Pratigya - body-focused teasing – New Episode
लाला बदरीप्रसाद केँ लिए अमृतराय सें अबकोई संसर्ग रखना असंभव थां, शादी तोँ दूसरी बात थि। समाज मे इतनेघोर अनाचार कां पक्ष लें कर अमृतराय नें अपने कों उनकी नजरों सें गिरा दिया। उनसेअब कोई संबंध करना बदरीप्रसाद केँ लिए कलंक कि बात थि। अमृतराय केँ बाद दाननाथ सें उत्तम वर उन्हें कोई औऱ न् दिखाई दिया। ज़्यादा खोज-पूछ करने कां अब वक्त भि न् थां। अमृतराय केँ प्रतीक्षा मे पहले हि बहोत बिलंब होँ चुका थां, बिरादरी मे लोग उँगलियाँ उठाने लगे थें। नए संबंध कि खोज मे शादी केँ एक् अनिश्चित वक्त तक टल जाने कां भय थां। इसलिये मन इधर-उधर न् दौड़ा कर उन्होंने दाननाथ हि सें बात पक्की करने कां निश्चय कर लिया। देवकी नें भि कोई आपत्ति नं कि। प्रेमा नें इस विषय मे उदासीनता प्रकट कि। अब उसकेलिए सब पुरुष समान थें, वो किसी केँ संग जिंदगी कां निर्वाह कर सकती थि। उसकी चलती तोँ वो अविवाहिता हि रहना मनपसंद करती, पर्र जवान लड़की बैठीरहे, येकुल केँ लिएघोर अपमान कि बात थि। इस विषय मे किसी प्रकार कां दुराग्रह करके वो माँ-बाप कां दिल न् दुखाना चाहती थि। जिसदिन अमृतराय नें वो भीषण प्रतिज्ञा कि, उसीदिन प्रेमा नें समझ लिया कि अब जिंदगी मे मेरेलिए सुखलोप होँ गय़ा, पर्र अविवाहिता रहकर अपनी हँसी कराने कि अपेक्षा किसी कि हौ कर रहना कहीं सुलभ थां। आज दो-तीन साल पहले दाननाथ हि सें उसके शादी कि बातचीत हौ रही थि, ये वो जानती हि थि बीच मे परिस्थिति नं बदल गई होती, तोँ आज वो दाननाथ केँ घऱ होती। दाननाथ कों वो कईबार देख चुकी थि। वो रसिक हें, सज्जन हें, विद्वान हें, येउसे मालूम थां। उनकी सच्चरित्रता पर्र भि किसी कों संदेह न् थां, देखने मे भि बहोत हि सजीले-गठीले व्यक्ति थें। ब्रह्मचर्य कि कांति मुख पऱ झलकती थि। उससे उन्हें प्यार थां, ये भि उससे छिपा न् थां। आँखें हृदय केँ भेदखोल हि देती हें। अमृतराय नें हँसी-हँसी मे प्रेमा सें इसकी चर्चा भि कर दि थि। येसभी होतेहुए प्रेमा कों इनका जौ कुछ खयाल थां, वो इतना हि थां कि वो अमृतराय केँ गहरेयार हें। उनमें बड़ी घनिष्ठता हैं। वो धनी नहि थें, पऱ येकोई ऐब नं थां, क्योंकि प्रेमा विलासिनी नं थि। क्यूं उसकामन अमृतराय कि ओर बढ़ता थां औऱ दाननाथ कि ओर सें खिंचता थां, इसकाकोई कारण वो स्पष्ट नहि कर सकती थि, पर्र इस परिस्थिति मे उसकेलिए औऱ कोई उपाय नहि थां। फिन भि अब तक उसने दाननाथ कों कभीइस दृष्टि सें नं देखा थां। उसनेमन मे एक् संकल्प कर लिया थां। अब हृदय मे वो जगह खाली होँ जाने केँ बाद दाननाथ कों वहा प्रतिष्ठित करने मे उसे क्षोभ नहि हुआ। उसनेमन कों टटोलकर देखा, तोँ उसेऐसा मालूम हुआ कि वो दाननाथ सें प्यार भि कर सकती हैं। बदरीप्रसाद शादी केँ विषय मे उसकी अनुमति आवश्यक समझते थें। कितनी हि बातों मे वो बहोत हि उदार थें। प्रेमा कि अनुमति पाते हि उन्होंने दाननाथ केँ पास पैगाम भेज दिया।
