Mukkader kaa sikander – New Episode
तेज़ मूसलधार बारिश थि… बादलों कि गड़गड़ाहट मानो आसमान कों चीररही थि।
अलीना अपनी कालेरंग कि गाड़ी मे थि… ड्राइविंग करतेहुए दफ़्तर सें घऱजारही थि उसके चेहरे पर्र वोँ रुतबा, वोँ ठंडापन बरकरार थां—कम सें कम बाहर् सें।
अचानक फोन कि स्क्रीन चमकी—
"शहबाज़ कॉलिंग."
उसनेकॉल आई उठाई।
शहबाज़ (मोबाइल पऱ):
अम्मी। मेरेकुछ मित्र आए हें आज। सोचा उनकेसंग डिनरकर लें। आपको बुरा तोँ नहि लगेगा?"
अलीना नें हल्की मुस्कान मे जवाब दिया—
"नहि। क्यूं लगेगा?"
मगरउस आवाज़ मे कहींकुछ कांपता हुआ छुपा थां… जैसे किसी पुराने ज़ख़्म पर्र बारिश कि बूँदें गिरगईं हों।
जैसे हि फोनकट हुइ, उसके ज़हन मे वोँ रातउभर आई—वोँ रात जौ सालों सें उसके अंदर पड़ीधूल कों हिलाकर रख देती थि।
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[फ़्लैशबैक — अतीत]
हवेली कि रौनक बढ़ी हुइ थि।
शहबाज़ अपने दोस्तों केँ संग बैठाहँस रहा थां। कुछ लड़कियाँ भि संगथीं। हवेली केँ हर कोने मे महमानों कि हँसी गूंजरही थि।
लड़की:
"आंटी, यह जोँ ऊपर वालारूम हैं नाँ… वोँ बहोत प्यारा हैं… हम् वहीं रुकेंगे। "
अलीना थोडा चौंकी, "वोँ रूम तोँ."
शहबाज़ (झुंझलाकर): "अम्मी प्लीज़! उन्हें अच्छा लगा हैं… एक् हि रात कि तोँ बात हैं."
अलीना नें नज़रें झुकालीं…
उसने शहबाज़ केँ चहरे पर्र नाराज़गी देखी औऱ स्वयं कों हारते हुए महसूस किया।
"ठीक हैं… वोँ रूम खुलवा दो."
वोँ भूल गई थि कि वोँ रूम सिकंदर कां थां… उसका बेटा… उसका मासूम…
पऱ शहबाज़ कां चहरा उतराहुआ देख उससे देखा नहि गय़ा।
क्योंकि दूसरों केँ बच्चों केँ लिए उसकेपास मम्मी जैसी ममता थि… मगर सिकंदर.?
वोँ खामोश बैठा थां… दरवाज़े कि चौखट केँ पास, अपनेबैड सें बेदखल।
न् कोई क्रोध… न् कोई प्रश्न… बस गहरी चुप्पी।
उसकी उम्र तोँ बस 16 - 17 कि थि, पऱ आँखों मे वोँ ठहराव थां जोँ तज़ुर्बे वाले व्यक्ति कि आँखों मे होता हैं।
वोँ रात… वोँ पहलीरात थि जब सिकंदर नें स्वयं कों बेघर महसूस किया थां… अपने हि घऱ मे।
उसने खामोशी सें नीचे वालेहॉल मे सोफा खींचा। औऱ वहींलेट गय़ा।
नां रोटी मांगी… नां रज़ाई… बस आंखें बंदकर लीं।
क्योंकि अब उसकी आंखों मे ख्वाब नहि… सन्नाटे थें।
क्योंकि अबउसे समझ आँ गय़ा थां कि अम्मी कि नज़रों मे वोँ सिर्फ़ बोझ हैं।
फ़्लैशबैक ख़तम-
अलीना कि सांसें तेज़ होँ गईं।
उसने झटके सें ब्रेक मारा औऱ गाड़ी कों मार्ग केँ किनारे खड़ा किया।
उसका जिस्म कांपरहा थां… उसने हैंडल कों कस केँ पकड़ा… औऱ जैसे हि अंदर कां सैलाब फूटा—
"क्षमा करदे सिकंदर…!"
"तूँ तोँ उसरात एक् शब्द भि नहि बोला… तुँ चुपचाप नीचेसो गय़ा। औऱ मे.? मे केसे मां थि। हाँ अलीना कों अपनी गलती कां अहसास थां। पर्र अब.जबसभी कुछ बिखर चूका थां। उसका सिकंदर उसेछोड़ करजा चूका थां.
उसकासिर स्टीयरिंग पऱ झुक गय़ा…
बारिश कि बूंदें गाड़ी कि छत पर्र पड़रही थीं… औऱ उसके अंदर कि बारिश उसकी आँखों सें फूटरही थि।
"मैंने तेरीहर बार किसी औऱ केँ लिए दरकिनार किया…"
"तेरी मासूमियत कों कुचल दिया… तेरीभूख, तेरी नींद, तेरी स्थान… सभीछीन ली."
"पऱ क्याँ पाया मैंने.? एक् खोखली शान? एक् झूठा परिवार?"
उसका काजलबह गय़ा थां… होंठ कांपरहे थें… औऱ आंखों सें निकलता हर आँसू उसकीरूह कों चीररहा थां।
"अब तुझसे कहां ढूंढ। सिकंदर। मेरे बच्चे। मे तौ तुझेही कभीसमझ हि नहि पाई." मेरीजान अम्मी केँ पासआजा.
वोँ बुरीतरह फूट पड़ी…
एक् समय कि रानी…आज अपनी गलती केँ आगे रेंगरही थि…
पर्र जौ टूट चुका हैं… क्याँ वोँ दोबारा जुड़ता हैं?
वाहन केँ शीशों पर्र बेमहर बारिश कि बूंदें लगातार गिररही थीं…मगर अलीना केँ दिल पऱ जोँ सैलाब टूटा थां, उसका हंगामा किसी तूफान सें कम नहि थां।
वोँ अब भि ड्राइविंग सीट पर्र बैठी थि… बदन कांपरहा थां… आँखें सुर्ख़… बाल बिखरे हुए… औऱ चेहरा ऐसा मानो सदियों कां पछतावा उस पर्र उतरआया होँ।
अचानक उसने सीने पऱ हाथ मारकर चीख मारी—
"सिकंदर.!"
"सिकंदर। मेरेलाल। मेरे बच्चे.!"
वोँ अपने दोनों हाथों सें बालों कों पकड़कर झुक गई… आँसुओं सें भीगी सांसें टूटती चलीगईं…
"देख, तेरी अम्मी केसेटूट रही हैं तेरे बिना.देख, मे ज़िंदा लाशबन गई हूं तेरे बिना."
"तुँ तौ बस एक् बारकह देता नाँ, 'अम्मी। मतकरो ऐसा.'
मे तौ तुम को अपनीजान दे देती रे."अपना कलेजा निकाल कर तुम्हें दे देती.
मति मारी गई थि मेरी.जोँ तुम्हारी तरफ देख्ना भूल गई…"तेरे दर्द कों महसूस करनाभूल गई.
"केसेभूल गई मे कि तेरा भि दिल हैं… तूँ भि मेरीकोख सें जन्मा हैं…"
वोँ अबसीट सें झटके सें बाहर् निकलआई… भीगती हुई गाड़ी केँ सामने घुटनों केँ बलबैठ गई… मार्ग पर्र कीचड़, पानी, औऱ आँसुओं कां घोल थां…
"सिकंदर.!"
"मुझे क्षमा करदे। मेरेलाल। मुझसे बहोत बड़ीभूल हौ गई.!"
"तेरे सामने कभीसिर झुका नहि पाई…मगर आजइस मिट्टी मे मिलकर तुम्हें पुकार रही हूं."मेरे लालआजा अपनी अम्मी केँ पास।
वोँ ज़ोर सें मार्ग पर्र माथापटक देती हैं… बार-बार… हरबार उसके शब्दों मे एक् टूटी हुइ मम्मी कि चीख होती हैं…
"मे क्यूं नहि समझपाई कि तूँ चुप रहकर कितना चीखरहा थां."
"तेरी वोँ खामोशी आज मेरेकान फाड़रही हैं."
मे भूल गई थि तेरा सबसे ज़्यादा हक़ हैं मेरे प्रेम पऱ.
"दूसरों केँ लिए मैंने तेरेदिल कों कुचल दिया…
तेरे आँसू मेरी आँखों सें नहि गिरे… इसीलिए आज मेरीरूह रोरही हैं."
"मे मां नहि थि… मे गुनहगार थि…!"
वोँ चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगती हैं, आसमान कि गरज उसके दर्द सें हार जाती हैं…
"सिकंदर। मेरे जिगर केँ टुकड़े… तूँ कहा हैं रे.?
एक् बारबस आँ जा… मुझेदेख लें… मुझे सुनादे अपनी खामोशी."
वोँ ज़मीन पर्र बैठ जाती हैं… दोनों हाथ आकाश कि ओर फैलाए हुए…
"याँ अल्23लाह। अगर मेरीकोई भि दुआअब तक बाकी हैं…
तोँ बस मुझे एक् बार मेरे सिकंदर सें मिलादे…"
"उसके पाँव पकड़ लूँगी… अपने गुनाह कुबूल कर लूँगी…
पऱ मुझेबस एक् बारदेख लेने दे…बच्चे कों.
"मेरा बच्चा अबकिस हाल मे हैं… कौनउसे सुलाता हैं, कौन उसकी थाली सजाता हैं… किसके सीने सें लगकर वोँ अपने दर्द छुपाता हैं.!"वोँ जिन्दा भि हैं याँ नहि। कहीं उसने स्वयं कों ख़तम तौ नहि कर लिया।
अलीना अबथक चुकी हैं… आँखें सूज चुकी हें…
मगर उसकादिल अब भि धड़करहा हैं—सिर्फ़ सिकंदर केँ लिए। याँ किसी औऱ केँ लिए भि.
बारिश थम गई हैं… मगर उसके आँसूअब भि बहरहे हें
भीगी हुइ, कांपती हुइ, बिखरी सांसों केँ संग अलिना जैसे-तैसे अपने बंगले केँ गेट तक पहुंचती हैं। गेट खुलता हैं, नौकर दौड़कर आता हैं—
"बेगम साहिबा.? यह क्याँ हालबना रखा हैं आपने.?!"
अलिना कुछ नहि कहती… उसकी आंखें लाल हें, चेहरा सूजाहुआ, बाल भीगेहुए उसके चेहरे सें चिपकरहे हें… वोँ बिना किसी कों देखे अंदर कि ओरचल देती हैं।
ड्रॉइंग रूम मे पहुंचते हि सामने हसन मिर्ज़ा बैठा होता हैं — सफेद कुर्ता, चेहरे पर्र गुरूर औऱ आँखों मे वोँ आग, जोँ सिर्फ़ तब जलती हैं जब इज़्ज़त नाम औऱ रुतबे कों अहम्येत दि जाए।
हसन मिर्ज़ा उठता हें… औऱ जैसे हि अलिना कों उस हालत मे देखता हें… उसके चेहरे कां रंगबदल जाता हैं।
"क्याँ हालबना रखा हैं तुमने अपना अलिना?!"
अलिना थक चुकी होती हैं… उसका चेहरा नीचे झुका होता हैं… पर्र उसकी आंखों सें फिन सें पानी गिरने लगता हैं।
हसन कि आवाज़ औऱ ऊँची होँ जाती हैं —
"कहीं किसी नें देख लिया होताइस हालत मे…!? क्याँ सोचते लोग? क्याँ कहते मेरे बारे मे!? कि मेरी पत्नि सड़कों पर्र यूँफिन रही हैं!?"अब तुम् एक् नवाब कि पत्नि होँ.
