Mukkader kaa sikander – New Episode
रातअब ढलने कों थि। पूरब सें हल्की सि लालिमा फूटरही थि, जैसे आसमान नें स्वयं भि खून सें रंग लिया हौ।
, सर सें टपकता लहू, हाथ कांपरहे थें… पऱ उस ज़िद्दी जानवर नें फिन भि मोटरसाइकिल कि हैंडल थामरखी थि।
ज़ोया उसके पीछे थि, दोनों हाथों सें उसे थामे… कांपती, डरी हुइ, आँखों सें बरसते आँसू उसकेपीठ पऱ गिररहे थें।
"रुकोमत सिकंदर… बस थोड़ी दूर औऱ… प्लीज़…"
वोँ बुदबूदाई।
सामने सड़क खाली थि। फिन एक् छोटा बोर्ड झूमता दिखा—"शिफ़ा क्लिनिक"।
सिकंदर नें ब्रेक लगाया, मोटरसाइकिल रुकी।
ज़ोया नें एक् समय कों उसकी हालत देखी—चेहरा पीलापड़ चुका थां, होंठसूख चुके थें, औऱ आँखों मे अजीब सि थकान थि… मगरफिन भि वोँ गिरा नहि।
उसी टाइम पीछे सें अलीना कि काली गाड़ी तेज़ ब्रेक सें रुकी।
वोँ जल्दी उतरी, दुपट्टा खींचती हुई सिकंदर कि तरफ भागी।
"सिकंदर! तुनेयहा क्यूं रोकी बाइक?इस कुटिया जैसे क्लिनिक मे क्यूं?"
उसकी साँसें उखड़रही थीं।
सिकंदर नें उसकीतरफ देखा भि नहि।
"सामने अस्पताल हैं। यहीं इलाज हौ जाएगा, " वोँ थकान मे भि शांत थां।
"नहि! मे कहरही हूं बड़े अस्पताल चलते हें, तुम्हें समझ नहि आता क्याँ?"
अलीना कि आवाज़ काँपरही थि—मगर गुस्से सें नहि, बेबसी सें। सारे गार्ड। उसकेआगे पीछे करने वालेलोग। सभी हैरान थें। कि मिलाकये नवाब। एक् लड़के केँ सामने इतनी बेबस क्यूं हैं.
सिकंदर नें उसके चेहरे कि तरफ देखा। कुछ देर तक बसउसे घूरता रहा…फिन बोला.
"मेरेपास पैसे नहि हैं, मैडम। बड़े अस्पताल afford नहि कर सकता। "
यह सुनकर अलीना कां दिल जैसे किसी नें निचोड़ दिया हौ… आँखें खुली कि खुलीरह गईं।
उसने धीरे-धीरे सें कहा:
"तुझेही पैसो कि चिंता क्यूं हैं.? मे हूं न्… मे सभी करूँगी… बसचल नाँ मेरेसंग…"
सिकंदर एकदम सें अपनासर झटका दिया।
उसने अलीना कि ओर देखा — उसकी आँखें अबलाल होँ चुकीथीं।
"सिकंदर किसी कां एहसान नहि लेता मेमसाहब l औऱ किसी केँ सामने हाथ भि नहि फैलता। आपको आपकी दौलत मुबारक.मै अपनी गरीबी मे ख़ुश हूं.। "
फिन धीरे-धीरे सें अपने जख्मो कों साहलता हुवा बोलता हैं.
"आजअगर ज़िंदा भि रहूं… तोँ अपनेदम पऱ। तेरे तेरे अहसानो तलेदब कर नहि। "
अलीना केँ सकपका जाती हैं.
उसके होंठ कांपे, पऱ कोई शब्द नहि निकला। वोँ चीखकर कहना चाहती थि। यह सारी दौलत तुम्हारी हैं। तूँ मेरा बच्चा हैं। मेरीहर चीज तेरी हैं। पर्र हिम्मत नहि हुवी.
