leela key rasleela ( + ) (incest special) (adultery special) – New Episode
अध्याय २
लीला नें घऱ पहुंचते हि लोटे कों एक् कोने मे रख दिया औऱ धीरे धीरे लल्लू केँ कमरे कि तरफ बढ़ी।
लीला नें धीरे-धीरे सें दरवाजे कों थोडा–सां खोला, कुछ लम्हा केँ लिए लीला दरवाजे पऱ हि खड़ीरह गई, अंदर कां नजारा देखकर उसकी सांसें भारी हौ गईं।
लल्लू गहरी नींद मे थां। सुभह कि हल्की रोशनी उसके मजबूत जिस्म पऱ पड़रही थि, उसकी धोतीकमर पर्र ढीली बंधी थि औऱ सबसे मजेदार बात कि उसका लन्ड पूरीतरह जाग चुका थां। धोती कां कपड़ा बीच मे ऊपर कि तरफतना हुआ थां औऱ एक् बड़ा सां तंबूबना हुआ थां।
लीला कि नजर सबसे पहलेउस तंबू पर्र रुक गई, कुछदेर तक वो चुपचाप खड़ीरही, उसकी आँखें उस उभरेहुए हिस्से सें हट हि नहि पारही थीं। लल्लू कां लन्ड इतना मोटा औऱ लंबादिख रहा थां कि धोती कां कपड़ा उस पऱ तनकर चिपका हुआ थां, बीच मे लन्ड केँ सिर कां उभराहुआ हिस्सा भि हल्का-हल्का नजर आँ रहा थां।
लीला कां गलासूख गय़ा, उसने अनजाने मे हि अपने होंठों कों चाटा।
“ओह रे.” वो मन हि मन बुदबुदाई।
उसनेनजर हटाने कि कोशिश कि मगरफिन सें उसकी नजरें उस स्थान चली गई, उसकी सांसें थोड़ी तेज होँ गईंफिन कुछसमय औऱ खड़ीरही औऱ चुपचाप बिना हिले-डुले बस देखती रही।
उसकेमन मे लज्जा औऱ आकर्षण, दोनों एक् संग उथल-पुथल मचारहे थें।
लीला दरवाजे पर्र खड़ी-खड़ी लल्लू कों देखरही थि, उसकीनजर उस तंबू पऱ हि अटकी हुईँ थि। लल्लू कां बदन सुभह कि हल्की रोशनी मे चमकरहा थां, खेती-बाड़ी केँ कारण उसका जिस्म बेहद मजबूत औऱ आकर्षक होँ गय़ा थां। चौड़े कंधे, मोटी-मोटी बाहें जिनमें नसें उभरी हुई थीं, छाती चौड़ी औऱ हल्के-हल्के बालों वाली, पेट सपाट थां मगर हल्की-हल्की लकीरें थीं, उसकी जांघें मोटी औऱ मजबूत थीं औऱ सबसे ज़्यादा लीला कां ध्यान खींचरहा थां उसका लन्ड।
धोती केँ अंदरबना हुआ तंबू बहुत बड़ादिख रहा थां, उसका लन्ड धोती केँ कपड़े कों खींचे हुए थां। धोती कां कपड़ा उस पऱ इतनातन गय़ा थां कि लन्ड कि मोटाई, लंबाई औऱ नसों कां हल्का उभारदिख रहा थां।
लीला नें अनजाने मे हि जांघें कसलीं, वो स्वयं कों समझाने कि कोशिश कररही थि।
“यह मेरा बेटा हैं। मेरा लल्लू.यह मे क्याँ सोचरही हूं?” वो स्वयं कों डाँटने लगी, उसके जिस्म मे अजीब–सि गर्मी फैलने लगी औऱ लज्जा सें उसका चेहरा लाल हौ गय़ा मगरफिन भि उसकी आँखें बार-बार उस स्थान जारही थीं।
“हाय रे। कितना लम्बा औऱ मोटा होँ गय़ा हैं इसका, यह मेरालाल हैं, मे अपने लल्लू कों इसनजर सें केसेदेख सकती हूं?”