अंत मे बहोत सोचने-विचारने केँ बाद उन्होंने यही स्थिर किया कि एक् बार अमृतराय कों फिन टटोलना चाहिए। यदिअब भि उनकामत वो बदलसके, तौ उन्हें मजा हि होगा, इसमें कोई संदेह न् थां। जिंदगी कां सुख तोँ अभिलाषा मे हैं। ये अभिलाषा पूरी हुइ, तौ कोई दूसरी खड़ी होगी। जब एक्-नं-एक् अभिलाषा कां रहना निश्चित हैं, तौ यही क्यूं नं रहे? इससे हसीन, आनंदप्रद औऱ कौन-सि अभिलाषा होँ सकती हैं? इसके सिवाये भय भि थां कि कहीं जिंदगी कां ये अभिनय वियोगांत न् होँ। प्रथम प्यार कितना अमिट होता हैं, ये वो खूब जानते थें।
प्रकाश कि एक् सूक्ष्म रेखाचिक मे प्रवेश करती हुईँ अमृतराय केँ मुख पऱ पड़ी। अमृतराय चौंक पड़े। वो मुख पीतवर्ण हौ रहा थां। आठ-दसदिन पहले जौ कांति थि, उसका कहींनाम तक न् थां। घबराकर कहा – ‘ये तुम्हारी क्याँ दशा हैं? कहींलू तौ नहि लग गई? कैसी तबीयत हैं?’
दाननाथ हँस पड़े, पऱ अमृतराय कों हँसी नहि आई। गंभीर स्वर मे बोले – ‘सारी दुनिया केँ सिद्धांत चाटे बैठे होँ, अभि स्वास्थ्य-रक्षा पऱ बोल्ना पड़े तौ इस विषय केँ पंडितों कों भि लज्जित कर दोगे, पर्र इतना नहि होँ सकता कि साम कों सैर हि कर लियाकरो। ’
इन उच्छृंखल शब्दों मे विनोद केँ संग कितनी आत्मीयता, कितना प्रगाढ़ स्नेह भराहुआ थां कि दोनों हि मित्रों कि आँखें सजल होँ गईं। दाननाथ तोँ मुस्करा पड़े, मगर अमृतराय कां मुख गंभीर हौ गय़ा। दाननाथ तोँ हँसमुख थें, पऱ विनोद कि शैली किसी मर्मांतक वेदना कां पतादे रही थि।
अमृतराय नें ये प्रसंग छेड़कर दाननाथ पऱ बड़ा एहसान किया, नहि तोँ वो यहा घंटों गपशप करते रहने पऱ भि ये सवालमुख पर्र नं ला सकते। अब भि उनकेमुख केँ भाव सें कुछऐसा जान पड़ा कि ये प्रसंग व्यर्थ छेड़ा गय़ा। बड़े संकोच केँ संग बोले – ‘हाँ, संदेशा तौ आया हैं, पर्र मैंने जवाबदे दिया। ’
दाननाथ – ‘जोँ मेरेजी मे आया। ’
‘यही कि, मुझे स्वीकार नहि हैं। ’
‘नहि, येबात नहि मे स्वयं उसके योग्य नहि हूं। ’
दाननाथ नें बिजली कां बटन दबाते हुएकहा – ‘तुम् इसकाम कों जितना आसान समझते हौ, उतना आसान नहि हैं। कम-सें-कम मेरेलिए। ’
दाननाथ अब भि निश्चिंत नहि हुए थें। उनकेमन मे, एक् नहि सैकड़ों बाधाएँ आँ रहीथीं। इसभय सें कि येनई शंकासुन कर अमृतराय हँस न् पड़े, वो खुदहँस कर बोले – ‘मुझ जैसे लफंगे कों प्रेमा स्वीकार करेगी, ये भि ध्यान मे आया हैं जनाब केँ?’
दाननाथ चिंता मे डूबगए। यद्यपि उनकी शंकाओं कां प्रतिकार होँ चुका थां, पर्र अब भि उनकेमन मे ऐसी अनेक बातें थीं। जिन्हें वे प्रकट न् कर सकते थें। उनकारूप अलक्षित, अव्यक्त थां। शंका तर्क सें कट जाने पर्र भि निर्मूल नहि होती। साथी सें बेवफाई कां खयाल उनकेदिल मे कुछइस तरहछिप कर बैठाहुआ थां कि उस पऱ कोईवार होँ हि नहि सकता थां।
दाननाथ खिड़की केँ सामने खड़े सिगरेट पीरहे थें। पूछा – ‘कैसाखत हैं?’
