♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
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♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
हैलो दोस्तो, केसे हें आप् सभी?????आशा करताहूॅ कि आप् सभी बहोत अच्छे सें हि होंगे।
दोस्तो, आख़िर बहुत मसक्कत केँ बाद मेराफोन मोबाइल बन हि गय़ा। चार पाॅचदिन सें सर्विस सेन्टर मे हि दियाहुआ थां उसे। आज हि बना हैं औऱ सबसे पहले आप् लोगों कों हि बताने कां सोचा मैने। क्योंकि मुझेपता हैं कि आप् लोगकुछ अधिक हि चिंतित व परेशान हौ गए होंगे। इसलिए मैने सोचा कि सबसे पहलेफोन बन जाने कि बात आप् सबको हि बतादूॅ औऱ यह भि बतादूॅ कि आप् लोगयह न् सोच बैठना कि मे किस्सा कों अधूरी छोंड़ करचला गय़ा हूॅ।
दोस्तो, फोन केँ बिना आजकल लाइफ कैसी होँ जाती हैं, यह मैंने अब जानां हैं। आपकेपास अगर कीपैड वालाफोन हैं तब तौ चलो इतनी तकलीफ़ नहि होतीमगर यदि आपकेपास स्मार्टफोन वग़ैरा हैं औऱ वोँ बिगड़ जाए तोँ समझो नं भूख लगती हैं न् प्यास औऱ नां हि सुकून मिलता हैं नाँ हि क़रार। फोन सें इतनी गहरी इश्क होती हैं इसका एहसास पहलीबार हुआ हैं मुझे।
दोस्तो, अब तोँ फोनबन हि गय़ा हैं इसलिए अबभाग लिखना शुरुआत कर दूॅगा। मेरी कोशिश रहेगी कि जितना जल्द होँ सके आप् सबके सामने एक् मेगाभाग हाज़िर कर सकूॅ। आप् सबसे गुज़ारिश हैं कि कृपया आप् सभी अपनासंग व सहयोग बनाए रखें औऱ मुझे मोटीवेट भि करते रहें।
!! शुक्रिया !!
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया औऱ शानदार रिव्यू केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस सुंदर प्रतिक्रिया औऱ शानदार रिव्यू केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) – New Episode
♡ एक् नया संसार ♡
भाग। 《 51 》
अब तक,,,,,,,,
"कुछ तोँ करना हि पड़ेगा चौधरी साहब?" अशोक नें कहा___"साला नुकसान तोँ दोनोतरफ सें होना हि हैं। इसलिए कुछ करके हि नुकसान झेलते हें। शायदऐसा भि होँ जाए कि साराखेल हमारे हक़ मे हौ जाए। "
"बात तौ सचकही तुमने। " चौधरी नें कहा___"मगर प्रश्न यह हैं कि हम् करेंगे क्याँ?"
"वही जोँ करने कां सजेशन थोड़ी देर पहले अवधेश भइया नें दिया थां। " अशोक नें कहा___"मगर उसमें थोडा चेंज करना पड़ेगा। वोँ यह कि लड़की केँ घरवालों कों पहले हम् दिलेरी सें धरनेजा रहे थें जबकि अबवही काम हम् इस तरीके सें करने कि कोशिश करेंगे कि उस कम्बख्त कों इसकीभनक तक नं लगसके। "
"ओहआई सि। " अवधेश श्रीवास्तव बोला__"मगर मुझे लगता हैं कि हमें एक् बारयह सभी करने सें पहलेफिन सें इस बारे मे सोच लेना चाहिए। कहींऐसा नं हौ कि हम् स्वयं हि धरलिए जाएॅ। "
"कायरव डरपोंक जैसी बातें मतकरो अवधेश। " चौधरी नें कठोरता सें कहा___"अब हम् चुप भि नहि बैटना चाहते हें। साला हिंजड़ा बनाकर रख दिया हैं उसने हमें। मगर अब औऱ नहि। अब जौ होगा देखा जाएगा। "
बस चौधरी कि इसबात नें जैसे फैंसला सुना दिया थां। किसी मे भि इस फैंसले केँ खिलाफ़ जाने कि हिम्मत न् थि। इसलिए अबइसकाम कों अंजाम देने कि वक्त सीमा पर्र विचार विमर्ष किया गय़ा औऱ उसकेबाद अशोक औऱ अवधेश अपने अपनेघऱ चलेगए। मगरआगे किसके संग क्याँ होने वाला हैं यह किसी कों कुछपता न् थां।
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अबआगे,,,,,,,
उधर तहखाने मे रितूजब पहुॅची तोँ वहाॅ कि साफ सफाईदेख करखुश हौ गई। अब यहाॅ पऱ पहले जैसीगंद नहि थि। एक् तरफ सूरज औऱ उसके तीनोयार हाथऊपर किये रस्सी सें बॅधे खड़े थें। रितू कों तहखाने मे आयादेख करउन चारों कि निगाह स्वयमेव हि उसतरफ उठतीचली गई थि। चेहरों पर्र घबराहट केँ भाव एकाएक हि उजागर होँ गए थें। चारों कि हालत बहुत ख़राब होँ चुकी थि। ठीक सें भोजन न् मिलने कि वजह सें उनकेबदन कमज़ोर सें दिखाई देरहे थें। दाढ़ी मूॅछें बढ़ गई थि जिससे पहचान मे नहि आँ रहे थें वोँ। वहीं दूसरी तरफ दीवार केँ पास हि लकड़ी कि एक् कुर्सी पर्र मंत्री कि बेटी रचना बैठी हुई थि। उसके दोनोहाॅ तथा दोनोपेर कुर्सी सें इसतरह बॅधेहुए थें कि वो हिलडुल भि नहि सकती थि।
"वाउ काका। " तहखाने केँ फर्श पऱ चलतेहुए रितू नें हरिया कि तरफदेख कर कहा___"आपने तौ कमाल हि कर दिया हैं। यहाॅ कि साफ सफाईदेख कर लगता हि नहि हैं कि अभि थोड़ी देर पहले यहाॅ गंदगी कां कितना बड़ा साम्राज्य कायम थां। "
"ई सुसरे लोगन नें इहाॅ बड़का वाला गंदगी फेरेरहे बिटिया। " हरिया काका नें कहा___"यसे साफ तोँ करइन कां परत नाँ। बस थोड़ी दिक्कत ता हुइ पऱ हम् सभी बहोत अच्छे सें कर लियाहूॅ। "
"हाॅ वोँ तोँ दिख हि रहा हैं काका। " रितू नें सहसा पहलू बदलते हुए कहा___"ख़ैर, इन लोगों कि ख़ातिरदारी अच्छी चलरही हैं नं?"
"अरे बिटिया। " हरिया नें अजीबभाव सें कहा___"ई कइसन प्रश्न हा?ईबात ताई ससुरा लोगन कां देख केँ हि समझमा आँ जई कि हम् कितना अच्छे सें ई लोगनकेर खातिरदारी कियाहूॅ। बसई ससुरी छोकरिया बहुतै उछलतरही। "
"ऐसा क्यूं काका?" रितू चौंकी।
"अरेऊ कां हैं नाँ बिटिया। " हरिया नें ज़रा नज़रें झुकाते हुए कहा___"ई चारो लोगन केँ जइसन एखरौ टट्टी पेशाब छूटगइल रहे। एसे हमकाएखर नीचे कां कपड़ा उतारैं कां परा। पर्र हम् सचकहत हूॅ बिटिया। हम् एखे बदनवा कां कछू नाहीं देखेन। एखे बावजूदव ई ससुरी चिल्लात रहीयसे हम् भि क्रोध मा एक् लाफादै दिये इसको। ससुरी बहुतै गंदा गरियावत रही हमका। पऱ हमहू तबहिनै मानेजब एखरसभी कुछसाफ कर केँ चकाचक कर दिहे। "
"ओह तोँ यहबात हैं। " रितूमन हि मन मुस्कुराते हुए बोलीं___"कोई बात नहि काका। आपने अपनाकाम बहोत अच्छे सें किया हैं। वरना तौ यहसभी गंद फैलाते हि रहते न्?"
"एक् बार मेरे हाॅथपेर कों इस रस्सी सें आज़ाद कर केँ देख कुतिया। " सहसा रचना नें एकाएक बिफरे हुए अंदाज़ सें चीखते हुए कहा___"तेरे हाथपेर तोड़कर तेरे हाॅथ मे न् देदूॅ तौ कहना। "
रचना कि इसबात सें जहाॅ हरिया कां पारा गर्म हौ गय़ा थां वहीं रितूउसे देखकर बस मुस्कुरा कररह गई। फिन उसने सूरज औऱ उसके दोस्तों कि तरफ इशारा करतेहुए रचना सें कहा___"इन चारों कों ग़ौर सें देखो औऱ पहचानो कि यह चारोकौन हें?"
"मुझे नहि पहचानना किसी कों। " रचना नें पूर्व कि भाॅति हि तीखेभाव सें कहा___"यह सभी तेरे दोस्त हें तूँ हि पहचान इन्हें। "
"मे चाहूॅ तौ इसीसमय तेरीइस गंदी ज़ुबान कों काटकर तेरे पिछवाड़े मे डालदूॅ। " रितू केँ मुख सें शेरनी कि भाॅति गुर्राहट निकली___"मगर उससे पहले तुझेही यह दिखाना चाहती हूॅ औऱ बताना चाहती हूॅ कि तूँ जिनके दम पऱ इतनाउछल रही हैं न् उनकी औकात मेरे सामने कीड़े मकोड़ों सें भि बदतर हैं। ग़ौर सें देखइन चारों कों। इनमें तेरा हि कोई अपना नज़र आएगा। "
रितू कि यहभात सुनकर रचना नें पहले तौ उसे आग्नेय नेत्रों सें घूरा उसकेबाद उसनेउन चारों कि तरफ अपनी निगाह डाली। सूरज अपनी बेहन कों ग़ौर सें अपनीतरफ देखते देख बुरीतरह घबरा गय़ा। वोँ नहि चाहता थां कि उसकी बेहनउसे पहचाने। क्योंकि उसेपता थां कि उस सूरत मे उसकी बेहन भयभीत हौ जाएगी। उसनेजब पहलीबार ऑखेंखोल कर रचना कों देखा थां तौ बुरीतरह चौंका थां संग हि डर भि गय़ा थां। उसे रितू सें इस सबकी उम्मीद नहि थि। हलाॅकि रितू नें उससेकहा ज्ररूर थां कि वोँ उसकी बेहन कों भि यहाॅ लें आएगी औऱ वोँ सभी उसकेसंग बलात्कार करेंगे। मगरउसे लगा थां कि यहसभी रितूमहज गुस्से मे कहरही थि। जबकि ऐसा वोँ करेगी नहि। मगरअब उसेसमझ आँ गय़ा थां कि रितू नें उस वक़्त कोई कोरी धमकी नहि दि थि बल्कि सच हि कहा थां। जिसका प्रमाण इस वक़्त रचना केँ रूप मे उसके सामने कुर्सी पऱ बॅधाहुआ मौजूद थां। ख़ैरउधर,
रितू कि यह बातें सुनकर रचना नें जब ग़ौर सें उन चारों कि तरफ देखा तौ एकाएक हि उसके चेहरे पऱ चौंकने केँ भावआए औऱ फिन जैसे एकाएक हि जैसे उसके दिलो दिमाग़ मे विष्फोट हुआ। उसनेपलट कर रितू कि तरफ देखा।
"तेरे चेहरे केँ यहभाव चीख़ चीख़कर इसबात कि गवाही देरहे हें कि तूनेइन चारों कों पहचान लिया हैं। " रचना केँ देखते हि रितू नें अजीबभाव सें कहा___"औऱ अबजब तूने पहचान हि लिया हैं तोँ पूछइन चारों सें कि यहसभी यहाॅ केसे औऱ क्यूं मौजूद हें?"
रितू कि इसबात कां असर रचना पऱ जल्दी हि हुआ। उसके चेहरे पऱ एकाएक हि ऐसेभाव उभरे जैसेउसे उन चारों कों इस हालत मे देखकर बेहददुख हुआ होँ। ऑखों मे पानी तैरता हुआ नज़रआने लगा थां उसके।
"भ भइया। "फिन उसकेमुख सें लरज़ता हुआ स्वर निकला___"यह सभी क्याँ हैं? आप् चारो यहाॅ केसे??"
रचना केँ इस प्रश्न पर्र सूरजचुप न् रहसका। बल्कि यह कहना चाहिए कि अब उसके सामने कोई चारा हि नहि रह गय़ा थां। इसलिए उसेअब अपनी बेहन केँ सामने अपनी यहाॅ पर्र मौजूदगी कां कारण बताना हि थां। इसलिए चेहरे पऱ दुख केँ भावलिए वो रचना कों अपनीराम कथा शुरुआत सें लेकरअंत तक बताता चला गय़ा। सारी बातें जानने केँ बाद रचना भौचक्की सि रह गई थि।
"औऱ हम् सभीयह समझरहे थें कि आप् लोगउस घटना केँ चलते कहींऐसी स्थान छुपगए हें जहाॅ पऱ आप् पुलिस व कानून कि पहुॅच सें दूर होंगे। " सारी बातें सुनने केँ बाद रचना नें आहतभाव सें कहा___"मगर आप् तौ यहाॅ हें भइया। ख़ैर, देख लिया नं भइया बुरे कां काम कां बुरा अंजाम। कितना कहती थि आप् लोगों कों कि इसतरह किसी कि ज़िंदगियों सें मत खेलो। मगर आप् लोगकभी मेरीबात नहि सुनते थें। बल्कि हमेशा यही कहते थें कि लाइफ कों एंज्वाय करो औऱ मस्तरहो। मुझे भि ऐसा हि करने कि नसीहत देते थें। मगर इससेहुआ क्याँ भइया?आज आप् चारो यहाॅइस हालत मे मौजूद हें। डैड कों तौ ख़्वाब मे भि यह उम्मीद नहि हैं कि उनके साहबज़ादे किस स्थान किसहाल मे हें इससमय?"
"तूनेसच कहा मेरी बेहन। " सूरज नें रुॅधे हुएगले केँ संग बोला___"यह सभी मेरे पापों कां हि प्रतिफल हैं। मैनेकभी इस बारे मे नहि सोचा थां कि जोँ कुछ मे कररहा थां उसका अंजाम ऐसा भि होगा। हमेशा वही करता थां जिसे करने मे कदाचित मुझे दुनियाॅ कां सबसे बड़ा औऱ ज़्यादा मजाआता थां। ख़ैर, मुझे अपनेइस अंजाम कां दुख नहि हैं रचना क्योंकि यह मैने स्वयं हि कमाया हैं। दुख तौ इसबात कां हैं कि मेरीवजह सें आज तूँ भि यहाॅ आँ गई हैं औऱ मे यहसोच कर हि अंदर सें बुरीतरह भयभीत हुआजा रहाहूॅ कि जाने तेरेसंग यह इंस्पेक्टरनी क्याँ करेगी?"
