Mukkader kaa sikander – New Episode
रात केँ 1 बजरहे थें।
दिल्ली-हरियाणा बॉर्डर, जंगलों औऱ फैक्ट्रियों केँ बीच एक् वीरान मार्ग। चारों तरफ सन्नाटा, मात्र दूर कहीं कुत्तों केँ भौंकने कि आवाज़।
एक् भारी ट्रक, पुराने जर्मन इंजन कि खरखराहट केँ संग धुआँ उड़ाता हुआ बॉर्डर कि तरफबढ़ रहा थां।
ट्रक केँ पीछे लकड़ी केँ ढांचे मे छुपे थें 500 किलो सोने कि ईंटें।
औऱ संग थां हसन मिर्ज़ा कां खौफनाक लश्कर — 20 हथियारबंद आदमियों कां घातक काफ़िला।
ड्राइवर - यूसुफ़, एक् पुरानां खिलाड़ी, हसन मिर्ज़ा कां भरोसेमंद व्यक्ति।
संग वालीसीट पऱ बैठा थां खालसी - तबरेज़, जौ बार-बार राइफल कि नली कों गीले कपड़े सें साफकर रहा थां।
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खालसी: (सिगरेट मुंह मे दबाकर)
"भइया… बॉर्डर पास हैं… कोई हरकत दिखे तोँ सीधे खोपड़ी उड़ादूँ?"
ड्राइवर:
"जब तक मोबाइल न् आए, गोली नहि चलानी… यह दिल्ली हैं तबरेज़। "
तभी। ट्रक अचानक रुक जाता हैं।
सामने एक् बांस कि बैरिकेडिंग लगाई गई थि, जिसेदो लाल झंडों सें घेरा गय़ा थां।
औऱ पास हि एक् जलताहुआ टायर, धुएँ मे लिपटा हुआ…
ड्राइवर घबराता हैं…
"यह तौ प्लान मे नहि थां…"
तबरेज़:
(चौंककर ट्रक सें उतरने कि तैयारी मे)
"रुक दोस्त! मे देखता हूं…"
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तभी ट्रक केँ दोनों तरफ़ झाड़ियों मे सरसराहट होती हैं।
चारों तरफ अंधेरे मे हलचल… हथियारबंद लोग एक्-एक् कर ट्रक केँ आसपास उतरते हें, पोजिशन लेते हें।
तबरेज़ चिल्लाता हैं—
"कौन हैं बे… सामने आँ!"
कोई जवाब नहि… मात्र हवा कि सीटी।
ड्राइवर:
"नज़र नहि आँ रहाकोई… बसरोड घेरा हैं, औऱ कोई निकलता भि नहि… लगता हैं कोई गैंग…"
तबरेज़: (गुस्से सें)
"साले सामने क्यूं नहि आते…छुप कर खेलते होँ बे.
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ड्राइवर अब ट्रक केँ क्लच पऱ पेररखे सजधजकर हैं… मगरतभी…
पास केँ पेड़ पऱ एक् जलतीलाल लाइट चमकती हैं…
ट्रक केँ आगे पड़ा बैरिकेड स्वयं-ब-स्वयं हटने लगता हैं — बिना किसी इंसान केँ…
खालसी:
(डर केँ संग फुसफुसाते हुए)
"भूत हैं क्याँ बे…?"
ड्राइवर:
"नहि बे…। जौ भि हौ कट्टा रेडीरख। सामने आये तौ भरदो सालो कों.
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मार्ग कि रातअब औऱ डरावनी होँ गई थि।
ट्रक आरामसे बैरिकेड पारकर रहा थां।
ड्राइवर केँ चेहरे पऱ पसीने कि लकीरें थीं, औऱ तबरेज़ कि उंगलियां ट्रिगर पऱ सख्त हौ चुकीथीं।
तभी.
“टटटटटटटटटटटटटटटट!!!”
चारों तरफ सें गोलियों कि बौछार शुरुआत होँ जाती हैं।
ट्रक कि बॉडी पर्र छर्रे ऐसे लगते हें जैसे किसी पर्र अंगारे बरसाए जारहे हों।
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ड्राइवर चीखता हैं —
"अबे क्याँ होँ रहा हैं यह!!!"
तबरेज़:
" घेर लेल्हन भइया रे."(भोजपुरी)
तभी तीनों तरफ़ कि झाड़ियों सें
तीन परछाइयाँ उड़ती हुइ बाहर् आती हें
साद, राहिल औऱ बीच मे — **
सिकंदर.
काले हुडी मे,, हाथ मे एक् रुस्सियन तमंचा।
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साद छलांग मारकर ट्रक केँ दरवाज़े पऱ पहुंचता हैं, ड्राइवर कों नीचे खींचता हैं —
साद:
"निचे आँ रे मादरचोद."
ड्राइवर डर केँ मारे हड़बड़ाकर नीचे गिरता हैं।
साद स्टेयरिंग संभालता हैं, ट्रक कों एक् झटके मे बंदकर देता हैं।
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राहिल, —घायल गुंडों केँ जेबों सें उनका मोबाइल निकाल कर तोड़ता जारहा थां.
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सिकंदर कि तरफ़…
सामने छह गुंडे, हाथों मे देसी कट्टा, पर्र सिकंदर कि आँखों मे डर नहि —।
सिकंदर:
"क्यूं मरना चाहते हौ बे.भाग जाओ। जिन्दा रहोगे.
