Mukkader kaa sikander – New Episode
हसन मिर्ज़ा अब अलिना केँ घऱ अक्सर आनेलगा थां।
घऱ मे सबकोयह एहसास होँ चुका थां कि अलिना औऱ हसन केँ बीचकुछ चलरहा हैं।
अलिना कि अम्मी, अब्बू, भइया, भाभी—सभी ख़ुश थें उन्हें लगरहा थां अब अलीना कां भि घऱबस जायेगा
16 साल कां सिकंदर.
जोँ अब तक इस दुनिया कि सच्चाइयों सें अनजान थां,
उसेकुछ समझ नहि आँ रहा थां।
वोँ मासूमियत सें अलिना केँ पासआया
"अम्मी, यह मिर्ज़ा अंकल रोज़-रोज़ क्यूं आते हें?"
अलिना हल्का सां मुस्कुराई।
"बिज़नेस मीटिंग होती हैं, बेटा। "
सिकंदर नें झिझकते हुएकहा
"पऱ अम्मी, यह तोँ हर रोज़ हि आते हैं?"
अलिना नें उसकेगाल थपथपाया।
"कुछ वक्त मे सभीठीक हौ जाएगा। "
सिकंदर नें सिर हिला दिया।
उसे अब भि समझ नहि आँ रहा थां,
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दूसरी ओर, हसन मिर्ज़ा कों सिकंदर ज़रा भि पसन्द नहि थां।
कईबार वोँ यहबात अलिना कों जता चुका थां।
जब भि हसनआता तोँ वोँ कभी अलीना कों अकेला नहि पता हमेसा सिकंदर उसकेआगे पीछे घूमता रहता थां। हसन कों अलीना केँ संग अकेले बहोत कम वक्तमिल पाता थां। अलीना जब देखती हसन सिकंदर केँ उसकेपास होने सें ख़ुश नहि हैं तौ वोँ सिकंदर कों वहां सें जाने कों बोलती पऱ जब तक सिकंदर कों अलीना सें डाट नहि परती वोँ नहि जाता थां.
हसन मिर्ज़ा कि बातों मे अजीब सां नशा थां।
अलिना जब भि उससे मिलती, वोँ बाकी दुनिया कों भूल जाती।
पऱ एक् तकलीफ़ थि।
सिकंदर।
वोँ हमेशा अलिना केँ आस-पास घूमता रहता।
जहाँ अलिना जाती, सिकंदर पीछे-पीछे चलाआता।
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आज भि कुछऐसा हि हुआ।
अलिना औऱ हसन ड्राइंग रूम मे बैठे थें।
सामने गरमचाय केँ प्याले रखे थें, पर्र अलिना कि नज़रें केवलहसन पऱ थीं।
तभी सिकंदर अंदरआया।
उसकी नीली आँखों मे मासूमियत थि, पऱ हसन केँ चेहरे पऱ चिढ़।
हसन नें अपनी मुठ्ठी कसली।
उसने बुरा-सां मुँह बनाया औऱ धीरे-धीरे सें कहा—
"यह लड़का हमेशा हमारे बीच आँ जाता हैं। "
अलिना नें गहरी साँसली।
वोँ जानती थि, हसन कों यह पसन्द नहि।
उसे सिकंदर कों यहा सें हटाना हि होगा।
"सिकंदर, बाहर् जाओ। "
सिकंदर नें अपनी मम्मी कि तरफ देखा।
"अम्मी, मे बस यहीं बैठूँगा। मे आपकोतंग नहि करूँगा। "
हसन नें अपनी आँखें घुमालीं औऱ चोर आवाज़ मे स्वयं सें बोलता हैं.
"देखा?यह बच्चा नहि, सिरदर्द हैं। "
अलिना नें गुस्से सें सिकंदर कों देखा।
"सिकंदर, मैंने कहा नां, बाहर् जाओ!"
पर्र सिकंदर अपनी स्थान खड़ारहा।
उसकी आँखों मे दुख थां।
उसेसमझ नहि आता थां हसन केँ सामने उसकी मां उससे इतनीदूर क्यूं भागने लगती हैं
हसन नें एक् ठंडी हँसी हँसी।
"अगर इसे तमीज सिखाई होती तौ आजयहयूँ जिद नहि करता। "
अलिना कां क्रोध औऱ बढ़ गय़ा।
उसने सिकंदर कि कलाई पकड़कर खींचा।
"जिद करनाबंद करो! तुम् हमेशा मेरे इर्द-गिर्द क्यूं घूमते रहते होँ? जाओयहा सें!"
सिकंदर नें अपनी मम्मी कों देखा।
अलिना नें अपनी नज़रों सें उसेकाट दिया।
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सिकंदर चुपचाप बाहर् चला गय़ा।
उसकीपीठ झुकी हुइ थि, उसकीचाल धीमी थि।
हसन - "अलिना, यह लड़का बहोत ज़िद्दी औऱ बदतमीज़ लगता हैं। "
अलिना हैरान रह गई।
"कैसी बातें कररहे होँ, हसन? वोँ मेरा बेटा हैं!"
हसन नें आंखें मटकाईं।
"बेटा हैं, पर्र नखरे तौ किसी नवाब सें कम नहि करता!"
सिकंदर बच्चा हैं, उसे दुनिया कि समझ नहि हैं अभि। " अलीना नें अपनासर झुकाते हुवे बोला.
हसन तंज़भरी हंसी हंसा।
"बच्चा? हद हैं, अलिना! तुम्हें समझना चाहिए कि अब तुम्हारी ज़िंदगी बदल चुकी हैं। "
"इस लड़के कि आदतें मुझे बिलकुल मनपसंद नहि!"
अलिना नें नज़रें फेरलीं।
"अभि तौ नई-नई मुलाक़ात हुइ हैं। कुछ वक्त मे सभीठीक होँ जाएगा। "
पर्र क्याँ वाक़ई?
क्याँ सभीठीक होँ पाएगा?
याँ फिनयह नाता, एक् तूफ़ान कि दस्तक थि?
हसन मिर्ज़ा अक्सर अलिना केँ सामने सहबाज कि तारीफें करता।
"अलिना, मेरा बेटा सहबाज तोँ बेहद समझदार हैं। "
"हरकाम मे परफेक्शन! औऱ एकदम जिम्मेदार!"
अलिना मुस्कुरा देती।
पहलेयह बातें उसे नज़रअंदाज़ करने लायक लगतीं,
पर्र अब, धीरे धीरे उसकेमन मे सहबाज कि छवि एक् "आदर्श बेटे" कि बननेलगी थि।
अबहरबार जब सिकंदर कोई छोटी-मोटी गलती करता,
तौ अलिना केँ मन मे सहबाज कि छवि उभरने लगती।
"काश, सिकंदर भि सहबाज जैसा होता."
"इतना जिम्मेदार, इतना सलीकेदार!"
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पऱ सिकंदर अब भि मासूम थां।
उसेअब भि नहि पता थां कि
जिस मम्मी कों वो अपनी पूरी दुनिया समझता हैं,
उसकेदिल मे उसकेलिए ज़हरफिन सें पलनेलगा थां।
वही ज़हर, जोँ उसके जन्म केँ समय उमड़ा थां।
जिसे उसकी मासूमियत नें, उसकेहर मासूम हँसी नें,
कहींदबा दिया थां।
पर्र अब वोँ ज़हरफिन सें लौटरहा थां.
आहिस्ता। पर्र लौटरहा थां।
सिकंदर कों अब भि नहि पता थां कि उसकी मम्मी केँ दिल मे क्याँ चलरहा हैं।
वोँ अब भि वही मासूम लड़का थां जोँ अपनी मां कि खुशी मे हि अपनी दुनिया देखता थां।
पर्र अब, अलिना कां रवैया आहिस्ता बदलने लगा थां।
अब वोँ उसे ताने मारने लगी थि।
"सिकंदर, तुम्हें कुछ अक़्ल हैं भि याँ नहि?"
"तुम् हरबात मे लापरवाह क्यूं रहते होँ?"
"कुछ सीखो सहबाज सें। हर चीज़ मे परफेक्ट!"
सिकंदर चुपचाप खड़ा रहता,
उसकी नीली आँखों मे अब मासूमियत कि स्थान अजनबी सां दर्द दिखने लगा थां।
पर्र वोँ कुछ नहि कहता, बस अपनी मां कि बातों कों अपनेदिल मे समेट लेता।
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एक् दिन, जब सिकंदर गलती सें पानी गिरा बैठा,
अलिना गुस्से सें आगबबूला हौ गई।
"बसकरदो सिकंदर! हर स्थान गंदमचा कररख देते हौ!"
"तुमसे तौ बेहतर सहबाज हैं, कम सें कम किसीकाम कां तोँ हैं!"
यह पहलीबार थां जब अलिना नें सीधे-सीधे उसे सहबाज सें कमतर बताया थां।
सिकंदर हैरान थां, मगरअब भि चुप।
उसने अपनी मां कों देखा,
वोँ पहले जैसी नहि रही थि।
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राहिल नें एक् दिन सिकंदर सें पूछा,
"भइया, तुम्हारी तरफ नहि लगता कि तेरी मम्मी बदल गई हैं?"
सिकंदर मुस्कुरा दिया, मगर उस हंसी मे अब पहले जैसी गर्माहट नहि थि।
"नहि रे, मां तोँ मम्मी होती हैं। बस मे हि अच्छा बेटा नहि हूं। "
राहिल गुस्से सें तिलमिला गय़ा।
"तूँ पागल हैं क्याँ सिकंदर? अपनी मां कों ईश्वर मतबना!"
"सुन भइया, कुछ माँएँ ऐसी भि होती हें जौ अपने बच्चों कों प्रेम करनाभूल जाती हें!"
सिकंदर नें राहिल कि बात पर्र ध्यान नहि दिया,
मगर उसदिन पहलीबार उसकी मासूमियत डगमगाई थि।
उसकी आँखों मे एक् डर सां आँ गय़ा थां।
क्याँ सच मे उसकी मम्मी उसे प्रेम करनाभूल रही थि.?