"यहकुछ नहि करेगी भइया। " रचना नें सहसा पुनः तीखेभाव अख़्तियार कर लिए___"इसे पता नहि हैं कि इसने किसके बच्चों पऱ हाॅथ डाला हैं? इसनेअब तक जौ कुछ भि आपके औऱ मेरेसंग किया हैं उसका अंजाम इसे अवश्य भुगतना पड़ेगा। इसेइस बात कां ज़रा सां भि एहसास नहि हैं कि इसकेसंग क्याँ क्याँ होगा?"
"रस्सी जल गई पर्र बल नहि गय़ा अब तक। " रितू नें रचना केँ सिर केँ बालों कों पकड़कर झटका दिया__"मुझे पता हैं कि तूँ यहसभी किसके दम पर्र बोलरही हैं। मगर तुम्हे पता हि नहि हैं कि तूँ जिसके दम पर्र यहराग अलापे जारही हैं वोँ स्वयं बहोत जल्द यहाॅ तेरे सामने हाज़िर होने वाला हैं। मैने तेरे बाप दिवाकर चौधरी औऱ उसकेउन सब दोगले दोस्तों कों वोँ वीडियोज़ भेज दिये हें जिन वीडियोज़ पर्र उनकी काली करतूतों कां सामान मौजूद हैं। कितनी मज़े कि बात हैं कि एक् बेटा अपने हि बाप कि ऐसी अश्लील वीडियो बनाकर रखेहुए थां जोँ अगर किसी केँ हाॅथलग जाएॅ तोँ वोँ बड़ी आसानी सें इसके बाप कों बीच चौराहे पऱ नंगा दौड़ा दे। "
रितू कि यहबात सुनकर रचना तौ चौंकी हि संग हि संग सूरज औऱ उसके साथी भि बुरीतरह चौंक पड़े थें। पलक झपकते हि उनके चेहरों पऱ सें रहासहा रंग भि उड़ गय़ा।
"कुछसमझ आया तुम को?"इधर रितू नें रचना केँ बालों कों ज़ोर सें खींचा___"सारे शहर कों अपनी मुट्ठी मे रखने वाला तेरा बाप औऱ उसके साथीअब मेरी गुलामी करने पर्र मजबूर हें। मे अगरउसे कहूॅ कि टट्टी खा तौ उसे खानां पड़ेगा। अबबता किसके दम पऱ इतनाउछल रही हैं तूँ? जबकि मैने तोँ यहाॅ तक सोचाहुआ कि जिसदिन तेरा बाप औऱ मित्र यहाॅ आएॅगे तौ उनके स्वागत मे तुम को हि नंगी करके उनके सामने डाल दूॅगी। फिन देखूॅगी कि नंगी औऱ गोरी चमड़ी कों उस हालत मे देखकर केसे उनकेखून मे उबालआता हैं?"
"नहींऽऽ। " रितू कि बात कों समझते हि तहखाने मे रचना केँ संगसंग सूरज औऱ उसके दोस्तों कां आर्तनाद गूॅजउठा, जबकि सूरज गिड़गिड़ाया___"प्लीज ऐसामत करना इंस्पेक्टर। मे तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। हर चीज़ केँ अपराधी मे औऱ मेरा बाप हैं यहसच हैं मगर मेरो बेहन बेकसूर हैं। उसेइस सबमें मत घसीटो प्लीज। "
"हाहाहाहाहा ई कां?" सहसा वहीं पऱ खड़ा हरिया ज़ोर सें हॅस पड़ा___"ई कां बिटिया। ई सरवाता एतनेमा हि गला फाड़ै लाग। कउनवसच हि कहेरहा कि जबबात ससुरी अपनेमा आवथै तबहिन समझमा आवथै कि ओसे कां मजा मिलथै? ई ससुरन केँ संगता इहैहोय कां चाही बिटिया। हम् भि देखूॅगा कि ऊ सबसेई लोगनकेर कां हाल होथै?"
"बिलकुल काका। " रितू नें कहा___"यह काम भि आपको हि करना हैं औऱ केसे करना हैं यह आप् जानो। "
"अरे चिंता नं करा बिटिया। " हरिया अंदर हि अंदर खुशी सें झूमता हुआबोल पड़ा___"ई कामता हम् बहुतै अच्छे सें करूॅगा। कउनव शिकायत नां होई तोहरा केँ, ई तोहरे हरिया काका केँ वादाबा। ऊ ससुरे मंत्रीवा केरओखे ई छोकरिया केँ संग बहुतै अच्छे सें ख़ातिरदारी करूॅगा हम्। "
"शाबाश काका। " रितू मुस्कुराई___"मुझे आपसेयही उम्मीद हैं। मुझेपता हैं आप् अपनाकाम बहोत अच्छे सें करते हें। "
"हाॅईता हा बिटिया। " हरिया काका गर्व सें अकड़ते हुए बोला___"हम् आपनकाम बहुतै अच्छे सें करताहूॅ। कउनव परकार केर शिकायत कां मौका नाहीं देताहूॅ। वक़्त आवैंता पहिले फेर तुँ देख लीहा। हम् ई ससुरन केँ नानीमा केर नानीमा नां याद दिलाई ता कहना। "
"नहि नहि। " रचना तोँ भयभीत होकर चीखी हि लेकिन सूरज बुरीतरह भयभीत होकररो पड़ा थां___"यह सभीमत करो इंस्पेक्टर। यह व्यक्ति बहोत ज़ालिम हैं। प्लीज मेरी बेहन केँ संगकुछ भि ऐसा वैसामत करो। जौ कुछ करना हैं हमारे संगकरो। "
"औऱ चीखो। " रितू बिजली कि तरह सूरज केँ पास पहुॅची थि, गरजते हुए बोलि___"औऱ तड़पो। मगरकोई फायदा नहि होगा। मे तुम् सबका वोँ हाल करूॅगी कि किसी भि जन्म मे यहसभी करने केँ बारे मे सोचोगे भि नहि औऱ अगर सोचोगे भि तौ कर नहि पाओगे। क्योंकि नामर्द कुछकर नहि सकते औऱ तुम् सभीहर जन्म मे नामर्द हि पैदा होगे। "
"अगर यहबात हैं। " सहसा सूरज नें अजीबभाव सें कहा___"तौ मुझमें औऱ तुममें क्याँ फर्क़ रह गय़ा इंस्पेक्टर? हर अपराध कि तौ यकीनन सज़ा होती हैं मगरउस सज़ा मे वोँ सभी तौ नहि होता न् जिस सज़ा कों पापकहा जाए याँ उसे अनैतिक करार दियाजाए? तुमने जौ कुछ करने कां सोचाहुआ हैं वोँ तौ हरतरह सें अनैतिक हैं, पाप हैं। "
"तुम्हारे मुख सें अनैतिक वपाप पुन्य कि यह बातें अच्छी नहि लगती मिस्टर। " रितू नें कहा___"मुझे तुमसे अधिकइन चीज़ों कां ज्ञान हैं। मुझेपता हैं कि मे क्याँ करनेजा रहीहूॅ। तुम्हें इसबात सें कोई फर्क़ नहि पड़ना चाहिए क्योंकि तुम् तोँ अनैतिक वपाप कर्म करने केँ आदी हौ। इसलिए बस खुली ऑखों सें उस सबको देखने केँ लिए सजधजकर होँ जाओ जोँ बहोत जल्द यहाॅ दिखने वाला हैं। "
"इस कुतिया केँ सामने मत गिड़गिड़ाओ भइया। " सहसा रचनाबोल पड़ी___"यह स्वयं भि वैसा हि कर्म करने वाली लगती हैं, वरनाऐसी बातें इसके दिमाग़ आती हि नहि। पुलिस वाली हैं नं, इसलिए हर किसी केँ नीचेलेट जाती होगी। ऐसी जॉब मे होता हि यही हैं आहहहहह। "
"तोहरी माॅ कों चोदूॅ छिनाल। " रचना कि बात सुनते हि हरिया आग बबूला होकर उसकोधर दबोचा थां___"तोहरी ई हिम्मत कि हमरी बिटिया केँ बारेमा अइसन कहथो। रुक अबहिन हम् तोहरा कां बताथैं कि कउन केखर सामने लेटत हैं?" हरिया नें सहसा रितू कि तरफ देखा__"बिटिया तुँ जा इहाॅ सें। हम् एखरई ज़बान बोलैं कां अंजाम दिखावथैं। "
"नहि प्लीज उसे छोंड़ दो। " रितू केँ कुछ कहने सें पहले हि सूरजचीख पड़ा थां___"उसकी तरफ सें मे माफ़ी माॅगता हूॅ। प्लीज इंस्पेक्टर इस व्यक्ति कों बोलो कि मेरी बेहन कों कुछ न् करे। "
"काकाइसे बस थोडा सां डोज देना। " रितू नें सूरज कि बात कि तरफ ध्यान दिये बिना हरिया सें कहा___"बाॅकी इसकेसंग आग़ाज़ तोँ इसका बाप करेगा। आप् समझरहे हें न् मेरीबात?"
"हम् सभीसमझ गय़ा हूॅ बिटिया। " हरिया नें कहा__"अब तुँ जा इहाॅ सें। हम् ई ससुरी कां बतावथैं कि तोहसे अइसन बोलैं कां अंजाम कां होथै?"
"मेरेसंग अगरकोई बद्दतमीजी कि तौ अंजाम अच्छा नहि होगा तुम्हारे लिए। " रचना चीखी___"छोंड़ दो मुझे। वरना बहोत पछताओगे तुम् सभी। "
रितू नें उसकीतरफ हिकारत भरी दृष्टि सें देखा औऱ तहखाने केँ बाहर् कि तरफचली गई। उसकेइस तरह जाते हि सूरजगला फाड़कर चिल्लाने लगा थां। बारबार कहरहा थां कि उसकी बेहन कों छोंड़ दो। मगर रितू नं रुकी। जबकि रितू केँ जाते हि हरिया नें लपककर तहखाने कां दरवाजा अंदर सें बंद किया औऱ फिन वापसपलट कर सूरज कि तरफ बढ़ा।
"कां रे मादरचोद। " हरिया नें सूरज केँ पेट मे एक् लात जमाते हुए कहा___"काहे अइसनगला फाड़रहा हैं? अबबता तोहरी ई राॅड बेहनकेर कां खातिरदारी करूॅ हम्? हमराता बहुतै मन करथै कि तोरीई बहनिया केर मदमस्त जलानी केर आनंदलूॅ मगर हमरी बिटिया नें ऊसभीकेर इजाजत नाँ दियेरही। एसेअब हम् तोरे साथैआपन ऊ पसन्द वालाकाम करूॅगा। "
"नहि नहि प्लीज काका। " हरिया कि बातसमझ कर सूरज बुरीतरह हिल गय़ा, बोला___"वोँ सभीमत करो। मे अपनी बेहन केँ सामने वोँ सभी नहि करना चाहता। "
"अबे बुड़बक। " हरिया नें सूरज केँ चेहरे पऱ अपनी हथेली फेरते हुए कहा___"हम् ससुरे तोहरी ख़्वाहिश थोड़ी न् पूछतहूॅ। हम् ता अपनी पसन्द केरबात करतहूॅ। अउरऊता होबैकरी बछुवा काहे सें केँ ऊ हमरी ख्वाहिश केरबात हा। एसे चल अपना पिछवाड़ा खोल। "
सूरज नहि नहि करता हि रह गय़ा मगर हरिया भला कहाॅ मानने वाला थां। उसने सूरज कि रस्सी कों ऊपर सें छोरा औऱ मजबूती सें पकड़कर उसके कच्छे कों एक् हाॅथ सें नीचे सरका दिया। रचनायह सभी अपनी खुली ऑखों सें देखरही थि। जैसे हि हरिया नें उसके भइया केँ कच्छे कों नीचे किया वैसे हि उसे झटकालगा। आश्चर्य सें उसकी ऑखेंफटी रहगईं। फिन सहसा जैसेउसे होशआया उसनेझट सें अपनी ऑखेंबंद करली। भला वोँ अपने भइया कों नग्न हालत मे केसेदेख सकती थि?