एक् तरफ मम्मी कि फिक्र थि तौ दूसरी तरफ जिस्म कि भूखजाग रही थि, उसकी बुर मे हल्की-हल्की खुजली होनेलगी।
“बस लीला, बस। नजरहटा लेँ, यहगलत हैं, तूँ उसकी मम्मी हैं.” वो मन हि मन स्वयं कों समझने लगी।
मगर फिन भि उसकी सांसें तेज होँ गई थीं औऱ चूचे ऊपर-नीचे होँ रहे थें, निप्पल ब्लाउज केँ अंदर सख्त होँ गए थें।
लीला स्वयं पऱ शर्मिंदा होँ रही थि।
“काश.कोई औऱ होता.मगर यह.यह तौ मेरा अपनाखून हैं। ” लीला नें एक् गहरी सांसली औऱ स्वयं कों संभालने कि कोशिश कि।
लीला नें आखिरकार कमरे केँ अंदरकदम रखा, वो आरामसे लल्लू केँ पलंग केँ पासआई, फिन उसने लल्लू केँ पांव कों पकड़ा, जैसे हि लीला कां हाथ उसकी जांघ पर्र पड़ा, उसे एक् झुरझुरी-सि महसूस हुइ।
“लल्लू। बेटा, उठो, ” उसने हल्की आवाज़ मे कहा औऱ पेर कों हल्का-हल्का हिलाया।
लल्लू अभि भि गहरी नींद मे थां।
फिन लीला नें आगे झुककर उसके कंधे कों दोनों हाथों सें पकड़ लिया, उसकेहाथ लल्लू कि त्वचा कों छूते हि उसके जिस्म मे एक् लहर दौड़ गई, उसकी उंगलियाँ अनजाने मे हि लल्लू केँ मजबूत कंधे कों थोडा औऱ जोर सें दबारही थीं।
“लल्लू! उठरे। कितना सोएगा तूँ?” इसबार लीला कि आवाज़ थोड़ी सख्त हौ गई थि।
जब लल्लू फिन भि नहि उठा तोँ लीला नें उसके कंधे कों औऱ जोर सें हिलाया, उसका शरीर लल्लू केँ जिस्म केँ बिलकुल नज़दीक थां, उसके बड़े–बड़े चुचे ब्लाउज केँ अंदरहिल रहे थें औऱ लल्लू केँ चेहरे पऱ छूरहे थि।
“अरे लल्लू! कितनी बार पुकारूँ तुम्हारी तरफ?” लीला थोडा औऱ आगे झुककर उसकेकान केँ पास बोलीं, उसकी गर्म सांस लल्लू केँ गाल पर्र पड़रही थि।
लल्लू आखिरकार हल्का-सां करवट बदलने लगा।
लीला कि नजर एक् लम्हा केँ लिएफिन सें उसके लंड पऱ गई मगर उसने जल्दी नजरफेर ली, उसकेहाथ अभि भि लल्लू केँ कंधे पर्र थें, उसने महसूस किया कि उसकेहाथ थोड़े काँपरहे हें, लीला जल्द सें हाथ हटाकर पीछेहट गई।
लीला केँ हिलाने सें औऱ उसकी आवाज़ सुनकर आखिरकार लल्लू कि नींद टूटी।
लल्लू नें एक् लंबी कराहट भरी औऱ उठनेलगा जिससे उसकी धोती औऱ ढीली हौ गई, उसका तंबू औऱ ऊँचा होँ गय़ा, उसका लन्ड धोती केँ कपड़े कों पूरीतरह तानरहा थां, बीच मे लन्ड केँ सिर कां गोल उभारनजर आँ रहा थां।
लल्लू नें दोनों हाथों सें आँखें मलतेहुए अधूरे मन सें उठकरबैठ गय़ा, उसकेबाल बिखरे हुए थें औऱ चेहरा नींद सें भराहुआ थां।
लल्लू कुछदेर तक आँखें मलतारहा, फिन उसने नीचे अपनी धोती कि तरफ देखा। लल्लू नें जल्दी धोती कों हल्का–सां घसीटकर अपना लण्ड छुपाने कि कोशिश कि मगर तंबू अभि भि बनाहुआ थां।
लीला नें यहसभी देख लिया, उसकीनजर फिन सें वहांचली गई मगर उसने जल्दी अपनीनजर फेरली।
लल्लू नें नींद सें भरी आवाज़ मे बोला, “मां। कितनी जल्दउठा रही होँ। रात कों देर सें सोया थां मे.”
उसकी आवाज़ सें ऐसालग रहा थां कि वो अभि भि पूरीतरह जागा नहि थां, वो बैठे-बैठे जोर सें अँगड़ाई लें रहा थां।
लीला खड़ी-खड़ी उसेदेख रही थि, उसने लल्लू कों देखते हुए सख्त आवाज़ मे बोला,
“लल्लू, कितनी बार समझाऊं तुम्हें कि वक़्त पऱ उठाकर, तेरे बाप केँ जाने केँ बाद पूराघऱ तेरेऊपर हैं, औऱ तूँ अभि भि ऐसे सोता हैं जैसेकोई राजकुमार हौ। ”
लल्लू नें आँखें मलतेहुए कहा, “मां। थोडा औऱ.”
लीला नें जल्दी टोका, आवाज़ औऱ ऊँची करतेहुए बोलीं, “थोडा औऱ। हररोज कां नाटक होँ गय़ा हैं तेरा, कितना बड़ा होँ गय़ा हैं, फिन भि सुभह उठने मे इतनीआलस करता हैं, देख अपनी हालत। लज्जा नहि आती तुम को?ऐसी हालत मे तुम्हे कोईदेख गय़ा तोँ पता नहि क्याँ सोचेगा!”
लल्लू चुप होँ गय़ा।
लीला कि आवाज़ मे गुस्से केँ संग थोड़ी चिंता भि थि, वो फिन सें बोलीं, “मे सोचती हूं कि मेरा लल्लू खेत मे मेहनत करेगा, घऱ संभालेगा मगर तेरी तौ बस सोने औऱ घूमने सें फुर्सत नहि हैं, उठ! जल्द मुंह-हाथ धोफिन गरम चाय–ब्रेकफास्ट कर औऱ जल्दी खेत केँ लिए निकल औऱ साम कों भि देरमत करना, आज भि आने मे आलस किया तोँ मे स्वयं खेत सें तुझेही कान पकड़कर घसीट लाऊंगी, समझा!”
अब लल्लू नें पूरीतरह जागकर थोडा गुस्से मे बोला, “अरे मम्मी। उठ गय़ा। हररोज सुभह–सुभह बसयही सुनना पड़ता हैं मुझे”
लीला नें एक् अंतिम नजर लल्लू केँ जिस्म पर्र डाली औऱ फिन मुड़कर कमरे सें बाहर् चली गई।
So disappointed since last update koy reviews nahee aaye Still I have too se kee kahani complete karunga , pahle socha thaa kee 200 updates toh atleast likhunga lekin ab 50 updates main hi ek short kahani kee prakaar isko complete karunga
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अध्याय ३
लल्लू केँ कमरे सें बाहर् निकलने केँ बाद लीला आहिस्ता किचन कि तरफ बढ़ी औऱ किचन केँ लगभग पहुंचते हि उसे चूल्हे कि लौ कि गर्माहट औऱ गरमचाय केँ पानी कि हल्की खुशबू मिली जोँ धीमीआंच पर्र गर्म हौ रहा थां।
कोमल पहले सें हि किचन मे खड़ी थि।
कोमल नें नीलेरंग कि सलवार-कमीज पहनेहुए थि, उसके लंबे कालेबाल अभि पूरीतरह नहि बंधे थें, कुछ लटें चेहरे पर्र गिररही थीं तौ कुछपीठ पऱ बिखरे हुए थें, नींद कि वजह सें उसकी आंखें हल्के सूजी हुई थीं।
कोमल चूल्हे केँ पास खड़ी पानी कों देखरही थि, उसकी मुद्रा मे अभि भि आलस थां, उसका पूरा शरीर जवानी केँ रस सें भराहुआ थां, छातियाँ भरी औऱ उभरी हुईँ थीं जोँ साँस लेते वक्त हल्के-हल्के हिलरही थीं, उसकीकमर पतली औऱ नाजुक थि औऱ नितम्ब गोल औऱ उभरेहुए थें।
लीलाकुछ समय चुपचाप किचन केँ दरवाजे पर्र खड़ीरही औऱ अपनी बेटी कों देखती रही।
“हाय रे। कितनी जवान औऱ हसीन होँ गई हैं मेरी कोमल, इसका जिस्म कितना निखर गय़ा हैं”
लीला नें एक् गहरी सांसली, उसकीनजर कोमल कि कमर, छातियों औऱ नितंबों पर्र घूम गई, फिन वो स्वयं कों मन हि मन समझाने लगी, “अब अधिकदेर नहि करनी चाहिए, कोई अच्छे घऱ कां लड़का देखकर इसकी विवाह पक्की कर दूंगी। ”
थोड़ी देरबाद लीला नें स्वयं कों संभाला औऱ किचन मे कदमरख दिया।
“अरे कोमल.आज तोँ मेरी राजकुमारी स्वयं-ब-स्वयं उठकर किचन मे आँ गई? क्याँ बात हैं? आज नींद पूरी होँ गई याँ मम्मी कि डांट कि याद आँ गई?” लीला हल्के-हल्के मजाकिया स्वर मे बोलीं
कोमल नें मुड़कर अपनी मम्मी कों देखा, उसकेगाल अभि भि नींद सें लाल थें। वो शर्माते हुए हल्का सां मुस्कुराई औऱ बोलि “मम्मी। तुम् हि तोँ रोज–रोज बोलती हौ कि जल्दउठा कर वरना ससुराल जाएगी तौ केसे रहेगी"
लीला चूल्हे केँ पासआकर बैठते हुए बोलि “औऱ नहि तोँ क्याँ! तुम को उठाऊं न् तौ तूँ अभि तक चारपाई सें चिपके पड़ेरहे, औऱ थोडा–सां होश मे भि रहाकर, देख तौ अपनी हालत.बाल बिखरे हुए हें, तूँ अब छोटी बच्ची नहि रही, जवान हौ गई हैं"
कोमल अपने बालों कों पीछे करतेहुए बोलि, “मम्मी सुभह-सुभह हि डांटना शुरुआत कर दिया तुमने.”