"इज़्ज़त मिट्टी मे मिल जाती हमारी! हमारे नाम कां तमाशा बन जाता!"
अलिना चौंककर उसे देखती हैं… उसके चेहरे पऱ किसी फिक्र नहि थि कि वोँ क्यूं रोई, याँ उसकेदिल पऱ क्याँ गुज़री… उसेबस अपनी 'इज़्ज़त' कि चिंता थि…
"तौ क्याँ कर लेती मे हसन.?!"
"कहो! किससे कहती कि मेरादिल फटरहा हैं… किसे बताती कि मैंने अपने बेटे कों खो दिया… औऱ अब पछतावे केँ सिवाकुछ नहि बचा!"
"तुम्हें मेरी तकलीफ सें कोई फर्क नहि पड़ता… तुम्हें फर्क पड़ता हैं कि लोग क्याँ कहेंगे!"
हसन उसकी बातों कों अनसुना करता हैं… औऱ झल्ला करपास कि मेज़ पऱ रखी चीज़ें गिरा देता हैं।
अलीना मेने तुम्हे बताया हैं। उस नाज़ायज़ केँ लिए कहीं तुम्हे तलाक नाँ देनापरे मुझे.तुम्हारे आँसू मेरी कमजोरी नहि बनेंगे, अलिना!"
अलीना धक् सें रह जाती हैं। तलाक.यह शब्दउसे सबसे ज़्यादा डरती हैं। क्योंकि वोँ जानती हैं — वोँ अपनी गलती कि सज़ा अभि भि भुगतरही हैं…औऱ वोँ दुसरी गलतीकर केँ हसन औऱ सहबाज कों नहि खो सकती.
कई बार सज़ा देने वाले स्वयं गुनहगार सें ज्यादा बेरहम होते हें…
औऱ हसन मिर्ज़ा कि आँखों मे इश्क नहि, केवल रुतवा थां एक् नवाब कां रुतवा
अलीना भीगी साड़ी मे, कांपते होंठों औऱ लाल आँखों केँ संग पलंग केँ किनारे बैठी हैं। कमरे कि रौशनी मद्धम हैं। बाहर् अब भि बारिश कि हल्की फुहार चलरही हैं। कमरे कां माहौल चुप औऱ भारी हैं।
द्वार (दरवाज़ा) धीरे-धीरे सें खुलता हैं। अम्मी औऱ भाभी अंदरआती हें। अम्मी सीधे जाकर उसकेपास बैठ जाती हें, उसकी भीगी हुईँ हथेलियाँ अपने हाथों मे लेती हें।
अम्मी (धीरे-धीरे सें):
"कितनी बारकहा हैं इतनामत सोचाकर जोँ होना थां हौ गय़ा,
वोँ तौ चला गय़ा तुम्हारी तरफछोड़ कर पर्र अब जौ तेरेपास हैं उसकीकदर कर.अब सहबाज हि तेरा बेटा हैं। उसी मे वोँ प्रेम ढूंढ.
अलीना बसचुप हैं। उसकी आँखों सें आंसूटपक रहे हें, पऱ आवाज़ नहि निकलरही।
भाभी (हौले सें मुस्कुराते हुए, पऱ बात मे कांटें):
"अरे अम्मी मिल तौ रहा हैं बेटे कां प्रेम हमारी अलीना कों। देख नहि रही केसे सहबाज सिकंदर कि स्थान लेने कि पूरी कोशिस कररहा हैं.
अलीना - यह तुम् क्याँ बोलरही हौ भाभी.मेरे सिकंदर कां स्थान कोई नहि लेँ सकता। मेरीसो जान कुर्बान मेरेलाल पऱ.
भाभी (आँखे घुमाते हुवे )
यह तोँ कहने कि बातें हैं अलीना। मुझे जौ दिखा मेनेबोल दिया। भाभी कि यह ताने अलीना केँ दिल केँ टुकड़े कररहा थां। पऱ उसकेपास अपने बचाव केँ लिए शब्द नहि थें। सायद भाभीसही बोलरही थि.
अम्मी देखकर भाभी कि तरफ़ देखती हें।
अम्मी (कठोरता सें):
"बस कर.जोँ होना थां होँ गय़ा.
भाभी (थोडा झेंपते हुए, फिन भि धीमे स्वर मे):
"मे तोँ बस इतनाकह रही थि… जोँ बीज बोया गय़ा थां, अबवही फल सामने हैं। "
अलीना एक् गहरी सांस लेकर उठती हैं। आँखों मे हज़ार प्रश्न, हज़ार पछतावे।
अम्मी (उसकेसिर पर्र हाथ फेरते हुए):
"अभि कुछ नहि गय़ा हैं बेटी। मुहब्बत कि दुआदेर सें सही, पर्र कबूल हौ सकती हैं। "
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तेज़ मूसलाधार बारिश हौ रही हैं। एक् बड़ी, चमचमाती SUV मार्ग केँ किनारे बंद खड़ी हैं। बोनट खुला हैं, औऱ उसमें झुकी हुई हें — इरा औऱ सुहाना। दोनों केँ बालभीग चुके हें औऱ चेहरों पऱ चिढ़ साफ़झलक रही हैं।
इरा (मोबाइल हवा मे हिलाते हुए, खीझ केँ संग):
"उफ्फ़। नेटवर्क तक नहि आँ रहा! हम् कोई जंगल मे आँ गए हें क्याँ?"
सुहाना (हाथ देखती हुई, मुँह बनाकर):
"दिदी, इसकार नें तौ मेरी नेलपॉलिश हि खराबकर दि। औऱ ऊपर सें स्टार्ट भि नहि हौ रही!"
इरा (झल्ला कर):
"तुँ हि तौ कहरही थि 'दिदी यह वाला मॉडललो, अंदरूनी सजावट इम्पोर्टेड हैं'। अब भुगतो इंपोर्टेड वाहन कां attitude!"
(तभीदूर सें एक् बाइक स्लो होती हैं… उस पर्र बैठा हैं राहिल — बाल बिखरे हुए, हल्की सि मुस्कान, आंखों मे शरारत औऱ दिल मे swag। बाइक साइड मे लगाता हैं। )
राहिल (बाइक सें उतरते हुए, हल्की मुस्कान केँ संग):अरे यह दोनों तोँ वही ऐटिटूड कि दुकान हैं नाँ। आज लगता हैं इनकी BMW ऐटिटूड देखारही हैं.सायद आज इनकी छमयां मम्मी नहि हैं इनकेसंग। चल भइया राहिल मज़े लेते हैं.
राहिल (बोनट कि तरफ बढ़ते हुए):
"क्याँ दिक्कत हैं मैडम लोगो? लगता हैं वाहन नें भि आप् दोनों सें रुठने कां मनबना लिया हैं!"
इरा(नाक चढ़ाते हुए):
"तुम्? पीछाकर रहें होँ हमारा.
राहिल (शरारती हँसी केँ संग):
"पीछाओ मैडम मे इस इलाके कां डॉन हूं। बहु-प्रतिभाशाली ग़रीब लड़का हूं… व्हीकल भि ठीककर देता हूं, औऱ दिल भि!"
सुहाना (अकड़ केँ):
"दिदी, हमेंइस छापरी सें हेल्प लेने कि ज़रूरत नहि हैं। सकल सें हि लफंगा लगता हैं.
राहिल (बोनट खोलते हुए, चुलबुले अंदाज़ मे):
"मेरे सहायता नहि लोगी तोँ पूरीरात यही गुजारनी पड़ेगी.
(वोँ कुछ वायर छूता हैं, घूमा-फिरा कर व्हीकल स्टार्ट कर देता हैं। )
इरा (थोडा हैरान होकर):
"ह्म्म। ठीक हैं, थैंकयू। अबजाओ यहा सें.
राहिल (हँसते हुए):
"पैसे-वैसे नहि चाहिए मैडम, आप् लोगों कां attitude हि बहोत हैं…
सुहाना (शीशा नीचे करके):
"हमारे घऱ कां पतालिख लो — साउथ एवेन्यू, हाउस नंबर 102… कल आँ जानां पैसे लें जानां.
राहिल (हाथ जोड़ते हुए, नाटकीय अंदाज़ मे):
"अरेवाउ! मैडम कि टिप भि VIP स्टाइल कि!"
इरा(तेज आवाज़ मे):
"कलदसबजे आनां, नौकर कों नामबता देना — 'राहिल, रोडसाइड छापरी.
(दोनों हँसते हुए व्हीकल मे बैठती हें, औऱ गाड़ी स्टार्ट कर निकल जाती हैं… मगर मोड़ पऱ जातेसमय सुहाना कां ब्रांडेड बैग पीछेगिर जाता हैं…)
राहिल (चिल्लाते हुए):
"अरे मैडम! आपकाबैग गिर गय़ा!!"
(वोँ बैग उठाता हैं, उसकी ब्रांडेड चेन औऱ perfume कि खुशबू महसूस करता हैं…)
राहिल (मुस्कुराते हुए, स्वयं सें):
"अब तोँ कल जानां हि पड़ेगा… पैसे लेने नहि… ऐटिटूड देखने.
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राहिल, हाथ मे गिराहुआ बैगलिए, हल्की मुस्कान केँ संगआगे बढ़ता हैं। मगर उसके चेहरे पर्र अब seriousness भि हैं। वोँ सीधे सिकंदर केँ घऱ पहुंचता हैं, द्वार (दरवाज़ा) खटखटाता हैं।
सिकंदर द्वार (दरवाज़ा) खोलता हैं।
सिकंदर (थोडा हैरानी सें):
"इतनी बारिश मे? सभीठीक तौ हैं?"
राहिल (भीतरआता हैं, कपड़े झाड़ते हुए):
"सभी झकास हैं भइया… पर्र जौ होने वाला हैं, वोँ सुनकर तेरादिल धड़क जाएगा!"
सिकंदर (थोडा मुस्कुराते हुए):
"अबे सीधाबोल, दिल कि धड़कन बाद मे बढ़ाना… बात क्याँ हैं?"
तभी द्वार (दरवाज़ा) फिन सें खुलता हैं औऱ साद — एजेंट ( यहवही हैं जिसने सिकंदर कों घऱ दिलाया थां जिसने पहलीभाग पढ़ी हैं उसे पाता होगा) अंदरआता हैं। उम्र लगभग 30, चाल मे तेज़ी औऱ आँखों मे चालाकी। यहवही एजेंट हैं जिनसे सिकंदर कों घऱ दिलाया थां.
राहिल (दोनों कि तरफ देखते हुए, फुसफुसाते अंदाज़ मे):
"भइया अगले हप्ते कि जुम्मे कि रात… मुंबई सें दिल्ली एक् ट्रक आँ रहा हैं… ट्रक मे क्याँ हैं पता हैं?"
सिकंदर:
"क्याँ?"
राहिल (धीरे-धीरे सें, आंखें चमकाते हुए):
"सोने कि ईंटें… साढ़े तीन करोड़ कां माल!"
साद (आगे बढ़ता हैं):
"इनसाइड इन्फॉर्मेशन पक्की हैं… ट्रक किसी प्राइवेट डीलर कां हैं, मगर no protection। रास्ते मे हम् लोगउसे रोक सकते हें… औऱ फिन…"
राहिल (बात काटते हुए):
"…औऱ फिन हम् होंगे मालामाल! समझा? ज़िंदगी भर कि struggle समाप्त!"
सिकंदर (थोडा सोचते हुए, धीरे-धीरे सें):
"इतना बड़ा रिस्क?"
