Pratigya - body-focused teasing – New Episode
लाला बदरीप्रसाद कि सज्जनता प्रसिद्ध थि। उनसेठग कर तोँ कोई एक् रुपया भि नं लें सकता थां, पर्र धर्म केँ विषय मे वो बड़े हि उदार थें। स्वार्थियों सें वो कोसों भागते थें, पऱ दीनों कि मदद करने मे भि नं चूकते थें। फिन पूर्णा तौ उनकी पड़ोसिन हि नहि, ब्राह्मणी थि। उस पऱ उनकी पुत्री कि सहेली। उसकीमदद वो क्यूं न् करते? पूर्णा केँ पास हल्के दामों केँ दो-चार गहनों केँ सिवा औऱ क्याँ थां। षोडसी केँ दिन उसनेवे सभी गहनेला कर लालाजी केँ सामने रखदिए, औऱ सजल नेत्रों सें बोलि – ‘मे अब इन्हें रखकर क्याँ करूँगी। ’
बदरीप्रसाद नें करुण-कोमल स्वर मे कहा – ‘मे इन्हें लें कर क्याँ करूँगा, बेटी? तुम् ये न् समझो कि मे धर्म याँ पुण्य समझकर येकाम कररहा हूं। ये मेरा कर्तव्य हैं। इन गहनों कों अपनेपास रखो। कौन जानेकिस टाइम इनकी जरूरत पड़े। जब तक मे जीता हूं, तुम्हें अपनी बेटी समझता रहूँगा। तुम्हें कोई तकलीफ नं होगी। ’
षोडसी बड़ीधूम सें हुइ। कईसौ ब्राह्मणों नें भोजन किया। दान-दक्षिणा मे भि कोईकमी न् कि गई।
रात केँ बारहबज गए थें। लाला बदरीप्रसाद ब्राह्मणों कों भोजनकरा केँ लेटे, तोँ देखा – प्रेमा उनके कमरे मे खड़ी हैं। बोले – ‘यहा क्यूं खड़ी होँ, बेटी – रात बहोत हौ गई, जाकरसो रहो। ’
प्रेमा – ‘आपने अभि कुछ भोजन नहि किया हैं नं?’
बदरीप्रसाद – ‘अब इतनीरात गए मे भोजन न् करूँगा। थक भि बहोत गय़ा हूं। लेटते हि लेटते सो जाऊँगा। ’
येकहकर बदरीप्रसाद चारपाई पऱ बैठगए औऱ एक् क्षण केँ बाद बोले – ‘क्यूं बेटी, पूर्णा केँ मैकेकोई नहि हैं? मैंने उससे नहि पूछा कि शायदउसे कुछ दुःख हौ। ’
प्रेमा – ‘मैके मे कौन हैं। मां-बाप पहले हि मर चुके थें, मामाजी नें शादीकर दिया। मगर जब सें शादीहुआ, कभी झाँका तक नहि। ससुराल मे भि सगाकोई नहि हैं। पंडित जी केँ दम सें रिश्ता थां। ’
बदरीप्रसाद नें बिछावन कि चादर बराबर करतेहुए कहा – ‘मे सोचरहा हूं, पूर्णा कों अपने हि घऱ मे रखूँ तोँ क्याँ हरज हैं? अकेली स्त्री केसे रहेगी। ’
प्रेमा – ‘होगा तोँ बहोत अच्छा, पर्र अम्माँ जी मानें तब तौ?’
बदरीप्रसाद – ‘मानेगी क्यूं नहि, पूर्णा तौ इनकार न् करेगी?’
प्रेमा – ‘पूछूँगी। मे समझती हूं उन्हें इनकार नं होगा। ’
बदरीप्रसाद – ‘अच्छा मानलो, वो अपने हि घऱ मे रहे तोँ उसका खर्चबीस रुपए मे चल जाएगा न्?’
प्रेमा नें आर्द्र नेत्रों सें पिता कि ओरदेख करकहा – ‘बड़ेमजे सें। पंडित जी पचास रुपए हि तोँ पाते थें। ’
बदरीप्रसाद नें चिंतित भाव सें कहा – ‘मेरेलिए बीस, पच्चीस, साठसभी बराबर हें, मगर मुझे अपनी जीवन हि कि तोँ नहि सोचनी हैं। अगरआज मे नं रहूँ, तोँ कमलाप्रसाद कौड़ी फोड़कर न् देगा, इसलिये कोई स्थायी बंदोबस्त कर जानां चाहता हूं। अभि हाथ मे रुपए नहि हें, नहि तोँ कल हि चार हजार रुपए उनकेनाम किसी अच्छे बैंक मे रख देता। सूद सें उसकी परवरिश होती रहती। ये शर्तकर देता कि मूल मे सें कुछ न् दियाजाए। ’
सहसा कमलाप्रसाद आँखें मलतेहुए आँ कर खड़े हौ गए औऱ बोले – ‘अभि आप् सोए नहि? गरमी लगती हौ, तौ पंखाला कररखदूँ। रात तोँ ज़्यादा हौ गई। ’
बदरीप्रसाद – ‘नहि गरमी नहि हैं। प्रेमा सें कुछ बातें करनेलगा थां। तुमसे भि कुछ सलाह लेना चाहता थां, तोँ तुम् आप् हि आँ गए। मे येसोच रहा हूं कि पूर्णा यहीं आँ कररहे तौ क्याँ हरज हैं?’