उधर हरिया नें सूरज कों पकड़े हि उसे रचना केँ पास खींचकर लाया औऱ उसके सामने लाकर रचना कि तरफदेख कर बोला___"ई देख ससुरी हम् तोहरे ई भइया केँ संग कां करथूॅ। हम् चाहूॅ ता अबहिन दुई मिनटमा तोहरे भइया कां ईदुई इन्च कां लौड़ा तोहरी चूॅतमा पालदूॅ मगर पेलूॅगा नाहीं। ऊता तोहरा बाप अपने लौड़ा सें तोहरी बुर कां पेलेगा। ईबखतता हम् तोहरे ई भइया कि गाड पेलूॅगा। ईदेख। "
हरिया कि बातों नें रचना केँ होश उड़ा दिये थें। उसे पहलीबार एहसास हुआ कि वोँ कितनी खतरनाक स्थान पर्र आँ गई हैं। यहाॅ पऱ उसकी उसके भइया कि औऱ उसके बाप कि चलने वाली नहि थि। यहसोच सोचकर हि वो थरथर काॅपे जारही थि। उसने शख्ती सें अपनी ऑखेंबंद कि हुईँ थि। उधर सूरज लज्जा कि इंतेहां कि हद सें गुज़र रहा थां। आत्मग्लानी औऱ अपमान मे डूबा थां वो। वो बुरीतरह हरिया सें छूटने कि मसक्कत कररहा थां। लेकिन छूट नहि पारहा थां। उसमें अब इतनी ताकत भि न् बची थि कि वोँ कोई ज़ोर आजमाइश करसके।
हरिया नें मजबूती सें पकड़कर उसेआगे कि तरफ झुका दिया औऱ अपनी धोती कों एक् साइडकर अपने हलब्बी लौड़े कों बाहर् निकाल लिया। एक् हाथ सें अपने लौड़े कों पकड़कर उसने सूरज कि गाड मे निशाना लगा दिया। इसकेसंग हि सूरज कि हृदय विदारक चीख तहखाने मे गूॅज गई। सूरज केँ लाख प्रयासों केँ बावजूद उसकेहलक सें चीख निकल गई थि औऱ वोँ होँ गय़ा जिसे वो किसी सूरत मे होने नहि देना चाहता थां। इधर अपने भइया कि इतनी भयानक चीख सुनकर रचना बुरीतरह डर गई। उसने पट्ट सें अपनी ऑखेंखोल कर अपने भइया कि तरफ देखा औऱ यहदेख कर तौ उसकी ऑखें हि बाहर् कि तरफउबल पड़ी कि उसके भइया कि गाड मे हरिया कां मोटा तगड़ा लौड़ा जड़ तक घुसा पड़ा थां। जबकि सामने कि तरफ झुकाहुआ उसका भइया झटकेखा रहा थां। उसकी ऑखों सें ऑसूबह रहे थें। रचना कों अपने भइया कि इसदसा पर्र बड़ा अजीब सां लगा। उसकी अंतर्आत्मा तक काॅप गई थि यह भयावह मंज़र देखकर। उसे एकाएक हि एहसास हुआ कि उसके भइया कि यहदसा उसकीवजह सें हि हुइ हैं। अगर उसने रितू कों वोँ सभी नं कहा होता तोँ शायदयह सभी न् होता। उसे स्वयं पर्र बेहद क्रोध आया। मगर अब क्याँ होँ सकता थां। अपने भइया कों इस दीनहीन दसा मे देखकर उसकी ऑखों सें ऑसू बहनेलगे।
उधर हरिया थोड़ी देर रुकने केँ बाद अपनीकमर कों झटका देना शुरुआत कर दिया थां। सहसा उसने अपनेसिर कों ज़रा सां घुमाकर रचना कि तरफ देखा। रचना औऱ हरिया कि ऑखेंआपस मे टकरागईं। रचना नें घबराकर जल्दी हि अपनी ऑखेंबंद कर अपनेसिर कों झुका लिया। यह देखकर हरिया मुस्कुरा उठा। उसकेबाद तोँ जैसे तहखाने मे हरिया केँ झटकों सें निकलती थापथाप कि आवाज़ें औऱ सूरज कि घुटी घुटी सि गूॅजती रहीं। जहाॅ एक् तरफ अपने साथी कि इसदसा पर्र उसके तीनोयार बेहद दुखी थें वहीं दूसरी तरफ रचना अपने भइया कि इसदसा पर्र थरथर काॅपे जारही थि।
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तहखाने सें बाहर् आकर रितू तेज़ तेज़ क़दमों केँ संग अपने कमरे कि तरफबढ़ गई थि। कमरे मे आते हि उसने आलमारी सें अपना वोँ फोन निकाला जिसे उसने अपने एक् मुखबिर सें खरिदवाया थां। उस मोबाइल कों अपनी पाॅकेट मे डालकर उसने अपने आईफोन कों स्विच ऑफ किया औऱ उसे भि अपनीजेब मे डाल लिया। उसकेबाद उसने आलमारी सें अपना सर्विस रिवाल्वर निकाल करउसे चेक किया तत्पश्चात उसे भि अपनी जीन्स कि बेल्ट मे खोंस लिया। टाप केँ ऊपर उसने एक् लेदर कि जाकेट पहना औऱ टेबल सें जिप्सी कि चाभी लेकर वो कमरे सें बाहर् निकल गई।
बाहर् लान मे एक् तरफ खड़ी जिप्सी मे बैठकर उसने जिप्सी कों स्टार्ट किया औऱ मेनगेट सें बाहर् आँ गई। इसबार उसकी जिप्सी कां रुखपुल कि तरफ न् होकरउस तरफ थां जिसतरफ फार्महाउस केँ बगल सें एक् अन्य मार्ग किसी दूसरी स्थान कि तरफ जाता थां। रितू नें इस रास्ते कों जानबूझ कर चुना थां क्योंकि उसेपता थां कि नहर पर्र बनेपुल कि तरफ वाले रास्ते पर्र आगे ख़तरा थां। उसके बाप केँ व्यक्ति कहीं भि उसेमिल सकते थें। हलाॅकि रितू कों पता थां कि उसके बाप कों सीबीआई वाले लेँ गए थें। लेकिन फिन भि उसेयह तोँ एहसाह थां हि कि उसके बाप केँ व्यक्ति खुलेघूम रहे हें।
करीब-करीब दस मिनटबाद रितू नें जिप्सी कों एक् ऐसीजग। पर्र रोंका जहाॅ पऱ एक् पवन चक्की लगी थि। दाहिने तरफदूर एक् पहाड़ थां जोँ कि गेरुए रंग कां थां। बाॅकी दूरदूर तक सुनसान इलाका पड़ाहुआ थां। पवन चक्की सें करीब-करीब पचासगज कि दूरी पऱ हि रितू नें मेन मार्ग हे उतारकर जिप्सी कों रोंका हुआ थां। कुछदेर आसपास कां जायजा लेने केँ बाद उसने अपने जीन्स कि पाॅकेट सें नयेफोन कों निकाला औऱ उसे स्विच ऑन किया। स्विच ऑन होते हि उसनेउस पऱ कोई नंबर डायलकर उसनेफोन कों कान सें लगा लिया।
"क्याँ हालचाल हें तेरे मंत्री?" उधर सें मोबाइल उठाते हि रितू नें मर्दाना आवाज़ मे कहा थां।
"मेरेहाल कि छोंड़। " उधर सें मंत्री कां करीब-करीब तीखा स्वर उभरा__"तूँ अपनेहाल कि चिन्ता कर। "
"ओहो ऐसा क्याँ?" रितू नें नाटकीय अंदाज़ सें कहा___"मेरे हाल कां क्याँ होने वाला हैं भला?"
"चिंता मतकर। "उधर सें मंत्री नें कहा___"बहोत जल्द तेराहाल बेहाल करने वालाहूॅ मे। मुझेपता चल गय़ा हैं कि मेरेसंग ऐसा दुस्साहस करने वाला तुँ कौन हैं। इसलिए अब मे तेरा वोँ अंजाम करूॅगा जौ आज तक किसी नें नां तौ सोचा होगा औऱ नां हि सुना होगा। "
मंत्री दिवाकर चौधरी कि इसबात सें रितू बुरीतरह चौंकी। उसकेमन मे प्रश्न उभरा कि मंत्री कों भला उसके बारे मे केसेपता चल गय़ा? क्याँ कमिश्नर साहब नें उसे उसके बारे मे बताया? नहि नहि ऐसा नहि होँ सकता। कमिश्नर साहब उसके बारे मे उसको तौ क्याँ बल्कि किसी कों भि कुछ नहि बता सकते। उन्हें पता हैं कि मंत्री इस प्रदेश केँ लिए कितना हानिहारक हैं। उन्होंने मंत्री केँ खिलाफ़ इसजंग कों अंजाम तक पहुॅचाने कां स्वयं हुक्म दिया थां। फिनभला वोँ केसे उसके बारे मे उसेबता देंगे? नहि नहि ऐसा संभव नहि हैं। तोँ फिन मंत्री कों उसके बारे मे केसेपता चल गय़ा? रितू कां दिमाग़ तेज़ी सें इधरउधर भाग दौड़कर रहा थां। मगरउसे कुछसमझ नहि आँ रहा थां। सहसा उसकेमन मे ख़याल आया कि कहींऐसा तौ नहि कि उसके हि पुलिस डिपार्टमेन्ट कां कोई पुलिस वाला मंत्री कों सभीकुछ बताया हौ। मगरऐसा केसे हौ सकता हैं? क्योंकि यहकेस बहोत हि गोपनीय थां। इसके बारे मे कमिश्नर केँ सिवा किसी कों कुछपता नहि थां। सहसा रितू कों उन पुलिस वालों कि यादआई जिन्हें उसने सूरज केँ फार्महाउस मे सूरज सें लड़ाई करने केँ बाद सस्पेण्ड किया थां। रितू कि लगा कि यकीनन उन्हीं नें मंत्री कों सभीकुछ बताया होगा। क्योंकि उन्हें तौ पता हि थां कि उसने सूरज औऱ उसके दोस्तों सें फार्महाउस पऱ लड़ाई कि थि औऱ उन चारों कों अधमरा कर दिया थां। रितू कों यकीन हौ गय़ा कि उन पुलिस वालों नें हि मंत्री कों सभीकुछ बताया हैं औऱ अब मंत्री उसकेलिए कालबन कर अपना क़हर बरसाने वाला हैं।
"क्याँ हुआ चौहान केँ बच्चे?" रितू कों इतनीदेर सें ख़ामोश जानकर उधर सें मंत्री नें चहकते हुए कहा___"हवा निकल गई क्याँ तेरी?"
मंत्री कां यह वाक्य सुनकर रितू केँ ज़हन मे जैसे विष्फोट सां हुआ। सारा मामला समयभर मे उसकीसमझ मे आँ गय़ा। उसेसमझ मे आँ गय़ा कि मंत्री नें उसरेप पीड़िता लड़की यानी विधी केँ चलतेयह पता लगाया हैं। उसनेपता किया होगा कि उसके बच्चों नें जिस लड़की केँ संगरेप कों अंजाम दिया थां वोँ लड़की विधी थि जोँ उसके हि बच्चों केँ काॅलेज मे पढ़ती थि। मंत्री नें अपनीतरफ सें छानबीन कि होगी कि इस मामले मे पुलिस नें तौ अपना हाॅथ नहि डाला औऱ नाँ हि कोईकेस वगैरह हुआ। मगर लड़की केँ संग जोँ कुछहुआ उसे उसकेघऱ वालेसहन नहि करसके। इसलिए संभव हैं कि लड़की केँ बाप नें अपनी बेटी केँ संगहुए इस अत्याचार कां बदला लेने केँ लिएयह सभी किया हैं। रितू नें स्वीकार किया कि मंत्री कां सोचना एकदम जायज़ हैं। क्योंकि उसकेसंग यहसभी करने कि वजह मात्र औऱ मात्र विधी केँ बाप केँ पास हि थि औऱ अब वो इस मामले कों जानकर विधी केँ घऱ वालों केँ ऊपर क़हरबन कर टूटने वाला हैं।
रितू नें राहत कि साॅस तौ ली लेकिन उसेअब विधी केँ माॅ बाप कि चिंता सताने लगी थि। वोँ जानती थि कि इसकेस सें विधी केँ घऱ वालों कां कोई लेना देना नहि हैं। वोँ बेचारे तोँ बेक़सूर हें। रितू विधी केँ पैरेन्ट्स केँ लिए फिक्रमंद होँ उठी थि। मगरफिन जैसेउसे ख़याल आया कि उसे इतना चिंता करने कि क्याँ ज़रूरत हैं? उसकेपास तौ मंत्री औऱ उसके साथियों केँ खिलाफ़ सबूत केँ रूप मे ऐसा डायनामाइट हैं जौ अगर पब्लिक केँ सामने आँ जाए तोँ मंत्री औऱ उसके दोस्त एक् हि समय मे उस डायनामाइट केँ विष्फोट सें तहसनहस हौ जाएॅगे। इस ख़याल केँ आते हि रितू केँ सुंदर होठों पऱ मुस्कान फैल गई। जबकि,
"लगता हैं तेरेसब देवता कूचकर गए हें चौहान। " उधर सें मंत्री कां ठहाका गूॅजा___"तुझे हीसमझ आँ गय़ा होगा कि अब तेरेसंग क्याँ होने वाला हैं। मगर चिंता मतकर। मे तुम्हारी तरफ एक् सुनहरा मौका देताहूॅ। सुना हैं कि तेरी पत्नि बहोत हसीन हैं, बिलकुल वैसी हि जैसी तेरी वोँ बेटी थि जिसे हमारे बच्चों नें रगड़ रगड़कर पेला थां। होँ भि क्यूं नं, आख़िर हसीनमाॅ कि कार्बन काॅपी जौ थि। ख़ैर, मे यहकहरहा हूॅ कि अगर तुम्हें अपनी औऱ अपने परिवार कि ज़रा सि भि फिक्र हैं तौ तूँ अपनीउस हसीन पत्नि कों हमारे हरम मे लेँ आँ। अगर तेरी पत्नि नें मुझे औऱ मेरेसब साथियों कों खुशकर दिया तौ सोचूॅगा कि तुम्हे तेरीइस हिमाक़त केँ लिए क्षमा करदूॅ। "
"अधिकउड़ मत रंडी कि औलाद। " रितू नें मर्दाना आवाज़ मे गरजते हुए कहा___"तूने अगर मेरे बारे मे ऐसा वैसा सोचने कि कोशिश कि तोँ सोच लेना कि तेरी बेटी मेरे कब्जे मे हि हैं। उसकेसंग मे क्याँ क्याँ करूॅगा यह तूँ सोच भि नहि सकता। मुझे अपनी ज़रा सि भि परवाह नहि हैं क्योंकि मे छोटा व्यक्ति हूॅ औऱ बेटी केँ मरने केँ बाद वैसे भि अब मुझमें जीने कि कोई ख्वाहिश नहि हैं। मगर तेरा क्याँ होगा नाली केँ कीड़े? तूँ तौ इस प्रदेश कि नाॅक औऱ कान हैं न्। तेरे वोँ रंगीन वीडियो अभि भि मेरेपास हें। मे चाहूॅ तोँ इसीसमय उन्हें सोसल मीडिया पर्र डालकर तेरी औऱ तेरी इज्ज़त कि धज्जियाॅ उड़ादूॅ। उसकेबाद तेरे पीछे प्रदेश कि जनता औऱ पुलिस इसतरह कुत्तों कि तरह दौड़ पड़ेगी कि साले तुम्हें कहीं पऱ छुपने कि स्थान भि न् मिलेगी। "
रितू कि इन खतरनाक बातों सें उधर सन्नाटा सां छा गय़ा। ऐसालगा जैसे मंत्री कों साॅप सूॅघ गय़ा होँ। सच हि तोँ थां। उसे कदाचित इसबात कां ध्यान हि नहि रह गय़ा थां कि उसके सबसे बड़े रक़ीब केँ पास उसके खिलाफ़ कितना बड़ा डायनामाइट मौजूद हैं।
"अब बोलता क्यूं नहि हरामज़ादे?" रितू नें पुनः दहाड़ते हुए कहा___"तेरी अम्मा मर गई क्याँ? एक् बातकान खोलकर सुन लें। तुँ यहमत समझना कि मे यहाॅ पर्र अकेला हूॅ औऱ तेरे व्यक्ति मुझे लम्हा भर मे हजमकर जाएॅगे। इतना कमज़ोर भि नहि हूॅ मे। मुझे तेरे क्रिया कलाप कि समयसमय कि ख़बर हैं औऱ मैने अपने चारोतरफ गुप्त रूप सें ऐसे व्यक्ति लगारखे हें जौ मुझे सुरक्षा भि प्रदान करते हें औऱ यह भि बताते हें कि तेरा अगला क़दम क्याँ होने वाला हैं। इसलिए तुँ कुछ भि करने याँ सोचने सें पहलेयह अवश्य सोच लेना कि तेरीकोई भि छोटी बड़ी हरकत तेरा वोँ अंजाम कर देगी जिसके बारे मे अभि मैने तुम्हें बताया थां। तेरी बेटी औऱ वोँ चारो लड़के मेरे कब्जे मे हें औऱ मे चाहूॅ तोँ तेरी बेटी केँ संग तेरे हि बच्चों कि वैसी वीडियो क्लिप बनाकर तुम कोभेज दूॅ जैसी वीडियो तेरेपास मे पहले भि भेज चुकाहूॅ। यकीन नं हौ तोँ बोल, मुझे तेरी बेटी कि हाॅट वीडियो बनाने मे ज़रा भि वक़्त नहि लगेगा। "
"नहि नहि प्लीज ऐसा ग़ज़ब मत करना। "उधर सें मंत्री कां गिड़गिड़ाहट सें भरा स्वर उभरा___"मे तुम्हारे आगे हाॅथ जोड़ता हूॅ। मुझसे ग़लती होँ गई जौ मैने तुम्हें वोँ सभीकहा। मे ऐसाकुछ भि नहि करूॅगा जिससे मुझे स्वयं हि गर्त मे डूब जानां पड़े। मगर,,,,
"फंस क्यूं गय़ा हिजड़े?" रितू गुर्राई___"बोल न्, मगर क्याँ?"