राहिल (सिकंदर केँ कंधे पर्र हाथ रखकर):
"भइया…यह कोई चुराया हुआ सपने नहि… यह मौका हैं… औऱ तेरीयाद हैं नाँ — जितना रुपया उतना ताकत… औऱ ताकत होगी तोँ तेरा बाप, अब्दुल रहमान, चाहेसात समंदर पार भि होँ… उसे खींच लाएंगे!"
साद:
"तुँ फैसला कर, हम् ready हें… कलरात सें हि बायपास रोड पर्र रेखी सुरुकर देंगे.
सिकंदर (गहरी साँस लेतेहुए):
"ठीक हैं… मे रेडी हूं!"उसको पैसो कि जरुरत थि। वोँ बाप कों ढूंढ़ना थां। उससेसच जानना थां। अलीना नें जौ उसे उसके बाप केँ बारे मे बताया थां वोँ अबउन बातों पऱ यकीन नहि करता थां.औऱ कहीं नां कहीं वोँ अपने बाप सें अपना नाता कायम करना चाहता थां। वोँ जनता थां कि अलीना इस दुनयाँ मे सबसे ज़्यादा नफरत अब्दुल रहमान केँ करती हैं.
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अब राहिल औऱ सादजा चुके थें।
रात कां दूसरा पहर थां। बाहर् मूसलधार बारिश, बिजली कि कड़क औऱ सड़कों पऱ छप-छप करती पानी कि आवाजें माहौल कों औऱ भारीबना रहीथीं।
सिकंदर अपने कमरे मे गहरी नींद मे थां। पास हि रखे रेडियो सें हल्की आवाज़ मे एक् पुरानां गानाचल रहा थां:
“हम् तेरेशहर मे आए हें मुसाफ़िर कि तरह…”
कमरे केँ बाहर् एक् छोटी सि लालटेन जलरही थि, औऱ हवाएं उसकेलौ कों कभी झुका देतीं, कभी बुझा देतीं।
बाहर् कां माहौल:
कुछ लोगों कि तेज़ चिल्लाहटें औऱ धमकियाँ सुनाई देने लगीं।
गुंडा #1 (ऊँची आवाज़ मे):
“सुना हैं नहि तुने?यह ज़मीन अब तेरी नहि रही, समझा? एक् हफ़्ते मे खालीकर दो वरना सामान केँ संगबदन भि उठेगा!”
गुंडा #2:
“यह मुस्ताक़ साहब ( अलीना केँ कंपनी कां CEO जिसने पहले केँ अपडेस पड़े होंगे उसेपता होगायह क्याँ माजरा हैं)कां हुक्म हैं… यह झुग्गी औऱ तुम्हारी यह सोसाइटी अब रहमतनगर नहि, प्रोजेक्ट साइट हैं!”
भीड़ मे सें कोई:
“क़ानून सें डर नहि लगता क्याँ तुम् लोगों कों?”
गुंडा #1 (हँसते हुए):
“क़ानून? वोँ तोँ हमारी जेब मे हैं.
तभी हाशिम साहब, ( जोया केँ अब्बू) गरिमा औऱ इज़्ज़त वाले इंसान, छतरीलिए सामने आते हें। उनकीचाल धीमीमगर आँखों मे बिलकुल डर नहि थां.
हाशिम साहब (गंभीर आवाज़ मे):
“बसकरो! यहलोग मज़लूम हें… यहा सालों सें रहरहे हें। तुम् कौन होते होँ हमें बेघर करने वाले?”
गुंडा #3 (उसे धक्का देता हैं):
मादरचोद। तुझेही नेता बनने कां अधिकसौख हैं.
हाशिम साहब लड़खड़ाते हें मगरडटे रहते हें:
“जब तक मे जिन्दा हूं तब तक तुम् मेरी ज़मीन नहि लेँ सकते!”हमने अपनेखून पसीने सें इसघऱ कों खीरीदा हैं.
गुंडा गुस्से मे आकर उनकेपेट मे घूंसा मारता हैं, फिन एक् केँ बाद एक् लातें… हाशिम साहब ज़मीन पऱ गिर पड़ते हें।
भीड़ चीखने लगती हैं।
रुक्सार, जोँ अभि तक घऱ केँ अंदर थि, चिल्लाते हुए बाहर् दौड़ती हैं।
रुक्सार (कांपती हुईँ, गीली साड़ी मे):
“हाशिम! याँ अल्23लाह… हाशिम!!”
अली, गुस्से मे भीगता हुआ दौड़ता हैं पर्र दो गुंडे उसे पकड़ लेता हें।
अली (चीखते हुए):
“छोड़ो मुझे हरामियों! सालों मेरे अब्बू कों मारता हैं। मादरचोदो.
ज़ोया (आंसुओं सें चेहरा भीगाहुआ), डरतेहुए दौड़ती हैं, औऱ ज़मीन पऱ गिर पड़े अब्बू कों बाहों मे भरती हैं।
ज़ोया (थरथराती आवाज़ मे):
“अब्बू… अब्बू… कुछ बोलिए… कुछ तौ बोलिए…”
गुंडा #2:
“कहा नां… निकलो यहा सें! वरना सबकेसंग यही होगा!”
भीड़ खामोश… डर औऱ बेबसी कां माहौल… कोईकुछ कह नहि पारहा…
औऱ वहीं दूसरी ओर, सिकंदर केँ कमरे मे सभी शांत… केवल वोँ पुरानां गानाअब भि चलरहा हैं.
“दिल मे कुछखोए हुए लम्हों कि कसक लेकरआए हें…”
सिकंदर अभि तक नींद मे हैं… मगर एक् तूफ़ान उसके दरवाज़े तक आँ पंहुचा थां.
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हाशिम साहब अभि भि ज़मीन पऱ पड़े उतावलापन रहे थें, रुक्सार उनकेसिर कों गोद मे रखे काँपरही थि, ज़ोया कि आँखों सें बहते आँसू रुकने कां नाम नहि लें रहे थें।
तभी… ज़ोया कि आँखों मे बिजली सि चमकती हैं।
ज़ोया (काँपती हुईँ, दबी आवाज़ मे):
“अली…अली! सिकंदर कों बुला…भाग… जल्दजा.
अली, जौ अब तक डरा औऱ टूटाहुआ थां… एकदम खड़ा होँ गय़ा। जैसे किसी नें उसके अंदर दोबारा जानभर दि होँ।
अली(जोश मे चीखते हुए):
“हाँ… हाँ बाज़ी! मे उन्हें लेकरआता हूं!”
वोँ बिना रुके बारिश मे भीगता हुआ सीढ़ियाँ चढ़ने लगा…हर कदम केँ संग उसकाडर पिघलता गय़ा, औऱ हिम्मत उबलती गई।
अली (भागते हुए, चिल्लाता हैं):
“सिकंदर भइया!!! भइया जल्दचलो… मेरे अब्बू कों मार देंगे.
वोँ पूरीजान सें सिकंदर केँ दरवाज़े पऱ हाथ मारने लगा अंदर धीमी रौशनी, रेडियो अब भि चलरहा थां…
द्वार (दरवाज़ा) खुलता हैं…
सिकंदर, आधी नींद मे, आँखें नीली आँखे। घूंग्राले बाल बिखरे हुए… सामने अली कों देखता हैं जोँ फूट-फूटकर रोरहा हैं।
सिकंदर (धीमे पऱ भारी आवाज़ मे):
“क्याँ हुआ?”
अली (हिचकते हुए):
“वोँ… कुछ डकैत … अब्बू… अब्बू कों बहोत मारा… भइया जल्दचलो वरना—”
अभि अली कि बात पूरी भि नहि होती कि सिकंदर दरवाज़े कों जोर सें बंद करता हैं, औऱ बिना एक् सेकेंड सोचे, तीसरी मंज़िल सें छलांग लगा देता हैं…
ज़ोर कि धमाकेदार आवाज़ आती हैं… पानी केँ छींटे चारों तरफ उड़ते हें।
मोहल्ले वाले, ज़ोया, रुक्सार – सभी सन्न…
यह व्यक्ति कौन हैं?
गुंडे, जौ अब तक हँसी उड़ाकर सबको धमकारहे थें, सिकंदर कों देखते हि उनके चेहरे उतर जाते हें।
गुंडा #1 (धीमे मे):
“अबे.अबे यहकौन हैं बे?भूत हैं क्याँ? तीसरी मंज़िल सें कूदा औऱ कुछ नहि हुआ…”
गुंडा #2:
“कोनो सनकी लागत हैं भैया.
सिकंदर धीरे धीरेआगे बढ़ता हैं, आंखें लाल, चेहरा गुस्से सें भरा… उसकी साँसे तेज़…
सिकंदर (गुंडों कि तरफ बढ़ते हुए, भारी आवाज़ मे हासिम साहब केँ तरफ इसरा करते हुवे)
“किसने हाथ लगाया रे मादरचोध.
गुंडा #3 (बोलने कि कोशिश करता हैं):
“हमने लगाया रे हरामखोर.
सिकंदर (गर्दन टेढ़ी करके, आग उगलती नज़रों सें):
“चुप… तेरी मम्मी कि…चुत मादरचोदो। शपथ खु*दा कि कुत्ता बना दूंगा आज तुम् सभी कों
गुंडा #1 (गुस्से मे):
“देख क्याँ रहें हौ भरवाओ मारो साले कों.
(अभि वोँ बात पूरी करता, उससे पहले…)
सिकंदर कां पहलापंच उसके जबड़े पर्र पड़ता हैं… सीधा पाँचफीट दूरजा गिरता हैं।
एक् औऱ गुंडा आता हैं, सिकंदर घुटना मारता हैं सीने मे… खून कि उल्टी वहीं ज़मीन पऱ गिरती हैं।
गुंडा #2 (पीछे हटतेहुए):
“अबे भागो… भागोबे। मुस्ताख साहब नें इसके पैसे नहि दिए हैं.
भीड़ मे सन्नाटा… पऱ हर चेहरा चौंकता हैं… डरता हैं… औऱ फिन — चुपचाप देखने लगता हैं कि मोहल्ले कां सबसे शांत रहने वाला लड़काआज आगबन चुका हैं.
गुंडे एक्-एक् कहैं। कुछ लंगड़ाते हुए, कुछ खून सें लथपथ…
सिकंदर, खून सें सनाहुआ, सीधा हाशिम साहब केँ पासआता हैं। ज़ोया अब तक रोरही थि।
सिकंदर (धीरे-धीरे सें ज़ोया सें):
“अस्पताल लें चलो इन्हे.
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बारिश अबथम चुकी थि…
माहौल मे एक् अजीब सि खामोशी थि…
गली कि सड़कों पऱ पानी कि बूंदें टपकरही थीं…
मगर अलीना इससमय उस दुनिया मे थि… जहाँ दर्द नहि थां… बस एक् अधूरी इश्क कां साया थां।
कमरे मे हल्की सि रोशनी थि… खिड़की सें आती ठंडीहवा उसके चेहरे कों छूरही थि।
अलीना बैड पऱ लेटी हुइ थि… मगर उसकी आँखें बंदथीं… औऱ माथे पर्र शिकन थि।
वोँ गहरी नींद मे थि…
औऱ तभी—
एक् हल्की सि मासूम सि आवाज़ उसके कानों सें टकराई।
“अम्मी…”
अलीना कि साँस जैसे एक् लम्हा कों थम गई होँ…
उसने धीरे धीरे पलकों कों खोला… औऱ स्वयं कों एक् अजीब सि स्थान पऱ पाया।
सामने धुंध थि… औऱ धुंध केँ बीच सें एक् छोटा बच्चा उसकीतरफ बढ़रहा थां।
उस बच्चे कि आँखें नीलीथीं… उसकी मुस्कान किसी फ़रिश्ते जैसी… घुंघराले बाल, सफ़ेद कुर्ता औऱ मासूम चेहरा…
बच्चा (धीरे-धीरे सें):
“अम्मी… तुमने मुझे छोड़ दिया.?