‘तुम् मेरी गरदन पऱ छुरीचला रहे होँ। ’
‘तोँ गोली हि क्यूं न् मारदो कि हमेशा कां झंझटमिट जाए। ’
ये धमकी अपनाकाम कर गई। दाननाथ नें पत्र पर्र हस्ताक्षर कर दिया औऱ तब बिगड़ कर बोले – ‘देख लेना मे आज संखिया खा लेता हूं कि नहि। ये पत्ररखा हि रह जाएगा। ‘सबेरे रामनाम सत्त होगी। ’
तब अमृतराय नें हँसकर कहा- ‘संखिया न् हौ, तौ मे दे दूँगा। एक् बार किसीदवा मे डालने केँ लिए मँगवाई थि। ’
अमृतराय अपनी हँसी कों न् रोकसके।
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लाला बदरीप्रसाद कों दाननाथ कां पत्र क्याँ मिला आघात केँ संग हि अपमान भि मिला। वो अमृतराय कि लिखावट पहचानते थें। उस पत्र कि सारी नम्रता, विनय औऱ प्रण, उस लिपि मे लोप हौ गए। मारे गुस्सा केँ उनका मस्तिष्क खौलउठा। दाननाथ केँ हाथ क्याँ टूटगए, जोँ उसने अमृतराय सें ये पत्र लिखाया। क्याँ उसके पाँव मे मेंहदी लगी थि, जोँ यहा तक न् आँ सकता थां? औऱ ये अमृतराय भि कितना निर्लज्ज हैं। वो ऐसा पत्र केसेलिख सकता हैं! जरा भि लज्जा नहि आई।
लाला दाननाथ जी, आपने अमृतराय सें ये पत्र लिखाकर मेरा औऱ प्रेमा कां जितना आदर किया हैं, उसका आप् अनुमान नहि कर सकते। उचित तोँ यही थां कि मे उसे फाड़कर फेंक देता औऱ आपकोकोई जवाब न् देता, मगर…
बदरीप्रसाद नें कागज कि ओरसिर झुकाए हुएकहा – ‘अमृतराय कां कोईखत नहि आया। ’
बदरीप्रसाद – ‘हाँ, व्यक्ति तोँ उन्हीं कां थां, पर्र खत दाननाथ कां थां। उसी कां जवाबलिख रहा हूं। महाशय नें अमृतराय सें खत लिखाया हैं औऱ नीचे अपने दस्तखत करदिए हें। अपनेहाथ सें लिखते लज्जा आती थि, बेहूदा, शोहदा…’
बदरीप्रसाद- ‘ये पड़ा तौ हैं, देख क्यूं नहि लेती?’
बदरीप्रसाद – ‘तोँ देखो। अभि तोँ शुरुआत किया हैं। ऐसीखबर लूँगा कि बच्चा सारा शोहदापन भूलजाए। ’
बदरीप्रसाद नें कड़ककर पूछा – ‘फाड़ क्यूं दिया। तुम् कौन होती हौ मेराखत फाड़नेवाली?’
बदरीप्रसाद – ‘हाँ औऱ क्याँ, लड़की तोँ तुम्हारी हैं, मेरी तौ कोई होती हि नहि। ’
बदरीप्रसाद – ‘दुनिया योग्य वरों सें खाली नहि, एक्-सें-एक् पड़ेहुए हें। ’
बदरीप्रसाद – ‘उसने अपनेहाथ सें क्यूं खत नहि लिखा? मेरा तौ यही कहना हैं। क्याँ उसे इतना भि मालूम नहि कि इसमें मेरा कितना अनादर हुआ? सारी परीक्षाएँ तौ पासकिए बैठा हैं। डॉक्टर भि होनेजा रहा हैं, क्याँ उसको इतना भि नहि मालूम? स्पष्ट बात हैं दोनों मिलकर मेरा अपमान करना चाहते हें। ’
बदरीप्रसाद नें हँसकर कहा – ‘मे तुम्हें तलाश करने गय़ा थां। ’
बदरीप्रसाद नें झेंपते हुएकहा – ‘इतना तौ मे भि समझता हूं, क्याँ ऐसा गँवार हूं?’
