♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो, एपसोड लिख तोँ लिया हैं मैनेमगर मे सोचरहा हूॅ कि विधी कां सारा किस्सा इस एक् हि एपसोड मे ख़त्म करदूॅ। आप् तौ जानते हें कि इसभाग मे भावनाओं औऱ जज़्बातों कि ऑधियाॅ चलनी हें, इसलिए इस एपसोड कों उसतरह सें लिखना बहोत हि मुश्किल काम हैं। मगर मुझसे जैसा भि बनसका मैने लिखा हैं इसे।
विधी वाला मैटर करीब-करीब ख़त्म हि हौ चुका हैं बस थोडा बाॅकी हैं। आप् यकीन नहि करेंगे दोस्तो कि इसमें मेरी क्याँ हालत हुइ हैं। मैने बहोत सोचसोच करइसे लिखा हैं, कदाचित यहीवजह थि कि आज मे इसे पूरीतरह सें सजधजकर नहि कर पाया औऱ नाँ हि इसे आपके सामने हाज़िर कर पाया, जबकि मैने आप् सबसे वादा किया थां कि आज एपसोड अवश्य दूॅगा। ख़ैर, इसकेलिए मे आप् सबसेतहे दिल सें मुआफ़ी चाहता हूॅ। दरअसल, आधा अधूरा एपसोड देने कां कोई मतलब नहि हैं। इससे आपका हि दिमाग़ ख़राब होगा। इस लिए मे सोचरहा हूॅ कि इसका पूरा एपसोड कल पोस्ट करूॅ।
कुछ दोस्तों नें मुझे सुझाव दिया थां कि मे किसी नोटपैड पऱ एपसोड लिखूॅ ताकि डिलीट हौ जाने कां चान्स न् रहे। मैंने उस सुझाव पर्र अमल भि किया औऱ नोटपैड पऱ हि एपसोड लिखा हैं मैने। हलाॅकि उसमें मुझेयह समझ मे नहि आया कि मैने कितना लिखा हैं? एपसोड यहाॅ पर्र लिखने कि अपेक्षा बड़ा हैं याँ छोटा? नोटपैड पर्र मेरायह पहला तज़ुर्बा हैं इसलिए शायद पहलीबार मे समझ मे नहि आएगा। मगर अगलीबार केँ लिए अवश्य समझ मे आँ जाएगा।
अंत मे एक् बारफिन सें आपसे मुआफ़ी चाहूॅगा दोस्तो, मगरकल आपको कंम्प्लीट भाग मिलेगा यह मेरा वादा हैं आपसे।
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग.《 45 》
अब तक,,,,,,,,,
बेड पर्र पड़े ब्यक्ति केँ चेहरे कि तरफआकर मेरी नज़रजिस चेहरे पऱ पड़ीउसे देखकर मे बुरीतरह उछल पड़ा। हैरत औऱ आश्चर्य सें मेरी ऑखेंफट पड़ीं। लेकिन फिन जैसे एकदम सें मुझेहोश आया औऱ मेरी ऑखों केँ सामने मेरा गुज़रा हुआ वोँ कल घूमने लगा जिसमें मे थां एक् विधीनाम कि लड़की थि औऱ उस लड़की केँ संग शामिल मेरा प्रेम थां। फिन एकाएक हि तस्वीर बदली औऱ उस तस्वीर मे उसी विधीनाम कि लड़की कां धोखा थां, उसकी बेवफाई थि। उसी तस्वीर मे मेरा वोँ रोना थां वोँ चीखना चिल्लाना थां औऱ नफ़रत मेरी थि। यहसभी चीज़ें मेरी ऑखों केँ सामने कईबार तेज़ी सें घूमती चली गई।
मेरे चेहरे केँ भाव बड़ी तेज़ी सें बदले। दुख दर्द औऱ नफ़रत केँ भाव एक् संगआकर ठहरगए। ऑखों मे ऑसूॅभर आएमगर मैने उन्हें शख्ती सें ऑखों मे हि जज़्ब कर लिया। दिल मे एक् तेज़ गुबार सां उठा औऱ उस गुबार केँ संग हि मेरी ऑखों मे चिंगारियाॅ सि जलने बुझने लगीं।
मेरेदिल कि धड़कने औऱ मेरी साॅसें तेज़ तेज़ चलनेलगी थि। मेरेमुख सें कोई अल्फाज़ नहि निकलरहे थें। लेकिन यहसच हैं कि कुछ कहने केँ लिए मेरे होंठ फड़फड़ा रहे थें। मुझेऐसा लगरहा थां कि याँ तौ मे स्वयं कों कुछकर लूॅ याँ फिनबेड पऱ ऑखेंबंद किये आहिस्ता पड़ीइस लड़की कों समाप्त करदूॅ। लेकिन जाने केसे मे कुछकर नहि पारहा थां।
अभि मे अपनीइस हालत सें जूझ हि रहा थां कि सहसाबेड पर्र धीरे-धीरे करवॅट लिए पड़ीउस बला नें अपनी ऑखें खोलीजिस बला कों मैनेटूट टूटकर चाहा थां।
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अबआगे,,,,,,,,,
उथर, अभय चाचा कि ससुराल मे।
करुणा चाची इससमय अपने कमरे मे आरामकर रही थि। दोपहर हौ चुकी थि। सभी लोगों केँ खानां खा लेने केँ बाद उन्होंने भि खाया औऱ फिन आराम करने केँ लिए अपने कमरे मे चलीगईं। करुणा चाची केँ मायके वालों कां परिचय देने कि यहाॅ पऱ कदाचित कोई ज़रूरत तौ नहि हैं पर्र फिन भि पाठकों कि जानकारी केँ लिएदे हि देताहूॅ।
चन्द्रकान्त सिंह राजपूत, यह करुणा चाची केँ दादाजी जी हें। इनकीउमर इस वक़्त पैंसठ केँ ऊपर हैं। यह एक् फौजी व्यक्ति हें। फौज मे मेजर थें यह। अब तौ ख़ैर सरकारी पेंशन हि मिलती हैं इन्हें लेकिन स्वयं भि घऱ परिवार औऱ ज़मीन जायदाद सें सम्पन्न हें यह।
हेमलता सिंह राजपूत, यह करुणा चाची कि दादीमा हें। यह बाॅसठ साल कि हें। चन्द्रकाॅत सिंह औऱ हेमलता सिंह केँ तीन लड़के औऱ एक् लड़की थि।
उदयराज सिंह राजपूत, यह चन्द्रकाॅत सिंह केँ बड़े बेटे थें जोँ कुछसाल पहले गंभीर बीमारी केँ चलते ईश्वर कों प्यारे होँ चुके हें।
सुभद्रा सिंह राजपूत, यह करुणा चाची कि माॅ हें। उमरयही कोई पचास केँ आसपास। विधवा हें यह। इनकेदो हि बच्चे हें। सबसे पहले करुणा चाची उसकेबाद हेमराज सिंह राजपूत। हेमराज सिंह कि भि विवाह होँ चुकी हैं औऱ उसकेदो बच्चे हें।
मेघराज सिंह राजपूत, यह करुणा चाची केँ चाचा हें। इनकीउमर पचास केँ आसपास हैं। पढ़े लिखे हें यह। मगर अपनी सारी ज़मीनों पऱ खेती बाड़ी कां काम करवाते हें। इनकी पत्नि कां नाम सरोज हैं जोँ कि पैंतालीस साल कि हें। इनकेदो बेटे हें जौ शहर मे रहकर पढ़ाई करते हें।
गिरिराज सिंह राजपूत, यह करुणा चाची केँ छोटे चाचा हें। यह पैंतालीस साल केँ हें औऱ शहर मे हि रहते हें। शहर मे यह एक् बड़ी सि प्राइवेट कंपनी मे बड़ी पोस्ट पऱ कार्यरत हें। इनकी पत्नि कां नाम शैलजा हैं। इनकेदो बच्चे हें जोँ शहर मे हि रहते हें अपनेमाॅ बाप केँ संग।
पुष्पा सिंह, यह करुणा चाची कि इकलौती फूफी हें। उमरयही कोई चालीस केँ आसपास। इनके पति कां नामभरत सिंह हैं। यह पेशे सें सरकारी डाक्टर हें। पुष्पा फूफी केँ दो बच्चे हें। एक् बच्चा पढ़ाई करके एक् बड़ी कंपनी मे जॉबकर रहा हैं जबकि दूसरा बेटा अपने बाप कि तरह डाक्टर बनना चाहता हैं इसलिए डाक्टरी कि पढ़ाई कररहा हैं।
तोँ यह थां करुणा चाची केँ मायके वालों कां संक्षिप्त परिचय। अबकथा कि तरफ चलते हें।
करुणा चाची अपने कमरे मे बेड पर्र पड़ी किसी गहरे ख़यालों मे गुम थि। कल उनकेपास उनके पति अभय कां मोबाइल आया थां। उन्होंने बताया थां कि विराज किसीकाम सें गावआया हैं, इसलिए वोँ बच्चों कों लेकर उसकेसंग हि मुम्बई आँ जाए। अभय नें करुणा कों पहले हि बता दिया थां कि वोँ मुम्बई मे विराज केँ संग हि रहरहा हैं। उसने सारीराम स्टोरी करुणा कों बता दिया थां।
करुणा अपने पति सें असलियत जानकर बहोत हैरान हुईँ थि औऱ बेहद दुखी भि। उसने स्वप्न मे भि उम्मीद न् कि थि कि एक् भइया अपने भइया कों इसतरह जान सें मार सकता हैं। अपनी जेठानी प्रतिमा केँ चरित्र कां सुनकर उसे लकवा सां मार गय़ा थां। उसकेमन मे प्रतिमा केँ प्रति घृणाव नफ़रत पैदा हौ गई थि। उसेयाद आता कि केसे प्रतिमा उसकेपास आकर उससे अश्लील बातें किया करती थि।
करुणा कों अबसमझ मे आया थां कि उसकी जेठानी उससेऐसी अश्लील बातें क्यूं किया करती थि। उसका एक् हि मकसद होता थां कि वोँ करुणा सें ऐसी बातें करके उसके अंदर वासना कि आग कों भड़का दे ताकि करुणा उसआग मे जलतेहुए कुछ भि करने कों रेडी हौ जाए। करुणा यहसभी सोचसोच कर हैरान थि कि उसकी जेठानी उसकेसंग क्याँ करना चाहती थि।
करुणा नें ईश्वर कां लाखलाख धन्यवाद अदा किया कि अच्छा हुआ कि वोँ अपनी जेठानी कि उन बातों सें स्वयं कों सम्हाले रखा थां। वरना जाने कैसा अनर्थ हौ जाता। अभय नें उसेसभी कुछबता दिया थां। उसने करुणा कों बता दिया थां कि उसका भतीजा विराज अब बहोत बड़ा व्यक्ति बन गय़ा हैं। उसने बताया कि केसे एक् ग़ैर इंसान नें उसे अपना बेटा बना लिया औऱ उसकेनाम अपनी अरबों कि संपत्ति कर दि। करुणा यहसभी जानकर बहोत खुश हुई थि। उसकी ऑखों सें ऑसूछलक पड़े थें यहसभी जानकर।
अभय नें जब उससेकहा कि वोँ बच्चों कों लेकर विराज केँ संग मुम्बई आँ जाए तौ वोँ इसबात सें बड़ाखुश हुइ थि। उसेलग रहा थां कि कितना जल्द वोँ मुम्बई पहुॅच जाए औऱ बड़ी बेहन केँ समान अपनी जेठानी गौरी सें मिले। उससेमिल कर वोँ अपने व्यवहार केँ लिए माफ़ी मागना चाहती थि औऱ उससे लिपटकर खूब रोना चाहती थि। जब सें उसेअभय केँ द्वारा सारी सच्चाई कां पताचला थां तब सें वो अकेले मे अक्सर ऑसू बहाती रहती थि। उसे अपनी जेठानी गौरी केँ संग बिताए हरसमय यादआते। उसेयाद आता कि केसे गौरीउसे अपनी छोटी बेहन कि तरह मानती थि औऱ उससे प्रेम करती थि। उसेकोई काम नहि करने दिया करती थि। वोँ हमेशा यही कहती कि तुम् पढ़ी लिखी होँ इसलिए तुम्हारा काम मात्र बच्चों कों पढ़ाना हैं। घऱ केँ सारेकाम वोँ स्वयं कर लेगी।
बेड पऱ पड़ी करुणा यहसभी सोचसोच करऑसू बहा हि रही थि कि सहसा उसकाफोन बजउठा। वोँ ख़यालों केँ अथाह सागर सें बाहर् आई औऱ सिरहाने रखेफोन कों उठाकर उसकी स्क्रीन मे फ्लैश कररहे 'अभयजी' नाम कों देखा तोँ जल्दी हि उसनेकाल कों रिसीव करफोन कों कान सें लगा लिया।
".। " उधर सें अभय नें कुछकहा।
"क्याँ???" करुणा हल्के सें चौंकी____"आज हि निकलना होगा मुझे?मगर बात क्याँ हैं जी? आप् तोँ कहरहे थें कि कल जानां हैं। "
".। " उधर सें अभय नें फिनकुछ कहा।
"यह क्याँ कहरहे हें आप्?" करुणा केँ चेहरे पऱ एकाएक हि चिंता केँ भाव आँ गए___"ऐसा केसे हौ सकता हैं?"
