरीर अभि भि थकाहुआ महसूस हौ रहा थां।
कोमलघऱ केँ पिछवाड़े मे जानवरों कों चाराडाल रही थि औऱ लल्लू सुभह–सुभह हि खेतचला गय़ा थां।
लीला कमरे सें बाहर् निकलकर घऱ केँ पिछवाड़े कि तरफचली गई औऱ चुपचाप साड़ी औऱ पेटीकोट ऊपर करके उकड़ू बैठ गई। पेशाब कि तेजधार निकली तौ उसको रामू औऱ रज्जो कि बातें फिनयाद आँ गईं, उसकी बुर कल कि उत्तेजना सें थोड़ी सूजी हुइ थि। पेशाब करतेहुए उसने अनजाने मे हि अपनी फूली हुइ बुर कि लिप्स कों छू लिया।
“अहह.” उसकी हल्की सि कराह निकल गई।
फिन धोने केँ बाद एक् पुराने घड़े सें पानी लेकर उसने स्नान किया। ठंडा पानी उसके बड़े–बड़े स्तनों पऱ गिररहा थां जिससे निप्पल सख्त होँ गए थें। वो आहिस्ता साबुन लगारही थि, खासकर बुर औऱ गांड केँ बीच अच्छे सें मलरही थि।
नहाने केँ बाद लीला एक् हल्के भूरेरंग कि हल्की सूती साड़ी पहनकर सजधजकर होँ गई, उसका ब्लाउज थोडा टाइट थां जिसमें सें उसके भारी बूब्ज़ औऱ गहरी क्लीवेज उभररही थि। बालों कों गीले हि पीछे बाँधकर एक् छोटे झोले मे पूजा कां सामान जैसेफूल, चूड़ा, अगरबत्ती, मिठाई औऱ थोड़े पैसेरख लिए।
आज सोमवार थां। हर सोमवार कों वो अपनी जीजी केँ संगबस सें शहर वाले प्रसिद्ध मंदिर जाती थि।
लीला नें रज्जो कों मोबाइल लगाया “जीजी, सजधजकर होँ नाँ? बस स्टैंड पहुंच जाओ। ”
रज्जो नें जवाब दिया, “अरे बेहन, आज तौ मे नहि जा पाऊंगी, तेरे जीजा केँ संग बैंक जानां हैं। ”
लीला थोडा उदास होती हुई बोलि, “ठीक हैं जीजी, फिन मे अकेली चली जाती हूं। ”
रज्जो नें जल्दी कहा, “सुन, मेरी ननदीआज जग्गू केँ संग ब्यूटी पार्लर कां सामान लेनेशहर जारही हैं। मे माधुरी कों बोल देती हूं कि तुझसे बस स्टैंड पऱ मिल लें। ”
लीला नें सोचा औऱ बोलीं, “ठीक हैं जीजी, माधुरी कों बोलदो। ”
लीला नें साड़ी कां पल्लू ठीक किया, झोला कंधे पर्र डालकर घऱ सें निकल पड़ी। कोमल कों बता दिया कि वो मंदिर जारही हैं औऱ साम तक लौटेगी।
गाँव कि गलियों सें गुजरते हुए लीला केँ मन मे तरह-तरह केँ विचार घूमरहे थें, चलते टाइम उसके भारी मम्मों हल्के-हल्के हिलरहे थें। बस स्टैंड थोडा दूर थां, रास्ते मे देहात केँ लोगउसे देखरहे थें। विधवा होने केँ बावजूद लीला कि जवानी अभि भि देहात केँ मर्दों कों आकर्षित करती थि।
बस स्टैंड पहुँचकर लीला इधर-उधर नजर दौड़ाने लगी, वहा पऱ बच्चों कि बहुत भीड़जमा थि।
तभीउसे सामने सें आवाज़ आई “जीजी!”
लीला नें मुड़कर देखा तौ रामू कां साला खड़ा थां। उसकेसंग नीतू भि थि।
संजय मुस्कुराते हुए लीला केँ पासआया, “जीजी, कैसी होँ? सुभह–सुभह कहां जारही होँ?”
लीला नें मुस्कुराकर जवाब दिया, “संजय, मे मंदिर जारही हूं, तुम् नीतू कों विद्यालय छोड़ने जारहे होँ क्याँ?”