सहबाज अब अलिना केँ घऱ कां एक् हिस्सा बन चुका थां।
जब भि आता, लोग उसकी तारीफों केँ पुल बांध देते।
घऱ मे हरकोई उससे बेहदखुश थां—अलिना केँ भइया, भाभी, मां, यहा तक कि अलिना स्वयं।
वोँ चाहती थि कि सिकंदर भि सहबाज जैसाबने।
"सिकंदर, सहबाज केँ संग खेलाकर। "
"कुछ तौ सीख उससे, देख कैसा समझदार लड़का हैं!"
सिकंदर धीरे-धीरे सें गर्दन हिलाता, पर्र उसे सहबाज सें खेलना पसन्द नहि थां।
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शुरुआत मे सहबाज नें भि सिकंदर कों बड़े प्रेम सें अपनाया।
उसे नई-नई चीज़ें सिखाने कि कोशिश करता,
"देख सिकंदर, ऐसेबैट पकड़ते हें."
"फुटबॉल ऐसे खेली जाती हैं."
पऱ वक़्त केँ संग सहबाज कां असलीरंग दिखने लगा।
अब वोँ सिकंदर कों नज़रअंदाज़ करनेलगा,
उसे छोटा औऱ बेकार समझने लगा।
असलीखेल तब शुरुआत हुआजब उसने अलिना केँ बारे मे गंदी बातें बोलनी शुरुआत कर दि।
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एक् दिन, जब दोनों गार्डन मे बैठे थें, सहबाज नें अचानक हंसते हुएकहा—
"दोस्त, तेरी मां तौ बड़ीहॉट हैं!"
सिकंदर चौंक गय़ा।
उसने अपनी नीली आँखों सें सहबाज कों घूरा।
"क.क्याँ?"
सहबाज हंसा,
"अबे, तेरी नहि लगता तेरी मां बहोत अधिक हसीन हैं?"
"पता नहि अब्बा (हसन मिर्ज़ा) केसे स्वयं कों रोक पाते हें!"
सिकंदर कां रंग पीलापड़ गय़ा।
"चुपकर, ऐसी बातें मतकर!"
सहबाज नें उसे हल्के सें धक्का दिया।
"अबे, तुँ तोँ सीरियस होँ गय़ा! मै तोँ मज़ाक कररहा थां!"
पर्र सिकंदर कों यह बिल्कुल मज़ाक नहि लगा।
वोँ अंदर तक हिल गय़ा थां।
उसने पहलीबार महसूस किया कि सहबाज वैसा नहि थां, जैसा वोँ दिखता थां।
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आरामसे सहबाज ऐसी बातें औऱ ज़्यादा करनेलगा।
"तेरी मां कां फिगर तौ कमाल हैं, अब्बू तौ भाग्य वाले हें!"
"कभी-कभी सोचता हूं, मे भि बड़ा होता तोँ."
सिकंदर इनसभी बातों सें नफरत करनेलगा थां।
अबउसे सहबाज सें घिनआने लगी थि।
पऱ वोँ कुछ नहि कहता थां।
बस चुपचाप सभी सुनता,
अपनी छोटी मुठ्ठियाँ भींचकर अपने अंदर जलता रहता।
वोँ समझ नहि पारहा थां कि उसकी मम्मी कां इनसभी मे क्याँ हाथ हैं।
पर्र एक् बातसाफ थि—
अबउसे सहबाज सें सख्त नफरत होनेलगी थि।
हसन मिर्ज़ा अब अलिना कों पूरीतरह अपनेजाल मे फंसा चुका थां।
अलिना कों लगता थां कि उसकी ज़िंदगी कि हर मुश्किल कां हल मात्र हसन मिर्ज़ा हि हैं।
जब भि वोँ दुःखी होती, हसन उसकी बातें सुनता, उसकी हौसला-अफ़ज़ाई करता।
"अलिना, तुम् दुनिया कि सबसे हिम्मती महिला होँ। तुमने अकेले सभीकुछ संभाला हैं। "
अलिना कों यह सुनकर अच्छा लगता।
आरामसे वोँ हसन कि बातों मे इतनीखो गई कि वोँ सही-गलत कां फर्क भूलने लगी।
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पर्र अलिना कों यह नहि पता थां कि हसन मिर्ज़ा एक् बहोत बड़ा धोखेबाज़ थां।
वोँ एक् नाम कां नवाब थां—हकीकत मे कंगाल।
बैंकों कां कर्ज़ उसकी गर्दन पर्र थां, कई लोगों कां रुपया मार चुका थां।
पर्र अबउसे अलिना मिल चुकी थि—उसकी नई ‘तिजोरी’।
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एक् रात, जब हसन औऱ अलिना अकेले बैठे थें, हसन नें बड़ी चालाकी सें कहा—
"अलिना, मे बहोत परेशान हूं। बैंक वाले मेरे पीछे पड़े हें। "
"अगरयह कर्ज़ न् चुका पाया, तौ मेरी इज़्ज़त मिट्टी मे मिल जाएगी। "
अलिना नें हैरान होकरउसे देखा।
"तुम् पर्र कितना कर्ज़ हैं?"
हसन नें गहरी साँसली, जैसेउसे यह बताने मे लज्जा आँ रही हौ।
"पचासलाख। "
अलिना नें बिना सोचेकहा—
"मे दूँगी। "
हसन केँ चेहरे पऱ एक् शातिर मुस्कान आँ गई,
पर्र उसनेउसे छुपाते हुए मजबूर इंसान बनने कि एक्टिंग कि।
"नहि। मे तुम्हें इस झंझट मे नहि डाल सकता। "
अलिना नें उसकाहाथ पकड़ा—
"तुम् मेरेलिए बहोत मायने रखते होँ हसन। मे कुछ भि कर सकती हूं तुम्हारे लिए। "
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अगले हि दिन, अलिना नें बैंक जाकरहसन कां सारा कर्ज़ चुका दिया।
हसन अब पूरीतरह जीत चुका थां।
अलिना उसकीजेब मे आँ चुकी थि।
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अब वोँ उसकेलिए कुछ भि करने कों सजधजकर थि,
औऱ यहबात हसन मिर्ज़ा अच्छी तरह जानता थां।
सिकंदर कईबार कोशिश कर चुका थां अपनी मम्मी कों समझाने कि.
उसे सहबाज कां असली चेहरा दिखाना थां।
पऱ वोँ खुलकर कह नहि पारहा थां।
एक् बेटे केँ लिएयह कहना आसान नहि थां कि उसकी मां जिसे सबसे बेहतरीन समझती हैं, वोँ संस्कार हिन् लड़का हैं।
पऱ अगर सिकंदर बता भि देता, तोँ क्याँ होता?
अलिना कों सहबाज सें अधिक समझदार औऱ सलीकेदार लड़काकोई औऱ दिखता हि नहि थां।
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उसदिन रात कों जब सहबाज घऱआया, तौ अलिना नें सिकंदर कों बुलाया—
"सिकंदर, जाओ सहबाज केँ संग बैठो। कुछ सीखो उससे। "
सिकंदर चुपरहा।
अलिना नें फिन दोहराया—
"जाओ, कुछ तौ अक्ल आएगी तुम्हें। "
सिकंदर कि मुट्ठियाँ भींचगईं।
उसनेफिन हिम्मत जुटाई।
"अम्मी, मुझे आपसेकुछ बात करनी हैं। "
अलिना नें गहरी नज़रों सें उसे देखा।
"क्याँ बात हैं?"
सिकंदर नें नज़रें झुकालीं।
"वोँ। अम्मी। सहबाज। वोँ। वोँ अच्छा नहि हैं। "
अलिना नें आँखें तिरछी कीं।
"क्याँ मतलब अच्छा नहि हैं? साफ-साफ कहो, बात क्याँ हैं?"
सिकंदर फंस गय़ा।
वोँ क्याँ बोले? केसे बोले?
सहबाज जौ उसके सामने बैठा थां, मुस्कुरा रहा थां।
सिकंदर कों उसकी आँखों मे मक्कारी साफदिख रही थि।
पऱ अलिना कों केवल सहबाज कां 'संस्कार' दिखता थां।
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अम्मी वोँ मुझसे गन्दी गन्दी बातें करता हैं.सिकंदर। यह नाँ कहसका कि साहबज अलीना कों गलतनज़र सें देखता हैं। केसे कहता। अपनी मां सें। यह किसी बेटे केँ लिए आसान नहि होता.
अलिना नें झुंझलाकर उसकीबात काट दि।
"ओहो! मे जानती हूं न् वोँ कितना अच्छा बच्चा हैं। तुम् उसे बेवजह बदनाम करने कि कोशिश मतकरो। " अलीना नें उसका यकीन नहि किया.
सिकंदर केँ अंदर गुस्से औऱ दर्द कि लहरउठी।
"अम्मी, मे झूठ क्यूं बोलूँगा? मुझेबस अच्छा नहि लगताजब—"
अलिना नें उसकीबात फिनबीच मे काट दि।
"सिकंदर, बसकरो!*
तुम्हें तौ कोई भि अच्छा नहि लगता।
पहले मैंने सोचा तुम् केवल एक् नालायक होँ, अबसमझ आँ रहा हैं कि तुम् जलने भि लगे हौ। "*
सिकंदर नें हैरानी सें अपनी मां कों देखा।
"मे क्यूं जलूँगा अम्मी? मे तोँ बस आपको बताने कि कोशिश कररहा हूं कि—"
अलिना नें उसके मुँह पर्र हाथउठा दिया।
"एक् शब्द औऱ मत कहना!
हद होती हैं एक् बच्चे कि बिगड़ैल सोच कि!"*
सिकंदर अपनी स्थान जड़ हौ गय़ा।
उसकागला सूख गय़ा थां।
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सहबाज नें एक् शरारती मुस्कान केँ संग सिकंदर कों देखा।
फिन चुपचाप अपनासिर झुका लिया, जैसेउसे कुछपता हि नं होँ।
पऱ सिकंदर नें उसकी आँखों मे जीतदेख ली थि।
सिकंडर केँ सच कां कोईमोल नहि थां यहा पऱ.
