भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai - Complete Kahani All Parts
भरोसे कि कसौटी
ट्रिन ट्रिन। ट्रिन ट्रिन। ट्रिन। ट्रिन। | लैंडलाइन मोबाइल कि घंटीबज रही थि | मे ऊपर अपने कमरे मे सोरहा थां | मोबाइल थां तौ नीचे पर्र सुभह केँ समय इसकी आवाज़ कुछ ज्यादा हि ज़ोरों सें आँ रही थि | मैंने अपनेऊपर अपना दूसरा तकिया बिल्कुल अपनेकान केँ ऊपररख लिया | आवाज़ फिन भि आँ रही थि पऱ इसबार थोड़ी कम थि | कुछ सेकंड्स मे हि मोबाइल कि आवाज़ आनीबंद होँ गयीँ, | मे अपनेधुन मे सोयारहा | कितना टाइम बीतापता नहि, दरवाज़े पऱ दस्तक होँ रही थि – ‘ठकठकठक ठक’ | मैंने अनसुना सां किया पर्र दस्तक थमने कां नाम हि नहि लेँ रही थि | झुँझला कर मे उठा औऱ जाकर द्वार (दरवाज़ा) खोला | सामने चाची खड़ी थि | मुस्कुराती हुइ | थोडा मज़ाकिया क्रोध दिखाते हुए अपने दोनों हाथ अपनेकमर केँ दोनों तरफ़रख कर थोड़ी तीखी अंदाज़ मे बोलि, “अभयsss….!यह क्याँ हैं? सुभह केँ सवाआठ बजरहे हें | अभि तक सोरहे हौ ?” मेरी आँखों मे अभि भि नींदतैर रही थि, थोडा अनसुना सां करतेहुए नखरे दिखाते हुएकहा, “ओफ्फ्फ़हो चाची। प्लीज़। सोनेदो नाँ | अभि उठने कां मन नहि हैं औऱ वैसे भि आज सन्डे हैं | कौनभला सन्डे कों जल्द उठता हैं ? औऱ अगर उठता भि हैं तौ मे क्यूं उठूँ ? क्याँ करूँगा इतनी जल्दउठ कर?” मैंने एक् सांस मे हि कह दिया | चाची आश्चर्य सें आँखें गोल बड़ी बड़ी करती हुई अपने होंठों पऱ हाथ रखतेहुए बोलि, “हायराम राम.! देखो तोँ, लड़का केसेबहस कररहा हैं ? अरे पगले, कोई नहि उठेगा तौ इसका मतलब कि तुँ भि नहि उठेगा? चल जल्द नीचेचल। ब्रेकफास्ट सजधजकर हैं। गरम हैं। जल्दचल केँ खा लेँ। मुझे औऱ भि बहोत काम हैं |”
इतनाकह कर चाची मुझे साइडकर मेरेखाट केँ पासचली गई, औऱ मेरेबैड कों ठीक करनेलगी | तकिया ठीक कि, ओढने वाले चादर कों समेटकर रखी औऱ फिन पलंग पऱ बिछे चादर कों हाथों सें झटकेदे करउसे भि ठीक करनेलगी | पलंग पर्र बीछे चादर कों ठीक करते वक़्त उनको थोडा आगे कि ओर झुकना पड़ा औऱ इससे उनकेगोल सुडोल नितम्ब पीछे यानि केँ मेरीतरफ ऊपर हौ केँ निकलआये | मे तोँ चाची कों देखे हि जारहा थां औऱ अब तौ नितम्बों केँ इसतरह सें निकलआने सें मे इस सुन्दर दृश्य कों देखकर मोहित हौ उठा थां | चाची हमेशा सें हि मुझे बड़ी प्यारी लगती थि | हिरण केँ छोटे बच्चे केँ तरह उनके काली, बड़ी औऱ चमकीली आँखें, मोतियों जैसे सजीले दांत, सुरीली मनमोहक गले कि आवाज़। आँखों केँ ऊपर धनुषाकार कालीआई ब्रो तोँ अपनीअलग हि अंदाज़ दर्शाती थि। औऱ यहसभी अपनी तरफ़ सबको बरबस हि खींच लेती थि | लाली मिश्रित उनकेगाल, जब वोँ हँसती याँ मुस्कुराती तोँ गालों केँ उपरी हिस्से औऱ ऊपर कि तरफ़ होतेहुए उनके गालों केँ साइड एक् हल्का सां डिंपल बना देता थां | रंग कि बात करूँ तौ चाची सांवली तौ नहि थि पऱ बहोत गोरी भि नहि थि, मीडियम रंग थां | साफ़रंग | देहयष्टि अर्थार्त फिगर कि बात करूँ तोँ उनकी फिगर थि प्रायः 36dd-32-36 | उनके वक्षों कों लेकर मे गलत भि होँ सकता हूं। हौ सकता हैं वोँ 36dd नाँ होँ कर 38 होँ | खैर, जौ भि हौ। थें तौ काफ़ी बड़े बड़े। | किसी भि पुरुष कां सिर घूमादे | यहा तक कि मैंने तोँ आस पड़ोस कि कई औरतों कों भि चाची कि फिगर कों लें कर इर्ष्या करते देखा हैं |
भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai – New Episode
चाची मुझे बहोत प्रेम करती थि | बहोत ख्याल रखती थि | हम् दोनों आपस मे कभीकभी ऐसेबात करते थें जैसे मानो हम् चाची भतीजा नां होँ कर देवर जी भाभी होँ याँ दोयार। (याँ दो प्रेमी) | मां बापू कों दूसरे शहर मे छोड़ चाचा चाची केँ संग रहतेहुए मुझेयही कोईदो बरस होँ गए थें | औऱ इतने हि वर्षों मे मे औऱ चाची आपस मे बहोत घनिष्ट होँ गए थें | मे चौबीस कां औऱ चाची शायद सैंतीस याँ अड़तीस कि | कमआयु मे हि शादी होँ गय़ा थां चाची कां | दो बच्चे हें | उनके उज्जवल भविष्य कि कामना करतेहुए चाचा चाची नें दिल पऱ पत्थर रखतेहुए बच्चों कों बोर्डिंग विद्यालय भेज दिया थां | वक्त टाइम पऱ मिलने जाते थें | कभीकभी छुट्टियों मे उन्हें अपनेयहा लें कर भि आते थें |
“कुछदेर पहले तुम्हारी मां कां मोबाइल आया थां। मैंने कह दिया कि ऊपर अपने कमरे मे पढ़ाई कररहा हैं। डिस्टर्ब करने सें मना किया हैं। | बाद मे बात करेगा.| आजबचा लिए तुम्हें। नहि तोँ अच्छी खासी डांट पड़ती तुम्हारी तरफ |”
“ओह्ह। थैंकयू चाची.|” कहतेहुए मे ख़ुशी सें झूमते हुए चाची कों पीछे सें गले लगाया। पकड़ते हि मेरा थोडा खड़ाहुआ लन्ड चाची कि गदराई गांड सें टकरा गई | चाची कों भि अवश्य अपने पिछवाड़े मे कुछ चुभता हुआ सां लगा होगातभी तोँ उन्होंने झटके सें स्वयं कों आज़ाद करतेहुए शरमाते हुएकहा, “अच्छा अच्छा ठीक हैं। चलोजाओ अब। जल्द सें ब्रशकर लो |”
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“औऱ कुछ लोगे, अभय?” चाची नें पूछा |
विचारों केँ भंवर सें बाहर् निकला मे | ब्रश करके नाश्ते मे बैठ गय़ा थां | चाची भि मेरेसंग हि बैठ गई, थि ब्रेकफास्ट करने |