ज़ोया, जौ अब तक चुप थि, आगे बढ़ी…
उसने सिकंदर कां हाथ थामा औऱ बोलि:
"चलो अंदर… मे हूं नां तुम्हारे संग। "
सिकंदर नें फिन एक् नज़र अलीना पऱ डाली — जैसेकोई अजनबी देखता हैं एक् दूरसे कों.।
वोँ चुपचाप ज़ोया केँ संग क्लिनिक केँ अंदरचला गय़ा…
अलीना वहीं खड़ीरही — हवा मे जमी हुइ एक् टूटी हुई स्त्री कि तरह…फिन भागकर उनके पीछे क्लिनिक मे घुस गयीँ,
---
1883838488489247834827338433
क्लिनिक केँ दरवाज़े पऱ एक् पुरानी घंटी कि आवाज़ होती हैं — टन-टन — औऱ फिनतीन परछाइयाँ भीतर दाख़िल होती हें।
सिकंदर केँ खून सें सने कपड़े, लड़खड़ाते क़दम, फिन भि आँखों मे वही ज़िद—“मे ठीक हूं ” वाली ज़िद।
नर्स (घबराई हुई, स्टूल सें उठती हैं):
“ओहमाय गॉड! इतनाखून… केसे हुवायह.
ज़ोया- गोलीलगी हैं.
नर्स - यह तौ पुलिस केस हैं। मै अभि पुलिस कों कॉलआई करती हूं.
सिकंदर ( उसे रोकते हुवे) - नहि। नहि कोई फ़ायदा नहि। जिसने यह किया हैं। पुलिस उसकी मुट्ठी मै हैं। पुलिस कुछ नहि करेगी.
अलीना कां चेहराह झुक जाता हैं। आँखों सें फिन सें बरसात सुरु होने लगती हैं। कालेजा कापने लगता हैं। पर्र वोँ कर भि क्याँ सकती थि। गलती तौ हौ गई, हैं उस सें.
नर्स( चिंता औऱ दया सें सिकंदर केँ तरफ देखते हुवे) डॉक्टर अभि शहर सें बाहर् हें… कम सें कमदो घंटे लगेंगे उन्हें आने मे…”
सिकंदर, अपनी पेशानी सें लहू पोंछता हैं,
“हाहाहा तब तक तौ मे मर जाऊंगा ?”
ज़ोया, कांपते होंठों सें उसकेहाथ पकड़ती हैं —
“प्लीज़… प्लीज़ ऐसामत कहो…कुछ नहि होगा तुम्हें… तुम्हें कुछ नहि होने दूंगी…”
उसकी आँखों सें आँसू उसकी हथेलियों पऱ गिरते हें, पऱ सिकंदर केँ चेहरे पऱ एक् अजीब सि मुस्कराहट उभरआती हैं… दर्द मे भि ठहाका मारने कि हिम्मत लिएहुए।
तभी अलिना दौड़ती हैं…
, एक् टूटी हुइ मम्मी। जोँ अपने बच्चे केँ मुँह सें निकले शब्दसुन नहि पायी।
वोँ सिकंदर केँ पासआकर उसे अपने सीने सें लगाना चाहती हैं — पऱ…
सिकंदर कां हाथ एक् झटके मे उसेदूर कर देता हैं।
उसका चेहरा तमतमाया हुआ,
“हाथमत लगा मुझे…”
अलिना वहींथम जाती हैं… मानो किसी नें उसके सीने केँ आर-पार छुरा घोंप दिया होँ।
वोँ बस वहीं खड़ीउसे अपनी बेबस आँखों देखती रहती हैं — बेबस, लाचार — जैसे टाइम कां हर सितमउसी पऱ ढह गय़ा हौ।
अलिना काँपती आवाज़ मे:
“मे दूसरी डॉक्टर साहिबा कों फोनकर रही हूं… अभि बुलाती हूं यहां…”
सिकंदर, जोँ अब तक कुर्सी पऱ बैठ गय़ा थां, वोँ फिन उठकर चिल्ला पड़ता हैं —
“तुम्हारी तरफ सुनाई नहि देता क्याँ? क्यूं मेरे पीछे पड़ी हैं तूँ?
जा यहां सें! जितना तेरे बेटे कों मारा, उससे हज़ार गुना तूने मुझे ज़ख़्मी कर दिया…
तेरा हिसाब बराबर हौ गय़ा अलिना …अब मुझे मेरेहाल पऱ छोड़दे। मुझे वोँ करने पऱ मजबूर मतकर जोँ मेरे बाप नें तेरेसंग किया थां!”