क्योंकि उसकी मां पहले हि उसे अपनेदिल सें उतार चुकी थि।
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Mukkader kaa sikander – New Episode
रूमधूप सें झुलसा हुआ थां। दीवारों पऱ पुरानी सीलन केँ निशान थें, औऱ छत सें घूमता पंखा पुराने समय कि तरह चर्र-चर्र कि आवाज़ कररहा थां।
सिकंदर कमरे मे दाख़िल हुआ। थकान उसके चेहरे पऱ नहि, उसकीरूह मे थि। वोँ चुपचाप आकर पलंग पऱ लेट गय़ा। रूम शांत थां। सिवाय उस रेडियो केँ, जोँ कोने मे पड़ा थां औऱ धुंधली आवाज़ मे एक् प्राचीन गीतबजा रहा थां.
"सहारे छिनने वालों, ज़रा सोचो क्याँ किया तुमने.
किसी कां वजूद मिटाया हैं, किसी कि ज़िन्दगी छीनी."
गाने कि यह पंक्तियाँ कमरे मे गूंजरही थीं, औऱ सिकंदर कि आँखें छत केँ पंखे पर्र टिकीथीं। मगर उसके ज़हन मे कोई औऱ चेहरा थां — अलीना कां चेहरा। उसकी मम्मी।
"कितना प्रेम करता थां तुझसे। मम्मी कहते हि दिलचैन पा लेता थां, औऱ तूनेउस चैन कों भि बेच दिया." — वोँ मन हि मन बुदबुदाया।
गाने कि अगली लाइनें जैसे उसकी तकलीफ कां बयानबन गई थीं.
"जोँ प्रेम माँगता थां, उसे जख़्मी कर डाला."
उसकी आँखों मे अलीना कि झलकें दौड़ने लगीं —
वोँ सुभहजब उसकी आँखे अलीना केँ बांहों मे खुलती थि
फिन
वोँ रातें, जब भूखासो गय़ा क्योंकि मम्मी नें द्वार (दरवाज़ा) नहि खोला.
वोँ बर्थडे, जब अलीना केँ पास टाइम नहि थां उसकी बर्थडे कों मानाने कां। क्यूं कि सहबाज कां कॉलेज
कां पहलादिन थां औऱ अलीना कों उसदिन कों यादगार बनाना थां। इसीसभी मे वोँ सिकंदर केँ बर्थडे कों भूल गई, थि.
औऱ फिन वोँ दिन, जब उसने किसी औऱ कों ‘बेटा’ कहकर पुकारा। सहबाज।
उसकेगले मे कुछफंस गय़ा थां, जैसेकोई भारी पत्थर होँ जौ बोलने नहि देरहा।
"तूने मेरी स्थान किसी औऱ कों दे दि,
"कभीदिल सें पूछा होता, मे क्याँ चाहता हूं.
बस एक् बारदेख लेती, मेरी आँखों मे कितनी शिकायतें थि तुझसे."
गानाअब अंतिम पंक्तियाँ कहरहा थां.
"कभी चाहा नहि जानां, कभी जानां तोँ ठुकराया."
सिकंदर नें करवटली, औऱ अपनेहाथ सें मुँहढक लिया।
आँखों सें आंसू नहि बहरहे थें, पर्र उसकीरूह बिलकुल भीगी हुईँ थि।
पंखाघूम रहा थां। जैसेसमय घूमरहा होँ, मगरकुछ भि नहि बदलता।
औऱ रेडियो। अब भि गुनगुना रहा थां.
‘किसी कि ज़िन्दगी छीनी। किसी कां दर्द छिना हैं
---
कमरे मे अब भि वही सन्नाटा पसरा थां… रेडियो कि आवाज़ कुछदेर पहले हि बंद हुइ थि, मगर कमरे कि हवा मे अब भि वही उदासी तैररही थि।
सिकंदर खाट पऱ वैसे हि पड़ा थां — जैसेकोई टूटी हुई चीज़ जिसेअब उठाने वालाकोई नां हौ।
तभी द्वार (दरवाज़ा) हल्के सें खुला।
ज़ोया अंदरआई। ( यहवही लड़की हैं जिसने सिकंदर कों भूतसमझ लिया थां। जिसने फर्स्ट एपसोड पढ़ी होगीउसे पाता होगा)
वोँ थम गई। उसकी नज़र सबसे पहले सिकंदर पर्र पड़ी।
वोँ चुप थां… पलंग पऱ पड़ा, छत कों एकटक घूरता हुआ।
ज़ोया केँ क़दम स्वयं-ब-स्वयं धीमे हौ गए। वोँ कुछ कहना चाहती थि, पऱ जैसे आवाज़ उसके होंठों सें बाहर् हि न् आँ सकी।
(ज़ोया केँ दिल कि आवाज़)
क्याँ हुवा हैं इसे.लग रहा हैं, यह तौ अंदर सें मर चूका हैं
। ऐसा क्यूं मासूस कररही हूं मे इसे देखकर.
वोँ कुछ औऱ पासआई।
"कितनी गहरी खामोशी हैं इसमें… पर्र इन आंखों मे… कितना तूफान हैं… ऐसा लगता हैं जैसे इसके अंदरकोई ज़ोर-ज़ोर सें चीखरहा हौ, पऱ वोँ चीख बाहर् तक नहि पहुंच पारही."
किसने तोड़ा इसको? किसने छीन लिया इससे सबकुछ?" क्याँ यह प्रेम मे धोका खाया हुवाकोई आशिक हैं
ज़ोया कां कलेजा भीगने लगा। पऱ उसने अपने आंसूरोक लिए।
इसके अंदरकुछ औऱ हैं… कुछ अधूरा, कुछ टूटाहुआ… जौ दुनिया कों दिखाना नहि चाहता.
वही सिकंदर इस सें अनजान थां कि एक् प्यारी सि लड़की उसके इतनेपास आकरखड़ी हैं औऱ उसकेदिल मे झाकने कि कोशिस कररही हैं.
मगरकुछ हि वक़्त मे सिकंदर नें यहसमझ लिया उसके कमरे मे कोई औऱ भि हैं। वोँ मुरकर देखता हैं। दोनों कि नज़रे मीलते हैं.
सिकंदर - ओह्ह्ह तुम् होँ। तुम्हे कुछ चाहिए.
ज़ोया उसके अचानक स्वयं केँ तरफ देखने सें आवाकरह गई।
उसने स्वयं कों थोडा संभाला…औऱ नज़रे चुराते हुवे धीरे धीरे बहोत नर्म आवाज़ मे बोलीं:
नीचे खानां लगा हैं.अम्मी नें भेजा हैं तुम्हें बुलाने केँ लिए."
सिकंदर नें उसकीओर देखा, पऱ कुछकहा नहि… बस वैसे हि लेटारहा।
ज़ोया नें एक् आख़िरी नज़र डाली उसकीतरफ… औऱ मन हि मन बुदबुदाई —
खड़ूसकही कां। इसी ऐटिटूड केँ कारण इसकी मासूका नें इसे छोरा होगा। बतमीज़। बगैरत। औऱ कुछ नहि तोँ कम सें कमनाम हि पूछ लेता.
फिन वोँ चुपचाप पलटी… औऱ बिनाकुछ कहे, कमरे सें बाहर् जानेलगी.
सिकंदर - रुको। तुम्हारा नाम क्याँ हैं.
ज़ोया केँ मानो पर्र निकलआये होँ। वोँ बिना पलटती हुवी बोलि - ज़ोया
सिकंदर - बहोत प्यारा नाम हैं। मुझे सिकंदर कहते हैं.
ज़ोया - जल्दचलो खानां ठंडा हौ जायेगा
---
सिकंदर जब ज़ोया केँ घऱ पहुंचा, द्वार (दरवाज़ा) पहले सें खुलाहुआ थां।
अंदर सें हलकी सि बातों कि आवाज़ें आँ रहीथीं — एक् घरेलू गुनगुनाहट, जिसमें थोड़ी गर्मी थि, थोड़ी तल्ख़ी…
"तुम्हें ज़रा भि अकल नहि हैं अली…दिन भर बाइक लेकरगली गली घूमता रहता हैं!"
यह आवाज़ थि ज़ोया केँ अब्बू कि — हाशिम साहब।
"बस करिए आप् भि! मेरा बेटा कोईगलत काम नहि करता! सारे मोहल्ले मे सबसे अच्छा बच्चा हैं अली!"
यह थि रुखसार बेगम — ज़ोया कि अम्मी… जिनकी आवाज़ मे बेटे केँ लिए एक् मां कि ढाल थि।
सिकंदर नें जैसे हि घऱ मे कदमरखा, यह मंजर उसके सामने थां।
रुखसार अपने बेटेअली केँ सामने सीना ताने खड़ी थि… उसकी आँखों मे मात्र एक् बात थि — मेरा बेटा ग़लत नहि हौ सकता।
सिकंदर कुछ लम्हा केँ लिए वहीं दरवाज़े पर्र खड़ारह गय़ा।
उसके अंदरकुछ हिला।
"क्याँ उसने नें कभीइस तरह मेरीतरफ देखा थां…?"
"क्याँ कभी वोँ किसी केँ सामने मेरेलिए खड़ी हुईँ थि…?"