"मगर मे यह जानना चाहता हूॅ। " मंत्री नें कहा___"कि यहसभी कब तक चलेगा? मेरा मतलब हैं कि तुम्हें जोँ चाहिए वोँ मे बिना सोचे समझे देने कों रेडीहूॅ। मगर तुम् मेरे बच्चों कों कुछ भि नहि करोगे। "
"तुँ मेरे सामने कोई कंडीशन रखने कि पोजीशन मे कहाॅ हैं कुत्ते?" रितू नें कहा___"औऱ तुँ भला मुझे देगा क्याँ? तेरी औकात क्याँ हैं मुझेकुछ देने कि? तूँ तोँ साले स्वयं हि भिखारी हैं। हर पाॅचसाल मे भिखारी कि तरह जनता केँ सामने हाॅथ फैलाए पहुॅच जाता हैं। यहअलग बात हैं कि जनता कि भीख कां तूँ गंदे तरीके सें फल देता हैं। उसी कां अंजाम तौ भुगतना हैं तुम्हे। इस प्रदेश सें तेरे जैसे लोगों कि सल्तनत हि नहि बल्कि नामो निशान तक मिटाने कां सोच लिया हैं मैने। औऱ हाॅ, किसी भि तरह कि रियायत कि उम्मीद मत करना। क्योंकि वोँ तेरे जैसों केँ लिए मेरी अदालत मे हैं हि नहि। "
"मे मानता हूॅ कि मेरे बच्चों नें तुम्हारी बेटी केँ संग बहोत बुरा सुलूक किया थां। " उधर सें मंत्री कां धीर गंभीर स्वर उभरा___"औऱ यह भि मानता हूॅ कि मैने अपने कार्यकाल मे प्रदेश कि जनता केँ संग बहोत बुरा किया हैं। मगर जौ गुज़र गय़ा उसे तोँ लौटाया नहि जा सकता न्? हाॅ इतनावचन अवश्य देताहूॅ कि आइंदा सें प्रदेश कि जनता केँ संगकुछ भि बुरा नहि करूॅगा बल्कि हरदमहर समय अच्छा करने कि कोशिश करेगा। मैने जिसका जौ भि बुरा किया हैं उसका नुकसान मे दोगुने भाव सें भरूॅगा। "
"तुँ क्याँ भरेगा दोगले इंसान। " रितू नें फटकार सि लगाते हुए कहा___"तूँ तोँ केवल जनता कां खून चूसना जानता हैं। आजयहसभी इसलिए बकरहा हैं क्योंकि मैने तेरे पिछवाड़े मे डंडा घुसाया हुआ हैं। वरना तूँ अपनीवही औकात दिखाता जोँ हमेशा सें सबको दिखाता आया हैं। मे तेरी किसी भि बातों पऱ आने वाला नहि हूॅ। तेरा औऱ तेरे साथियों कां अंजाम मेरे द्वारा लिखाजा चुका हैं चौधरी। इसलिए मुझसे रहम कि भीखमत माॅग। बल्कि मरने सें पहलेअगर कुछ अच्छा करना चाहता हैं तौ उन मजलूम लोगों केँ कुछकर जिनका तूने खाया हैं औऱ जिन पऱ तूने अत्याचार किया हैं। संभव हैं कि तेरेऐसा करने पऱ मे तेरे अंजाम कों बदतर न् होने कि सूरत पऱ विचार करूॅ। "
"मे करूॅगा चौहान। " उधर सें मंत्री केँ स्वर मे राहत केँ भावों कि झलक दिखी___"अवश्य करूॅगा मे। मे हरउस ब्यक्ति कां भला करूॅगा जौ मेरे द्वारा किसी भि तरह सें सताया गय़ा हैं औऱ यहकाम मे आज सें हि नहि बल्कि अभि सें करना शुरुआत कर दूॅगा। बस तुम् मेरे बच्चों केँ संगकुछ बुरामत करना। "
"पहले जोँ कहरहा हैं उसे करके तोँ दिखा चौधरी। " रितू नें कहा___"अगर मुझे नज़रआया कि तेरीवजह सें प्रदेश कि समूल जनताखुश हौ गई हैं तौ यकीनमान तेरे अंजाम कि स्थित मे अवश्य कुछकमी कर दूॅगा। "
"ओह बहोत बहोत धन्यवाद चौहान। " मंत्री नें खुश होकर कहा___"मे तुम्हें यकीन दिलाता हूॅ कि बहोत जल्द तुम् प्रदेश कि इस जनता कों मेरीवजह हेखुश होतेहुए देखोगे। "
"ओके बेस्ट ऑफलक। " रितू नें कहा औऱ कालकट कर दि।
मंत्री दिवाकर चौधरी सें बात करने केँ जल्दी बाद हि रितू नें उसफोन मोबाइल कों स्विच ऑफकर दिया थां। इससमय उसके चेहरे पऱ असीम राहत केँ भाव थें। राहत केँ भावइस लिए कि उसने विधी केँ माॅ बाप कों चौधरी केँ क़हर सें किसीतरह बचा लिया थां। मगरउसे पता थां कि चौधरी बहोत हि दोगला इंसान हैं। संभव हैं कि उसनेउसे झूॅठा आश्वासन दिया होँ। जबकि वोँ करेवही जोँ उसने उससे शुरुआत मे कहा थां। अतः रितू कां अब पहलाकाम यही थां कि किसीतरह सें विधी केँ माॅ बाप कों मंत्री केँ क़हर सें सुरक्षित करे। मगर समस्या यह थि कि केसे? क्योंकि विधी कां गाॅव हल्दीपुर केँ बाद पड़ता थां। जिसका मार्ग दोतरफ सें थां। एक् हल्दीपुर सें तौ दूसरा नहर केँ पास सें जोँ दूसरा मार्ग गय़ा थां। यह दोनो रास्ते ऐसे थें जिन पऱ मौजूदा हालात मे जानां ख़तरे सें खाली नहि थां। क्योंकि रितू कों पता थां कि उसका बाप भले हि इस टाइम सीबीआई केँ सिकंजे मे थां मगर उसके मित्र औऱ उसके व्यक्ति तौ आज़ाद हि थें जोँ हरतरफ फैलेहुए होंगे।
रितू केँ लिएआज बस कां दिन औऱ रात किसीतरह गुज़ारनी थि। कल तौ उसका भइया विराज आँ हि जाएगा। हलाॅकि वोँ चाहती तौ पुलिस प्रोटेक्शन लें सकती थि औऱ धड़ल्ले सें कहीं भि आँ जा सकती थि लेकिन वो अपने प्यारे भइयाराज कि बात कों टालना नहि चाहती थि। उसने भि तोँ वादा किया थां उससे कि वोँ यहजंग उसकेसंग हि मिलकर लड़ेगी। मगरअब चूॅकि विधी केँ माॅ बाप कि सुरक्षा कां प्रश्न थां तौ उसेकुछ तौ करना हि थां। इसलिए अब वोँ यहीसोच रही थि कि विधी केँ माॅ बाप कों किसतरह सें सुरक्षित करे?
पवन चक्की केँ पास जिप्सी मे बैठी रितूकुछ देर तक इस समस्या केँ बारे मे सोचती रही। उसकेबाद उसनेइस सबको अपने दिमाग़ सें झटका औऱ जिप्सी कों स्टार्ट कर वापसी केँ लिए मुड़ गई।
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उधर हवेली मे!
सुभह सें दोपहर औऱ दोपहर सें अबसाम होने वाली थि। प्रतिमा अपने कमरे मे बेड पऱ पड़ी हुई थि। सारादिन उसनेइसी सोच विचार मे गुज़ार दिया थां कि वोँ अपने बाप सें केसेबात करे? हलाॅकि इसबीच उसने मुम्बई मे अपनी बड़ी बेहन सें मोबाइल पऱ अपने बाप जगमोहन सिंह कां फोन नंबर लेँ लिया थां। उसकी बेहनइस बात सें हैरान भि हुईँ थि। उसके पूछने पऱ प्रतिमा नें उसे सारी बातें बता दि थि कुछ बातों कों छोंड़ कर। लेकिन अपने बाप कां फोन नंबर लेने केँ बाद भि प्रतिमा कि हिम्मत नहि होँ रही थि कि वोँ अपने पिता कों मोबाइल लगाए।
उसकीइस हालत सें शिवा भि परेशान थां। उसनेउन आदमियों कां गेस्ट हाउस मे रहने कां इंतजाम भि कर दिया थां। चिंतित व परेशान तौ वोँ स्वयं भि थां अपने बाप केँ लिएमगर उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ स्वयं ऐसा क्याँ करे जिससे सारी समस्याएॅ समाप्त होँ जाएॅ।
इस टाइम भि वोँ अपनीमाॅ केँ कमरे मे हि आयाहुआ थां औऱ कमरे मे हि एक् तरफरखे सोफे पऱ बैठाहुआ थां। उसकी नज़रें अपनीमाॅ केँ मुरझाए हुए चेहरे पर्र केन्द्रित थीं। उसे इसबात सें तक़लीफ भि हौ रही थि कि वोँ कुछकर नहि पारहा थां। उसेआज समझ आँ रहा थां कि स्वयं कोईकाम करना कितना मुश्किल होता हैं। आज तक तौ वो बनी बनाई जलेबी हि खारहा थां। मगरजब स्वयं हि जलेबी बनाने कां नंबरआया तौ उसका दिलो दिमाग़ जैसे कुंद सां पड़ गय़ा थां। उसे पहलीबार लगा कि बेबसी क्याँ होती हैं? सभीकुछ होतेहुए भि कुछ नं कर पाना किसे कहते हें?
"ऐसेकब तक हताश बैठी रहेंगी माॅम?"फिन उसने प्रतिमा कों देखते हुए हि कहा___"यह तौ आपको भि पता हैं कि हम् अगरकुछ करना भि चाहें तौ नहि कर सकते। इस लिएअगर नानाजी जी केँ द्वारा हमारी समस्या कां समाधान हौ सकता हैं तोँ क्यूं नहि बात करती आप् उनसे? दोपहर सें देखरहा हूॅ मे आपको। आप् इसीतरह गहरीसोच मे डूबी बैठी हुईँ हें। इसतरह भलाकब तक बैठी रहेंगी आप्? आप् जानती हें कि डैड कों सीबीआई केँ चंगुल सें निकालना कितना ज़रूरी हैं। डैड केँ बिजनेस सें संबंधित साथियों नें अपने व्यक्ति हमारी सहायता केँ लिएभेज दिये हें। अब उनको हम् यूॅ हि तोँ चुपचाप यहाॅ नहि बैठाए रह सकते न्? इसलिए माॅम आप् अपने दिमाग़ सें सारी बातों कों निकालिए औऱ नानाजी जी कों मोबाइल लगाकर उनसेबात कीजिए। "
"केसे मोबाइल लगादूॅ बेटा?" प्रतिमा नें सहसा हताशभाव सें कहा___"औऱ किसमुह सें मोबाइल लगाऊॅ अपने बाप कों?"