“क्याँ मे इतना बुरा हूं अम्मी?
अलीना कि आँखों मे आंसूभर आए…मानो उसका कालेजा फट गय़ा हौ वोँ नीचेझुक कर उसका चेहरा थामती हैं… काँपते होठों सें बोलती हैं…
अलीना (टूटती आवाज़ मे):
“नहि… नहि मेरीजान… तुँ मेरीरूह कां हिस्सा हैं … मेरा सपने… मेरा सबसे हसीन सपना…हैं तुँ। मे तुम को केसे छोड़ सकती हूं…”
“मेरे नसीब नें तुम्हारी तरफ मुझसे छीन लिया…”
बच्चा उसकी उंगली थाम लेता हैं… उसकी मासूम हथेली अलीना कि काँपती उंगलियों मे समा जाती हैं।
बच्चा (धीमी आवाज़ मे, दुःखी लहजे मे):
“तौ फिन आपने क्यूं मेरीतरफ देखा भि नहि?
मात्र सज़ादे दि… बिना मेरी गलती केँ…”
अलीना कि चीख सि निकलती हैं—
अलीना:
“बसकरो… मेरीजान बसकरो…
मुझेमत अम्मी मर जायेगी.
मे हर रोज़ मरती हूं…
हर साँस तुझसे दूर होकर मेरेलिए ज़हरबन गई हैं…”
बच्चा उसकीगोद मे बैठ जाता हैं… औऱ एक् अंतिम बारउसे देखता हैं।
बच्चा:
“आपने अपने सिकंदर कों मार दिया अम्मी.
अलीना उसकीओर बढ़ती हैं, उसे सीने सें लगाना चाहती हैं… मगरतभी वोँ बच्चा धुंध मे गायब होने लगता हैं।
अलीना (चिल्ला कर):
“रुको!!मत जाओ… मेरीजान… मेरीलाल … सिकंदर मेरीजान। वापस आँ जा.
मगर अब वहां मात्र धुंध थि… औऱ उसकी गोदी खाली…
अलीना कि चीख सें उसकी नींद टूटती हैं।
वोँ हड़बड़ा कर उठती हैं… उसका शरीर पसीने सें भीगा होता हैं… औऱ आँखों सें लगातार आंसूबह रहे होते हें।
अलीना (दम घुटी सि आवाज़ मे, स्वयं सें):
“क्याँ मेरा बच्चा… सच मे मर गय़ा हैं। क्याँ मेनेउसे मार दिया। मेरीवजह सें सिकंदर मर चूका हैं.
”
अपना revew देना नाँ भूले। मेरेलिए आपकेराय। औऱ आपका प्रेम सबसे अहम् हैं। मेरी आप् सभी सें बिनती हैं केँ कहानी सें रिलेटेड दो लाइन जरूर लिखें।
अगलाभाग कल 2 बजे.आये गा. ap sub plzz kahani padhne k baad apna revew dena met bhulna. bas kuch lines likhne h. maira manobal badhega.
Mukkader kaa sikander – New Episode
तेज़ बारिश मे भीगते हुए मोहल्ले केँ लोग हसीम साहब कों सहारा देकर हॉस्पिटल तक लेकर पहुंचे। अंदर पहुंचते हि नर्सें स्ट्रेचर लें आईं औऱ उन्हें इमरजेंसी वार्ड मे शिफ्ट किया गय़ा। रुक्सार कि साड़ी पूरीतरह भीग चुकी थि, मगर उसकी आंखों मे आंसुओं कि धाराथमी नहि थि। अली केँ चेहरे पर्र चिंता कि लकीरें गहरी होतीजा रहीथीं। ज़ोया कां दुपट्टा गले सें उतर चुका थां, बाल चेहरे सें चिपकरहे थें औऱ नज़रे बस अपने अब्बू पर्र टिक्की हुवी थि.
सिकंदर एक् कोने मे चुपचाप बैठा थां। उसके चेहरे पऱ कोईभाव नहि थां, जैसेकुछ महसूस हि नाँ हौ रहा होँ।
डॉक्टर बाहर् आए, "घबराइए मत, बस बेहोश हें। सुभह तक होश आँ जाएगा। "
रुक्सार अली औऱ ज़ोया नें सुकून कि सांसली, मगर ज़ोया नें वहीं सिकंदर कि ओर देखा जैसे उसके चेहरे कों पढ़ने कि कोशिस कररही होँ.
यह लड़की अब पूरीतरह सें मुहब्बत मे पड़ चुकी थि। एक् तरफ़ा मोहबत.
मोहल्ले वालेआपस मे खुसर-पुसर करनेलगे—
यह जौ गुंडे थें न्। नवाबहसन मिर्ज़ा केँ भेजेहुए थें। "
यह सारी जमीन उनकी पत्नि। अलीना मिर्ज़ा कों चाहिए.
अब रानी साहेबा ( अलीना ) कों यहामॉल बनवाना हैं.
"अबसमझ आया, क्यूं अचानक इन झुग्गियों कों खाली करवाने कि बातचल पड़ी। "
सिकंदर नें वोँ सभी सुना। एक्-एक् शब्द। मगर चेहरा वैसा हि ठंडा। जैसेकोई बातअसर हि नाँ कररही होँ।
सायदअब उसकीलिए अलीना एक् अजनबी थि। उसेअब अलीना सें कुछ लेना देना नहि थां। वोँ अब अलीना केँ सामने जानां नहि चाहता थां। पर्र एक् दिक्कत थि ज़ोया.
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"अब औऱ बर्दाश्त नहि होता…आज हसीम साहब कों मारा, कल हमारे बच्चों कि बारी होगी?"
"अरे भई! सीधा सीधा नवाबहसन मिर्ज़ा औऱ उसकी पत्नि अलिना कां खेल हैं यह…"
"हां, उन्हीं कां प्रोजेक्ट हैं वोँ मॉल वाला…अब इस बस्ती कों खदेड़ केँ मैदान बनाना हैं इन अमीरों कों!"
भीड़ मे सें एक् बुज़ुर्ग बोले –
"अरेअब तौ यहसभी हद सें बाहर् होँ गय़ा हैं भइया…घऱ खाली करवाने केँ चक्कर मे लोगों कि जान लेने पऱ उतरआए हें…"
दूसरे मर्द नें गुस्से सें कहा –
"औऱ यहसभी अलिना बेगम कि मर्ज़ी सें हौ रहा हैं… सीधा-सीधा हुक्म उसी कां हैं!"
ज़ोया, जोँ अब तक अपने अब्बू केँ लिए रोतीरही थि… अब उसकी आंखों मे आंसू नहि,
वोँ सीधाबीच मे आई औऱ गुस्से सें बोलीं –
"कब तक सहेंगे हम् सभी?कब तक चुप रहेंगे? आज मेरे अब्बू थें… कल किसी औऱ केँ होंगे…"
सभीलोग चुप होँ गए… ज़ोया कि आवाज़ मे कुछऐसा थां जौ सबको झकझोर गय़ा।
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मोहल्ला – प्राचीन कुंआ(साम कां समय, थोड़ी हल्की बारिश हौ रही हैं)
मोहल्ले केँ सभीलोग आरामसे जमा हौ चुके थें। कुछ बच्चे भीगते हुएपास खड़े थें। बूढ़े, औरतें, नौजवान – सबके चेहरे पऱ ग़ुस्सा थां… दर्द थां… औऱ सबसे अधिक थां अपमान कां घाव।
ज़ोया कुएं केँ किनारे खड़ी थि। उसके चेहरे पऱ अब मासूमियत नहि, लपटें थीं… हिम्मत थि… औऱ आंखों मे एक् नया जूनून।
ज़ोया (तेज़ आवाज़ मे, भीड़ कि तरफ़ देखकर):
"कब तक सहेंगे हम्? कब तक हमारी ज़मीन, हमारा आसमान, हमारी इज़्ज़त – यह अमीरलोग छीनते रहेंगे? यह अलीना मिर्ज़ा – हमें मिटाना चाहती हैं। मगरअब हमारी आवाज़ हि सबसे बड़ी बग़ावत होगी!"
भीड़ मे सरगर्मी बढ़ती हैं।
एक् बुज़ुर्ग चाचा (कड़क आवाज़ मे):
"बोल बिटिया, आज हम् सभी तेरेसंग हें!"
सिकंदर दूर सें खरा। मुस्कुराते हुवे अपने सिगरेट जलाते हुवे - तोँ इस लड़की कों नेता बनना हैं.देखतें हैं यह तितली खुले आसमान मे कितने देर ऊरपाती हैं.
ज़ोया (हाथ उठाकर):
"हम् यहीं – इसी कुएं केँ पास – धरना देंगे!कल सुभह सें जब तक यह जुल्म रुकता नहि, हम् यहीं बैठेंगे! नां खानां, नाँ पानी – सिर्फ़ सच्चाई कां साथ!"
भीड़ सें आवाज़ आती हैं –
हाँ हाँ.धरना देंगे!"
"हक़ लेंगे!"
रुख़सार (आँखों मे डर, पर्र होंठों पऱ मम्मी कि ममता):
"… कहींकुछ हौ गय़ा तौ…"
हासिम साहब (कमज़ोर मगर मजबूत आवाज़ मे, जौ अंदर कमरे मे लेटे थें, बाहर् कि आवाज़ें सुनकर उठ जाते हें):
"रुख़सार… जौ औलाद अपने बाप केँ लिए दुनिया सें लड़जाए… उस पर्र नाज़ किया जाता हैं, डर नहि! आज तुँ डररही हैं… मगर मे। मे अपनी बेटी पर्र फख़्र कररहा हूं…"
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काली मर्सेडीज कि खिड़कियों पर्र बारिश कि बूंदें यूंगिर रहीथीं जैसे आसमान स्वयं भि गुस्से मे होँ। अलिना स्टियरिंग थामे दफ़्तर कि ओरजारही थि, आंखों पर्र काला चश्मा, होंठों पऱ वही सख्त खामोशी — जोँ उसकी पहचान थि।
अलीना - उह्ह्ह। अल्23लाह यह बारिस तौ रुकने कां नाम हि नहि लें रही.
तभी फोन कि स्क्रीन जलउठी — "मुसक़ान अहमद" कॉलिंग। (CEO )
“हांकहो!” अलिना नें झुंझलाकर कॉलआई उठाई, आवाज़ मे गूंजती हुकूमत थि।
"मैम, एक् बुरी ख़बर हैं… कलरात हमारे आदमियों कों किसी नें बहोत मारा हैं.
"क्याँ??" अलिना कि आंखें सुर्ख़ हौ गईं, उसने ब्रेक मारी औऱ गाड़ी एक् झटके मे रुक गई।
“जी, अहमधनहर मे… उस इलाके कों खाली कराने भेजेगए लोगो कों एक् लोकलडॉन हैं — राहिल… उसके लोगों नें मारा हैं… औऱ अब वहां केँ लोग धरना देने निकल पड़े हें…”
अलिना नें दांत भींचे, “साले कुत्ते… एक् झुग्गी केँ लौंडे नें मेरे प्लान पऱ थूक दिया…?” उसनेफोन कों साइड मे पटका औऱ अपनी सांसों कों काबू मे करने कि कोशिश कि, फिन एकदम शातिर मुस्कान केँ संग बोलि:
“इस राहिल कि औकात क्याँ हैं?”
“मैम, छोटा मोटा लोकल गैंगस्टर हैं, पर्र इलाका उसी केँ नाम सें कांपता हैं। ”
"तौ फिन.उसे खरीदलो। "
"मैम?"