"नहि… वोँ तोँ हमेशा किसी औऱ कि मां बनतीरही… मेरेलिए कभी नहि…"
ज़ोया नें यहसभी देखा… वोँ सभीसमझ रही थि।
वोँ सिकंदर कि आँखों कि नमी भि देखरही थि… औऱ उसकी निगाहों मे उफनते सैलाब कों भि।
रुखसार अब सिकंदर कि तरफ़ मुड़ी।
"अरेआओ बेटा, अंदरआओ… खानां सजधजकर हैं, बहोत देर सें तुम्हारा इंतजार हौ रहा हैं…"
हाशिम साहब नें मुस्कुरा करकहा,
"हमने सोचाआज तुम्हारा पहलादिन हैं इस मोहल्ले मे… औऱ ऊपर सें यह हमरी बेटी जोया केँ वजह सें तुम्हे कल कि सुभह ख़राब हौ गई। ( वहीभूत वाला कांड)। बेचारी नादान हैं अभि। माफ़कर दोइसे.
उसके अब्बू कां जोया कों यु बच्ची कहना वोँ भि सिकंदर केँ सामने जोया कों बिलकुल पसंद नहि आया.
जोया - अब्बू मे अब बच्ची नहि हूं। 23 साल उम्र हैं मेरी.ऐसा लगरहा थां वोँ यहबात अपने अब्बू सें नहि सिकंदर सें बोलरहे हौ.
सिकंदर नें हल्की सि मुस्कान दि… बिलकुल फीकी, पऱ सच्ची।
अलीअब भि चुप थां, पऱ उसकी अम्मी नें उसकी थाली पहलेलगा दि थि…
औऱ सिकंदर देखरहा थां — मां कां वोँ स्पर्श… जोँ थाली मे रोटियाँ रखतेहुए बेटे केँ माथे तक पहुंच जाता हैं।
"खाओ बेटा, घऱ जैसा हि समझो… औऱ ज़ोया नें बताया तुम् फौज मे हौ सिकंदर मुस्कराते हुवे बोला - नहि आंटी मे फौज मे थां। पर्र वहां सें मुझे निकाल दिया गय़ा.
रुखसार कि आवाज़ मे अपनापन थां, औऱ सिकंदर केँ लिए… एक् अनजानी सि बेचैनी।
सिकंदर नें स्वयं कों रोकते हुएकहा —
"बहोत धन्यवाद… आप् सभी कां…मुझे इंसान समझने केँ लिए
सभी उसकी बातों पऱ हसपरे.
अली - सिकंदर भइयाइस ज़ोया कि बच्ची नें तोँ आपको पूराभूत डिक्लेअर कर दिया थां वोँ तौ सुकर हैं मेरजो मे समझ गय़ा केँ आप् इंसान हैं.
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(जिज्ञासु आँखों सें):
"भाईजान, सुना हैं आप् Markos मे थें? वोँ तौ बहोत हि खतरनाक फोर्स हैं नाँ?"
सिकंदर (आँखें झुकाए, गहरे स्वर मे):
"अलीवहा जिंदा रहने कां मतलब हैं रोज़कुछ नां कुछमार देना — कभी अपनी नींद, कभी अपना ज़मीर। "
रुक्सार (हौले सें):
"तुम् बहोत कुछझेल करआए हौ बेटा। अल्23लाह तुम्हें चैनदे। "
सिकंदर (हल्की सि कड़वी हँसी):
"चैन तौ वहां कब्र मे मिलेगा आंटी। हम् जैसे लोगों कों बस साँसें मिलती हें, ज़िंदगी नहि। "
ज़ोया चुपचाप बैठी थि। वोँ कुछबोल नहि रही थि, मगर उसके अंदर कि हलचल उसकी आँखों सें साफ़झलक रही थि। सायदइस लड़की कों सिकंदर सें प्रेम हौ गय़ा थां। पहेली नज़र वाला प्रेम.
ज़ोया (मन हि मन):
"क्याँ होँ रहा हैं मुझे.? क्यूं।, उसी कि आँखों मे डूब जाने कों दिलकर रहा हैं."
उसने धीरे-धीरे सें नजरें झुकालीं, पर्र उसकादिल उसकी आँखों सें ज्यादा तेज़बोल रहा थां।
ज़ोया (मन हि मन):
"पागल हौ गई हैं ज़ोया.? किसी अजनबी केँ लिएऐसा महसूस करना.यह मुहब्बत नहि बस आकर्षण। हैं नाँ.? याँ फिन। अल्23लाह। कहीं मुझे। नहि!"
ज़ोया (स्वयं सें लड़ती हुइ, मन मे):
"ख़ुदा कां वास्ता ज़ोया, होश मे आँ! तुम को क्याँ लगनेलगा हैं। वोँ तुझसे मुहब्बत करेगा? उसके सीने मे इश्कबची हि कहां हैं.? उसकी तोँ हरबात मे दर्द हैं, औऱ तूँ उस दर्द सें मुहब्बत करनेलगी हैं.?"
हासिम साहब(नज़रों मे गहराई लेकर):
"तुम्हारी ख़ामोशी बहोत वजनदार हैं बेटे तुम् जरूरकुछ उससे भि बड़ा करोगे बड़ाकरो
सिकंदर हल्का सां मुस्कराया, पर्र वोँ मुस्कराहट भि जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर्र मरहम रखने जैसा थां।
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सिकंदर चुपचाप ज़मीन पर्र बिछीदरी पर्र बैठ गय़ा।
उसके सामने थाली सजाई गई थि — गर्म गर्म रोटियाँ, सब्ज़ी, चावल औऱ कटोरी मे दाल।
रुखसार नें स्वयं उसके सामने थालीरखी थि।
"खालो बेटा… हाथ गर्म हें अभि। "
रुखसार मुस्कुरा दि —
"अब सें जब तक यहां होँ… बेटा हि रहोगे। "
ज़ोया चुपचाप किचन केँ कोने मे खड़ी होकरउसे देखरही थि।
सारे घरवाले अपने-अपने बातों मे लगे थें… मगर ज़ोया कि नज़र सिकंदर सें हटी हि नहि।
रुखसार नें प्रेम सें उसकेसिर पर्र हाथ फेरा,
"औऱ चाहिए कुछ…?"
सिकंदर नें बस एक् मुस्कान दि…
"नहि… बहोत हैं…"
"
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सिकंदर अब भि थाली मे रखी रोटी कों देखरहा हैं…
पर्र उसकामन वहां नहि हैं —
उसकादिल कहीं औऱ भटक गय़ा हैं।
Flsahback
सीढ़ी पर्र सिकंदर दुबका बैठा हैं,
उसका मुंह सूखाहुआ हैं, होंठफटे हुए…
आँखों केँ नीचे गड्ढे…
पर्र नज़रें ड्राइंग रूम कि उस बड़ी टेबल पऱ टिकी हें, जहाँ पूरा खानदान बैठकर खानां खारहा हैं।
अलीना — रेशम कि साड़ी, गहनों सें लदी, चेहरे पर्र रौब.
सामने उसके पति हसन मिर्ज़ा, सहबाज, अलीना केँ अब्बू-अम्मी, भइया, भाभियाँ —
सभी हँसते हुए खानां खारहे थें।
केवल एक् चेहरा थां जोँ रो नहि रहा थां… मगरहर कोईदेख सकता थां — वोँ बच्चा अंदर हि अंदर उतावलापन रहा थां।
सिकंदर
उसने एक् निवाला मुँह मे नहि गय़ा सुभह सें…
पेट मे मरोड़ उठरही थि…
पऱ दिल कों चैनइस बात कां थां कि अम्मी पास हि तौ बैठी हें… शायद अभि बुला लें…
अलीना कि नज़र एक् लम्हा कों सिकंदर पऱ पड़ी…
सिकंदर कि आँखें चमक उठीं —
एक् मासूम सि उम्मीद लिए…
जैसेउस नजर मे छुपा हौ रब…
पर्र…
अलीना नें ठंडी आवाज़ मे कहा —
"तुँ यहीं बैठेरह, आज तुम को खानां नहि मिलेगा। "
सिकंदर हक्का-बक्का।
"तूँ बहोत बिगड़ गय़ा हैं सिकंदर… मेरी अंगूठी चुराई तूने। "
"चोरी भि सीख गय़ा तूँ… यही सिखाया थां मैंने तुझेही?"
सिकंदर कां चेहरा जैसे पत्थर होँ गय़ा।
वोँ कुछ नहि बोला…
सहबाज जोरजोर सें हसनेलगा। हसन केँ भि चेहरे पऱ मुस्कान थि। पर्र अलीना उसे तोँ लगरहा थां वोँ ऐसाकर केँ सिकंदर कों सुधार रही हैं। उसेयह नहि दिखरहा थां कि। उसके बेटे पर्र सभीहस रहें हैं। वोँ स्वयं सें हि अपने बच्चे कों तोररही हैं। उसके आत्माविस्वास कों तोररही हैं। वोँ उसे बागीबना रही हैं.
(वापस वर्तमान मे)
सिकंदर कि आँख सें एक् आँसू थाली मे गिरा।
रुखसार नें देखा…मगर कुछ नहि कहा।
उसने अपने आँचल सें उसकी आँखों कों पोंछा।
केवल इतना बोलि — "कहो बेटा, नमक ज़्यादा तोँ नहि?"
सिकंदर मुस्कराया — वोँ मुस्कान जौ मात्र दर्द केँ संगआती हैं।
"नहि आंटी बहोत सही हैं सभी…
दूसरी तरफ ज़ोया, जौ यहसभी देखरही थि,
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धूपतेज थि, औऱ पुरानी दिल्ली कि गलियों मे जैसे हमेशा कि तरह भीड़-भाड़ थि। तभी एक् सफेदरंग कि चमचमाती वाहन, जिसे देखकर हि अंदाजा हौ रहा थां कि किसी अमीरघऱ कि हैं, तेज़ी सें मुड़ी… औऱ धड़ाक!