वोँ दौड़ता हैं, एक् कों सीधेरॉड सें जबड़े पर्र मारता हैं — टूटी हड्डी कि ‘चड़ाक’ गूंजती हैं।
दूसरे कों गर्दन सें पकड़कर धकेलता हैं — उसकी रीढ़ कि हड्डी चटक जाती हैं।
तीसरे कि आंखों मे उंगलियाँ घुसा देता हैं — चीख गूंजती हैं।
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मगर लड़ाई आसान नहि…थि.
एक् गुंडा पीछे सें सिकंदर केँ सिर पर्र डंडा मारता हैं —
"ठक!!!"
सिकंदर लड़खड़ा जाता हैं।
उसके माथे सें खून बहता हैं, आँखें धुंधली… पांव मे भि एक् चाकूघुस जाता हैं।
साद चिल्लाता हैं:
"भइया!!"
पऱ सिकंदर उठता हैं… खून सें सना चेहरा… आँखे सुर्ख़…
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फिन वोँ आख़िरी बार गुस्से सें दहाड़ता हैं, एक्-एक् करकेबच गए गुंडों कों गिरा देता हैं।
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मार्ग पऱ अब सिर्फ़ गोली कि खुशबू, खून कि बूंदें, औऱ तीन शेरों कि साँसे गूंजरही हें।
ट्रकअब ‘कब्ज़े’ मे हैं… पऱ सिकंदर कां सरफटा हैं, खूनटपक रहा हैं पर्र चेहरे पर्र जीत कि मुस्कान थि.।
राहिल सिकंदर सें - भइया तुँ घऱजा। तूँ घायल हैं। हम् गाड़ी कों ठिकाने लगा देंगे.
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हसन मिर्ज़ा कों जब बताया जाता हैं तौ वोँ किसी घायल सांप केँ तरह चटपटाने लगता हौ। मानो जैसे उसकेफन कों किसी नें कुचल दिया हैं। एक् हि रात मे उसेदो इतनेबड़े घाव मिले थें। जौ अगरभर भि जाये तोँ भि उसके निसान हसन कां पीछा नहि छोडेंगे। वोँ तिलमिलाया हुवा अलीना सें बोलता हैं.
अलीना मुझे जानां होगा। तुम् सहबाज कां ख्याल रखना औऱ अबयह तुम्हारी ज़िमेदारी हैं उस लोंडे कों उसके किये कां सुध समेत वापस लोटाना.
अलीना बिना उससेकुछ पूछे अपना गर्दन हाँ मे हिला देती हैं। औऱ पूछती भि केसे। शोहर जोँ थां। शोहर जौ करेंसभी सही हैं.
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हॉस्पिटल कां ऑपरेशन रूम बाहर् कां हिस्सा – रात केँ दोबजे
अलिना कां चेहरा सख़्त थां, … औऱ होंठों पर्र नफ़रत वाले शब्द। उसके सामने दो गुंडे खड़े काँपते हुए अपना बयानदे रहे थें।
पहला गुंडा (डरतेहुए):
"बीबी साहिबा… हम् कुछ नां करपाए… साहब नें हुक्म दिया कि उस लौंडिया कों उठाओ औऱ गाड़ी मे लें आओ… पर्र जैसे हि हम् बढ़े, वोँ छोरा आँ गय़ा… जैसेकोई जिन…… साहब पे हमलाकर दिया…सर पे रॉड मारी… औऱ… औऱ हम् कुछ नाँ करपाए…”
दूसरा गुंडा (गला सूखाहुआ):
"हमनेमना किया थां बीबी साहिबा… कहा थां मतकरो… पर्र साहब बोले – ‘यह मेरी रखैल बनेगी… चाहेकुछ भि होँ जाए। ’… पर्र उस छोरे नें… उसने तोँ क़यामत ढा दि…”
(एक् सेकंड केँ लिए हॉस्पिटल मे सन्नाटा फैल जाता हैं)
अलिना कि साँसें तेज़ होँ रहीथीं… फिन उसने एक् गहरी, ठंडी सांसली… औऱ अपनी बड़ी-बड़ी झिलमिल आँखों मे अंगारें भरकर बोलि:
अलिना (आहिस्ता मगर कांपते हुए शब्दों मे):
"उस लोंडे नें मेरे बेटे कों मारा हैं?… उस बदजात नें मेरी ममता कों ज़लील किया हैं?। मेरी औलाद कों मिट्टी मे घसीटा हैं?। अबसुन लेँ यह दुनयाँ … सुन लें यह रहमतनगर… अलिना मीरज़ा कां अब एक् हि ऐलान हैं."
(उसने पीछे पलटकर देखा – उसका पूरा ख़ानदान, भइया, भाभी, नौकर, बॉडीगार्ड – सभी सन्न खड़े थें)
अलिन :
"अबउस लोंड़िया कों… मे उसकेउस दोस्त केँ सामने अपने बेटे कां तोहफा बनाकर पेश करूंगी… अब वोँ ज़ोया… मेरीबहू नहि… मेरी बेटे कि रखैल बनेगी… औऱ उस लफंगे कों… मे अपने हाथों सें… कुत्तों कि तरह मारूंगी!!"
