Pratigya - body-focused teasing - Episode 1
Pratigya
देवकी – ‘जाकर समझाओ-बुझाओ औऱ क्याँ करोगे। उनसे बोलो, भैया, हमारा डोंगा क्यूं मझधार मे डुबाए देते हौ। तुम् घऱ केँ लड़के हौ। तुमसे हमेंऐसी आशा न् थि। देखो कहते क्याँ हें। ’
देवकी – ‘आखिर क्यूं? कोईहरज हैं?’
देवकी नें इस आपत्ति कां महत्व नहि समझा। बोलि – ‘ये तोँ कोईबात नहि आजअगर कमलाप्रसाद मुसलमान होँ जाए, तौ क्याँ हम् उसकेपास आनां-जानां छोड़ देंगे? हमसे जहाँ तक हौ सकेगा, हम् उसे समझाएँगे औऱ उसे सुपथ पऱ लाने कां उपाय करेंगे। ’
देवकी – ‘नहि, माफ़ कीजिए। इस जाने सें न् जानां हि अच्छा। मे हि कल बुलवा लूँगी। ’
देवकी – ‘प्रेमा उन लड़कियों मे नहि कि तुम् उसका शादी जिसके संग चाहोकर दो। जरा जाकर उसकीदशा देखो तौ मालूम हौ। जब सें येखबर मिली हैं, ऐसा मालूम होता हैं कि देह मे प्राण हि नहि। अकेले छत पर्र पड़ी हुईँ रोरही हैं। ’
देवकी – ‘कौन! मे कहती हूं कि वो इसीशोक मे रो-रोकर प्राण दे देगी। तुम् अभि उसे नहि जानते। ’
बदरीप्रसाद बाहर् चलेगए। देवकी बड़े असमंजस मे पड़ गई। पति केँ स्वभाव सें वो परिचित थि, मगर उन्हें इतना विचार-शून्य न् समझती थि। उसेआशा थि कि अमृतराय समझाने सें मान जाएँगे, मगर उनकेपास जाए केसे। पति सें रार केसेमोल लें।
देवकी नें कहा-‘रोओ मत बेटी, मे कल उन्हें बुलाऊँगी। मेरीबात वो कभी न् टालेंगे। ’
देवकी नें विस्मय सें प्रेमा कि ओर देखा, लड़कीये क्याँ कहरही हैं, ये उसकीसमझ मे न् आया।
देवकी नें कहा – ‘औऱ तेरा क्याँ हाल होगा, बेटी?’
देवकी नें आँसूभरी आँखों सें कहा – ‘मम्मी-बाप किसके सदा बैठे रहते हें बेटी! अपनी आँखों केँ सामने जोँ काम हौ जाए, वही अच्छा! लड़की तोँ उनकी नहि क्वाँरी रहने पाती, जिनके घऱ मे भोजन कां ठिकाना नहि। भिक्षा माँगकर लोग कन्या कां शादी करते हें। मोहल्ले मे कोई लड़की अनाथ होँ जाती हैं, तोँ चंदा माँगकर उसका शादीकर दिया जाता हैं। मेरेयहा किसबात कि कमी हैं। मे तुम्हारे लिएकोई औऱ वर तलाश करूँगी। ये जाने-सुने व्यक्ति थें, इतना हि थां, नहि तौ बिरादरी मे एक् सें एक् पड़ेहुए हें। मे कल हि तुम्हारे बाबूजी कों भेजती हूं। ’
प्रेमा नें जमीन कि तरफ देखते हुएकहा – ‘नहि अम्माँ जी, मेरेलिए आप् कोई फिक्र नं करें। मैंने क्वाँरी रहने कां निश्चय कर लिया हैं। ’
कमलाप्रसाद नें आते-हि-आते कहार सें पूछा – ‘बरफलाए?’
कमलाप्रसाद नें गरजकर कहा – ‘जोर सें कहो, बरफ लाए कि नहि? मुँह मे आवाज़ नहि हैं?’
कहार नें देखा कि अब बिना मुँह खोले कानों केँ उखड़ जाने कां भय हैं, तोँ धीरे-धीरे सें बोला – ‘नहि, सरकार। ’
कहार – ‘पैसे नं थें। ’
कहार – ‘हाँ हुजूर, किसी नें सुना नहि। ’
कमलाप्रसाद नें कपड़े भि नहि उतारे। गुस्सा मे भरेहुए घऱ मे आँ कर मां सें पूछा – ‘क्याँ अम्माँ, बदलू तुमसे बर्फ केँ लिए पैसे लेनेआया थां?’