"क्याँ मतलब माॅम??" शिवा चकराया।
"तुम् इससभी कों जितना आसान समझते होँ न् वोँ इतना आसान नहि हैं बेटा। " प्रतिमा नें कहा___"ज़रा सोचो कि अपने बाप सें संबंध तोड़े मुझे कितने साल हौ गए। अपनी खुशीव अपने स्वार्थ केँ लिए मैने अपनेउस पिता कों त्याग दिया थां जिनका इस दुनियाॅ मे हम् दोनो बहनों केँ सिवा दूसरा औऱ कोई नहि थां। मे हि सबसे ज़्यादा अपने पिता कि लाडली थि औऱ मैने हि उन्हें सबसे ज़्यादा दुख दिया औऱ उदास भि किया। आज मुझेइस बात कां बखूबी एहसास हैं बेटा कि अपनी औलाद कि बेरुखी केँ चलते एक् बाप नें आज तक कितनी तक़लीफ़ औऱ कितना दुखसहा होगा। यह प्रश्न तौ उठेगा हि बेटा कि इसके पहले मुझे अपने बाप कि याद क्यूं नहि आई? इसके पहले मैने क्यूं यह जानना भि ज़रूरी नहि समझा कि जगमोहन सिंहनाम कां कोई ब्यक्ति जौ कि मेरा बाप हैं वोँ ज़िंदा भि हैं याँ कि मर गय़ा हैं? आजअगर मुझ पर्र यह मुसीबत नं आती तौ ज़ाहिर हैं कि आइंदा भि मे अपने बाप सें बात करने केँ बारे मे सोचती भि नहि। यहऐसी बात हैं बेटा जिसकी वजह सें मेरी हिम्मत नहि पड़रही कि मे अपने बाप कों मोबाइल लगाकर उससेबात कर सकूॅ। जबकि इसबात कां मुझे पूर्ण विश्वास हैं कि मेरी समस्या केँ बारे मे जानकर मेरा बाप मेरी सहायता करने सें हर्गिज़ भि इंकार नहि करेगा। "
"यहसच हैं माॅम कि आपने अपने पिता जी सें बात न् करकेअब तक बहोत बड़ीभूल हि कि हैं। " शिवा नें गंभीरता सें कहा___"मगर यह भि सच हैं कि इस बारे मे सोचते रहने सें भि क्याँ होगा? वोँ सभी अपनी स्थान सें गायब तोँ नहि हौ जाएगा। भूल इंसान सें हि होती हैं, आपसे भि हुई हैं। भले हि आपकी वोँ भूल माफ़ी केँ लायक हौ याँ नाँ हौ। मगर किसी भि भूल याँ अपराध केँ चलतेयूॅ चुप तोँ नहि बैठेरहा जा सकता। उसकेलिए सबसे पहले अपने अपराधों केँ लिए नानाजी जी सें माफ़ी माॅगनी होगी आपको। वोँ जोँ भि इसकेलिए सज़ादें उसे आपको स्वीकार करना हि पड़ेगा। हलाॅकि मुझेऐसा लगता हैं कि नानाजी जी आपकोकोई सज़ा देंगे हि नहि। मगर औपचारिकता तोँ करनी हि पड़ेगी आपको। उन्हें भि इसबात कां बोध होगा कि चलो मुसीबत मे हि सही लेकिन उनकी बेटी कों उनका ख़याल तौ आया। बस, उसकेबाद तौ सभीकुछ आसान हि होँ जानां हैं माॅम। इस लिए मे तोँ यही कहूॅगा कि आप् यहसभी सोचना छोंड़िये औऱ नानाजी जी कों हिम्मत बाॅधकर मोबाइल लगाइये। "
प्रतिमा अपने बेटे शिवा कि इससूझ बूझभरी बातें सुनकर चकितरह गई थि। उसे यकीन नहि होँ रहा थां कि उसका बेटा ऐसी समझदारी भरी बातें भि कर सकता हैं। मगर चूॅकि शिवा कि बातें न्यायपूर्ण व तर्कसंगत थि इसलिए उसे भि इसबात कां एहसास हुआ कि इसतरह सोचते रहने सें भला क्याँ होगा? आख़िर बिना मोबाइल किये अथवा बिनाबात किये किसी भि समस्या कां समाधान तौ होने वाला नहि हैं। उसकेलिए शारीरिक औऱ मानसिक कर्म तौ करना हि पड़ेगा।
"तुमने बिलकुल ठीककहा बेटे। "फिन प्रतिमा नें गहरी साॅस लेतेहुए कहा___"जोँ होँ गय़ा औऱ जौ कुछ मैने किया हैं उसका सामना तौ मुझे करना हि पड़ेगा। अतः मे अब अवश्य अपने पिता जी कों मोबाइल लगाऊॅगी। उनसे अपने किये कि माफ़ी भि मागूॅगी। उनसे कहूॅगी कि अपनी बेटी कि इस संगीन भूल कों हौ सके तौ माफकर दें औऱ अपनी कृपामुझ पऱ बरसादें। "
"यह हुइ न् बात। " शिवा नें सहसा मुस्कुरा कर कहा__"मुझे यकीन हैं माॅम कि नानाजी जी आपकोकुछ नहि कहेंगे। दुख तोँ होगा उन्हें मगर उससे भि ज़्यादा खुशी भि होगी उन्हें कि उनकी लाडली बेटी नें आख़िर उन्हें याद करके मोबाइल तौ किया। "
"तेरेमुह मे घी शक्कर होँ बेटा। " प्रतिमा नें प्रसन्नतापूर्ण भाव सें कहा___"भगवान करे तूँ जैसाकह रहा हैं वैसा हि हौ। "
"ऐसा हि होगा माॅम। " शिवा नें जोशीले अंदाज़ केँ संग कहा___"आप् बिलकुल भि इस सबकी चिंता न् करें। बस फोन निकालिये औऱ लगा दीजिए नानाजी जी कों मोबाइल। "
प्रतिमा नें अपने बेटे केँ उस चेहरे कों कुछदेर तक देखा जौ इस वक़्त हज़ार हज़ार वाॅट केँ बल्बों कि तरह रोशन थां। फिनबेड केँ सिरहाने पर्र हि रखे अपनेफोन कों एक् हाथ सें उठाया औऱ अपने पिता कां नंबर ढूॅढ़ कर काॅपते हाॅथों सें उसे डायलकर दिया। काल लगाते हि प्रतिमा केँ हृदय कि गति असाधारण रूप सें तेज़ होँ गई। दिलो दिमाग़ मे एक् अजीब सां एहसास मानो ताण्डव सां करनेलगा। मन मे एक् अंजाना सां भय अपने पाॅव पसारने लगा। उधर काल लगाते हि रिंग जाने कि आवाज़ प्रतिमा केँ कानों मे सुनाई देनेलगी। उसकी नज़रजब शिवा पर्र पड़ी तोँ शिवा कों फोन कां स्पीकर ऑन करने कां इशारा करतेहुए पाया। प्रतिमा नें हड़बड़ा कर जल्द सें फोन कां स्पीकर ऑनकर दिया। तभी,,,,
"यस जगमोहन सिंह स्पीकिंग हियर। "उधर सें बहोत हि खुर्राटदार आवाज़ उभरी। प्रतिमा कों उस आवाज़ सें हि ऐसालगा जैसे उसकीहवा शंट होँ गई हौ। प्रत्युत्तर मे उसकेमुख सें कोई लफ्ज़ नं फूटसका। जबकि,
"हैलोहू इज देयर?" जगमोहन कि आवाज़ पुनः उभरी।
"पि.पिता.जी। " प्रतिमा नें बहोत हिम्मत करके आख़िर टूटेहुए शब्दों सें कह हि दिया___"म.मे आँ.आपकी बेटी प्रतिमा बोल.रही हूॅ। "
प्रतिमा कि इसबात सें उसतरफ सन्नाटा सां छा गय़ा। जबकि उधर केँ छागएइस सन्नाटे नें प्रतिमा कि हृदयगति कों मानो रोंक सां दिया। उसकेमनो मस्तिष्क मे तरहतरह कि आशंकाएॅ समयभर मे उत्पन्न हौ गईं।
"आँ.आपने.सुना पिता जी??" प्रतिमा नें उसतरफ कि ख़ामोशी सें भयभीत होकर पुनः लरज़ते हुए स्वर मे कहा___"मे.आपकी बेटी प्रतिमा बोलरही हूॅ। "
"हाॅ सुन तौ लिया हैं मैने। "उधर सें जगमोहन कां अजीब सां अंदाज़ झलका___"मगर सोचरहा हूॅ कि ऐसा केसे हौ सकता हैं औऱ क्यूं होँ सकता हैं?"
"जजी मे कुछ समझी नहि पिता जी। " प्रतिमा कां मनो मस्तिष्क जैसे चकरा सां गय़ा।
"समझने कि ज़रूरत भि क्याँ हैं तुम्हें?" उधर सें जगमोहन केँ लहजे मे एकाएक हि जैसे शिकायत औऱ नाराज़गी केँ भाव एक् संगघुल मिलगए थें___"जब समझने कां टाइम थां तौ तुमने उस टाइम बेहतर तरीके समझ तौ लिया हि थां। अब औऱ कुछ समझने कि भला तुम्हें क्याँ ज़रूरत पड़ गई?"
"मु मुझे क्षमा कर दीजिए पिता जी। " प्रतिमा कि ऑखों सें सहसाऑसू छलक पड़े, उसकी आवाज़ एकदम सें भारी होँ गई, बोलीं___"मैने आपका बहोत दिल दुखाया हैं। जबकि मुझेपता हैं कि बचपन सें लेकर युवा अवस्था तक आपने मेरीहर ख़्वाहिश कों ऑखबंद करके पूरी कि थि। बदले मे मैने आपकोदुख तक़लीफ़ औऱ रुसवाई केँ सिवाकुछ भि नहि दिया। "
"अरे यह क्याँ???" जगमोहन कां ऐसा स्वर उभरा जैसेउसे प्रतिमा कि इसबात पर्र ज़रा भि यकीन न् आया हौ। अतः बोला___"यह मे क्याँ सुनरहा हूॅभई? आज मेरी बेटी केँ मुख सें इस लहजे मे ऐसी बातें निकलरही हें जिन बातों कां मेरी बेटी केँ मुख सें निकलने कां कोई प्रश्न हि पैदा नहि होँ सकता थां। सबसे पहले मुझेयह बता कि तेरी तबीयत तोँ ठीक हैं नं?"
प्रतिमा कुछबोल नं सकी। अपने पिता कि इन बातों मे चुपेतंज कों समझकर उसकी रुलाई फूट गई। उसे अपने पिता कि इन तंजपूर्ण बातों कां ज़रा भि बुरा नहि लगा थां। बल्कि रुलाई तोँ उसकीइस बात पऱ फूटी थि आज उसकावही बाप उससेइस लहजे मे बातकर रहा थां जौ बाप इसके पहले उससे मात्र प्रेम सें बातें करता थां। बिनामाॅ कि थि दोनों बहनें। मगरउस बाप नें माॅ बनकर भि अपनी बेटियों कि परवरिश कि थि। उसने दूसरी विवाह नहि कि, बल्कि पना सम्पूर्ण जिंदगी औऱ अपनी सम्पूर्ण खुशियाॅ अपनी बेटियों पऱ कुर्बान कर दिया थां। जगमोहन अपनी दोनो बेटियों कों जीजान सें चाहता थां मगर उसकीजान तौ जैसे उसकी छोटी बेटी प्रतिमा पर्र बसती थि। इसका कारणयह थां कि प्रतिमा बिलकुल अपनीमाॅ पर्र गई थि। मगर प्रतिमा पऱ जिसकी जान बसती थि आजवही बाप अपनी बेटी सें तंजपूर्ण बातें कररहा थां। प्रतिमा कों इसबात कां एहसास थां कि उसके बाप कां यहतंज दरअसल उसके अंदर छुपे दर्द रूपी गुबार कां महज एक् मामूली सां हिस्सा हैं।
"यह क्याँ बेटा?" उधर सें जगमोहन कां स्वर एकदम सें भारी सां हौ गय़ा___"अपने बाप केँ अंदर छिपे दर्द रूपीइस गुबार कों क्याँ ज़रा सां भि नहि निकलने देना चाहती तुँ? इसे निकल जाने देती तोँ कदाचित दिल कां दर्दकुछ कम हौ जाता। मगर ख़ैर, जानेदे। मे तौ सपने मे भि तुम्हारी तरफ रुलाने कां सोच नहि सकता, यह तौ फिन भि हक़ीक़त हैं। "
प्रतिमा कां हृदय बुरीतरह काॅपकर रह गय़ा। वोँ यहसोच कर बुरीतरह फफकफफक कररो पड़ी कि उसके बाप कां दिल कितना विसाल हैं। अपने अंदर छुपे असहनीय दर्द केँ बावजूद वो अपनी बेटी कों रुलाना नहि चाहता। बाप कि इस महानता नें प्रतिमा कों इतना छोटा औऱ मामूली बनाकर रख दिया कि उसे अपने आप् सें एकाएक घृणा सि होनेलगी। उसकी ऑखों केँ सामने लम्हा भर मे वोँ सारे मंज़र घूमगए जोँ अब तक उसने किया थां औऱ उस मंज़र कों देखते हि प्रतिमा कों लगा जैसे दुनियाॅ मे उससे बड़ाकोई पापी नहि हैं। प्रतिमा कां जी चाहा कि यह ज़मीन फटे औऱ वोँ उसमें पाताल तक समाती चलीजाए। मगरहाए रे किस्मय! ऐसा भि नहि होँ सकता थां। उसकेदिल मे भावनाओं औऱ जज़्बातों कां इतना भयंकर ज्वारभाॅटा मचलउठा कि उसेलगा कि कहीं उसकादिल उसका सीना फाड़कर बाहर् न् उछल पड़े। अगले हि लम्हा उसे ज़ोर कां चक्कर आया औऱ वो बेड पऱ एक् तरफगिर गई।
"माॅऽऽऽम। " शिवा जोँ एकटक प्रतिमा कों हि देखरहा थां वोँ अपनीमाॅ कों इसतरह चक्कर खाकर गिरते देख बुरीतरह चीखते हुए सोफे सें उठकर प्रतिमा कि तरफ लपका थां, बदहवाश सां प्रतिमा केँ चेहरे कों थपथपाते हुए बोला___"क्याँ हुआ माॅम? आप् ठीक तौ हें नं? प्लीज बताइये नं माॅम.क्याँ होँ गय़ा आपको?प पानी.पानी स सविता ऑटी.कहाॅ हें आप्? प्लीज जल्द सें पानी लाइये। डाॅक्टर कों बुलाईये। "
शिवा बुरीतरह घबरा गय़ा थां औऱ उसी घबराहट मे चीखेजा रहा थां। वहींबेड पऱ हि पड़े प्रतिमा केँ फोन सें भि जगमोहन कि घबराई हुई आवाज़ गूॅजरही थि। वोँ उधर सें पूछेजा रहा थां___"क्याँ हुआ बेटी? तुँ ठीक तोँ हैं न्? तुँ चिंता मतकर मेरी बेटी। मे तुझसे ज़रा सां भि नाराज़ याँ क्रोध नहि हूॅ। अरे तूँ तोँ मेरी लाडली बेटी हैं नं। "
उधर शिवा केँ चिल्लाने कां असर जल्द हि हुआ थां। सविता जोँ कि नौकरानी थि वोँ जल्दी हि हाॅथ मे पानी कां ग्लास लिए भागते हुएआई। वोँ स्वयं भि बुरीतरह घबराई हुइ लगरही थि।
"शिवा बेटे क्याँ हुआ हैं मालकिन कों?" सविता नें पानी कां ख्लास शिवा कों पकड़ाते हुए बोलीं थि।
"पता नहि ऑटी। " शिवा नें दुखीभाव सें कहा___"माॅम तौ नानाजी जी सें मोबाइल पर्र बातें कररही थि। फिन जाने क्याँ हुआ इन्हें कि चक्कर खाकरबेड पर्र गिर गई हें। आप् प्लीज जल्द सें डाक्टर कों मोबाइल कीजिए औऱ उनसे कहिए कि वोँ दो मिनट केँ भीतर यहाॅ आँ जाएॅ। "
"ठीह हैं बेटा। " सविता नें कहा___"मे अभि डाक्टर साहब कों मोबाइल लगाती हूॅ। "यह कहकर सविता वहाॅ सें चली गई। जबकि इधर कमरे मे फोन मे सें गूॅजती जगमोहन कि आवाज़ पऱ सहसा शिवा कां ध्यान गय़ा। उसनेलपक करफोन उठा लिया।
"नानाजी जी मे शिवाबोल रहाहूॅ। " फिन शिवा नें सीघ्रता सें कहा___"देखिए नं माॅम कों क्याँ होँ गय़ा हैं? कुछबोल हि नहि रही हें। ऐसा क्याँ कह दिया हैं आपने जिसकी वजह सें मेरी माॅम कि यह हालत होँ गई हैं?"
