ये क्या कर रही हो माँ! - Maa Beta Ka Rishta - Real Story Continue Part 1
दोस्तों यह स्टोरी परिवार मे यौन संबंधो पऱ आधारित हैं जिस भि पाठक कों असहजता होती हैं इसे पढने मे जिसेऐसी कहानियों मे रुचि नहीं हैं वोँ यह किस्सा नाँ पढें। औऱ किस्सा मै अपनेमन मे लिखूंगा कोई भि पाठक सुझाव दे सकता हैं यंदि मुझे सुझाव मनपसंद आया तोँ मै अपनीकथा मे शामिल करूंगा मगरकोई भि जबरदस्ती नहींकर सकता कि मै दिया गय़ा सुझाव स्वीकार करूयह पूर्णतः मेरी ख़्वाहिश पर्र निर्भर करेगा।
पहलीकडी जल्द हि पोस्ट करूँगा, शुक्रिया।।
ये क्या कर रही हो माँ! - Maa Beta Ka Rishta – New Episode
बात 1977 कि हैं जब भारत केँ उत्तरी भाग केँ किसी गाँव मे दो परिवार रहते थें। पड़ोसी तौ वोँ थें हि मगर एक् औऱ बात थि, जौ उनमें समान थि याँ शायद असामान्य थि; वोँ ये कि दोनों परिवारों मे दो-दो हि सदस्य थें। एक् परिवार मे पिता कां देहांत होँ चुका थां तौ दूसरे मे मां नहि थि, मगर दोनों केँ एक्-एक् बेटा थां। विराज तब ग्यारह कां होगा औऱ जयदस कां; दोनों कि बहोत पक्की दोस्ती थि।
दोस्ती तोँ विराज कि मां सें, जय केँ बाबा कि भि अच्छी थि, मगर समाज कों दिखाने केँ लिए वोँ अक्सर यही कहते थें कि अकेली स्त्री कां इकलौता बेटा हैं तोँ उसकी सहायता कर देते हें। ऐसे तोँ विराज केँ घऱ केँ सारे बाहरी कामजय केँ बाबा हि करते थें; चाहे वोँ किराने कां सामान लाने कि बात हौ याँ फिन खेती-बाड़ी केँ काम;मगर दुनिया कों दिखाने केँ लिए विराज कों हमेशा संग रखना होता थां।
विराज कि मम्मी भि अपने लायक सारेकाम कर दिया करती थि, जैसे कि जय औऱ उसके बाबा केँ लिए खानां बनाना, कपड़े धोना औऱ उनकेघऱ कि साफ़-सफाई। मगरयह शायद हि किसी कों पता थां कि वोँ सिर्फ घऱ कि साफ़-सफाई मे हि नहि बल्कि चुदाई मे भि पूरासंग देती थि।
सच कहें तौ इसमें कोई बुराई भि नहि थि; दोनों अपने जीवनसाथी खो चुके थें, ऐसे मे हरतरह सें एक् दूसरे कां सहारा बनकर ज़िन्दगी काटना हि सही तरीका थां।
विराज कों अक्सर खेती-बाड़ी केँ काम केँ लिए खेत-खलिहान मे रहना पड़ता थां। नाम केँ लिए हि सहीमगर इसवजह सें वोँ पढ़ाई मे बहुत पिछड़ गय़ा थां। यूँ तौ साराकाम जय केँ बाबा करवाते थें मगर विराज उनकेसंग घूमघूम कर दुनियादारी कुछ जल्द हि सीख गय़ा थां। किताबों सें अधिकउसे खेती औऱ राजनीति कि समझ होँ गई थि। वैसे भि उम्र मे जय सें थोडा बड़ा हि थां तौ विद्यालय मे उसकेडर सें जय कि तरफकोई नज़रउठा करदेख भि नहि सकता थां। जय भि पढ़ाई मे विराज कि सहायता कर दिया करता थां।
जब भि विराज कों काम सें औऱ जय कों पढ़ाई सें फुर्सत मिलती तोँ दोनों संग हि रहते थें। कभी अपने पहिये दौड़ाते हुएदूर खेतों मे चले जाते तौ कभीनदी किनारे जाकर चपटे पत्थरों कों पानी पऱ टिप्पे खिलवाते। जबथक जाते तोँ कहीं अमराई मे बैठकर गप्पें लड़ते रहते। दोनों केँ बीचकभी कोईबात छिपी नहि रह पाती थि। हरबात एक् दूसरे कों बता दिया करते थें।