“नहि चाची। अब औऱ नहि |” पेट पऱ हाथ रखतेहुए मैंने कहा | चाची मुस्कुरा दि | पर्र नं जाने क्यूं उनकीये मुस्कराहट कुछ फीकी सि लगी | ऐसालगा कि चाची बात तोँ ठीक हि कररही हैं, हावभाव भि ठीक हैं पऱ शायद दिमागी रूप सें वोँ कहीं औऱ हि भटकी हुइ हें | उनका खाने कों लेकर खेलना, थोडा थोडा मुँह मे लेना इत्यादि सभी जैसे बड़ा अजीब सां लगरहा थां | अपने ख्यालों मे इतनी खोयी हुई थि कि उनकोइस बात कां पता तक नहि चला कि उनका आँचल उनके सीने पर्र सें हट चूका हैं औऱ परिणामस्वरुप लगभग 5 इंच कां लम्बा सां उनका क्लीवेज मेरे सामने दृश्यमान होँ रहा थां औऱ संग हि उनके बड़ेगोल सूडोल दाएँ मम्मों कां उपरी हिस्सा काफ़ी हद तक दिखरहा थां |
“क्याँ बात हैं चाची, कोई तकलीफ़ हैं?” मैंने पूछा |
“अंह। ओह्ह। न्.नहि अभय.कुछ नहि। बस थोड़ी थकी हुइ हूं.|” चाची नें अनमना सां जवाब दिया | जवाबसुन कर हि लगा जैसेकुछ तोँ बात हैं जोँ वोँ मुझसे शेयर नहि करना चाहती | मैंने भि बात कों आगे नहि बढ़ाने कां सोचा औऱ चाची केँ दाएँहाथ पर्र अपना बाँया हाथ रखतेहुए बड़े प्रेम सें धीमी आवाज़ मे कहा, “ओके चाची। पर्र चाची। कभी भि कोई भि प्रॉब्लम होँ तोँ मुझे अवश्य याद करना, ठीक हैं ?” मेरी आवाज़ मे मिठास थि | चाची मुस्कुरा कर मेरी तरफ़ देखी पऱ उससमय मे मेरी नज़र कहीं औऱ थि | मेरी नज़रों कों फॉलो करतेहुए चाची नें अपनी तरफ़ देखा औऱ अपने सीने पऱ सें पल्लू कों हटाहुआ देखकर चौंकउठी, “अरेराम,। छि.|” कहतेहुए झट सें अपने सीने कों ढक लिया औऱ हँसते हुए झूठे गुस्से सें मेरेहाथ पऱ हल्का सां चपत लगाते हुए बोलीं, “बड़ा बदमाश होनेलगा हैं तुँ आजकल |” चोरी पकड़े जाने सें मे झेंप गय़ा औऱ जल्द जल्द ब्रेकफास्ट ख़त्म करनेलगा | तभी टेलीफोन कि घंटीफिन बजी, चाची उठकर गयीँ, औऱ रिसीव किया, “हेलो.”
“जी। बोलरही हूं.|”
“हाँजी। हाँजी.|”
“क्याँ.पऱ.परर.|”
“हम्म। हम्म.|”
इसी तरह ‘हम्म हम्म’कर केँ चाची दूसरी तरफ सें आने वाली आवाज़ कां जवाब देतीरही | मे खाने मे मग्न थां, मात्र एक् बार चाची कि तरफ नज़र गई। देखा कि उनके चेहरे कि हवाईयाँ उड़ी हुई हैं | मे कुछ समझा नहि | मुझे अपनीओर देखते हुए चाची सामने कि ओर मुड़ गई | थोड़ी देरबाद फ़ोन क्रेडल पऱ रखकर मेरेपास आँ करबैठ गई | मैंने गौर सें देखा उन्हें। बहोत चिंतित दिखरही थि | नज़रें झुकी हुइ थि | मुझसे रहा नहि गय़ा | पूछा, “क्याँ हुआ चाची। किसका मोबाइल थां?”