अलिना एक् लम्हा कों डरकर पीछेहट जाती हैं…आँसू आँखों मे नहि हें, पऱ दर्द उसकी साँसों मे लरज़रहा हैं।
फिन भि, वोँ मां हैं — ज़ुबान कि तल्ख़ी पर्र बेटे कि परेशानी भारी हैं।
धीरे-धीरे सें पासआती हैं, जैसेकोई बेज़ुबान अपनी औलाद केँ दर्द कों सहलाने कि कोशिश करता हैं।
नज़रों सें हि उसे सहलाने लगती हैं — वोँ नज़रों मे अफसोस नहि, दुआ हैं… इंतजार हैं… औऱ टूट चुकी उम्मीदें भि।
ज़ोया चुप हैं, उसकी आँखें भि सिकंदर कि धड़कनें गिनरही हें।
वोँ कुछ नहि कहरही, अब उसके आंसू भि सुख चूके हैं।
पर्र अबउसे यकीन होँ गय़ा थां कि सिकंदर कां इस स्त्री सें कुछ तोँ रिस्ता हैं.पऱ अब भि वोँ इस नतीजे पऱ नहि पहुंची थि कि यह स्त्री सिकंदर कि मम्मी हैं.
सिकंदर नर्स कि ओर देखता हैं:
“सर्जरी कां सामान निकालो…
मे स्वयं निकालूंगा गोली…
नर्स सन्न… अलिना सन्न… ज़ोया सन्न… पूरा क्लिनिक एक् लम्हा केँ लिएरुक जाता हैं।
जैसे वक्त नें भि उसकीजिद कों सलाम किया हौ।
25333633974474849374834484484444
छोटे सें टेबल पऱ रखे औज़ारों सें उठती स्टील कि ठंडीचमक उससमय केँ सन्नाटे कों औऱ भारीबना रही हैं।
सिकंदर, अब कमीज़ कि आस्तीनें मोड़ चुका हैं, अपनी कमीज़ कों फाड़कर अपनी जख़्मी छाती तक मार्ग बना चुका हैं।
उसकी आँखों मे दर्द नहि, बसजिद हैं… औऱ लहूबह रहा हैं जैसेहर बूंदकोई प्राचीन पलबहा रही होँ।
क्लिनिक कां रूम दवाओं कि महक सें भरा हैं।
नर्स धीरे धीरे सर्जरी केँ सारे औज़ार टेबल पर्र रखरही हैं — कैंची, सुई, टांके कां धागा, रूई, spirit — हर चीज़ कि आवाज़ उस भयानक खामोशी कों चीररही हैं।
नर्स
"'प्लीज़… प्लीज़ मतकरो ऐसा बेटा … infection हौ सकता हैं, shock लग सकता हैं…”
सिकंदर - आप् चिंता मतकरो मां जी। मुझेआता हैं यह करना.मुझे सिखाया गय़ा हैं.
सिकंदर कुर्सी पर्र बैठा हैं, सीने कां गहरा ज़ख्म साफ दिखाई देरहा थां …खून उसके मर्दानी शरीर पऱ सुखकर चिपक गयीँ, थि।
उसकी आँखें बिल्कुल शांत हें — जैसेउस दर्द कों महसूस हि नहि कररहा… याँ सायद दिखाना नहि चाहता थां।
दूर किसीघऱ सें रेडियो कि आवाज़ आँ रही थि.गाना बजरहा हैं.
"उम्रभर जी न् सकेगे। किसी केँ होँ नां सकेंगे"
"किसी बेगाने केँ खातिर तुमने अपनों कों भुला दिया."
ज़ोया, सिकंदर केँ पास बैठी हैं, उसकी आँखें लगातार बहरही हें — पर्र वोँ ज़ोर सें नहि रोरही… बस उसकी साँसें सिकंदर केँ संगडोल रही हें।
वोँ हर लम्हा उसेदेख रही हैं — जैसेहर पल उसकी ज़िंदगी कां आख़िरी हौ।
“प्लीज़… मेरीजान कि शपथ…मत करोयह स्वयं सें… मै नहि देख पायूँगी.मुझे कुछ हौ जाएगा…”
नर्स (धीरे-धीरे सें):
“यहलो … सभीकुछ रेडी हैं…”
सिकंदर बिनाकुछ बोले, सुई उठाता हैं… spirit मे cotton डुबोकर अपनाघाव साफ करने लगता हैं…
ज़ोया (धीमे सें, काँपती आवाज़ मे):
“किसे साबित कररहे होँ, सिकंदर.?
तुम्हे किसी कों साबित करने कि जरुरत नहि.मै जानती हूं। खु*दा जनता हैं। तुम् कितने मज़बूत हौ.