कमलाप्रसाद नें आँखें फाड़कर कहा – ‘यहा! अम्माँ जीकभी नं राजी होंगी। ’
बदरीप्रसाद – ‘अम्माँ जी कि बात छोड़ो, तुम्हें तौ कोई आपत्ति नहि हैं? मे तुमसे पूछना चाहता हूं। ’
कमलाप्रसाद नें दृढ़ता सें कहा – ‘मे तौ कभी इसकी सलाह नं दूँगा। दुनिया मे सबतरह केँ व्यक्ति हें, नं जाने क्याँ समझें। दूर तक सोचिए। ’
बदरीप्रसाद – ‘उसके पालन-पोषण कां तौ कुछ प्रबंध करना हि होगा। ’
कमलाप्रसाद – ‘हम् क्याँ कर सकते हें?’
बदरीप्रसाद – ‘तौ औऱ कौन करेगा?’
कमलाप्रसाद – ‘शहर मे हमीं तौ नहि रहते। औऱ भि बहोत सें धनीलोग हें। अपनी हैसियत केँ मुताबिक हम् भि कुछमदद कर देंगे। ’
बदरीप्रसाद नें कटाक्ष-भाव सें कहा – ‘तौ चंदाखोल दियाजाए, क्यूं? अच्छी बात हैं, जाओ घूम-घूम कर चंदाजमा करो। ’
कमलाप्रसाद – ‘मे क्यूं चंदाजमा करनेलगा। ’
बदरीप्रसाद – ‘तबकौन करेगा?’
कमलाप्रसाद इसकाकुछ जवाब नं देसके। कुछदेर केँ बाद बोले – ‘आखिर आपने क्याँ निश्चय किया हैं?’
बदरीप्रसाद – ‘मे क्याँ निश्चय करूँगा? मेरे निश्चय कां अब मूल्य हि क्याँ? निश्चय तौ वही हैं, जौ तुम् करो। मेरा क्याँ ठिकाना? आज मे कुछकर जाऊँ, कल मेरीआँख बंद होते हि तुम् उलट-पुलट दो, व्यर्थ मे बदनामी हौ। ’
कमलाप्रसाद नें बहोत दुःखित हौ करकहा – ‘आप् मुझे इतनानीच समझते हें। ये मुझे न् मालूम थां। ’
बदरीप्रसाद बेटे कों बहोत प्रेम करते थें, येदेख कर कि मेरीबात सें उसेचोट लगी हैं, जल्दी बात बनाई – ‘नहि-नहि मे तुम्हें नीच नहि समझता। बहोत संभव हैं कि आज हम् जोँ बातकर सकते हें, वो कल स्थिति केँ बदल जाने सें नं कर सकें। ’
कमलाप्रसाद – ‘परमेश्वर न् करे कि मे वो विपत्ति झेलने केँ लिए बैठा रहूँ, मगर इतनाकह सकता हूं कि आप् जौ कुछकर जाएँगे, उसमें कमलाप्रसाद कों कभी किसीदशा मे आपत्ति नं होगी। आप् घऱ केँ स्वामी हें। आप् हि नें ये संपत्ति बनाई हैं। आपकोइस पर्र पूरा अधिकार हैं। निश्चय करने केँ पहले मे जोँ चाहे कहूँ, मगर जब आप् एक् बाततय कर देंगे, तौ मे उसके विरुद्ध जीभ तक न् हिलाऊँगा। ’
बदरीप्रसाद – ‘तोँ कल पूर्णा केँ नामचार हजार रुपए बैंक मे जमाकर दो औऱ ये शर्तलगा दो कि मूल मे सें कुछ न् लेँ सके। उसकेबाद रुपए हमारे होँ जाएँगे। ’
कमलाप्रसाद कों मानो चोट-सि लगी। बोले – ‘खूबसोच लीजिए। ’
बदरीप्रसाद नें निश्चयात्मक स्वर मे कहा – ‘खूबसोच लिया हैं। देख्ना मात्र ये हैं कि इसे स्वीकार करती हैं याँ नहि। ’
कमलाप्रसाद – ‘क्याँ उसके स्वीकार करने मे भि कोई संदेह हैं?’