वोँ बिनाकुछ कहे सहबाज़ केँ कमरे मे जाती हैं… उसेहोश नहि थां… मशीने बीपकर रहीथीं… उसकेसिर पऱ पट्टी बंधी थि।
अलिना झुकती हैं… उसके माथे पऱ एक् नज़र डालती हैं… औऱ मात्र एक् लफ्ज़ कहती हैं…
अलिना (धीमेमगर खून सें सना लहजा):
"अम्मी हूं मे तेरी…अब देख्ना… केसे चुकाती हूं अम्मी होने कां कर्ज़…!"
(फिन वोँ सीधे बाहर् निकलती हैं – हाथ हिलाती हैं – इशारा होता हैं)
15-20 काले शीशों वाली SUVs हॉस्पिटल केँ पोर्च सें निकलती हें – सब कारें रहमतनगर कि तरफ दौड़ पड़ती हें।
रहमतनगर – रात केँ 3 बजे
ठंडीहवा मे लिपटी चाँदनी – मोहल्ला नींद मे डूबा थां…याँ ऐसा जातारहा थां। आजसाम जोँ हुवा थां उसकेबाद किसी मे हिम्मत नहि बची थि धरना देने कि। सभीसमझ चूके थें। सहजादे ( सहबाज ) कों मारा हैं तोँ रानी तौ आयेगी हि। सभी सहमे हुवे थें.
एक् भारी सां ब्रेक… टायर्स कि चरमराहट… औऱ गाड़ियों कि कतार मोहल्ले केँ बीचोबीच रुक जाती हैं।
द्वार (दरवाज़ा) खुलता हैं… पहलीकार सें अलिना उतरती हैं – काले लिबास मे – ऊँचे एड़ी केँ जूते, हाथ मे महेंगे बैग कलाई मे सोने केँ कंगन औऱ आँखों मे गुरुर औऱ आत्मबिस्वास …
मार्ग केँ दोनों किनारों पर्र लोगजाग जाते हें… दरवाज़ों सें झांकते हें… सभी जानते थें… "रानी साहिबा स्वयं पधारी हें…"
पीछे कि गाड़ियों सें उतरते हें बॉडीगार्ड्स, नौकर, – सभी सहमेहुए हें…
माहौल मे सिहरन हैं… हवा सर्द हैं… औऱ अलिना कि आंखों मे एक् हि प्यास – इंतकाम!
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अभि लोग अपने घरों सें झाँक हि रहे थें कि एक् कर्कश, घबराई हुइ आवाज़ नें मोहल्ले कों झकझोर दिया—
मुस्ताक अहमद (चीखते हुए, ऊँगली हवा मे उठाकर):
"सुनो मोहल्लेवालों!! आजउस लोंडे कां जनाज़ा नकलने स्वयं मलिकाए नवाब – अलिना मीरज़ा –औऱ तुम्हारा हिसाब लेनेआई हैं!! बचासको तौ बचालो!!"
(एक् लम्हा कों मोहल्ले कि रूह काँप उठती हैं… दरवाजों केँ पीछे कि हालचल बढ़ जाती हैं … चेहरों पे डरउतर आता हैं…)
अलिना नें हाथ कां इशारा किया।
गुंडे ज़ोया केँ घऱ कि ओर बढ़े।
घनघनाते हुए लातों सें द्वार (दरवाज़ा) पीटना शुरुआत हुआ –
"द्वार (दरवाज़ा) खोलो!! मालिकाए नवाब कां हुक्म हैं!! उस लोंड़िया कों बाहर् भेज!!"
अंदर हड़कंप मच गय़ा थां। पर्र ज़ोया कि आँखें शांतथीं – न् वोँ डरी, न् हिली। पर्र रुक्सार घबरा गई थि – उसने बेटी कों छिपाने कि कोशिश कि, पऱ गुंडे दरवाजे कों तोड़ते हुए अंदरघुस आए। अली नें कोशिस कि पर्र उसे एक् तरफकर दिया गय़ा.
कुछ हि समय मे ज़ोया कों बालों सें पकड़कर घसीटते हुए बाहर् लाया गय़ा।
मोहल्लेवाले अपनी खिड़कियों सें देखरहे थें – कोई सहायता करने कि हिम्मत नं करसका।
ज़ोया कों अलिना केँ क़दमों मे पटका गय़ा।
रुक्सार ज़मीन सें चिपकती हुइ दौड़ी… औऱ अलिना केँ क़दमों मे गिर पड़ी।
रुक्सार (चीखती, काँपती आवाज़ मे):
"बख्शदो मेरी बेटी कों… वोँ मासूम हैं बीबी साहिबा … तुम् भि तोँ मां हौ… तुम्हे माँ कि ममता कां वास्ता हैं… मेरी बच्ची कों छोड़दो…!"
अलिना कि आँखों मे कोई नर्मी नहि थि।
उसका चेहरा सख़्त थां… औऱ लहजा ज़हर सें भराहुआ।
अलिना (धीमेमगर अंगारों कि तरह जलते शब्दों मे):
"मम्मी?। तूँ मुझे माँ कि दुहाई देती हैं कुत्त्या?। मेरी औलाद लहूलुहान पड़ी हैं अस्पताल मे… औऱ तूँ मुझसे रहम माँगती हैं?। जब मेरे बच्चे कों बेहरहमी सें मारा गय़ा तब तेरी ममता कहां थि?."
"अब मेरी ममता सिर्फ़ इंतकाम माँगती हैं… औऱ वोँ मे तुम्हारी तरफदे केँ रहूंगी!"
