भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai – New Episode
कहते हें कि जब मनुष्य कोई बड़ा याँ गंभीर अपराध याँ पापकर बैठता हैं औऱ फिनउसे छुपाने कां भरपूर प्रयास भि करता हैं, तब उसके चेहरे केँ हावभाव, उसका उठना बैठना, उसके शारीरिक गतिविधि इत्यादि सभीकुछ उसके बारे मे कोई नं कोई संकेत देना प्रारंभ कर देते हें | औऱ फ़िलहाल ऐसा हि कुछ हौ रहा थां चाची केँ संग.रात मे चाचा नें अचानक पूछ हि लिया चाची केँ स्वास्थ्य केँ बारे मे |
चाचा – “दीप्ति, तुम् ठीक होँ नां? कुछदिन सें देखरहा हूं कि तुम् कुछखोई खोई सि, दुःखी सि हौ। कोई तकलीफ़ हैं?”
चाची – “अरे नहि। कुछ नहि। काम करते करतेकभी कभीऐसा हौ जाता हैं। आप् फ़िक्र मत कीजिए। कुछ होगा तौ सबसे पहले आपको हि बताउंगी.|” बड़ी हि प्यारी सि स्माइल चेहरे पे लाकर बोलीं | चाचा शायद पिघलगए चाची कि मोहक मुस्कान देखकर.
चाचा – “ यू श्योर ??। पक्का कुछ नहि हुआ हैं?”
इसपर चाची नें चेहरे पर्र हल्का क्रोध लाकर चाचा केँ बहोत लगभगजा कर अपने वक्षों कों थोडा ऊपरकर, चाचा केँ छाती सें हल्का सां सटाती हुइ आँखों मे आँखें डालकर बोलि, “अच्छा। तोँ अब आपका हम् पऱ भरोसा भि नहि रहा.?”
चाची कि इसअदा पर्र चाचा तोँ जैसेसभी भूल हि बैठे। चाची कों उनकेकमर सें पकड़कर अपनेपास खींच उनके होंटों पऱ अपने होंठ ज़रा सां टच करतेहुए गालों पऱ किस किया औऱ बड़े प्रेम औऱ अपनेपन सें कहा, “ तुमपे भरोसा नां करूं। ऐसाकभी हौ सकता हैं क्याँ भला.??”
इसकेबाद दोनों नें झट सें एक् दुसरे कों गले सें लगा लिया औऱ बहोत देर तक वैसे हि रहे | फिन एक् दुसरे सें अलग होकर अपने अपनेकाम मे लगगए। मे बहोत दूर सें उन्हें देखरहा थां। दोनों कां आपस मे प्रेम देखकर मुझे बहोत अच्छा लगा। पर्र संग मे बुरा भि। बुरा दोनों केँ लिएलगा। एक् तौ चाची केँ लिए। औऱ दूसरा चाचा केँ लिए, कि उनकी पत्नि, उनकी धर्मपत्नी उनकेपीठ पीछे क्याँ गुल खिलारही हैं |
रात कां खानां हम् सबनेसंग हि खाया। चाचा अपनेधुन मे खानां सफ़ाचट कररहे थें। औऱ चाची बीचबीच मे आँखों मे उदासी लिए चाचा कों देखती औऱ आँखें नीचीकर खानां खाती.| मे सिवाए देखने केँ औऱ कुछ भि नहींकर सकता थां। कम सें कमइस टाइम |
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अगलेदिन सुभह, रोज़ कि तरह हि चाचा दफ़्तर चलेगए वक्त पे औऱ मे भि अपने कोचिंग समाप्त करनहा धोकर नाश्ते केँ लिएबैठ गय़ा | टेबल पऱ जब चाची खानां सर्वकर रही थि तब मैंने उनके चेहरे कों पढ़ने कि कोशिश कि | हावभाव सें तोँ वोँ शांत थि पर्र चिंता औऱ दुविधा कि मार चेहरे पऱ साफ़झलक रही थि | वोँ भि प्रयास कररही थि कि मे कुछसमझ नाँ पाऊँ पर्र अब तक तौ बहोत देर होँ चुकी थि | कारण नां सही पर्र किसी संकट कां अंदेशा तोँ मैंने कर हि लिया थां औऱ जानने केँ लिए अपनेकमर भि कस चुका थां | बसदेर थि तोँ मात्र शुरुआत करने कि | औऱ शुरुआत कों शुरुआत करने केँ लिए एक् क्लू कि ज़रूरत थि जोकि अभि मेरेपास थि नहि | पर्र शायद भाग्य जल्द हि मेहरबान होने वाला थां मुझ पऱ |
