Mukkader kaa sikander – New Episode
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रात धीरे धीरेढल रही थि, मगर दिल्ली केँ तंग गलियों मे अब भि हर कोने मे फुसफुसाहटें थीं।
हसन मिर्ज़ा अपने आलीशान दफ़्तर मे बैठा थां — सामने उसकेदो खास खबरियों कां झुकाहुआ सिर, औऱ सामने उसके चहरे पर्र फैली हुइ शिकनें।
हसन मिर्ज़ा नें धुआँ उड़ाते हुए सिगार होंठों सें हटाया, गहरी सांसली औऱ फिन अपनी भारी आवाज़ मे पूछा—
हसन मिर्ज़ा :
कौन थां.?"
खबरी थोडा सहमकर बोला—
खबरी:
"हुजूर। नाम तोँ पक्का नहि। मगरखबर हैं कि… पुरानी दिल्ली कां एक् लोकल गुंडा… रहिलनाम कां… उसी केँ लोग देखेगए थें उसरात…"
हसन मिर्ज़ा कि आँखें एक् समय केँ लिए सिकुड़ जाती हें… उसने सिगार कों ऐश ट्रे मे कुचला औऱ धीरे-धीरे सें, बहोत हि नपे-तुले लहजे मे कहा—
हसन मिर्ज़ा (आवाज़ ठंडीमगर गहरी):
"एक् लोकल गुंडा…?
इतनी बड़ी वारदात…?
इतनी हिम्मत…?"
वोँ कुर्सी सें उठता हें, कमरे मे टहलते हुए गहरीसोच मे डूब जाता हें… फिन धीमेमगर ज़हरभरे लहजे मे बुदबुदाते हें—
हसन मिर्ज़ा:
"नहि.
कोईगली कां आवारा कुत्ता इतना बड़ा कांड नहि सकता…"
"उसके पीछेकोई औऱ हैं…"
"कोई… जोँ बंदूकों सें खेलने मे उस्ताद हैं…"
"कोई… जिसके लिएयह बसखेल जैसा हैं.…"
फिन खिड़की केँ पास जाकर बोलता हैं। तुम् सभी नें कभी भड़ियों केँ झुण्ड कों देखा हैं.? झुण्ड केँ आगेआगे उनका सरदार चलता हें। सारे भड़िये उसे झुण्ड कां नेता मानते हें। क्यूं कि वोँ उस झुण्ड कां सबसे ताकतवर भेरिया होता हैं। पऱ यहबात केवलउस सादर कों हि पता होती हें। कि उस झुण्ड मे कोई औऱ भि हैं। जोँ उस सें भि ज़्यादा ताकतवर। खूंखार हें। औऱ वोँ सरदार भि उसी केँ इसरों कर नाचता हें.
हसन मिर्ज़ा कां चेहरा अब खिड़की सें आती ठंढी हवाओ कों महसूस कररहा थां।
वोँ एक् इशारा करता हैं… औऱ एक् व्यक्ति झट सें उसकाफोन पकड़ा देता हैं।
हसन मिर्ज़ा नंबर डायल करता हैं — स्क्रीन पऱ नाम चमकता हैं — "मालिका"।
मोबाइल कुछ सेकेंड बजता हैं, फिन मालिका कि जनानी, मगर लोभी आवाज़ सुनाई देती हैं—
मालिका (हलक़ी मुस्कान केँ संग):
"आदाब मिर्ज़ा साहब… इतनीरात गएयाद किया…?"
हसन मिर्ज़ा बिना भूमिका केँ सीधा मुद्दे पर्र आता हैं—
हसन मिर्ज़ा (आदेशात्मक आवाज़ मे):
"मालिका… एक् काम हैं तेरेलिए…"
"एक् राहिल नाम केँ कुत्ते कों अपनेजाल मे फांसना। उसे अपनी मुट्ठी मे कर.पता लगाना हें कि मेरे सोने कों कहां रखा हें उसने.
"औऱ यह भि जान… उसके पीछे किसकी छाया हैं…"
मोबाइल केँ उसपार हल्की हँसी गूंजती हैं।
मालिका (धीरे-धीरे सें):
"राहिल.? ह्म्म्म.
ठीक हें। वैसेयह बात तुम् मुझेयहा आकर भि बता सकते थें। अकेली हूं घऱ पर्र। बेटियां बाहर् गई हें.
हसन मिर्ज़ा:
"अभि नहि। !"
मालिका मुस्कुराती हैं, फिन ठंडी आवाज़ मे कहती हैं—
मालिका:
हसन मेरीजान.
रहिल मेरा शिकार बनेगा… औऱ उसकेसंग उसके सारेराज भि आपके कदमों मे होगा…" वैसेअब सहबाज कैसा हें.?
हसन उसकीबात सुने बिना मोबाइल काट देता हें.
मोबाइल कटते हि हसन मिर्ज़ा कुर्सी पर्र फिन सें धंस जाता हैं।
कमरे मे गहरा सन्नाटा छा जाता हैं — बस उसकी आँखों मे बर्फ़ीली आगजलरही थि।
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एक् भारी, सन्नाटे सें भरी सुभह। हवाओं मे बेचैनी थि। बंगलो केँ ड्रॉइंग रूम मे अलिना कि मोबाइल कि घंटी बजती हैं। वोँ बेसब्री सें मोबाइल उठाती हैं। दूसरी तरफ डॉक्टर सलीम कि गंभीर आवाज़ होती हैं।
डॉ। सलीम (धीरे-धीरे, ठहरते हुए)
"मैडम। सहबाज कों होश आँ गय़ा हैं."
अलिना जैसे किसी गहरे समुंदर सें बाहर् आई हौ। उसकी आंखें छलक जाती हें, होंठ कांपते हें। वोँ बिनाकुछ बोले जल्दी खड़ी हौ जाती हैं।
अलिना (कांपती आवाज़ मे)
"मेरा बच्चा। मेरा सहबाज."
वाहन कि चाबी उठाती हैं औऱ नौकर तक कुछकहे बिना सीढ़ियां दौड़ती हैं। पूराघऱ जैसे उसके कदमों कि आहट सें कांप उठता हैं। वाहन बेतहाशा स्पीड मे अस्पताल कि ओर भागती हैं। रियर व्यू मिरर मे उसकी आंखों सें बहते आंसू साफ़ दिखते हें।
अस्पताल मे डॉक्टर औऱ नर्स पहले सें खड़े होते हें। अलिना द्वार (दरवाज़ा) धकेलती हैं औऱ सीधे डॉक्टर केँ सामने आँ खड़ी होती हैं।
अलिना (सांसें टूटी हुई)
"कैसा हैं मेरा बेटा? मे उससेमिल सकती हूं?"
डॉ। सलीम (थोडा रुककर)
"मैम। सहबाज होश मे हैं। मगर—"
अलिना (तेज़ी सें)
"मगर क्याँ डॉक्टर? साफ़-साफ़ बोलिए!"
डॉ। सलीम (गंभीर लहजे मे)
"सिर पऱ गहरीचोट कि वजह सें। उसके दोनों पैरों मे लकवा होँ गय़ा हैं। वोँ अबचल नहि सकता.कम सें कम अभि नहि। "
अलिना कि आंखें फटीरह जाती हें। उसकी सांस जैसेथम जाती हैं। फिन वोँ एक् कदम पीछे हटती हैं। औऱ धीरे-धीरे सें दीवार सें टिक जाती हैं।
अलिना (सिसकते हुए)
"नहि। यह नहि होँ सकता। मेरा बेटा। मेरे सहबाज। नहि."