कमलाप्रसाद – ‘नहि, उनसे तोँ भेंट नहि हुइ। उनकीतरफ गय़ा तोँ थां, मगरजब सुना कि वो किसीसभा मे गए हें, तोँ मे सिनेमा चला गय़ा। सभाओं कां तोँ उन्हें रोग हैं औऱ मे उन्हें बिल्कुल फिजूल समझता हूं। कोई फायदा नहि। बिना व्याख्यान सुने भि व्यक्ति जीतारह सकता हैं औऱ व्याख्यान देने वालों केँ बगैर भि दुनिया केँ रसातल चले जाने कि संभावना नहि। जहाँ देखो वक्ता-हि-वक्ता नजरआते हें, बरसाती मेढकों कि तरह टर्र-टर्र किया औऱ चलतेहुए। अपना वक्त गँवाया औऱ दूसरों कों हैरान किया। सभी-केँ-सभी मूर्ख हें। ’
कमलाप्रसाद नें जोर सें कहकहा मारकर कहा – ‘औऱ यह सभाओंवाले क्याँ करेंगे। यहीसभी तौ इनसब कों सूझती हैं। लालाअब किसी विधवा सें विवाह करेंगे। अच्छी बात हैं, मे जरूर बारात मे जाऊँगा, चाहे औऱ कोईजाए याँ न् जाए। जरा देखूँ, नएढंग कां शादी कैसा होता हैं? वहा भि सभी व्याख्यानबाजी करेंगे। इन लोगों केँ किए औऱ क्याँ होगा। सभी-केँ-सभी मूर्ख हें, अक्ल किसी कों छू नहि गई। ’
कमलाप्रसाद- ‘इस टाइम तौ बादशाह भि बुलाए तौ न् जाऊँ। हाँ, किसीदिन जाकरजरा कुशल-क्षेम पूछ आऊँगा। मगर हैं बिल्कुल सनकी। मे तौ समझता थां, इसमें कुछसमझ होगी। मगर निरा पोंगा निकला। अब बताओ, बहोत पढ़ने सें क्याँ फायदा हुआ? बहोत अच्छा हुआ कि मैंने पढ़ना छोड़-छाड़ दिया। बहोत पढ़ने सें बुद्धि भ्रष्ट हौ जाती हैं। जब आँखें कमजोर हौ जाती हें, तोँ बुद्धि केसेबची रह सकती हैं? तोँ कोई विधवा भि ठीक होँ गई कि नहि? कहां हें मिसराइन, कहदोअब तुम्हारी चाँदी हैं, कल हि संदेशा भेजदें। कोई औऱ न् जाए तौ मे जाने कों रेडी हूं। बड़ा आनंद रहेगा। कहां हें मिसरानी, अब उनके किस्मत चमके। रहेगी बिरादरी हि कि विधवा नं? कि बिरादरी कि भि कैद नहि रही?’
कमलाप्रसाद – ‘ये सभावाले जोँ कुछ नं करें, वो थोडा। इनसब कों बैठे-बैठे ऐसी हि बेपर कि उड़ाने कि सूझती हैं। एक् दिन पंजाब सें कोई बौखलआया थां, कह गय़ा, जात-पाँत तोड़दो, इससेदेश मे फूट बढ़ती हैं। ऐसे हि एक् औऱ जाँगलू आँ करकह गय़ा, चमारों-पासियों कों भइया समझना चाहिए। उनसे किसीतरह कां परहेज न् करना चाहिए। बस, सभी-केँ-सभी, बैठे-बैठे यही सोचा करते हें कि कोईनई बात निकालनी चाहिए। बुड्ढे गांधी जी कों औऱ कुछ नं सूझी तोँ स्वराज्य हि कां डंकापीट चले। सबों नें बुद्धि बेचखाई हैं। ’
पूर्णा कों देखते हि प्रेमा दौड़कर उसकेगले सें लिपट गई। पड़ोस मे एक् पंडित वसंत कुमार रहते थें। किसी दफ्तर मे क्लर्क थें। पूर्णा उन्हीं कि महिला थि, बहोत हि हसीन, बहोत हि सुशील। घऱ मे दूसरा कोई न् थां। जबदसबजे पंडित जी दफ्तर चले जाते, तौ यहींचली आती औऱ दोनों सहेलियाँ साम तक बैठी हँसती-बोलती रहतीं। प्रेमा कों इतना प्यार थां कि यदि किसीदिन वो किसी कारण सें नं आती तौ खुद उसकेघऱ चली जाती। आज वसंत कुमार कहीं दावत खानेगए थें। पूर्णा कां जीउबउठा, यहाचली आई। प्रेमा उसकाहाथ पकड़े हुएऊपर अपने कमरे मे लेँ गई।
प्रेमा – ‘भैया मे किसीतरफ ताकने कि लत नहि हैं। यही तौ उनमें एक् गुण हैं। पतिदेव कहींगए हें क्याँ?’