सिकंदर उसकीतरफ देखता हैं, मगरकुछ नहि कहता…बस needle उठाता हैं…
सामने — बेंच पर्र थोड़ी दूरी पऱ — बैठी होती हैं अलीना।
उसकी आँखें सिकंदर पऱ हि जमी हें…
हरबार जब वोँ सुई अपनी चमड़ी मे चुभाता हैं, अलीना कां दिलचीख उठता हैं …
वोँ अपनेहाथ आपस मे भींच लेती हैं… आँखें बंद करती हैं… फिनखोल देती हैं…
हरबार जब सिकंदर दर्द सें सांस रोकता हैं, अलीना जैसे स्वयं कों घुटते हुए पाती हैं।
संग मे गाने कि आवाज़। माहौल कों औऱ रुवासी बनारहा थां.
"मेरे यादोमै तुम् होँ। मेरे सासों मै तुम् हौ."
"मगर तुम् जाने कैसी। गलतफेमि मे गुम होँ."
तुम्हारे दिल कों मं*दिर.दे*वता तुमको बना लिया.
अलीना (मन हि मन):
“खु*दा मुझे मेरीजान कों लोटा दे.मर गयीँ, हूं इसके बिना.अब बसकर.अब इसे मेरी आँचलमै डालदे।
सिकंदर स्वयं अपनी छाती मे सुई डालता हैं… औऱ आहिस्ता टांका लगाने लगता हैं…
ज़ोया (फफककर):
“आआआ। धीरे-धीरे करो नां। दर्द होगा नां.”
सिकंदर कां हाथकुछ समय केँ लिए रुकता हैं… वोँ गहरी साँस लेता हैं… औऱ बोलता हैं —
सिकंदर (धीमे सें, प्रेम सें):
“अच्छा मेरे बदले कां दर्द मेरी जंगली बिल्ली कों होँ रही हैं क्याँ”?
533384=4(4775=94=593---4=4-594-
सुब्ह कां वक्त…सात बज चुके थें। आसमान मे हल्की नीली रौशनी थि, पर्र रात कि उदासी अब भि हवा मे तैररही थि।
क्लिनिक केँ भीतर सिला सिलाई पूरी होँ चुकी थि।
नर्स नें धीमे स्वर मे कहा,
“अब अधिक दर्द नहि होगा.बस थोड़ी देर मे आराम आँ जाएगा। मगर एक् पेन किलर अवश्य लें लेना। ”
ज़ोया धीरे-धीरे सें उठी, उसकी आंखें साफ करती हुवी बोलि।
“मे लेकरआती हूं… पास मे हि मेडिकल हैं। ”
औऱ वोँ तेज़ क़दमों सें बाहर् चली गई।
सिकंदर नें गहरी सांसली, औऱ थोडा लड़खड़ाते हुए क्लिनिक केँ दरवाज़े तक पहुँचा। जैसे हि उसने बाहर् कदमरखा…
अलीना नें जल्दी नज़रें उठादीं।
वोँ वहींपास केँ बेंच पऱ बैठी थि…
धीरे-धीरे सें उठी। फिन कुछ हिम्मत बटोरकर बोलीं —
“वोँ… मे कहरही थि कि… अबचलो नाँ, मे तुम्हें घऱ छोड़ देती हूं। तुम्हारी मोटरसाइकिल बाद मे मंगवा लेंगे…”
सिकंदर थमा, फिन बिना उसकीओर देखे ठंडी आवाज़ मे बोला —
“मैडमजी… आप् बड़े अस्पताल जाइए। आपका बेटा वहां इंतजार कररहा होगा। ”
यह लफ्ज़ सुनते हि अलीना कि फफक गई। उसकी आंखें फिनभीग गईं। वोँ कुछ लम्हा देखती रही सिकंदर कों… फिन अचानक पीछे सें दौड़कर उसे पकड़ लिया।
वोँ अब उसकीपीठ सें लगकर बिलखरही थि…
“ऐसी रुसवाई मतकर …
तेरे बिनामर जाऊंगी रे…
चल नाँ… मेरेसंग चल…घऱचल…
सिकंदर जैसेजमी हुईँ बर्फ़ बन गय़ा थां। उसने स्वयं कों छुड़ाने कि कोशिश कि,
“छोड़… छोड़ मुझे…
अब मे तुम को औऱ तेरी यादों कों अपनी ज़िंदगी सें निकाल चुका हूं…तुम्हारी तरफमै किसी बुरे ड्रीम्स कि तरह भुला चूका हूं। अब मुझे सुकून सें जीने दे.मुझे अकेला रहनेदे… अब मुझे तेरी जरुरत नहि हैं.तूँ अपनी ज़िन्दगी मे ख़ुशरह मे अपनी मे ”
अलीना कि चीखअब उसकी सांसों मे घुल चुकी थि।
वोँ सिकंदर कों औऱ ज़ोर सें पकड़ते हुए बोलीं —
“ऐसामत बोल… सिकंदर… तेरी खु*दा कां वास्ता हैं
चाहे मुझेमार डाल…
कहीं बांधकर रख…लाख सितमकर मुझपे.उह तक नहि करुँगी.किसी कोने मे पड़े रहूंगी…नमक रोटी भि देगा खाने कों.खा लुंगी.बस… मुझे अपनेपास रख लें…सभी छोड़कर तेरेपास आँ जाउंगी.