अब तक तोँ यह बातें बच्चों वाली हि हुआ करतीं थींमगर अब दोनों किशोरावस्था कि दहलीज़ पऱ खड़े थें; अब बहोत कुछ बदलने वाला थां।
विराज कि मम्मी कामुक प्रवृत्ति कि तोँ थि हि लकिनसंग मे वोँ एक् दबंग औऱ बेपरवाह किस्म कि स्त्री भि थि। विराज केँ सामने हि कपड़े बदल लेना, याँ नहाने केँ बाद अपने उरोजों कों ढके बिना हि विराज केँ सामने सें निकल जानां एक् आमबात थि। वैसे विराज नें कभीउसे कमर सें नीचे नंगी नहि देखा थां औऱ नं हि उसकीइस स्वच्छंदता केँ पीछे अपने बेटे केँ लिएकोई वासना थि। उसकी काम-वासना कि पूर्ति जय केँ बाबा सें होँ जाती थि। यह तौ शायदउसे ऐसाकुछ लगता थां शायद कि मां केँ मम्मों तौ होते हि उसके बच्चे केँ लिए हें तोँ उस सें उन्हें क्याँ छिपाना।
विराज बारहसाल कां होने कों आँ गय़ा थां मगरअब भि कभीकभी उसकी मम्मी उसे अपनादूध पिला दिया करती थि। दूध तौ इस उम्र मे क्याँ निकलेगा मगरयह दोनों केँ रिश्तों कि नजदीकियों कां एक् मूर्त रूप थां। वैसे तौ यह मां-बेटे केँ बीच कां एक् वात्सल्य-पूर्ण क्रिया-कलाप थां, मगरआज कुछ बदलने वाला थां। विराज आज अपनीफसल बेचकर आया थां। आँ कर उसने सारे पैसे मां कों दिएफिन नहाधो कर खानां खाया, औऱ फिन मां-बेटा सोनेचले गए। दोनों एक् हि खाट पऱ संग हि सोते थें।
विराज- मां, तुझेही पता हैं आज वोँ सेठ गल्ला कमभाव पे लेने कां बोलरहा थां।
मम्मी- फिन?
विराज- फिन क्याँ! मैंने तोँ बोल दिया कि सेठ! हमरेबैल इत्ते नाजुक भि नैयें केँ दूसरी मंडी तक नाँ जा पाएंगे। फिन आँ गओ लाइन पे। जित्ते कई थि उत्तेई दिए।
मम्मी- अरे मेरा बेटा तौ सयाना होँ गय़ा रे।
इतनाकह कर मां नें विराज कों चूम लिया औऱ गले सें लगा। लिया। फिन दोनों पहले जैसे लेटे थें वैसे हि लेटकर सोने कि कोशिश करनेलगे। कुछदेर केँ सन्नाटे केँ बाद धीरे-धीरे सें मां कि आवाज़ आई- दुद्दू पियेगा?
विराज- हओ!
मम्मी नें अपने ब्लाउज केँ नीचे केँ कुछबटन खोले औऱ अपन एक् बूब्ज़ निकाल कर विराज कि तरफ़आगे कर दिया। विराज हमेशा कि तरह एक् हाथ सें उसको सहारा देकर चूचुक अपने मुँह मे लेँ करऐसे चूसने लगा जैसे वोँ उसकीआज कि मेहनत कां इनाम हौ।
ये क्या कर रही हो माँ! - Maa Beta Ka Rishta – New Episode
मगरअब बचपनसंग छोड़रहा थां औऱ वक्त केँ संग मम्मी नें भि ऐसे आग्रह करना पहलेकम औऱ फिन धीरे-धीरे धीरे-धीरे बंदकर दिए। विराज भि अपनी किसानी केँ काम मे व्यस्त रहनेलगा औऱ उसके अन्दर सें भि यह बच्चों वाली चाहतें समाप्त होने लगींथीं औऱ अब उसकी अपनी उम्र केँ लोगों केँ संग ज़्यादा जमनेलगी थि खासतौर पर्र जय केँ संग। वक़्त यूँ हि बीत गय़ा औऱ दोनों विवाह लायक होँ गए।
एक् दिनजय विराज कों अपनेसंग एक् ऐसी स्थान लें गय़ा जहाँ सें वेछुप छुपकर गाँव कि लड़कियों कों नहाते हुएदेख सकते थें। उन लड़कियों केँ नग्न स्तनों कों देखकर अचानक विराज कों अपना बचपनयाद आँ गय़ा जब वोँ अपनी मम्मी कां दूध पिया करता थां