प्रेमा – ‘सभा मे नहि गए?आज तोँ बड़ी भारीसभा हुईँ हैं। ’
प्रेमा – ‘आज कि सभा देखने लायक थि। तुम् होती तौ मे भि जाती, समाज सुधार पऱ एक् महाशय कां बहोत अच्छा व्याख्यान हुआ। ’
प्रेमा नें हँसकर कहा – ‘नहि बेहन, समाज मे औरत औऱ पुरुष दोनों हि हें औऱ जब तक दोनों कि उन्नति न् होगी, जिंदगी सुखी नं होगा। पुरुष केँ विद्वान होने सें क्याँ औरत विदुषी होँ जाएगी? पुरुष तोँ आखिरकार सादे हि कपड़े पहनते हें, फिन स्त्रियाँ क्यूं गहनों पर्र जान देती हें? पुरूषों मे तौ कितने हि क्वाँरे रह जाते हें, स्त्रियों कों क्यूं बिना शादीकिए जिंदगी व्यर्थ जान पड़ता ? बताओ? मे तौ सोचती हूं, क्वाँरी रहने मे जौ सुख हैं, वो शादी करने मे नहि हैं। ’
प्रेमा नें अमृतराय कि प्रतिज्ञा कां हाल न् कहा। वो जानती थि कि इससे पूर्णा कि निगाह मे उनकाआदर बहोत कम जौ जाएगा। बोलि – ‘वो खुद शादी न् करेंगे। ’
प्रेमा – ‘नहि बेहन, झूठ नहि हैं। शादी करने कि ख़्वाहिश नहि हैं। शायदकभी नहि थि। दिदी केँ मर जाने केँ बाद, वो कुछ विरक्त-सें होँ गए थें। बाबूजी केँ बहोत घेरने पर्र औऱ मुझ पर्र दया करके वो शादी करने पऱ रेडीहुए थें, पर्र अब उनका विचार बदल गय़ा हैं औऱ मे भि समझती हूं कि जब एक् व्यक्ति खुद गृहस्थी केँ झंझट मे नं फँसकर कुछ सेवा करना चाहता हैं, तौ उसके पाँव कि बेड़ी न् बनना चाहिए। मे तुमसे सत्य कहती हूं, पूर्णा, मुझे इसका दुःख नहि हैं, उनकी देखा-देखी मे भि कुछकर जाऊँगी। ’
प्रेमा – ‘बिनाकहे भि तौ व्यक्ति अपनी ख़्वाहिश प्रकट कर सकता हैं। ’
प्रेमा – ‘नहि पूर्णा, तुम्हारे पैरों पड़ती हूं। पत्र-वत्र न् लिखना, मे किसी केँ शुभ-संकल्प मे विघ्न नं डालूँगी। मे यदि औऱ कोईमदद नहि कर सकती, तौ कम-सें-कम उनके रास्ता कां कंटक न् बनूँगी। ’
प्रेमा – ‘ऐसाकोई दुःख नहि हैं, जोँ व्यक्ति सह नं सके। वो जानते हें कि मुझे इससे दुःख नहि, हर्ष होगा, नहि तोँ वो कभीये इरादा नं करते। मे ऐसे सज्जन प्राणी कां उत्साह बढ़ाना अपना धर्म समझती हूं। उसे गृहस्थी मे नहि फँसाना चाहती। ’
प्रेमा – ‘तौ फिन उन्हें भि होगा। ’
प्रेमा – ‘तौ मे भि अपना हृदय कठोरबना लूँगी। ’
प्रेमा नें हारमोनियम सँभाला औऱ पूर्णा गानेलगी।
Pratigya - body-focused teasing – New Episode
काशी केँ आर्य-मंदिर मे पंडित अमरनाथ कां व्याख्यान होँ रहा थां। श्रोता लोग मंत्रमुग्ध सें बैठेसुन रहे थें। प्रोफेसर दाननाथ नें आगे खिसककर अपने साथी बाबू अमृतराय केँ कान मे कहा – ‘रटी हुईँ स्पीच हैं। ’ अमृतराय स्पीच सुनने मे तल्लीन थें। कुछ जवाब न् दिया।
अमृतराय नें फिन भि कुछ जवाब न् दिया। एक् क्षण केँ बाद दाननाथ नें फिनकहा – ‘भइया, मे तोँ जाता हूं। ’
दाननाथ – ‘तुम् कब तक बैठे रहोगे?’