वोँ लड़खड़ाते हुए ICU केँ अंदर जाती हैं। सहबाज कां चेहरा पीला हैं, आंखें खुली हें, मगरबदन बेजान। अलिना उसकेपास जाकर फर्श पर्र बैठ जाती हैं। उसकेबाल बिखर जाते हें, होंठ कांपते हें, औऱ वोँ धीरे-धीरे सें उसके पांव छूती हैं।
अलिना (फूट-फूट कर)
" सहबाज मेरेजान। देखो अम्मी आपकेपास हें.
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कमरे मे अजीब सि खामोशी थि… मशीनों कि बीप कि आवाज़, सहबाज कि सांसों कां धीमा उतार-चढ़ाव औऱ अलिना कि आंखों सें लगातार गिरते आंसू। वोँ उसके बेजान पैरों कों बार-बार सहलारही थि… जैसे प्रेम सें ताक़त लौटा देगी।
अलिना (धीरे-धीरे सें, कांपती उंगलियों सें उसकाहाथ पकड़ते हुए):
"सहबाज। मेरीजान। मुझसे बातकरो नां। कुछ तोँ कहो."
सहबाज चुप थां। उसकी आंखें छत कों देखरही थीं, मगर उनमें गहरी बेचैनी तैररही थि। फिन धीरे-धीरे सें उसने गर्दन मोड़ी, औऱ बिना अलिना कि तरफ देखेकहा:
सहबाज (खामोशी चीरते हुए):
"यह सभी। उसनें किया हैं, अम्मी."
[अलिना जैसे पत्थर कि होँ गई। उसे एक् समय मे समझ आँ गय़ा—वोँ 'उसने'कौन हैं। उसका सिखंदर। उसकी रगों मे एक् टीस सि दौड़ गई। ]
अलिना (धीरे-धीरे सें, टूटते हुए):
"नहि। बेटा। ऐसामत सोचो."
[सहबाज नें उसकीतरफ देखा, उसकी आंखों मे गहरीचोट थि, औऱ एक् मासूम डर। फिन वोँ बच्चों कि तरह फुसफुसाया:]
सहबाज:
"अम्मी। तुम् मेरेसंग होँ नाँ.?
मेरासंग दोगी नां तुम्.?"
[अलिना अब तक अंदर हि अंदरटूट चुकी थि। उसने कांपते हाथों सें सहबाज कां सिर अपनीगोद मे रखा औऱ रोतेहुए बोलि:]
अलिना (आंसुओं सें गीली आवाज़ मे):
"मेरेलाल। ज़िंदगी केँ हर मोड़ पर्र…
हर दर्द केँ हरसाए मे.
तुम्हारी अम्मी तुम्हारे संग होगी.
कभी तुम्हें अकेला नहि छोड़ूँगी। कभी नहि."
[सहबाज उसकीगोद मे वैसे हि चुप पड़ारहा। फिन अलिना नें धीरे-धीरे सें उसके माथे पर्र हाथरखा औऱ फुसफुसाई:]
अलिना (धीरे-धीरे सें):
"पऱ सुनो.
यह बातहसन कों मत बताना.
सिखंदर अभि बच्चा हैं। नादान हैं.
गलतियां करता हैं। पऱ दिल सें बुरा नहि हैं.
माफकर दोउसे। मेरेलिए."
[सहबाज कुछ नहि कहता, बस अपनी पलकें मूंद लेता हैं। फिन बड़ी मुश्किल सें फुसफुसाता हैं:]
सहबाज:
"मुझे किसी सें कुछ नहि चाहिए.
बस तुम्.
बस तुम्हारा संग, अम्मी."
अलिना उसकी हथेली कों अपनी हथेली मे छिपा लेती हैं, सायद अनजाने मै उसने एक् वादाकर लिया थां.जैसे यह वादाकोई क़ीमती चीज़ होँ। कमरे मे फिन सन्नाटा छा जाता हैं, मगरअब वोँ सन्नाटा पहले जैसा नहि। अब वोँ एक् मम्मी औऱ बेटे केँ बीच जन्मे अंधे रिश्ते कि दस्तक हैं। अलीना आगे झुकती हें औऱ सहबाज केँ होठो पर्र अपना होंठरख देती हें। फिनबड़े प्रेम सें उसके बालो कों सहलाती हुवी उसके होठों कां रसपान करने लगती हें। अगरकोई अनजान देखता तौ बोल हि नहि सकता थां यह दोनों मां बेटे हें। ऐसालग रहा थां दो प्रेमी एक् दूसरे कों चुम्बन देरहे हें। अब दोनों केँ दिल मे क्याँ थां यह तौ रब हि जाने.
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कमरे मे अभि भि हल्की-हल्की दवाइयों कि महक फैली हैं। उसकेपास बैठी उसकी उंगलियों कों सहलारही हैं, जैसे मम्मी अपने टूटेहुए बच्चे कों संभालने कि कोशिश कररही होँ।
सहबाज (धीमी आवाज़ मे, खोएहुए अंदाज़ मे)
"अम्मी। सभी समाप्त हौ गय़ा नाँ?"
अलिना (आंसू रोकती हुईँ)
"नहि मेरेलाल कुछ नहि हुवा हें दुनयाँ केँ सारे डॉक्टर्स कों तेरी इलाज मे लगा दूंगी पर्र तुम्हे तेरे कदमो पऱ खड़ाकर केँ रहूंगी."
तभी द्वार (दरवाज़ा) तेजी सें खुलता हैं… औऱ अंदरआता हैं हसन मिर्ज़ा। आंखों मे बेताबी, चेहरे पऱ डर औऱ होठों पर्र किसी तूफान कि गूंज।
हसन मिर्ज़ा
"सहबाज!!!"
वोँ तेज़ी सें उसकेपास आता हैं, उसकी हालत देखकर एक् समय कों ठिठक जाता हैं। व्हीलचेयर मे जकड़ा उसका बेटा… आंखों मे खालीपन… औऱ जिस्म मे हरकत तक नहि…
हसन मिर्ज़ा (सांसें फुली हुई, कांपती आवाज़ मे)
"यह…यह क्याँ होँ गय़ा मेरे बेटे कों.? अलिना। यह.यह?"
अलिना (कठिनाई सें बोलती हैं)
"डॉक्टरों नें कहा हैं… अस्थाई लकवा हैं… अगर अच्छे सें ख्याल रखाजाए तोँ… शायद."
हसन मिर्ज़ा (सहबाज कि ओर झुकते हुए, उसकी ठुड्डी पकड़कर)
"बोल … यहहाल किसने किया तेरा? किसने इतनी हिम्मत कि… कौन थां वोँ…?"
सहबाज (थोड़ी देरचुप रहता हैं, फिन धीरे-धीरे सें)
"अब्बू। छोड़ दीजिए। सभीठीक हौ जाएगा."
हसन (गुस्से सें फनफनाता हैं)
"ठीक हौ जाएगा.? यहपेर जोँ अब नहि चल सकते.यह आंखों मे जौ मायूसी हैं। यहठीक होँ जाएगा.? नहि सहबाज… मुझेनाम बता … मे उसे ज़िंदा दफना दूंगा…"
सहबाज (चेहरा फेरते हुए, सूनी आवाज़ मे)
"कुछ बातों कां जवाब… चुप्पी हि होती हैं अब्बू…"
अलिना (धीरे-धीरे सें हसन केँ पास जाकर)
"यह टाइम बदले कि नहि। सहारे कि हैं। " अंदर हि अंदर वोँ काँपरही थि। कहीं सहबाज हसन केँ सामने सिकंदर कां नाम नाँ लेले.