"अबेओ कमीनो!" – राहेल कि बाइक ज़मीन पऱ गिर चुकी थि, औऱ वोँ स्वयं अपने दोनों हाथों सें मार्ग रगड़ते हुए गालियाँ देताउठ रहा थां – "दिखाई नहि देता? क्याँ आंखों मे मूंगफली डालरखे हौ बे
गाड़ी सें पहले उतरी एक् स्त्री – लगभग 45 कि उम्र, भारी साड़ी, भारी मेकअप औऱ उससे भि भारी एटीट्यूड। उसके पीछे-पीछे उतरीं उसकीदो जवान बेटियां, जिनके कपड़ों औऱ चेहरे केँ एक्सप्रेशन सें ज़ाहिर थां कि ड्रामा इनके डीएनए मे हैं।
"Excuse mai?" बड़ी बेटी नें चश्मा उतारते हुएकहा, "तमीज़ नहि हैं बात करने कि? इतनी ज़ोर सें बोलोगे तोँ रैड कारपेट बिछा केँ माफ़ी मांग लेंगे क्याँ?"
राहेल नें खून खौलता हुआ उठाया — "अबे व्हीकल चलाते हौ याँ बुलेट ट्रैन.
"हायरे !" महिला नें मुंह पर्र हाथरखा, "देखा आजकल केँ लड़कों कों? हमसे टकराए भि, औऱ ऊपर सें बदतमीज़ी भि कररहे हें!"यह थि नफीसा बेगम पुरानी दिल्ली कि रेड लाइट एरिया कि मालकिन। पूरी कि पूरीरेड लाइट एरिया कि ज़मीनइसी कि हैं.पहले यह भि वास्या थि पऱ अपने बाटियों केँ होने केँ बाद इसने धंधाछोड़ दिया पऱ अब दुसरी औरते धंधा करती हैं औऱ यह उनकी मालकिन हैं
छोटी बेटी (छोटेबाल, कानों मे बडी सि बाली, ऐटिटूड ऐसा जैसे पूरीसड़क इसकी मां कि हौ " नाम हैं सुहाना) बोलीं — "मां, clearly इनको attention कि सीकर हैं। बड़ाआया छपरी
राहेल (तेज गुस्से सें) — "अबेओ इंस्टाग्राम कि रीलों कि औलादों! गलती तुम् लोगों कि हैं औऱ भाषण मुझे सुनारही होँ? वाहन चलानी नहि आती तौ Auto लो नाँ, Paris Fashion Week मे घूमने थोड़़ी आयी होँ
बरी बेटी (नाक सिकोड़कर नाम हैं ईरा) — "मां, police बुलाते हें। यह लड़का तौ literally हमपे चिल्ला रहा हैं। बहोत toxic vibes हें!"
"Toxic tere baap kaa nam h क्या?" राहेल गुस्से मे चीखा — "अबे माफ़ी माँगलो औऱ निकलो यहां सें वरना मे हि बुला लूंगा पुलिस औऱ तुम् लोगों केँ नंबर प्लेट कि वीडियो वायरल कर दूंगा, फिन देख्ना कौन toxic लगता हैं!"
महिला (नाटकीय तरीके सें दोनों बेटियों कों पीछे करती हुइ) — "चलो बेटा, हम् इनके जैसे सड़कछापों सें बहस नहि करते। औऱ सुन लड़के, तुम्हें जोँ करना हैं कर लें
राहिल (जब वोँ चलेगये तौ पीछे सें चिलाते हुवे) सालोदिख मत जानां दुबारा.
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वोँ सफ़ेद चमचमाती वाहन पुरानी दिल्ली केँ एक् तंग मोड़ सें गुज़री औऱ आकर एक् सुनसान गली केँ कोने पर्र रुक गई। बाहर् सें देखने पर्र यहगली एकदम मामूली सि लगती थि — पऱ यहांहर कोने मे कोईराज छुपा थां।
गाड़ी सें पहले उतरीवही स्त्री — चेहरे पऱ अबकोई ड्रामा नहि थां, बल्कि एक् सख्त कठोरता थि। उसके पीछे उतरीं उसकी दोनों बेटियाँ, अब उनके चेहरे सें नकली मासूमियत औऱ चुलबुलापन गायब थां। उनकी आँखों मे तेज़ी थि, चाल मे एक् अलग हि आत्मविश्वास।
"चलो अंदर, " स्त्री नें व्हीकल कि चाबी पर्स मे डालते हुएकहा, "आजफिन देर हौ गई हैं।
तीनों एक् पुराने, बदरंग सें बिल्डिंग मे दाख़िल हुईं। बाहर् बोर्ड पर्र कुछ नहि लिखा थां, मगर स्थान-स्थान लगे कपड़े, खिड़की सें झांकती औरतों कि आँखें, औऱ बिल्डिंग सें आती सुगंध सभीकुछ कहरही थि। यहकोई आम स्थान नहि थि — यह थां "वेश्यालय"।
भीतर दाख़िल होते हि, हॉल मे करीब 15-20 औरतें बैठीथीं। कोईपान चबारही थि, कोई आईने मे बाल सवाररही थि, कोईफोन पऱ किसी ग्राहक सें रेटतय कररही थि। वोँ महिला — जौ गाड़ी चलारही थि — यहां कि मलक़ा थि। सभीउसे "मालकिन" कहतीथीं।
बड़ी बेटी नें झल्ला करकहा — "अम्मी, वोँ कमीना हमें गालियाँ देरहा थां! हमने उसकी बाइक सें हल्की सि टक्कर मारी थि बस। पऱ वोँ तौ जैसे हमारी औकात बताने पर्र तुला थां!"
"औक़ात?" नासिफा बगम नें ठंडी हँसी हँसी, "औक़ात हम् बना भि सकते हें, औऱ मिटा भि सकते हें। याद रखना, हमारे पासकौन आता हैं औऱ किसके संग क्याँ होता हैं — यह हम् तय करते हें। यह लड़के-लड़की हमें सिखाएँगे?"
छोटी बेटी — "अम्मी, अगर वोँ लड़काफिन सामने आया तौ इसबार मे हि उसका तमाशा बना दूंगी… हम् केवल शरीर नहि बेचते, दिमाग़ भि चलाना आता हैं!"
मलिका नें उनकेसिर पऱ हल्की चपत लगाई — **"तुम् दोनों मेरेनाम कि इज़्ज़त हौ, समझीं? तुम्हें किसी राहेल, साहिल याँ समीर सें डरने कि ज़रूरत नहि। "
( नासिफा बगम हि मलिका हैं.)
औऱ फिन वोँ तीनों भीतरचली गईं — उसगली केँ उस हिस्से मे, जहांरात कि रौशनी औऱ जिस्मों कि सौदागरी दोनों एक् संग दमकती हें।
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बिल्डिंग केँ ऊपरी हिस्से मे एक् छोटा-सां रूम थां। कमरे मे हल्की-हल्की रोशनी थि औऱ एक् कोने मे बिछी गंदी-सि चादर पर्र एक् स्त्री दर्द सें कराहरही थि। उसका चेहरा पसीने सें भीगाहुआ थां, बाल बिखरे हुए थें। गोद मे एक् नवजात बच्चा थां जोँ अभि-अभि इस दुनिया मे आया थां… औऱ उसकी किलकारी एक् कोने मे टंगी दीवारों कों हिलारही थि।
वोँ स्त्री — शबनम — काँपते हुए खड़ी हुई औऱ जैसे हि नफ़ीसा बेगम कमरे मे दाखिल हुईं, वोँ दौड़कर उनके पैरों मे गिर पड़ी।
शबन (गिड़गिड़ाती हुईँ, आँखों सें आंसू बहाते हुए):
"बेगमजी… खुदा कां वास्ता हैं, मेरेलाल कों मत छीनिए मुझसे… मेरा बेटा हैं यह… मेरीजान हैं… इसे अनाथ आश्रम मत भेजिए… मे इसेकाम पर्र नहि लगाऊंगी, मे जोँ कहोगी करूँगी… मगरइसे मुझसे मत छीनो…"
नफ़ीसा बेगम (बिलकुल बर्फ कि तरह ठंडी आँखों सें उसे घूरते हुए):
"क्यूं.? क्याँ तुम्हे लगता हैं तेरायह बेटा कोई राजा कां वारिस हैं.? स्त्री, जब मे चारदिन केँ अपने बेटे कों इस धंधे कि खातिर अनाथालय मे छोड़आई थि। तब नाँ किसी खुदा नें मुझे रोका, नाँ किसीमाई केँ लाल नें। "
शबन उनकेपैर पकड़कर ज़ोर सें रोने लगती हैं।
"बेगमजी। आप् मम्मी होँ। स्वयं मम्मी हौ कर भि। ऐसा केसेकर सकती हौ.?"
नफ़ीसा बेगम (चीखती हैं, पांव झटकती हैं):
"हाँ, मां हूं! औऱ मम्मी हि हूं, तभी जानती हूं कि इस धंधे मे मर्द केवल लेनेआते हें, देने नहि। मर्दों कां काम केवल हमारे शरीर कों नोचना हैं, पऱ इस धंधे मे पैदाहुए मर्द किसीकाम केँ नहि होते। तेरायह बच्चा मेरे धंधे कि पुस्तक मे बस एक् बोझ हैं!"
वोँ झुकती हैं औऱ शबन केँ गोद सें बच्चा छीन लेती हैं।
नफ़ीसा बेगम (गुस्से सें):
"यह बेटा तुम्हारी तरफकभी नहि मिलेगा। इसे वहीं भेजा जाएगा जहां औऱ भि धंधे कि औलादें पड़ी हें – अनाथाश्रम। औऱ अगर तुम्हारी तरफ ज़्यादा दर्द होँ रहा हैं तौ अपने शरीर सें हि पूछ, जिसने बिना शराफत केँ इसे पैदा किया हैं!"