औऱ वहीं मार्ग केँ किनारे, टूटती सुभह कि रौशनी मे एक् मां, अपनी औलाद केँ पैरों मे गिरी थि…
---
… मगर सिकंदर केँ आँखों मे वोँ पानी नहि थां जौ नर्मी लाए… वोँ ठंडी, बर्फ़ीली नमी थि… जोँ पत्थर कों भि जमादे।
वोँ अलीना कों स्वयं सें अलग करता हैं —
“कहा नां… दूररह मुझसे!
तूँ मेरी मम्मी नहि हैं… तूने मां कहलाने कां हक़उसी दिनखो दिया थां,
जिसदिन तूने मुझे छोड़कर उस व्यक्ति कां हाथ थामा थां। ”
बड़ा ग़ुमान थां नां तुम्हारी तरफ। एक् नवाब कि पत्नि होने पऱ। अब कहां गई, तेरी वोँ अकड़। तेरा वोँ गुरुर। क्याँ हुवानये बेटे औऱ शोहर सें प्रेम नहि मिलरहा क्याँ.
अलीना फूट-फूट कररोरही थि…
""सिकंदर तूँ बिगड़ गय़ा हैं। सिकंदर तुम्हे सहबाज सें सीखना चाहिए। सिकंदर बाहर् कोई पूछे तोँ बताना मैयहा काम करता हूं.बहोत परवाह थि नां तुम्हे अपनी शोहर केँ इज़्ज़त कि.शोहर केँ इज़्ज़त केँ लिए मुझे बेटा कहने सें डरती थि नां तूँ। तोँ अब कहां गयीँ, तेरी वोँ नवाबी ठाठ.अब तुम को परवा नहि हैं इज़्ज़त कि जोँ बिचसड़क पऱ तमाशा कररही हैं."""
( यहसभी क्याँ माजरा हैं वोँ जब फ़्लैशबैक सुरु होगातब पता चलेगा)
अलीना ( सिकंदर कों जोर सें थामे हुवे। बिलकते हुवे)
"गलती होँ गयीँ,। मेरीमति मारी गयीँ, थि। मेरे कलेज़े कों लकवामार गय़ा थां.तुम कोसमझ नहि पायी। जोँ तुम को मेनेनज़र अंदाज किया। मुझेमार। गालीदे। पर्र अपनेपास रख लेँ."
सिकंदर ( भींगी आँखों सें.हाँ अब उसकी आँखे भींग गयीँ, थि)
क्याँ बोलि तूँ। मुझेसमझ नहि पायी। तुझेही इतना भि नहि पता। कि एक् मां औऱ बेटे कां नाता पहले सें हि समझा समझाया हुवा होता हैं.एक् मम्मी कों अपने बच्चे कों समझने कि जरूरत नहि परती। तुँ सच क्यूं नहि बोलती तेरेऊपर उन दोनों बाप बेटे कि खुमारी चढ़ी थि। तूँ सुरु सें हि बदचलन थि। मेरा बाप भि तेरी काली करतूते जान गय़ा होगा.इस लिए तुम्हें किसी बाजारू स्त्री केँ तरह इस्तमाल कर केँ फेक दिया। औऱ अब तुँ उन दोनों बाप बेटे कि रखेल। ( अलीना उसके होंठ पर्र हाथरख करउसे चुपकरा देती हैं)
अलीना ( अब उसका चहेरा सख्त होँ गय़ा थां। ऐसालग रहा थां। उसके शरीर मे जान हि नां बची होँ। )
"बसकर.आगे मतबोल। मर जाउंगी मै.
इतनाबोल बेजान सि अलीना अपने गाड़ी केँ तरफ बढ़ने लगती हैं.अभि जोँ उसने सुना। उसनेकभी ख्वाब मे भि नहि सोचा थां उसका सिकंदर उस सें ऐसीबात करेगा.