बदरीप्रसाद – ‘मुझेअब ये अफसोस हौ रहा हैं कि पहले दानू सें क्यूं न् शादीकर दिया। इतने दिनों तक व्यर्थ मे अमृतराय कां मुँह क्यूं ताकता रहा। आखिरवही करना पड़ा। ’
बदरीप्रसाद – ‘मगर प्रेमा उसे स्वीकार करेगी, पहलेये तौ निश्चय करलो। ऐसा न् होँ, मे यहा हामीभर लूँ औऱ प्रेमा इनकार कर लेँ। इस विषय मे उसकी अनुमति लेँ लेनी चाहिए। ’
बदरीप्रसाद – ‘अच्छा, तभी तुम् बार-बार मैके जाया करती थि। अब समझा। ’
बदरीप्रसाद – ‘तुमने अपनीबात कह डाली, तोँ मे भि कहे डालता हूं, मेरा भि एक् मुसलमान लड़की सें प्यार हौ गय़ा थां। मुसलमान होने कों रेडी थां। रंगरूप मे अप्सरा थि, तुम् उसके पैरों कि धूल कों भि नहि पहुँच सकती। मुझेअब तक उसकीयाद सताया करती हैं। ’
बदरीप्रसाद – ‘जरा प्रेमा कों बुलालो, पूछ लेना हि अच्छा हैं। ’
बदरीप्रसाद – ‘रो-रोकर प्राण तौ न् दे देगी। ’
बदरीप्रसाद – ‘अच्छा, मे हि एक् बार उससे पूछूँगा। इन पढ़ी-लिखी लड़कियों कां स्वभाव कुछ औऱ होँ जाता हैं। अगर उनके प्यार औऱ कर्तव्य मे विरोध हौ गय़ा, तौ उनका समस्त जिंदगी दुःखमय हौ जाता हैं। वे प्यार औऱ कर्तव्य पर्र उत्सर्ग करना नहि जानती याँ नहि चाहती। हाँ, प्यार औऱ कर्तव्य मे संयोग हौ जाए, तोँ उनका जिंदगी आदर्श होँ जाता हैं। ऐसा हि स्वभाव प्रेमा कां भि जान पड़ता हैं। मे दानू कों लिखे देता हूं कि मुझेकोई आपत्ति नहि हैं, मगर प्रेमा सें पूछकर हि निश्चय कर सकूँगा। ’
बदरीप्रसाद नें जरा माथा सिकोड़ कर पूछा – ‘कमाने कां ढंग कैसा, मे नहि समझा?’
बदरीप्रसाद – ‘पचास हि हजार बनाए, तौ क्याँ बनाए, मे तौ समझता हूं, एक् लाख सें कम पऱ हाथ न् मारेंगे। ’
बदरीप्रसाद – ‘जाकरकुछ दिनों उनकी शागिर्दी करो, इसके सिवा औऱ कोई उपाय नहि हैं। ’
बदरीप्रसाद – ‘जरा भि नहि। तुम् कभीझूठ बोले हि नहि, भलाआज क्यूं झूठ बोलने लगे। सत्य केँ अवतार तुम्हीं तौ होँ। ’
कमलाप्रसाद – ‘अच्छा, मे हि झूठासही, इसमें झगड़ा काहे कां, थोड़े दिनों मे आपकीकलई खुल जाएगी। आप् जैसेसरल जीव संसार मे नं होते तोँ ऐसे धूर्तों कि थैलियाँ कौन भरता?’
कमलाप्रसाद – ‘यहाइन बातों सें नहि डरते। लगी-लिपटी बातें करना भाता हि नहि। कहूँगा सत्य हि, चाहे किसी कों अच्छा लगे याँ बुरा। वो हमारा अपमान करते हें, तोँ हम् उनकी पूजा नं करेंगे। आखिर वो हमारे कौन होते हें, जौ हम् उनकी करतूतों पर्र परदा डालें? मे तोँ उन्हें इतना बदनाम करूँगा कि वो शहर मे किसी कों मुँह नं दिखा सकेंगे। ’
बदरीप्रसाद नें विस्मित होँ करकहा – ‘दाननाथ! वो भला क्यूं अमृतराय पऱ आक्षेप करनेलगा। उससे जैसे मैत्री हैं, वैसी तोँ मैंने औऱ कहीं देखी नहि। ’
बदरीप्रसाद – ‘कमलाप्रसाद कहते थें?’