दाननाथ – ‘बस, होँ निरे बुद्धू, अरे स्पीच मे हैं क्याँ? रटकर सुनारहा हैं। ’
दाननाथ – ‘अजी घंटों बोलेगा। राँड़ कां चर्खा हैं याँ स्पीच हैं। ’
दाननाथ – ‘पछताओगे। आज प्रेमा भि खेल मे आएगी। ’
दाननाथ – ‘मुझे क्याँ गरज पड़ी हैं जौ आपकीतरफ सें माफ़ माँगता फिरूँ। ’
दाननाथ इतनी आसानी सें छोड़ने वाले व्यक्ति न् थें। घड़ी निकाल कर देखी, पहलू बदला औऱ अमरनाथ कि ओर देखने लगे। उनका ध्यान व्याख्यान पर्र नहि, पंडित जी कि दाढ़ी पर्र थां। उसके हिलने मे उन्हें बड़ामजा आया। बोलने कां मर्ज थां। ऐसा मनोरंजक दृश्य देखकर वो चुप केसे रहते? अमृतराय कां हाथदबा करकहा – ‘आपकी दाढ़ी कितनी सफाई सें हिलरही हैं, जी चाहता हैं, नोचकर रखलूँ। ’
अमरनाथ जी नें कहा – ‘मे आपके सामने व्याख्यान देने नहि आया हूं। ’
अमरनाथ – ‘बातें बहोत होँ चुकीं, अबकाम करने कां वक्त हैं। ’
अमरनाथ – ‘आप् लोगों मे जिन महाशयों कों पत्नि-वियोग होँ चुका हैं, वो कृपया हाथ उठाएँ। ’
अमरनाथ – ‘आप् लोगों मे कितने महाशय ऐसे हें, जौ वैधव्य कि भँवर मे पड़ी हुईँ अबलाओं केँ संग अपने कर्तव्य कां पालन करने कां साहस रखते हें। कृपया वेहाथ उठाए रहें। ’
दाननाथ नें अमृतराय केँ कान मे कहा – ‘ये तुम् क्याँ कररहे होँ! हाथ नीचेकरो। ’
वक्ता नें कहा – ‘इतनी बड़ीसभा मे सिर्फ एक् हाथउठा देखता हूं। क्याँ इतनी बड़ीसभा मे सिर्फ एक् हि हृदय हैं, औऱ सभी पाषाण हें?’
दाननाथ – ‘मुझमें नक्कू बनने कां साहस नहि हैं। ’
सभा विसर्जित हौ गई। लोग अपने-अपने घऱचले। पंडित अमरनाथ भि विदाहुए। सिर्फ एक् मनुष्य अभि तक सिर झुकाए सभा-भवन मे बैठाहुआ थां। ये बाबू अमृतराय थें।
अमृतराय नें चौंककर कहा – ‘हाँ-हाँ, चलो। ’
दाननाथ केँ पेट मे चूहे दौड़रहे थें। बोले – ‘आज तुम्हें ये क्याँ सूझी। ’
दाननाथ – ‘प्रेमा सुनेगी तोँ क्याँ कहेगी?’