".। " उधर सें अभयकुछ देर तक उससेकुछ कहतारहा।
"ठीक हैं आप् चिंता मत कीजिए। " करुणा नें कहा__"मे हेमराज केँ संग हि बच्चों कों लेकर यहाॅ सें निकलूॅगी। उसकेबाद मे रेलवे स्टेशन पर्र विराज सें मिल लूॅगी। "
".। " उधर सें अभय नें फिनकुछ कहा।
"जी ठीक हैं। " करुणा नें कहा___"मे अभि माॅ औऱ दादाजी जी सें बात करतीहूॅ। सामान कुछ ज़्यादा नहि हैं। बस एक् बैग हि हैं। बाॅकी जैसा आप् कहें। "
".। " उधर सें अभय नें कुछकहा।
"हाॅठीक हैं। " करुणा नें सिर हिलाया___"मे सामान ज़्यादा नहि लूॅगी। आप् हेमराज कों समझा दीजिएगा। "
उधर सें अभय नें कुछ औऱ कहाजिस पऱ करुणा नें हाॅकह करसिर हिलाया उसकेबाद कालकट होँ गई। कालकट होने केँ बाद करुणा नें गहरी साॅसली औऱ फिनबेड सें उतरकर कमरे सें बाहर् आँ गई।
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इधर हास्पिटल मे।
मेरे दिलो दिमाग़ मे ऑधी तूफान चलरहा थां। मुझ पऱ नज़र पड़ते हि बेड पर्र पड़ी विधी केँ चेहरे पऱ ऐसेभाव उभरे जैसे वो मुझेदेख कर एकदम सें स्टेचू मे तब्दील होँ गई होँ। एकटक मेरीतरफ देखेजा रही थि वो। फिन सहसा उसके चेहरे केँ भाव एकाएक हि बदले। उस चेहरे पऱ दुख औऱ पीड़ा केँ भावउभर आए। पथराई हुई ऑखों नें अपने अंदर सें किसी टूटेहुए बाॅध कि तरह ऑसुओं कों बाहर् कि तरफ तेज़ प्रवाह सें बहाने शुरुआत कर दिया।
उसके चेहरे केँ बदलेहुए उन भावों कों देखकर भि मेरे अंदर कि नफ़रत औऱ आक्रोश मे कोईकमी नहि आई। मेरी ऑखों केँ सामने कोई औऱ हि मंज़र घूमरहा थां। गुज़रे हुएकल कि तस्वीरें बारबार ऑखों केँ सामने घूमरही थीं। अभि मे इनसभी तस्वीरों कों देख हि रहा थां कि तभी बेजान होँ चुके विधी केँ बदन मे हल्का सां कंपनहुआ औऱ उसके थरथराते हुए होठों सें जौ लड़खड़ाता हुआ शब्द निकला उसने मुझे दूसरी दुनियाॅ सें लाकरइस हकीक़त कि दुनियाॅ मे पटक दिया।
"र.राऽऽऽज। " बहोत हि करुणभाव सें मगर लरज़ता हुआ विधी कां यह स्वर मेरे कानो सें टकराया। हकीक़त कि दुनियाॅ मे आते हि मेरी नज़र विधी केँ चेहरे पऱ फिन सें पड़ी तौ इसबार मेरा समूचा अस्तित्व हिल गय़ा। विधी कि ऑखों सें ऑसूबह रहे थें, उसके चेहरे पर्र अथाह पीड़ा केँ भाव थें। यहसभी देखकर मेरा हृदय हाहाकार करउठा। समयभर मे मेरे अंदर मौजूद उसके प्रति मेरी नफ़रत घृणा औऱ क्रोध सभीकुछ साबुन केँ झाग कि तरह बैठता चला गय़ा। मेरे टूटेहुए दिल केँ किसी टुकड़े मे दबा उसकेलिए बेपनाह प्रेम चीखउठा।
मैने देखा कि करवॅट केँ बल लेटी विधी कां एक् हाॅथ धीरे-धीरे सें ऊपर कि तरफऐसे अंदाज़ मे उठा जैसे वोँ मुझे अपनेपास बुलारही हौ। मेरा समूचा शरीर हि नहि बल्कि अंदर कि आत्मा तक मे एक् झंझावात सां हुआ। मे किसी सम्मोहन केँ वशीभूत होकर उसकीतरफ बढ़चला। इस वक़्त जैसे मे स्वयं कों भूल हि चुका थां। कुछ हि समय मे मे विधी केँ पास उसकेउस उठेहुए हाॅथ केँ पास पहुॅच गय़ा।
"त तुम् आँ गएराज। " मुझे अपने लगभग देखते हि उसने अपनेउस उठेहुए हाथ सें मेरी बाॅई कलाई कों पकड़ते हुए कहा___"मे तुम्हारे हि आने कां यहाॅ इन्तज़ार कररही थि। मेरी साॅसें मात्र तुम्हें हि देखने केँ लिएबची हुईँ हें। "
मेरेमुख सें उसकीइन बातों पर्र कोई लफ्ज़ नं निकला। लेकिन मे उसकी आख़िरी बातसुन कर बुरीतरह चौंका अवश्य। हैरानी सें उसकीतरफ देखा मैने। मगर फिन अचानक हि जाने क्याँ हुआ मुझे कि मेरे चेहरे पर्र फिन सें वही नफ़रत औऱ क्रोध उभरआया। मैने एक् झटके सें उसके हाॅथ सें अपनी कलाई कों छुड़ा लिया।
"अब यहकौन सां नया नाटक शुरुआत किया हैं तुमने?" मेरेमुख सें सहसा गुर्राहट निकली___"औऱ क्याँ कहा तुमने कि तुम् मेरा हि इन्तज़ार कर थि? भला क्यूं कररही थि मेरा इन्तज़ार? कहींऐसा तौ नहि कि तुम्हें पताचल गय़ा होँ कि इस टाइम मे फिन सें रुपये पैसे वाला हौ गय़ा हूॅ?इस लिए पैसों केँ लिएफिन सें मुझे बुला लिया तुमने। वाउ क्याँ बात हैं जवाब नहि हैं तेरा। अब समझ मे आई सारीबात मुझे। मुझे मुम्बई सें बुलाने केँ लिए मेरे हि मित्र कां इस्तेमाल किया तूने। क्याँ दिमाग़ लगाया हैं तूने लड़की क्याँ दिमाग़ लगाया हैं। मगर तेरेइस दिमाग़ लगाने सें अबकुछ नहि होने वाला। मे तेरेइस नाटक मे फॅसने वाला नहि हूॅअब। इतना तौ सबकसीख हि लिया हैं मैने कि तुझ जैसी लड़की सें केसेदूर रहा जाता हैं। मुश्किल तौ थां मगरसह लिया हैं मैने, औऱ अबउस सबसे बहोत दूर निकल गय़ा हूॅ। अब कोई लड़की मुझे अपनेरूप जाल मे याँ अपने झूठे प्रेम केँ जाल मे नहि फॅसा सकती। इस लिए लड़की, यह जोँ तूने नाटकरचा हैं न् उसे यहीं समाप्त करदे। अब कुछ नहि मिलने वाला यहाॅ। मेरा दोस्त भोला थां नासमझ थां इसलिए तेरी बातों केँ जाल मे फॅस गय़ा औऱ मुझे यहाॅ बुला लिया। मगर चिंता मतकर मे अपने दोस्त कों सम्हाल लूॅगा। "
मैनेयह सभी बिना रुके मानो एक् हि साॅस मे कह दिया थां औऱ कहने केँ बाद उसकेपास एक् समय भि रुकना गवाॅरा नं किया। पलट कर वापसचल दिया, दो क़दम चलने केँ बाद सहसा मे रुका औऱ पलटकर बोला___"एक् बात कहूॅ। आज भि तुम्हे उतना हि प्रेम करताहूॅ जितना पहले किया करता थां मगर बेपनाह प्रेम करने केँ बावजूद अब तुम्हे पाने कि मेरेदिल मे ज़रा सि भि हसरत बाॅकी नहि हैं। "
यहकहकर मे तेज़ी सें पलट गय़ा। पलटइस लिए गय़ा क्योंकि मे उस बेवफा कों अपनी ऑखों मे भरआए ऑसुओं कों दिखाना नहि चाहता थां। मेरादिल अंदर हि अंदर बुरीतरह तड़पने लगा थां। मुझेलग रहा थां कि मे हास्पिटल केँ बाहर् दौड़ते हुए जाऊॅ औऱ बीच मार्ग पऱ घुटनों केँ बलबैठ करतथा आसमान कि तरफ चेहरा करके ज़ोर ज़ोर सें चीखूॅ चिल्लाऊॅ औऱ दहाड़ें मारमार कर रोऊॅ। सारी दुनियाॅ मेरा वोँ रुदन देखेमगर वोँ न् देखे सुने जिसे मे आज भि टूटकर प्रेम करताहूॅ।
"तुम्हारी इन बातों सें पता चलता हैं राज कि तुम् आज केँ वक़्त मे मुझसे कितनी नफ़रत करते होँ। " सहसा विधी कि करुण आवाज़ मेरे कानों पऱ पड़ी____"औऱ सच कहूॅ तौ ऐसा तुम्हें करना भि चाहिए। मुझे इसकेलिए तुमसे कोई शिकायत नहि हैं। मैने जोँ कुछ भि तुम्हारे संग किया थां उसकेलिए कोई भि यही करता। मगर, मेरा यकीनकरो राज मेरेमन मे नां तौ पहलेयह बात थि औऱ नाँ हि आज हैं कि मैने पैसों केँ लिएयह सभी किया। "
"बंद करो अपनीयह बकवास। " मैनेपलट कर चीखते हुएकहा थां, बोला___"तेरी फितरत कों अच्छी तरह जानता हूॅ मे। आज भि तूने मुझेइसी लिए बुलवाया हैं क्योंकि तेरीपता चल चुका हैं कि अब मे फिन सें पैसे वाला हौ गय़ा हूॅ। पैसों सें प्रेम हैं तुम्हे, पैसों केँ लिए तुँ किसी भि लड़के केँ दिल केँ संग खिलवाड़ कर सकती हैं। मगर, अब तेरीकोई भि चालमुझ पर्र चलने वाली नहि हैं समझी? मेरादिल तोँ करता हैं कि इसी टाइम तुझेही तेरे किये कि सज़ादूॅ मगर नहि कर सकता मे ऐसा। क्योंकि मुझसे तेरीतरह किसी कों चोंट पहुॅचाना नहि आता औऱ नाँ हि मे अपने मतलब केँ लिए तेरेसंग कुछ करना चाहता हूॅ। तेरीअगर मे कोई दुवा नहि दे सकता तोँ बद्दुवा भि नहि दूॅगा। "
मेरी बातें सुनकर विधी केँ दिल मे कदाचित टीस सि उभरी। उसकी ऑखेंबंद हौ गई औऱ बंद ऑखों सें ऑसुओं कि धारबह चली। मगर फिन जैसे उसने स्वयं कों सम्हाला औऱ मेरीतरफ कातरभाव सें देखने लगी। उसे इसतरह अपनीतरफ देखता पाकर एक् बार मे फिन सें हिल गय़ा। मेरेदिल मे बड़ी ज़ोर कि पीड़ा हुइ मगर मैने स्वयं कों सम्हाला। आज भि उसके चेहरे कि उदासी औऱ ऑखों मे ऑसूदेख कर मे बेचैनी जाता थां लेकिन अंदर सें कोईचीख कर मुझसे कहने लगता इसने तेरे प्रेम कि कदर नहि कि। इसने तेरी धोखा दिया थां। तेरी सच्ची चाहत कों मज़ाक बनाकर रख दिया थां। बसइस एहसास केँ संग हि उसकेलिए मेरे अंदर जौ उतावलापन उठ जाती थि वोँ कहींगुम सि होँ जाती थि।
"तुमने तोँ मुझेकोई सज़ा नहि दि राज। " सहसा विधी नें पुनः करुणभाव सें कहा___"मगर मेरी ज़िदगी नें मुझे स्वयं सज़ी दि हैं। ऐसी सज़ा कि मेरी साॅसें बसचंद दिनों कि याँ फिनचंद पलों कि हि मेहमान हें। भाग्य बड़ी ख़राब चीज़ भि होती हैं, एक् समय मे हमसे वोँ सभीकुछ छीन लेती हैं जिसे हम् किसी भि कीमत पर्र किसी कों देना नहि चाहते। क़िस्मत पऱ किसी कां ज़ोर नहि चलताराज। यह मेरी बदकिस्मती हि तोँ थि कि मैने तुम्हारे संग वोँ सभी किया। मगर यकीन मानोउस टाइम जौ मुझेसमझ मे आया मैनेवही किया। क्योंकि मुझेकुछ औऱ सूझ हि नहि रहा थां। भला मे यह केसेसह सकती थि कि मेरी छोटी सि ज़िदगी केँ संग तुम् इसहद तक मुझे प्रेम करनेलगो कि मेरे मरने केँ बाद तुम् स्वयं कों सम्हाल हि न् पाओ?उस वक्त मैने तुम्हें धोखा दियामगर उस टाइम केँ मेरे धोखे नें तुम्हें इतना भि टूटकर बिखरने नहि दिया कि बाद मे तुम् सम्हल हि न् पाते। मे मानती हूॅ कि दिलजब किसी केँ द्वारा टूटता हैं तौ उसका दर्द हमेशा केँ लिएदिल केँ किसी कोने मे दबा बैठा रहता हैं। मगर, उस टाइम केँ हालात मे तुम् टूटे तौ अवश्य मगरइस हद तक नहि बिखरे। वरनाआज मेरे सामने इसतरह खड़े नहि रहते। आज तुम् जिस मुकाम पर्र होँ वहाॅ नहि पहुॅच पाते। "