संजय नें सिर हिलाया, “हाँ जीजी, आज नीतू कि बोर्ड कि परीक्षा हैं"
लीला बोलीं "अच्छा! तभीबस स्टैंड पऱ बच्चों कि इतनी भीड़ हैं"
तभीबस स्टैंड पऱ माधुरी औऱ जग्गू भि पहुँच गए।
लीला नें पूछा, “माधुरी, इतनीदेर केसेलग गई?”
माधुरी हँसते हुए बोलि "भाभी, ब्यूटी पार्लर केँ सामान कि लिस्ट सजधजकर कररही थि। हर हफ्ते शहरकौन जाए इसलिये पूरे महीने कां सामान एक् संग लाना पड़ता हैं। "
लीला मुस्कुराती हुइ बोलीं "हाँ माधुरी, बिल्कुल सहीबात हैं। "
कुछदेर मे शहर जाने वालीबस आँ गई, पाँचों जल्द-जल्द मे बस मे चढ़गए मगर भीड़ इतनी अधिक थि कि सभीलोग एक्-दूसरे सें चिपककर खड़े होने कों मजबूर थें।
माधुरी औऱ संजयआगे कि तरफ निकलआए औऱ पीछे कि तरफरह गए जग्गू, नीतू औऱ लीला।
माधुरी औऱ संजय दोनों एक् दूसरे कि तरफ मुंह करके खड़े थें औऱ नीतू औऱ जग्गू केँ बीच मे लीला खड़ी थि। लीला कि साड़ी कां पल्लू थोड़ासरक गय़ा थां नीतू कि सांसें लीला केँ क्लीवेज केँ आस–पास पड़ रहीं थि औऱ उसने दाएंहाथ सें उसकीकमर पकड़रखी थि। जग्गू कि सांसें लीला केँ गले औऱ कान पऱ पड़ रहीं थि औऱ उसने बाएंहाथ सें उसका कंधा पकड़रखा थां औऱ भीड़ कि वजह सें दोनों कां जिस्म लीला सें पूरीतरह चिपका हुआ थां।
लीला कि सांसें थोड़ी तेज हौ गईं थि, हर हिचकोले केँ संग जग्गू औऱ नीतू कां जिस्म लीला कि गांड औऱ चूचे पर्र दबरहे थें। लीला कां भारी-भरकम शरीरइन दोनों जवान लड़का-लड़की केँ बीच फँसाहुआ थां, लीला कों महसूस होँ रहा थां कि जग्गू कां लण्ड सख्त हौ रहा हैं जोँ उसकी गांड कि दरार मे हल्का-हल्का दबावबना रहा थां।
“हायरे। यह क्याँ होँ रहा हैं, ” लीलामन हि मन बुदबुदाई।
लीला कि जांघें आपस मे कसगईं, उसकी बुर सें चिपचिपा रस निकलने लगा थां। लीला स्वयं कों संभालने कि कोशिश कररही थि मगर उसका शरीर बेकाबू होनेलगा थां।
बस आरामसे शहर कि तरफबढ़ रही थि, भीड़ इतनी थि कि सांस लेना भि मुश्किल हौ रहा थां। लीला चुपचाप खड़ी थि मगर उसके शरीर मे तूफान मचाहुआ थां, कभी नीतू कां हाथ लीला केँ भरेहुए चुचों पऱ पड़ जाता। विद्यालय ड्रेस मे नीतू कां नाजुक जिस्म लीला सें सटाहुआ थां औऱ हर हिचकोले मे उसकी उँगलियाँ अनजाने मे हि लीला केँ ब्लाउज केँ ऊपर सें निप्पल कों छू जातीं, लीला केँ भारी मम्मों हिलते-डुलते औऱ नीतू केँ चेहरे पर्र दब जाते। कभी जग्गू कां मजबूत हाथ लीला कि गोल-मटोल गांड पर्र पड़ जाता। जग्गू ठीक लीला केँ पीछे चिपका हुआ थां, उसका सख्त, तगड़ा जिस्म लीला केँ नितंबों सें पूरीतरह सटाहुआ थां औऱ हर हिचकोले केँ संग उसका लन्ड अनजाने मे हि लीला कि साड़ी केँ ऊपर सें गांड केँ छेद मे धंस जाता।