जैसे हि ब्रेकफास्ट समाप्त करहाथ मुँह धोने केँ लिएउठा, मैंने देखा कि अन्दर किचेन मे, सब्जी बनारही चाची केँ चेहरे पऱ उनके सामने वाले खिड़की सें एक् कागज़ कां टुकड़ा आँ करलगा | समझते देर न् लगी कि किसी नें ये कागज़ चाची पर्र खिड़की केँ रास्ते उनपर फेंकी हैं | जल्दजा कर कागज़ फेंकने वाले कों देख भि नहि सकता थां, इससे चाची कों शक होँ जाता | चेहरे पऱ कागज़ कां टुकड़ा आँ कर लगते हि चाची नें ‘आऊऊ’ सें आवाज़ कि | खिड़की सें झाँककर देखने कि कोशिश भि कि कि किसने फेंका हैं। पर्र शायद उन्हें भि कोई नहि दिखा | चाची कां अगलाकदम मुझेपता थां इसलिये पहले हि स्वयं कों एक् सेफ स्थान मे छुपाकर उनपर नज़ररखा | चाची नें टेबल कि तरफ़ देखा, मुझेवहा नाँ देखकर थोड़ी निश्चिंत हुई, फिन किचेन सें एक् कदम बाहर् आँ कर भि उन्होंने इधरउधर देखा। मुझे कहीं न् पाकर सुकून कि सांसली औऱ उस मुड़े हुए कागज़ कि टुकड़े कों ठीककर उसे देखने लगी | शायदकुछ लिखा थां उसमे | औऱ शायद अवश्य कुछऐसा लिखा थां जिसका कदाचित उन्होंने कल्पना तक नहि कि होगी | उन्होंने जल्द हि उस कागज़ कों फाड़कर, अच्छे सें छोटे छोटे टुकड़े कर केँ डस्टबिन मे फेंक दिया | फिनकुछ देर वहीँ खड़ी खड़ी अपने मंगलसूत्र सें खेलते हुए खिड़की सें बाहर् देखते हुएकुछ सोचती रही | फिन अपनेकाम मे लग गई | मे हाथ मुँहधो कर अपनेरूम मे चला गय़ा |
लगभगआधे घंटेबाद चाची नें नीचे सें आवाज़ दिया। मे गय़ा | जाकर क्याँ देखता हूं कि चाची ब्लडरेड कलर कि साड़ी औऱ मैचिंग ब्लाउज जिसके बाँह केँ किनारों पे गोल्डन थ्रेड सें सिलाई कि गई हैं, पहनकर सजधजकर खड़ी हैं | हाथ मे एक् पर्स हैं। कम ऊँचाई कि हील वाली रेडिश ब्राउन कलर कि सेंडल पहनी हैं | जब मे उनके सामने पहुंचा तब वोँ आगे कि ओर थोडा झुककर अपने पैरों केँ पास साड़ी केँ हिस्से कों ठीककर रही थि | ठीक करते करतेकहा, “अभय, सुनो, मुझे थोडा बाहर् जानां हैं। मैंने खानां बनाकर रख दिया हैं। समय पऱ खा लेना.ठीक हैं?” ‘ठीक हैं’ कहतेहुए उन्होंने नज़रउठा कर मेरी औऱ देखा औऱ पाया कि मेरी नज़रें उनकी ब्लाउज केँ अन्दर सें झांकते उभारों पऱ थीं | पर्र उन्होंने इस पऱ कोई रिएक्शन नहि दिया औऱ साड़ी कों ठीक करने केँ बाद एक् बारफिन वक्त पर्र खा लेने वाली हिदायत दुबारा देतेहुए बाहर् चली गई | उस साड़ी ब्लाउज मे चाची इतनी ज़बरदस्त दिखरही थि कि मेरे लन्ड बाबाजी नें बरमुडा केँ अन्दर जल्दी फनफनाना शुरुआत कर दिया | चाची कां ब्लाउज आगे औऱ पीछे, दोनों तरफ़ सें डीपकट थां | क्लीवेज तोँ दिख हि रही थि, संग हि मांसल बेदाग साफ़पीठ कां बहोत सां हिस्सा भि दिखरहा थां | औऱ इसलिये चाची पीछे सें भि एवनलग रही थि |
भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai – New Episode