विधी कि बातें सुनकर मुझेकुछ समझ न् आया कि यह क्याँ अनाप शनापबके जारही हैं? मगर उसके लहजे मे औऱ उसकेभाव मे कुछ तौ ऐसा थां जिसने मुझेकुछ हद तक शान्त सां कर दिया थां।
"तोँ तुम् क्याँ चाहती थि कि मे टूटकर बिखर जाता औऱ फिनकभी सम्हलता हि नहि?" मैने तीकेभाव सें कहा___"अरे मे तोँ आज भि उसी हालत मे हूॅ। मगर कहते हें न् कि इंसान केँ जिंदगी मे मात्र उसीबस कां हक़ नहि होता बल्कि उसके परिवार वालों कां भि होता हैं। मेरीमाॅ मेरी बेहन नें मुझे प्रेम हि इतना दिया हैं कि मे बिखरकर भि नहि बिखरा। मैने भि सोच लिया कि ऐसी लड़की केँ लिए क्याँ रोना जिसने प्रेम कों कभी समझा हि नहि? रोना हैं तोँ उनकेलिए रोओ जोँ सच मे मुझसे प्रेम करते हें। "
"यह तौ खुशी कि बात हैं कि तुमने ऐसा सोचा औऱ स्वयं कों सम्हाल लिया। " विधी नें फीकी मुस्कान केँ संग कहा__"मे भि यही चाहती थि कि तुम् उस सबसे स्वयं कों सम्हाल लो औऱ जिंदगी मे आगेबढ़ जाओ। किसी एक् केँ चले जाने सें किसी कां जिंदगी रुक नहि जाता। समझदार इंसान कों सबकुछ भूलकर आगेबढ़ जानां चाहिए। वही तुमने किया, इस बात सें मे खुशहूॅ राज। यही तोँ चाहती थि मे। यकीन मानो तुम्हें आजइसतरह देखकर मेरेमन कां बोझउतर गय़ा हैं। मे तुमसे यह नहि कहूॅगी कि तुम् मुझेउस सबकेलिए क्षमा करदो जोँ कुछ मैने तुम्हारे संग किया थां। अगर तुम् ऐसे हि खुश होँ तोँ भला मे माफ़ी माॅगकर तुम्हारी उस खुशी कों केसे मिटा सकतीहूॅ? अब तुम् जाओराज, जिंदगी मे खूब तरक्की करो औऱ अपनों केँ संगसंग स्वयं कों भि खुशरखो। औऱ हाॅ, जिंदगी मे मुझेकभी यादमत करना, क्योंकि मे याद करने लायक नहि हूॅ। "
विधी कि इन विचित्र बातों नें मुझे उलझाकर रख दिया थां। मुझेसमझ नहि आँ रहा थां कि आजइसे होँ क्याँ गय़ा हैं? यह तौ ऐसी बातें कहरही थि जैसेकोई उपदेशक होँ। मेरे दिलो दिमाग़ मे तरहतरह कि बातें चलनेलगी थीं।
"जाते जाते मेरी एक् आरज़ू भि पूरी करतेजाओ राज। " विधी कां वाक्य मेरे कानों सें टकराया___"हलाॅकि तुमसे कोई आरज़ू रखने कां मुझेकोई हक़ तोँ नहि हैं मगर मे जानती हूॅ कि तुम् मेरी आरज़ू अवश्य पूरी करोगे। " कहने केँ बाद विधीकुछ लम्हा केँ लिए रुकीफिन बोलि___"मेरे पासआओ नं राज। मे तुम्हें औऱ तुम्हारे चेहरे कों जीभर केँ देख्ना चाहती हूॅ। तुम्हारे चेहरे कि इस खूबसूरत तस्वीर कों अपनी ऑखों मे फिन सें बसा लेना चाहती हूॅ। मेरीयह आरज़ू पूरीकर दोराज। इतना तोँ कर हि सकते होँ न् तुम्?"
विधी कि बातसुन कर मेरे दिलो दिमाग़ मे धमाका सां हुआ। मेरे पूरे शरीर मे झुरझुरी सि हुई। पेट मे बड़ी तेजी सें जैसेकोई गैस कां गोला घूमने लगा थां। दिमाग़ एकदम सुन्ना सां पड़ता चला गय़ा। कानों मे कहींदूर सें सीटियों कि अनवरत आवाज़ गूॅजती महसूस हुई मुझे। समय भर मे मेरे ज़हन मे जाने कितने हि प्रकार केँ ख़याल आए औऱ जाने कहाॅगुम होँ गए। बस एक् हि ख़याल गुम न् हुआ औऱ वोँ यह थां कि विधीऐसा क्यूं चाहरही हैं?
किसी गहरे ख़यालों मे खोयाहुआ मे इसतरह विधी कि तरफबढ़ चला जैसेमुझ पर्र किसीतरह कां सम्मोहन हौ गय़ा हौ। कुछ हि समय मे मे विधी केँ लगभग उसके चेहरे केँ पासजा कर खड़ा हौ गय़ा। मेरे खड़े होते हि विधी नें किसीतरह स्वयं कों उठाया औऱ बेड कि पिछली पुश्त सें पीठ टिका लिया। अब वोँ अधलेटी सि अवस्था मे थि। चेहरा ऊपर करके उसने मेरे चेहरे कि तरफ देखा। उसकी ऑखों मे ऑसुओं कां गर्मजल तैरता हुआ नज़रआया मुझे। मैने पहलीबार उसके चेहरे कों बड़े ध्यान सें देखा औऱ अगले हि समय बुरीतरह चौंक पड़ा मे। मुझे विधी केँ चेहरे पऱ मुकम्मल खिज़ा दिखाई दि। जोँ चेहरा हर लम्हा ताजे खिले गुलाब कि मानिन्द खिलाहुआ रहा करता थां आजउस चेहरे पर्र वीरानियों केँ सिवाकुछ नं थां। ऐसा लगता थां जैसे वोँ शदियों सें बीमार होँ।
उसेइस हालत मे देखकर एक् बारफिन सें मेरादिल उतावलापन उठा। जी चाहा कि अभि झपटकर उसे अपने सीने सें लगालूॅ मगरऐन समय पऱ मुझे उसका धोखायाद आँ गय़ा। उसका वोँ दोटूक जवाब देनायाद आँ गय़ा। मुझे भिखारी कहनायाद आँ गय़ा। इन सबकेयाद आते हि मेरे चेहरे पर्र कठोरता छातीचली गई। एक् बारफिन सें मेरे अंदर सें नफ़रत औऱ क्रोध उभरकर आया औऱ मेरे चेहरे तथा ऑखों मे आकरठहर गय़ा।
"मे तुम्हें दुवा मे यह भि नहि कह सकती कि तुम्हें मेरीउमर लगजाए। " तभी विधी नें छलकआए ऑसुओं केँ संग कहा___"बस यही दुवा करतीहूॅ कि तुम् हमेशा खुशरहो। जिंदगी मे हरकोई तुम्हें दिलोजान सें प्रेम करे। कभी किसी केँ द्वारा तुम्हारा दिल नं दुखे। खुदा मिलेगा तोँ उससे पूछूॅगी कि मैनेऐसा क्याँ गुनाह किया थां जोँ उसने मुझेऐसी ज़िंदगी बक्शी थि? ख़ैर, अब तुम् जाओराज, मैने तुम्हारी तस्वीर कों इसतरह अपनी ऑखों मे बसा लिया हैं कि अबहर जन्म मे मुझे केवल तुम् हि नज़र आओगे। "
विधी कि इसबात सें एक् बारफिन सें मेरे चेहरे पर्र उभरआए नफ़रत व गुस्से मे कमी आँ गई। मैंने उसे अजीबभाव सें देखा। मेरे अंदरकोई ज़ोर ज़ोर सें चीखेजा रहा थां कि इसे एक् बार अपने सीने सें लगा लेँ राज। मगर मैने अपने अंदर केँ उस हंगामा कों शख्ती सें दबा दिया औऱ पलटकर कमरे केँ बाहर् कि तरफचल दिया। मैने महसूस किया कि मेरीकोई अनमोल चीज़ मुझसे हमेशा केँ लिएदूर हुइ जारही हैं। मेरेदिल कि धड़कने अनायास हि ज़ोर ज़ोर सें धड़कने लगी। मनो मस्तिष्क मे बड़ी तेज़ी सें कोई तूफान चलनेलगा थां। अभि मे दरवाजे केँ पास हि पहुॅचा थां कि.
"रुक जाओऽऽ। " यह वाक्य एक् नई आवाज़ केँ संग मेरे कानों सें टकराया थां। दरवाजे केँ लगभग बढ़ते हुए मेरे क़दम एकाएक हि रुकगए। मे बिजली कि सि तेज़ी सें पलटा। कमरे मे हि बेड केँ पास खड़ीजिस पर्सनैलिटी पर्र मेरी नज़र पड़ीउसे देखकर मे हक्का बक्का रह गय़ा। आश्चर्य औऱ अविश्वास सें मेरी ऑखेंफटी कि फटीरह गईं। मुझे अपनी ऑखों पर्र यकीन नहि हुआ कि जिस पर्सनैलिटी कों मेरी ऑखेंदेख रही हें वोँ सच मे वही हें याँ फिनयह मेरी ऑखों कां कोई भ्रम हैं।
"मुझे तुमसे यह उम्मीद नहि थि राज। " सहसायह नई आवाज़ फिन सें मेरे कानों सें टकराई___"तुम् इसतरह केसे यहाॅ सें जा सकते हौ? इतनी बेरुख़ी तौ कोई अपने किसी दुश्मन सें भि नहि जाहिर करता जितनी तुम् विधी कों देखकर ज़ाहिर कररहे होँ। "
इसबार मे बुरीतरह चौंका। यह तौ सच मे वही हें। यानी रितू दिदी। जीहाॅ दोस्तो, यहवही रितू दिदी हें जिन्होंने अपने जिंदगी मे कभी भि मुझे भइया नहि माना औऱ नाँ हि मुझसे बात करना ज़रूरी समझा। मगर मे इसबात सें हैरान थां कि वोँ यहाॅ केसे मौजूद होँ सकती हें? जब मे आया थां इस कमरे मे तब तोँ यह यहाॅ नहि थि, फिन अचानक यह कहाॅ सें यहाॅ पऱ प्रकट होँ गईं?
"प्लीज़ दिदी। " तभीबेड पऱ अधलेटी अवस्था मे बैठी विधी नें रितू दिदी सें कहा___"कुछ मत कहिएउसे। "
"नहि विधी। " रितू दिदी नें आवेशयुक्त भाव सें कहा__"मुझे बोलने देअब। माना कि तूने जौ किया वोँ उस वक्त केँ हिसाब सें ग़लत थां मगर इसका मतलबयह नहि कि बिना किसीबात कों जाने समझेयह तेरीइस तरहबोल कर यहाॅ सें चलाजाए। "
"नहि दिदी प्लीज़। " विधी नें विनती करतेहुए कहा___"ऐसा मत कहिएउसे। मुझे किसीबात कि सफाई नहि देना हैं उससे। आप् जानती हें कि मे उसे किसी भि तरह कां दुख नहि देना चाहती अब। "
"क्यूं करती हैं रेऐसा तुँ?" रितू दिदी कि आवाज़ सहसा भारी हौ गई, ऑखों मे ऑसू आँ गए, बोलि___"ऐसा मतकर विधी। वरनायह ज़मीन औऱ वोँ आसमान फट जाएगा। तुँ चाहती थि नं कि तूँ अपने आख़िरी वक्त मे अपनेइस महबूब कि बाहों मे हि दम तोड़े? फिन क्यूं अबइस सबसे मुकररही हौ तूँ? अब तक तौ तड़प हि रही थि नं तौ अब अपने आखिरी टाइम मे क्यूं इस तड़प कों लेकर जानां चाहती हैं? नहि नहि, मे ऐसा हर्गिज़ नहि होने दूॅगी। "
रितू दिदी कि बातें सुनकर मेरे दिलो दिमाग़ मे भयंकर विष्फोट हुआ। ऐसा लगा जैसे आसमान सें कोई बिजली सीधा मेरेदिल पर्र गिर पड़ी होँ। पलक झपकते हि मेरी हालत ख़राब होँ गई। दिमाग़ मे हरबात बड़ी तेज़ी सें घूमने लगी। एक् एक् बात, एक् एक् दृष्य मेरे ज़हन सें टकराने लगे। पवन कां मुझे मोबाइल करके यहाॅ अर्जेन्ट बुलाना, मेरे द्वारा वजह पूछने पर्र उसकाअब तक चुप रहना। हास्पिटल केँ इस कमरे केँ बाहर् सें यहकहकर चले जानां कि मे यहाॅ जौ कुछ भि देखूॅ सुनूॅ उसेदेख सुनकर स्वयं कों सम्हाले रखूॅ। हास्पिटल केँ इस कमरे केँ अंदर विधी कां मुझसे मिलना, उसकी वोँ सभी विचित्र बातें औऱ अब रितू दिदी कां यहाॅ मौजूद होकरयह सभी कहना। यह सभी चीज़ें मेरे दिलो दिमाग़ मे बड़ी तेज़ी घूमने लगी थि।
मुझेअब समझआया कि असल माज़रा क्याँ हैं। मेरे दिमाग़ नें काम करना शुरुआत कर दिया औऱ अब मुझेसभी कुछसमझ मे आनेलगा थां। दरअसल विधी कों कुछहुआ हैं जिसके लिएपवन नें मुझे यहाॅ बुलाया थां। मगर विधी कों ऐसा क्याँ होँ गय़ा हैं? रितू दिदी नें यह क्याँ कहा कि____ "तुँ चाहती थि न् कि तूँ अपने आख़िरी वक़्त मे अपनेइस महबूब कि बाहों मे हि दम तोड़े?" हे ईश्वर! यह क्याँ कहा रितू दिदी नें?