शबन फूट-फूट कर रोती हैं। कमरे केँ बाहर् सें कुछ औऱ औरतें यह मंज़र चुपचाप देखरही थीं, पर्र किसी कि हिम्मत नहि थि बोलने कि।
एक् बुढ़ी महिला (धीरे-धीरे सें बुदबुदाती हैं):
"नफ़ीसा बेगम। महिला कम। जल्लाद ज्यादा हैं। दिल तोँ इसकाकब कां मर चुका हैं। "
कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) तेज़ आवाज़ केँ संगबंद होता हैं। औऱ शबन कि चीखें उस वीरान कमरे कि दीवारों मे गूँजती रहती हें…
---
राहिल कां घऱ.रात कां वक्त थां। कमरे कि लाइटें बुझी हुईँ थींबस एक् कोने मे रखा लैम्प जलरहा थां। उसके पीली रौशनी मे सिकंदर कि आंखें चमकरही थीं — मगर वोँ चमक किसी उम्मीद कि नहि थि… वोँ थि एक् ऐसे अतीत कि जौ उसेहर लम्हा तोड़ता जारहा थां।
सिकंदर केँ हाथ मे एक् पुरानी सि डीवीडी थि — धूलजमी हुइ, किनारे मुड़े हुए। उस पर्र जलेहुए मार्कर सें लिखा थां:
"Sikander Birth Record."
राहिल (हैरानी सें):
"भइया.यह क्याँ हैं.? जन्म कि रिकॉर्डिंग.?"
सिकंदर नें बिनाकुछ कहे डीवीडी कों प्लेयर मे डाला। टेलीविज़न पऱ पुरानी वीडियो चलनेलगी — एक् डिलीवरी रूम कां दृश्य, डॉक्टर्स, नर्सें, औऱ दर्द मे तड़पती हुईँ एक् स्त्री…
आवाज़ आई — अलीना कि चीखों मे लिपटी नफ़रत:
"निकालो इसे मेरेबदन सें बाहर्.!! निकालो!!
मर क्यूं नहि गय़ा यह…?
तुँ मर क्यूं नहि गय़ा सिकंदर.?
अल्23लाह! इस बच्चे कों उठालो। सिकंदर कों मौतदे दे.!!
इससे अच्छा तौ मेरीकोख सूनीरह जाती.!!"
टेलीविज़न कि स्क्रीन पऱ नर्सें बच्चे कों संभालती हें, पर्र अलीना कां चेहरा। नफ़रत सें भराहुआ, जैसे उसनेकोई शैतान देख लिया हौ।
राहिल कां मुँह खुला कां खुलारह जाता हैं… उसकी आंखें हैरानी औऱ दर्द सें भर जाती हें।
राहिल (धीरे-धीरे सें, टूटी आवाज़ मे):
"यह.यह तेरी मां थि.? यह स्त्री.?
सिकंदर खामोश थां। उसकी आंखें पथरा चुकीथीं। होंठ सूखेहुए थें। उसने धीरे-धीरे सें अपनी आँखें बंदकीं औऱ अपने माथे कों पीछे दीवार सें टिका लिया।
सिकंदर (धीमीमगर कांपती आवाज़ मे):
उस बदचलन महिला नें मुझसे कभी प्रेम हि नहि किया वोँ बस मुझसे प्रेम करने कां दिखावा करतीरही। औऱ जबउसे मौका मिला तौ उनसने अपने दोस्त औऱ उसके बेटे केँ सामने अपनी टांगे खोल दि। रंडी हैं वोँ.
उसकेलिए मे बस एक् गलती थां… एक् सज़ा…"
राहिल (आँखें भरकर):
"साला। मेरी मम्मी भि मुझे नहि चाहती थि। मगर उसने मुझे मारने कि बद्दुआ तोँ नहि दि…
कम सें कम उसने मुझे किसी दरगाह केँ बाहर् छोड़ दिया। ताकिकोई पाल लें।
मगर.यह.? यह स्त्री। यह तौ मां केँ नाम पर्र धब्बा हैं। "
सिकंदर कि आंखों सें आँसू नहि निकले। शायदअब निकलते भि नहि थें। वोँ रो चुका थां — हज़ारों बार — — हरउसदिन, जबउसे भूखलगी, जब वोँ बीमार पड़ा,
सिकंदर (आहिस्ता सें):
"जिसदिन मैंने पहलीबार यह वीडियो देखा थां नाँ…
मे रातभर बस एक् हि प्रश्न करतारहा — ‘मे क्यूं जिंदा हूं.?’
अगर अल्23लाह कों मुझसे इतना हि नफ़रत थि… तौ मुझे क्यूं भेजा…?"
राहिल (उसका कंधा पकड़ता हैं):
"भइया.अब बसकर। तेरासमय अबआया हैं।
अब वोँ दिन आएंगे जब दुनिया तुझसे पूछेगी —
'तुँ कौन हैं सिकंदर?'
औऱ तूँ मुस्कुराकर कहेगा —
'वोँ जोँ मरना चाहता थां,
टेलीविज़न कि स्क्रीन अब ब्लैंक होँ गई थि। मगरउस कमरे मे सन्नाटा चीखरहा थां।
एक् बेटे कां टूटा बचपन। एक् मम्मी कि झूठी ममता। औऱ दो दोस्तों कि बीच कि वोँ खामोशी,
जौ शब्दों सें कहीं अधिक गहरी थि।
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bhay apse aur 1 saval kia he uskah bhi javab mil jata too badiya hotha apse jsbab kee umid he dm kia he hu sake too dekh Lena.
Mukkader kaa sikander – New Episode
सुभह कि हल्की धूप खिड़की सें छनकर अंदर आँ रही थि।
अलिना कि आँखें आरामसे खुलीं। उसके माथे पऱ पसीने कि नमी थि। वोँ अपने अतीत कों देखरही थि… ख्वाब मे।
सिकंदर.
वोँ झटके सें उठी औऱ बैठ गई। उसकी साँसें तेज़ होँ गईं।
"फिन वही सपना." उसने स्वयं सें बुदबुदाया।
मगरयह सपना नहि थां, उसका अतीत थां… उसकी सच्चाई थि।
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वोँ स्वयं कों संभालते हुएबैड सें उतरी, ठंडे पानी केँ छींटे मारे औऱ अपने चेहरे कों आइने मे देखा।
आइने मे वही चेहरा थां, पर्र आँखों मे कोई औऱ थि।
एक् खोई हुईँ महिला, जोँ आजसभी कुछ होतेहुए भि अधूरी थि।
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हॉल मे आते हि उसने देखा, पूरा परिवार वहा बैठा थां।
अममी, अब्बू, भइया, भाभी, हसन मिर्जा औऱ साहबाज.
साहबाज अब उसका इकलौता बेटा थां।
पर्र वहाकोई नहि थां…तोँ वोँ थां उसका अपनाखून। उसकेबदन कां टुकड़ा। उसके दरकते दिल कि आवाज़.
वोँ नहि थां, जिसे उसनेनौ महीने अपनीकोख मे पाला थां।
खैर अलीना अपने चेहरे पर्र मुस्कान बिखेरते हुवे। अपनीउन यादों कों भुलाते हुवे सबकेसंग नास्ते कि टेबल पर्र जा बैठी.
साहबाज नें उसकीतरफ देखा औऱ मुस्कुराकर बोला,
"अम्मी, मुझे हार्ले डेविडसन मोटरसाइकिल चाहिए!"
अलिना कां चेहरा खिलउठा। उसका बेटा उससेकुछ मांगरहा थां। वोँ खिलखिलाते हुवे बोलि। क्यूं नहि मेरा बच्चा। तुम्हे जोँ चाहिए वोँ मिलेगा दुनिया कि सारी खुशी तुम्हे दूंगी मै.
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इतना सुनते हि भाभी नें ताना मारने वाले अंदाज़ मे कहा,
"अरे… यही मोटरसाइकिल नां जौ सिकंदर लेना चाहता थां? मुझे अच्छे सें याद हैं, यह उसका सपना थां…"
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अलिना ठिठक गई।
उसकादिल जैसे एक् समय केँ लिएरुक गय़ा।
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"सिकंदर कां सपना."
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वोँ कुछ नहि बोलि।
बससिर हिलाकर हामीभर दि।
पऱ भीतर हि भीतर उसकादिल टुकड़ों मे बंटने लगा।
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"मेरा अपनाखून… धक्के खारहा होगा… भूखा होगा… जाने कहां होगा."
"औऱ यहा मे… दूसरों केँ ख्वाब पूरे करने मे लगी हूं…"
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उसकी आँखों केँ सामने एक् मासूम चेहरा घूम गय़ा।
नीली आँखें… सहमी हुइ… पऱ दर्द सें भरी हुइ।
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उसका सिकंदर…
जौ अब उसकेपास नहि थां।
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"कहां होगा मेरा बच्चा…?"
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उसकागला सूख गय़ा।
उसने पानी कां गिलास उठाया… पऱ उसेहाथ मे पकड़ने कि हिम्मत नहि थि।
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गिलास हथेली सें छूटकर ज़मीन पऱ गिर पड़ा।
खटाक!
औऱ जैसे हि काँच केँ टुकड़े फर्श पर्र बिखरे…
अलिना कां दिल भि उसीतरह बिखर गय़ा।
गिलास केँ टुकड़े ज़मीन पर्र बिखर चुके थें।
पूराहॉल एक् समय केँ लिए खामोश हौ गय़ा।
सबकी नज़रें अलिना पऱ थि।
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हसन मिर्जा नें भौंहें चढ़ाकर देखा,
"अलिना, क्याँ हुआ?"
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अलिना नें झट सें अपने आँसू पोछे, होंठों पर्र ज़बरदस्ती कि मुस्कान लाई,
"कुछ नहि… हाथ सें छूट गय़ा। "
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पऱ उसकादिल जानता थां…
कि मात्र गिलास नहि टूटा थां… कुछ औऱ भि टूटरहा थां।
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भाभीआगे बढ़ीं,
"गिलास तोँ टूटेगा हि अलिना… जबदिल सें किसी केँ लिएदुआ निकले औऱ बदले मे ताने मिलें, तौ हाथ काँप जाते हें। "
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अलिना सन्नरह गई।
उसका चेहरा तमतमा गय़ा, पर्र वोँ जवाब नहि देपाई।
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साहबाज हंसते हुए बोला,
"अम्मी, आप् इतनी टेंशन क्यूं लें रही हें? मे हूं नां! सिकंदर कि यादें भुला दीजिए, अब मे हि आपका बेटा हूं। "
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उसकीयह बात सुनते हि…
अलिना कां दिलधक सें रह गय़ा।
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उसने नजरें ऊपर उठाईं,
"सिकंदर कि यादें नहि भुला सकती मे!"