लीला कि सांसें तेज हौ रहीथीं, उसने स्वयं कों संभालने कि कोशिश कि मगरतभी लीला कि नजरआगे कि तरफ गई।
लीला नें देखा कि माधुरी कि सफेदटॉप केँ नीचे उसके मम्मों ऊपर-नीचे होँ रहे थें। संजय कां दायाँ हाथ पूरीतरह माधुरी कि नीली जीन्स केँ अंदर घुसाहुआ थां, जीन्स कां कपड़ा टांगों केँ बीच हल्का–हल्का भीग चुका थां। माधुरी कि आँखें बंदथीं, होंठ काँपरहे थें, उसका चेहरा वासना सें लाल हौ चुका थां, माधुरी दाँतों तले होंठ दबाएहुए थि ताकिकोई कराह बाहर् नं निकले। माधुरी कां बायाँ हाथ पूरीतरह संजय कि पैंट केँ अंदर घुसाहुआ थां, उसका लन्ड पैंट केँ अंदर बिल्कुल तनाहुआ थां, दोनों बिल्कुल बेखबर होकर एक् दूसरे कि मसलने मे लगेहुए थें।
लीला बिल्कुल स्तब्ध रह गई थि। माधुरी नें अपने पति केँ अफेयर कि वजह सें उसे छोड़ दिया थां। संजय कि पत्नि भि अपने आशिक केँ संग फरार थि मगर लीला कों ये नहि मालूम थां कि इन दोनों कां चक्कर चलरहा हैं।
कुछदेर बादबस शहर पहुँच गई। भीड़ औऱ बस केँ हिचकोलों नें लीला कों पूरीतरह थका दिया थां।
जैसे हि बस रुकी तौ सभीलोग नीचे उतरने लगे। माधुरी औऱ जग्गू बाजार कि तरफ निकललिए औऱ संजय औऱ नीतू विद्यालय कि तरफ रवाना होँ गए।
लीला अकेली मंदिर कि ओर बढ़ी, मंदिर केँ पास पहुँचकर उसने साड़ी कां पल्लू ठीक किया औऱ अंदरचली गई।
मंदिर मे लीला नें पूजा कि, फूल चढ़ाए, अगरबत्ती जलाई औऱ माथा टेकामगर मन मे शांति कि स्थान अभि भि उथल-पुथल मची हुइ थि, दर्शन करने केँ बाद लीला मंदिर कि सीढ़ियों पर्र बैठ गई। अचानक लीला कि आँखों मे आँसू आँ गए, वो दोनों हाथों सें चेहरा छुपाकर आरामसे रोनेलगी, अंदर हि अंदर अपराधबोध नें उसेघेर लिया थां, वासना उसकेऊपर बिल्कुल हावी होँ चुकी थि, वो रोते-रोते साड़ी केँ पल्लू सें आँसू पोंछरही थि।
कुछदेर बाद एक् सफेदरंग कां कुत्ता लीला केँ पासआया औऱ उसके साड़ी केँ पल्लू कों मुँह मे लेकर खींचने लगा।
“अरे छोड़। क्याँ कररहा हैं?” लीला नें पल्लू छुड़ाने कि कोशिश कि मगर कुत्ता नहि माना। वो पल्लू खींचता हुआ लीला कों मंदिर केँ पीछे कि तरफ लेँ जानेलगा।
लीला अनजाने मे उसके पीछेचल पड़ी। मंदिर केँ पीछे एक् पुरानां पीपल कां पेड़ थां। वहा एक् पतले–दुबले सें बाबा बैठेहुए थें, उनकी हड्डियाँ दिखरही थीं, जिस्म पऱ बस चमड़ी चढ़ी हुई थि, लंबी सफेद दाढ़ी, मूँछ औऱ बाल थें।
कुत्ता लीला कां पल्लू छोड़कर बाबा केँ पासबैठ गय़ा।
बाबा नें लीला कि तरफ देखा औऱ मुस्कुराने लगे, उनकी आँखों मे एक् अजीब-सि चमक थि जैसे उन्हें सभीकुछ पहले सें पता हौ।
लीला नें रोते-रोते हि हाथ जोड़कर बोलीं, “प्रणाम बाबा.”