"हां! मीटिंग फिक्स करो…आज हि राहिल केँ संग। जितने पैसे मांगे देदो, मगर वोँ धरना रुकना चाहिए। उस मोहल्ले केँ लोगउसी केँ भरोसे पऱ छातीठोक रहे हें। जब वोँ हि बिक जाएगा, तौ यह जनता तौ अपने आप् घुटनों पर्र आँ जाएगी!"
फिन उसने चश्मा उतारते हुए होंठ चबाते हुवे बोलीं- किसीगली केँ कुत्ते कों इतना भौंकने कि इजाज़त नहि दि जाती। ”उसके सामने रोटी फेको वोँ तुम्हारे सामने दुम हिलाये गा.
“जीमैम, मे जल्दी इंतज़ाम करता हूं। ”
मोबाइल कटते हि अलिना नें शीशे मे स्वयं कों देखा। चेहरे पऱ एक् सिकन तक नहि थि। जैसेयह उसने पहलेकई बार किया हौ.…वोँ इस बिजनेस कि एक् माहिर खिलाड़ी थि। उसे लोगो केँ ईमानदारी कों खीरीदना आता थां.
उसकी गाड़ी अबफिन सें आगे बढ़ने लगी — पर्र इसबार रफ्तार पहले सें ज़्यादा तेज़ थि। एक् तूफान थां जौ दिल्ली कि सड़कों पर्र दौड़रहा थां — नाम थां अलिना मिर्ज़ा।
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लोहे कां गेट खुला… लिफ्ट कि घंटीबजी औऱ राहिल वसाद जैसे हि अलिना मिर्ज़ा केँ दफ़्तर कि मंज़िल पर्र पहुंचे, सामने शीशे औऱ मार्बल कि चमचमाती दुनिया खड़ी थि। छत सें लटके झूमर, दीवारों पर्र विदेशी पेंटिंग्स, औऱ हर कोने मे AC कि ठंडी ठंडी साँसें — यह नज़ारे किसी पांच सितारा महल सें कम नहि थें।
राहिल ठिठककर रुक गय़ा।
"तोँ यह हैं रानी साहिबा( अलीना ) कां दरबार…" उसने हौले सें मुस्कराते हुए सिगरेट जेब सें निकाली, पऱ फिनयाद आया — "यह स्थान बड़ी हैं, तमीज़ दिखानी होगी…" सिगरेट जेब मे हि रख दि।
सादहँस पड़ा:
"चिंता मतकर भइया…आज नहि तोँ कल…यहसभी कुछ अपने सिकंदर कां होगा। फिन देख्ना, अपना भि झूमर नीचे औऱ पाँवऊपर वाली लाइफ होगी…आज झुग्गी मे सही, पर्र कल शीशमहल मे हि बैठेंगे। "
राहिल मुस्करा कर गर्दन हिलाता हैं, “तेरे मुँह मे घी-शक्कर… साले, तुझमें मनकम, पर्र ड्रीम्स भारी हें। ”
इसीबीच, एक् स्त्री सेक्रेटरी उन्हें अंदर लें जाती हैं — एक् बड़ी, आलीशान मीटिंग रूम कि ओर, जहाँ काँच कि दीवारों केँ पार दिल्ली कां पूरा आसमान झुकानजर आँ रहा थां।
औऱ वहा थि… ALINA MIRZA.
नीली आँखों मे बर्फ़ कां सन्नाटा, होंठों पर्र हल्की लिपस्टिक, बाल खुले औऱ घुंघराले, औऱ कुर्सी पऱ ऐसे बैठी जैसे पूराशहर उसकी मुट्ठी मे होँ। बातचीत सें पहले हि वोँ निगाहों सें फाइलपढ़ चुकी थि — यहदोकौन हें।
राहिल ( साद केँ कान मे धीरे-धीरे सें.) - अबे.यह तोँ पूरी अपने सिकंदर कि कार्बन कॉपी हैं बे.
साद - अबे साले। सिकंदर इसकी कार्बन कॉपी हैं। यह सिकंदर कि नहि.
राहिल: (हथेली सें टोपी उतारता हैं, पर्र चेहरा वहीठसक वाला)
"सलाम रानी साहिबा… बुलावा भेजा थां, तोँ हाज़िरी लगा दि हमने। "
अलिना: (बिना मुस्कराए, सीधीबात करती हैं)
"तुम्हारे खिलाफ़ phir तक दर्ज होँ सकती थि… हमारे लोगों पऱ हाथ उठाना कोई मज़ाक नहि। "
राहिल: (कंधे उचकाते हुए)
"हमने नहि उठाया, बीबीजी… हालात नें उठवाया। अपने एरिया मे लोगघऱ छोड़ने सें इंकार कररहे थें… तौ हम् बस उनकेसंग थें। "
अलिना: (थोडा झुककर)
"औऱ अगर मे कहूं कि मे तुम्हें लेना चाहती हूं… एक् कीमत बताओ —
साद: (फुसफुसाता हैं राहिल सें)
"बोलदे भइया, दो तीन खोका.बाद मे बोलेंगे काम नहि बना.ठग लेंगे.
राहिल: (अलिना कि आँखों मे आँख डालकर)
"मैडमजी… हम् बिकने वालों मे सें नहि। औऱ यह जौ धरना हैं नां, यह हमारा नहि… मुहल्ले वालों कां हैं। औऱ आपके लोगो कों हमारे भइया नें पीटा। वोँ क्याँ हैं नां अपने भइया कि नींद ख़राबकर दि थि आपके लोगों नें। इसलिए पिट दिया.
अलिना (तेज़ी सें):
"वोँ कौन?नाम बताओ…उसे मे डील करूंगी। "
राहिल: (हंसते हुए)
"नाम नाँ पूछो… वोँ आपसे मिलना नहि चाहता। वोँ क्याँ हैं नाँ आप् सायदइस दुनयाँ कि अखीरी इंसान होंगी जिसे वोँ मिलना चाहेगा.
अलिना: (गुस्से मे)
"मुझे उससे मिलना हैं। "
साद (चेहरा सख्त करतेहुए):
"मैडम, ज़रा संभल केँ… आप् तौ बिलकुल मत जानां उसके सामने.
अलिना एक् लम्हा केँ लिएचुप होती हैं — उसका क्रोध आँखों मे दहकता हैं, पऱ वोँ स्वयं कों काबू मे करती हैं।
“ठीक हैं… तुम् दोनों जा सकते हौ… पऱ एक् बातयाद रखना — … यह मे जल्द तुम्हें याद दिलाऊंगी। ”
राहिल पीछे मुड़ता हैं:
“औऱ बीबीजी… राजमहल कि दीवारें जितनी ऊंची होती हें, जब गिरती हें तोँ आवाज़ दूर-दूर तक जाती हैं… अभि भि वक़्त हैं, समझौता करलो — वरना तख़्त सें ज़मीन तक आने मे देर नहि लगती। ”
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लोहे कां भारी द्वार (दरवाज़ा) बंद होता हैं। रूम ठंडा हैं, दीवारों पऱ शिकार किएगए शेरों कि खालें टंगी हें, औऱ एक् कोने मे शराब कि पुरानी बोतलों सें भरी अलमारी।
हसन मिर्ज़ा कुर्सी पर्र बैठा हैं, कुर्ता-पायजामा, ऊपरजरी वालीशॉल, औऱ हाथ मे एक् पुरानी अंगूठी — जौ उसके खानदान कि पहचान हैं।
सामने खड़ा हैं एक् व्यक्ति — सफेदबाल, झुकीकमर… मगर आँखों मे लालच।
हसन मिर्ज़ा: (धीरे-धीरे बोलता हैं, मगरहर शब्द नश्तर कि तरह)
"यह ट्रक जुम्मे कि रात दिल्ली मे दाखिल होना चाहिए… कोई देरी नहि चलेगी। "
व्यक्ति:
"मिर्जा साहब… मार्ग थोडा लंबा हैं… पुलिस चेकिंग भि…"
हसन (तेज़ी सें):
"मैंने कहा नां… पुलिस सें कोई खतरा नहि हैं। एस.पी। साहब मेरेघऱ कि ईद कि दावत पऱ हरसाल बिरयानी खानेआते हें… औऱ बिरयानी मे क्याँ होता हैं, यह तुमसे बेहतर कौन जाने?"
(हल्की हँसी)
व्यक्ति (नरमी सें):
"तोँ… यह वाला ट्रक भि वैसे हि माल लेकरजा रहा हैं?"
हसन मिर्जा:
"नकली रजिस्ट्रेशन, फर्जी दस्तावेज़, ड्राइवर कों नयानाम औऱ नया चेहरा मिल चुका हैं। ट्रक मे सोने कि ईंटें हें.
"अगरकोई पकड़ा भि गय़ा… तौ वोँ कहेगा — 'माल बंगालदेश सें आया हैं, हम् तोँ बस डिलीवरी बॉय हें। '
औऱ जब तक पुलिस फाइलबना रही होगी, ईंटें पाकिस्तान केँ रास्ते दुबई पहुँच चुकी होंगी। "
व्यक्ति (आश्चर्य मे):
"आपने तोँ पूरा मार्ग सोचरखा हैं…"
हसन मिर्जा:
"मेरे रास्तों पर्र चलने केँ लिए जूतों कि नहि… जिगर कि ज़रूरत होती हैं।
मे वोँ व्यक्ति हूं जिसने हर दीवार कों द्वार (दरवाज़ा) बनाया हैं… औऱ हर दरवाज़े केँ पीछे एक् बंदूक रखी हैं। "
(एक् लंबा सिगार जलाता हैं, औऱ धुएं केँ बीच बोलता हैं)
"अगर दिल्ली मे कोई रुकावट बनी… तोँ किसी कों ज़िंदा दफनाने मे हमें वक्त नहि लगता। "
व्यक्ति:
"औऱ… अगरउस ट्रक पर्र किसी कि नजर पड़ी?"
हसन (गंभीर होकर):
"तोँ उसकी आंखें निकाल दि जाएंगी… औऱ खून सें वोँ रस्ता धोया जाएगा। "
(एक् लम्बी चुप्पी होती हैं)
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लोहे कि खिड़की केँ पास खड़ाहसन मिर्जा अभि-अभि सिगार बुझाता हैं। तभी उसकीजेब मे रखा मोबाइल वाइब्रेट करता हैं।
स्क्रीन पऱ नाम चमकता हैं: “Alina
हसन (मोबाइल उठाते हि):
"हाँकहो मेरी रानी सुभह-सुभह याद केसेआई?"
अलिना (तेज़ आवाज़ मे, परेशान लहजे मे):
"आपकोकुछ अंदाज़ा हैं, कलरात क्याँ हुआ?
हमारे लोग — जौ अहमधनहर गए थें — उन्हें एक् लोकल गुंडे राहिल औऱ उसके आदमियों नें मार-पीट करभगा दिया।
अब वहा धरना होँ रहा हैं मेरे खिलाफ!"
हसन (बिना हिलते):
"राहिल…
अलिना:
"मैंने स्वयं उससे मिलने कि कोशिश कि… ऑफर दिया…मगर उसने इनकार कर दिया।
कहता हैं — यह मेरे भइया कां मामला हैं, मे नहि बोल सकता। "
(एक् लम्हा कि चुप्पी)
हसन (थोडा मुस्कुराते हुए):
"इतनी सि बात पर्र परेशान हौ गईं मेरीजान.
साहबाज कों बोलिए — वोँ देख लेगासभी। दोदिन मे यह धरना-वर्ना सभी खामोश। "
(अलिना कां चेहरा उतर जाता हैं वोँ सहबाज कों इससभी मे नहि घसीटना चाहती थि मां थि नां। इसलिये.)
अलिना:
"नहि!!
साहबाज कों नहि शामिल करूँगी इस कीचड़ मे…
आप् जानते हें — वोँ मेरा बेटा हैं!