हसन मिर्ज़ा (कंधे झुकाकर, आंखों मे आँसूलिए)
"मैंने बहोत कुछ खोया हैं इस सियासत मे। अब औऱ नहि सह सकता अलिना। मेरा बेटा… मेराखून… यूं जिंदा लाश बनकर नहि रह सकता…"
सहबाज (धीरे-धीरे सें, आंखें बंद करतेहुए)
"बस अब्बू… जोँ होना थां, हौ गय़ा… बसअब आप् मेरेसंग रहिए…यही बहोत हैं…"
अलिना सहबाज केँ सिर पर्र हाथ फेरते हुएउसे अपने सीने सें लगाती हैं… औऱ हसन मिर्ज़ा वहीं बैठकर अपनी आंखें पोंछते हें, अंदर हि अंदरउस आग मे जलतेहुए… जौ नाम सहबाज नें नहि लिया, पर्र जिसने उसकेदिल कों चीरकर रख दिया…
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धूप अपने ढलने केँ सफर पऱ थि, मगर मोहल्ले कि गलियों मे सन्नाटा पसराहुआ थां।
वोँ रहमतनगर जहाँकुछ दिन पहले तक चीखें, दौड़ते क़दम, खून औऱ खौफ़ कां नज़ारा थां, अब एक् अजीब सि खामोशी मे लिपटा थां।
हसीम साहबअब फिन सें अपनी चारपाई बाहर् निकालने लगे थें,
ज़ोया उनकेलिए पानी लाती औऱ अली अपनी दुकान पऱ बैठा झाड़ू देता नज़रआता।
रुख़्सार केँ चेहरे पर्र भि अबचैन थां, वोँ मोहल्ले कि औरतों मे बैठकर बातें करनेलगी थि।
राहिल औऱ सादअब फिन सें वैसी हि रौनक सें घूमते नज़रआने लगे थें,
जेब मे वोँ छोटा सां सोने कां टुकड़ा लिए, जिसकी बोलीं लगाने केँ लिए वोँ इधर-उधर खरीददार तलाशकर रहे थें।
औऱ इन सबसेअलग — मोहल्ले कि एक् छोटी सि गली मे, अपनी टूटी हुईँ मोटरसाइकिल केँ सामने बैठा थां सिकंदर।
नीचे बैठकर उसने मोटर कां ढक्कन खोलरखा थां।
कभी अपनी कमीज़ कि बाँह सें पसीना पोंछता,
तोँ कभी ज़मीन पर्र रखा स्पैनर उठाकर कुछ कसता।
उसके हाथों मे ग्रीस थां, मगर आंखें साफ़। ठंडी। बेज़ार।
जैसेइस मोहल्ले कां हंगामा भि अबउसे छू नहि सकता।
तभी दूर सें आती हैं एक् स्याह रंग कि चमचमाती जीप।
Jeep breaks.
Tyres halt.
मोहल्ले केँ कईलोग खिड़कियों औऱ चौखटों सें झाँकते हें।
जीप कां द्वार (दरवाज़ा) खुलता हैं…
एक् पांव ज़मीन पर्र उतरता हैं — सुनहरा पंजाबी जूता, जिसमें सफेद मोतियों कि नाज़ुक कढ़ाई।
फिन उतरती हैं — अलीना मिर्ज़ा।
काली सलवार कमीज़, रेशमी दुपट्टा सिर कों ढाकता हुआ। एक् सुंदर मुस्लमान महिला। जिसके खूबसूरती कि सुगंध नें रहमतनगर केँ खुसबू कों फीकाकर दिया थां.
आंखों पऱ बड़ी कालीऐनक औऱ चाल मे वही रुतबा…
जिसमें सियासत कि ठसक भि थि, औऱ दर्द कि छांव भि।
लोग फुसफुसाने लगे।
स्त्री 1:
"लो आँ गयीँ, डायन। पाता नहि अबउस बेचारे
( सिकंदर) केँ संग क्याँ करेगी?"
महिला 2:
"इतनीकम उम्र कि लगती हें … लगती तौ मुश्किल सें तीस-बत्तीस कि हें … हाँ गरीबो कां खून चूसेगी तोँ जवानी तोँ हिचकोले खायेगी हि.। "
अलीना कों स्वयं केँ लिए होँ रहे बातो कां पाता थां। अब हें तौ एक् महिला हि। जान जाती हें कौन उसकेलिए क्याँ बोलरहा हें
अलीना कों किसीबात कि परवाह नहि थि।
वोँ सीधा सिकंदर कि तरफ बढ़ती हैं।
उसकीचाल मे धीमापन थां… शायददिल कि धड़कनों नें अबलय तोड़ दि थि।
सिकंदर नें एक् नज़र डाली…फिन वापस मोटर कि तरफझुक गय़ा।
उसकेलिए जैसेकोई आया हि नहि।
अलीना (धीरे-धीरे सें, मगर लड़खड़ाते हुए लहजे मे):
"वोँ। मे। मे कहरही थि.
मैंने जोँ मुलाज़िमा भेजी थि। वोँ। तुम्हारा ख्याल तोँ रखरही हैं नां?"
सिकंदर (बिना देखे, बेरुखी सें):
"ख्याल.? मे अपना ख्याल रख सकता हूं। आपकी मुलाज़ाम कों मेनेघऱ भेज दिया"
अलीना हड़बड़ा जाती हैं। उसकी हथेलियाँ काँपती हें। एक् बारफिन उसे अहसास हुवा कि सिकंदर कों उसकी जरूरत नहि हें। उसका वोँ रुपया जोँ वोँ अपनेलाल। अपनी छल्ले ( सिकंदर) लिए कमाई थि। अब उसके सहजादे कों उसकी दौलत नहि चाहिए। यहबात अलीना कों डरा देती हें। पर्र। वोँ मांनने कों रेडी नहि थि कि उसका छल्ला अबउसे अपनीदिल सें दिल सें निकाल चूका हें.
अलीना (धीरे-धीरे सें):
"अच्छा छोड़ोयह सभी। तुम्हारे लिएकुछ लायी हूं। चलो नाँ देखती हूं.?"
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सिकंदर अपनी मोटरसाइकिल पऱ बैठ, आरामसे मोहल्ले केँ नुक्कड़ कि तरफ निकलने हि वाला थां,
कि पीछे सें एक् आवाज़ फिन गूंजती हैं — "सिकंदर। एक् मिनट। मात्र एक्। सुन नाँ"
वोँ मुड़ता हैं।
अलीना वहीं खड़ी हैं, जीप केँ पास।
उसका दुपट्टा अब थोडा सरक चुका हैं, आंखों सें ऐनकहटा चुकी हैं… औऱ अब चेहरा पूरीतरह दिखरहा हैं —
एक् टूटी हुइ माँ, जोँ फिन सें कुछ देनेआई हैं, औऱ शायदफिन सें ठुकराने केँ लिए रेडी भि।
अलीना (आहिस्ता सें):
"वोँ। वोँ। बोलरही कि। यहजीप खरीदी हैं मेने.त। तौ। तूँ इसेचला। जब पैसे होंगे तोँ दे देना.!
मुझेलगा अबतु अस्पताल सें आँ चुका हैं,
तोँ… तौ कम सें कम आने-जाने मे तकलीफ नां होँ…
मै तुम्हारी हैसियत कां मज़ाक नहि बनारही। बसबोल रही हूं। लेँ लेता तोँ अच्छा होता."
हर एक् शब्द अलीना सोचसमझ करचुन रही थि। जिससे सिकंदर कों उसपर क्रोध नां आये.कितनी कमज़ोर पऱ जाती थि वी सिकंदर केँ सामने.