बाबा नें गहरीनजर सें उसे देखा औऱ मुस्कुराते हुए बोले, “बेटी लीला,,, आओ"
लीला हैरानी सें बाबा कि तरफ देखने लगी, बाबा कों उसकानाम केसेपता? मगर उनकी आवाज़ मे इतनी शांति थि कि लीलाकुछ बोल नहि पाई।
बाबा नें आगे बोला, “वासना परमेश्वर कि देन हैं बेटी मगरमन कि उलझनउसे पापबना देती हैं। ”
लीला बाबा केँ सामने सिर झुकाए फूट-फूट कर रोनेलगी मगरसंग हि एक् अजीब–सि जिज्ञासा उसके अंदरजाग रही थि कि बाबाआगे क्याँ बोलेंगे।
कुछदेर तक बाबा चुपचाप उसकी पीड़ा कों देखते रहे, फिन धीरे-धीरे सें बोले, “बेटी, महिला कि कामुकता बहोत शक्तिशाली होती हैं इसको तूँ जितना नियंत्रण मे करने कि कोशिश करेगी उतनायह तेरी बर्बादी कि तरफ लें जाएगी। "
लीला नें सिर उठाया औऱ रोती हुईँ बोलीं “बाबा। मे पापकर रही हूं। मेरेमन मे बुरे-बुरे विचार आँ रहे हें। ”
बाबा मुस्कुराने लगे औऱ तलाब कि तरफ इशारा करतेहुए बोले“देख बेटी, कमल केँ फूल कों देख, कीचड़ मे पैदा होता हैं, कीचड़ मे हि रहता हैं फिन भि कितना हसीन औऱ सुगंधित होता हैं, कीचड़ उसे गंदा नहि करता बल्कि पोषण देता हैं, तेरी कामुकता भि वैसा हि कीचड़ हैं अगर तुँ उसे स्वीकार कर लेगी तोँ तेरी जवानी भि कमल कि तरह खिलेगी खूबसूरत औऱ सुगंध देने वालीमगर अगर तुँ उसे नकारती रही तोँ सूख जाएगी"
बाबा नें शांतमगर दृढ़ स्वर मे आगे बोले, “जोँ भि तेरेपास स्वाभाविक रूप सें आँ रहा हैं उसे ठुकराना सबसे बड़ा अधर्म हैं। यह हि कर्म औऱ प्रकृति कां नियम हैं। तुँ अगर अधूरी रही तोँ अपने परिवार कों केसे संभालेगी? आँखें बंद करके अपनेमन सें पूछ कि तुम कोसच मे क्याँ चाहिए? औऱ तेरी ख़्वाहिश क्याँ हैं?"
लीला नें आँखें बंदकर लीं, कुछ समय केँ लिए उसके होंठ काँपे औऱ उसकी आँखों सें आँसू बहनेलगे।
बाबा मुस्कुराए औऱ बोले “स्वयं कों स्वीकार कर, लज्जा मतकर। जब तुँ अपनी ख़्वाहिश कों स्वीकार कर लेगी तोँ तुँ सचमुच मजबूत बनेगी, नं अपराधबोध रहेगा, नं डर। ”
लीला नें आँखें खोलीं, उसकेमन मे अपराधबोध अभि भि पूरीतरह खत्म नहि हुआ थां।
बाबा थोडा रुककर फिन सें बोले, “बेटी, महिला कि वासना भि उसकी शक्ति कां हिस्सा हैं। तूँ अपनी वासना कों राक्षसी समझरही हैं जबकि वो तेरी अंदर कि देवी हैं, उसे स्वीकार कर लेँ। ”
लीला काँपते हुए बोलीं, “बाबामगर समाज.”
बाबा मुस्कुराए औऱ बोले "तुम्हें समाज कां बोझ अपनेसिर पऱ उठाने कि कोई जरूरत नहि हैं। वासना कों दबाने वाली गुलाम बनती हैं उसे स्वीकार करने वाली उसकी स्वामिनी बन जाती हैं, अपनी वासना सें लड़मत बल्कि उसे अपनाकर देख। "
लीला नें बाबा कों प्रणाम किया औऱ उठनेलगी मगर उसकेमन मे एक् नई हिम्मत कां बीज अंकुरित हौ रहा थां जैसे हि वो जानेलगी उसकेमन मे कुछ प्रश्न आए।
लीला जल्दी मुड़कर वापस बाबा केँ पासआई औऱ बोलि “बाबा। मुझे आपसेकुछ प्रश्न पूछने हें कृपया रास्ता दिखाएं”
बाबा नें शांत नजरों सें उसे देखा औऱ मुस्कुराते हुएकहा, “पूछो बेटी”
लीला थोडा सकुचाते हुएमगर दृढ़ स्वर मे बोलीं, “बाबा, मुझे केवल शारीरिक सुख नहि चाहिए, मे मानसिक सुख भि चाहती हूं। मे किसी केँ संग केवल भोग-विलास नहि करना चाहती, मे चाहती हूं कि सामने वाले केँ संग मेरा मात्र बदन नहि, मन भि जुड़े। क्याँ यह संभव हैं?”