"नननहींऽऽऽऽ। " अपने हि सोचों मे डूबा मे पूरी शक्ति सें चीख पड़ा थां, लम्हा भर मे मेरी ऑखों सें ऑसुओं कां जैसेकोई बाॅधटूट पड़ा। मे भागते हुए विधी केँ पासआया। इधर मेरीचीख सें रितू दिदी औऱ विधी भि चौंक पड़ी थि।
मे भागते हुए विधी केँ पासआया थां, बेड केँ किनारे पऱ बैठकर मैने विधी कों उसके दोनो कंधों सें पकड़कर स्वयं सें छुपका लिया औऱ बुरीतरह रो पड़ा। मे विधी कों अपने सीने सें बुरीतरह भींचे हुए थां। मेरेमुख सें कोईबोल नहि फूटरहा थां। मे बस रोयेजा रहा थां। मुझेसमझ मे आँ चुका थां कि विधी कों कुछऐसा होँ गय़ा हैं जिससे वोँ मरने वाली हैं। यहबात मेरेलिए मेरीजान लें लेने सें कम नहि थि।
"नहि राज। " विधी मुझसे छुपकी स्वयं भि रोरही थि, लेकिन उसने स्वयं कों सम्हालते हुए कहा___"इस तरहमत रोओ। मे अपनी ऑखों केँ सामने तुम्हें रोतेहुए नहि देख सकती। प्लीज़ चुप हौ जाओ नं। "
"नहि नहि नहि। " मैंने तड़पते हुए कहा___"तुम् मुझे छोंड़ कर कहीं नहि जाओगी। तुम् नहि जानती कि तुम्हारे लिए कितना तड़पा हूॅ मे। पर्र अब औऱ नहि विधी। मे तुम्हें कुछ नहि होने दूॅगा। "
"पागलमत बनोराज। " विधी नें मेरेसिर कों सहलाते हुए कहा___"स्वयं कों सम्हालो औऱ जिंदगी मे आगे बढ़ो। "
"मे कुछ नहि जानता विधी। " मैने सिसकते हुए कहा___"मे फिन सें तुम्हें खोना नहि चाहता। मुझे बताओ कि क्याँ हुआ हैं तुम्हें? मे तुम्हारा इलाज़ करवाऊॅगा। दुनियाॅ भर केँ डाक्टरों कों तुम्हारे इलाज़ केँ लिए लम्हा भर मे लेँ आऊॅगा। "
"अबकुछ नहि होँ सकताराज। " विधी नें सहसा मुझसे अलग होकर मेरे चेहरे कों अपनी दोनो हॅथेलियों मे लेतेहुए कहा___"मैने कहा न् कि मेरासफर समाप्त होँ चुका हैं। मुझे ब्लड कैंसर हैं वोँ भि लास्ट स्टेज कां। मेरी साॅसें किसी भि लम्हा रुक सकती हें औऱ मे ईश्वर केँ पासचली जाऊॅगी। "
"ननहींऽऽऽ। " विधी कि यहबात सुनकर मुझे ज़बरदस्त झटकालगा। ऑखों केँ सामने अॅधेरा सां छा गय़ा। हर चीज़ जैसे किसी शून्य मे डूबती महसूस हुईँ मुझे। कानों मे कुछ भि सुनाई नहि देरहा थां मुझे। दिल कि धड़कने रुक सि गई औऱ मे एकदम सें अचेत सि अवस्था मे आँ गय़ा।
"राऽऽऽज। " विधी केँ हलक सें चीख निकल गई, वोँ मेरे चेहरे कों थपथपाते हुए बुरीतरह रोनेलगी। पास मे हि खड़ी रितू दिदी भि दौड़कर मेरेपास आँ गईं। मुझे पीछे सें पकड़ते हुए मुझे ज़ोर ज़ोर सें आवाज़ें लगाने लगीं। सभी कुछ एकदम सें ग़मगीन सां होँ गय़ा थां। टाइम कों एक् स्थान ठहर जाने मे एक् समय कां भि वक्त नहि लगा।
वोँ दोनो बुरीतरह रोयेजा रही थि। रितू दिदी केँ दिमाग़ नें काम किया। पास हि टेबल पऱ रखे पानी केँ ग्लास कों उठाकर उससे मेरे चेहरे पर्र पानी छिड़का उन्होंने। थोड़ी हि देर मे मुझेहोश आँ गय़ा। होश मे आते हि मे विधी सें लिपटकर ज़ार ज़ार रोनेलगा।
"क्यूं विधी क्यूं?" मैने बिलखते हुए उससे कहा___"क्यूं छुपाया तुमने मुझसे? क्याँ इसीलिए तुमने मेरेसंग वोँ सभी किया थां, ताकि मे तुमसे दूरचला जाऊॅ? औऱ मे मूरखयह समझता रहा कि तुमने मेरेसंग कितना ग़लत किया थां। कितना बुराहूॅ मे, आज तक मे तुम्हें भला बुरा कहतारहा। तुम्हारे बारे मे कितना कुछ बुरा सोचता रहा। मैने कितना बड़ा अपराध किया हैं विधी। ओह कितना बड़ापाप किया मैने। मुझे तौ ईश्वर भि कभी क्षमा नहि करेगा। "
"नहि राज नहि। " विधी नें उतावलापन कर मुझे अपने सें छुपका लिया, बोलीं___"तुमने कोई अपराध नहि किया, कोई पाप नहि किया। तुमने तौ बस प्रेम हि किया हैं मुझे, हर रूप मे तुमने मुझे प्रेम किया हैं राज। मुझे तुम् पर्र नाज़ हैं। परमेश्वर सें यही दुवा करूॅगी कि हर जन्म मे मुझे तुम्हारा हि प्रेम मिले। "
"अपने आपको सम्हालो राज। " सहसा रितू दिदी नें मुझे पीछे सें पकड़े हुए कहा___"भगवान इसबात कां गवाह हैं कि तुम् दोनो नें कोईपाप नहि किया हैं। विधी नें उस वक़्त जौ किया उसमें भि उसकेमन मे मात्र यही थां कि तुम् उससेदूर होँ जाओ औऱ एक् नये सिरे सें जिंदगी मे आगे बढ़ो। तुम् स्वयं सोचोराज कि जौ विधी तुम्हें दिलोजान सें प्रेम करती थि उसने तुम्हें अपने सें दूर करने केँ लिए स्वयं कों केसे पत्थर दिल बनाया होगा? उसकादिल कितना तड़पा होगा?मगर इसकेबाद भि उसने तुम्हें स्वयं सें दूर किया। उस टाइम कां वोँ दुखआज केँ इसदुख सें भारी नहि थां। "
"मगर दिदी इसने मुझसे यहबात छुपाई हि क्यूं थि?" मैने रोतेहुए कहा___"क्याँ इसे मेरे प्रेम पऱ भरोसा नहि थां? मे इसके इलाज़ केँ लिए धरती आसमान एक् कर देता औऱ इसकोइस गंभीर बिमारी सें बचा लेता। "
"नहि राज। " दिदी नें कहा___"तुम् उस वक्त भि कुछ नं कर पाते क्योंकि तब तक कैंसर इसकेखून मे पूरीतरह फैल चुका थां। पहलेइस बात कां इसेपता हि नहि थां औऱ जबपता चला तोँ डाक्टर नें बताया कि इसके इलाज मे ढेर सारा रुपया लगेगा औऱ इसका इलाज हमारे देश मे होँ पाना भि मुश्किल थां। उस वक़्त नां तौ तुम् इतने सक्षम थें औऱ नां हि इसके माता पिता जौ इसका इलाज करवा पाते। इस लिए विधी नें फैंसला किया कि वोँ तुमसे जितना जल्द हौ सकेदूर हौ जाए। क्योंकि तब तुम्हें इसबात कां भि दुख होता कि तुम् इसका इलाज नहि करवापाए। सभीकुछ हमारे हाॅथ मे नहि होताराज। कुछ भगवान कां भि दखल होता हैं। "
"कुछ भि कहिये दिदी। " मैने कहा___"कम सें कम मे अपनी विधी केँ संग तौ रहता। उसे स्वयं सें अलग करकेउसे दुखों केँ सागर मे डूबने तोँ न् देता। "
"नहि राज तुम् इस सबसे दुखीमत हौ। " विधी नें कहा___"सभी कुछभूल जाओ। मे बसयह चाहती हूॅ कि तुम् मुझे खुशी खुशीइस दुनियाॅ सें अलविदा करो। आज तुम्हारी बाहों मे हूॅ तौ मेरे सारेदुख दर्ददूर हौ गए हें। मेरी ख्वाहिश थि कि मेरादम निकले तौ केवल मेरे महबूब कि बाहों मे। तुम्हारी खूबसूरत छवि कों अपनी ऑखों मे बसाकर यहाॅ सें जानां चाहती थि। इसलिए दिदी सें मैने अपनीयह ख़्वाहिश बताई औऱ दिदी नें मुझसे वादा किया कि यह तुमको मेरेपास लेकर अवश्य आएॅगी। "
मे विधी कि इसबात सें चौंका। पलटकर रितू दिदी कि तरफ देखा तौ रितू दिदी कि नज़रें झुकगईं। उनके चेहरे पऱ एकाएक हि ग्लानि औऱ अपराध बोझ जैसेभाव उभरआए।
"राज, तुम्हारी रितू दिदी अब पहले जैसे नहि रहीं। " सहसा विधी नें मुझसे कहा___"यह तुमसे बहोत प्रेम करती हें। इन्हें कभी स्वयं सें दूर न् करना। इन्होंने जौ कुछ किया उसमे इनकाकोई दोष नहि थां। इन्होंने तोँ वही किया थां जौ इन्हें बचपन सें सिखाया गय़ा थां। आजहर सच्चाई इनकोपता चल चुकी हैं इसलिए अबयह तुम्हें हि अपना भइया मानती हें। तुम् इन्हें क्षमा कर देना। इनकामुझ पऱ बहोत बड़ा उपकार हैं राज। यह मुझे अपनी छोटी बेहन जैसा प्रेम देती हें। जब सें यह मुझे मिली हें तब सें मुझेयही एहसास होतारहा हैं जैसे कि तुम् मेरेपास हि हौ। "
विधी कि इन बातों सें मुझे झटका सां लगा। मैने एक् बारफिन सें पलटकर रितू दिदी कि तरफ देखा। उनकासिर पूर्व कि भाॅति हि झुकाहुआ थां। मैने अपने दोनो हाॅथों सें उनके चेहरे कों लेकर उनके चेहरे कों ऊपर उठाया। जैसे हि उनका चेहरा ऊपरहुआ तोँ मुझे उनका ऑसुओं सें तर चेहरा दिखा। मेरा कलेजा हिल गय़ा उनकायह हालदेख कर। मैने उन्हें अपने सीने सें लगा लिया। मेरे सीने सें लगते हि रितू दिदी कि रुलाई फूट गई। वोँ फूटफूट कर रोनेलगी थि। जानेकब सें उनके अंदरयह गुबार दबाहुआ थां औऱ अब वोँ इसरूप मे निकलरहा थां।
"यह क्याँ दिदी?" मैने उनकेसिर कों प्रेम सें सहलाते हुए कहा___"चुप होँ जाइये दिदी। अरे आप् तोँ मेरी सबसे प्यारी औऱ बहादुर दिदी हें। चलिये अबचुप हौ जाइये। "
"तुँ इतना अच्छा क्यूं हैं राज?" रितू दिदी कां रोनाबंद हि नहि होँ रहा थां____"तेरी मुझ पऱ क्रोध क्यूं नहि आता? मैने तुम्हें कभी अपना भइया नहि माना। हमेशा तेरादिल दुखाया मैने। मुझे वोँ सभीयाद हैं मेरे भइया जोँ कुछ मैने तेरेसंग किया हैं। जबजब मुझे वोँ सभीयाद आता हैं तबतब मुझे स्वयं सें घृणा होने लगती हैं। मुझेऐसा लगने लगता हैं कि मे अपने आपको क्याँ कर डालूॅ। "
"नहि दिदी। " मैने उन्हें स्वयं सें अलग करके उनके ऑसुओं कों पोंछते हुए कहा___"ऐसा कभी सोचना भि मत। मेरेमन मे कभी भि आपके प्रति कोई बुरा ख़याल नहि आया। कहीं न् कहीं मुझे भि इसबात कां एहसास थां कि आप् वहीकर रही हें जौ आपको सिखाया जाता थां। "
"यहसभी तूँ मेरादिल रखने केँ लिएकह रहा हैं न्?" रितू दिदी नें कहा___"जबकि मुझेपता हैं कि तुम्हारी तरफ मेरेउस व्यवहार सें कितनी तक़लीफ़ होती थि। "
"हाॅ बुरा तौ लगता थां दिदी। " मैने कहा___"मगर उस सबकेलिए आप् पर्र कभी क्रोध नहि आता थां। हरबार यही सोचता थां कि इसबार आप् मुझसे अवश्य बात करेंगी। "
"औऱ मे इतनी बुरी थि कि हरबार तेरीउन मासूम सि उम्मीदों कों तोड़ देती थि। " रितू नें सिर झुका लिया, बोलीं___"तुँ उस सबकेलिए मुझे सज़ादे मेरे भइया। तेरीहर सज़ा कों मे हॅसते हुए कुबूल कर लूॅगी। "
"ठीक हैं दिदी। " मैने कहा___"आपकी सज़ायही हैं कि अब सें आप् यहसभी बिलकुल भि नहि सोचेंगी औऱ नाँ हि यहसभी सोचकर स्वयं कों रुलाओगी। यही आपकी सज़ा हैं। "
मेरीयह सज़ासुन कर रितू दिदी देखती रहगईं मुझे औऱ सहसाफिन सें उनकी ऑखों सें ऑसूबह चले। वोँ मुझसे लिपटगईं। वोँ इसतरह मुझसे लिपटी हुइ थि जैसे वोँ मुझे अपने अंदरसमा लेना चाहती हों।
विधी अपना ऑसुओं सें तर चेहरा लिए हम् दोनो बेहन भइया कों देखरही थि। उसके होठों पर्र मुस्कान थि। सहसातभी उसे ज़ोर कां धचकालगा। हम् दोनो बेहन भइया कां ध्यान विधी कि तरफ गय़ा। विधी कों आएउस ज़ोर केँ धचके सें अचानक हि खाॅसी आनेलगी। मे बुरीतरह चौंका। उधर विधी कों लगातार खाॅसी आनेलगी थि। मे यहदेख कर बुरीतरह घबरा गय़ा। मेरेसंग संग रितू दिदी भि घबरा गई। मैने विधी कों अपनी बाहों मे लेँ लिया।
"विधी, क्याँ हुआ तुम्हें?" मे बदहवाश सां कहताचला गय़ा___"तुम् ठीक तोँ होँ न्? यह खाॅसी केसेआने लगी तुम्हें। डाक्टरऽऽऽ.डा डाक्टर कों बुलाओ कोई। "
मे पागलों कि तरहइधर उधर देखने लगा। मेरी नज़र रितू दिदी पर्र पड़ी तौ मे उन्हें देखकर एकाएक हि रो पड़ा___"दिदी, देखो नं विधी कों अचानक यह क्याँ होनेलगा हैं? प्लीज़ दिदी जल्द सें डाक्टर कों बुलाइये। जाइये जल्द.डाक्टर बुलाइये। मेरी विधी कों यह खाॅसी केसेआने लगी हैं अचानक?"