“कुछखास नहि। मेरे एक् अपने कां तबियत बहोत ख़राब हैं, इसलिये मन थोडा घबरारहा हैं |” काँपते आवाज़ मे बोलीं। बोलते हुए मेरीतरफ एक् सेकंड केँ लिए देखा थां उन्होंने | उनकी आँखें किनारों सें हलकी भीगी हुई थि | मेरामन बहोत किया कि आगेकुछ पूछूँ पर्र नाँ जाने क्यूं मे चुपरहा | दोनों अपने प्लेट्स कि तरफ़देख रहे थें |
भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai – New Episode
दो-तीन दिनबीत होंगे | एक् रात कों सभीखा पीकर सोये थें | अचानक सें मेरी नींद खुली | “खट्ट” कि आवाज़ केँ संग टेबल लैंपऑन किया मैंने | मुझेदेर रात लाइट बल्ब जलाना अच्छा नहि लगता थां | इसलिये अपनेलिए एक् टेबल लैंपरखा थां | नींद क्यूं टूटी, पता नहि पऱ नींद टूटने केँ संग हि मुझे ज़ोरों सें एक् सिगरेट सुलगाने कि तलब होनेलगी | पऱ संग हि प्यास भि लगा थां औऱ संयोग देखिये, आज मैंने अपना पानी कां जग भि नहि भरा थां | सो पानी लेने केँ लिए मुझे नीचे किचेन मे जाने केँ लिए अपने कमरे सें खालीजग लिए निकलना पड़ा | सुस्त मन सें मे सीढ़ियों सें नीचेउतर हि रहा थां कि मुझे जैसे किसी केँ कुछ कहने/ बोलने कि आवाजें सुनाई दि | मे चौकन्ना हौ गय़ा | आश्चर्य तोँ हौ हि रहा थां कि इतनीरात गएभला कौन होँ सकता हैं? मे धीमे औऱ सधे क़दमों सें नीचे उतरने लगा | कुछ नीचे उतरने पऱ सीढ़ियों पऱ हि एक् स्थान मे रुक गय़ा | आवाज़ अब थोडा स्पष्ट सुनाई देरही थि | थोडा औऱ ध्यान लगाकर सुनने कि कोशिश कि मैंने | दुबारा चौंका। क्यूंकि जौ आवाजें आँ रहीथीं वोँ किसीऔरत कि थि औऱ शत प्रतिशत मेरी चाची कि आवाज़ थि | मे जल्द पऱ पूरी सावधानी सें तीनचार सीढ़ियाँ औऱ उतरा | अब आवाज़ काफ़ी सही आँ रही थि | सुनकर ऐसालग रहा थां जैसे कि किसी सें बहोत विनती, मिन्नतें कररही हैं चाची पऱ दूसरे किसी कि आवाज़ सुनाई नहि देरही थि औऱ ज़रा औऱ गौर करने पर्र पाया कि नीचे जहाँ सें आवाजें आँ रही थि, वहीँआस पास हि कहीं पर्र टेलीफोन रखा होता हैं | इसका सीधा मतलबयह हैं कि अवश्य चाची किसी सें फ़ोन पऱ बातकर रही हैं.
“नहि। प्लीज़। ऐसे क्यूं कहरहे हें आप् ? मे सचकहरही हूं। मैंने किसी कों कुछ नहि बताया हैं। प्लीज़ यकीं कीजिये आप् मेरा.| प्लीज़ एक् अबला नारी पर्र तरस खाइए। मे विवाह शुदा हूं। मेरा एक् परिवार भि हैं | मैंने तौ कुछ सुना हि नहि थां जोँ मे किसी कों बताउंगी। प्लीज़। प्लीज़। प्लीज़। विश्वास कीजिये। प्लीज़ ऐसामत कहिये। कुछमत कीजिए। आपको आपके ईश्वर कि शपथ.|”