दाननाथ – ‘अजीजाओ भि, बातें बनाते होँ। उसे तुमसे कितना प्यार हैं, तुम् खूब जानते होँ। यद्यपि अभि शादी नहि हुआ, मगर साराशहर जानता हैं कि वो तुम्हारी मँगेतर हैं। सोचो, उसे तुम् कितनी बार प्यार-पत्र लिख चुके हौ। तीनसाल सें वो तुम्हारे नाम पर्र बैठी हुइ हैं। भले व्यक्ति, ऐसा रत्न तुम्हें संसार मे औऱ कहां मिलेगा? अगर तुमने उससे शादी नं किया तौ तुम्हारा जिंदगी नष्ट होँ जाएगा। तुम् कर्तव्य केँ नाम पऱ जौ चाहेकरो पर्र उसे अपने हृदय सें नहि निकाल सकते। ’
दाननाथ नें अमरनाथ कां नामआते हि नाक सिकोड़ करकहा – ‘क्याँ कहना हैं, वाउ!रट कर एक् व्याख्यान दे दिया औऱ तुम् लट्टू हौ गए। वो बेचारे समाज कि क्याँ खाक व्यवस्था करेंगे? ये अच्छा सिद्धांत हैं कि जिसकी पहलीऔरत मर गई होँ, वो विधवा सें शादीकरे!’
दाननाथ – ‘बस, तुम्हारे न्याय-पथ पर्र चलने हि सें तौ सारे संसार कां उद्धार हौ जाएगा। तुम् अकेले कुछ नहि कर सकते। हाँ, नक्कू बन सकते होँ!’
दाननाथ सरल स्वभाव केँ मनुष्य थें। जिंदगी केँ सरलतम रास्ता पर्र चलने हि मे वो संतुष्ट थें। किसी सिद्धांत याँ आदर्श केँ लिए कष्ट सहना उन्होंने न् सीखा थां। वो एक् कॉलेज मे अध्यापक थें। दसबजे कॉलेज जाते। एक् बजेलौट आते। बाकी सारादिन सैर-सपाटे औऱ हँसी-खेल मे काट देते थें।
दाननाथ ये लंबा व्याख्यान सुनकर बोले – ‘तोँ तुमने निश्चय कर लिया?’
दाननाथ – ‘औऱ प्रेमा?’
दाननाथ नें तिरस्कार-भाव सें कहा – ‘क्याँ बातें करते हौ। तुम् समझते होँ, प्रेमा कोई बाजार कां सौदा हैं, जी चाहा लिया, जी चाहा न् लिया। प्यार एक् बीज हैं, जोँ एक् बारजम करफिन बड़ी मुश्किल सें उखड़ता हैं। कभी-कभी तौ जल, प्रकाश औऱ वायु बिना हि जिंदगी पर्यंत जीवित रहता हैं। प्रेमा मात्र तुम्हारी मँगेतर नहि हैं, वो तुम्हारी प्रेमिका भि हैं। ये सूचना उसे मिलेगी तौ उसका हृदय भग्न हौ जाएगा। कह नहि सकता, उसकी क्याँ दशा होँ जाए। तुम् उस पऱ घोर अन्याय कररहे होँ। ’
बोले – ‘अगर वो उतनी हि सहृदय हैं, जितना मे समझता हूं, तोँ मेरी प्रतिज्ञा पऱ उसे दुःख न् होना चाहिए। मुझे विश्वास हैं कि उसेसुन कर हर्ष होगा, कम-सें-कम मुझेऐसी हि आशा हैं। ’
अमृतराय कां घर-मकान आँ गय़ा। टमटमरूक गय़ा। अमृतराय उतरकर अपने कमरे कि तरफचले। दाननाथ जरादेर तक प्रतीक्षा मे खड़ेरहे कि ये मुझे बुलावें तौ जाऊँ, पर्र जब अमृतराय नें उनकीतरफ फिनकर भि नं देखा, तौ उन्हें भयहुआ, मेरी बातों सें कदाचित इन्हें दुःखहुआ हैं। कमरे केँ दरवाज़ा पऱ जाकर बोले – ‘क्यूं भइया, मुझसे नाराज हौ गए क्याँ?’