सिकंदर उसकी आंखों मे सीधा देखता हैं — फिनजीप कि तरफ।
तेरीहाथ लगाए गई, हरचीज मेरेलिए हराम हैं। मैउस पर्र थूकू भि नां.
अलीना दर्द सें तड़प जाती हें। उसका कलेगा फट जाता हें.वही फफ़क़कर रोने लगती हें। सिकंदर कि बातें उसकेदिल कों कचोटकर रख देती हें.
" अम्मी हूं तेरी … सभीकुछ तौ तेरा हि हें.
कभी तोँ समझ मेरादिल…"
सिकंदर:
"दिल.?
जिसेकभी मेरे रोने कि आवाज़ भि सुनाई नहि दि…
अब उसका ज़िक्र मतकर। मुझे बहोत काम हें चल निकलयहा सें। जा तेरा भतार तेरा इंतज़ार कररहा होगा."
वोँ मोटरसाइकिल घुमा लेता हैं औऱ चलने लगता हैं।
अलीना कि आंखें भरआती हें।
मगरइस बार वोँ खामोश नहि रहती…
वोँ उसके पीछेचल देती हैं।
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कुछदेर बाद
पुरानां, टूटाहुआ लकड़ी कां द्वार (दरवाज़ा).
भीतर एक् रूम — छोटा, सीलनभरा, …
एक् कोना।। छोटी सि अलमारी,
दूसरे कोने मे एक् पलंग — उस पर्र सिकंदर लेटा हैं, पुस्तक पढ़ते हुए।
छत कां पंखा घिसघिस कि आवाज़ कररहा हैं।
एक् बल्ब —
चारों तरफ गरीबी कि किस्सा बिखरी हैं — मगर सिकंदर कि आंखें स्थिर हें… जैसेउसे कोई फर्क हि नहि।
तभी द्वार (दरवाज़ा) धीमे सें खुलता हैं।
अलीना अंदरआती हैं…
उसकी आंखें कमरे कों देखती हें —
एक् समय केँ लिए ठिठक जाती हैं। इस सें कई गुना अच्छी तोँ उसके नौकरो केँ कमरे थें.उसका दिल फटने लगता हैं…पऱ फिनउसे बैड पर्र लेता उसका सहज़ादा दीखता हैं। औऱ अलीना केँ होठों पऱ फीकी पर्र मुस्कान तैर जाती हें.
अलीना (धीरे-धीरे सें):
"यही हैं तुम्हारा घऱ…?"
सिकंदर पुस्तक सें नजर हटाए बिना:
"हाँ… औऱ बहोत हैं मेरेलिए।
जैसा भि हें मेरा अपना हें.औऱ तूँ क्यूं आयीयहा। मै तुझसे उलझना नहि चाहता। मुझे औऱ भि काम हें तुँ मुझे परेशान मत कियाकर।। "
अलीना कि सांसें भारी हौ जाती हें। वोँ सिकंदर कि बातों कों अनसुना कर देती हें.
वोँ अंदर आँ जाती हैं, बैड केँ पास बैठती हैं, पुस्तक छूने कि कोशिश करती हैं।
अलीना (बहोत धीमे लहजे मे):
"सुन नाँ। खानां खाया तूने.?
सिकंदर पुस्तक बंद करता हैं, धीरे-धीरे सें उसकीतरफ देखता हैं — वोँ अलीना केँ यहा होने सें परेशान थां। पऱ अभि उसेउस सोने कों बेचना थां। तौ अभि वोँ कोई औऱ लड़ाईमोल नहि लें सकता थां.
सिकंदर - नहि.
अलीना - मै खानां बना दू.बिरयानी तुम्हारी फेवरेट
सिकंदर अचानक पिस्टल निकाल कर अलीना कों धक्का देकर दीवाल सें लगाता हुवा पिस्टल उसके काँपत्ति पऱ तान देता हें"। हरामजादी। खेलरही हें मुझसे। तुम्हे मज़ाकलग रहा हैं यहसभी। हलकेमै लें रही हें मुझे.
अलीना डर सें आवाकरह जाती हें। बदन मे सिंहरण दौड़ जाती हें। फिन स्वयं कों सँभालते हुवे.
."मेरीजान रुक क्यूं गय़ा। चला गोली.मार डाल अपनी अम्मी कों.अगर इसी सें तेरेरूह कों शांति मिलेगी। तोँ अलीना कि 100 जान कुर्बान मेरे चाँद.
सिकंदर उसकीतरफ देखता हैं… आंखों मे क्रोध नहि… एक् अजीब सि उदासी।
सिकंदर (बहोत धीमे, थके हुए लहजे मे):
"कभी नहि सोचा थां। इतनी बदचलन बेहयाह होगी तूँ। तूँ किसी बाजारू महिला सें कम नहि हें। बसइस दौलत नें तेरे शरीर कों ढकरखा हें.
अलीना:
अलीना बस मुस्कुराती हुवीबड़े प्रेम सें उसकी आँखों मे देखरही थि। उसके आंसुवों सें भींगे चेहरे पऱ केवल मुस्कान थि। जोँ केवलउस नीले आँखों वाले केँ अलीना सें बात करने सें आयी थि.
अलीना खामोश खड़ी हैं।
उसकी आंखों सें आंसू लगातार गिररहे हें…
वोँ कमरे कि सीलन कों नहि, अपनेदिल कि सीलन कों महसूस कररही हैं।
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सिकंदर केँ कमरे सें निकलती अलीना केँ भारी होँ गये थें.
सूरज कि पीली रौशनी अब थोड़ी सुर्ख होनेलगी थि …
गली केँ नुक्कड़ पऱ पहुंचते हि सामने सें ज़ोया आँ रही थि, बाज़ार सें लौटती हुईँ।
अलीना थमती हैं।
ज़ोया भि रुकती हैं।
कुछसमय दोनों केँ बीच चुप्पी छा जाती हैं।
अलीना (भीगी आवाज़ मे):
"। एक् मिनट। मुझे तुमसे कुछ कहना हैं…"
ज़ोया (आदब सें):
"जी। फरमाइए.। "
अलीना नें अपना चेहरा फेर लिया। जैसे लहजे मे कुछ काँपरहा हौ। फिन स्वयं कों समेटकर बोलती हैं:
अलीना:
"सहबाज। उसे लकवामार गय़ा हैं…
कलरात… उसकेआधे शरीर नें काम करनाबंद कर दिया…
डॉक्टर नें कहा हैं कि शायदअब वोँ कभीठीक नं हौ पाए…"
ज़ोया कि आंखें फैल जाती हें — वोँ अवाक़ सि रह जाती हैं।
ज़ोया:
"क्याँ…?"
अलीना (टूटते हुए):
"हाँ…
शायद… शायद अल्लाह नें उसके गुनाहों कि सजाइसी दुनिया मे दे दि…
जोँ दर्द उसने तेरी दिया…आज वही दर्द उसकी रगों मे ठहर गय़ा हैं।
वोँ अब मात्र देख सकता हैं… बोल सकता हैं… मगरचल नहि सकता…"
ज़ोया कुछ नहि कहती, बस सुनती हैं। अलीना अब औऱ लगभगआती हैं, हाथ जोड़ लेती हैं।
अलीना:
"मे अम्मी हूं… औऱ तूँ भि बेटी जैसी हि लगती हैं।
तुझसे इल्तिज़ा करती हूं… एक् बार…बस एक् बार उससेमिल लेँ…
मिलकर उसे माफ़ीदे दे.…
वोँ अब भि स्वयं कों कोसरहा हैं।
तेरी एक् नज़र… एक् लफ्ज़ कि ज़रूरत हैं उसे…
ताकिचैन केँ दो आंसूरो सके। "
ज़ोया कि आंखें अब भीगी हुईँ हें।
उसने स्वयं कों बहोत मज़बूत कर लिया थां…
मगर एक् मां केँ आंसूउसे पिघला देते थें। अभि अभि सिकंदर सें फिन सें धुथकारे जाने पर्र.उसे अंदर भावनाओ कां समंदर उमड़परा थां.