लीला हल्का–सां ऊंची आवाज़ मे बोलीं, “दिनभर तौ तुम्हे समझाती रहती हूं कि उठते हि सबसे पहले स्वयं कों संभालो, फिनकाम करो। तुँ तोँ जैसे अभि भि विद्यालय कि लड़की हौ, चल जल्द सें बाल बाँधफिन कुछकर। ”
कोमल हल्के सें मुस्कुराते हुए बोलीं “मेरी सासू मतबनो.” औऱ अपनेबाल बांधने लगी।
लीला चूल्हे केँ पासबैठ गई औऱ गरमचाय कां चम्मच घुमाने लगी। कोमल नें अपनेबाल पीछे बाँधे औऱ फिनआटे कि लोई बेलने लगी।
लीला नें चुपचाप कोमल कों काम करते देखा, फिन धीरे-धीरे सें बोलीं, “आज क्याँ-क्याँ बनाएगी, मेरी बेटी?"
कोमल नें रोटी बेलते हुए जवाब दिया, “माँ, दाल औऱ आलू कि सब्जी बना लूँगी औऱ अगर तुम् बोलो तौ रायता भि सजधजकर करदूँ। ”
लीला मुस्कुराती हुई बोलि, “हाँ, रायता भि बनादे, लल्लू खेत सें थककर आएगा, उसे अच्छा लगेगा”
कोमल रोटी सेंकती हुई बोलि "जी माँ."
लीला नें गरमचाय कों अच्छे सें उबालने लगीतभी उसे पिछवाड़े सें जानवरों कि आवाज़ सुनाई दि “कोमल, आज तूने जनावरों कों चारा डाला याँ नहि?”
“नहि मम्मी, मे तोँ अभि–अभि आई हूं। ” कोमल बोलीं
लीला नें हल्का सां क्रोध किया, “देख, यह हि तौ दिक्कत हैं तुझेही हरकाम याद दिलाना पड़ता हैं, कल सें तूँ सुभह उठकर सबसे पहले जनावरों कों चारा डालेगी, मे अकेली कितने काम करूँ?”
कोमल रोटी पलटते हुए बोलि, "कल सें ध्यान रखूँगी। ”
लीला नें गरमचाय कां कप सजधजकर करतेहुए कोमल कि तरफ देखा औऱ बोलि, “लड़कियों कों घऱ केँ सारेकाम आने चाहिए, विवाह केँ बाद तौ तेरी अकेले हि ससुराल केँ पूरेकाम करने पड़ेंगे। ”
विवाह कि बात सुनते हि कोमल केँ गाल हल्के सें लाल होँ गए, उसने नजरें झुकाली औऱ चुपचाप रोटियाँ सेंकती रही।
लीला नें कोमल कि लज्जा देखकर हल्का सां मुस्कुराया मगरकुछ बोलीं नहि, फिन लीला नें एक् कपगरम चाय कोमल कि तरफ बढ़ाया औऱ स्वयं दूसरा कप लेकरबैठ गई।
फिन लीला धीरे-धीरे सें बोलीं, “कोमल। तुँ अब२४साल कि होँ गई हैं कोमल। देख, कितनी जवान औऱ हसीन होँ गई हैं तूँ, अब तुम्हारी तरफ विवाह कां ख्याल करना चाहिए। ”
कोमल केँ गाल जल्दी लाल होँ गए, उसने नजरें झुकाली औऱ बोलीं, “मम्मी। इतनी भि क्याँ जल्द हैं? तुँ अकेली घऱ केँ काम-धाम केसे देखेगी?”
लीला नें गरमचाय कां घूँट लेतेहुए सिर हिलाया, “तुँ घऱ कि चिंता मतकररे, तेरी क्याँ लगता हैं मे तुझसे घऱ केँ काम किसलिए करने केँ लिए देती हूं कि मे थक जाती हूं, नहि रे!यह तोँ बस एक्सक्यूज़ हैं। तेरी विवाह कि उम्र हौ चुकी हैं औऱ तूँ ‘इतनी भि क्याँ जल्द हैं’ बोलरही हैं। ”
कोमल थोडा शर्मा कर बोलीं “मम्मी, मगर विवाह मे देने केँ लिए दहेज कहां सें लाएगी?”