मेरीबात सुनकर रितू दिदी कों जैसेहोश आया। वोँ बदहवाश सि होकर पहलेइधर उधर देखीफिन भागते हुए कमरे सें बाहर् कि तरफ लपकी। इधर मे लगातार विधी कों अपनी बाहों मे लिएउसे फुसला रहा थां। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम सें जैसे कुंद सां पड़ गय़ा थां। उधर विधी कों रहरहकर खाॅसी आँ रही थि। सहसातभी उसकेमुख सें खून निकला। यहदेख कर मे औऱ भि घबरा गय़ा। मे ज़ोर ज़ोर सें डाक्टर डाक्टर चिल्लाने लगा। विधी कि हालत प्रतिपल ख़राब होतीजा रही थि। उसकी हालतदेख कर मेरीजान हलक मे आकरफॅस गई थि।
तभी कमरे मे भागते हुए डाक्टर नर्सें औऱ रितू दिदी आँ गई। उनके पीछे हि विधी केँ माॅमडैड भि आँ गए। उनके चेहरे सें हि लगरहा थां कि उनकी हालत बहोत ख़राब हैं। डाक्टर नें आते हि विधी कों देखा।
"देखिये इनकी हालत बहोत ख़राब हैं। " डाक्टर नें विधी कों चेक करने केँ बाद कहा___"ऐसा लगता हैं कि आज इनका बचना बहोत मुश्किल हैं। "
"डाऽऽऽऽक्टर। " मे पूरी शक्ति सें चीख पड़ा थां___"ज़ुबान सम्हाल करबात कर वरनाहलक सें ज़ुबान खींचकर तेरे हाॅथ मे दे दूॅगा समझे? मेरी विधी कों कुछ नहि होगा। इसे कुछ नहि होने दूॅगा मे। मे इसेठीक कर दूॅगा। "
"बेटीऽऽऽ। " विधी कि माॅभाग कर विधी केँ पासआई औऱ रोतेहुए बोलीं___"मे केसेजी पाऊॅगी अगर तुम्हें कुछ होँ गय़ा तोँ?"
"ममाॅ। " खाॅसते हुए विधी केँ मुख सें लरजते हुए शब्द निकले___"आज मे बहोत खुशहूॅ। अपने महबूब कि बाहों मे हूॅ। कितने अच्छे वक़्त पर्र मेरादम निकलने वाला हैं। उस ईश्वर सें शिकायत तोँ थि मगरअब कोई शिकायत भि नहि रह गई। उसने मेरी आख़िरी ख्वाहिश कों जोँ पूरीकर दि माॅम। मेरे जाने केँ बादडैड कां ख़याल रखियेगा। "
"नहि नहि। " मे ज़ार ज़ाररो पड़ा___"तुम्हें कुछ नहि होगा विधी औऱ अगरकुछ होँ गय़ा न् तोँ सारी दुनियाॅ कों आगलगा दूॅगा मे। सबको जिंदगी मृत्यु देने वालेउस भगवान सें नफ़रत करने लगूॅगा मे। "
"ऐसामत बोलोराज। " विधी नें थरथराते लबों सें कहा___"मरना तोँ एक् दिन सबको हि होता हैं, फर्क केवल इतना हैं कि कोई जल्दमर जाता हैं तोँ कोई ज़रादेर सें। मगरहर कोई मरता अवश्य हैं। मेरेलिए इससे बड़ीभला औऱ क्याँ बात हौ सकती हैं कि मे अपने जन्म देने वाले माता पिता केँ सामने औऱ अपने महबूब कि बाहों मे मरनेजा रहीहूॅ। मुझे हॅसते हुए विदाकरो मेरे साजन। तुम्हारी यह दासी तुम्हारे इन सुंदर अधरों कि मुस्कान देखकर मरना चाहती हैं। मुझसे वादा करों मेरे महबूब कि मेरे जाने केँ बाद तुम् स्वयं कों कभी तक़लीफ़ नहि दोगे। किसीऐसी लड़की केँ संग अपनी दुनियाॅ बसा लोगे जौ तुमसे इस विधी सें भि ज़्यादा प्रेम करे। "
"नहि विधी नहि। " मैंने रोतेहुए झुककर उसके माथे सें अपना माथासटा लिया___"मत करोऐसी बातें। तुम् मुझे छोंड़ कहीं नहि जाओगी। मे तुम्हारे बिना जीने कि कल्पना भि नहि कर सकता। "
"क्याँ यही प्रेम करते हौ मुझसे?" विधी नें अटकते हुए स्वर मे कहा___"कहो मेरे देवता। यह कैसा प्रेम हैं तुम्हारा कि तुम् अपनीइस दासी कि आखिरी ख़्वाहिश भि पूरी नहि कररहे?"
"मे कुछ नहि जानता विधी। " मैने मजबूती सें सिर हिलाते हुए कहा___"मुझे प्रेम व्यार कुछ नहि दिखरहा। मे केवल इतना जानता हूॅ कि तुम् मुझे अकेला छोंड़ कर कहीं नहि जाओगी बस। "
"अरे मे तुम्हें छोंड़ कर कहाॅजा रहीहूॅ राज?" विधी नें मेरे चेहरे कों सहलाकर कहा___"मेरा दिल मेरी आत्मा तोँ तुममें हि बसी हैं। तुम् मुझेहर समय अपने क़रीब हि महसूस करोगे। यह तोँ जिस्मों कि जुदाई हैं राज, औऱ इसबदन कां जुदा होना भि तौ ज़रूरी हैं। क्योंकि मेरायह शरीर तुम्हारे लायक नहि रहा। यह बहोत मैला हौ चुका हैं मेरे महबूब। इसका खाक़ मे मिल जानां बहोत ज़रूरी हौ गय़ा हैं। "
"दिदी इसे समझाओ न्। " मैनेपलट कर दिदी कि तरफ देखते हुए कहा___"देखिये कैसी बेकार कि बातें कररही हैं यह। इससे कहिये नं दिदी कि यह मुझे छोंड़ कहीं नं जाए। इससे कहिये नं कि मे इसके बिनाजी नहि पाऊॅगा। "
मेरीबात सुनकर दिदी कुछ बोलने हि वाली थि कि सहसाइधर विधी कों फिन सें खाॅसी कां धचकालगा। मैनेपलट कर विधी कों देखा। उसकेमुख सें खून निकलकर बाहर् आँ गय़ा थां।
"रराऽऽज। " विधी नें उखड़ती हुई साॅसों केँ संग कहा___"अब मुझे जानां होगा। मुझेवचन दो मेरे हमदम कि तुम् मेरेबाद कभी भि स्वयं कों दुखी नहि रखोगे। अपनीइस दासी कों वचनदो मेरे देवता। मुझे हॅसते हुए विदाकरो। औऱ.औऱ एक् बार अपनी वोँ मनमोहक मुस्कान दिखादो न् मुझे। मेरेपास वक्त नहि हैं, मेरे प्राण लेने केँ लिए देवदूत आँ रहे हें। मे उन्हें अपनीतरफ आतेहुए स्पष्ट देखरही हूॅ। "
"नहींऽऽऽ। " मे बुरीतरह रो पड़ा___"ऐसा मत बोलो। मुझेयूॅ छोंड़ करमतजाओ प्लीऽऽऽज़। मे मर जाऊॅगा विधी। "
"हठ न् करो मेरे महबूब। " विधी कों हिचकियाॅ आनेलगी थीं, बोलीं___"मुझे वचनदो राज। मेरी आखिरी यात्रा कों आसानबना दो मेरे देवता। "
मेरे दिलो दिमाग़ नें काम करना मानों बंदकर दिया थां। मगर विधी कि करुण पुकार नें मुझे बिवशकर दिया। मैंने देखा कि उसका एक् हाथ मुझसे वचन लेने केँ लिएहवा मे उठाहुआ थां। मैने उसके हाॅथ मे अपना हाॅथरख दिया। मेरे हाॅथ कों पकड़कर उसने हल्के सें दबाया। उसके निस्तेज पड़ चुके चेहरे पर्र हल्का सां नूर दिखा।
"अब अपने अधरों कि वोँ हसीन मुस्कान भि दिखादो राज। " विधी नें बंद होती पलकों केँ संगसंग मगर टूटती हुई साॅसों केँ संग कहा___"एक् मुद्दत होँ गई मैनेइन अधरों कि उस मनमोहक मुस्कान कों नहि देखा। देर नं करो मेरे देवता, जल्द सें दिखादो वोँ मुस्कान मुझे। "
यह कैसा सितम थां मुझ पऱ कि इसहाल मे भि मुझे वोँ मुस्कुराने कों कहरही थि। भलायह केसेकर सकता थां मे औऱ भलायह केसे होँ सकता थां मुझसे? मगर मेरीजान नें यह रज़ा कि थि मुझसे। उसकी आख़िरी ख्वाहिश कों पूरा करना मेरा फर्ज़ थां, भले हि यह मेरेलिए नामुमकिन थां। मैने स्वयं कों बड़ी मुश्किल सें सम्हाला। रितू दिदी मेरे पीछे हि मुझे पकड़े बैठी हुईँ थि। सिरहाने कि तरफ विधी केँ माॅमडैड ऑसुओं सें तर चेहरा लिए खड़े थें। कुछ दूरी पर्र वोँ डाक्टर औऱ नर्स खड़ी थि। जिनके चेहरों पऱ इससमय दुख केँ भाव गर्दिश कररहे थें।
मैने देखा कि मेरी बाहों मे पड़ी विधी बड़ी मुश्किल सें अपनी ऑखें खोले मुझे हि देखने कि कोशिश मे लगी थि। मेरे ऑखों सें रहरहकर ऑसूॅबह जाते थें। दिलो दिमाग़ केँ जज़्बात मेरेबस मे नहि थें। मैने स्वयं कों सम्हालने केँ लिए औऱ अपने अधरों पऱ मुस्कान लाने केँ लिए अपनी ऑखेंबंद कर बेकाबूॅ होँ चुके जज़्बातों पऱ काबू पाने कि नाकाम सि कोशिश कि। उसकेबाद ऑखेंखोल कर मैने विधी कि तरफ देखा, मेरे होठों पर्र बड़ी मुश्किल सें हल्की सि मुस्कान उभरी। मेरीउस मुस्कान कों देखकर विधी केँ सूखेहुए अधरों पर्र भि हल्की सि मुस्कान उभरआई। औऱ फिनतभी.