मे उस पऱ एक् खरोंच नहि आने दूँगी…"
हसन (धीरे-धीरे औऱ गंभीरता सें):
"प्रेम करती हौ उससे…मै भि करता हूं जान सें ज़्यादा। आखिर हमारे सारे जाएदाद कां एकलौता वारिस हैं.
मगरयाद रखो, जिसने इस दुनिया मे सर झुकाया नहि… वोँ सर काटने वालों सें डरता भि नहि।
साहबाज मेरा बेटा हैं… औऱ मेरे बेटे कों कोईछू भि नहि सकता।
हमारे इस ताकक्त पऱ सहबाज़ कों बैठना हैं। तौ उसे दुनयाँ कों समझना होगा.
अलिना (आँखें भीगने लगती हें):
"आपकेलिए शायदयह तख़्त-सिंहासन हैं… मगर मेरेलिए साहबाज मेरा बच्चा हैं।
मे नहि चाहती वोँ भि उसीआग मे जले… जिसमें एक् बार सिकंदर जल चुका हैं। " कहींवी भि मुझेछोड़ कर नाँ चला जाये.
हसन (गुस्से सें):
"सिकंदर? फिनवही नाम?
वोँ तुम्हारी गलती थि। उसकी रगों मे गन्दा खूनदौर रहा थां.… मगर सहबाज हमारा खून हैं.
साहबाज कों कुछ नहि होगा।
जोँ भि उसके सामने आएगा… वोँ याँ तौ झुकेगा… याँ मिटेगा।
अब मोबाइल रखो… औऱ उसे रेडीकरो। "
(मोबाइल कट। अलिना फटी-फटी आँखों सें दीवार कों देखती हैं। आहिस्ता वोँ कहती हैं
अलिना:
"सिकंदर। मेराखून थां। उसमेकोई गंदिगी नहि थि। मेने उसपर उसके बाप कि परछाई तक नहि परने दि थि.
---
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बाहर् मोहल्ले मे धरना जारी थां।
ज़ोया आगे खड़ी थि, हाथ मे माइक नहि थां, मगर उसकी आवाज़ पूरे मोहल्ले कि आवाज़ बन चुकी थि।
ज़ोया:
"जब तक हमारे अब्बू केँ हमलावरों कों सज़ा नहि मिलती —
हम् नाँ घऱ जाएंगे, नां पीछे हटेंगे!" औऱ इस स्थान कों छोड़ने कि बात तौ भूल हि जाओ.
मोहल्ले वाले तालियों औऱ नारों सें उसकासंग देरहे थें। मगर ज़ोया कि आँखें बार-बार पीछेगली कि तरफ़जा रहीथीं…
सिकंदर नजर नहि आँ रहा थां।
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धूप कि एक् हल्की किरण पुराने खिड़की सें छनकर सिकंदर केँ चेहरे पर्र गिररही थि।
वोँ अपने पुराने बिस्तर पर्र लेटा थां — आँखें बंद…सायद सोया हुवा थां.
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उधर ज़ोया, अब्बू केँ पास जाती हैं…
ज़ोया:
"अब्बू… मे थोडा सां धन्यवाद कां खानां लेकर सिकंदर भइया कों देनेजा रही हूं…"
हसीम साहब (मुस्कुराकर):
"जा बेटी… वोँ भि थक गय़ा होगा। "
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ज़ोया सिकंदर केँ कमरे तक पहुँचती हैं।
द्वार (दरवाज़ा) थोडा खुलाहुआ होता हैं…
वोँ धीरे-धीरे सें अंदर जाती हैं। कमरे मे हल्की-सि खुशबू होती हैं — पुरानी किताबों, तेल औऱ धूप कि मिली-जुली सि।
सिकंदर बेख़बर लेटा होता हैं।
ज़ोया उसकेपास जाकर चुपचाप बैठ जाती हैं।
धीरे-धीरे सें उसका चेहरा देखती हैं —
उसके माथे पर्र कुछ थकान होती हैं, औऱ होंठ थोड़े सें खुले होते हें।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें, उसके बालों मे हाथ फेरते हुए):
"तुम् क्यूं इतने उलझे रहते होँ, सिकंदर?
कभी तोँ मुस्कुरा लियाकरो…
तुम्हें पता भि हैं… तुम् मुस्कुराओ तौ दिलचैन पाता हैं…"
वोँ स्वयं कों रोकती हैं, धीरे-धीरे सें हाथ पीछे खींचती हैं, औऱ उसकेपास पड़े कम्बल कों उठाकर प्रेम सें उसकेऊपर ओढ़ा देती हैं।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
"तुम्हारी हर चीज़…हर बात मुझे मनपसंद आनेलगी हैं.
काश… मे पढ़ पाती तुम्हारे दिल कों…
मगर शायद तुम् पढ़वाना हि नहि चाहते…"
वोँ धीरे धीरे कमरे मे टहलती हैं — उसकी किताबें, पुराने स्केच, टूटी घड़ी, चिट्ठियाँ… हर चीज़ सें जैसे वोँ उसे समझने कि कोशिश कररही थि।
तभी एक् पुरानी डायरी उस छोटे ट्रंक सें बाहर् झांकरही होती हैं।
ज़ोया पास जाती हैं… धीरे-धीरे सें डायरी उठाती हैं।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
"क्याँ तुमने कभी किसी केँ लिए लिखा हैं,
कहीं… इसमें इसकीउस मासूका कि यादें तौ नहि हैं?"
वोँ डायरी अपने दुपट्टे मे लपेटकर अपनेपास रख लेती हैं।
फिन अंतिम बार सिकंदर कों देखती हैं —
बहुतदेर तक बस देखती रहती हैं।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
"मालूम हैं… यह मुहब्बत एक् तरफ़ा हैं…
मगर मे स्वयं सें वादा करती हूं…
एक् दिन तुम् मुझे देखोगे — ऐसे, जैसे मे तुम्हें हर रोज़ देखती हूं। "
वोँ चुपचाप कमरे सें निकल जाती हैं…
पीछे सिकंदर नींद मे करवट लेता हैं — जैसे किसी कि मौजूदगी उसेचैन देरही होँ…
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Mukkader kaa sikander – New Episode
भइया कहानी कां रिव्युव दो। जल्द जल्द मे एपसोड तब दूंगा जब आप् कों किस्सा मनपसंद आएगीहुए.
सो पलज़्ज़ज़ दो लाइनकम सें कम जरूर लिखना.इस सें मुझे मोटिवेशन मिलती हैं कहानी कों लिखने कि
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रात केँ तक़रीबन दसबज चुके हें… मोहल्ले केँ बीचों-बीच धरना जारी हैं… लोगजोश मे नारेलगा रहे हें…
“हम् अपनाहक़ लेकर रहेंगे!”
“बिल्डर-माफिया मुर्दाबाद!”
लोगों कि भीड़ कों जोयालीड कररही हैं — पर्र इस उबाल औऱ जोश सें दूर…
पर्र सिकंदर केँ कमरे मे.अंधेरे कि चुप्पी मे, सिकंदर अकेला लेटा थां।
कमरे मे उजाला केवल एक् पुरानां सां रेडियो कररहा हैं… औऱ उस रेडियो पऱ एक् दुःखी, रूह तक चीर देने वाला गानाचल रहा हैं…
“याद.याद। याद.
बस यादरह जाती हें…” (गाने कि आवाज़ धीमे धीमे कमरे मे भरती जाती हैं…)
सिकंदर कि आँखें छत पर्र जमी हें… मगर उनमें कोईरंग, कोई रौशनी नहि बची…
आज उसका बर्थडे हैं।
पर्र कोई मोमबत्ती नहि, कोईकेक नहि, कोई 'हैप्पी बर्थडे बेटा' नहि.
आज वोँ दिन नहि जिसदिन वोँ पैदाहुआ थां…
आज वोँ दिन हैं जब वोँ पहलीबार उसने जानां थां बेहोसी क्याँ होती हैं। कैसा लगता हैं जबकोई भूख प्यास सें बेहोस होकरगिर परता हैं। कैसा लगता हैं जब किसी केँ टांगे कापने लगती हैं कमज़ोरी केँ मारे। कैसा लगता हैं जबकोई भूखेपेट। बोरियां उठाता हैं। कैसा लगता हैं। अपनी मम्मी सें दुथकारे जाने पऱ.
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फ़्लैश बैक
सुभह कां टाइम…
अलीना, गुस्से मे पागल होकर, सीढ़ियों सें नीचे उतरती हैं।
अलीना (कड़क आवाज़ मे):
"आज तुम को सज़ा मिलेगी, हरामजादे अब तुँ मेरे अलमारी सें पैसे चुराने लगा.दिन वदिन तेरे करतूत बढ़तेजा रहे हैं। कल हि साहबज़ नें मुझे बोला थां। तूँ विद्यालय मे लड़ाईयां करनेलगा हैं औऱ अब चोरी। वोँ तौ सुकर हैं सहबाज नें तुम्हें पैसे चुराते देख लिया नहि तोँ मे बेचारे उन नौकरो पर्र इलज़ाम लगाती.
सिकंदर अपने हारा हुवा चेहरा लिए अपनी मम्मी केँ आंखों मे देखरहा थां। वोँ सायदउन आंखों मे कुछ ढूंढ़रहा थां। पऱ वोँ उसेमिल नहि रहा थां। उसने अलीना सें कुछ नहि कहा.कुछ कहने कां कोई फ़ायदा नहि थां। अब अलीना नें उसकेदिल कां हाल जानां छोड़ दिया थां। अब अलीना नें उसे पराया कर दिया थां
आज न् तेरी खानां मिलेगा, नं पानी… औऱ पूरेदिन नौकरों केँ संग बर्तन मांजेगा औऱ जोँ काम नौकर करते हैं वोँ तुम को करना होगा.यही तेरीसजा हैं। अलीना अपनेतरफ सें सिकंदर कों सुधार रही थि। पर्र उस बेवकूफ महिला क्याँ पता थां कि सहबाज केसेउस सें खेलरहा हैं। उसके सिकंदर कों उस सें दूर करताजा रहा हैं.
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सिकंदर कि आंखें लाल हें, शरीर पर्र धूल हैं, हाथों मे छाले हें। औऱ दिल मे एक् जलाहुआ कोना।
सुभह सें साम होँ चुकी हैं… मगर उसकेपेट मे एक् दाना तक नहि गय़ा।
प्यास सें होठसूख चुके हें, सांसों मे थकावट कि भारी चुप्पी हैं।
हवेली केँ बड़े सें रसोई मे आज भि उसकी स्थान नहि थि…
उसकी थालीआज भि खाली थि…
नौकरलोग, जिन्हें वोँ पहलेनाम सें बुलाता थां… आजउसी कों हुक्म सुनारहे थें।
सिकंदर, बिनाकोई जवाबदिए, बससर झुकाकर काम करतारहा…
जैसेउसे किसी प्रश्न कां हक़ हि नहि…
उसकागला सूखरहा थां… मगरकोई एक् ग्लास पानी तक नहि पूछता…
वोँ बर्तन मांजते-मांजते, किसी कोने मे जाकरकभी थोड़ी देर आँखें मूँद लेता…फिन उठकर दोबारा लग जाता…
उसकीकमर झुकती जारही थि, कंधे जवाबदे रहे थें, पर्र किसी नें पूछा तक नहि –
"तूँ ठीक हैं?"
कभी वोँ हि सिकंदर थां जोँ हवेली केँ हरकाम मे सबसेआगे होता थां…
पर्र आज किसी केँ लिए वोँ बस एक् सज़ायाफ्ता नौकर थां।
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एक् शानदार, बड़ी-बड़ी शीशे कि खिड़कियों वाला दफ़्तर…
जहाँ अलीना एक् कॉन्फ्रेंस फोन मे बिज़ी हैं।
अलीना (प्रोफेशनल अंदाज़ मे):
"Yes, Mr। Qureshi। Finalize the deal। I don’t want any more delays."