तभीपास सें ज़ोया लौटती हैं… उसकेहाथ मे दवाईयां थीं।
वोँ दोनों कों उसहाल मे देखती हैं…
पर्र कुछ नहि कहती…बस सिकंदर कि आंखों मे देखती हैं…
औऱ धीरे-धीरे सें आकर उसके कंधे पर्र हाथ रखती हैं।
सिकंदर अपनी नज़रें झुका लेता हैं।
वोँ बस एक् शब्द कहता हैं —
“चलो ज़ोया…”
औऱ वोँ दोनों वहां सें निकल जाते हें… पीछे अलीना बसउसे जाते हुवे देखती रहती हैं.
“मुस्ताक़। हॉस्पिटल चलो सहबाज कों होस आँ गय़ा होगा ” उसकी आवाज़ सें लागरहा थां। वोँ बहोत जख़्मी हैं। यह जख्म रूहानी थि। इस पर्र मरहम भि नहि लग सकता थां.
---
133567889096%₹₹&77&67%6%6%6%5
---
सुभह कां वक़्त थां … हॉस्पिटल केँ रास्ते पऱ एक् काली SUV तेज़ रफ़्तार सें चलरही थि… अंदर बैठी थि अलिना—खामोश, खोई हुइ,।
अलीना कि आँखें खिड़की सें बाहर् देखरही होती हें… मगर उसके ज़हन मे वोँ नज़ारा घूमरहा थां जब सिकंदर उसकीतरफ देखा भि नहि… जब वोँ खून सें लथपथ थां औऱ फिन भि उसे अजनबी कि तरहकाट गय़ा।
अलीना (मन हि मन सोचती हैं):
"क्याँ अब वोँ मुझे अपनी नफ़रत केँ भि क़ाबिल नहि समझता…?" मुझे तोँ देख्ना भि नहि चाहता.
पाता नहि केसेदिन देखे होंगे मेरेलाल नें जौ इतना सख्त हौ गय़ा हें.
अचानक उसकीसोच टूटती हैं जब वोँ सामने बैठे मुसताक कि तरफ़ देखती हैं।
अलीना (धीरे-धीरे, मगर बेसाख्ता):
"मुसताक… आजकल केँ लड़कों कों कैसी गाड़ियाँ मनपसंद आती हें?"
मुसताक थोड़ी देर सकपका जाता हैं… फिन संयम सें जवाब देता हैं—
मुस्ताक़:
"जी मैडम… लड़कों कों तौ आजकलजीप हि मनपसंद आती हें… बड़ी औऱ भारी सि…"
अलीना (हल्की सि सिसकती मुस्कान केँ संग):
"एक् अच्छी, महंगी जीपबुक करवाओ… "
मुस्ताक़:
"जी मैडम…"
वाहन रुकती हैं… सामने अस्पताल कां द्वार (दरवाज़ा) हैं… अलिना उतरती हैं, धूप कि तेज़ रोशनी उसकी आंखों मे चुभती हैं, मगर उसके चेहरे पऱ बस खालीपन हैं।
हॉस्पिटल रूम — सहबाज बेहोश पड़ा हैं… चुप, सांसें मशीनों केँ भरोसे चलरही हें। अलिना जाकर उसकेसिर पऱ हाथ रखती हैं… धीरे-धीरे सें उसकेपास बैठती हैं… उसकी आंखें भीग चुकी हें, मगर आंसूरोक रही हैं।
अलीना (धीरे-धीरे सें बुदबुदाते हुए):
"क्याँ जरुरत थि उस लड़की कों हाथ लगाने कि। सभी मेरी गलती हैं नां मै तुझेही वहां भेजती नां तुँ उस सें लड़ता"
फिन वोँ सामने खड़ी एक् नोकरानी कों इशारे सें बुलाती हैं। उसकानाम हैं – “सलीमा”
अलीना:
"सुन सलीमा… तूँ आज हि रहमतनगर जा…वहा कुएं वाली सोसाइटी मे एक् लड़काआया हैं नया…"
सलीमा (झुकते हुए):
"जी मैडम…"
अलीना (गंभीर, ठंडी आवाज़ मे):
"आज सें तूँ हि उसकेलिए खानां बनाएगी, उसके कपड़े धोएगी, ज़रूरत कि हर चीज़ देखेगी…
उसेअगर कुछ भि चाहिए, तूँ मुझे बताएगी…"
(फिन वोँ अपनाबैग खोलती हैं औऱ उसमें सें नोटों कि एक् मोटी गड्डी निकालती हैं)
अलीना:
"लेँ यह…जावहा एक् अच्छा सां सोफा टेलीविज़न ख़रीद लेँ… कमरे केँ लिए जोँ चाहिए, सभी लें आँ…
पैसेकम पड़ें तोँ मुझसे औऱ लें लेना…"
सलीमा (हैरान होकर):
"जी मैडम…"
अलीना ( आवाज़ ठोस):
"औऱ सुन…कोई कामचोरी मत करना…
अगर मुझेपता चला कि तूने ज़रा भि लापरवाही कि… तोँ तेरीखाल खिंचवा दूंगी… समझी?" औऱ हाँ उसकी दवाईयों कां खास ख्याल रखना। टाइम पर्र उसे दवाई देना.