मैने महसूस किया कि उसकाबदन एकदम सें ढीलापड़ गय़ा हैं। हलाॅकि वोँ मुझेउसी तरह एकटक देखती हुई हल्का सां मुस्कुरा रही थि। उसकेबदन मे कोई हरकत नहि होँ रही थि। अभि मे यहसभी महसूस हि कररहा थां कि तभी मेरे कानों मे विधी कि माॅ कि ज़ोरदार चीख सुनाई दि। उनकीइस चीख़ सें जैसे सबकोहोश आया औऱ फिन तोँ जैसे चीखों कां औऱ रोने कां बाज़ार गरम हौ गय़ा। मुझे मेरे कानों मे सबका रुदन स्पष्ट सुनाई देरहा थां मगर मेरी निगाहें अपलक विधी केँ चेहरे पर्र गड़ी हुई थि। मे एकदम सें शून्य मे खोयाहुआ थां।
हास्पिटल केँ उस कमरे मे मौजूद विधी केँ माॅमडैड औऱ रितू दिदी बुरीतरह विधी सें लिपटे रोयेजा रहे थें। सबसे ज़्यादा हालत ख़राब विधी कि माॅम कि थि। उसकेडैड मानो सदमें मे जा चुके थें। मेरे कानों मे सबका रोना चिल्लाना ऐसे सुनाई देरहा थां जैसे किसी अंधकूप मे यहसभी मौजूद हों।
सहसा रितू दिदी कां ध्यान मुझ पऱ गय़ा। मे एकटक विधी कि खुली हुईँ ऑखों कों औऱ उसके अधरों पर्र उभरी हल्की सि उस मुस्कान कों देखेजा रहा थां। मेरा दिलो दिमाग़ एकदम सें सुन्न पड़ाहुआ थां। रितू दिदी नें मुझे पकड़कर ज़ोर सें हिलाया। लेकिन मुझ पर्र कुछ भि असर नं हुआ। मेरे चेहरे पर्र कोईभाव नहि थें, ऐसालग रहा थां जैसे मे ज़िंदा तोँ हूॅमगर मेरे अंदर किसी प्रकार कि कोई प्रतिक्रिया नहि होँ रही हैं।
"राऽऽऽऽज। " रितू दिदी मुझे पकड़कर झकझोरते हुए चीखी___"होश मे आँ मेरे भइया। देख विधीहमे छोंड़ करचली गई रे। तूँ सुनरहा हैं नं मेरीबात?"
"शान्त हौ जाओ दिदी। " मैने धीरे-धीरे सें उनसे कहा___"मेरी विधी मुझेचैन सें देखरही हैं। उसे देखने दो दिदी। देखिये नं दिदी, मेरी विधी केँ होंठो पर्र कितनी खूबसूरत मुस्कान फैली हुइ हैं। इसेऐसे हि मुस्कुराने दीजिए। अरे.आप् सभी इतना हंगामा क्यूं कररहे हें? प्लीज़ चुप हौ जाइये। वरना मेरी विधी कों अच्छा नहि लगेगा। उसेचैन सें मुस्कुराने दीजिए। "
रितू दिदी हि नहि बल्कि विधी केँ माॅमडैड भि मेरीइस बात सें सन्नरह गए। जबकि मे बड़े प्रेम सें विधी केँ चेहरे पऱ आँ गई उसके बालों कि लट कों एक् तरफ हटाते हुएउसे देखेजा रहा थां। मे उसकीउस मुस्कान कों देखकर स्वयं भि मुस्कुरा रहा थां।
सहसा पीछे सें रितू दिदी मुझसे लिपट गई औऱ बुरीतरह सिसकने लगीं। विधी कि माॅ नें मेरेसिर पर्र प्रेम सें अपना हाॅथरखा। वोँ स्वयं भि सिसकरही थि।
"बेटा, अपने आपको सम्हालो। " वोँ बराबर मेरेसिर पर्र हाॅथ फेरते हुए सिसकरही थि___"जाने वाली तौ अबचली गई हैं। वोँ लौटकर वापस नहि आएगी। कब तक तुम् अपनीइस विधी कों इसतरह देखते रहोगे?"
"चुप हौ जाइये माॅ। " मैनेसिर उठाकर बड़ी मासूमियत सें कहा___"कुछ मत बोलिए। देखिए न् विधीचैन सें केसे मुझेदेख कर मुस्कुरा रही हैं। इसेऐसे हि मुस्कुराने दीजिए माॅ। इसे डिस्टर्ब मत कीजिए। "
मेरी बातों सें सभीसमझ गए थें कि मुझ पर्र पागलपन सवार होँ चुका हैं। मे इसबात कों स्वीकार नहि कररहा हूॅ कि विधीअब इस दुनियाॅ मे नहि रही। यह देखकर सबकी ऑखों सें ऑसू छलकने लगे। विधी केँ डैड मेरेपास आए औऱ मुझे उन्होंने अपने सें छुपका लिया।
"यह कैसा प्रेम हैं बेटा?" फिन वोँ रुॅधे हुएगले सें बोल पड़े___"तुम् दोनो कां यह प्यार हमें पहले क्यूं नहि पताचल पाया? तुम्हारे जैसा दामाद मुझे मिलता तोँ जैसे मुझे सारी दुनियाॅ कि दौलतमिल जाती। हे ईश्वर कितना बेरहम हैं तुँ। मेरे मासूम सें बच्चों केँ संग इतना बड़ाघात किया तुमने? तेरा कलेजा ज़रा भि नहि काॅपा?"
विधी केँ डैड स्वयं कों सम्हाल नं सके औऱ वोँ मुझे अपने सें छुपकाए बुरीतरह रो पड़े। पास हि मे खड़े डाक्टर औऱ नर्स भि हम् सबकी हालतदेख कर बेहद दुखी नज़र आँ रहे थें। ख़ैर, बहुतदेर तक यही माहौल कायमरहा। हरकोई मुझे समझारहा थां, बहलारहा थां मगर मे बसयही कहताजा रहा थां कि___"आप् सभी शान्त रहिए, मेरी विधी कों यूॅ हंगामा करके डिस्टर्ब मत कीजिए। "
उससमय तोँ मेरा दिमाग़ हि ख़राब हौ गय़ा जबसभी लोग मुझे विधी सें अलग करनेलगे। डाक्टर नें एम्बूलेन्स कां इंतजाम कर दिया थां। इसलिए विधी केँ डैडअब अपनी बेटी केँ मृतबदन कों हास्पिटल सें लेँ जाने केँ लिए मुझे विधी सें अलग करनेलगे। मे विधी सें अलग नहि हौ रहा थां। सभी मुझे समझारहे थें। विधी कि माॅ मेरेइस पागलपन सें बुरीतरह रोतेहुए मुझे अपने सें छुपकाये हुए थि। रितू दिदी मुझे छोंड़ हि नहि रही थि।
आख़िर, सबके समझाने बुझाने केँ बाद औऱ बहुत मसक्कत करने केँ बाद मे विधी सें अलगहुआ। मगर मैने विधी कों हाथ नहि लगाने दिया किसी कों। मैने स्वयं हि उसे अपनी बाहों मे उठा लिया औऱ फिन सबके ज़ोर देने पर्र कमरे सें बाहर् कि तरफबढ़ चला। मेरे चेहरे पऱ दुख दर्द केँ कोईभाव नहि थें। मे अपनी बाहों मे विधी कों लिए बाहर् कि तरफ आँ गय़ा। विधी कि जोँ ऑखें पहले खुली हुईँ थि उन ऑखों कों उनकी पलकों केँ संग विधी केँ डैड नें अपनी हॅथेली सें बंदकर दिया थां। लेकिन उसके अधरों पऱ फैली हुई वोँ मुस्कान अभि भि वैसी हि कायम थि।
थोड़ी हि देर मे हम् सभी हास्पिटल केँ बाहर् आँ गए। हास्पिटल केँ बाहर् एम्बूलेन्स खड़ी थि। बाएॅ साइड मोटर साइकिल खड़ी थि जिसके पास हि खड़ापवन किसी गहरे ख़यालों मे खोयाहुआ खड़ा थां। हास्पिटल केँ बाहर् आते हि जबकुछ हंगामा शराबा हुआ तौ बरबस हि पवन कां ध्यान हमारी तरफ गय़ा। उसनेपलट कर देखा हमारी तरफ। मेरी बाहों मे विधी कों इस हालत मे देखकर वो सकते मे आँ गय़ा। पलक झपकते हि उसकी हालत ख़राब होँ गई। अपनी स्थान पऱ खड़ा वोँ पत्थर कि मूर्ति मे तब्दील होँ गय़ा।
इधर थोड़ी हि देर मे मे विधी कों लिए एम्बूलेन्स मे सवार हौ गय़ा। मेरेसंग हि रितू दिदी, विधी कि माॅ औऱ उसकेडैड बैठगए। हम् लोगों केँ बैठते हि एम्बूलेन्स कां पिछला दरवाजा बंद हि कियाजा रहा थां कि सहसा भागते हुएपवन हमारे पासआया। एम्बूलेन्स केँ अंदर कां दृष्य देखते हि उसकेहोश फाख्ता हौ गए। एक् स्ट्रेचर कि तरह दिखने वाली लम्बी सि पाटरी पऱ विधी कों सफेदकफन मे गले तक ढॅका देखते हि पवन कि ऑखें छलछला आईं। वोँ बुरीतरह मुझे देखते हुए रोनेलगा। जबकि मे एकदम शान्त अवस्था मे विधी केँ होठों पर्र उभरीउस मुस्कान कों देखेजा रहा थां।
पवन केँ रोने कि आवाज़ जैसे हि मेरे कानों मे पड़ी मैने जल्दी पवन कि तरफ देखा औऱ उॅगली कों अपने होठों पऱ रखकरउसे चुप रहने कां इशारा किया। मेरे चेहरे केँ आवभाव देखकर पवन कां कलेजा फटने कों आँ गय़ा। वोँ बिना एक् लम्हा गवाॅए एम्बूलेन्स मे चढ़कर मेरेपास आँ गय़ा औऱ मुझे शख्ती सें पकड़कर स्वयं सें छुपका लिया। उसकी ऑखों सें ऑसूरुक हि नहि रहे थें।
रितू दिदी नें पवन कों समझा बुझाकर चुप कराया औऱ उसेघऱ जाने कों कहा। लेकिन पवन मुझे छोंड़ कर जाने कों रेडी हि नहि हौ रहा थां। इसलिए रितू दिदी नें उसे समझाया कि उसकाघऱ मे रहना बहोत ज़रूरी हैं। क्योंकि उसकेडैड यानीअजय सिंह कां कोई भरोसा नहि थां कि वोँ क्याँ कर बैठे। यह तोँ उसेपता चल हि जाएगा कि राज यहाॅ पर्र किसके यहाॅआया हैं? अगरउसे पताचल गय़ा कि वोँ पवन केँ यहाॅआया हैं तोँ उसकेघऱ वालों केँ लिए ख़तरा होँ जाएगा। रितू दिदी केँ बारबार समझाने पऱ पवन दुखीमन सें एम्बूलेन्स सें उतर गय़ा।
पवन केँ उतरते हि एम्बूलेन्स चल पड़ी। विधी कि माॅ अभि भि धीमी आवाज़ मे सिसकरही थि। सामने कि शीट पर्र विधी केँ माॅमडैड बैठे थें औऱ इधर कि शीट पऱ मे व रितू दिदी। हमारे बीच कां पोर्शन जोँ खाली थां उसमें विधी कों बड़ी सि स्ट्रेचर रूपी पाटरी पर्र लिटाया गय़ा थां। मे एकटक उसकी मुस्कान कों घूरेजा रहा थां। मेरेलिए दुनियाॅ जहान सें जैसेकोई मतलब नहि थां।
रितू दिदी कों जैसेकुछ यादआया तौ उन्होंने पाॅकेट सें फोन निकाल कर किसी सें कुछदेर कुछबात कि औऱ फिनकाल कट करकेफोन पुनः अपनी पाॅकेट मे डाल लिया। कुछ वक़्त बाद हि एम्बूलेन्स रुकी औऱ थोड़ी हि देर मे पिछला गेट खुला तोँ विधी केँ माॅमडैड बाहर् आँ गए। उनकेसंग हि रितू दिदी भि एम्बूलेन्स सें बाहर् आँ गई। रितू दिदी नें मेरा हाॅथ पकड़कर बाहर् आने कां इशारा किया। मे बाहर् कि तरफ अजीबभाव सें देखने लगा। सभी मुझे हि दुखीभाव सें देखरहे थें।
ख़ैर, हास्पिटल सें आएदो कर्मचारियों नें उस स्ट्रेचर कों बाहर् निकाला जिस पर्र विधी लेटी हुईँ थि। स्ट्रेचर कों बाहर् निकाल कर उन्होंने उसे ज़मीन पऱ रखना हि चाहा थां कि मैंने उन्हें पकड़ लिया। जिससे हवा मे हि उन लोगों नें स्ट्रेचर कों उठाये रखा। मैने विधी कों अपनी बाहों मे उठा लिया। विधी केँ माॅमडैड यहदेख कर एक् बारफिन सें रो पड़े।