उसीरात विराज नें अपनी मम्मी कों फिनदूध पिलाने कों कहा। वैसे तौ मम्मी कों ये बड़ी अजीबबात लगीमगर उसकेलिए तोँ विराज अब भि बच्चा हि थां तोँ उसनेहाँ कह दिया। मम्मी नें पहले कि तरह अपने ब्लाउज केँ नीचे केँ कुछबटन खोले औऱ अपना एक् बूब्ज़ निकाल कर विराज कि तरफ़आगे कर दिया। मगर आजउसे चूसने सें ज्यादा मजा छूने मे आँ रहा थां। उसकी उँगलियाँ अपने आप् उस बूब्ज़ कों सहलाने लगीं जैसे कि सितार बजाया जारहा होँ। मगर सितार एक् हाथ सें केसे बजता। विराज कां दूसरा हाथ अपने आप् ब्लाउज केँ अंदरसरक गय़ा औऱ उसने अपनी मां कां दूसरा मम्मों पूरीतरह अपनी हथेली मे भर लिया।
एक् बूब्ज़ आधा औऱ एक् पूरा उसकेहाथ मे थां औऱ वोँ दोनों कों सहलारहा थां। आजउसे कुछअलग हि अनुभूति होँ रही थि। धीरे-धीरे धीरे-धीरे सहलाना, मसलने मे बदल गय़ा। औऱ तभी विराज नें महसूस किया कि उसका लन्ड कड़क हौ गय़ा हैं। यूँ तौ उसने पहले भि कईबार सुभह सुभह नींद मे ऐसा महसूस किया थां मगर अभि यह जोँ हौ रहा थां उसकाकोई तोँ सम्बन्ध थां उसकी मां केँ स्तनों केँ संग। उसकीबाल बुद्धि मे येबात स्पष्ट नहि हौ पारही थि कि ऐसा क्यूं होँ रहा हैं। इसी बेचैनी मे वोँ चूसना छोड़कर ज़ोर ज़ोर सें स्तनों कों मसलने लगा।
मम्मी- ऊँ…हूं… बहोत पी लियादूध… अबसोजा।
विराज समझ गय़ा कि मां उसकीइस हरकत सें खुश नहि हैं। वैसे तोँ उसकी मां वात्सल्य कि मूर्ति थि मगरअगर क्रोध हौ जाए तोँ इकलौता बेटा होने कां लिहाज़ नहि करती थि। विराज कों पता थां कि अबयहसभी कोशिश करना खतरे सें खाली नहि हैं औऱ उसने निश्चय किया कि अब वोँ यहसभी मां केँ संग नहि करेगा।
अगलेदिन विराज अपनेइस नए अनुभव केँ बारे मे जय कों बताने केँ लिए बेचैन थां। जैसे हि मौका मिला, जय कों कहा-चल अमराई मे चलकर बैठते हें।
दोनों अपनी हमेशा वाली आरामदायक स्थान पर्र जाकर बैठे औऱ विराज नें जय कों सारा किस्सा बताया कि केसे मम्मी केँ बूब्ज़ दबाने सें उसका लन्ड कड़क हौ गय़ा थां।
जय कों विश्वास नहि हुआ- क्याँ बातकर रहा हैं? ऐसा भि कोई होता हैं क्याँ! मे नहि मानता।
विराज- अरे मे सचकहरहा हूं। केसे समझाऊं? अब तेरे सामने तोँ नहि कर सकता न्…
जय-आंख बंद करकेसोच उससमय कैसालग रहा थां।
विराज- एक् कामकर मे तेरे पुन्दे मसलता हूं, आँखें बंद करके औऱ सोचूंगा कि मम्मी केँ दुद्दू दबारहा हूं।
जय- तूँ मेरे मज़े लेने केँ लिए एक्सक्यूज़ तौ नहि माररहा हैं नां? तूँ भि अपनी चड्डी उतार! मे भि देखूंगा तेरा नुन्नू केसे खड़ा होता हैं।
दोनों नें अपनी चड्डी उतार दि। जय, विराज केँ बगल मे थोडा आगे होकर खड़ा होँ गय़ा औऱ पीछे मुड़कर विराज केँ मुरझाये लण्ड कों देखने लगा। विराज नें आँखें बंदकीं औऱ जय केँ नितम्बों कों सहलाते हुएकल रात वाली यादों मे खो गय़ा। थोड़ी हि देर मे उसका लण्ड थोड़े थोड़े झटके लेनेलगा।
जय-अरे यह तौ उछलरहा हैं। कर-कर औऱ अच्छे सें यादकर!!