"ब बेटा मैने तौ ऐसा वैसाकुछ नहि कहा थां। " उधर सें जगमोहन कां भारी स्वर उभरा___"मगर तुम् चिंता मत करना बेटे। तुम्हारी माॅ कों बस चक्कर आयाहुआ हैं औऱ कुछ नहि। डाक्टर आएगा वोँ अच्छे सें चेकअप कर लेगा। तुम् मुझे बताओ कि कहाॅ सें बोलरहे होँ? मे सारेकाम धाम छोंड़ कर अभि यहाॅ सें तुम् लोगों केँ पास आँ रहाहूॅ। "
"नानाजी जी मे जिला गुनगुन केँ हल्दीपुर गाॅव सें बोलरहा हूॅ। " शिवा नें मन हि मनखुश होतेहुए कहा थां___"आप् जब यहाॅ पहुॅचेंगे तौ किसी सें भि पूछ लीजिएगा कि ठाकुर साहब कि हवेली जानां हैं। बसकोई नं कोई आपको हवेली तक छोंड़ने अवश्य आँ जाएगा आपकेसंग। "
"ओहठीक हैं बेटा। " उधर सें जगमोहन नें कहा___"बस तुम् अपनीमाॅ कां अच्छे सें ख़याल रखना। मे कल तक तुम्हारे पासहर हालत मे पहुॅच जाऊॅगा। "
इसकेसंग हि उधर सें जगमोहन नें काल कों कटकर दिया। जबकि शिवा केँ होठों पऱ मुस्कान उभरआई। उसनेपलट कर प्रतिमा कों देखा औऱ ग्लास मे भरे पानी कों अपनी हथेली मे लेकर प्रतिमा केँ चेहरे पर्र छिड़कना शुरुआत कर दिया। कुछ हि देर मे प्रतिमा कों होश आँ गय़ा। उसने पलकों कों लपलपाते हुए अपनी ऑखेंखोल दि। शिवा नें उसेबेड पर्र अच्छे सें लिटाया औऱ बेड केँ किनारे पऱ हि बैठगये।
"पि पिता जी। "होश मे आते हि प्रतिमा दुखीभाव सें कहउठी थि।
"डोन्ट वरी माॅम। " शिवा नें प्रतिमा केँ हाथ कों पकड़कर हल्का सां दबाया___"इवरीथिंग इज अब्सोल्यूटली फाइन एण्डफार काइण्ड योर इन्फाॅरमेशन आपके पिता जीकल यहाॅ आँ जाएॅगे। "
"क्याऽऽ???" शिवा कि बातसुन कर प्रतिमा बुरीतरह उछल पड़ी थि।
"यस माॅम। " शिवा नें मुस्कुराते हुए कहा___"एण्ड यूनो व्हाट आपकेइस चक्कर नें कमालकर दिया। "
"क्याँ मतलब???" प्रतिमा हैरान।
"मतलबयह कि जोँ चीज़ बातों मे नहि होँ सकती थि वोँ चीज़ आपकेइस चक्कर सें हौ गई। " शिवा नें उत्साहित भाव सें कहा___"क्याँ सही वक़्त पर्र आपको चक्कर आया माॅम। "
"यह तूँ क्याँ बकवास कररहा हैं??" प्रतिमा केँ चेहरे पर्र एकाएक शख्तभाव उभर आए___"यहसभी तुम्हें मज़ाक लगरहा हैं? तुम्हारी तरफ मेरे औऱ मेरे पिता कि भावनाओं कां ज़रा सां भि एहसास नहि हुआ? कैसा बेटा हैं तूँ मेरा? तुम्हे इससभी मे भि एक् चाल नज़रआई? मेरायू चक्कर खाकरगिर जानां भि तुम्हें किसी कामयाबी कां हिस्सा नज़रआया? वाउ बेटा वाउ.आज तूने साबित कर दिया कि तुँ मात्र औऱ मात्र अपने बाप पऱ गय़ा हैं। तेरेलिए किसी केँ जज़्बात किसी केँ दुख दर्दकोई मायने नहि रखते। आज अगर मुझे चक्कर कि वजह सें दिल कां दौरापड़ जातातब भि शायद तुम्हारी तरफ औऱ तेरे बाप कों कोई फर्क़ नहि पड़ता। "
"म माॅम। " शिवा बुरीतरह सें झेंपते हुए बोला___"यह आप् क्याँ कहरही हें?"
"शटअप। " प्रतिमा ज़ोर सें चीखी थि। उसकी ऑखों सें एकाएक ऑसूबह चले___"क्याँ नहि किया मैने औऱ क्याँ नहि दिया मैने तुम् दोनो बाप बेटों कों? मगर मेरे त्याग औऱ बलिदान कां कोईमोल नहि हैं तुम् दोनो कि नज़र मे। मैने वोँ काम भि किया जिसके लिएकोई भि भारतीय स्त्री किसी भि सूरत मे रेडी नहि होँ सकती। मैने अपनेसंग संग अपनी आत्मा तक कों जहन्नुम मे झोंक दियामगर उसका भि कोईमोल नहि तुम् लोगों कि नज़र मे। अभि तक तोँ नहि मगरअब एहसास होँ रहा हैं कि मेरे कर्मों कि सज़ा मुझे मिलनी शुरुआत होँ गई हैं। "
"आईएम स्वारी माॅम। " शिवा नें सिर झुकाते हुए कहा___"मेरा वोँ मतलब हरगिज़ भि नहि थां जौ आप् समझ बैठी हें। मे तोँ.
"बस। " प्रतिमा नें अपना दाहिना हाथउठा कर अपने पंजे सें उसे रुकने कां संकेत देतेहुए कहा___"कुछ भि सफाई देने कि ज़रूरत नहि हैं। मे कोई बच्ची नहि हूॅ जिसे किसी भि तरह कि बातों सें बहला फुसला दियाजाए। मेरे सीने मे भि एक् दिल हैं जिसमें प्रेम मुहब्बत औऱ ममता कां सागर उछाल मारता हैं। मगर तूने औऱ तेरे बाप नें कभी उसकी कद्र नहि कि। "
"आप् बेवजह बातों कां पतंगड़ बनारही हें माॅम। " शिवा नें कहा___"जबकि मे क़समखा कर कहताहूॅ कि मेरे कहने कां वोँ मतलब नहि थां। हाॅ मे यह मानता हूॅ कि मैंने वोँ सभीउस वक़्त कह दिया जबकि हालात वैसे नहि थें। इसीलिए मे आपसे उसकेलिए माफ़ी भि माॅगरहा हूॅ। औऱ दूसरी बात मुझे पहली नज़र मे यहीलगा कि आपने चक्कर खाकर गिरने कां नाटक किया हैं। इसलिए आपके नाटक कों ज़ारी रखने केँ लिए मे भि ज़ोर सें चीखते हुए आपकेपास आकर वोँ सभी आपसे कहनेलगा थां। क्योंकि यह तोँ मुझेपता हि थां कि फोन चालू हालत मे हैं औऱ नानाजी जी कों वोँ सभीकुछ साफसाफ सुनाई देगा जौ कुछ हम् यहाॅ करेंगे औऱ ऐसाहुआ भि। तभी तोँ जब मैने देखा कि आपके चक्कर खाने सें उधर नानाजी जी भि चिंतित व परेशान होँ उठे हें तौ मैने जल्द सें फोनउठा कर उनसेबात कि थि औऱ उन्हें आपके बारे मे सभीकुछ बताया थां। उसकेबाद उन्होंने यहाॅआने केँ लिएकहा औऱ यहाॅ कां पता पूछा मुझसे तौ मैनेबता दिया। बस, यहीहुआ थां। उसकेबाद मुझेलगा कि नाटक समाप्त हौ गय़ा हैं तौ मैने आपके चेहरे पर्र पानी छिड़क कर आपकोहोश मे लें आया औऱ आपसे वोँ सभीकहा। मगर आपने तौ कुछ औऱ हि मुझे सुना दिया। "
"तभी तौ कहतीहूॅ कि तुम् दोनो बाप बेटों कों किसी केँ दुख दर्द कां एहसास नहि हैं। " प्रतिमा नें दुखीभाव सें कहा__"अगर होता तौ उसी टाइमसमझ जाते कि वोँ कोई नाटक नहि बल्कि हक़ीक़त थां। तुम्हें समझना चाहिए थां कि वर्षों कि बिछड़ी एक् बेटी अपने बाप सें बातकर रही थि। उस वक़्त बाप बेटी केँ दिलों मे भावनाओं कां कैसा ज्वार भाॅटा ताण्डव कररहा होगा?यह उन प्रबल भावनाओ कां हि असर थां कि मेरादिल उन भीषण जज़्बातों कों सहन नं कर पाया औऱ मे चक्कर खाकरगिर गई थि। मगर, जैसा कि मैनेकहा तुम् दोनो बाप बेटों कों किसी केँ दुख दर्द कां एहसास नहि हैं। तभी तौ मेरीउस हालत कों भि नाटकसमझ लिया। "
"मुझे क्षमा कर दीजिए माॅम। " शिवा नें सहसा भारी लहजे मे कहा___"मुझसे सच मे बहोत बड़ी ग़लती होँ गई हैं। मगर आइंदा ऐसा नहि होगा माॅम, यह मेरा वादा हैं आपसे। आप् तोँ जानती हें कि आपकी अहमियत मेरी लाइफ मे कितनी हैं। मे ऐसाकोई कामकर हि नहि सकता जिससे आपकेदिल कों ठेस पहुॅचे। बस एक् बार क्षमा कर दीजिए नं। "
प्रतिमा नें इस टाइम शिवा केँ चेहरे पर्र उभरेहुए मासूम सें भावों कों देखा तौ सहसा उसकी ममताजाग गई। उसने जल्दी हि शिवा कों पकड़कर अपनेऊपर खींच लिया औऱ कसकर अपने सीने सें भींच लिया। तभी किसी केँ आने कि आहट सें दोनो हि अलगहुए। कुछ हि पलों मे सविता नें कमरेएं प्रवेश किया। उसने बताया कि डाक्टर साहब आँ गए हें। सविता कि बातसुन कर शिवाबेड सें उठकर कमरे सें बाहर् कि तरफचला गय़ा। थोड़ी हि देर मे अजय सिंह कां फैमिली डाक्टर अनिलजैन शिवा केँ संग कमरे मे दाखिल हुआ। अनिलजैन चालीस कि उमर कां तथा मध्यम हाइट काठी कां ब्यक्ति थां। अजय सिंह जैसे इंसान सें संबंध रखने वालायह पहलाऐसा ब्यक्ति थां जोँ शक्ल औऱ सीरत सें शरीफ़ थां।
शिवा नें अनिल कों प्राथमिक बातें बताईं कि क्याँ हुआ थां उसकी माॅम कों। उसकेबाद अनिल नें चेकअप करना शुरुआत किया। थोड़ी देर तक प्रतिमा कों चेक करने केँ बाद उसनेकुछ दवाईयाॅ दि औऱ उन्हें सेवन करने कि विधि बताई। फिन उसने शिवा कों अपनेसंग बाहर् आने कां इशारा करतेहुए कमरे सें बाहर् कि तरफचल दिया।
"क्याँ बात हैं डाक्टर अंकल?" शिवा नें बाहर् आते हि सहसा गंभीरता सें पूछा___"मेरी माॅम पूरीतरह ठीक तौ हें न्?"
"चिंता कि कोईबात नहि हैं बेटा। " अनिल नें कहा__"बस थोड़ी कमज़ोरी थि इसवजह सें उन्हें चक्कर आया थां। ठाकुर साहबआएॅ तौ उनसे कहना कि मैने उन्हें याद किया हैं। अगर उनकेपास टाइम हौ तोँ कुछ टाइम केँ लिए मेरेपास अवश्य आएॅ वोँ। "
"जी बिलकुल डाक्टर अंकल। " शिवा नें विनम्रता सें कहा___"मे डैड कों अवश्य आपकेपास जाने केँ लिए कहूॅगा। "
उसकेबाद डाक्टर अनिलजैन हवेली सें अपना थैला लियेचला गय़ा। शिवा भि वापस अपने माॅम केँ पास आँ गय़ा। सविता रात केँ लिए खानां बनाने चली गई थि। उसे प्रतिमा नें कह दिया थां कि कुछ औऱ लोगों कों संग मे लेकरउन लोगों केँ लिए भि खानां बना लेना जौ लोगआज गेस्टरूम मे ठहरेहुए हें। कुछदेर अपनीमाॅ केँ पास बैठने केँ बाद शिवा प्रतिमा केँ हि कहने पर्र गेस्टरूम कि तरफचला गय़ा। जबकि प्रतिमा अपने पिता केँ आने केँ बाद उससे मिलने केँ सुनहरे ख़याल बुनने लगी।
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उधर विराज कि तरफ!
रात हुइ तौ विराज औऱ आदित्य नें थोडा बहोत खानां खाया। हलाॅकि खानां पीना वोँ लोग लेकर नहि चले थें इसलिए एक् स्टेशन पऱ जब ट्रेन रुकी तौ वहींइन दोनो नें अपनेलिए खाने कि कुछ चीज़ें लें लिये थें औऱ फिन ट्रेन मे हि दोनो नें बैठकर खा लिया थां।
नीलम कि मौजूदगी मे मैने इतना अवश्य किया कि अपनीशीट पर्र आदित्य कों बैठा दिया थां औऱ आदित्य कि शीट पऱ मे बैठ गय़ा थां। इससेहुआ यह कि अब नीलम कि तरफ मेरीपीठ होँ गई थि। हलाॅकि इसतरफ बैठने सें मेरीपीठ भि उसे दिखाई नहि देनी थि। ख़ैर खानां पीना करके हम् दोनो हि धीरे-धीरे लेटकर सोगए थें। नींद भि ज़बरदस्त लगी थि क्योंकि हम् दोनो लगातार यात्रा हि कररहे थें।
रात केँ किसी प्रहर हमें हंगामा सां सुनाई दिया। ऐसा लगा जैसेकुछ लोगआपस मे झगड़ा कररहे थें। यहएसी कां डिब्बा नहि थां। मैने जानबूझ करएसी मे टिकट बनवाने कों नहि कहा थां जगदीश अंकल सें। रिजर्वेशन वाले डिब्बे मे भि कुछलोग जनरल डिब्बे कि भीड़देख करघुस आते थें। ख़ैर, उस हंगामा शराबे कि वजह सें हमारी नींदटूट गई औऱ हमारी ऑखेंखुल गई।
हंगामा शराबा मेरे पीछे कि तरफ सें सुनाई देरहा थां। आदित्य जैसे हि उठकर अपनीशीट पऱ बैठा वैसे हि उसकी नज़र मेरे पीछेउस तरफ पड़ीजिस तरफ हंगामा होँ रहा थां। आदित्य नें देखा कि चार पाॅच लड़के मेरे पीछे कि तरफ वालीशीट केँ पास फर्श पऱ खड़े थें औऱ शीट पर्र बैठेहुए यात्रियों कों अनाप शनापबके जारहे थें। उन लड़कों कि आवाज़ों केँ बीचकुछ औरतों व लड़कियों कि भि आवाज़ें आँ रही थि। इसबीच मे भि उठकर अपनीशीट पऱ बैठ गय़ा थां। मैनेयह सोचकर अपने पीछे कि तरफ नहि देखा कि कहीं नीलम कि नज़रमुझ पर्र न् पड़जाए। लेकिन उससमय मे चौंका जब नीलम कि तेज़ तेज़ आवाज़ मेरे कानों पर्र पड़ी। उसकी आवाज़ सें ऐसा प्रतीत होँ रहा थां जैसे वोँ बस रोने हि वाली हौ।
यहजान कर मेरेमनो मस्तिष्क मे झनाका सां हुआ। मुझे समझते देर नं लगी कि उन लड़कों सें नीलमतथा अन्य लोगों कि कहा सुनी हौ रही हैं। मुझेयह तौ समझ नं आया कि आख़िर बात क्याँ हुइ हैं लेकिन इतना अवश्य समझ गय़ा कि नीलमइस तरह किसी सें झगड़ा करने वाली लड़की नहि हैं। उस हालत मे तोँ बिलकुल भि नहि जबकि वोँ ट्रेन मे अकेली सफरकर रही होँ। मुझेलगा नीलमइस समय बेहद परेशान हालत मे हैं। मेरे अंदर कां भइयाजाग गय़ा। बातभले हि चाहे जोँ होँ मगर मे यह हर्गिज़ भि बरदास्त नहि कर सकता थां कि कोईऐरा गैरा मेरी बेहन कों कुछ उल्टा सीधाकहे याँ उससे किसीतरह कां झगड़ा करे।
मैने आदित्य कों इशारा किया। आदित्य मेरा इशारा समझ गय़ा। उसकेबाद हम् दोनो हि उसतरफ चल दिये। इस बीच मैने जल्द सें अपनेमुख औऱ नाक कों रुमाल सें ढॅक लिया थां। कुछ हि लम्हा मे हम् दोनोउन लड़कों केँ पास पहुॅच गए। मैने एक् लड़के कों हल्का सां दबाव देकर एक् तरफ किया औऱ शीट कि तरफ देखने कि कोशिश कि। मे देखकर चौंका कि नीलम अपनीशीट पऱ बैठी सिसकरही थि। उसकेबगल सें हि एक् औऱ लड़की बैठी हुईँ थि। उसकी हालत भि नीलम जैसी हि थि। मुझेसमझ नं आया कि नीलम औऱ वोँ लड़की सिसक क्यूं रही हें? जबकि उन दोनो केँ बगल सें एक् महिला भि बैठी थि जिसके संग एक् दस बारहसाल कां लड़का थां। नीलम कि सामने कि शीट पर्र दो व्यक्ति वदो औरतें बैठी हुइ थि। उनके चेहरों पर्र करीब बारहबजे हुए थें।
"ओयेकौन हैं बे तूँ?" सहसाउस लड़के नें मुझे धक्का देतेहुए कहा जिसे दबाव देकर मे अंदरशीट कि तरफ देखने लगा थां, बोला___"औऱ तुँ मुझे एक् तरफ करके अंदर कहाॅ घुसा आँ रहा हैं? क्याँ तुम्हे भि यह दोनो लौंडियाॅ मनपसंद आँ गई हें?"