बाबा थोड़ीदेर चुपरहे फिन धीरे-धीरे सें बोले, "बेटी, यह प्रश्न तेरी आत्मा कि पवित्रता दिखाता हैं। सुन, सच्चा सुखतभी पूरा होता हैं जबबदन औऱ मन दोनों एक् संग तृप्त हों। ”
बाबा नें आगे समझाया, “जिस शख्स केँ संग तेरामन जुड़ेगा, वही तेरे जिस्म कों भि सच्चा सुखदे पाएगा। जबदोलोग एक्-दूसरे कों समझते हें, सम्मान देते हें, देखभाल करते हें तोँ जिस्म कां मिलन भि पवित्र होँ जाता हैं। वोँ भोग-विलास नहि, प्यार औऱ समर्पण कां रूप लें लेता हैं। तूँ डरमत, जोँ आदमी तुम को केवल शारीरिक रूप मे देखेगा, उसकेसंग तुँ कभी पूरीतरह संतुष्ट नहि होँ पाएगी मगर जौ तुम को मानसिक रूप मे स्वीकार करेगा, तेरी भावनाओं, तेरी जरूरतों कों समझेगा उसकेसंग संबंध बनाने मे कोईपाप नहि हैं। ”
बाबा लीला कि आँखों मे देखते हुए बोले “तुँ अपनी वासना कों दबाने कि बजायउसे एक् दिशादे औऱ ऐसे आदमी कों अपने जिंदगी मे आनेदे जौ तेरेमन औऱ जिस्म दोनों कों समान महत्व दे, फिन तुँ पूरीतरह संतुष्ट महसूस करेगी, न् कोई खालीपन रहेगा, न् कोई अपराधबोध, औऱ याद रखना कि तूँ विधवा हैं मगर तेरी भावनाएँ हें, जरूरतें हें उन्हें पूरा करने मे कोई बुराई नहि जब तक तुँ स्वयं कों औऱ दूसरों कों सम्मान दे। ”
लीला कि आँखों मे आँसू थें मगरयह आंसू स्पष्टता केँ थें, उसकामन बहुतहद तक शांत औऱ मजबूत हौ चुका थां।
लीला धीरे-धीरे सें बोलि “बाबा, मुझे अपने परिवार केँ रिश्तेदारों केँ प्रति गहरा मानसिक जुड़ाव हैं। वे मुझे बाहर् केँ किसी अजनबी सें ज़्यादा आकर्षित करते हें तोँ क्याँ यह बहोत बड़ापाप नहि होगा?”
बाबा नें लीला कों गहरीनजर सें देखा, उनकी आँखों मे नं तौ आश्चर्य थां, नं निंदा, मात्र करुणा थि, उन्होंने कुछदेर लीला कों सोचने कां टाइम दिया, फिन शांत स्वर मे बोले, “बेटी, यह बहोत गहरा प्रश्न हैं, पारिवारिक रिश्तों मे शारीरिक संबंध रखना बहोत संवेदनशील विषय हैं मगर सच्चाई यह हैं कि रिश्ते केवल रक्त सें नहि बनते बल्कि प्यार, विश्वास, औऱ सम्मान सें भि बनते हें। ”
बाबाआगे बोले, “ऐसे दोलोग जिनका रक्त कां नाता हैं वे एक्-दूसरे कि जरूरतों औऱ भावनाओं कों समझते हें तोँ उनका शारीरिक मिलन बाहर् केँ किसी अजनबी सें बहोत अधिक गहरा औऱ सच्चा हौ सकता हैं मगर शर्तयह हैं कि दोनों तरफ सें पूरी सहमति हौ, सम्मान हौ औऱ कोई जबरदस्ती नं होँ औऱ ऐसा संबंध एक् दिशा मे तभीजा सकता हैं जबवे परिवार कों तोड़ने कि बजाय औऱ मजबूत बनाएमगर अगरयह मात्र क्षणिक भूख हैं औऱ बाद मे अपराधबोध लाएगा तोँ वो गलत होगा। ”
बाबा नें आगे बोल्ना जारीरखा “बेटी, अगरदो लोग एक्-दूसरे कों मन, जिस्म औऱ आत्मा सें पूरीतरह स्वीकार करते हें तौ रक्त कां नाता भि बाधा नहि बन सकतामगर याद रखना कि ये फैसला बहोत सोच-समझकर लेना, कोई भि नाता दूसरों कों दुखी नहि करना चाहिए औऱ सबसे महत्वपूर्ण बात कि तुँ स्वयं सें पूछ, क्याँ यह संबंध तुम्हे संतुष्टि देगा? याँ अपराधबोध? अगर जवाब सकारात्मक हैं तोँ डरमत। "
बाबा कि बातें लीला केँ मन कों शांति देरही थींमगर एक् अंतिम प्रश्न अभि भि बाकी थां। वो थोडा हिचकिचाते हुएफिन बोलीं “बाबा.आज तक मेरा किसी पराए मर्द केँ संग शारीरिक औऱ मानसिक रूप सें बिल्कुल भि जुड़ाव नहि रहामगर अगर भविष्य मे ऐसी स्थिति बनजाए कि कोई पराया मर्द मुझे आकर्षित करे तौ ऐसी स्थिति मे मुझे क्याँ करना चाहिए?”