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पहलीबार उसने ज़ोर सें बोला थां।
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हसन मिर्जा कि त्यौरियाँ चढ़गईं,
"फिनवही पुरानी बातें! सिकंदर चला गय़ा, अबउसे भूलजाओ। "
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अलिना कि आँखों मे एक् सैलाब उमड़आया।
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"केसेभूल जाऊंहसन? वोँ मेरा बच्चा थां! मेरीकोख सें जन्मा थां!"
"तुम् नहि समझोगे एक् मम्मी कां दर्द…
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साहबाज अचानक अलीना कों गाल पर्र पप्पी लेते हुवे बोला.अरे अम्मी मै हूं नाँ आपकेपास। आप् क्यूं उस निकम्मे सिकंदर कों लेकर परेशान हैं। औऱ एक् औऱ पप्पी उसके गालों पऱ लें लेता हैं। अलीना भि उसके बातों कों नज़र अंदाज़ करबस उसके प्रेम मैखो जाती हैं। सोचती हैं। सिकंदर कि लिएमै सहबाज कों तौ स्वयं सें दूर नहि कर सकती। वोँ तोँ चला गय़ा। पऱ अब सहबाज पर्र मैकोई अँच नहि आने दूंगी। मेरा प्यारा बच्चा.यह अलीना सोच हि रही थि कि। हसन कि आवाज़ आयी
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पर्र अगले हि लम्हा…
हसन मिर्जा नें गुस्से सें उसकी कलाई पकड़ली।
"बसकरो, अलिना! मे यह ड्रामा औऱ नहि सह सकता। "
"तुम्हें फ़ैसला करना होगा—सिकंदर कि यादों मे जीना हैं याँ हमारे संग रहना हैं अगर इतना हि प्रेम हैं। उस हरामी सें। तोँ साफसाफ बोलदो। मै तुम्हे तलाकदे दूंगा.
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अलिना सन्नरह गई।
"क्याँ सच मे इतनी पराई होँ गई हूं सिकंदर केँ लिए?"
"क्याँ सच मे मेरे अपने हि मुझे सिकंदर कां नाम लेने सें रोकरहे हें?" नहि नहि। हसन नाराज़ हौ रहा हैं। मै भि पागल हूं। पाता नहि बारबार क्यूं उसकी यादोमै खो जाती हूं.
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पर्र उसकेदिल केँ जख़्म अब औऱ भि गहरे होँ चुके थें।
पुरानी दिल्ली कि सँकरी गलियों मे धूलउड़ रही थि। सिकंदर औऱ राहिल एक् पुराने, जर्जर घर-मकान केँ सामने खड़े थें। घर-मकान कि दीवारों पर्र टाइम कि मार साफ़दिख रही थि—उखड़ी हुईँ पेंटिंग, स्थान-स्थान जाले, औऱ दरवाज़े पऱ जंगलगी हुइ जंजीर। सिकंदर कि नज़रें बेचैनी सें दरवाज़े पर्र जमीथीं।
राहिल नें सिगरेट कां एक् लंबाकश लिया औऱ सिकंदर कि तरफ देखा, "अबे, तूँ पक्का हैं? यह हि स्थान हैं?"
सिकंदर कि आँखें ठंडीथीं, जैसे बरसों कि नफ़रत उसमें जम चुकी हौ। उसने हल्के सें सिर हिलाया, "हाँ। अब्दुल रहमान यहीं रहता थां."
राहिल नें होंठ भींचलिए, "अबे साले, तेरा तौ खून खौलना चाहिए थां उसकानाम सुनकर! वोँ हरामी जोँ तेरी मां केँ संग."
सिकंदर नें हल्के सें मुस्कुराते हुए राहिल कि बात काटी, उसकी मुस्कुराहट मे जहर घुलाहुआ थां। "अगर मे अपने बाप कि स्थान होता, तौ मे भि उस हरामज़ादी केँ संगयही करता."
राहिल नें आँखें फाड़दीं, "अबे! तूँ क्याँ बकरहा हैं, सिकंदर?"
सिकंदर नें जेब सें एक् सिगरेट निकाली, उसे उँगलियों मे घुमाते हुए उसनेकहा, "जौ स्त्री एक् व्यक्ति केँ लिए अपने बेटे कों छोड़दे। उसे 'स्त्री' कहने कां हक़ नहि हैं। वोँ सालीबस एक् रंडी हैं, जिसे मेरे बाप नें इस्तेमाल किया औऱ फेंक दिया। औऱ जानता हैं सबसे मज़ेदार बात क्याँ हैं, राहिल?"
राहिल नें गहरी साँसली, "क्याँ?"
सिकंदर नें सिगरेट कों जलाया, हल्का सां धुआँहवा मे छोड़ते हुएकहा, "वोँ स्त्री अब भि मेरी मां कहलाने कां दावा करती हैं। मगरसच यह हैं कि मैंने उसे मम्मी मानना कब कां छोड़ दिया। "साला मै किसी रंडी कां बचा केसे होँ सकता हूं। उस साली केँ पाता नहि कितने दोस्त होंगे
राहिल कां चेहरा तमतमा गय़ा, "पर्र फिन भि। तूँ उस हरामी कां नाम अपनेनाम केँ आगे जोड़रहा हैं?"
सिकंदर नें सिर झुकाकर हंस दिया, "अबे नाम मे क्याँ रखा हैं, राहिल? अब्दुल रहमान मेरा बाप थां, चाहे जैसा भि थां। मगरकम सें कम, वोँ उस बदचलन स्त्री सें ज्यादा सच्चा थां। "
राहिल गुस्से सें अपनी सिगरेट ज़मीन पर्र फेंक देता हैं, "सिकंदर, तेरा दिमाग़ खराब होँ गय़ा हैं! तुम को नहि पता कि यह नफरत तुम्हे अंदर सें खा जाएगी!"
सिकंदर नें उसकीतरफ ठंडी नज़रों सें देखा, "राहिल। यह नफरत नहि हैं। यह मात्र इंसाफ़ हैं। "
औऱ फिन, बिनाकुछ कहे, सिकंदर दरवाजे कि तरफबढ़ गय़ा।
पुरानी दिल्ली कि धूलभरी गलियों मे सामढल रही थि। सिकंदर औऱ राहिल उस टूटे-फूटे घर-मकान केँ बाहर् खड़े थें, उनके सामने कुछ बूढ़े लोग बैठे हुक्का पीरहे थें। सिकंदर नें उनमें सें एक् सें पूछा,
"अब्दुल रहमान। यहा रहता थां, 20 साल पहले.
एक् झुर्रीदार बुजुर्ग नें सिकंदर कि तरफ देखा, आँखों मे पुरानी यादों कां बोझ थां। "हाँ.नाम सुना हैं। बड़ा शराबी थां। मगरदस साल पहलेयहा सें गायब हौ गय़ा। कोई कहता हैं दुबईभाग गय़ा, कोई कहता हैं यहीं किसीगली मे सड़ गय़ा। पर्र हाँ, लड़का.उस व्यक्ति केँ पीछे जाने कि ज़रूरत नहि। वोँ क़िस्मत सें अधिक नसीब जलाने वाला थां। "
राहिल - मियां पूरीबात बताओ
बुजुर्ग नें लंबाकश लिया औऱ धीरे-धीरे सें कहा, कुछ अमीरलोग उसके पीछे पऱ गए थें। एक् अमीर स्त्री। नें उसका
उसका जीना हरामकर रखा थां। उसी सें पीछा छुराता हुवायहा सें चला गय़ा.
सिकंदर नें ठंडी नज़रों सें उन बूढ़ों कों देखा औऱ बिनाकुछ कहेपलट गय़ा।
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सिकंदर औऱ राहिल अपनी बाइक तक पहुँचे हि थें कि दोनों ठिठकगए।
"साला! बाइक कहां गई?" राहिल चिल्लाया।
गली मे अंधेरा घिरने लगा थां, मगरदूर एक् मोड़ पर्र कुछ लड़कों कि परछाइयाँ दिखरही थीं। बिल्ला —पुरानी दिल्ली कां एक् लोकल गुंडा—औऱ उसकेसंग दस औऱ लड़के खड़े थें।
बीला नें एक् सिगरेट जलाते हुए ठहाका लगाया, "अबेओ राहिल मियाँ, अपनी बाइक ढूँढरहे होँ?"
राहिल गुस्से सें आगे बढ़ा, "हरामी! बाइक वापसकर!"
बीला नें सिगरेट कां धुआँ उड़ाया, "अबेओ छोटे, यह दिल्ली हैं। यहा जोँ छिनता हैं, वोँ लौटता नहि। "
सिकंदर अब तक चुपचाप खड़ा थां, उसकी आँखें बिल्ला औऱ उसके आदमियों कों नापरही थीं। वोँ सिर्फ़ दस थें। बसदस।
राहिल नें धीरे-धीरे सें कहा, "सिकंदर, साले बहोत हें.चल भइया.बाद मे देखता हूं इस हराम केँ औलाद कों.
सिकंदर हल्का सां मुस्कुराया, "सिर्फ़ दस हैं.
राहिल - हाँबे भोसरी केँ। मे तोँ भूल हि गय़ा थां। तुँ तोँ marcos मे अपना गांडघिस करआया हैं.
बीला केँ एक् व्यक्ति नें आगे बढ़कर सिकंदर पर्र वार करने केँ लिए चाकू निकाला, मगर उससे पहले हि सिकंदर कां घूंसा उसकी जबड़े पऱ पड़ा—इतना तेज़ कि वोँ लड़का उल्टा गिरा औऱ बेहोश हौ गय़ा!