दाननाथ नें स्नेह सें अमृतराय कां हाथ पकड़ लिया औऱ बोले – ‘फिनसोच लो, ऐसा नं होँ पीछे पछताना पड़े। ’
ये संकेत किसकी ओर थां, दाननाथ सें छिपा नं रहसका। जब अमृतराय कि पहलीऔरत जीवित थि, उसी वक़्त दाननाथ सें प्रेमा केँ शादी कि बातचीत हुइ थि। जब प्रेमा कि बेहन कां देहांत होँ गय़ा तोँ उसके पिता लाला बदरीप्रसाद नें दाननाथ कि ओर सें मुँहफेर लिया। दाननाथ विद्या, धन औऱ प्रतिष्ठा किसीबात मे भि अमृतराय कि बराबरी नं कर सकते थें। सबसे बड़ीबात ये थि कि प्रेमा भि अमृतराय हि कि ओर झुकी हुई मालूम होती थि। दाननाथ इतने उदासहुए कि आजीवन अविवाहित रहने कां निश्चय कर लिया। दोनों मित्रों मे किसी प्रकार कां द्वेष-भाव न् आया। दाननाथ यों देखने मे तौ नित्य प्रसन्नचित्त रहते थें, मगर वास्तव मे वो संसार सें विरक्त सें होँ गए थें। उनका जिंदगी हि खुशी-विहीन होँ गय़ा थां। अमृतराय कों अपने प्रिय साथी कि आंतरिक व्यथा देख-देख कर दुःख होता थां। वो अपने चित्त कों इस परीक्षा केँ लिए महीनों सें सजधजकर कररहे थें। किंतु प्रेमा-जैसी अनुपम सुंदरी कां त्याग करना आसान न् थां। ऐसीदशा मे अमृतराय कि यह बातें सुनकर दाननाथ कां हृदयआशा सें पुलकित हौ उठा। जिस आशा कों उन्होंने हृदय कों चीरकर निकाल डाला थां, जिसकी इस जिंदगी मे वो कल्पना भि न् कर सकते थें, जिसकी आखिरी ज्योति बहोत दिनहुए शांत होँ चुकी थि, वहीआशा आज उनके मर्मस्थल कों चंचल करनेलगी। इसकेसंग हि अमृतराय केँ देवोपम त्याग नें उन्हें वशीभूत कर लिया। वो गदगदकंठ सें बोले – ‘क्याँ इसीलिए तुमने आज प्रतिज्ञा कर डाली?अगर वो साथी तुम्हारी इस उदारता सें लाभ उठाए, तोँ मे कहूँगा वो साथी नहि, शत्रु हैं औऱ यही क्याँ निश्चय हैं कि इसदशा मे प्रेमा कां शादी तुम्हारे उसी साथी सें होँ?’
दाननाथ नें तिरस्कार कां भाव धारण करकेकहा – ‘तुम् उसे इतनानीच समझना चाहते हौ, तौ समझलो, मगर मे कहे देता हूं कि यदि मे उस साथी कां ठीक अनुमान करसका हूं, तौ वो अपने बदले तुम्हें निराशा कि भेंट न् होने देगा। ’
ये कहतेहुए दाननाथ बाहर् निकलआए औऱ अमृतराय दरवाज़ा पऱ खड़े, उन्हें रोकने कि ख़्वाहिश होने पऱ भि बुला न् सके।
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होली कां दिनआया। पंडित वसंत कुमार केँ लिएये भंग पीने कां दिन थां। महीनों पहले सें भंग मँगवा रखी थि। अपने मित्रों कों भंग पीने कां नेवता दे चुके थें। सवेरे उठते हि पहलाकाम जौ उन्होंने किया, वो भंग धोना थां।
सहसा बाबू कमलाप्रसाद आँ पहुँचे। ये जमघटदेख कर बोले – ‘क्याँ होँ रहा हैं? भई, हमारा हिस्सा भि हैं न्?’
कमलाप्रसाद – ‘अजी मीठी पिलाओ, नमकीन क्याँ? मगर दोस्त, केसर औऱ केवड़ा जरूर होँ, किसी कों भेजिए मेरेयहा सें लें आए। किसी लौंडे कों भेजिए जोँ मेरेघऱ जाकर प्रेमा सें माँगलाए। कहीं धर्मपत्नी जी केँ पास नं चलाजाए, नहि तोँ मुफ्त गालियाँ मिलें। त्योहार केँ दिन उनका मिजाज गर्म होँ जाया करता हैं। दोस्त वसंत कुमार, धर्मपत्नियों कों प्रसन्न रखने कां कोई आसान नुस्खा बताओ। मे तोँ तंग आँ गय़ा। ’
कमलाप्रसाद – ‘तौ दोस्त, तुम् बड़े भाग्यवान होँ। क्याँ पूर्णा तुमसे कभी नहि रूठती?’
कमलाप्रसाद – ‘कभी किसीचीज केँ लिएहठ नहि करती?’