आज अचानक सें मेरा सब्र कां बाँधटूट गय़ा | मैंने सोच लिया कि आजकुछ तोँ पतालगा कर हि रहूँगा | ऐसा ख्याल आते हि मे लपका अपनेरूम कि तरफ़, रेडी होने केँ लिए। पाँच मिनट सें भि कम वक़्त मे मे सजधजकर हौ कर तालालगा कर बाहर् निकला। सामने रोड कि ओर देखा। चाची नहि दिखी। सामने हि एक् मोड़ थां। शायद चाची उस मोड़ पे मुड़ चुकी हौ। ऐसा सोचते हुए मैंने झट सें अपना स्कूटी निकाला औऱ दौड़ा दियाउस मोड़ तक। मोड़ पऱ पहुँच कर मैंने स्कूटी रोककर इधरउधर नज़र दौड़ाया। देखा सामने एक् कनेक्टिंग रोड पे कुछआगे एक् लालरंग कि वैन खड़ी हैं औऱ चाची उसमें घुसरही हैं ! उनके घुसते हि वैन कां द्वार (दरवाज़ा) बंदहुआ औऱ चल पड़ा | मैंने भि अपना स्कूटी लगा दियाउस वैन केँ पीछे पऱ एक् अच्छे खासे डिस्टेंस कों मेन्टेन करतेहुए | बहोत जल्द हि वोँ वैनहवा सें बातें करनेलगा; पर्र मैंने भि आजहर कीमत पर्र चाची कां पीछा करने कां ठानरखा थां |
सो, स्पीड मैंने भि बढ़ा दिया | रास्ते मे लोग औऱ दूसरी गाड़ियाँ भि थीं पऱ वैनजिस हुस्न केँ संग सबकेबीच सें अपनेलिए मार्ग बनाते हुएआगे बढ़रहा थां, उससेवैन कां चालककोई बहोत हि बढ़िया पेशेवर मालूम होँ रहा थां | वैन कां चालकजिस तरह सें वैन कों सबकेबीच सें आसानी सें लें जारहा थां; वैसा तोँ मे अपने स्कूटी सें भि नहि करपारहा थां | एक् तोँ मुझे काफ़ी दूरीबना कर चलनापड़ रहा थां औऱ ऊपर सें रोड पर्र मौजूद भीड़ |
खैर, थोड़ी हि देर मे, मैंने स्वयं कों एक् बहोत हि अजीब सि, याँ यूँ कहें कि एक् गरीब सि बस्ती मे पाया। एक् मोहल्ले कि छोटेतंग रास्तों सें हौ कर गुज़रते हुए वो वैन एक् स्थान रोड केँ बायीं तरफ़ रुका,। बहोत दूर एक् पान दुकान थि। औऱ मेरेआस पास बहोत सें टूटे फूटे कुटिया याँ कच्चे घर-मकान केँ घऱ थें, जिनमें शायदअब कोई नहि रहता होगा | हाँ, जिस स्थान वैन रुकी थि उसकेठीक सामने। मतलबरोड केँ दूसरी तरफ़ एक् टेलर कि दुकान थि | मैंने अपने स्कूटी कों बहोत पीछे एक् गरमचाय वाले केँ पास छोड़कर वापस वहां पहुंचा। देखता हूं कि सभी केँ सभीवैन सें उतरकर रोड केँ उसपार, उस टेलर कि दूकान कि तरफ़बढ़ रहे हें। दो काफ़ी लम्बे अधेड़ उम्र केँ व्यक्ति थें जोँ चाची कों अपनेबीच मे रखकर उनके (चाची) केँ दाएँ-बाएँ होँ करचलरहे थें। दोनों व्यक्ति केँ दाढ़ी बढ़ी हुई थि औऱ उन दोनों नें थोड़े मैले सें कुरते औऱ पजामे पहनरखे थें | दोनों कि बीच चलने वाली महिला मेरी चाची हि थि यह मैंने पहचाना उनके साड़ी सें। मेरा मतलब चाची जबघऱ सें निकली थि तौ साड़ी मे थि पऱ अभि जब वोँ उतरी तोँ उन्होंने एक् बुर्का पहनरखा थां | इसका मतलब बुर्का उन्होंने वैन मे हि पहना होगा | मैंने उन्हें पहचाना उनके बुर्के केँ नीचे सें झांकती उनकी साड़ी, उनके सेंडल औऱ धूप मे चमचम करके चमकती उनकी अंगूठियों कि मदद सें | सिर सें लेकरपेर तक मे अतुलनीय आश्चर्य सें भराहुआ थां कि आखिर माजरा क्याँ हैं.