चाची कां इतना कहना थां कि शायद दूसरी तरफ़ सें कोई गुस्से सें बहोत जोर सें चीखा थां, रात केँ सन्नाटे मे फ़ोन केँ दूसरी तरफ़ कि आवाज़ भि कुछकुछ सुनाई देरही थि | कुछसमझ मे तौ नहि आँ रहा थां पर्र इतनातय थां कि कोई बहोत गालियों केँ संग चाची कों डांटरहा थां औऱ उनपरचीख भि रहा थां | मैंने ऊपर सें झांककर देखने कि कोशिश कि | देखा चाची सहमी हुई सि कानों सें फ़ोन कों लगाएचुप चाप खड़ी थि | चाची कों सहमेहुए सें देखने सें कहीं अधिकजिस बात नें मुझे हैरत मे डाला वोँ ये थां कि चाची सिर्फ़ ब्लाउज औऱ पेटीकोट मे खड़ी थि ! साड़ी नहि थि उनपर ! आश्चर्य सें उन्हें देखने लगा पऱ कुछ हि सेकंड्स मे मेरे आश्चर्य कां जगह दिलचस्पी औऱ ‘लस्ट’ नें लें लिया क्योंकि बिना साड़ी केँ चाची कों ऊपर सें देखने पऱ उनके सुडोल एवं उन्नत चूचियों केँ ऊपरी हिस्से औऱ उनकेबीच कि गहरी घाटी एक् अत्यंत हि लावण्यमय दृश्य कां निर्माण कररहे थें | सहमी हुईँ चाची केँ हरेक गहरे औऱ लम्बे साँस केँ संग उनके वक्षों कां एक् रिदम मे ऊपर नीचे होना पूरे दृश्य मे चार चाँदलगा रहे थें | चूचियां भि ऐसे जोँ नीचेपेट पर्र नज़र कों जाने हि नहि देरहे थें | चूचियों केँ कारणपेट दिख हि नहि रहा थां चाची कां | मैंने पीछे नज़र डाला। उनके गदराये सुडोल उठेहुए गांड पेटीकोट मे बड़े प्यारे औऱ मादक सें लगरहे थें | जी तोँ कररहा थां कि अभि जाकरजोर सें एक् चांटा मारूं उनके गांड पऱ | पऱ स्वयं कों नियंत्रित किया मैंने |
मन हि मन सोचा, “अवश्य चाचा चाची मे पति पत्नि वालाखेल चलरहा थां औऱ बीच मे यह फ़ोन आँ गय़ा याँ फिनखेल ख़त्म कर केँ रेस्ट लें रहे थें। तभी फ़ोनआया |” मुझे दूसरा वाला ऑप्शन अधिकसही लगा | बच्चे बाहर् हें इसलिये पूरेरूम मे मस्ती करते हें। अगर मे भि नहि होतातब शायद पूरेघऱ मे मस्ती करते घूमते। शायद नंगे.!
“अच्छा। ठीक हैं। क्षमा कीजिये। गलती होँ गई। अब नहि बोलूँगी। पऱ प्लीज़ मेरे परिवार कों कुछमत कीजिए। मे हाथ जोड़ती हूं | आपको आपके ऊपरवाले कां वास्ता.|” चाची गिड़गिड़ायी.
दूसरी तरफ़ सें फिनकोई आवाज़ आई। जैसे कि कोईकुछ निर्देश देरहा हौ याँ कुछपूछ रहा होँ.
“आपको आपके अल्लाह कां वास्ता.|” चाची बहोत हि सहमी औऱ धीमे आवाज़ मे बोलीं |
मे चौंका | अरे!!यह क्याँ बोलरही हैं चाची??!!। किससे बातकर रही हैं औऱ ऐसा क्यूं बोलरही हैं?
“हाँ। हम्म। पऱ। पर्र। प्लीज़। नहि।।। ओके.ठीक। ठीक हैं। नौबजे जाते हें वोँ। साढ़े नौ.??। पऱ क्यूं। पर्र। ओके। ठीक हैं। |” इसीतरह कुछदेर तक बातकर चाची नें फ़ोन वापस क्रेडल पऱ रख दिया औऱ एक् तरफ़चली गयीँ,.| मे हतप्रभ सां पूरीबात समझने कां पूरा प्रयास करनेलगा | चाची किससे इतनी विनती कररही थि? कौन थां दूसरी तरफ़.? औऱ नौबजे औऱ साढ़े नौबजे कां क्याँ चक्कर हैं? थोडा दिमाग़ दौड़ाने पऱ यादआया कि रोज़ सुभहनौ बजे तौ चाचा दफ़्तर केँ लिए निकलते हें पर्र यह साढ़े नौबजे कां क्याँ मामला हैं ?
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