लीला नें गंभीर स्वर मे बोला, “पहले तुँ स्वयं कों सजधजकर कर विवाह केँ लिए, इतनामत सोचाकर। मे तेरी मम्मी हूं, बस एक् अच्छा घऱ औऱ लड़का चाहिए, लल्लू नें खेतों मे इतनी मेहनत कि हैं कि ठीक–ठाक पैसेजमा होँ गए हें बाकी इधर–उधर सें इंतजाम हौ जाएगा बस तुँ अपनामन बना लें"
कोमल केँ चेहरे पऱ लज्जा केँ संग थोड़ी–सि उलझन भि थि।
लीला नें कोमल केँ कंधे पऱ हाथ रखतेहुए नरम स्वर मे बोला, “कोमल, मे तेरी खुशी चाहती हूं। तुँ मेरी इकलौती बेटी हैं, अगर तेरी विवाह कि उम्र निकल गई तोँ अच्छे घऱ कां लड़का नहि मिलेगा"
कोमल चुपचाप सुनरही थि, उसकी उंगलियाँ रोटी सेंकते हुए थोड़ी–थोड़ी काँपरही थीं।
लीला नें फिन सें केहना शुरुआत किया“सुन, मैंने सोचा हैं। अगरइस बारफसल सें ठीक–ठाक मुनाफा हौ गय़ा तौ तेरी विवाह कां प्रोग्राम शुरुआत कर दूंगी, आजकल अच्छे घऱ कि लड़कियों कि विवाह २०-२२साल कि उम्र मे होँ जाती हैं औऱ तुँ तोँ पहले सें हि देरकर चुकी हैं। ”
कोमल नें शर्माते हुए धीरे-धीरे सें पूछा, “मम्मी। आपनेकोई लड़का देखा हैं क्याँ?”
लीला नें गरमचाय कां कप रखतेहुए कहा, “अभि तौ नहि देखामगर सोचरही हूं, मुझे तोँ ऐसा लड़का चाहिए जौ खेती-बाड़ी वाला होँ, घऱ संभालने वाला होँ, पढ़ा-लिखा होँ मगर शहरिया नं हौ देहात कां हि होना चाहिए ताकि तुम को अपनी मम्मी सें अधिकदूर न् जानां पड़े। ”
कोमल नजरें झुकाकर बोलीं, “मम्मी। इतनी जल्द। मुझे तौ डरलगरहा हैं। ”
लीला नें कोमल कां हाथ पकड़ लिया औऱ बोलि, “ किसबात कां डर?देख कोमल, हर लड़की कों विवाह करनी पड़ती हैं, मुझे भि डरलगा थां जब तेरे बाप सें मेरी विवाह हुई थि बस उसकी शराब पीने कि आदत खराब थि मगर जिम्मेदार व्यक्ति थां औऱ तुझेही अच्छा घऱ मिलेगा, अच्छा पति मिलेगा, फिन तुँ अपनी दुनिया बसाएगी। पति केँ जाने केँ बाद मे कितना तरसती हूं वोँ तोँ तुँ देख हि रही हैं, मे तेरेलिए ऐसा नहि चाहती। ”
कोमल केँ गाल पूरे केँ पूरेलाल हौ गए, तरसने कां मतलब वो भली–भांति जानती थि।
लीला नें कोमल कां हाथ थोडा जोर सें पकड़ते हुए बोला "कोमल, मे तेरी सहायता करूंगी मगर फैसला तुम्हारी तरफ लेना हैं। ऐसा लड़का पसन्द करना जोँ तुम्हे सम्मान दे औऱ साधारण, मेहनती औऱ परिवार वाला लड़का होना चाहिए।
कोमल नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया मगर उसके चेहरे पर्र लज्जा, घबराहट औऱ थोड़ी उत्सुकता कां मिश्रण थां।
लीला नें मुस्कुराते हुएकहा, "विवाह तोँ तुम्हारी तरफ करनी हि हैं बस अच्छा घऱमिल जाए, फिन देख्ना कितना अच्छा लगेगा। ”
कोमल नें अंतिम रोटी सेंक केँ गैसबंद कर दि।
लीला नें कोमल केँ सिर पऱ प्रेम सें हाथ फेरते हुए बोला, "मे तेरी जीवन केँ लिए हि सोचरही हूं तूँ बस इतनासमझ लें कि तुम्हे बसहां याँ नाँ करना हैं बाकीसभी कुछ मे देख लूंगी। ”
कोमल नें धीरे-धीरे सें सिर हिलाया।
लीला नें कोमल कि पीठ पर्र हल्का सां हाथरखा औऱ फिन जानवरों कों चारा डालने केँ लिएघऱ केँ पिछवाड़े मे चली गई।
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अध्याय ४
घऱ केँ अंदर पूरीतरह सन्नाटा छायाहुआ थां। लल्लू सुभह-सुभह खेतों मे काम करनेचला गय़ा थां औऱ कोमल अपनी सहेली केँ घऱ गई थि औऱ लीलाघऱ पर्र अकेली थि।
लीला आंगन मे पुरानी लकड़ी कि चारपाई पर्र बैठी हुई थि, उसके सामने एक् पुरानी साड़ी पड़ी थि जिस पर्र सें वो धूल झाड़रही थि मगर उसका ध्यान बिलकुल कहीं औऱ थां, उसका भारी-भरकम शरीर गर्मी केँ कारण पसीने सें तर थां, ब्लाउज उसके मोटे, भरे हुए स्तनों पऱ तनी हुईँ थि, गर्दन सें लेकर क्लीवेज तक पसीना बहरहा थां। बीच-बीच मे उसकी सांसें भारी हौ रहीथीं स्तनों केँ निप्पल ब्लाउज केँ अंदर सख्त होकरचुभ रहे थें औऱ उसकी बुर मे हल्की-हल्की मगर लगातार खुजली हौ रही थि।
लीला नें एक् लंबी, गहरी सांसली, उसने स्वयं कों मन हि मन डाँटा “क्याँ सोचरही हैं तूँ लीला?यह गलत हैं। लल्लू तेरा बेटा हैं। तूँ विधवा हैं। ”
मगर जितना वो स्वयं कों समझाने कि कोशिश कररही थि उतना हि उसके शरीर मे आग बढ़ती जारही थि। उसकी जांघें आपस मे कस गई थीं, वो अनजाने मे हि अपनी जांघों कों रगड़रही थि जिससे बुर मे हल्की-हल्की सनसनी बढ़रही थि।
आज सुभह कि घटना नें उसकीभूख कों औऱ उकसा दिया थां। लल्लू केँ कमरे मे उसका ढीली धोती केँ अंदरतना हुआ लम्बा औऱ मोटा उभार, बार-बार उसकेमन मे घूमरहा थां।
तभी अचानक दरवाजे किसी कि दस्तक हुई।
“भाभी.घऱ पऱ हौ क्याँ?”