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
"अच्छा…
मे मिलूंगी…
पऱ केवल इंसानियत कि वजह सें…
जौ कुछ मेने झेला, वोँ माफ करने लायक नहि…
मगर शायद उसकी हालत नें उसकी सज़ा मुकम्मल कर दि हैं। "
अलीना - सुक्रिया मेरी बच्ची। वैसे गुनहगार तौ तेरीमै भि हूं। पर्र मेनेइसे भि कईबड़ा गुनाह किया हें। जिसकी सजा अल्ला**ह अब सायदकबर तक पंहुचा कर हि माने.
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कमरे मे हल्की रौशनी हैं।
दीवार केँ संग एक् बेड पड़ा हैं — उस पऱ सहबाज आधाबदन बेजान लिए लेटा हैं।
उसके एक् हाथ मे ड्रिप लगी हैं, चेहरा ज़र्द पड़ा हैं, आंखें पथराई हुइ हें।
वोँ कमरे कि दीवार कों देखरहा हैं — जैसे ज़िंदगी अब उसकेपास नहि, बस सामने सें गुजररही हैं।
तभी द्वार (दरवाज़ा) खुलता हैं — ज़ोया अंदरआती हैं।
सहबाज कि आंखें उसकीतरफ घूमती हें।
वोँ कुछसमय कुछसमझ नहि पाता, फिन होंठ कांपते हें…
सहबाज (कमज़ोर आवाज़ मे):
"त। तुम् …?"
ज़ोया चुप रहती हैं। उसके चेहरे पऱ कोई नफ़रत नहि — एक् शांत ठंडक हैं।
वोँ बेड केँ पासआकर खड़ी होती हैं।
सहबाज (रोतेहुए):
"मुझेमाफ करदो …
मैंने तुम्हें बहोत तकलीफ दि… बहोत…
मैंने जौ किया, उसकाकोई एक्सक्यूज़ नहि…
अब तौ मेरीआधी रूह भि मेरी दुश्मन बन गई हैं…
बस एक् बार…कह दो… कि माफ किया…"
ज़ोया कि आंखें भरआईं, पऱ उसने स्वयं कों काबू मे रखा।
ज़ोया:
"मे तुम्हे माफकर चुकी हूं …
मै किसी सें बैर नहि रखती। मेरारब मुझे इसकी इज़ाज़त नहि देता.
सहबाज कि आंखों सें आंसू बहते हें।
वोँ अपने एक् काम करने वालेहाथ सें ज़ोया कां हाथ थामने कि कोशिश करता हैं।
सहबाज:
"क्याँ… हम् यारबन सकते हें…
बसयार…?"
ज़ोया थोड़ी देर तक उसे देखती हैं… फिन हौले सें सिर हिला देती हैं।
ज़ोया (धीरे-धीरे सें):
"हां… हम् यार रहेंगे…
मगर वोँ यार…
जोँ एक्-दूसरे कों कभी तकलीफ नहि देंगे। "
कमरे मे सन्नाटा हैं — मगरअब वोँ सन्नाटा बोझ नहि हैं…
बल्कि एक् नई शुरुआत कां इशारा करता हैं।
सहबाज मुस्कुरा देता हैं — आंखों मे चैनलिए।
औऱ ज़ोया… उसके चेहरे पर्र भि एक् राहत हैं।
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ज़ोया औऱ सहबाज केँ बीच वोँ दिलछू लेने वाली बातचीत बस समाप्त हि हुईँ थि कि…
ज़ोया कि जेब मे रखे मोबाइल कि घंटीबज उठती हैं।
**स्क्रीन पऱ नाम चमकता हैं: "Sikandar Calling…"
ज़ोया कां चेहरा पलभर कों फकपड़ जाता हैं।
जैसे उसकी बेवफाई पकड़ी गयीँ, होँ।
जैसे उसकाकोई ऐसा राज़खुल गय़ा होँ, जोँ शायद नहि खुलना चाहिए थां।
पऱ फिन… वोँ स्वयं कों संभालती हैं, गहरी सांस लेती हैं, औऱ कॉलआई रिसीव करती हैं।
ज़ोया (धीरे-धीरे औऱ नर्म आवाज़ मे):
"हेलो…"
सिकंदर (धीमेमगर शिकायती लहजे मे):
"कहां होँ ज़ोया…?
मे तौ आज तुम्हें खाने पे लेँ जाने वाला थां… याद हैं नां?"
ज़ोया एक् समय कों नजरें झुका लेती हैं, अलिना कि आंखें उस पऱ गड़ी हें।
सहबाज भि मोबाइल कि आवाज़ सुनरहा हैं — उसके होठों कर वहीं जानी पहचानी मुस्कान आँ जाती हें।
ज़ोया (थोडा रुककर):
"वोँ। वोँ.हाँ… मुझेयाद हैं…
बस… मे अपनी एक् सहेली सें मिलने आई हूं… थोड़ी तबीयत ख़राब थि उसकी। "
सिकंदर (थोड़ी खामोशी केँ बाद):
"ठीक हैं…
फिनजब फुर्सत मिले, तोँ बताना। "
ज़ोया (तड़पकर। जिसे सिकंदर कों नहि वोँ स्वयं कों झूठबोल रही होँ):
"ठीक हें। अच्छा सुनो नाँ। तुम् मेरीजान हौ। बहोत प्रेम करती हूं तुमसे."
सिकंदर - जनता हूं.
फोनकट होता हैं।
सहबाज कि ओर नज़र जाती हैं —
उसके होंठों पर्र एक् बेहद हल्की, मगर सच्ची मुस्कान तैर जाती हैं।
सहबाज (धीरे-धीरे सें, कांपती आवाज़ मे):
"झूठ…मगर… कितना हसीनझूठ थां यह…
ज़ोया उसकीतरफ देखती हैं — उसके चेहरे पर्र अफसोस पछतावा झलकरही थि।
ज़ोया:
"हरसच ज़रूरी नहि होता…
कुछ झूठ रिश्तों कों टूटने सें बचाते हें…
औऱ कुछ… टूटे दिलों कों मरने सें रोकते हें। "
तभी उनकीनजर सामने खड़ी अलीना पर्र पड़ती हैं…
जौ चुपचाप सभीसुन रही थि।
उसका चेहरा बहोत कुछ बयांकर रहा थां — वोँ मुस्कुरा भि रही थि… औऱ उसकी आंखों मे नमी भि थि।
अलीना (धीरे-धीरे सें, ज़ोया कि तरफ बढ़ती हुइ):
"कभी-कभी…
हम् माँएं अपने बच्चों केँ लिएसच सें बड़ी लड़ाई लड़ती हें…
तुमने आज जोँ किया, वोँ शायद मेरी दुनिया कि सबसे बड़ी रहमत थि।
ज़ोया उसे देखती हैं — अब उनकेबीच कोई दीवार नहि बची।
"अब आरामकरो… यार।
मे फिन मिलूंगी…
जबदिल चाहेगा, बेझिझक बातकर लेना। "
ज़ोया अब कमरे सें बाहर् निकलने लगती हैं,
औऱ अलीना उसके पीछेचल देती हैं —
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राहिल अपनी बाइक पऱ थां, जा हि रहा थां कि एक् कोने मे खलबली दिखी।
काले शीशों वाली सफेद SUV वाहन खड़ी थि।
कार केँ चारों ओरकुछ लोकल लड़के हल्ला मचारहे थें।
कभी बोनट पऱ लात, कभी विंडशील्ड पर्र हाथ— जैसे मार्ग कि कोई लड़ाई वहींआकर फूट पड़ी थि।
अंदर बैठी थि मलिका — बड़ी नजाकत औऱ गुस्से मे,
पलकों पर्र ऐटीट्यूड औऱ होंठों पर्र क्रोध।
ड्राइवर बाहर् आकर समझारहा थां — पऱ वोँ लौंडे कहां सुनने वाले थें।
राहिल (बाइक रोकते हुए, स्वयं सें बड़बड़ाता हैं):
"अबेओ चिलगोजों कि फौज! क्याँ कररहा हें बे?"