मीटिंग समाप्त होती हैं… वोँ लैपटॉप बंद करती हैं…
एक् गहरी सांस लेती हैं औऱ अपनी कुर्सी सें उठकर स्ट्रेच करती हैं।
उसका ध्यान पास टंगे कैलेंडर पर्र चला जाता हैं…
औऱ जैसे हि उसकी निगाह उस तारीख पर्र जाती हैं —
"10 अप्रैल" —
अलीना (धीरे-धीरे सें फुसफुसाती हैं):
"10 अप्रैल.? आज.आज सिकंदर कां बर्थडे हैं…"
वोँ घरी मे वक्त देकती हैं तोँ 5 बजरहे थें। वोँ जल्द सें अपना पर्स उठाती हैं औऱ दफ़्तर सें बाहर् निकलती हैं रास्ते सें वोँ एक् केक औऱ कुछ बल्लोंन औऱ एक् प्यारा सां खेलना। लेती हैं। सायदयह सिकंदर कां उपहार थां। अलीना अब तक नहि समझीथी कि उसके लाडले कों खेलोना नहि उकसा प्रेम चाहिए.
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सिकंदर कि हालतअब काबू सें बाहर् जा चुकी थि।
पेट खाली… होंठ सूखे… शरीर काँपता हुआ… आँखों मे गहराती अंधेरी थकावट.,। उसके पांव काँपरहे थें। क्यूं कि घुटनो मे जान नहि बची थि.
हर सांस जैसे एक् बोझबन चुकी थि…
हरकदम जैसे पत्थर कां होँ गय़ा थां…
वोँ किसीतरह दीवार पकड़कर अपने कमरे केँ दरवाज़े तक पहुँचता हैं…
द्वार (दरवाज़ा) भि ठीक सें नहि खोल पाता… औऱ बेसुध होकर अंदरगिर जाता हैं।
ठक्.!
एक् भारी आवाज़ होती हैं —
उसका शरीर फर्श सें टकराता हैं। पर्र मासूम केँ पासकोई नहि थां। जोँ उसे सहारा देसके। सायदआज उस खु*दा केँ आँखों मे भि आंसूआये होंगे। सायदइस लिए वोँ सिकंदर कों अपनेपास बुला लेना चाहता थां.
सिकंदर अब बेहोश थां … एकदमचुप… बर्फ कि तरह ठंडा…
उसका चेहरा सफेदपड़ चुका थां, होंठ नीले, हाथ-पांव थमेहुए सें…
कपड़ों मे मिट्टी लगी थि, चेहरे पर्र थकान कि दरारें थें.औऱ दिल मे अधूरी उम्मीद कि खामोशी।
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दूसरी तरफ – हवेली कां बड़ा द्वार (दरवाज़ा) खुलता हैं…
अलीना, एक् सजाया हुआकेक हाथ मे लिए, अपने पूरे परिवार केँ संग अंदर दाखिल होती हैं…
संग मे उसका भइया, भाभी, अम्मी औऱ अब्बू भि हें।
सबके चेहरों पर्र मुस्कान हैं… शायदआज वोँ ‘एक् सरप्राइज़’ देनेआए हें…
अलीना (हल्की मुस्कराहट केँ संग):
"आज उसे हँसते हुए देखूंगी। अलीना बहोत ख़ुश थि.
जैसे हि सभी सिकंदर केँ कमरे केँ पास पहुंचते हें…
द्वार (दरवाज़ा) अधखुला पड़ा हैं… औऱ अंदर घुप्प अंधेरा।
अलीना धीरे-धीरे सें अंदर झांकती हैं…
औऱ अगले हि लम्हा — उसकीचीख हवेली मे गूंज उठती हैं…
अलीना (दहशत मे):
"सिकंदर…!!!"
उसकेहाथ सें केकगिर जाता हैं…
फर्श पऱ "Happy Birthday लिखे शब्द भि टूट जाते हें… जैसे उनकीतरह रिश्तों कां वहम भि टूट जाता हैं…
अलीना दौड़कर उसकेपास आती हैं… उसका चेहरा अपनीगोद मे रख लेती हैं…
अलीना (थरथराती हुईँ):
"उठ नाँ … उठ … देख … अम्मी आई हैं… देख … अम्मी केँ संगसभी आए हें…" क्याँ हुवा तेरी बाबू.
अम्मी, अब्बू, सभी चौंककर पास आँ जाते हें…
भइया (हक्का-बक्का):
"दोस्त… यह तोँ… इसका शरीर तोँ बर्फ कि तरह ठंडा हैं…!"
भाभी (रोतेहुए):
"हायरे अल्ला**ह… यह क्याँ हौ गय़ा…?"(यह अभि अभि अपने मायके सें आयी थि)
अलीना अब उसके गालों पऱ थपकियाँ देती हैं… पऱ कोई हरकत नहि…हर लम्हा केँ संग अलीना कि रूह उसके शरीर कों छोड़रही थि। वोँ आज पहलीबार अपने जिगर केँ टुकड़े कों बेहोस देखरही थि.
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अलीना ज़मीन पऱ बैठी सिकंदर कां सिर अपनीगोद मे रखे पागलों कि तरह रुदन करने लगती हैं।
उसकेहाथ कांपरहे थें… चेहरा सूजाहुआ… औऱ दिलऐसे धड़करहा थां जैसे किसी नें उस पऱ हथौड़े मारदिए हों।
तभी पीछे सें हसन मिर्ज़ा औऱ साहबाज कमरे मे घबराकर दाखिल होते हें।
हसन मिर्ज़ा (दहशत मे):
"यह…यह क्याँ हुआउसे…?!"
अलीना (टूटती आवाज़ मे):
"पता नहि … क्याँ हुवा हैं मेरे बच्चे कों केसे बेहोस होँ गय़ा.… कुछबोल हि नहि रहा…"
हसन मिर्ज़ा मोबाइल उठाते हें औऱ डॉक्टर कों फोन करते हें —
"डॉक्टर साहब… जल्द आइए…मेरा बेटा बेहोष हौ गय़ा हैं… हालत बहोत ख़राब हैं…"
तभीकुछ नौकर-चाकर कमरे मे आँ जाते हें। हसन मिर्ज़ा उन्हें घूरते हें —
"किसी कों कुछपता हैं यह क्याँ हुआइसे?!"
एक् बूढ़ा नौकर धीरे-धीरे सें बोल पड़ता हैं —
"बीबीजी… सुभह आपने हि तौ कहा थां कि छोटे उस्ताद कों आज नां खानां देना हैं… नां पानी… औऱ पूरेघऱ कां काम करवाना हैं… शायदउसी सें… अचेत होँ गए होंगे …"
बस…!! जैसे किसी नें अलीना केँ सीने मे आगलगा दि होँ…वोँ सह नहि पायी कि उसके बेटे कि यह हालत उसकीवजह सें हुवी हैं.वोँ अपनासुध वुद्ध खो बैठती हैं। औऱ जोर सें चिल्लाती हैं.याँ अल्ला56हहहहहहहहहहह
उसकेदिल मानोफट गय़ा होँ।
वोँ आहिस्ता उस नौकर कि ओर मुड़ती हैं…
उसकी आँखों मे अब आँसू नहि —
अब उसमें मां कि टूटी हुई आत्मा थि…
औऱ फिन…
अलीना चीख पड़ती हैं —
क्याँ कहा तूने। सुभह सें इसनेकुछ नहि खाया। तुम् लोगों नें मेरे बच्चे कों सुभह सें भूखारखा। पुरेदिन मेराबचा भूखे प्यासे काम करतारहा। अल्ला22ह.सुभह सें इसकेपेट मे एक् दाना तक नहि गय़ा.
अलीना (गुस्से सें कांपती हुई):
हरामजादे। मेरे बेटे कों भूखारखा तूने।
अलीना नौकर पर्र झपट पड़ती हैं…
उसे गंदी-गंदी गालियाँ देने लगती हैं…
"कमीने। साले हरामखोर.हराम केँ जाने। निकलयहा सें.
तुम कोअगर मेरी एक् भि बातसमझ नहि आई थि तोँ पूछ लेता…
पऱ तुम को क्याँ… मेरा बच्चा तेराकौन सां अपना थां …क्याँ जाता तेराअगर उसे एक् रोटीदे देता…!!!"
सिक्न्दर कों अपने सीने सें लगाकर। उठजा सिकंदर मेरेलाल। अम्मी तुम कोऐसे नहि देख सकती.देख अगर तूँ नहि उठा तोँ तेरी अम्मी कि जान निकल जयेगी। नहि देख सकती तेरीऐसे। ए मेरे खुदा। मेरेलाल कों लोटादे मुझे.
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हवेली – रात
डॉक्टर आँ चुके हें।
सिकंदर कों ड्रिप पऱ लगाया गय़ा हैं।
डॉक्टर नें चेकअप केँ बादहसन मिर्ज़ा कों देखा औऱ कहा:
डॉक्टर (नरम लहज़े मे):
“यह तौ साफ़ हैं कि बच्चा बहोत अधिक कमज़ोर हौ चुका हैं…
जिस्म मे पानी कि भारीकमी हैं…
लंबे टाइम तक कुछ नाँ खानां, थकावट औऱ भावनात्मक दबाव…यही वजह हैं बेहोशी कि। ”
डॉक्टर रुकते हें, फिन अलीना कि ओर देखते हें…
“पऱ सच बताऊँ… यह सिर्फ़ जिस्मानी कमजोरी नहि हैं…
इसे सदमालगा हैं। आप् लोग इसकेआस पास अधिक सें अधिक टाइम बिताएं
डॉक्टर चला जाता हैं। कमरे मे फिन सें सन्नाटा छा जाता हैं।
अलीना सिकंदर केँ सिरहाने बैठी हैं।
उसके सामने उसकावही बेटा, जोँ कभी उसका आँचल पकड़कर चलता थां, अबखाट पऱ बेहोश पड़ा हैं…
याँ शायदहोश मे होतेहुए भि इस दुनिया सें बेग़ाना।
अलीना (धीरे-धीरे सें उसकेहाथ कों थामती हैं):
“सिकंदर… बेटा… उठजा…देख मे तेरेपास हूं…
मैंने बहोत गलती कि हैं… पऱ अब मे तुम को छोड़कर कहीं नहि जाऊंगी…”
पऱ सिकंदर कि पलकें हल्की सि हिलती हें, वोँ आँख खोलता हैं…
पर्र उसमें कोई जज़्बात नहि होते।
वोँ उठकर बैठता हैं… बिनाकुछ कहे…
अलीना:
“कुछ तोँ बोल… क्रोध कर… डाँट लेँ मुझे…
पर्र ऐसेचुप मतरह बेटा… तुझसे यह खामोशी नहि देखी जाती…”
वक्त बीतने लगा सिकंदर अब किसी सें बात नहि करता थां। अलीना उसकी आवाज़ सुनने केँ लिएतरश गई थि। अबउसे सिकंदर कि ख़ामोशी खानेलगी थि। वोँ औफिस सें आती औऱ सिकंदर केँ आगे पीछे गहने लगती। पऱ वोँ बच्चा अब बिखर चूका थां। सायद उसनेऐसा कुछदेख लिया थां जौ उसे नहि देखनी चाहिए थि.