लीला चौंककर खड़ी होँ गई, उसने जल्द सें साड़ी कां पल्लू ठीक किया औऱ आरामसे दरवाजे कि ओरबढ़ गई, उसकेमन मे हल्का-सां डर औऱ उत्सुकता दोनों एक् संगउभर रहे थें, उसने दरवाजा खोला तौ सामने रामू खड़ा थां।
रामू, चालीस साल कां, ठरकी व्यक्ति थां। तालाब केँ किनारे उसका छोटा–सां घर-मकान थां। रामू, लीला कां देवर जी थां, उसकी पत्नि शशि, पैंतीस साल कि, गृहिणी थि। बेटी नीतू, उन्नीस साल कि, घऱ केँ काम मे अपनी मम्मी कि सहायता करती थि। साला संजय, तीस साल कां, देहात मे छोटा–सां मेडिकल स्टोर चलाता थां।
“अरे देवरु जी। तुम्?” लीला नें थोडा हैरानी सें मगर सामान्य स्वर मे कहा।
रामू नें मुस्कुराते हुएकहा, “हाँ भाभी, मे हि हूं। कैसी होँ? अंदर आँ सकता हूं?”
लीला नें हल्का सां हिचकिचाते हुए दरवाजा थोडा औऱ खोला औऱ बोलीं, “ठीक हूं, हाँ। आँ जाओ”
रामू अंदरआया औऱ पुरानी चौकी पर्र बैठ गय़ा, उसने चारों तरफनजर दौड़ाई औऱ पूछा, “भाभी, आज घऱ मे बिलकुल सन्नाटा हैं, लल्लू औऱ कोमल कहां हें?”
लीला खड़ी-खड़ी हि बोलि, “लल्लू तोँ सुभह–सुभह खेतचला गय़ा थां। कोमल अपनी सहेली केँ घऱ गई हैं, दोनों साम कों हि लौटेंगे। ”
रामू नें सिर हिलाया औऱ बोला, “अच्छा। तोँ आज तुम् पूरीतरह अकेली हौ। ”
लीला कों ये वाक्य थोडा अजीबलगा, वो हल्के सें बोलीं, “हाँ देवरु जी, अकेली हि हूं, क्यूं?”
रामू नें आहिस्ता चौकी पऱ पीछेटेक लगाई औऱ मुस्कुराते हुएकहा, “भाभी, पिछले महीने सें गेहूँ केँ फसल कि कटाई मे रात-दिन लगाहुआ थां। आज थोडा टाइम मिला तोँ सोचा कि चलो भाभी केँ पास होँ आऊँ। ”
लीला नें साड़ी कां पल्लू ठीक करतेहुए कहा, “अच्छा! देवर जीजी, मे गरमचाय बनाकर लाती हूं। ”
लीला मुड़कर किचन कि ओर बढ़ी तोँ रामू कि नजर उसके हिलते-डुलते गोल नितंबों पऱ चली गई, लीला नें उसकीनजर महसूस कि जिससे उसके भारी–भरकम जिस्म मे एक् हल्की-सि सिहरन दौड़ गई।
रामू नें पीछे सें आवाज़ लगाई, “भाभी, गरम चाय मे थोड़ी ज़्यादा चीनी डालना, धूप सें आया हूं पूराबदन सूख गय़ा हैं। ”
लीला नें बिना मुड़े हल्के सें जवाब दिया, “ठीक हैं। देवरु जी”
किचन मे लीला नें गरमचाय कां पानी चढ़ाया, उसकेहाथ हल्के काँपरहे थें। रामू कि नजरें उसके अंदर मौजूद बेचैनी कों औऱ बढ़ारही थीं।
लीला किचन सें गरमचाय कां ट्रे लेकर वापस आंगन मे आँ गई, रामू चौकी पऱ धीरे-धीरे बैठा थां, उसने लीला कों आतेहुए देखा तोँ बिल्कुल सीधा होँ गय़ा।
लीला नें गरमचाय कां कप रामू केँ सामने रख दिया औऱ स्वयं उसके सामने वाली चौकी पर्र अपनी साड़ी कां पल्लू ठीक करकेबैठ गई।
रामू नें गरमचाय कां कप उठाया, एक् घूँट लिया औऱ बोला, “भाभी, गरम चाय तोँ बहोत अच्छी बनाई हैं तुमने। ”
लीला नें हल्के सें सिर हिलाया औऱ बोलीं, “शुक्रिया, देवरु जी। ”
कुछ देरचुप रहने केँ बाद रामू नें बात शुरुआत कि, “भाभी, आजकल खेतों कि हालत देखकर मन खराब हौ जाता हैं। ”
लीला नें गरमचाय कां घूँट लेतेहुए पूछा, “क्यूं? फसल अच्छी नहि आई क्याँ?”