(बाइक खड़ी करता हैं, कॉलर सीधा करता हैं औऱ सीधाउन लड़कों केँ बीच पहुंचता हैं)
राहिल (तेवर मे):
"चाचा कि बारात समझरखी हैं?
शराफत सें हटो नहि तौ कान केँ निचे लगूंगा, चोध्या जाओगे"
लड़के- राहिल भइयाजाओ हमारे मामले मे मतपड़ो.
राहिल (मुस्कुरा कर):
"अबे तेरे जैसेदो कों तौ मे रजाई मे लपेट केँ डोसाबना दूँ।
चल निकल दोस्त, मैडमजी कों परेशान मतकर!"
थोड़ी देर कि बहस केँ बाद लड़के भागते हें।
राहिल मुड़ता हैं औऱ कार कि खिड़की पर्र दस्तक देता हैं।
खिड़की नीचे होती हैं औऱ… सामने हैं मलिका बेगम, उनकेसंग दोनों बेटियाँ — ईरा औऱ सुहाना।
मलिका (नज़ाकत सें):
"ओ। तौ तुम् हौ.
राहिल:
मैडमजी लगता हें आपका औऱ मेराकोई बहोत गहरा रिस्ता हैं। सालाहर बार आपके दर्सन होँ जाती हें.
ईरा (चश्मा उतारते हुए, sarcastically):
"ग्रेट। एक् औऱ रोडसाइड फलसफार."
राहिल (हंसते हुए):
"फलसफार? नहि मैडम, असली वाला गुंडा हूं …
अब आप् तोँ जानती हि होगी। "
सुहाना (हंसते हुए):
"संस्कार वाले गुंडे? क्याँ नया नेटफ्लिक्स केटेगरी हें?"
मलिका (मुस्कुराते हुए):
"तुम्हारा स्टाइल थोडा अलग हैं…
Security Guard बनोगे मेरेलिए?"
राहिल (आंख मारते हुए):
"सिक्योरिटी गार्ड याँ बॉडीगार्ड?
क्युकि सलमान भइया वाली एंट्री तो फ्री मे दूंगा, मगर मां शपथ लॉयल्टी फुल HD मिलेगी!"
ईरा (आंखें घुमाते हुए):
"मोम प्लीज, इस बन्दे नें तो पहले हि मुझेबोर कर दिया …
मुझे डाउट हें यह gun चलाने केँ बजाये लड़कियों सें जुतिया खाता होगा!"
राहिल:
"मैडम, gun भि चलता हूं, औऱ डायलाग भि …
Mukkader kaa sikander – New Episode
Alina wo dayan hu joo hammesha sikander ko takleef deta h अब joya ko dur krr दिया h bahla krr
kahani badhiya h halanki kirdar sikander के alawa कोई damdaar nahii।
or dusra। dushmani hasan badhiya laga baaki saare kirdaar unch nich h
Chahe woh joya hu yaa aleena yaa rahil
lekin me chahunga sikander joya ko v saja de iss galti kaa
Warna। Kirdaar sikander kaa mazaa nahii aayega
Shandar update too Hasan mirza ne malika ko rahim ko apne jaal mai pasa krr usse gold kaa ptaa lagane kaa kaam sofa h Dekhte h vo ismein kamyab hoty h ya nahee
Mukkader kaa sikander – New Episode
yeh"mukkader kaa sikander" kahani से related post nahii h yeh मेरे एक close dost के real life experience h joo mai यहाँ shere ker raha ho। ap sub अपना oppion देना.
मे अभय शर्मा हूं। मेरे पिताजी, जिनका नाम(अब इस दुनिया मे नहि रहे)—अमर शर्मा—सरकारी ठेकेदार थें। मेरी मां, संध्या शर्मा, SBI मे बैंक मैनेजर हें।
यह स्टोरी 2018 कि हैं, जब मैंने NEET कां एग्जाम दिया थां। अच्छे नंबर नहि आए, तोँ मेरे पिताजी नें मुझे विदेश भेज दिया। वहा मुझे एक् अच्छे मेडिकल कॉलेज मे एडमिशन मिल गय़ा औऱ मैंने MBBS कि पढ़ाई शुरुआत कर दि।
बीच मे 2019 मे मे इंडिया वापसआया। घऱ पऱ सभीकुछ ठीक-ठाक लगरहा थां, याँ शायदबस मुझेऐसा दिखाया जारहा थां। मैंने एक् महीना घऱ पऱ गुज़ारा, मगर मेरे अंदरकोई शक नहि उठा कि मां-पिताजी केँ बीचकुछ ठीक नहि हैं। शायद मे उस टाइम बेफ़िक्र थां, याँ ध्यान हि नहि दे पाया।
फिन मे वापस आयरलैंड चला गय़ा औऱ मोबाइल पर्र बात होती रही—मम्मी औऱ पिताजी सें। मुझेआज भि याद हैं कि वेकभी एक् संग मुझसे बात नहि करते थें। कभीजब मे पिताजी सें बात करता तौ वे कहते, “माँ अभि बाहर् गई हें, ” याँ “वोँ अभि काम मे बिज़ी हें। ” उस वक्त मे बच्चा थां, इनसभी कों समझ नहि पाया।
(ये मेरी ज़िन्दगी कां वोँ हिस्सा हैं जहाँ मैंने उसकी गहराई महसूस नहि कि—मगर आज पीछे मुड़कर सोचता हूं तौ लगता हैं कि उस दूरी मे शायदकुछ अनकही बातें औऱ टूटते हुए रिश्ते समाए थें। )
मे लॉकडाउन केँ वक़्त वहीं आयरलैंड मे फंस गय़ा।
मां औऱ पिताजी हमेशा मुझेकॉल आई करके हाल-चाल पूछते। कभी-कभी मोबाइल पर्र मां बहोत रोती, “बाबू। तुँ जल्द सें वापस आँ जा, तेरे बिनायहा जी नहि लगता मेरा। ” मे समझाता, “मम्मी, अभि लॉकडाउन हैं, केसे आँ सकता हूं?कहती यह मोदीकुछ करता क्यूं नहि। बच्चों कों उसकेमाओ केँ पास लाएगा याँ फिन भाषण देता फिरेगा। मैहस देता उनकी बातों पऱ.