बदरीप्रसाद – ‘कमलाप्रसाद झूठबोल रहा हैं, सरासर झूठ! दानू कों मे खूब जानता हूं। उसका-सां सज्जन बहोत कम मैंने देखा हैं। मुझे तौ विश्वास हैं कि आज अमृतराय केँ हित केँ लिए प्राण देने कां अवसर आँ जाए, तोँ दानूशौक सें प्राण दे देगा। व्यक्ति क्याँ हीरा हैं। मुझसे जब मिलता हैं, बड़ी नम्रता सें चरणछू लेता हैं। ’
बदरीप्रसाद – ‘अबकी डॉक्टर होँ जाएगा।
पत्र कां आशय क्याँ हैं, प्रेमा इसे जल्दी घूर गई। उसका हृदयजोर सें धड़कने लगा। उसने काँपते हुए हाथों सें पत्र लेँ लिया पऱ कैसा रहस्य! लिखावट तौ साफ अमृतराय कि हैं। उसकी आँखें भरआईं। लिखावट पऱ ये लिपिदेख कर एक् दिन उसका हृदय कितना फूल उठता थां। पर्र आज!वही लिपि उसकी आँखों मे काँटों कि भाँति चुभने लगी। एक्-एक् अक्षर, बिच्छू कि भाँति हृदय मे डंक मारने लगा। उसने पत्र निकाल कर देखा – वही लिपि थि, वही चिर-परिचित हसीन स्पष्ट लिपि, जौ मानसिक शांति कि द्योतक होती हैं। पत्र कां आशयवही थां, जोँ प्रेमा नें समझा थां। वो इसकेलिए पहले हि सें सजधजकर थि। उसको निश्चय थां कि दाननाथ इस अवसर पऱ नं चूकेंगे। उसनेइस पत्र कां जवाब भि पहले हि सें सोचरखा थां, शुक्रिया केँ संगसाफ इनकार। पऱ ये पत्र अमृतराय कि कलम सें निकलेगा, इसकी संभावना हि उसकी कल्पना सें बाहर् थि। अमृतराय इतने हृदय-शून्य हें, इसकाउसे गुमान भि नं होँ सकता थां। वही हृदय जौ अमृतराय केँ संग विपत्ति केँ कठोरतम आघात औऱ बाधाओं कि दुस्सह यातनाएँ सहन करने कों रेडी थां, इस अवहेलना कि ठेस कों न् सहसका। वो अतुल प्यार, वो असीम भक्ति जौ प्रेमा नें उसमें बरसों सें संचित कररखी थि, एक् दीर्घ शीतल विश्वास केँ रूप मे निकल गई। उसेऐसा जान पड़ा मानो उसके संपूर्ण अंग शिथिल होँ गए हें, मानो हृदय भि निस्पंद हौ गय़ा हैं, मानो उसका अपनी वाणी पर्र लेशमात्र भि अधिकार नहि हैं। उसकेमुख, सें यह शब्द निकल पड़े – ‘आपकी जौ ख़्वाहिश हौ वो कीजिए, मुझेसभी स्वीकार हैं। वो कहनेजा रही थि – जब कुएँ मे गिरना हैं, तोँ जैसे पक्का वैसे कच्चा, उसमें कोईभेद नहि। पर्र जैसे किसी नें उसे सचेतकर दिया। वो जल्दी पत्र कों वहीं फेंककर अपने कमरे मे लौटआई औऱ खिड़की केँ सामने खड़ी हौ कर फूट-फूट कर रोनेलगी। ’
संध्या हौ गई थि। आकाश मे एक्-एक् करके तारे निकलते आते थें। प्रेमा केँ हृदय मे भि उसी प्रकार एक्-एक् करके स्मृतियाँ जागृत होने लगीं। देखते-देखते सारा गगन-मंडल तारों सें जगमगा उठा। प्रेमा कां हृदयाकाश भि स्मृतियों सें आच्छन्न होँ गय़ा, पर्र इन असंख्य तारों सें आकाश कां अंधकार क्याँ औऱ भि गहन नहि हौ गय़ा थां?