रामू नें सिर हिलाया औऱ बोला, “फसल तोँ ठीक-ठाक आई हैं, मगर समस्या यह हैं कि खेत बहोत सूखगए हें भाभी, मिट्टी पूरीतरह सूखकर कड़ी हौ गई हैं।
लीला बोलि "तोँ ठीक सें पानी क्यूं नहि डालरहे होँ, देवरु जी?"
रामू नें आगेकहा, “सूखेखेत मे मात्र पानी डालने सें काम नहि चलता, भाभी। उसकी अच्छे सें जुताई करनी पड़ती हैं हल कों गहराई तक घुसाना पड़ता हैं फिन तेज़-तेज़ सें चलाना पड़ता हैं, बार-बार फेरना पड़ता हैं। ”
लीला कि सांस थोड़ी तेज हौ गई, उसने शर्माते हुएकहा, “देवर जीजी, तुम् कहना क्याँ चाहते होँ?”
रामू नें लीला कि आँखों मे देखते हुए मुस्कुराकर कहा, "देखो भाभी, तुम्हारा खेत भि तौ पांचसाल सें सूखा पड़ा हैं भैया केँ जाने केँ बाद शायद उसमें कोई भि हल नहि डाला गय़ा, मिट्टी कितनी कड़ी होँ गई होगी, तुम्हारे खेत कों भि तोँ अंदर तक प्यास लगी होगी।
लीला कां चेहरा लज्जा सें लाल होँ गय़ा, उसने नजरें झुकालीं, उसके अंदरफिन सें गर्मी बढ़ने लगी थि मगर बाहर् सें उसने स्वयं कों संभालते हुएकहा, “मेराखेत सूखा हैं तोँ क्याँ हुआ? तुम्हें उसकी इतनी चिंता क्यूं होँ रही हैं देवरु जी!”
रामू नें गरमचाय कां अंतिम घूँट लिया औऱ धीरे-धीरे सें बोला, “चिंता इसलिये हौ रही हैं भाभी, क्योंकि मेरे भैया कां खेत हैं औऱ जब मे देखता हूं कि घऱ कां खेत सूखा पड़ा हैं, तोँ मन नहि मानता। ऐसा लगता हैं कि अगरकोई मजबूत हलडाल दियाजाए, अच्छे सें जुताई कर दि जाए तोँ शायदखेत फिन सें हरा-भरा औऱ रसीला होँ सकता हैं। ”
लीला कि सांसें तेज होँ गई थीं, उसके बूब्ज़ हल्के-हल्के ऊपर-नीचे होँ रहे थें, उसका चेहरा औऱ लाल हौ गय़ा, उसनेगरम चाय कां कप नीचेरख दिया। लीला कि जांघें आपस मे कस गई, उसकी बुर मे गर्मी बढ़रही थि औऱ वो अनजाने मे हि अपनी जांघें रगड़रही थि।
लीला हल्का सां तेज स्वर मे बोलीं "यह क्याँ बकवास कररहे हौ देवरु जी?"
रामू नें आगे झुकते हुए धीमीमगर स्पष्ट आवाज़ मे कहा, "बकवास नहि सचबोल रहा हूं, भाभी। जब भि मे तुम्हारे खेत केँ पास सें गुजरता हूं तोँ मुझेदुख होता हैं। "
लीला नें लज्जा सें नजरें झुकाए रखतेहुए हल्के सें कहा, “देवर जीजी। मेरेखेत कि चिंता करने कि कोई जरूरत नहि हैं तुम्हें?”