बाबा नें लीला कों देखा औऱ धीरे-धीरे सें मुस्कुराए औऱ बोले “बेटी, जिंदगी मे सभीकुछ पहले सें तय नहि होता। भविष्य मे अगरकोई ऐसा आदमी तेरे जिंदगी मे आता हैं जिसके संग तेरामन जुड़ता हैं, जिसके संग तुम को सुरक्षा, सम्मान औऱ सुख कां एहसास होता हैं तोँ उसे स्वीकार करने मे कोई गलती नहि हैं। पराया मर्द होँ याँ अपना, फर्क रक्त कां नहि, रिश्ते कि नीयत कां होता हैं अगर वोँ आदमी तुम्हारी तरफ स्त्री केँ रूप मे सम्मान दे, तेरी भावनाओं कों समझे औऱ दोनों तरफ सें पूरी सहमति औऱ विश्वास हौ तौ ऐसे संबंध कों स्वीकार कर लेना। परमेश्वर नें इंसान कों अकेले जीने केँ लिए नहि बनाया मगरयाद रखना कि संबंध मात्र शारीरिक भूख केँ लिए नहि बल्कि भावनात्मक जुड़ाव केँ संग होना चाहिए। कोई भि संबंध तेरे परिवार कों नुकसान नहि पहुँचाना चाहिए औऱ तुँ स्वयं कों कभी अपमानित याँ मजबूर महसूस नं करे। ”
बाबा नें लीला कि आँखों मे देखते हुएकहा, “अपनी आंतरिक आवाज़ कों सुन, अगर कोई शख्स तुझेही शांति देता हैं औऱ तुम्हे स्त्री होने कां पूरा एहसास कराता हैं औऱ तुँ उसकेसंग रहकर स्वयं कों गुनाहगार नहि मानती, तोँ डरमत। ”
लीला नें गहरी सांसली। अब उसके चेहरे पऱ एक् स्पष्ट शांति दिखरही थि, उसके तीनों सवालों केँ जवाब मिलने केँ बाद उसकामन बहुतहद तक शांत औऱ दृढ़ होँ चुका थां।
लीला नें बाबा कि नमस्ते किया औऱ भावुक स्वर मे बोलि, “शुक्रिया बाबा। आपने मेरी आत्मा कों नया जन्म दिया। आगे सें मे बिनाडरे, बिना अपराधबोध केँ अपनी जीवन जीने कि कोशिश करूँगी। ”
बाबा नें मुस्कुराते हुए आशीर्वाद दिया, “जाओ लीला बेटी, जैसासही लगे वैसा हि करना। ”
लीलावहा सें उठी, उसकेमन मे अब अपराधबोध कि स्थान स्वीकृति औऱ हिम्मत आँ गई थि। बाबा कि बातों नें उसकेमन कि अंतिम गाँठ कों भि खोल दिया थां।
लीला मुड़कर जानेलगी, तभी उसको ध्यान आया कि उसने बाबा केँ चरणस्पर्श नहि किए जैसे हि वो वापस पीछे कि तरफ देखी तोँ वहाकोई भि नहि रहा नं बाबा थें नं कुत्ता।
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