जय कि बात नें विराज कि कल्पना मे विघ्न डाल दिया थां, मगर कल्पना कब किसी केँ वश मे रही हैं। विराज कि कल्पना केँ घोड़े जौ थोड़े सच्चाई कि धरती पऱ आये तौ एक् नया मोड़ लें लिया औऱ उसेलगा कि जैसे वोँ अपनी मां केँ नितम्ब सहलारहा हैं। इतनामन मे आते हि टन्न सें उसका लण्ड खड़ा होँ गय़ा।
जय-अरे! यह तौ सच मे खड़ा हौ गय़ा!!
विराज नें भि आँखें खोललीं।
विराज- तूँ तोँ मान हि नहि रहा थां!
जय-छू केँ देखूं?
विराज- देख लें! अब मैंने भि तोँ तेरे पुन्दे छुए हें तोँ तुम्हारी तरफ क्याँ मना करूँ।
जय नें अपनीदो उंगलियों औऱ अंगूठे केँ बीचउस छोटे सें लण्ड कों पकड़कर देखा, थोडा दबाया थोडा सहलाया।
विराज- औऱ कर दोस्त! मजा आँ रहा हैं।
जय-ऐसे?
विराज- हाँ… नहि-नहि ऐसे नहि… हाँ…बस ऐसे हि करतारह… बड़ामजा आँ रहा हैं याऽऽऽर!
इसतरह धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों दोस्त जल्द हि अपने आप् सीखगए कि लण्ड कों केसे मुठियाते हें। यह पहलीबार थां तोँ विराज कों ज्यादा वक्त नहि लगा। वोँ जय केँ हाथ मे हि झड़ गय़ा।
विराज- ओह्ह…अहह…!
जय-अबे, यह क्याँ हैं? पेशाब तोँ नहि हैं… सफ़ेद, चिपचिपा सां?
विराज- पता नहि दोस्त मगरजब निकला तौ एक् करंट जैसालगा थां। मजा आँ गय़ा मगर मस्त वाला।
जय- सफ़ेद करंट!हे हेहे…चल तुम्हारी तरफ इतनामजा आया तौ मुझे भि कर नाँ।
विराज- मगर तेरा तौ खड़ा नहि हैं?
भले हि दोनों जवान हौ चुके थें, 18 पारकर चुके थें मगर मासूमियत अभि संग छोड़कर गई नहि थि। समय धीरे-धीरे धीरे-धीरे सभी सिखा देता हैं। धीरे-धीरे धीरे-धीरे दोनों साथी अपनेइस नएखेल मे लगगए थें। उन्होंने लण्ड कों खड़ा करना, मुठियाना औऱ तौ औऱ चूसना भि सीख लिया। मगर दोनों मे सें कोई भि समलैंगिक नहि थां। उनकी कल्पना कि उड़ान हमेशा विराज कि मां केँ चारों औऱ हि घूमती रहती थि।
इसीबीच एक् रात विराज नें अपनी मम्मी कों पलंग सें उठकर जातेहुए देखा। थोड़ी देरबाद जब उसनेछिप कर दूसरे कमरे मे देखा तौ उसकी मां जय केँ पिताजी सें चुदवा रही थि। इसबात सें तौ विराज-जय कि दोस्ती औऱ गहरी हौ गई। दोनों अपने मम्मी बाप कि चुदाई कि बातें कर-कर केँ एक् दूसरे कां लण्ड मुठियाते तौ कभी पूरे नंगे हौ कर एक् संग एक् दूसरे कां लण्ड चूसते औऱ संग-संग एक् दूसरे केँ जिस्म कों सहलाते भि जाते।
कभी कभी तौ जब मौका मिलता तोँ दोनों छिपकर अपने मम्मी-बाप कि चुदाई देखते हुए एक् दूसरे कि मुठमार लेते। मगर दोनों कि इस लंगोटिया यारी मे एक् बड़ा मोड़तब आयाजब विराज केँ लिए विवाह कां नाताआया।
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