"मनपसंद तौ आएॅगी हि दिनेश। " एक् अन्य लड़के नें हॅसकर कहा___"आख़िर माल तौ ज़बरदस्त हि हैं न्। "
"अरे तोँ पहले हमें तोँ चखनेदे भइया। " दिनेश नाम केँ उस लड़के नें कहा___"उसके बादयह भि चख लेगा। "
"केसेचख लेगा दोस्त?" तीसरे लड़के नें कहा___"हम् साले इतनीदेर सें इन मालों सें कहरहे हें कि बाथरूम चलोमगर यह हें कि सुनती हि नहि हें हमारी बात। "
उन लड़कों कि इन बातों सें हि ज़ाहिर होँ गय़ा थां कि माज़रा क्याँ हैं। मगर मे हैरान इसबात पर्र थां कि वहाॅ पऱ बैठे बाॅकी सभीउन लड़कों कि बददमीची सहन केसेकर रहे थें? याँ फिन वोँ सभीडर रहे थें कि यह लड़के कहीं उनकी औरतों याँ बेटियों कों कुछ कहने न् लगें। यह योहद हि होँ गई थि। सबको अपनी फिक्र थि, कोईयह नहि सोचरहा थां कि दूसरी लड़कियाॅ भि तौ किसी कि बेहन बेटी होंगी। इस सबसे मेरा दिमाग़ बेहद ख़राब होँ चुका थां। मैनेपलट कर आदित्य कि तरफ देखा। वोँ मुझे देखते हि समझ गय़ा कि क्याँ करना हैं।
"ओ भइया ज़राबात तोँ सुन। " मैने अपनी आवाज़ बदलते हुएकहा दिनेश नाम केँ उस लड़के सें कहा___"तेरे अगर औऱ भि मित्र इस ट्रेन मे हों तोँ मोबाइल करके बुला लें उन्हें। क्योंकि अब जोँ तुम् लोगों केँ संग होने वाला हैं उसकेबाद तुम् लोगों हास्पिटल पहुॅचाने वाला भि तोँ कोई होना चाहिए नं। "
"ओये चिकने। " दिनेश सें पहले हि उसका एक् अन्य दोस्त बोल पड़ा___"अधिक हीरोपंती करने कां शौक चढ़ा हैं क्याँ तेरे कों? चलफूट लें इधर सें वरना हम् लोगों सें पंगा लेने कां अंजाम अच्छा नहि होगा समझा? औऱ हाॅआपन केँ औऱ भि छोकरे लोगइस ट्रेन मे मौजूद हें। इसलिए आपन एक् हि बार तेरे सें बोलेगा कि इधर सें खिसक लेँ तुँ। "
"किसी नें सच हि कहा हैं कि लातों केँ भूत बातों सें नहि मानते। " मैने गुस्से सें उबलते हुएउस लड़के कां कालर पकड़ा औऱ ज़ोर सें अपनीतरफ खींच लिया___"तुम् जैसेगटर केँ कीड़ों कों मसलना हि बेहतर होता हैं। "
मैने जैसे हि उस लड़के कों अपनीतरफ खींचा तौ एक् अन्य हरकत मे आँ गय़ा। अभि वोँ हरकत मे आया हि थां कि आदित्य नें धर लियाउसे। इधर मैनेउस लड़के केँ चेहरे पऱ ज़ोर कां पंचजड़ दिया। उनमें सें किसी कों भि इस सबकी उम्मीद नहि थि। चेहरे पर्र ज़ोरदार पंच पड़ते हि उस लड़के कि नाक कि हड्डी टूट गई औऱ भल्ल करकेखून बहनेलगा। वोँ बुरीतरह बिलबिलाते हुए अपनीनाक कों अपने दोनो हाॅथों सें पकड़ लिया। अचानक हुएइस हमले सें दो लड़के जोँ अभि खाली थें वोँ भि हरकत मे आँ गए। आसपास फर्श पर्र खड़ेहुए लोग एकदम सें उस स्थान सें दूर हटतेचले गए।
आदित्य नें जिस लड़के कों धरा थां उसका एक् हाॅथ पकड़कर ज़ोर सें उमेठ दिया। जिससे वोँ दर्द मे चीखा। हाॅथ उमेठते हि आदित्य नें पीछे सें अपने घुटने कां वार उसके पिछवाड़े पऱ किया तौ उसकासिर ऊपर कि शीट पर्र लगे लोहे केँ पाइप सें टकराया। उसकेहलक सें चीख निकल गई। इधरदो लड़को केँ हाथ मे पलक झपकते हि जाने कहाॅ सें चाकू प्रकट होँ गय़ा थां। मतलबसाफ थां कि वोँ चारो पेशेवर अपराधी थें। मगर उन्हें क्याँ पता थां कि आज उनका पाला उनसे भि बड़े खलीफा सें पड़ गय़ा थां।
एक् लड़के नें जैसे हि अपना चाकू वालाहाथ ऊपरहवा मे उठाकर मुझ पऱ चलाया तोँ मैने उसकेउस हाॅथ कों एक् हाॅथ सें हवा मे हि रोंका औऱ दूसरे हाॅथ सें उसकी कलाई पऱ कराट कां वार किया जिससे उसकेहाथ सें चाकूछूट कर फर्श पऱ गिर गय़ा। चाकू केँ गिरते हि मैने उसकेपेट मे ज़ोर कि लात मारी तोँ वोँ झोंक मे हि बाएॅ साइड केँ डंडे सें टकराकर फर्श पऱ चित्त गिर पड़ा। उधर ऐसा हि हाल आदित्य कि तरफ भि थां। कहने कां मतलबयह कि दो मिनट केँ अंदर हि वोँ चारो लड़के ट्रेन केँ फर्श पऱ पड़े बुरीतरह कराहरहे थें औऱ हम् दोनो सें रहम कि भीख माॅगने लगे थें।
"जी तौ करता हैं कि। " मैने खूंखार भाव सें कहा__"जौ घिनौना कर्म तुम् लोगों नें किया हैं उसकेलिए तुम् सबकेहाथ पांव तोड़कर तुम् सबके हाॅथों मे देदूॅ। मगर मे यहाॅ पऱ अधिक बखेड़ा नहि करना चाहता। इसलिए जितना जल्द होँ सके यहाॅ सें दफा होँ जाओ वरनायह भि सोच लेना कि जिस बखेड़े कि अभि मे बातकर रहाहूॅ उससे मे डरता भि नहि हूॅ। "
मेरीइस बात कां असर जल्दी हि हुआ। वोँ चारो बुरीतरह लड़खड़ाते हुए फर्श सें उठे औऱ नौदो ग्यारह हौ गए। उन चारों केँ जाते हि मे वापस पलटा औऱ नीलम कि देखा तौ चौंक गय़ा। वोँ मुझे हि देखेजा रही थि। उसकी ऑखों मे ढेर सारेऑसू थें। अभि मे उसेदेख हि रहा थां कि सहसा वो अपनी स्थान सें उठी औऱ बिजली कि तरह दौड़कर मुझसे लिपट गई।
"राऽऽज मेरे भइया। "फिन वोँ मुझसे लिपटी फूटफूट कर रोनेलगी थि। उसकीइस क्रिया सें जहाॅ मे भौचक्का रह गय़ा थां वहींशीट पर्र बैठी वोँ दूसरी लड़की भि हैरान रह गई थि। तभी मुझे ध्यान आया कि उन लड़कों सें लड़ते वक़्त जानेकब मेरेमुख सें रुमाल निकल गय़ा थां। शायदयही वजह दि कि नीलमजान गई थि कि मे वास्तव मे कौनहूॅ।
"ओहराज। " मुझसे लिपटी नीलम रोतेहुए कहरही थि___"तुम् यहाॅ भि मेरी इज्ज़त बचाने केँ लिए पहुॅच गए। इतने अच्छे औऱ इतने महान केसे होँ सकते होँ तुम्? यहसच हैं कि अगर तुम् नहि होते तोँ कदाचित वोँ लड़के मुझे औऱ सोनम दिदी कों अपनीउन अश्लील बातों सें हि मार देते। "
"बस चुप होँ जाओ। " मैनेउसे स्वयं सें अलगकर उसके चेहरे कों अपने दोनो हाॅथ कि हॅथेलियों मे लेतेहुए कहा___"कुछ नहि होता। मे जब तक ज़िंदा हूॅ तुम्हारा कीई भि बुरा नहि कर सकता। "
मेरीयह बातसुन कर नीलम एकटक मेरी ऑखों मे देखने लगी। कुछ इसतरह जैसे मेरी ऑखों मे कुछ तलाशकर रही हौ। आसपास मौजूद लोग हमारी तरफ ऑखें फाड़े देखरहे थें। मुझेयह सभी बड़ा अजीब सां लगनेलगा।
"जाओअब अपनीशीट पर्र बैठजाओ। " मैंने सहसा गंभीर भाव सें कहा___"सभी लोग अजीबतरह सें इधर हि देखरहे हें। "
"देखने दोराज। " कहने केँ संग हि नीलम पुनः मुझसे छुपक गई, फिन बोलीं___"मुझे किसी कि कोई परवाह नहि। मे बस इतना जानती हूॅ कि मे ऐसे आदमी कि पनाहों मे हूॅ जिसना मेरी अस्मत कि दोदोबार रक्षा कि हैं। इस पनाह मे आकर मुझेऐसा एहसास हौ रहा हैं मेरे भइया जैसेयह स्थान मेरेलिए दुनियाॅ कि सबसे महफूज़ औऱ सबसे हसीन स्थान हैं। राज, मुझे अपनीइस पनाह सें अबकभी जुदा नं करना। "
"हाॅ बाबा नहि करूॅगा। " मैने नीलम कों स्वयं सें अलग करके कहा___"अब जाओ अपनीशीट पऱ बैठजाओ। औऱ हाॅ मे अगलीशीट पऱ हि हूॅ। अगर किसीतरह कि कोई तकलीफ़ होँ तौ मुझे आवाज़ लगा देना। "
"तुम् भि मेरेपास हि बैठजाओ नं राज। " नीलम नें किसी बच्ची कि तरह ज़िद करतेहुए कहा___"याँ फिनऐसा करो कि मुझे भि अपनेपास बैठालो। मे तुम्हारे पास हि रहना चाहती हूॅ। प्लीज मेरी इतनी सि बातमान जाओ नं। "
नीलम कि इसबात सें मे एकदम सें उसकीतरफ देखता रह गय़ा। फिन मैने चेहरा घुमाकर आदित्य कि तरफ देखा औऱ सामने शीट पऱ बैठी सोनम कि तरफ भि। दोनो मुझे हि देखरहे थें। मुझेसमझ नं आया कि अब मे क्याँ करूॅ?
"तुम् अपनी सोनम दिदी कों अकेला छोंड़ कर केसे मेरेपास बैठ सकती हौ?" मैने कहा___"औऱ उधर मेरेसंग मेरा साथी आदित्य भि तोँ हैं। मे उसे अकेला छोंड़ कर तुम्हारे पासभला केसेबैठ जाऊॅगा? इसलिए यह बेकार कि ज़िद छोंड़ो औऱ अपनीशीट पऱ बैठजाओ। मे पास मे हि तोँ हूॅ। "
"हाॅ मगर मुझेतब भि तुम्हारे पास हि बैठना हैं। " नीलम नें बुरा सां मुहबना लिया___"अपने मित्र सें कहदो कि यहाॅ मेरीशीट पर्र सोनम दिदी केँ संगबैठ जाएॅ। "
"यह कैसी ज़िद हैं नीलम?" मैने हैरान___"अगर सोनम दिदी कों इसबात सें ऐतराज़ हुआ तौ?"
मेरीबात सुनकर नीलम नें झट सें पलटकर सोनम कि तरफ देखा औऱ फिन कहा___"दिदी, क्याँ आपको इनके यहाॅ बैठने सें ऐतराज़ हैं?"
"क क्याँ मतलब??" नीलम केँ द्वारा एकाएक हि इसतरह पूछने पऱ सोनम करीब हड़बड़ा गई थि।
"मे यहपूछ रहीहूॅ आपसे। " नीलम नें मानो अपने वाक्य कों दोहराया___"कि क्याँ आपकोराज केँ मित्र केँ यहाॅ पऱ बैठने सें ऐतराज़ हैं?"
सोनम नें नीलम कि इसबात पऱ बड़े अजीबभाव सें उसकीतरफ देखा। नीलम कों देखने केँ बाद मेरीतरफ औऱ फिन आदित्य कि तरफ। सबको देखने केँ बाद पुनः नीलम कि तरफ देखते हुए कहा___"अगर तुँ यही चाहती हैं तोँ ठीक हैं। मुझेकीई ऐतराज़ नहि हैं इनके यहाॅबैठ जाने सें। "
"ओह थैंक्यू सोमच दिदी। " नीलम नें खुश होकर कहा___"आप् सच मे बहोत अच्छी हें। "
"चलचलअब मस्का मतलगा। " सोनम नें कहा___"जा बैठजा राज केँ पास। मगर उसे परेशान मत करना ज़्यादा। "
"ओ हैलो। " मे एकदम सें बोल पड़ा___"कोई मेरे साथी सें भि जानना चाहेगा कि उसे यहाॅ बैठने सें ऐतराज़ हैं कि नहि?"