सभीउस टेलर कि दूकान मे प्रवेश करगए | इधरवैन केँ चालक वालेसीट सें एक् औऱ व्यक्ति उतरा। अवश्य यही चालक होगा। लंबाई मे बाकी दोनों सें कम थां, थोडा मोटा भि थां। दाढ़ी नहि थि उसकी पऱ मूछें बहोत लम्बी थीं। उसने भि कुरता पजामा पहनरखा थां | वैन सें उतरकर थोड़ी अंगड़ाईयाँ ली औऱ कुरते केँ पॉकेट सें एक् बीड़ी निकाल कर सुलगा लिया औऱ लम्बे लम्बे कश लेतेहुए वाहन केँ आसपास हि टहलने लगा | मे एक् टूटे झोंपड़े कि एक् टूटी खिड़की केँ पीछे सें यहसभी देखरहा थां औऱ बड़ी हि बेसब्री सें उन लोगों केँ, खासकर चाची केँ लौटआने कि इंतजार करनेलगा। दिल भि बहोत घबरारहा थां मेरायह सोचकर कि न् जाने क्याँ सलूक हौ रहा थां अन्दर चाची केँ संग | आसपास केँ दुर्गन्ध औऱ मच्छरों केँ डंक सें परेशान मुझेवहा बैठे बैठे लगभग चालीस मिनट हौ गए | टेलर कि दूकान केँ दरवाज़े मे आवाज़ हुआ। दरवाज़े पर्र बड़ा सां पर्दा भि थां.जोँ अब थोडा उठा। औऱ अन्दर सें वही दोनों व्यक्ति चाची कों बुर्के मे लेकर बाहर् निकले। औऱ वैन कि तरफ़चल दिए | रोडपार करवैन केँ पास जाकर खड़े होँ गए | मुझेलगा कि अबफिन इनका पीछा करना पड़ेगा। अभि वेलोग वैन केँ पासआकर खड़े हि हुए थें कि दो – तीन मिनट बीतते बीतते एक् औऱ ग्रेरंग कि वैन आँ कर उनकेबगल मे रुकी ! फिनउन दो मे सें एक् व्यक्ति उसवैन मे चढ़ा, फिन मेरी चाची औऱ फिन दूसरा व्यक्ति चढ़ा | तीनो केँ वैन मे बैठते हि, वैन तेज़ी सें दूसरी तरफ़ निकल गई, | मे हैरत औऱ भौचक्का सां उन्हें जाते देखता रहा | वैसे भि इस परिस्तिथि मे मेरेपास करने केँ कुछ नाँ थां | थोड़ी बहोत जासूसी कररहा हूं तौ इसका मतलबयह थोड़े हैं कि मे भि कोई व्योमकेश बक्शी याँ सुपर कमांडो ध्रुव हूं.|
उसवैन केँ जाने केँ बाद टेलर दूकान सें एक् अधेड़ उम्र कां व्यक्ति निकला। सच कहूं तौ उसकी उम्रकुछ ज्यादा हि लगरही थि | उसने दुकान केँ दरवाज़े बंद किये, ताले लगाए औऱ उसवैन मे जाकरबैठ गय़ा | उसके बैठते हि वैन भि वहा सें चल दिया |
भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai – New Episode
यहादो बातें बताना ज़रूरी हैं, पहला तौ यह कि जबवे दोनों व्यक्ति चाची कों लें कर उतरे थें तब मैंने उनके चेहरों पर्र गौर किया थां | हाइट काठी सें तोँ यहा केँ नहि लगरहे थें, संग हि उनके चेहरे कि रंगत भि अजीब सि थि। सफ़ेद सफ़ेद सि। औऱ ऐसी रंगत मे टेलीविज़न पर्र कश्मीरियों केँ देखे थें ! दूसरी बातये कि जब चाची टेलर दुकान सें निकली