वही दुसरी तरफ। साहबाज अब अपनी हदेंपार करनेलगा थां। वोँ अब अलीना सें अकेले मे याँ सिकंदर केँ सामने गन्दी बातें करनेलगा थां। अलीना केँ मन मे हसन मिर्ज़ा नें भर दिया थां कि सहबाज सें प्यारा औऱ समझदार बचाइस दुनयाँ मे नहि हैं। वोँ सहबाज केँ सवालों कों उसकी मासूमयत समझती थि। उसे लगता थां कि सहबाज कों बचपन सें हि मां कां प्रेम नहि मिलाइस लिए वोँ मुझमे अपनी मम्मी कों ढूंढ़रहा हैं.
सहबाज उसेगलत तरीके सें छूता। पर्र वोँ उसको उसका प्रेम समझती। याँ फिनउसे भि मज़ा आँ रहा थां। यह तोँ रब जनता हैं.पऱ यहबात पक्की थि अलीना उसेमना नहि करती थि.
एक् दिन दफ़्तर जाने सें पहले अलीना सिकंदर कों उसके कमरे मे मिलने आई। उसके पीछे सहबाज भि थां.अलीना नें सिकंदर कों गले लगाया पर्र सिकंदर कां वही ठंढा वार्ताब। फिन सहबाज आकर अलीना केँ गलेलग जाता हैं। वोँ अलीना केँ स्थन कों हाथ लगता हैं अलीना उसे हटाने याँ डाठने केँ वजाहय उसकेतरह मुस्कुराते हुवेदेख रही थि वीयह भि भूल गई थि कि सिकंदर भि उनकेसंग खरा हैं.
सहबाज - अम्मी आपने वादा किया हैं। कि आप् दफ़्तर सें आकर मुझे दुधु पिलाओगी। मेनेकभी दुधु नहि पिया हैं.
अलीना ( उसके बालों मे हाथ फेरते हुवे ) - पक्का वादा। मेरा बच्चे कों अम्मी कि दुधु पिने कां मनकररहा हैं। आज पक्का। उनके बातों सें जाहिर थां। यह पहलीबार नहि हुवा हैं। हाँ पहलीबार सिकंदर केँ सामने जरूर हुवा थां.
तभी अलीना कों आहसास होता हैं सिकंदर भि वही हैं। वोँ सहबाज कों अपनेदे दूर करते हैं औऱ आँखों सें ईसारा करती हैं। सहबाज उसके इसारे कों समझ जाता हैं। औऱ मुस्कुराते हुवे कमरे सें चले जाता हैं। सिकंदर यहदेख करदंग रह जाता हैं। अलीना उसके चेहरे कों पेड़ चुकी थें। वोँ समझ गई कि सिकंदर कों यह अच्छा नहि लगा पऱ यह बेवकूफ़ स्त्री कों लगरहा थां कि सिकंदर कों सहबाज देजलन होँ रही हैं इसलिए उसका चेहरा उतर गय़ा हैं। खैर अत्तित कां पन्नों पर्र पूर्ण विराम लगता हैं औऱ सिकंदर स्वयं कों अपने कमरे मे पाता हैं। उसके आँखों सें आंसू कि बुँदे टपकरही थि.
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| साम कां वक़्त हौ गय़ा थां| मोहल्ले केँ बीचों-बीच धरना | माहौल भावुक औऱ खामोश बगावत सें भराहुआ]
कमरे कि बत्तियां बुझी हुइ थीं। बस एक् कोने मे रखा पुरानां रेडियो चलरहा थां, जिसकी धीमी आवाज़ मे वही गाना गूंजरहा थां:
"याद.याद। यादबस यादें रह जाती हें."
सिकंदर अबखाट पर्र नहि थां।
सिकंदर काले कुर्ते-पायजामे मे रेडी हौ चुका थां। उसका चेहरा शांत थां… मगर आंखों मे एक् ठहराहुआ दर्द, एक् ठहरी हुइ आग साफ़झलक रही थि।
वोँ अपना इत्र लगाता हैं,, फिन खामोशी सें कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खोलकर बाहर् निकलता हैं।
बाहर् कां दृश्य:
धरने कि भीड़ मे हलचल थि। लोग “इंसाफ़ दो, इंसाफ़ दो!” केँ नारेलगा रहे थें। ज़ोया मंच केँ पास खड़ी थि। रुक्सार औऱ अली भि वहीं थें। तभी सबकीनजर सामने सें आते सिकंदर पऱ पड़ी।
उसका चेहरा थकाहुआ थां, मगरचाल मे एक् अलग हि ठहराव थां।
रुक्सार उसेपास बुलाकर बोलि बोलि:
रुक्सार: “सिकंदर बेटा… कहां जारहे हौ इस वक्त?”
सिकंदर (धीमी आवाज़ मे, बहोत शांत लहजे मे):
"दुआ करने…जमा मस्जिद जारहा हूं। "
ज़ोया उसे पलभर तक देखती रही।। वोँ बिनाकुछ कहे उसकेपास आई।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
“मुझे भि लें चलो… मे भि दुआ मांगना चाहती हूं। अपने औऱ इन लोगों कि सलामती केँ लिए.
सिकंदर उसकीतरफ एक् समय देखता रहा…फिन बिनाकुछ कहे मोटरसाइकिल कि चाबी निकलता हैं।
ज़ोया जल्द सें अपना दुपट्टा ठीक करती हैं। अलीकुछ कहने हि वाला होता हैं मगर रुक्सार उसे आंखों सें रोक देती हैं।
ज़ोया औऱ सिकंदर, दोनों बिनाकुछ बोले, बाइक पर्र सवार होँ जाते हें। सिकंदर बाइक स्टार्ट करता हैं। ज़ोया उसकीपीठ सें हल्के सें टिक जाती हैं।
बाइक धीरे धीरेचल पड़ती हैं… मोहल्ले केँ रास्तों सें गुजरते हुए… धरने केँ नारों केँ बीच…उस पुरानी, जानी-पहचानी मगरअब अजनबी हौ चुकी अहसास केँ संग
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हवेली कां ड्राइंग रूम | रात कां टाइम | सभीलोग संग बैठे हें
हवेली मे गर्मा-गरम गरमचाय केँ संगसभी बैठकर बातें कररहे थें। हँसी-मज़ाक चलरहा थां। भाभियाँ हल्की-फुल्की चुहलकर रहीथीं। सहबाज सोफे पऱ पसरा थां, औऱ अम्मी साइड मे बैठी हुइ थीं।
अचानक, माहौल मे हल्की-सि चुप्पी आँ गई जब अलिना कि भाभी सें अम्मी नें यूँ हि पूछ लिया:
अम्मी:
"बहु, दोपहर मे तुम् कहां गई थीं?नजर हि नहि आईं पूरेदिन."
भाभी नें धीरे-धीरे सें मुस्कुराते हुए जवाब दिया:
भाभी:
"अम्मी… मस्जिद गई थि… दुआ करने। आज सिकंदर कां जनमदिन थां नाँ। अब किसी कों यादरहे याँ न् रहे, मे तोँ उसे बहोत चाहती थि, बहोत… उसकीहर बात, हर आदत…सभी याद हैं मुझे। मे उसके जनमदिन कों केसेभूल सकती हूं?"
यह शब्द, एक् तीर कि तरह जाकर अलिना केँ सीने मे धँसगए। जैसे किसी नें उसकी मां होने कि हैसियत पर्र तमाचा मार दिया होँ।
– वोँ चुप हैं… उसकी नज़रें झुकी हुई हें।
उसकाहाथ काँपरहा थां। दिल कि धड़कनें तेज़ होँ गई थीं। उसके कानों मे केवल भाभी केँ वोँ शब्द गूंजरहे थें –
"मे उसके जनमदिन कों केसेभूल सकती हूं…"
अचानक, अलिना उठती हैं। हड़बड़ाहट मे गरमचाय कां कपगिर जाता हैं, कोईकुछ पूछता उससे पहले हि वोँ अपनेबैग कि तरफ लपकती हैं, चाबी उठाती हैं औऱ दरवाज़े कि तरफ बढ़ती हैं।
सभी चौंकते हें। सहबाज पूछता हैं:
"अरे अम्मी कहां जारही हें इससमय?"
अलिना -
"मुझेकुछ याद आँ गय़ा हैं… बहोत जरूरी हैं जानां। "
गाड़ी केँ अंदर | अलिना ड्राइव करतेहुए | आँखों मे आंसू
मार्ग पऱ उसकी वाहन तेज़चल रही थि… मगर उसकामन उससे भि तेज़भाग रहा थां… पीछे कि तरफ, अतीत कि ओर।
अलिना (अपने आप् सें):
"केसेभूल गई मे… केसे…आज उसका जनमदिन थां…
"मुझे तुझसे कुछ नहि चाहिए मेरे खुदा…बस एक् बार… एक् बार मेरी औलाद मुझे देखे… शायद मुझे क्षमा करदे… याँ कम सें कम मेरी आँखों मे देखकर नफ़रत हि कर लेँ… पऱ कुछ तौ कहे…कुछ तोँ सुने…"अगर वोँ मुझे मारे पीटे। जौ चाहे वोँ करेंबस एक् आकर मुझेदेख लें.
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[सीन शुरुआत – ज़ामा मस्जिद केँ बाहर् कि गलियाँ | रात कां वक़्त]
अलिना अपनी वाहन सें उतरती हैं। आसमान मे हल्की सि ठंडक हैं, गीली मिट्टी कि खुशबू फैली हुई हैं। मस्जिद केँ आसपास कि तंग गलियाँ पीली लाइटों सें जगमगा रही हें। लोग इधर-उधर जारहे हें, बच्चे खेलरहे हें, कुछ दुकानदार अपनी दुकानें समेटरहे हें।
(कैमरा अलिना केँ चेहरे पऱ – उदासी औऱ बेचैनी साफझलक रही हैं। )
वोँ आरामसे मस्जिद कि तरफ बढ़ती हैं, हील कि हल्की-हल्की आवाज़ पत्थर कि गलियों मे गूंजरही हैं।
तभी। सामने सें एक् काले लिवास मे एक् लंबा, बेहद हसीन जवानआता हैं… उसके घुंघराले बालहवा मे उड़रहे होते हें… नीली आंखें, चेहरे पर्र ग़ैरमामूली चैन…रौब ऐसा कि भीड़ अपने आप् मार्ग देरही होँ।
अलिना कां दिल एक् लम्हा केँ लिएरुक जाता हैं… सांसें थम जाती हें…
(धीरे-धीरे सें फुसफुसाती हैं):
"सिकंदर…?"
वोँ वहींथम जाती हैं। नज़रों कों यकीन नहि होता…उस लड़के केँ चेहरे मे कुछ थां… कुछ जानां-पहचाना… जोँ सीधा उसकेदिल सें जुड़ता थां।
वोँ बिना अलिना कि तरफ देखेआगे बढ़ता हैं, औऱ भीड़ मे खो जाता हैं
अलिना एक् झटके सें पीछे मुड़ती हैं… उसकी नज़रों नें उसे ढूंढना चाहा…मगर…
(हल्की सि सिसकी लेती हैं):
"कहां चला गय़ा…? क्याँ मेरावहम थां…?"
वोँ स्वयं कों समझाती हैं, पर्र आंखें उस भीड़ मे भटकरही होती हें… शायददिल अब भि उम्मीद मे थां कि एक् बारफिन वोँ चेहरा दिखजाए।
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अलीना दुवा करके महज़ीद सें बाहर् आती हैं तभी उसके मोबाइल पऱ कलआता हैं.मुस्ता क़ कालिंग.
अलीना फ़ोन उठाते हुवे.-हाँ मुस्ता क़ साहब बोलिए.
CEO - मैडमगजब होँ गय़ा। सहबाज बाबू कों किसी नें बहोत मारा हैं। वही राहिल केँ लोग थें.सर पर्र रोड लेकर मारा हैं हालत बहोत नाजुक हैं.
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Mukkader kaa sikander - Next part miss mat karna
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