(अलिना ज़ोया कि तरफ़ बढ़ती हैं… उसे बालों सें पकड़कर उठाती हैं…)
ज़ोया कि आँखों मे आँसू नहि थें… नं डर…बस एक् ख़ामोशी थि… औऱ यही अलिना कों जलारही थि।
अलिना (गुस्से सें काँपते हुए):
"ताड़ क्याँ रही हैं हरामजादी? तेरेउस लफंगे दोस्त नें मेरे बेटे कों अधमरा कर दिया ! अबदेख – तुम्हारी तरफ पुरे बस्ती केँ केँ सामने नंगा करूँगी!" तब मेरा बदला पूरा होगा.
(मोहल्ले मे सन्नाटा हैं… सिर्फ़ चाँद कि रोशनी औऱ अलिना कि गूँजती आवाज़ हैं…)
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रात थि… मगरयह कोईआम रात नहि थि।
आसमान मे चाँद अपनी अंतिम साँसें लेनेलगा थां, औऱ पूरी हवाओं पर्र किसी मातम कां बादल छाया हुवा थां.।
औऱ कुछ हि पलोंमै बारिश सुरु हौ गयीँ,। मानो आसमान कों समझ आँ गय़ा थां क्याँ होने वाला हैं।
मोहल्ले केँ बीचोंबीच, कूड़े औऱ कीचड़ सें सनी गलियों मे गूँजता सन्नाटा थां।
सिर्फ़ एक् स्त्री कि साँसें तेज़थीं — वोँ महिला थि अलिना मिर्ज़ा।
उसके एक् हाथ मे ज़ोया केँ बाल थें, जोँ भीगती हुई ज़मीन पऱ घुटनों केँ बल गिरी थि… औऱ दूसरा हाथ उसकी तरफ़उठा थां, जैसेकोई आसमान सें इन्साफ़ माँगरही हौ…
अलिना कि आँखों मे पागलपन उतरआया थां।
"हरामज़ादी! चल कपड़े उतार.आज तुम्हें पुरेशहर केँ नंगे चककर लगवाउंगी.
ज़ोया कि आँखों सें आँसू नहि, — सायदअब बचे हि नहि थें। एक् हि रातमै दोबार उसे उसकेघऱ सें घसीटा गय़ा। पुरे समाज केँ सामने जलील किया गय़ा। अब उसमे ताकत नहि बची थि। वोँ पुरे समाज केँ सामने तारतार होँ गई, थि.
तभी…
गर्र्रर्रररर…
एक् मोटरसाइकल कि आवाज़ जैसेमौत कां साया बनकर मोहल्ले मे गूँजी।
उसकेसंग एक् छाया सामने आई — काले बरसाती कोट मे, खून सें लथपथ, माथे पर्र पट्टी औऱ फूटे हुवे होंठ — वोँ थां ‘सिकंदर’। घायल सिकंदर.
मगर अलिना अब भि बेख़बर थि… अंधरे केँ कारण वोँ उसका चेहरा नहि देख पायी.
तभी मुस्ताक अहमद नें तेज़ी सें उसकीओर बढ़ते हुएकहा—
"मैडम…वही हैं! वही लोंडा हैं जोँ छोटे मालिक कों मारा थां.
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रातअब औऱ गहरी हौ चुकी थि।
बिजली अब आसमान मे नहि, ज़मीन पर्र चमकरही थि — छुरियों, सरियों औऱ डंडों कि शक्ल मे।
मोहल्ले कि बीचोंबीच, कीचड़ औऱ खून मे लथपथ ज़मीन पर्र सिकंदर खड़ा थां —, …
"तुँ हैं नाँ रे। तूने हि मारा थां नां मेरे बेटे कों.
अलिना नें गुस्से सें काँपते हुए चीख़कर पूछा।
सिकंदर कि मुस्कराहट मे खून मिला थां… उसकीफटे हुवे होंठ सें खूनटपक रहा थां, एक् आँख केँ ऊपरबड़ा सां घाव थां., पांव सें खूनबह रहा थां… फिन भि वोँ सीधा खड़ारहा।
"हाँ… मे हि हूं। "
उसकी आवाज़ सीधी अलिना कि छाती मे जा धँसी।
"तुम्हारे बेटे कों ज़मीन पर्र पटकने वाला मे हि थां। "
अलिना कि आँखें खून सें लाल हौ गईं… उसने पीछे मुड़कर अपने आदमियों कों देखा — औऱ बोलीं—
"मारोइसे… टुकड़े-टुकड़े करदो…!जला दोइस हरामी कों!" हराम केँ जाने। मेरे बेटे कों मरता हैं। अलीना मिर्ज़ा केँ बेटे कों मारेगा तुँ। इतनी हिम्मत.
गुंडों कि भीड़टूट पड़ी…
कोई सरिया लेकर दौड़ा, कोई छुरी लेकर…
औऱ उस बेचारे पर्र, जोँ पहले सें हि ज़ख़्मी थां, जौ अबहिल भि मुश्किल सें पारहा थां…
सिकंदर एक् समय कों पीछेहटा… फिन स्वयं कों संभालने कि नाकाम कोशिश कि… मगर पहलावार उसकीपीठ पऱ पड़ा।
दूसरा उसकेपेट पर्र…
तीसरा उसके चेहरे पऱ…
औऱ फिन तोँ जैसे.मौत कां जश्न शुरुआत होँ गय़ा।
मोहल्ले कि फटी-पुरानी ईंटों वाली गलियों मे सिकंदर कों 100 सें अधिकलोग माररहे थें…
उसके शरीर सें खूनऐसे बहरहा थां जैसे गिलास टूटने केँ बादलाल शराब.…
हर वार केँ संग उसकी साँसे धीमी होतीजा रहीथीं…
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एक् कोने मे ज़ोया पड़ी थि — बेहोश। उसकी साँसे चलरही थींमगर जिस्म मे जान नहि थि।
रुक्सार ज़मीन पर्र घुटनों केँ बल बैठी थि… उसकी चीखें रात कों फाड़रही थीं—
"छोड़दो उसे… खुदा कां वास्ता हैं… मार डालोगे क्याँ उसे!"