तब मैंने जौ देखा थां, उसेदेख कर तौ मेरा दिमाग़ ऐसा घुमा, ऐसा घूमा कि मे बेहोश होते होतेबचा थां | कारण थां कि जब चाची टेलर कि दूकान सें निकली तब भि बुर्के मे हि थि पर्र पता नहि क्यूं मुझेऐसा लगरहा थां कि जैसे मे इतनीदूर सें भि चाची केँ प्रत्येक अंग प्रत्यंग कों भली भांति नं केवलदेख सकता हूं, बल्कि उनकेबदन केँ हरेक कटाव कों भि महसूस कर सकता हूं !! यहा तक कि बुर्के केँ नीचे सें जौ थोड़ी बहोत भि चाची कि साड़ी पहलेदिख रही थि, वोँ भि मुझेइस बार नहि दिखी ! मनघोर आशंकाओं सें भरउठा थां |
कुछदेर वहीँ रुकने केँ बाद मैंने अन्दर जाने कां फैसला किया | येऐसा इलाका थां जहां इंसान तौ छोड़िये, दूरदूर तक एक् पक्षी तक नहि दिखरही थि | मैंने दौड़कर रोडपार किया औऱ एक् पुरानी टूटे घर-मकान केँ छत पऱ सें कूदकर मे उस टेलर वाले दुकान केँ घर-मकान केँ छत पर्र जा पहुंचा | ऊपर कि हि एक् टूटी खिड़की सें अन्दर दाखिल हुआ | चारों तरफ़ सिलाई केँ कामआने वाले कपड़ों केँ टुकड़े औऱ धागेरखे औऱ गिरेहुए थें | दूसरा कमरे कां हाल भि कमोबेश कुछऐसा हि थां | तीसरे कमरे मे देखाढेर सारे छोटे बड़े डब्बे रखेहुए थें | उन्हें खोलकर देखा तोँ उनमें रंग बिरंगे धागे पाया | उसरूम कों छोड़ बाहर् निकला औऱ सीढ़ियों केँ रास्ते नीचे उतरा। नीचेदो कमरे थें | एक् जहां सिलाई होती हैं, सिलाई मशीन भि रखे थें.यह शायद सामने सें दूकान मे घुसते हि पड़ने वालारूम होगा। मे दुसरे कमरे मे गय़ा | अँधेरा थां वहा। शायद कपड़े बदलने वालारूम होगा | पहले सोचा कि छोड़ो दोस्त, कौन जाता हैं फिन नाँ जाने क्याँ सोचते हुए मे अन्दर चला हि गय़ा | रूम मे अँधेरा थां तौ देखने केँ लिए मैंने स्विच बोर्ड ढूंढकर लाइटऑन किया औऱ फिन जोँ मैंने देखा वोँ देखकर तोँ मे स्वयं केँ कुछ भि सोचने समझने कि शक्ति मानोखो हि दिया | सामने मेरी चाची केँ वही ब्लडरेड कलर कि साड़ी औऱ वही गोल्डन थ्रेड सिलाई वाला मैचिंग ब्लाउज नीचेमेज पर्र गिरी हुई थि !! संग हि एक् पेटीकोट, एक् पैंटी औऱ एक् सफ़ेद ब्रा भि उन पऱ रखी हुई मिली!! मेरा दिमाग़ तोँ जैसे सुन्न सां होँ गय़ा | त। तोँ क्याँ.इस.इसका मतलब चाची अपने कपड़े यहीं छोड़उन लोगों केँ संग नंगी हि कहींचली गई। ऑफ़ कोर्स उन्होंने बुर्का पहना थां। पर्र थि तौ नीचे सें नंगी हि | मेरासिर चकराया औऱ मे पीछे कि तरफ़ गिरा पर्र पीछेरखे एक् लकड़ी केँ अलमारी सें टकरा गय़ा | मेरे टकराने सें अलमारी केँ अन्दर कुछ भारी सां आवाज़ हुआ | स्वयं कों थोडा संभाल कर मे उठा औऱ बिना तालालगे अलमीरा केँ दरवाज़े कों खोला.