खैर, फिन 2021 मे मे वापस भारत आया—मेरी MBBS कि पढ़ाई करीब-करीब समाप्त हौ चुकी थि, बसकुछ महीने बचें थें। इंडिया आते हि पिताजी मुझे एयरपोर्ट पर्र रिसीव करनेआए, पर्र उनकेसंग मां नहि थीं। मुझे बुरालगा। लगा, काम मे कितने बिजी होँ गई, हें कि अपने बेटे केँ लिए भि टाइम नहि हैं।
जब मैंने पिताजी कों देखा तौ बहोत परेशानी हुईँ। उनकी उम्र केँ दससाल ज़्यादा लगरही थि —चेहरे पर्र सूखी लकीरें, गाल औऱ कलाई कि हड्डियाँ उभरी हुईं। मुझसे लिपटकर वोँ रोनेलगे। पहलीबार मैंने अपने पिताजी कों रोतेहुए देखा। मुझेलगा कि इतनेदिन बाद मुझे देखकर हि उनकी आँखें भरआईं। सच कहूं तौ, बाप कों रोता हुवादेख कर कालेजा फट जाता हें.—उनके आँसुओं कों देखकर दिल चकनाचूर हौ गय़ा।
हम् घऱ कि ओर निकलगए। रास्ते भर बापू चुपचाप कारचला रहे थें, हम् दोनों मे अधिक बातचीत नहि हुइ—वैसे भि मे उनसे अधिकबात नहि करता थां।
घऱ पहुँचकर मैंने स्वयं कों फ्रेश किया, मगर पिताजी मुझे छोड़कर फिनकाम पर्र निकलगए। उन्होंने कुछ नहि बताया—औऱ मुझे भि सभीकुछ ठीक-ठीक लगरहा थां, तोँ मैंने कुछ पूछने कि ज़हमत नहि उठाई।
मै मां कां इंतज़ार कररहा थां। वोँ दफ़्तर सें साम 5 बजेआती थि.मैघऱ मे अकेला घूमता रहा। पऱ एक् बात मेनेनोट कि मुझे मां कि कोई भि सामान घऱ पऱ नहि दिखा.
साम पाँचबजे तक घऱ मे अकेला घूमता रहा, इंतजार करतारहा कि मम्मी कब आएँगी— बजगए, छह बजगए, फिन सातबज गए… मां नहि आईं।
फिन मैंने उन्हें मोबाइल किया तौ बोलीं, “क्याँ, तूँ इंडिया आँ गय़ा हैं? मुझे तोँ पता हि नहि थां!”
मे चौंक गय़ा, “मे पिछले हफ्ते हि पिताजी कों बताया थां कि मे आँ रहा हूं। बापू नें आपको नहि बताया क्याँ?”
उन्होंने बात घुमा दि औऱ कहा, “मे बहोत बिजी थि, ध्यान हि नहि रहा होगा। ”
उस वक़्त मे हतप्रभ रह गय़ा—कितनी दूरियाँ हमारे बीचबढ़ गई थीं, औऱ मे जानता थां कि अबकुछ प्रश्न थें जोँ जवाबचाह रहे थें…
वोँ मेरेकॉल आई करने केँ 15 मिनटबाद आईं। बापू केँ बिलकुल उल्टे—उसकी आँखों मे काजल, पूरे चेहरे पर्र मेकअप, नयी साड़ि, गले मे झिलमिलाती शुनरी हार, कान-नाक मे झुमके औऱ बाली… मैंने मम्मी कों कभी इतना सजते धजते नहि देखा थां। लगरहा थां जैसे अभि-अभि विवाह हुई हौ।
वोँ मुझे देखते हि रोनेलगी औऱ मुझे कसकरगले सें लगा लिया। पर्र मे गुस्से मे थां—। मैंने उन्हें दूरकर दिया औऱ गुस्से सें कहा, “कहां थि आप्? आपका दफ़्तर तोँ पाँचबजे समाप्त हौ जाता हैं, फिन भि अभि आठ बजने कों हें औऱ आप् अभि घऱआई हें! अगर मे नहि मोबाइल करता तोँ आप् औऱ देर तक आतीं!”औऱ यहसभी क्याँ हें। आपने इतना मेकउप क्यूं किया हें। कहां गई, थि आप्.
वोँ कुछ सेकंड केँ लिए खामोश रह गई, जैसे उसने मेरेइस प्रश्न कि उम्मीद हि नहि कि थि। कोई भि मम्मी कों ऐसा सज-धजकर घऱआते देखता तौ सबसे पहला प्रश्न यही होता, ‘माँ कहां थि?’… औऱ मे भि वहीसोच रहा थां, इसलिये क्रोध आया।
उसने धीरे-धीरे सें जवाब दिया, “तुँ क्यूं क्रोध होता हैं? बाद मे सभी समझाऊँगी, पहले बापू कों घऱआने दे। ”फिन उसने पूछा, “तूँ नें खानां खाया?”
मे उचकता हुआ बोला, “खानां केसे खाऊँ…जब आपको बाहर् घूमने कां फुरसत नहि हैं तोँ मुझेकौन खिलाएगा?”
वोँ कुछ लम्हा मेरी आँखों मे ताकती रही, फिन बोलीं, “ठीक हैं, तूँ जा अपने कमरे मे, मे रसोई मे तेरेलिए खानां बनाती हूं। ”
मैंने सिर हिलाया औऱ कमरे मे आकर पीसी चालूकर गेम खेलने लगा, जबकि पीछे सें उसकी कदमों कि आहट आँ रही थि—औऱ मोबाइल पऱ किसी सें बातें करतेहुए वो किचन मे जानेलगी।
जब हमने खानां खा लिया, तब पिताजी आए। फिन दोनों नें मुझे अपने सामने बिठाया औऱ बापू नें पहले बोला, “तुम्हारी मां औऱ मे अबअलग होँ गए हें… हमारा डिवोर्स हौ गय़ा हैं। यहबात हम् तुमसे बताना चाहते थें, पऱ हमेंलगा तुम्हारे पढ़ाई पर्र असर पड़ेगा, इसलिये नहि बताया। ”
यह सुनते हि मेरा पूरा जहां उजड़ गय़ा। मे रोनेलगा औऱ गुस्से सें उन्हें देखने लगा। वे दोनों मेरी आँखों मे देखरहे थें। मे उन्हें किसी गुनहगार कि तरह ताड़रहा थां।
बापू शायदसमझ गए। तौ उन्होंने कहा, “मेरीकोई गलती नहि हैं। तुम्हारी मां कों दफ़्तर मे एक् व्यक्ति सें प्रेम होँ गय़ा, जिसके कारण उसने मुझे औऱ तुम्हें छोड़ दिया। ”
यह सुनकर मम्मी भड़कगईं औऱ बोलीं, “मैंने तुम्हें छोड़ा हैं? अपने बच्चे कों नहि। तुम् मुझे उसके नज़रो मे गिरना चाहते हौ!” दोनों मेरे सामने हि आपस मे लड़ने लगे।
पर्र अब मुझे मम्मी पऱ अधिक क्रोध आँ रहा थां। मे अपना काबू खोताजा रहा थां… घऱ कि चीजें इधर-उधर फेंकने लगा, सामान तोड़ने लगा। फिन मम्मी केँ पास गय़ा औऱ उससे पूछा, “बताओ, क्यूं किया तुमने ऐसा?”
पीछे-पीछे मम्मी नें बताया कि बापूउसे मारते-पीटते थें… इसलिये उसने पिताजी कों छोड़ दिया थां। मगरयह बातसच नहि थि। मैंने बचपन सें आज तक पिताजी कों कभी मां सें लड़ते हुए नहि देखा थां—उल्टा मम्मी हि कभी-कभी उन्हें डाँट दिया करती थि। मुझेपता थां कि मम्मी झूठबोल रही हैं।
तौ उसरात मैंने दोनों मे सें बापू कों चुना। रात केँ दोबजे मैंने मां कों घऱ सें धक्के मारकर बाहर् निकाल दिया थां। मेरे सिर पर्र गुस्से कां खून सवार थां। मुझेआज भि याद हैं जब वोँ मेरे पैरों मे गिरकर मेरे घुटनों सें लिपटकर रोरही थि—तब मैंने उसके बालों सें पकड़कर उसेघऱ सें बाहर् धकेल दिया थां.