सलीमा सहमकर सिर हिला देती हैं औऱ जल्द निकल जाती हैं। अलिना वापस जाकर सोफे पऱ बैठती हैं…
साहबाज कि तरफ एक् नज़र डालती हैं… औऱ फिन अपनी हथेलियों कों देखती हैं, जैसे वोँ सोचरही होँ –
---
1345588999787788888856
---
अस्पताल कां रूम ठंडा, सफ़ेद दीवारों सें घिराहुआ… जहाँ साहबाज अब भि बेहोश पड़ा थां। एक् ओर कोने मे कुर्सी पऱ अलिना बैठी थि… औऱ सामने खड़ी थि उसकी भाभी — अमीना। तेज़ नज़रों वाली, औऱ हर सच्चाई कों बिनाकहे पढ़ लेने वाली
अभि अभि सलीमा बाहर् निकली थि, हाथ मे नोटों कि गड्डी लिए… औऱ सारा माजरा भाभी केँ कानों तक पहुँच चुका थां।
भाभी (धीरे-धीरे सें, मगर तीखे अंदाज़ मे पूछती हें):
"अलिना… यह जौ तुम् कुएं वाली सोसाइटी केँ लड़के कि इतनी चिंता कररही हौ…
कहीं वोँ वही तौ नहि जोँ मैसोच रही हूं.?"
अलिना कि गर्दन झुक जाती हैं… आँखें बोल उठती हें, होंठ खामोश हें। कोई जवाब नहि देती — मगर उसकी सांसें तेज़ हौ जाती हें, चेहरा ज़र्द पड़ने लगता हैं।
भाभी एक् कदम औऱ आगे बढ़ती हें… चेहरे पऱ तंज औऱ गले मे तल्ख़ी भरकर कहती हें—
भाभी:
"तोँ यहसभी कर केँ तूँ उसके प्रेम कों लेना चाहती हैं…?"
अलिना कि आँखों मे एक् समय कों पानीभर आता हैं… मगर वोँ तिलमिलाकर खड़ी होँ जाती हैं।
उसकी आँखें जलरही होती हें, मगर आवाज़ मे एक् ग़मगीन सच्चाई औऱ बेबसी होती हैं।
अलिना (आवाज़ भर्राई हुई, मगर साफ़):
"खुदा जानता हैं भाभी…
मे यहसभी बस अपनी खुशी केँ लिएकर रही हूं…"
"वैसे भि… मेरा सिकंदर अपने पैरों पर्र खड़ा हैं… किसी केँ सामने हाथ नं फैलाने कि जरूरत नहि हैं उसे"
"खुद्दारी कूट-कूट केँ भरी हैं उसमें…!"
भाभी थोड़ी देर तक अलिना कों देखती रहती हें… उनकी आँखों मे हैरत नहि, वोँ अचानक मुड़ती हें औऱ सीधा कहती हें
भाभी:
"अच्छा… मे तौ जाऊंगी उससे मिलने…
कितने साल होँ गए अपने बच्चे कों नहि देखा मैंने…"
"देख्ना… क़ायदे सें दौड़कर आएगा… औऱ मेरे सीने सें लग जाएगा…"
इस जुमले नें अलिना केँ दिल कों चीरकर रख दिया… उसकी सांसें अटकने लगती हें… वोँ खड़ीरह जाती हैं — मगर उसकी आँखों सें अब आंसू बहने लगते हें।
वोँ जानती थि… भाभीसच कहरही थीं…
सिकंदर अवश्य वोँ प्रेम वोँ इज़्ज़त देगा अमीना कों जिसके लिए अलीना कुछदेर पहलेतरस गई, थि.