रामू नें मुस्कुराते हुए जवाब दिया,
“जरूरत केसे नहि हैं भाभी, तुम्हारे खेत कों बहोत टाइम सें जुताई नहि मिली हैं, बस तुम् एक् बार इजाजत देदोफिन जितना पानीखेत केँ लिए लगेगा उतना पानी लगातार डालता रहूंगा। ”
लीला कि बुर अब पूरीतरह गीली होँ चुकी थि औऱ अंदर सें हल्के-हल्के सिकुड़–फैल रही थि।
लीला संकोच करतेहुए बोलि, “बसकरो! देवर जी–भाभी केँ बीचऐसी बातें शोभा नहि देतीं। "
रामू नें हल्के सें हँसकर कहा, “देवर जी हूं इसलिये तोँ कहरहा हूं भाभी, मे सोचता हूं कि मे अपना मजबूत हल लेकर आँ जाऊँ, पहले तोँ खेत कों अच्छे सें गहराई तक जोतदूँ फिन इतना पानी डालूँ कि सूखी मिट्टी पूरीतरह भीगजाए औऱ नरम होँ जाए। ”
लीला नें नजरें झुकाए रखतेहुए धीरे-धीरे सें कहा, “मुझे बहोत लज्जा आँ रही हैं देवरु जी, ऐसी बातें मतकरो"
फिन भि रामू रुका नहि, वो थोडा औऱ आगे झुककर बोला, “लज्जा कि क्याँ बात हैं भाभी, मे तोँ बसखेत कि बातकर रहा हूं अगरखेत मे कोईहल नहि डालाजाए तोँ मिट्टी बिलकुल बंजर होँ जाती हैं घऱ कां सूखाखेत देखकर कोई भि किसान चुप नहि रह सकता, अभि भि हल नहि डाला गय़ा तौ आगे चलकर औऱ मुश्किल पैदा हौ सकती हैं। ”
लीला नें नजरें झुकाए रखतेहुए कहा, “तौ तुम् क्याँ चाहते हौ? देवरु जी”
रामू नें लीला कि आँखों मे देखते हुए जवाब दिया, “भाभी, बस तुम्हारे खेत कां किसान बनना चाहता हूं मे, एक् बार शुरुआत किया तौ रुकूँगा नहि। जब तक खेत पूरीतरह हरा–भरा न् होँ जाए। ”
लीला कि सांसें औऱ तेज होँ गई थीं, उसके भारी मम्मों तेजी सें ऊपर-नीचे हौ रहे थें, वो अनजाने मे हि अपनी जांघें कस-कसकर रगड़रही थि, उसकी बुर मे इतनी गर्मी औऱ खुजली हौ रही थि कि उसकी बुर सें रस बूंद–बूंद करकेटपक रहा थां।
लीला लज्जा सें लाल चेहरे केँ संग बोलीं, “देवर जीजी, शशि कों पताचल गय़ा तौ क्याँ सोचेगी?”
रामू नें हँसते हुएकहा, “शशि कों कुछपता नहि चलेगा औऱ मे तोँ बस अपना फर्ज निभारहा हूं। घऱ कां खेत सूखा पड़ा देखकर मुझे बुरा लगता हैं। मे एक् नौकर कि तरह अपनी मालकिन केँ खेत कि पूरी देखभाल कर सकता हूं। ”
लीला नें एक् गहरी सांसली, उसकागला सूखरहा थां। वो धीरे-धीरे सें मगर गंभीर स्वर मे बोलि “देवरु जी.अबबस करो! एक् शब्द भि औऱ अपने मुंह सें निकाला तौ मुझसे बुराकोई नहि होगा। "
रामू नें लीला केँ शर्माए हुए चेहरे कों देखा। वो जान गय़ा थां कि उसकी बातें लीला कों अंदर हि अंदर प्रभावित कररही हें। फिन भि उसने अंतिम तीर चलाया, “ठीक हैं भाभी, मे चुप होँ जाता हूं मगरयाद रखना.जब भि तुम्हारे खेत कों अंदर सें तेज प्यास लगे तोँ एक् बारयाद कर लेना। ”
लीला बिनाकुछ कहेबस नजरें झुकाए बैठीरही, उसके जिस्म मे आगलगी हुइ थि।
रामू नें एक् अंतिम नजर लीला केँ भरेहुए स्तनों औऱ गोल नितंबों पर्र डाली, फिन मुस्कुराते हुए बोला, “अच्छा भाभी, अब मे चलता हूं। खेत भि जानां हैं। ”
रामू नें दरवाजे कि ओरकदम बढ़ाए औऱ बाहर् निकल गय़ा।
leela key rasleela ( + ) (incest special) (adultery special) - Continue reading next part
Badhia update bhay.accha kiya aapne joo thora mahaul bnaa rahe hu warna sidhe chudayi hu jati too majaa nahee ata.iintazaar rahegi agle update kee.
BSs ek baat Leela kee raasleela sirf uske Bete k sath hi hnaa chahiye. BAAP kee dharti jaydaad jarr aur joru par beta kaa adhikar hotha h. yeh dhyan mai rkh kr kahani likhna. koy 3rd person Leela k ghrr kee pratishta na loot sake
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