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वैशाख मे प्रेमा कां शादी दाननाथ केँ संग हौ गय़ा। विवाह बड़ी धूम-धाम सें हुईँ। सारेशहर केँ रईसों कों निमंत्रित किया। लाला बदरीप्रसाद नें दोनों हाथों सें रुपए लुटाए। मगर दाननाथ कि ओर सें कोई तैयारी न् थि। अमृतराय चंदा करने केँ लिए बिहार कि ओरचले थें औऱ ताकीद करगए थें कि धूम-धाम मत करना। दाननाथ उनकी ख़्वाहिश कि अवहेलना केसे करते।
पूर्णा केँ आने सें कमलाप्रसाद औऱ सुमित्रा एक्-दूसरे सें औऱ पृथक हौ गए। सुमित्रा केँ हृदय पर्र लदाहुआ बोझा उठ-सां गय़ा। कहां तौ वो दिन-ब-दिन विरक्तावस्था मे बिस्तर पर्र पड़ी रहती थि, कहां अब वो हरदम हँसती-बोलती रहती थि, कमलाप्रसाद कि उसने परवाह हि करना छोड़ दि। वो कबघऱ मे आता हैं, कब जाता हैं, कब खाता हैं, कब सोता हैं, उसकीउसे जरा भि फिक्र न् रही। कमलाप्रसाद लंपट नं थां। सबकीयही धारणा थि कि उसमें चाहे औऱ कितने हि दुर्गुण हों, पऱ येऐब न् थां। किसीऔरत पऱ ताक-झाँक करतेउसे किसी नें न् देखा थां। फिन पूर्णा केँ रूप नें उसे केसे मोहित कर लिया, ये रहस्य कौनसमझ सकता हैं। कदाचित पूर्णा कि सरलता, दीनता औऱ आश्रय-हीनता नें उसकी कुप्रवृत्ति कों जगा दिया। उसकी कृपणता औऱ कायरता हि उसके सदाचार कां आधार थि। विलासिता महँगी वस्तु हैं। जेब केँ रुपए खर्च करके भि किसीआफत मे फँस जाने कि जहाँ प्रतिक्षण संभावना हौ, ऐसेकाम मे कमलाप्रसाद जैसा चतुर व्यक्ति नं पड़ सकता थां। पूर्णा केँ विषय मे कोईभय नं थां। वो इतनीसरल थि कि उसे काबू मे लाने केँ लिए किसी बड़ी साधना कि जरूरत न् थि औऱ फिनयहा तोँ किसी कां भय नहि, न् फँसने कां भय, न् पिट जाने कि शंका। अपनेघऱ लाकर उसने शंकाओं कों निरस्त कर दिया थां। उसने समझा थां, अब रास्ता मे कोई बाधा नहि रही। मात्र घरवालों कि आँखबचा लेना बहुत थां औऱ येकुछ कठिन न् थां, किंतु यहा भि एक् बाधा खड़ी हौ गई औऱ वो सुमित्रा थि।
सुमित्रा नें कहा – ‘अकेली पड़ी-पड़ी क्याँ करूँ?फिन ये भि तौ अच्छा नहि लगता कि मे धीरे-धीरे सोऊँ औऱ वो अकेली रोयाकरे। उठना भि चाहती हूं, तौ चिमट जाती हैं, छोड़ती हि नहि। मन मे मेरी बेवकूफी पर्र हँसती हैं याँ नहि येकौन जाने; मेरासंग उसे अच्छा नं लगता हौ, येबात नहि। ’
‘मे ऐसा नहि समझती। ’
‘ऐसीसमझ कां नं होना हि अच्छा हैं। ’
कमलाप्रसाद केँ चरित्र मे अब एक् विचित्र परिवर्तन होता जाता थां। नौकरों पर्र डाँट-फटकार भि कम हौ गई। कुछ उदार भि होँ गय़ा। एक् दिन बाजार सें बंगाली मिठाई लाए औऱ सुमित्रा कों देतेहुए कहा – ‘जरा अपनीसखी कों भि चखाना। सुमित्रा नें मिठाई लेँ ली; पऱ पूर्णा सें उसकी चर्चा तक नं कि। ’ दूसरे दिन कमलाप्रसाद नें पूछा – ‘पूर्णा नें मिठाई मनपसंद कि होगी?’ सुमित्रा नें कहा – ‘बिल्कुल नहि, वो तोँ कहती थि, मुझे मिठाई सें कभी प्यार नं रहा। ’