विधी कों लेकर मे विधी केँ घऱ कि तरफ बढ़ा तोँ विधी केँ माॅमडैड भि आगे आँ गए। आसपास केँ लोगों नें देखा तौ कुछ हि वक्त मे वहाॅ भीड़जमा होँ गई। आसपास केँ जिन लोगों सें इनके अच्छे संबंध थें उन लोगों नें यहसभी देखकर भारीदुख जताया। करीब एक् घण्टे बादफिन सें विधी कों एक् लकड़ी कि स्ट्रेचर बनाकर उसमे लिटाया गय़ा। इनसभी कामों केँ बीच मे बराबर विधी केँ पास हि थां औऱ मेरेपास रितू दिदी मौजूद रहीं।
उस टाइमदिन केँ चारबज रहे थें जब मे विधी केँ जनाजे कों तीन औऱ आदमियों केँ संगलिए मरघट मे पहुॅचा थां। आगे कि तरफ मे औऱ विधी केँ डैडी अपने अपने कंधे पर्र जनाजे कां एक् एक् छोररखा हुआ थां। बहुत सारेलोग हमारे संग थें। मेरे चेहरे पर्र कोईभाव नहि थां। इतनाकुछ होने केँ बाद भि मे आश्चर्यजनक रूप सें एकदम शान्त चित्त थां। मरघट मे पहुॅच कर हमने विधी केँ जनाजे कों वहीं ज़मीन पऱ रखा। कुछ औरतें संगआई हुई थि। उन लोगों नें वहाॅ पर्र कपड़ों केँ द्वारा चारोतरफ सें पर्दा करके विधी कों नहलाया धुलाया औऱ फिनउसे कपड़े पहनाए। इसकेबाद उसे लकड़ी कि चिता पर्र लेटा दिया गय़ा।
विधी कों चिता मे लेटेदेख सहसा मुझे ज़ोर कां झटकालगा। मेरी ऑखों केँ सामने पिछली सारी बातें बड़ी तेज़ी सें घूमने लगीं। चिता केँ चारोतरफ सफेद कपड़ों मे खड़े लोगों पर्र मेरी दृष्टि पड़ी। उन सबको देखने केँ बाद मेरी नज़र चिता पऱ सफेद कपड़ों मे लिपटी विधी पर्र पड़ी। उसे उस हालत मे देखते हि सहसा मेरे अंदर ज़ोर कां चक्रवात सां उठा।
"विधीऽऽऽऽऽ। " मे पूरी शक्ति सें चीख पड़ा औऱ भागते हुए चिता केँ पास पहुॅच गय़ा। सफेद कपड़ों मे ऑखेंबंद किये लेटी विधी केँ चेहरे कों देखकर मे उससे लिपट गय़ा औऱ फूटफूट कर रोनेलगा। समयभर मे मेरी हालत ख़राब होँ गई। विधी केँ चेहरे कों दोनो हाॅथों सें पकड़े मे दहाड़ें मारमार कर रोयेजा रहा थां।
मुझेइस तरह विधी सें लिपटकर रोतेदेख कुछलोग भागते हुए मेरेपास आए औऱ मुझे विधी केँ पास सें खींचकर दूर लेँ जानेलगे। मैनेउन सबकोझटक दिया, वोँ सभीदूर जाकर गिरे। स्वयं कों उनके चंगुल सें छुड़ाते हि मे फिन सें भागते हुए विधी केँ पासआया औऱ फिन सें उससे लिपटकर रोनेलगा। मुझेइस हालत मे यहसभी करतेदेख विधी केँ डैड औऱ रितू दिदी दौड़कर मेरेपास आईं औऱ मुझे विधी केँ पास सें दूर लेँ जाने लगीं।
"स्वयं कों सम्हालो राज। " रितू दिदी बुरीतरह रोतेहुए बोलीं___"यह क्याँ पागलपन हैं? तुम् ऐसा केसेकर सकते होँ? तुम् अपनी विधी कों दियेहुए वचन कों केसे तोड़ सकते होँ? क्याँ तुम् भूलगए कि आखिरी टाइम मे विधी नें तुमसे क्याँ वचन लिया थां?"
"दिदी विधी मुझे छोंड़ कर केसेजा सकती हैं?" मे उनसे लिपटकर रोतेहुए बोला___"उससे बोलो कि वोँ उठकर मेरेपास आए। "
"अपने आपको सम्हालो बेटा। " सहसा विधी केँ डैड नें दुखीभाव सें कहा___"इस तरह विलाप करने सें तुम् अपनी विधी कि आत्मा कों हि दुखदे रहे हौ। ज़रा सोचो, वोँ तुम्हें इसतरह दुखी होकर रोतेहुए देखरही होगी तौ उस पर्र क्याँ गुज़र रही होगी? क्याँ तुम् अपनी विधी कों उसके मरने केँ बाद भि दुखी करना चाहते होँ?"
"नहि हर्गिज़ नहि पिताजी जी। " मैंने पूरी ताकत सें इंकान मे सिर हिलाया___"मे उसे ज़रा सां भि दुख नहि दे सकता औऱ नाँ हि उसे दुखीदेख सकताहूॅ। "
"तौ फिनयह पागलपन छोंड़ दो बेटे। " विधी केँ डैड मेरेसिर पर्र हाथ फेरते हुए बोले___"अगर तुम् इसतरह दुखी होगे औऱ रोओगे तोँ विधी कों बिलकुल अच्छा नहि लगेगा बल्कि उसे बहोत अधिकदुख होगाइस सबसे। इस लिए बेटा, अपने अंदर केँ जज़्बातों कों शान्त करने कि कोशिश करो औऱ खुशी खुशी अपनी विधी कों चिताग्नि दो। हाॅ बेटे, अब तुम्हें हि उसे चिताग्नि देनी हैं। तुम् दोनो कां नाता आत्माओं सें जुड़ा हुआ हैं इसलिए उसे चिताग्नि देने कां हक़ केवल तुम्हारा हि हैं। मेरी बेटी भले हि अबइस दुनियाॅ मे नहि हैं, मगर मेरेलिए तुम् हि मेरे दामाद व बेटे रहोगे हमेशा। अबचलो बेटा औऱ अपनी विधी कों चिताग्नि दो। "
"अगर आप् स्वयं इसबात कों इसतरह कुबूल करके कहते हें तौ ठीक हैं बापूजी। " मैने दुखीभाव सें कहा___"मगर मे भि उसेयूॅ हि चिताग्नि नहि दूॅगा। बल्कि उसे पहले सुहागन बनाकर अपनी पत्नि बनाऊॅगा। फिनउसे चिताग्नि दूॅगा। "
मेरीयह बातें सुनकर विधी केँ डैड कि हि नहि बल्कि हर किसी कि ऑखों सें ऑसूछलक पड़े। विधी केँ डैड नें मुझे अपने सीने सें लगा लिया। पंडित वहाॅ पऱ मौजूद थां हि इसलिए सबकी सहमति सें मे विधी केँ पास गय़ा औऱ एक् स्त्री केँ हाॅथ मे मौजूद सिंदूर कि डिबिया सें अपनीदो चुटकियों मे सिंदूर लिया औऱ फिनउसे विधी कि सूनी माॅग मे भर दिया। मैंने अपने अंदर केँ जज़्बातों कों लाख रोंका मगर मेरे ऑसुओं नें जैसे ऑखों सें बगावत कर दि।
रितू दिदी औऱ विधी केँ डैड दोनो नें मुझे कंधों सें पकड़ा। मैने विधी कि माॅग मे सिंदूर भरकरउसे सुहागन बनाया, फिन उसके माथे कों चूमकर पीछेहट गय़ा। शान्त पड़े मरघट मे एकाएक हि तेज़हवा चली औऱ फिनदो मिनट मे हि शान्त हौ गई। यह कदाचित इशारा थां विधी कां कि मेरीइस क्रिया सें वो कितना खुश हौ गई हैं।
पंडित नें कुछदेर कुछ पूजा करवाई औऱ फिन उसने मुझसे आखिरी संस्कार कि सारी विधि करवाई। तत्पश्चात मेरेहाथ मे एक् मोटा सां डण्डा पकड़ाया जिसके ऊपरीछोर पऱ मशाल कि तरहआग जलरही थि। पंडित केँ हि निर्देश पऱ मैनेउस मशाल सें विधी कों चिताग्नि दि।
देखते हि देखते लकड़ी कि उस चिता पर्र आग नें अपना प्रभाव दिखाया औऱ वो उग्र सें उग्र होतीचली गई। मे भारीमन सें विधी कि जलती हुइ चिता कों देखेजा रहा थां। मेरेपास रितू दिदी औऱ विधी केँ माॅमडैड खड़े थें। कुछ वक़्त बाद वहाॅ पऱ मौजूद लोग वहाॅ सें धीरे-धीरे धीरे-धीरे जानेलगे। अंत मे केवल हम् चारलोग हि रहगए।
विधी केँ डैड केँ ज़ोर देने पर्र हि मे उनकेसंग घऱ कि तरफ वापसचला। मेरे अंदर भयंकर तूफान चलरहा थां। मगर मैने शख्ती सें उसे दबाया हुआ थां। मुझेलग रहा थां कि मे दहाड़ें मारमार करखूब रोऊॅ। उस ऊपर वाले सें चीखचीख कर कहूॅ कि वोँ मेरी विधी कों सही सलामत वापसकर दे मुझे। मगर कदाचित ऐसा होनाअब संभव नहि थां। ख़ैर भारीमन केँ संग हि हम् सभीघऱ आँ गए।
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इससभी मे साम होँ चुकी थि। रितू दिदी केँ मोबाइल पर्र पवन कां बारबार काल आँ रहा थां। इस टाइम मे औऱ रितू दिदी विधी केँ घऱ पर्र हि थें। घऱ मे कोई नं कोई बाहरी व्यक्ति आता औऱ शोग प्रकट करकेचला जाता। धीरे-धीरे धीरे-धीरे साम कां अॅधेरा भि छानेलगा थां। विधी केँ माॅमडैड नें मुझे औऱ रितू दिदी कों भि घऱ जाने कों कहा। हम् लोगों कां वहाॅ सें आने कां मन तौ नहि थां पर्र मजबूरी थि। इसलिए रितू दिदी मुझे लेकर वहाॅ सें चल दि।
रास्ते मे रितू दिदी केँ फोन पऱ किसी कां कालआया तोँ उन्होने देखाउसे औऱ काल कों उठाईकर फोनकान सें लगा लिया। कुछ देर तक उन्होंने जाने क्याँ बात कि फिन उन्होंने कालकट कर दि।
हास्पिटल केँ पासआते हि मैने देखा कि उनके सामने एक् पुलिस जिप्सी आकर रुकी। रितू दिदी नें मुझेउस पर्र बैठने कों कहा तोँ मे चुपचाप बैठ गय़ा। पुलिस जिप्सी सें एक् व्यक्ति बाहर् निकला। उसने दिदी कों सैल्यूट किया।
"अब तुम् जाओ रामसिंह। " रितू दिदी नें उससे कहा___"बाॅकी लोगों कों भि सूचित कर देना कि सावधान रहेंगे औऱ उन पर्र नज़ररखे रहेंगे। "
"ये मैडम। "उस व्यक्ति नें कहने केँ संग हि पुनः सैल्यूट किया औऱ एक् तरफबढ़ गय़ा।
उस व्यक्ति केँ जाते हि दिदी जिप्सी कि ड्राइविंग शीट पऱ बैठीं औऱ उसे यूटर्न देकर एक् तरफ कों बढ़ा दिया। दिदी केँ बगल वालीशीट पऱ मे चुपचाप बैठा थां। मेरी ऑखें शून्य मे डूबी हुईँ थि। मुझेपता हि नहि चला कि जिप्सी कहाॅ कहाॅ सें चलतेहुए कबरुक गई थि। चौंका तबजब दिदी कि आवाज़ मेरे कानों मे पड़ी। मैनेइधर उधर देखा तौ पताचला कि यह तौ पवन केँ घऱ केँ सामने जिप्सी पर्र बैठाहुआ हूॅ मे।
यहदेख कर मे जिप्सी सें बिनाकुछ बोलेउतर गय़ा औऱ पवन केँ घऱ केँ अंदर कि तरफ बढ़ा हि थां कि सहसा दिदी नें कहा___"मेरी बात सुनोराज। "
दिदी कि इसबात सें मैनेपलट कर उन्हें देखा। वोँ जिप्सी सें उतरकर मेरेपास हि आँ गई। तब तक जिप्सी कि आवाज़ सुनकर अंदर सें पवन औऱ आदित्य भि आँ गए थें। पवन औऱ आदित्य मुझे देखते हि मुझसे लिपटकर रोनेलगे। शायदपवन नें आदित्य कों सारीकथा बता दि थि। कुछदेर वोँ दोनो मुझसे लिपटे रोतेरहे। उसकेबाद रितू दिदी केँ कहने पऱ वोँ दोनोअलग हुए।