अली केँ हाथ कि हड्डी टूटी पड़ी थि, वोँ दर्द मे कराहता हुआबस दूर सें देखरहा थां…
हासिम साहब… वोँ बूढ़े इंसान… जिनकी आँखों नें ज़िंदगी केँ कई ज़ुल्म देखे थें… आज बेबस खड़े थें…
उनकी आँखों सें आंसूबह रहे थें… होंठ काँपरहे थें…
"याँ खु*दा…यह तूने क्याँ किया….
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सिकंदर अबगिर पड़ा थां।
उसका शरीर हिलना बंद हौ गय़ा थां…मगर अलिना केँ रूह कों अब भि ठंडक नहि मिली थि.
सिकंदर मुस्कुराते हुवे स्वयं सें बोलता हैं.
"जिसे अपनीकोख सें निकाला थां…"
"उसे हि मार दिया … किसी औऱ केँ लिए। हाहा."
औऱ फिन एक् तेज़ साँस केँ संग…
फिन सें खड़ा होने कि कोशिस करता हैं.
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गुंडों भीड़ छँटने लगी…
अलिना अब भि वहीं खड़ी थि… बारिश अब भि गिररही थि…
उसे नहि पता थां… कि उसने किसे मरवाया हैं.
उसे नहि पता थां… उस लड़के केँ शरीर सें बहरही हरखून कि बून्द उसकी अपनी हैं.
मगर… वोँ समय बहोत दूर नहि थां… जबयह सच्चाई उसकीरूह कों छलनीकर देगी।
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बारिश अब तेज़ हौ चुकी थि।
पानी कि बूँदें जैसे ज़ख्मों पऱ नमक छिड़क रहीथीं।
सिकंदर अब भि उठने कि कोशिश कररहा थां… उसकाबदन टूट चुका थां, मगर उसकी रगों मे अब भि वहीआग थि… वही हिम्मत… वही जूनून।
वोँ लरज़ते हुए घुटनों पऱ आया…फिन कांपते हाथों सें स्वयं कों ऊपर खड़ा किया।
उसके शरीर सें खूनऐसे बहरहा थां जैसेकोई नदीफूट पड़ी होँ…
गुंडों कि भीड़अब थोड़ी पीछेहट गई थि — क्यूँकि जिसने अब तक दम नहि तोड़ा, वोँ शायदमौत सें बड़ाकुछ थां।
अलिना नें देखा… औऱ कुछ लम्हा कों ठिठक गई।
उसके होंठ हिले — “इतनामार खाकर भि… यहफिन खड़ा हौ गय़ा?”
सिकंदर दूर… अँधेरे मे खड़ा थां…
अलिना कां दिल जाने क्यूं काँपा… पर्र उस काँप कों उसने गुस्से मे बदल दिया।
“मुस्ताक़ …” वोँ बोलीं।
मुसताक़ नें जल्दी कोट केँ अंदर सें एक् चमचमाता हुआ पिस्टल निकाला औऱ अलिना कि हथेली मे रख दिया।
"यह लो मैडम…अब तोँ ख़त्म कर हि दोइस नासूर कों। "
अलिना नें पिस्टल पकड़ी। उसका चेहरा पत्थर जैसा सख़्त थां… आँखों मे खून थां, औऱ दिल मे बदले कि आग।
उसने हथियार तान दिया…
"मर"… जिसतरह तूने मेरे बेटे कों मारा…आज तूँ भि उसीतरह ज़मीन पर्र गिरेगा… औऱ कोई आँसू नहि बहाएगा!"
सिकंदर नें सिर ऊँचा किया… उसकी आँखें अलिना कि आँखों सें टकराईं…उसकी चमकती नीली आँखें अंधेरे मे भि जाहिर थि। पर्र अलीना उसे पहचान नहि पायी। याँ वोँ अभि पहचानना नहि चाहती थि.
"तूँ क्याँ सोचेगा आख़िरी समय मे?" अलिना नें हँसते हुए पूछा।
सिकंदर नें हल्की सि मुस्कान दि… —
“बसयही… कि जिसे खुदा कहकर माँगा थां… उसने हि मुझे मिटा दिया। ”
"बकवास बंदकर!" अलिना चीखी — औऱ तभी…
“धड़ाम!!”
आसमान कों चीरती हुवी बिजली गिरी… औऱ एक् समय केँ लिए पूरा मोहल्ला उजाले सें नहाया…
औऱ उसी उजाले मे अलिना कि आँखों केँ सामने जौ चेहरा आया…
उसने उसकीरूह तक कों झकझोर दिया।
वोँ फुसफुसाते हुवे बोलि.
"नाँ। नां। मौला.!"
उसके होंठ काँपने लगे…
"सि… सि… सिकंदर…?"
पर्र तब तक…
“धम्म्म…!!”