कमलाप्रसाद – ‘तौ दोस्त, तुम् बड़े भाग्यवान हौ। यहा तौ उम्रकैद हौ गई हैं। अगर घड़ीभर भि घऱ सें बाहर् रहूँ, तौ जवाब-तलब होनेलगे। सिनेमा रोज जाता हूं औऱ रोज घंटों मनावन करनी पड़ती हैं। ’
कमलाप्रसाद – ‘वाउवाउ! ये तौ तुमने खूबकही। शपथ अल्लाह पाक कि, खूबकही। जिसकल वो बिठाए, उसकलबैठ जाऊँ?फिन झगड़ा हि नं हौ, क्यूं? अच्छी बात हैं। कलदिन भरघऱ सें निकलूँगा हि नहि, देखूँ तब क्याँ कहती हैं। देखा, अब तक लौंडा केसर औऱ केवड़ा लें कर नहि लौटा। कान मे भनकपड़ गई होगी, प्रेमा कों मनाकर दिया होगा। भइया, अब तोँ नहि रहा जाता, आज जौ कोई मेरे मुँहलगा तोँ बुरा होगा। मे अभि जाकरसभी चीजें भेज देता हूं। मगरजब तक मे नं आऊँ, आप् नं बनवाइएगा। यहाइस फन केँ उस्ताद हें। मौरूसी बात हैं। दादाजी तोलेभर कां ब्रेकफास्ट करते हें। उम्र मे कभी एक् दिन कां भि नागा नहि किया। मगर क्याँ मजाल कि नशा होँ जाए। ’
पूर्णा नें उबटन एक् प्याली मे उठाते हुएकहा -’ ये देखो, मे तोँ पहले हि सें बैठी हुई हूं। ’
पूर्णा – ‘पहलेजरा यहा आँ करबैठ जाव, उबटन तोँ मलदूँ, फिन नहाने जानां। ’
पूर्णा – ‘वाउ, उबटन क्यूं न् मलवाओगे? आज कि तोँ ये रीति हैं, आकेबैठ जाव। ’
पूर्णा नें लपककर उनकाहाथ पकड़ लिया औऱ उबटनभरा हाथ उनकीदेह मे पोत दिया। तब बोलीं -’सीधे सें कहती थि, तोँ नहि मानते थें अब तोँ बैठोगे। ’
पूर्णा – ‘अब गंगाजी कहां जाओगे। यहींनहा लेना।। ’
पूर्णा – ‘अच्छा, तौ जल्दलौट आनां, ये नहि कि इधर-उधर तैरने लगो। नहाते वक़्त तुम् बहोत दूरतैर जाया करते हौ। ’
मगरवहा जाकर देखा तौ फूल इतनी हि दूर औऱ आगे थें। अबकुछ थकान मालूम होनेलगी थि, किंतु बीच मे कोईरेत ऐसा न् थां कि जिस पर्र बैठकर दम लेते। आगे बढ़ते हि गए। कभी हाथों सें जोर मारते, कभी पैरों सें जोर लगाते फूलों तक पहुँचे। पऱ, उस टाइम तक सारेअंग शिथिल हौ गए थें। यहा तक कि फूलों कों लेने केँ लिएजब हाथ लपकाना चाहा, तोँ हाथ नं उठसका। आखिर उनको दाँतों मे दबाया औऱ लौटे। मगर, जबवहा सें उन्होंने किनारे कि तरफ देखा तोँ ऐसा मालूम हुआ, मानो एक् हजारकोस कि मंजिल हैं। जिस्म बिल्कुल अशक्त हौ गय़ा थां औऱ जल-प्रवाह भि प्रतिकूल थां। उनकी हिम्मत छूट गई। हाथ-पाँव ढीलेपड़ गए। आस-पास कोईनाव याँ डोंगी नं थि औऱ न् किनारे तक आवाज़ हि पहुँच सकती थि। समझगए, यहीं जल-समाधि होगी। एक् क्षण केँ लिए पूर्णा कि यादआई। हाय, वो उनकीबाट देखरही होगी, उसे क्याँ मालूम कि वो अपनी जिंदगी-लीला खत्मकर चुके। वसंत कुमार नें एक् बारफिन जोर मारा, पर्र हाथ पाँवहिल नं सके। तब उनकी आँखों सें आँसू बहनेलगे। तट पऱ लोगों नें डूबते देखा। दो-चार व्यक्ति पानी मे कूदे, पर्र एक् हि क्षण मे वसंत कुमार लहरों मे समागए। सिर्फ कमल केँ फूल पानी पऱ तैरते रहगए, मानोउस जिंदगी कां अंत होँ जाने केँ बाद उसकी अतृप्त लालसा अपनी रक्त-रंजित छटा दिखारही होँ।
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