"सालों! मारोइसे!" बीला चिल्लाया।
बाकीदस लोग सिकंदर औऱ राहिल पऱ झपट पड़े। मगर सिकंदर कोई मामूली लड़का नहि थां। वोँ एक् मर्कोस कां सॉल्जर थां!
पहला लड़का: उसने लोहे कि रॉड उठाकर सिकंदर पर्र हमला किया, मगर सिकंदर नें रॉड कों बीच मे हि पकड़ लिया औऱ उसे इतनीजोर सें घुमाया कि लड़के कां कंधा उखड़ गय़ा!
दूसरा लड़का: उसने पीछे सें हमला करने कि कोशिश कि, मगर सिकंदर झुका औऱ उसे कोहनी मारकर ज़मीन पऱ गिरा दिया!
राहिल भि पीछे नहि थां, उसने एक् लड़के कां गला पकड़कर घुटना मारा औऱ उसे सीधा दीवार सें टकरा दिया!
बीलाअब गुस्से मे थां। उसने पिस्तौल निकाली!
"अबेओ बहोत हौ गय़ा, अब तोँ तेराखेल खत्म!"
मगर सिकंदर मुस्कुराया, उसके पिस्टल कों देखते हुवे बोला - बच्चे तेरा खिलौना छोटा हैं।
बीला नें गुस्से मे ट्रिगर दबाया—मगर राहिल नें तेज़ी सें एक् पत्थर उठाकर बीला कि कलाई पर्र दे मारा! पिस्तौल ज़मीन पर्र गिर गई!
सिकंदर नें बिनाकोई मौका गँवाए, आगे बढ़कर बीला कां गला पकड़ लिया औऱ उसे दीवार सें लगा दिया।
सिकंदर- बेटा मे एक् राक्षस हूं। काटकर खा जाउगा.
बीला घबराकर हाँफने लगा, "स.सॉरी भइया!"
सिकंदर नें उसे छोड़ा औऱ अपनेहाथ झाड़ते हुए बाइक केँ पास गय़ा।
"चल, राहिल! आज बहोत समय बर्बाद हौ गय़ा!"
राहिल हंसते हुए बाइक पऱ बैठा, "अबे सिकंदर, यहा तौ लफड़ा हौ गय़ा बे.
सिकंदर नें हल्की मुस्कान दि
बाइक स्टार्ट हुईँ, औऱ वोँ दोनों पुरानी दिल्ली कि गलियों सें बाहर् निकलगए।
अलिना नें दफ़्तर केँ दरवाज़े सें अंदरकदम रखा, तोँ उसके चेहरे पऱ वहीठसक औऱ आत्मविश्वास थां, जौ हर रोज़ होता थां। उसकी ऊँची हील्स फर्श पर्र ठक-ठक कि आवाज़ कररही थीं, औऱ हाथ मे महँगा बैगझूल रहा थां। जैसे हि उसने अपने केबिन कां द्वार (दरवाज़ा) खोला, सामने उसका CEO औऱ कुछ अन्य अफसर खड़े थें।
"मैम, आपको एक् ज़रूरी बात बतानी थि, " CEO नें हल्की घबराई हुई आवाज़ मे कहा।
"क्याँ हुआ?" अलिना नें कुर्सी पर्र बैठते हुए तेज़ आवाज़ मे पूछा।
CEO नें थोडा पानी पीकरगला साफ़ किया औऱ कहा, "मैम, हमारे XYZ एरिया केँ जोँ प्लॉट्स थें। वहा झुग्गी-झोपड़ियाँ बस चुकी हें। "
अलिना कां चेहरा सख्त हौ गय़ा। उसने झटके सें टेबल पर्र हाथ मारा, जिससे वहारखी फाइलें हल्का-सां उछलगईं।
"झुग्गियाँ? वहा? वोँ मेरी प्रॉपर्टी हैं!"
CEO नें सिर झुका लिया। "जी, मैम, मगर वहा बहुत गरीबलोग बस चुके हें। वोँ स्वयं कों वहा कां असली हक़दार मानते हें औऱ हटने केँ लिए सजधजकर नहि हें। हमनेकई बार समझाया, मगर."
अलिना नें घूरते हुएकहा, "तोँ फिन पुलिस बुलाओ! बुलाओ प्रशासन कों! यहसभी गैरकानूनी कब्जा हैं, औऱ मुझे अपनी प्रॉपर्टी वापस चाहिए!"
CEO नें गहरी साँसली औऱ थोडा पासआकर बोला, "मैम, पुलिस औऱ प्रशासन गरीबों केँ संग खड़े होँ जाते हें। आपकोपता हैं, यह स्लम वाले अपनेहक़ केँ लिए प्रदर्शन करते हें, मीडिया इनके पीछेलग जाती हैं, औऱ फिन सरकार इनकासंग देने लगती हैं। पुलिस कों भेजकर भि कुछ हासिल नहि होगा। "
अलिना कि उँगलियाँ टेबल पऱ बजने लगीं। उसके माथे पऱ शिकन औऱ गहरी होँ गई।
"तोँ फिन क्याँ करना चाहिए?" उसने ठंडी आवाज़ मे पूछा।
CEO थोडा मुस्कराया औऱ बोला, "मैम, ऐसे मामलों मे सीधा एक्शन लेना पड़ता हैं। अगर हम् वहा लोकल लड़कों कों भेजें, तोँ मामला जल्द सुलझ सकता हैं। "
अलिना कि आँखें सिकुड़ गईं। "लोकल लड़के?"
"जी, कुछ गुंडे जौ इसकाम मे माहिर हें। वोँ इन झुग्गी वालों कों इसतरह सें डराएँगे कि वोँ स्वयं ब स्वयं भाग जाएंगे। नां कोई phir होगी, नां कोईकेस। सभी साफ़। "
अलिना चुपचाप कुछ सेकंड तक सोची, फिन धीरे-धीरे सें बोलीं, "नाम बताओ.कौन कर सकता हैं यहकाम?"
CEO नें हल्की मुस्कान केँ संग एक् पर्ची उसकी तरफ़ बढ़ाई। "यहाकुछ नाम लिखे हें, इनमें सें किसी कों भि हायरकर सकते हें। "
अलिना नें पर्ची उठाई औऱ पढ़ने लगी। उसकी उँगलियाँ आरामसे पर्ची पर्र फिसलरही थीं, औऱ उसके चेहरे पऱ हल्की सख्ती औऱ बढ़रही थि।
फिन उसने धीरे-धीरे सें कहा, "ठीक हैं। काम होँ जानां चाहिए। बिना किसी रुकावट केँ। "
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अलिना नें मेज़ पऱ रखे ग्लास कों धीरे-धीरे सें सरकाया औऱ पर्ची कों ध्यान सें पढ़ने लगी। उसके चेहरे पर्र एक् गहरीसोच कि लकीरें उभरने लगीं। तभी CEO नें धीरे-धीरे सें उसकीओर एक् फाइल बढ़ाई।
"मैम, अगर हम् केवलउन झुग्गी वालों कों हटाएँगे तोँ बाकी केँ ज़मीन मालिक सतर्क होँ जाएँगे। मगरअगर हम्। पूरे इलाके मे डर फैलादें, तोँ यहसबलोग अपनी ज़मीन औने-पौने दामों मे हमें बेचने पर्र मजबूर होँ जाएँगे। "
अलिना नें सिर उठाकर उसकी तरफ़ देखा। "क्याँ मतलब?"
CEO नें एक् नक्शा खोला औऱ टेबल पर्र फैलाया। "देखिए, यह पूरा इलाका देखरही हें? यह ज़मीनें अलग-अलग लोगों केँ पास हें, मगरअगर हम् सहीचाल चले, तोँ यह सारी ज़मीन हमारे हाथ मे आँ सकती हैं। "
अलिना नें नक्शे पऱ नज़रें दौड़ाईं। आस-पास केँ इलाकों मे छोटे-बड़े कई प्लॉट्स थें, कुछघऱ भि बनेहुए थें। मगरउन सबकेबीच मे एक् छोटी सोसाइटी थि
अलिना नें नक्शे पऱ उँगली रखी। "यह क्याँ हैं?"
CEO हल्के सें मुस्कुराया, जैसे वोँ इसी प्रश्न कां इंतजार कररहा थां। उसने अपने चश्मे कों एडजस्ट किया औऱ धीरे-धीरे सें बोला, "यही असलीखेल हैं, मैम.यह सोसाइटी बहोत कीमती ज़मीन पर्र बनी हैं। अगर हम् इसे भि अपने कंट्रोल मे लें लें, तोँ इस पूरे इलाके कि कीमत आसमान छूने लगेगी। "
अलिना चुपचाप नक्शे कों देखती रही। उसे अच्छी तरहसमझ आँ रहा थां कि CEO किसओर इशारा कररहा थां। उसकी उँगलियाँ उस सोसाइटी केँ नाम पऱ जाकरठहर गईं.
"तुम्हें लगता हैं कि यह मुमकिन हैं?" उसने धीरे-धीरे सें पूछा।
CEO नें नक्शे पर्र हल्का थपकी दि औऱ कहा, "डर एक् बहोत बड़ी ताकत होती हैं, मैम। लोग अपनी ज़मीन सें प्रेम करते हें, मगरजब उनकेसिर पऱ खतरा मंडराने लगता हैं, तोँ वोँ प्रेम जल्द हि डर मे बदल जाता हैं। औऱ डर केँ आगे। सौदेबाज़ी आसान होँ जाती हैं। "
अलिना नें एक् गहरी साँसली औऱ कुर्सी पऱ पीछेटिक गई। "अगरयह होँ गय़ा। तोँ यहशहर मे सबसे बड़ीडील होगी। "
CEO नें मुस्कुराते हुएसिर हिलाया। "बिल्कुल, मैम। औऱ इसमें आपको मात्र एक् 'हाँ' कहनी हैं। बाकी हम् संभाल लेंगे। "
उसने हल्के सें नक्शे पर्र उँगली फेरी, औऱ फिन धीरे-धीरे सें मुस्कुराई।
"करदो शुरूआत."
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