ट्रिगर दब चुका थां। गोलीचल चुकी थि।
सिकंदर केँ सीने सें खून कां फव्वारा निकला… उसकी आँखें फटी कि फटीरह गईं…
उसके चेहरे पऱ एक् हि भाव थां — चैन।
ए। खु*दा। बिना अपने बाप( अब्दुल रहामान) कों देखे हि मार देगा मुझे.?
वोँ बुदबुदाया… औऱ फिन उसके घुटने ढीलेपड़ गए…
सिकंदर ज़मीन पर्र गिर पड़ा… ज़ोया कि ओरहाथ बढ़ाया… मगर उसकी पलकों नें फिनकभी नाँ खुलने कि शपथखा ली।
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अलिना वहीं अपने घुटनो केँ बल धारम सें गिरती हैं …
उसकेहाथ सें पिस्टल गिरा… आँखें चौड़ी… औऱ आवाज़ बंद।
मुस्ताक़ नें घबराकर पुछा — "क्याँ हुआ, मैडम?"
अलिना धीमे सें बोलि —
"मैंने… अपने हि बेटे कों मार डाला…"
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बारिश कि बूँदें अब आँसूओं कि तरह नहि, सज़ा कि तरहगिर रहीथीं।
हर बूँद ज़मीन सें टकरारही थि जैसे टाइम किसी गुनाह कां हिसाब लेँ रहा होँ।
सिकंदर ज़मीन पऱ पड़ा थां… छाती सें खूनबह रहा थां… पऱ वोँ अब भि जीने कि कोशिश कररहा थां।
उसकाबदन काँपरहा थां… हाथ ज़मीन पऱ रगड़ता हुआ थोडा ऊपरउठा… फिन नीचेगिर गय़ा…
पर्र आँखें… उसकी आँखें अब भि खुलीथीं।
वोँ अलिना कों देखरहा थां।
औऱ अब… अलिना घुटनों केँ बल उसके सामने थि।
वोँ बसदूर सें उसकी आँखों मे देखरही थि… सन्नाटे मे… चुपचाप… बेआवाज़…
उसकी साँसें चलरही थीं… पऱ आत्मा जैसेरुक चुकी थि।
उसकी आँखों मे आँसू नहि थें… सायद आँखें रोनाभूल चुकी थि.
उसके सामने वही बच्चा थां… जिसकी नब्ज़ कभी उसकी हथेली पर्र धड़कती थि…
जिसकी पहलीचीख उसने सुनी थि…
जिसका चेहरा उसने अपनी छाती सें चिपका कर पहलीबार मां कहलाने कां हक पाया थां…
औऱ आजवही बच्चा उसके सामने पड़ा थां… उसकी हि गोली सें…
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सिकंदर नें देखा… औऱ हल्की सि मुस्कान दि…
“अम्मी…” वोँ बुदबुदाया, होंठ हिले… आवाज़ बेहद धीमी थि… पऱ अलीना नें दूर सें हि समझ लिया.
“आज… तूम… जीतीं… मे हार गय़ा…” यही चाहिए थां नां तुम्हे। सिकंदर कों मरना होगा। हाहाहा। लो सिकंदर मररहा हैं.
अलिना काँपी नहि… हिली भि नहि…
बस उसके चेहरे पऱ सैकड़ों प्रश्न थें… औऱ जवाब एक् भि नहि।
उसेयाद आया…जब सिकंदर पैदाहुआ थां, डॉक्टर नें कहा थां — “बच नहि पाएगा। ”उस टाइम अलीना बहोत ख़ुश हुवी। थि.पर्र उस वक्त भि सिकंदर नें हार नहि मानी थि…
वोँ नन्हीं सि जान, मशीनों सें लड़ती रही… साँसों सें जूझती रही… औऱ आखिरकार… जीउठा थां।
औऱ आज…वही बच्चा… फिन सें हार नहि मानरहा थां…
फिन सें उसके अंदर जीने कि आग थि…
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अचानक… जैसे मोहल्ले कि दीवारों मे आवाज़ गूंजती हैं। जैसे किसी डायन कों जिन्दा जलाया जारहा होँ.
अलिना कि चीखें मोहल्ले कि दीवारों सें टकराकर आसमान तक पहुँच गईं —
आआआआआ। याँ खु*दाआआआआआ …!”
“मेरा सिकंदर। मर नहि सकता.
वोँ ज़मीन पर्र झुक गई… सिकंदर केँ चेहरे कों अपनीगोद मे रखा…
हाथ कांपरहे थें… होंठ थरथरा रहे थें…
“ए.ए। बाबू। मिरीजान। चलउठचल अस्पताल चलते हैं.
पर्र अबकोई आवाज़ नहि आई…
सिर्फ़ बारिश थि… बिजली कि गूंज थि… औऱ अलिना कि टूटी हुई रूह कि चीखें।
भीड़चुप थि।
रुक्सार बेसुध रोरही थि।
हसीम साहब नें मुँहफेर लिया थां… शायद उन्होंने भि कुछखो दिया थां।
अली, घुटनों पऱ थां — उसकी आँखों मे जलरही थि, उसकेबस मे होतासो सायद अलीना कां गलाकाट देता.
ज़ोया अब भि बेहोश थि… औऱ सिकंदर कि हथेली बस उसकी उंगलियों कों छूना चाहती थि।
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अलिना नें सिकंदर केँ माथे पऱ हाथरखा… औऱ धीमे सें बोलि —
“सिकंदर। मेरीजान। चल अस्पताल। चल.उठ नां। अम्मी कों सजा भि तोँ देनी हैं। जितने गुनाह मेने किये हैं हिसाब लेगा नाँ मुझसे। तौ फिनचल.