अब एक् बारफिन औऱ पहले सें कहीं ज्यादा चौकने कि बारी थि मेरी | अलमारी मे कईतरह केँ, छोटे बड़े औऱ अलगअलग सें दिखने वाले हथियार जैसे कि हैण्ड ग्रेनेड्स, पिस्तौल, एके 47, जैकेट्स औऱ औऱ भि कईतरह केँ हथियार करीने सें सजाकर रखेहुए थें | दिमाग़ अब भन्न भन्न सें बजरहा थां मेरा। खतरे कि घंटी तौ बज हि रही थि। औऱ जौ ख्याल मेरे जेहन मे आँ रहे थें, कि ‘हे ईश्वर। यह कहां औऱ किन लोगों केँ बीच हैं चाची.?? कहां फंस गई वोँ?’
अपने सामने हथियारों कां जखीरा देखकर मे दंग थां | हाथ औऱ होंठ काँपउठे थें | बदन केँ सब जोड़ जैसे ढीले पड़ने लगे | माथे पर्र लम्हा भर मे हि छलकआईं पसीने कि बूँदों कों हाथ सें पोछा औऱ बड़ी सावधानी सें काँपते हाथों सें मैंने अलमीरा केँ दरवाजों कों लगाया | फिन वहींपास मे हि रखे एक् छोटे सें स्टूल पऱ सिर कों दोनों हाथों सें पकड़कर बैठ गय़ा | कमरे मे मौजूद सब चीज़ें जैसेजोर ज़ोर सें मेरे चारों ओर चक्कर काटरहे थें | घबराहट औऱ डर केँ कारण मेरादिल किसी धौंकनी कि तरह जोरो सें चलरहा थां | मैंने वहां ज्यादा वक्त बिताना उचित नहि समझा, आगे कां क्याँ सोचना हैं औऱ क्याँ नहि, यहसभी तौ यहा सें निकलकर घऱ पहुँचने केँ बाद हि सोच पाऊंगा | फ़िलहाल इतनीबात तोँ मेरे कों बिल्कुल अच्छे सें समझ मे आँ गई, थि कि चाची एक् बहोत हि बड़ी औऱ पेचीदे मुसिबत मे फंसी हैं औऱ बहोत जल्द इसकीआंच हमारे परिवार पर्र आने वाली थि | खासकर मे जिसतरह सें इस मुसीबत कां पता करने केँ लिए पीछे पड़ा थां, कोईशक नहीं कि चाची केँ बाद अगला व्यक्ति मे हि होऊँगा इस भँवर मे फँसने वाला | स्वयं कों संभालते हुए किसीतरह खड़ाहुआ | हवाईयाँ तोँ अब भि चेहरे कि उड़ी हुइ थीं | गला भि सूख गय़ा थां | मुँह मे बचे खुचेथूक कों गटककर गले कों भिगाने कि कोरी कोशिश करतेहुए रूम सें बाहर् कदमरखा | जिस अदम्य साहस कां परिचय देतेहुए मे यहा तक आया थां, अब बाहर् जाने केँ लिए वोँ साहसबचा नहि | लड़खड़ाते कदमों सें सीढ़ियों कि तरफ़ बढ़ा हि थां कि तभी बाहर् सें किसी कि आवाज़ आई | मेरेकान खड़ेहुए | इधरउधर देखा | छुपने कां कोई स्थान नहि थां | बसयह सीढ़ी थि जौ पीछे सें आधी अधूरी बनी थि | मे जल्द सें सीढ़ी केँ पीछेछिप गय़ा |
भरोसे की कसौटी - Chachi Ki Chudai - Next part mein bada twist
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