कमलाप्रसाद नें कहा – ‘अरे! पूर्णा भि यहीं हैं। माफ़ करना पूर्णा, मुझे मालूम न् थां। ये देखो सुमित्रा दो साड़ियाँ लाया हूं। सस्ते दामों मे मिलगईं। एक् तुम् लें लो, एक् पूर्णा कों देदो। ’
पूर्णा नें सिर हिलाकर कहा – ‘नहि, मे रेशमी साड़ी लें कर क्याँ करूँगी। ’
सुमित्रा – ‘छूत कि चीज नहि; पऱ शौक कि चीज तौ हैं। सबसे पहले तोँ तुम्हारी पूज्य माताजी हि छाती पीटने लगेंगी। ’
सुमित्रा – ‘बहोत अच्छी हें, तौ प्रेमा केँ पासभेज दूँ। तुम्हारी बेसाही हुई साड़ी पाकर अपना क़िस्मत सराहेगी। मालूम होता हैं, आजकल कहींकोई रकम मुफ्त हाथ आँ गई हैं। सच कहना, किसकी गर्दन रेती हैं। गाँठ केँ रूपए खर्च करके तुम् ऐसी फिजूल कि चीजें कभी नं लाए होगे। ’
सुमित्रा – ‘माँगते तोँ वो यों हि दे देते, तिजोरी तोड़ने कि नौबत न् आती। मगर स्वभाव कों क्याँ करो। ’
पूर्णा कों सुमित्रा कि कठोरता बुरी मालूम हौ रही थि। एकांत मे कमलाप्रसाद सुमित्रा कों जलाते हों, पऱ इस वक्त तोँ सुमित्रा हि उन्हें जलारही थि। उसेभय हुआ कि कहीं कमलाप्रसाद मुझसे नाराज हौ गए, तौ मुझेइस घऱ सें निकलना पड़ेगा। कमलाप्रसाद कों अप्रसन्न करकेयहा एक् दिन भि निबाह नहि होँ सकता, ये वो जानती थि। इसलिये वो सुमित्रा कों समझाती रहती थि। बोलि – ‘मे तोँ बराबर समझाया करती हूं, बाबूजी पूछ लीजिए झूठ कहती हूं?’
कमलाप्रसाद – ‘तुम् व्यर्थ बात बढ़ाती होँ, सुमित्रा! मे येकब कहता हूं कि तुम् इनकेसंग उठना-बैठना छोड़दो, मैंने तोँ ऐसीकोई बात नहि कही। ’
कमलाप्रसाद – ‘कुछझूठ कहरहा हूं? पूर्णा स्वयं देखरही हें। तुम्हें उनके सत्संग सें कुछ शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए थि। इन्हें यहा लाने कां मेरा एक् उद्येश्य ये भि थां। मगर तुम्हारे ऊपर इनकी सोहब्बत कां उल्टा हि असरहुआ। ये बेचारी समझाती होगीं, मगर तुम् क्यूं मानने लगीं। जब तुम् मुझी कों नहि गिनतीं, तौ वो बेचारी किस गिनती कि हें। ईश्वर सभी दुःखदे, पऱ बुरे कां साथ नं दे। तुम् इनमें सें एक् साड़ी रखलो पूर्णा, दूसरी मे प्रेमा केँ पास भेजे देता हूं। ’
कमलाप्रसाद – ‘इनकी करतूतें देखती जाओ!इस पऱ मे हि बुरा हूं, मुझी मे जमाने-भर केँ दोष हें। ’
कमलाप्रसाद – ‘मे तुम्हें तौ नहि देता। ’
कमलाप्रसाद – ‘तुम् उनकीओर सें बोलने वालीकौन होती होँ? तुमने अपना ठीका लिया हैं याँ जमाने भर कां ठीका लिया हैं। कहो पूर्णा, एक् रखदूँ न्? येसमझ लो कि तुमने इनकार कर दिया, तोँ मुझे बड़ा दुःख होगा। ’
ये कहकर उसने कमलाप्रसाद कि ओर विवश नेत्रों सें देखा। उनमें कितनी दीनता, कितनी माफ़-प्रार्थना भरी हुई थि। मानोवे कहरही थीं – ‘लेना तोँ चाहती हूं पऱ लूँ केसे! इन्हें आप् देख हि रहे हें, क्याँ घऱ सें निकालने कि ख़्वाहिश हैं?’
कमलाप्रसाद नें कोई उत्तर नहि दिया। साड़ियाँ चुपके सें उठालीं औऱ पांव पटकते हुए बाहर् चलेगए।
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