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बारिश अब भि थमने कां नाम नहि लेँ रही थि…
गोलि कि आवाज़ अब सन्नाटे मे बदल चुकी थि।
चारों ओरबस भीगी मिट्टी कि महक, चीखों कि गूंज औऱ टूटे दिलों कि खामोशी थि।
सिकंदर, अलीना कि गोद मे पड़ा थां।
उसकालहू उसकी काली पोशाक मे समा गय़ा थां, औऱ उस पवित्र ममता कि महक मे अबखून कि गर्माहट शामिल हौ चुकी थि।
अलीना कांपरही थि… उसकी आँखें, मे आंसूजम गये थें.
वोँ बार-बार अपने बेटे केँ चेहरे कों थपथपाती, उसकी सांसें जांचती, औऱ फिन प्रेम सें कहती.
मेरीजान। आँखेबंद मतकरो। अम्मी सें बातें करो नाँ.
कुछ नहि होने दूंगी तुम्हे। तुम् तौ मेरीजान होँ। मेरेलाल हौ.
फिन अचानक—
“मुसताक!!! जल्दकर, कार निकाल! इसे हॉस्पिटल लेँ चल!!!”
उसकी आवाज़ अब आदेश नहि… गुहार बन चुकी थि।
मुसताक भागता हैं।
इसीबीच… ज़ोया कों होशआता हैं।
उसकी आँखें खुलती हें… सामने वोँ मंजर—
सिकंदर… अलीना कि गोद मे पड़ा…खून सें सना…
"सिक्कूउउउउउ!!!"
एक् ऐसीचीख… जैसे पूरे आसमान कों चीरदे।
ज़ोया घिसटती हुईँ उसकेपास दौड़ती हैं, लड़खड़ाती हैं, गिरती हैं… पर्र रुकती नहि।
सिकंदर… जौ अब तक अधमरा पड़ा थां… अलीना कि गोद सें धीरे-धीरे सें उठता हैं। अलीना उसे रोकने कि कोशिस करती हैं। पर्र सिकंदर उसे अनदेखा कर देता हैं.
उसकेहाथ काँपरहे थें, पांव लड़खड़ा रहे थें… मगर उसके भीतरकोई ऐसी रोशनी थि जोँ बुझने कां नाम नहि लेँ रही थि।
वोँ दर्द मे भि मुस्कुराता हैं… उसकी आँखों मे जलन नहि, चैन हैं।
ज़ोया केँ पास पहुँचकर वोँ उसेकस करगले लगा लेता हैं।
"श्श्श… रोमत मेरी जंगली…बिल्ली.
उसकी आवाज़ बहोत धीमी थि, मगर सीधा ज़ोया कि रूह तक उतर गई।
"कुछ नहि हुआ मुझे…"
वोँ बोलता हैं, हल्के सें उसके माथे पऱ चूमते हुए।
"तुँ जानती हैं नां… तेरा सिकंदर… कोईआम लड़का नहि हैं… फौजी हैं। वोँ भि। बहोत बड़े वाला। ( मारकोस) तोँ यह छोटी सि गोली.
"मेरीजान इतनी सस्ती नहि कि एक् गोली सें निकलजाए…"
"तुँ रोई तौ मे हार जाऊंगा… "
ज़ोया उसे थामेहुए बुरीतरह रोरही थि, पर्र उसकी सांसों मे अब भि एक् उम्मीद थि… सिकंदर कि बातों सें जिंदा उम्मीद।
"सिकंदर… मुझेमाफ़ करदोसभी मेरीवजह सें हुवा हैं."
वोँ हँसता हैं हल्के सें — कुछ नहि हुवा हैं। सभीठीक हैं."
वोँ फिन ज़ोया कि गोद मे हल्का सां सिर टिका देता हैं… जैसे बच्चा मम्मी केँ सीने सें लगकरचैन पाता हैं।
अलीना ज़मीन पर्र बैठी थि।
उसका चेहरा अब धुंधला थां… पानी कि बूंदों औऱ उसके आंसुओं मे कोई फर्क नहि बचा थां।
वोँ बस सिकंदर कों देखरही थि उसकी आंखों मे जोया केँ लिए प्रेम देखरही थि। जोँ कभी उसकेलिए भि होता थां.
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ज़ोया नें काँपती हुईँ आवाज़ मे उसका चेहरा थामा —
"सिकंदर, चलो… हॉस्पिटल लेँ चलती हूं… देखो, बहोत खूनबह रहा हैं…"
सिकंदर नें हल्का सां मुस्कराकर उसके माथे पऱ हाथरखा, जैसेउसे हि ढाढ़स बंधारहा होँ
भीगे कपड़ों औऱ ज़मीन पऱ फैलेखून केँ बीच वोँ उठता हैं, लड़खड़ाता हैं, फिन सीधा खड़ा होता हैं।
ज़ोया कां हाथ थामे वोँ अपनी मोटरसाइकिल कि तरफ़ बढ़ता हैं…
बारिश अब हल्की हौ चली थि, मगर फिजा मे एक् भारीपन अब भि टंगा थां।
औऱ तभी…
"रुको!!!"