उसका क्याँ?
वोँ तोँ उस बेटे केँ लिएअब सिर्फ़ एक् नाम हैं… एक् ठंडा, कड़वा नाम…
177373773827373833373338338838388383
स्थान थि – एक् वीरान, जली हुइ पगडंडी केँ किनारे टूटी-फूटी मार्ग…
जहां पेड़ झुकेहुए थें, औऱ धूल उड़ारही थि… चारों ओर सन्नाटा थां, मगरउस सन्नाटे मे एक् तूफान आने कि भनक थि।
किसी वक्तयहा सें ट्रक गुज़रा करता थां… पऱ अब वहांजले हुए टायर, टूटी हुइ बारिकेट, औऱ सड़क पऱ जहाँतहा बिखरे गोलियों केँ कारतूस.औऱ दरख़्त पर्र गोलियों केँ निसान।
हसन मिर्ज़ा कि कारधूल उड़ाती हुइ वहा रुकती हैं… उसके पीछेचार SUV औऱ काले कपड़े पहने हथियारबंद व्यक्ति।
हसनकार सें उतरते हुए, अपनी आँखों कों बचाते हुए इधर-उधर देखता हैं…
उसके चेहरे पर्र गुस्से कि लोहजल रही थि।
हसन (धीरे-धीरे, पर्र कांपती हुइ आवाज़ मे):
"उन हरामियों कों पताल सें भि ढूंढ निकलूंगा। शपथ खु*दा कि। एक् एक् कों कुत्ता बना दूंगा."
(वोँ एक् जलेहुए टायर केँ पास झुकता हैं… राख उठाकर हाथ मे मसल देता हैं)
हसन:
"अपने सारे खबरीयों कों काम पे लगादो रे.उन मादरचोदो कों ढूंढो। इसबार ई*द पऱ उन्ही कि कुर्बानी देनी हैं."
ड्राइवर औऱ खलासी, जिनकी जानबच गई थि, एक् SUV सें नीचे उतारे जाते हें – डरेहुए, काँपते हुए।
ड्राइवर कि आँख पर्र पट्टी हैं, गाल पऱ गहरे निशान।
हसन ड्राइवर कि गर्दन पकड़ता हैं, आंखों मे झांकता हैं –
"तुँ ज़िंदा क्यूं बच गय़ा रे मादरचोद.औऱ अपनीजेब सें कलम निकाल कर उसकी दूसरी आँखमै घुसा देता हैं."
ड्राइवर छटपटा हुवा जमीन पऱ गिर जाता हैं। हसना अपने रुमाल सें अपनेहाथ कों साफ करता हैं। फिन अपने चेहरे पऱ लगेखून केँ छीते पोछता हैं.
हसन कि आंखें सिकुड़ती हें… वोँ खलासी कि तरफ़ मुड़ता हैं —
हसन:
"। मादरचोद तुम्हारी तरफ हि उनके सनाख्त करनी हैं.तुँ जिन्दा रहेगा कुछदिन.?"
खलासी (घबराते हुए):
"साहब…"
हसन उसे रोकते हुवे.अपनी उँगलियों कों अपने होठों पऱ लें जाकर.
'" सऊऊऊ। नाँ मतबोल."
bhay likh tm badhiya rahe hu suggestion yahi h kee kahani kaa rhthm banaye rakho thora odd lagaa itni aasani say sikandar kaa aleena say baat krna lekin situation hi aisi bann gai too fir khaa kare okk good luck keep writting
Mukkader kaa sikander – New Episode
Omg yeh naukrani wali scene padh krr ekdum से Albela kahani hit किया dimag mai, फिर mene gaur किया too देखा too writer too same hi h, अब mein एक tarf too khus ho की nayee kahani mil rahi पर dusri tarf gaali bi dene kaa mann krr raha pichle story के liye
Jaisi Karni waisi bharni Ab jb Tumne Apne sage beta k Saath kiya wo tow jhelna padega Apne khoob say itni nafratvor dusre k khoob say itni bahobbat Baherhal dekhte hain aage kiya hotha hain Badhiya shaandar update
Mukkader kaa sikander – New Episode
Mukkader kaa sikander - Aage kya hua? Next part padhiye
Wohi too nahee kia jaraha tumhari kahaniyan k sath , the great hamantstar kee kahani complete hojaye. Esha shobhagya too ab tak nahee mila h. Khair kahani achhi chl rahi h ummid karte h complete hongi
Relavant source : click here