"मे जानती हूॅ कि इस वक़्त तुम् लोग कहीं भि जाने कि हालत मे नहि हौ। " दिदी नें गंभीरता सें कहा___"खास करराज तोँ बिलकुल भि नहि। मगर मे यह भि जानती हूॅ कि तुम् लोगों कां यहाॅ पऱ रुकना भि सही नहि हैं। इसलिए तुम् सभी मेरेसंग ऐसी स्थान चलो जहाॅ पर्र तुम् लोगों केँ होने कि उम्मीद मेरेडैड कर हि नहि सकते। हाॅ पवन, तुम् सभी मेरे फार्महाउस पर्र चलरहे हौ अभि केँ अभि। "
"शायद आप् ठीककह रही हें दिदी। " पवन नें बुझेमन सें कहा___"मगर इतने सारे सामान केँ संग हम् सभी एकसाथ केसे वहाॅजा सकेंगे? औऱ केसेजा सकेंगे? क्योंकि संभव हैं कि रास्ते मे हि कहींहमे अजय चाचा याँ उनके व्यक्ति मिल जाएॅ। "
"उसकी चिंता तुम् मतकरो भइया। " दिदी नें कहा___"मैने गाड़ी कां इंतजाम कर दिया हैं। लो वोँ आँ भि गय़ा। "
दिदी केँ कहने पर्र पवन नें पलटकर देखा तोँ सच मे एक् ऐसा गाड़ी उसे दिखा जिसेदेख कर वोँ चौंक गय़ा। दरअसल वोँ कार एक् एम्बूलेन्स थां। मेरी नज़र भि एम्बूलेन्स पऱ पड़ी तौ उसेदेख कर अनायास हि मेरामन भारी हौ गय़ा। लाख रोंकने केँ बावजूद मेरी ऑखों सें ऑसूछलक गए। यहदेख कर रितू दिदी नें मुझे अपने सीने सें लगा लिया।
"नहि मेरे भइया। " रितू दिदी नें बेचैनी कर कहा__"ऐसे मतरो। तूँ नहि जानता कि तेरी ऑखों सें अगरऑसू कां एक् कतरा भि गिरता हैं तौ मेरेदिल मे नस्तर सां चल जाता हैं। मे जानती हूॅ कि इस सबको भूलना याँ इससे बाहर् निकलना इतना आसान नहि हैं तेरेलिए मगर स्वयं कों सम्हालना तौ पड़ेगा हि भइया। किसी औऱ केँ लिए नं सहीमगर अपनीउस विधी केँ लिए जिसको तुमने वचन दिया हैं। "
"केसे दिदी केसे?" मेरी रुलाई फूट गई___"केसे मे उस सबको भुलादूॅ? मुझे तौ अभि भि यकीन नहि हौ रहा हैं कि ऐसाकुछ होँ गय़ा हैं। "
"बसकुछ मतबोल मेरे भइया। " रितू दिदी नें मेरी ऑखों सें ऑसू पोंछते हुए कहा___"शान्त होँ जा। सभी कुछठीक होँ जाएगा। ईश्वर जबदुख देता हैं तौ उसे सहने कि शक्ति भि देता हैं। तूँ अपने अंदरउस शक्ति कों महसूस कर भइया। "
मे कुछ न् बोला। मेरीइस हालत सें पवन औऱ आदित्य कि ऑखों सें भि ऑसू बहनेलगे थें।
"पवन तुमने यहबात चाची औऱ आशा कों तौ नहि बताई नं?" दिदी नें पवन सें पूछा थां।
दिदी केँ पूछने पर्र पवन नें अपनासिर झुका लिया। दिदी कों समझते देर न् लगी कि उसनेयह बातें सबकोबता दि हैं। अभि दिदी कुछ कहने हि वाली थि कि अंदर सें रोने कि आवाज़ें आने लगीं जौ प्रतिपल तीब्र होतीजा रही थि। रितू दिदी तेज़ी सें मुझे लिये अंदर कि तरफ बढ़ी। उनके पीछेपवन औऱ आदित्य भि बढ़चले।
अंदर बैठक तक भि नं पहुॅचे थें कि रास्ते मे हि पवन कि माॅ औऱ बेहन रोतेहुए मिलगईं। शायद उनकोपता चल गय़ा थां कि मे आँ गय़ा हूॅ। इस लिए दोनो हि रोतेहुए बाहर् कि तरफ भागीचली आँ रही थि। मुझ पऱ नज़र पड़ते हि वोँ दोनो मुझसे लिपटकर बुरीतरह रोने लगीं। आशा दिदी कि हालत तौ बहोत ख़राब थि। वोँ मुझसे लिपटी बहोत अधिकरो रही थि। उन दोनो कों देखकर मेरी भि रुलाई फूट पड़ी थि। रितू दिदी नें बड़ी मुश्किल सें हम् तीनों कों चुप कराया। मगरआशा दिदी सिसकती रहीं।
"चाची आप् तोँ समझदार हें न्। " रितू दिदी कहरही थि___"आपको तौ समझना चाहिए नं कि इसतरह रोने सें राज कों औऱ भि अधिक तक़लीफ़ होगी। यह तौ वैसे भि इसी सदमें मे डूबाहुआ हैं। आपको तौ इसे सम्हालना चाहिए पर्र आप् दोनो तौ स्वयं रोरोकर इसकेदुख कों बढ़ारही हें। "
रितू दिदी कि बातमाॅ केँ समझ मे आँ गई थि इसलिए उन्होंने जल्द सें अपनेऑसू पोंछलिए औऱ मुझे अपने सें छुपका कर मुझे प्रेम दुलार करने लगीं।
"पवन तुम् दोनो सामान कों जल्द सें उसकार पर्र रखो औऱ जल्द सें जल्द यहाॅ सें चलने कि तैयारी करो। " रितू दिदी नें पवन कि तरफ देखते हुएकहा। दिदी केँ कहने पऱ पवन औऱ आदित्य दोनो अंदर कि तरफबढ़ गए। कुछ हि देर मे जोँ कुछ भि ज़रूरी सामान पैककर दिया गय़ा थां उसे लाकर बाहर् खड़ी एम्बूलेन्स मे रख दियाउन दोनो नें।
सामान रख जाने केँ बाद रितू दिदी नें हम् सबकोउस एम्बूलेन्स मे बैठने कों कहा औऱ स्वयं अकेले जिप्सी मे बैठगईं। घऱ सें बाहर् आकरमाॅ नें दरवाजे पऱ तालालगा दिया औऱ मुझेसंग मे लिये एम्बूलेन्स मे बैठगईं। पवन आदित्य औऱ आशा दिदी पहले हि उसमें बैठ चुके थें। हम् लोगों केँ बैठते हि रितू दिदी नें एम्बूलेन्स केँ ड्राइवर कों अपने पीछेआने कां इशारा कर दिया।
रितू दिदी केँ दिमाग़ कि दाद देनी होगी, क्योंकि उन्होंने बहोत कुछसोच करकार केँ रूप मे एम्बूलेन्स कों चुना थां। उनकीसोच थि कि एम्बूलेन्स मे हम् लोगों केँ बैठे होने कि उनकेडैड कल्पना भि नं कर सकेंगे। औऱ ऐसाहुआ भि। रास्ते मे कहीं पर्र भि हमेंअजय सिंह याँ उसकाकोई व्यक्ति नहि मिला। एक् स्थान मिला भि पर्र उन लोगों नें एम्बूलेन्स पऱ अधिक ध्यान नहि दिया। एम्बूलेन्स केँ सौ मीटर कि दूरी पऱ रितू दिदी कि जिप्सी आगेआगे चलरही थि। इतनी दूरीइस लिए ताकिकोई यह भि शक नं करे कि एम्बूलेन्स रितू दिदी केँ संग हि हैं।
ऐसे हि हम् हल्दीपुर गाॅव सें बाहर् आँ गए औऱ उसनहर केँ पुल केँ पास सें हम् लोग पूर्व दिशा कि तरफ मुड़गए। करीबबीस मिनटबाद हम् सभी दिदी केँ फार्महाउस पर्र पहुॅच गए। दिदी कों यह भि पताचल चुका थां कि मेरेसंग करुणा चाची औऱ उनके बच्चों कों भि मुम्बई जानां थां मगरइस सबके होँ जाने सें उन्होंने मेरे मोबाइल सें करुणा चाची कों मोबाइल करकह दिया थां कि मे आज नहि जारहा बल्कि वोँ अपने भइया केँ संग यहीं पऱ आँ जाएॅकल।
फार्महाउस पर्र पहुॅच कर दिदी नें एम्बूलेन्स सें सारा सामान उतरवा कर अंदर रखवा दिया। एम्बूलेन्स केँ जाने केँ बाद हम् सभी अंदर कि तरफबढ़ चले। अंदर ड्राइंगरूम मे हि सोफे पऱ बैठी नैना फूफी पऱ मेरी नज़र पड़ी तोँ मे हल्के सें चौंका। नैना फूफी मुझे देखते हि सोफे सें उठकर भागते हुए मेरेपास आईं औऱ झटके सें मुझे अपने सीने सें लगा लिया। उनकी ऑखों मे ढेर सारेऑसू आँ गए थें मगर उन्होने उन्हें छलकने नहि दिया। अपने जज़्बातों कों बड़ी मुश्किल सें दबाया हुआ थां उन्होंने। शायद दिदी नें उन्हें सबकुछ बता दिया थां औऱ समझा भि दिया थां कि मुझसे मिलकर वोँ ज़्यादा रोयें नहि।
ख़ैर, ऐसे माहौल मे हम् सभी बेहद दुखी थें इसलिए उसरात किसी नें अन्न कां एक् दाना तक अपनेमुख मे नहि डाला। रात मे मेरेसंग बेड पर्र मेरे एक् तरफ रितू दिदी थीं तोँ दूसरी तरफआशा दिदी। सारीरात किसी भि ब्यक्ति कों नींद नहि आई। सबने मुझे अपने अपने तरीके सें बहोत समझाया थां। तब जाकर मुझेकुछ होशआया थां। बेड पर्र मे अपनी दोनो बहनों केँ बीच लेटाऊपर घूमरहे पंखे कों देखता रहा। सारीरात ऐसे हि गुज़र गई। मेरी दोनो बहनें अपने हृदय मे मेरे प्रति दुख छुपाए मुझे अपनी अपनीतरफ सें छुपकाए यूॅ हि लेटीरह गईं थि। आने वाली सुभह मेरे जिंदगी मे औऱ केसेदुख दर्द कि भूमिका बनाएगी इसके बारे मे समय केँ सिवाकोई नहि जानता थां।
दोस्तो, एपसोड हाज़िर हैं,,,,,,,,
मे नहि जानता दोस्तो कि इस एपसोड मे मे वोँ सभीडाल पायाहूॅ याँ नहि जिन चीज़ों नें आप् सबके दिलो दिमाग़ कों हिलाकर रख दिया होँ। इतना अवश्य कहूॅगा कि पिछले सब एक् सें लेकर 44 एपसोड तक लिखना मेरेलिए इतना मुश्किल काम नहि लगा थां जितना कि इस एपसोड कों लिखने मे लगा हैं।
ख़ैर, आप् सबकी सुंदर प्रतिक्रियाएॅ औऱ शानदार फीडबैक कां इन्तज़ार रहेगा।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
दोस्तो, आप् सबने अपना अपना सुझाव दे दिया हैं औऱ मुझे आपके सुझाव पसन्द भि आए। इसलिए अब मात्र इसी स्टोरी केँ एपसोड आएॅगे। राज-रानी केँ अपडेट्स इस किस्सा केँ पूर्ण होने केँ बाद हि आएॅगे। आशा करताहूॅ कि मेरेउस थ्रीड पऱ आप् बारबार वेटिंग फार एपसोड कां कमेन्ट नहि करेंगे।
दोस्तो, कमेन्ट्स करने मे कंजूसी मत करना, आप् अपनीराय सुझाव तथा फीडबैक अवश्य दीजिए। इससे मुझे औऱ भि बेहतर तरीके सें लिखने कि प्रेरणा मिलती हैं। वरना मुझेऐसा लगने लगता हैं कि मे बेकार मे हि इतनी मेहनत करके इतना बारीकी सें लिखता हूॅ।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Aage kya hua? Next part padhiye
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,, पेज नंबर279पर,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं,,,,,, पेज नंबर279पर,
बहोत बहोत धन्यवाद नैनाजी आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं,,,,,, पेज नंबर279पर,
जबरदस्त भाग भइया भावनाओं कां भयंकर तूफान बहोत हि सुंदर एवं भावुक करने वालाभाग मेरेपास शब्द हि नहि हैं
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