एक् दर्द सें भरीचीख… अलीना।
वोँ दौड़ती हुईँ आती हैं… उसके पाँव कि मोतीजरी हुवी जुति पीछेछूट गई थि, मगरउसे परवाह नहि।
गीली ज़मीन पऱ घुटनों केँ बलबैठ … सिकंदर केँ घुटनो कों अपने बांहों मे लपेट लेती हैं.
"मतजाउस मोटरसाइकिल पऱ… प्लीज़… मेरेसंग। गाड़ी मे चल…अभि तेरी हालत नहि हैं ड्राइविंग करने कि."
सिकंदर कां चेहरा शांत थां… वोँ चुपचाप ज़ोया कां हाथ थामेआगे निकलने लगा।
"क्यूं जिद्द कररहा हैं। "
सिकंदर उसकी तरफ़ देखता हैं… मगर आंखों मे कोई कोमलता नहि थि… उसकी आंखों मे कुछ थां हि नहि। जैसे अलीना उसकेलिए कोई अजनबी हौ.।
वोँ झुकता हैं…दर्द केँ बाबजूद। उसके चेहरे केँ पास जाकर, ठंडी औऱ खामोश आवाज़ मे कहता हैं—
"मैडमजी… आप् भूलरही हें, आपके पति औऱ बेट नाराज़ होँ जाएंगे…"
"कहीं वोँ नां कहें, कि आपने अपने बेटे केँ गुनेहगार कों अपनी गाड़ी मे बैठाया…"
"जिसे मारना थां… उसी कों बचाने दौड़ पड़ीं आप्?" वैसे भि मेरे गन्दे खून सें आपकीयह आलीशान गाड़ी गन्दी होँ जाएगी.
अलीना कि रगों मे जैसेकुछ फट गय़ा होँ… उसका चेहरा पत्थर जैसा हौ गय़ा।
वोँ चाहती थि कुछकहे… मगर शब्द उसके होंठों तक हि नहि आँ पाए।
सिकंदर मुड़ने हि वाला होता हैं कि… अलीना स्वयं कों रोक नहि पाती…
वोँ उसकेगले लग जाती हैं…
"क्यूं नहि सुनरहा मेरीबात? तूँ मेरेसंग चल नाँ… मतजाउस मोटरसाइकिल सें … तूँ जीत गय़ा हैं, मे हार गई… अब औऱ क्याँ चाहिए तेरी?"
सिकंदर उसकी बाहें धीरे-धीरे सें अपने कंधे सें हटाता हैं…
औऱ ठंडी मुस्कान केँ संग बोलता हैं—
"आपकीयह हार भि समय कि मेहरबानी हैं… वरना आप् तौ हमेशा समय सें पहलेबिक जातीथीं…"
अलीना पीछे हटती हैं, जैसे किसी नें उसके सीने मे खंजर घोंप दिया हौ।
वोँ अब भि ज़मीन पर्र बैठी हैं… भीगी… टूटी हुई।
ज़ोया यहसभी देखरही थि… मगरकुछ समझ नहि पारही थि।
वोँ स्वयं सें पूछती हैं—
"इसे सिकंदर कि इतनी चिंता क्यूं होँ रही हैं.अभि कुछदेर पहले कितना जहरउगल रही थि."
अलीना… आहिस्ता ज़ोया कि तरफ़ घूमती हैं… उसकी आँखें लालथीं,
अलीना ( जोया केँ आगेहाथ जोरती हुवी) - बोल नाँ इसे.ऐसे ज़िद नां करें.
सिकंदर चुपचाप उसकी तरफ़ देखता हैं…
"ज़ोया… चलो…"
वोँ अब भि कमजोर थां… मगर उसकी आँखों मे एक् जुनून थां।
टाइम निकलता जारहा थां। सिकंदर केँ सीने मे गोलीधसी हुवी थि। उसकीजान कों खतरा थां। तोँ अलीना कों उसकेज़िद केँ आगे हारना परता हैं.
ज़ोया उसके पीछेबैठ जाती हैं।
मोटरसाइकिल स्टार्ट होती हैं।
अलीना एक् बारफिन चीख पड़ती हैं — मुस्ताक़ गाड़ी निकालो। पीछेचलो.
पूरी गरीयों कि काफिले मोटरसाइकिल केँ पीछेचल देती हैं। अब हल्का हल्का उजाला होनेलगा थां। औऱ उस उजाले मे एक् मोटरसाइकिल केँ पीछे करीब 25 महंगी गरिया पूरीरोड कों घेरे चेलेजा रहे थें.
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bhay kahani jesi write likh rah h likhne do agar ap ko kahani ashi nahii LG rhi too apni shuru kro bhay hum promise krte h app kee kahani v read krenge koy v sujab nahii denge
Mukkader kaa sikander – New Episode
bhay tu क्या dill ❤️ hi cheer dega क्या apne lafzo से, एक too kahani itna achi h ke update kaa wait nahii hotha aur ऊपर से padne ke bad ese lgta hi ke itna juldi khatm bi hu गया, bhay tu Banda hi alag h yr, tere lafzo mai magic h yr, sala movie chl rhi hu aur bus कभी khtm hi na hu.
God bless you bro। and hammesha likhte raho yr jise hammesha hame esi amazing kahaniyan padne ko milti rhe
Mukkader kaa sikander – New Episode
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Mukkader kaa sikander - Next part miss mat karna
bhay koy galti nahii h kahani mai aur tumhe likhne mai suggestion Dena too suraj ko deepak dikhane jesa h so carry on bro. Best wishes
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