अब मुझे बुरा लगता हैं… मुझेऐसा नहि करना चाहिए थां, पर्र मे अपने गुस्से पर्र काबू नहि रख पाया थां। मेरा दिमाग़ पूरीतरह गुस्से मे धुँधला गय़ा थां…
सुभह … मम्मी मेरे दोनों मामाजी कों लेकर आँ गई थीं। मे उस टाइम सोया हुवा थां.। बाहर् आया तौ देखा मेरे दोनों मामाजी, पिताजी कों पिटरहे हें —उनकेसर सें खून आँ रहा थां। मम्मी नें मामाजी कों बोला थां कि बापू नें मुझे मम्मी केँ खिलाफ भरकया हें। औऱ कलरात पिताजी नें मां कों मारा हैं। पऱ यहझूठ थां। पिताजी नें ऊँगली तक नहि उठायी थि कलरात मां पर्र। जौ भि किया थां मेने किया थां। पऱ वोँ सारे जख्म दिखाकर जोँ कि मेरे कारण हुवे थें.पिताजी कों फसारही थि.
मुझसे देख नहि गय़ा। मैंने दोनों मामाजी पर्र भि उसदिन हाथउठा दिया। छोटे मामाजी कां हाथ तोड़ दिया मैंने। मम्मी कों मे गंदी-गंदी गालियाँ देतारहा… वोँ बस रोतीरही। उसकानया पति भि वहा थां, पऱ वोँ शांतखड़ा रहा, कुछ नहि कहरहा थां।
फिन पुलिस आँ गई। मुझे पुलिस स्टेशन लें जाया गय़ा, जहाँ मेरेऊपर phir दर्ज होँ गई। पुलिस स्टेशन मे बहोत शोर हुवा.मगर बाद मे मेरे मामाजी नें केस वापस लें लिया…
फिन सायद मेरी मां कों लगा कि मै बापू केँ मैसंग इसलिए हूं क्यूं कि सारी प्रॉपर्टी उनकेनाम हें.यह बातउसे उसकेनए पति औऱ मायके वालों नें बताई होगी.इस लिए उसनेफिन सें मुकदमा दर्ज करवाया पिताजी पऱ। औऱ हमारे आधी प्रॉपर्टी मेरे मम्मी कि नाम हौ गयीँ,। सुकर थां कि उसने हमारा घऱछोड़ दिया.घऱ हमारे पासरहा नहि तोँ हम् बेघर होँ जाते.
मेने कोर्ट मै उनसेकहा भि कि अगर आपनेऐसा किया तोँ मेरे हाथों सें आपकोआग तक नसीब नहि होगी। पर्र उसनेफिन भि ऐसा किया.
मेरे शब्दचुभ रहे थें—जैसे कोई जि़ल्दी खंजर। लड़की-सि-नाजुक दिखने वाली मम्मी मेरे सामने अब रौबवाली स्त्री बनआई थि, जिसने मेरे पिताजी कि सारी जायदाद अपनेनाम कराने केँ लिए मुकदमा कर दिया थां।
मां नें मेरीओर देखा—आँखों मे क्रोध, होंठों पऱ लोहे कि ठंडक—औऱ धीरे-धीरे बोलि, “अभय, यह फैसला मैंने तुम्हारे लिए लिया हें। अबआधी प्रॉपर्टी मेरेनाम हें। तोँ अब तुम्हे अपने बापू सें दरने कि जरुरत नहि हें। मै जानती हूं तुम् मुझसे बहोत प्रेम करते हौ तोँ अब मेरेपास आँ जाओ। अजीबबात थि.मेरी मम्मी कों लगरहा थां यहसभी मै प्रॉपर्टी केँ लिएकर रहा हूं.
मे बोला, अब तुम् मर चुकी हौ मेरेलिए। मर जाऊंगा पर्र तुम्हारे सामने हाथ नहि फिलाऊंगा.
मुझेआज भि याद हें कोर्ट रूम केँ बाहर् हमारी बातें होँ रही थि। मेरेइस जवाब कां उसे अंदजा नहि थां.वोँ थिरकती आवाज़ मे बोलीं,। अभय। तुँ मेरा बेटा हैं। यहमै तुम्हे कभी भूलने नहि दूंगी.औऱ वोँ इंसान जिसके लिए तुँ मुझसे लड़रहा हैं। वोँ मुझे हमेसा मरता पीतता थां.पर्र तूँ उसकी side लें रहा हें
मैंने अपनी उंगली उसकीतरफ उठाई, “मां, झूठ केहना बंदकरो! बचपन सें लेकरआज तक, मैंने कभी बापू कों तुम्हारे हाथ पऱ चोट लगाते नहि देखा—मगर अब तुम् राज़खोल रही होँ कि उन्होंने तुम्हें मारा-पिटा!
खैरकुछ दिनों बाद एक् एक्सीडेंट मे मेरे पिताजी चलबसे। मै अकेला रह गय़ा.वोँ मेरे पिताजी कों एक् अंतिम बार देखने तक नहि आयी.अब मै अकेला थां। कोई अपना नहि। पर्र मेने फेसबुक पर्र देखाअब वोँ बिधवा वाली ज़िन्दगी जीरही हें। उसके दूसरे पति केँ ज़िंदा रहते हुवे भि उसने सिंदूर लगाना छोड़ दिया हें.उसका दूसरा पति सायदउसे छोड़ चूका हें। मां अब बिंद्रावन मे रहनेलगी हें.वहां साध्वी बन गयीँ, हें.फेसबुक पऱ पोस्ट करती हें अपनी पूजा कि बिध्यान। जॉब भि सायदछोड़ दिया हें। अभि भि जवान हसीन दिखती हें। बोलने मे वही मिठास हें। फेसबुक पऱ लाइवआती हें तौ कितनी बार मेरा जिक्र कर चुकी हें। मेरा बेटा डॉक्टर हें। मेरा बेटा सबसेअलग हें। मेरा बेटा मेरे जैसे दीखता हें.पर्र कभी मेरानाम नहि लेती.उसे सायद पाता हें मे उसे देखता हूं। उसके प्रवचन सुनता हूं.पऱ अभि भि मेरेलिए चिठ्ठी लिखती हें। कभीकभी मन करता हें लेँ आउयहा अपनेपास बेंगलोर.( मै अभि बेंगलोर मे सर्जन हूं)। पऱ फिन पिताजी कां चेहरा सामने आँ जाता हें। पऱ क्याँ करू मम्मी हें। चिंता होती हें।
मेरे एक् मित्र कि सादी मां मायके मे हि हुवी हें। मै भि बारात गय़ा थां। तब अंतिम बारउसे देखा थां। (मेराअब उसके मायके वालों सें भि रिस्ता टूट चूका हें। मै उनसे भि अब कॉन्टेक्ट मै नहि हूं.)। पर्र पूरीरात वोँ बावली केँ तरह मेरेआगे पीछे करतीरही। मेरे कॉलेज केँ यारपूछ रहे थें यह महिला कौन हें। अब क्याँ बोलता उन्हें मां हें मेरी।
Mukkader kaa sikander - Next part miss mat karna
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