मेरीइस बात सें नीलमव सोनम एकदम सें चुप हौ गई। मैने आदित्य कि तरफ देखा तोँ उसे मुस्कुराते हुए पाया। तभी नीलमव सोनम कि नज़रें एकदम सें आदित्य कि तरफ दौड़गईं। जैसेउसे देखकर हि ऑखों सें पूछरही हों कि आपको ऐतराज़ हैं क्याँ यहाॅ बैठने सें? आदित्य उनकी ऑखों मे उभरे प्रश्न कां आशयसमझ कर बोला__"ठीक हैं मे सोनमजी केँ पास हि बैठ जाताहूॅ। "
"लोराज। " आदित्य केँ मुख सें यह सुनते हि नीलम नें मेरीतरफ देखकर कहा___"अब तोँ किसी कों कोई ऐतराज़ नहि हैं। सोअब मे तुम्हारे संग हि अगली वालीशीट पर्र बैठूॅगी। चलोअब हम् जल्द सें अपनीशीट पऱ चलते हें। "
मरता क्याँ न् करता कि तर्ज़ पऱ मे हैरान परेशान होकर नीलम केँ संग वापस अपनीशीट पर्र आँ गय़ा। जबकि आदित्य सोनम केँ पास हि नीलम वालीशीट पऱ बैठ गय़ा। इधर मेरीशीट पऱ आते हि नीलम मेरेबगल सें हि धम्म सें बैठ गई। बैठते हि उसने अपना एक् हाथ मेरीकाख सें डालकर मेरा एक् हाॅथ मानो अपने कब्जे मे लें लिया थां।
"अरेअब यह क्याँ हैं?" नीलम केँ ऐसा करते हि मैने हैरानी सें कहा___"सोना नहि हैं क्याँ? चलोजाओ ऊपर वालीशीट पर्र लेटकर सोजाओ। "
"मुझे नींद नहि आँ रही हैं राज। " नीलम नें एकदम सें बच्चियों वाले अंदाज़ सें कहा___"तुम् भि मत सोना। हम् सारीरात ढेर सारी बातें करेंगे। मुझे तुमसे बहोत सारी बातें करनी हें। "
"वोँ सभी तौ ठीक हैं। " मैने एकाएक अजीबभाव सें कहा___"मगर क्याँ तुम्हें ऐसा महसूस नहि होँ रहा कि आज सूरज पश्चिम दिशा सें निकलरहा हैं? यह तौ कमाल हौ गय़ा नं कि जौ नीलम मुझसे कभीबात करना तौ दूरकभी मुझे देख्ना तक गवाॅरा नहि करती थि आजवही नीलम मुझसे सारीरात ढेर सारी बातें करेंगी? यकीन नहि होँ रहा मुझे। यह जादू हैं याँ फिन खुली ऑखों कां मेराकोई ख़्वाब?"
मेरीइन बातों सें नीलम कों झटका सां लगा। अभि तक जोँ चेहरा एकदम सें ताज़े गुलाब कि मानिंद खिलाहुआ दिखरहा थां वोँ मेरीइन बातों सें पलक झपकते हि मुरझा गय़ा थां। उसके चेहरे पर्र समयभर मे गहन पीड़ा वदुख केँ भावउभर आए औऱ ऑखों मे ऑसू रूपी समंदर मानों हिलोरें लेनेलगा थां। कुछ कहने केँ लिए उसके होंठबस थरथरा कररहगए थें।
"मुझे मेरेउन सब बुरे कर्मों कि सज़ादो राज। " नीलम नें रुऑसे स्वर मे कहा___"यकीन मानो, तुम्हारी हर सज़ा कों मे खुशी खुशी क़बूल कर लूॅगी। मगरअब तुम्हारी किसी भि तरह कि बेरुखी सहन नहि कर पाऊॅगी मे। मुझेपता हैं कि मैने तुम्हारे संगअब तक क्याँ किया थां। लेकिन अगर ग़ौर सें सोचोगे तोँ इस सबमें तुम्हें अवश्य समझ आएगा कि उस सबमें मेरीकोई ग़लती नहि थि। मैने तोँ वही किया थां अब तक जोँ बचपन सें हमें सिखाया गय़ा थां। सही ग़लत कां पाठ तौ हमें हमारे माॅ बाप नें हि बचपन सें पढ़ाया थां। जबकि वास्तव मे सही ग़लत क्याँ हैं वोँ अबसमझ आया हैं मुझे। मे सच कहतीहूॅ मेरे भइया कि मे अपनेउन सब कर्मों केँ बारे मे सोचसोच कर बेहद दुखीहूॅ। मुझे अपने आप् सें घृणा होती हैं। "
"इंसान जिन्हें दिल सें चाहता हैं। " मैने कहा___"वही अगरऐसा करें तोँ तक़लीफ़ तोँ यकीनन होती हैं नीलम। मैनेकभी भि तुम् सबके बारे मे ग़लत नहि सोचा थां। बल्कि हमेशा यही चाहता थां तुम् सभी मुझसे उसीतरह बातें करो हॅसोकहो जैसे बाॅकी सभी करते थें। मगर मुझेआज तक समझ न् आया कि हमनेऐसा कौन सां गुनाह किया थां हमें आप् सबकी केवल नफ़रत मिली। ख़ैर, यह सभी तोँ कल कि बातें हैं मगर मे यह जानना चाहता हूॅ कि आजऐसा क्याँ होँ गय़ा हैं कि तुम्हें वहीराज अपना भइया लगनेलगा औऱ इतना हि नहि बल्कि दुनियाॅ कां सबसे अच्छा इंसान भि लगनेलगा। क्याँ केवलइस लिए कि मैने इत्तेफाक़ सें दोबार तुम्हारी इज्ज़त कि रक्षा कि याँ फिन इसकीकोई दूसरी वजह हैं?"
"इंसान कां चरित्र जैसा भि हौ राज। " नीलम नें गंभीर भाव सें कहा___"वोँ दूसरों केँ सामने उजागर होँ हि जाता हैं। यहअलग बात हैं कि इसमें थोडा बहोत टाइमलग जाता हैं। तुम् लोगों केँ जिस चरित्र कां पाठ हम् भइया बहनों कों बचपन सें पढ़ाया गय़ा थां उसे हमनेयह सोचकर यकीन केँ संगमान लिया क्योंकि हम् यही समझते थें कि कोई भि माॅ बाप अपने बच्चों कों ग़लत नसीहत नहि देते हें। मगर जौ ग़लत होता हैं उसका भि पर्दाफाश हौ हि जाता हैं एक् दिन। तुमने मेरीदो बार इज्ज़त बचाईइसे संयोग समझो याँ वक़्त कां बदलाव, जिसके फलस्वरूप मुझेयह समझआया कि अपनेजिस माॅ बाप सें मैने तुम् लोगों केँ चरित्र कां पाठ पढ़ा थां वोँ दरअसल झूॅठा भि तौ हौ सकता थां। क्योंकि एक् बुरे इंसान सें अच्छे कर्म कि उम्मीद नहि कि जा सकती। जबकि तुमने जोँ किया वोँ निहायत हि अच्छे कर्म कि पराकाष्ठा थि। तुम्हारे उस कर्म नें मुझेयह सोचने पर्र बिवशकर दिया कि तुम् वैसे नहि होँ जैसा मेरेमाॅ बाप नें अब तक समझाया थां। बस, इंसान जब किसी केँ बारे मे गहराई सें सोचता हैं तोँ उसेकुछ न् कुछ तोँ एहसास होता हि हैं कि हक़ीक़त क्याँ हैं? अब तक तोँ मैने तुम्हारे बारे मे उस तरीके सें सोचा हि नहि थां राजमगर उस हादसे केँ बादजब मैने तुम्हारे बारे मे आदि सें अंत तक सोचा तोँ मुझे एहसास हुआ कि तुम् बुरे नहि हौ सकते। इंसान कों अपनी सफाई मे कुछ भि कहने कां अधिकार हैं जबकि हमने तौ तुम् लोगों कि किसीबात कों सुनना हि कभी गवाॅरा नहि किया थां। ऐसे मे भला हमें केसेसमझ आता कि सच क्याँ हैं? हमसे यकीनन ग़लती हुईँ हैं राज औऱ मे इस ग़लती कों अवश्य सुधारूॅगी। घऱ पहुॅचते हि माॅमडैड सें बताऊॅगी कि केसे तुमने दोदोबार उनकी बेटी कि इज्ज़त कि रक्षा कि हैं। "
"तुम्हारे बताने सें कुछ नहि होने वाला नीलम। " मैने फीकी सि मुस्कान केँ संग कहा___"तुम्हें तौ अभि सारी असलियत कां पता हि नहि हैं। मगर मेरा दावा हैं कि जब तुम्हें सारी सच्चाई कां पता चलेगा तौ तुम्हारा दिल हाहाकार कर उठेगा। "
"क्याँ मतलब??" नीलम नें चौंकते हुए कहा___"तुम्हारी इन बातों कां क्याँ मतलब हैं राज? तुम् किस असलियत कि बातकर रहे हौ?"
"मे तुम्हें इस बारे मे स्वयं कुछ नहि बताऊॅगा। " मैने गंभीर भाव सें कहा___"क्योंकि मेरे बताने पर्र तुम्हें यही लगेगा कि मे तुम्हारे माॅमडैड केँ विषय मे बेवजह हि अनाश शनापबक रहाहूॅ। इसलिए इस सबके बारे मे तुम्हें स्वयं हि पता करना होगा नीलम। जब तक तुम्हें स्वयं सारी बातों कां पता नहि चलेगा याँ तुम् स्वयं अपनी ऑखों सें नहींदेख लोगीतब तक तुम् दूसरे कि बताई हुइ बात कां यकीन नहि कर सकोगी। "
"आख़िर ऐसीकौन सि बातें हें राज?" नीलम केँ चेहरे पऱ गहन चिंता केँ तथा सोचने वालेभाव उभरे___"जिनके बारे मे तुम् बातकर रहे होँ? तुम् मुझे बताओराज, मुझे तुम्हारी हरबात पर्र यकीन होगा। "
"नहि होगा नीलम। " मैने पुरज़ोर लहजे मे कहा__"कुछ बातें ऐसी होती हें जिन पऱ यकीन करना बेहद मुश्किल होता हैं। यहाॅ तक कि अगर इंसान स्वयं अपनी ऑखों सें भि देख लेँ तौ यकीन नहि कर पाता। इस लिए मेरेकुछ भि बताने कां कोई मतलब नहि हैं। तुम् स्वयं सारी बातों कां पता लगाओ औऱ फिनउन पर्र विचार करो। "
"क्याँ रितू दिदी भि उन सारी बातों कों जानती हें?" नीलम नें कहा___"जिनके बारे मे तुम् बातकर रहे हौ?"
"हाॅ। " मैने कहा___"रितू दिदी कों आरी असलियत कां पता हैं। "
"तोँ क्याँ यहीवजह हैं कि। " नीलम नें कहा___"आजकल वोँ माॅमडैड केँ ख़िलाफ हें?"
"हाॅयही वजह हैं। " मैने कहा___"अब तुम् सोच सकती हौ कि भलाऐसी वोँ क्याँ बातें होंगी जिसके चलते तुम्हारी अपनी दिदी अपने हि माॅमडैड केँ खिलाफ होँ गई हें?"
मेरीबात सुनकर नीलमकुछ बोल न् सकी, बस एकटक मेरीतरफ देखती रही। मे समझ सकता थां कि वोँ इनसभी बातों केँ चलते अपने दिलो दिमाग़ कों विचारों भॅवर मे डुबारही हैं। कुछ औऱ हमारे बीचऐसी हि बातें होती रहीं। उसकेबाद मैनेउसे सो जाने कां कह दिया। हलाॅकि मे जानता थां कि अबउसे सारीरात नींद नहि आने वाली थि। वोँ रातभर इन्हीं बातों कों सोचती रहेगी कि आख़िर ऐसीकौन सि सच्चाई हैं जिसकी मे बातकर रहाहूॅ औऱ जिस सच्चाई कों जानकर उसकी अपनी दिदी अपने हि माॅमडैड केँ खिलाफ़ हौ गई हैं?
नीलम कों ऊपर केँ बर्थ पर्र लिटाने केँ बाद मे भि अपने नीचे वाले बर्थ पर्र लेट गय़ा औऱ नीलम केँ संग हुई बातों केँ बारे मे सोचने लगा। आख़िर क्याँ करेगी नीलमजब उसे अपनेमाॅ बाप औऱ भइया कि असलियत कां पता चलेगा? वोँ कैसा रिऐक्ट करेगी जबउसे पता चलेगा कि उसकेमाॅ बाप नें किसतरह इस हॅसते खेलते परिवार कों बरबाद किया थां? सभीकुछ जानने केँ बाद क्याँ नीलम भि अपनी बड़ी बेहन कि तरह अपनेमाॅ बाप केँ खिलाफ़ हौ जाएगी? मे इन्ही सभी बातों केँ बारे मे सोचरहा थां। तभी सहसा मुझेअजय सिंह कां ख़याल आया। मैने परसों आने सें पहले हि जगदीश अंकल कों मोबाइल करकेअजय सिंह केँ संग एक् धाॅसू खेल खेलने कां कह दिया थां। यहउसी कां परिणाम थां कि इससमय अजय सिंह सीबीआई कि गिरफ्त मे थां। मगरअब जबकि मे कल दोपहर तक हल्दीपुर रितू दिदी केँ फार्महाउस पहुॅच जाऊॅगा तोँ अजय सिंह कों भि सीबीआई कि गिरफ्त सें आज़ाद कर देने कां टाइम आँ जाएगा।
अजय सिंहजब सीबीआई कि गिरफ्त सें निकलकर अपनी हवेली पहुॅचेगा तब वोँ प्रतिमा कों जौ कुछ बताएगा उसेसुन कर सबके पैरों केँ नीचे सें ज़मीन गायब हौ जाएगी। अजय सिंह कां दिमाग़ उस सबके बारे मे सोचते सोचते फटने कों आँ जाएगा मगरउसे कुछसमझ नहि आएगा। वोँ इसतरह किंकर्तब्यविमूढ़ सि स्थित मे बैठारह जाएगा जैसेकोई मौत केँ मुह सें अचानक बचने केँ बाद शून्य मे खोयाहुआ सां रह जाता हैं।
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दोस्तो, वादे केँ मुताबिक आप् सबके सामने मेगा एपसोड हाज़िर हैं,,,,,,,
आप् सबकी प्रतिक्रिया औऱ रिव्यू कां बेसब्री सें इन्तज़ार रहेगा।
इस एपसोड कों रेडी करने मे मैने कितनी मेहनत कि हैं इसका ज़िक्र करना उचित तौ नहि हैं, पर्र मुझे यकीन हैं कि आप् सभीसमझ गए होंगे।
♡ एक् नया संसार ♡ (Full Storyd) - Next part miss mat karna
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,,भाग दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत बहोत धन्यवाद भइया आपकीइस हसीन प्रतिक्रिया केँ लिए,,,,,,,,,, एपसोड दे दिया हैं भइया,,,,,,,,
बहोत हि हसीन एपसोड भइया जबर्जस्त काबिलियत कां प्रदर्शन आप् कि लेखनी कमाल कि हैं
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