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बदरीप्रसाद नें तिरस्कार-भाव सें कहा – ‘तुम्हारी ये बड़ी बुरीआदत हैं कि तुम् सभी कों स्वार्थी समझने लगते हौ। कोईभला व्यक्ति दूसरों कां एहसान सिर पर्र नहि लेना चाहता। मनुष्य कां स्वभाव हि ऐसा हैं। गए घरों कि बात जानेदो, मगर जिसमें आत्म-सम्मान कां कुछ भि अंश हैं, वो दूसरों कि मदद नहि लेना चाहता। मुझे तोँ संदेह हि नहि, विश्वास हैं कि पूर्णा कभीइस बात पर्र राजी नं होगी। वो मेहनत-मजूरी कर सकेगी, तौ करेगी, मगरजब तक विवश नं हौ जाए, हमारी मददकभी न् स्वीकार करेगी। ’
प्रेमा नें बड़ी उत्सुकता सें कहा – ‘मुझे भि ये संदेह हैं। राजी होगी भि तौ बड़ी मुश्किल सें। ’
बदरीप्रसाद – ‘तुम् उससे इसकी चर्चा करना। कल हि। ’
प्रेमा – ‘नहि दादाजी, मुझसे न् बनेगा। वो औऱ मे दोनों हि अब तक बहनों कि तरहरही हें, मुझसे इसढंग कि बातअब नं करते बनेगी। मे तौ रोने लगूँगी। ’
बदरीप्रसाद – ‘तौ मे हि सभीठीक कर लूँगा। हाँ, कल साम मुझे अवकाश न् मिलेगा, तब तक तुम्हारी अम्माँ जी सें भि बातें होंगी। शायद वो उसकेयहा रहने पऱ राजी हौ जाएँ। ’
कमलाप्रसाद गृह-प्रबंध मे अपने कों लासानी समझते थें। यों तोँ बुद्धि विकास मे वो अपने कों अफलातूं सें रत्ती-भर भि कम न् समझते थें। पऱ गृह-प्रबंध मे उनकी सिद्धि सर्वमान्य थि। सिनेमा रोज देखते थें, पर्र क्याँ मजाल थि कि जेब सें एक् रुपया भि खर्च करें। मैनेजर सें दोस्ती कररखी थि, उल्टे उसकेयहा कभी-कभी दावतखा आते थें। पैसे कां काम धेले मे निकालते थें औऱ बड़ी सुंदरता सें कभी-कभी लाला बदरीप्रसाद सें इस विषय मे उनकीठन भि जाया करती थि। बूढ़े लालाजी बेटे कि इस कुत्सित मनोवृत्ति पर्र कभी-कभी खरी-खरी कह डालते थें। कमलाप्रसाद समझगए कि लालाजी इस टाइमकोई आपत्ति नं सुनेंगे, बल्कि आपत्ति सें उल्टा असर होने कि संभावना थि। इसलिये उन्होंने कूटनीति सें काम लेने कां निश्चय किया। प्रातःकाल पूर्णा केँ दरवाज़ा पऱ जाकर आवाज़ दि। पूर्णा पहले तोँ उनसे परदा करती थि, पऱ अब बहुरिया बनकर बैठने सें केसेकाम चल सकता थां। उन्हें अंदर बुला लिया। बरामदे मे चारपाई पड़ी हुईँ थि। कमलाप्रसाद बाबूउस पऱ जा बैठे। एक् क्षण मे पूर्णा आँ कर उनके सामने खड़ी होँ गई। पूर्णा कां माथा घूँघट सें ढकाहुआ थां, पऱ दोनों सजल आँखें कृतज्ञता औऱ विनय सें भरी हुईँ भूमि कि ओरताक रहीथीं। कमलाप्रसाद उसेदेख कर अवाक-सां रह गय़ा। वो इस इरादे सें आया थां कि इसे किसी भाँति यहा सें टालदूँ। मैकेचले जाने कि प्रेरणा करूँ। उसे इसकीजरा भि चिंता नं थि कि इस अबला कां भविष्य क्याँ होगा। उसका निर्वाह केसे होगा, उसकी रक्षा कौन करेगा, इसकाउसे लेश-सिर्फ भि ध्यान नं थां। वो सिर्फ इस टाइमउसे यहा सें टालकर अपने रुपएबचा लेना चाहता थां, पर्र विधवा कि सरल, निष्कलंक, दीन-मूर्ति देखकर उसे अपनी कुटिलता पर्र सरम आँ गई। कौन प्राणी ऐसा हृदय-हीन हैं जौ किसी कोमल पुष्प कों तोड़कर भाड़ मे फेंकदे। जिंदगी मे पहलीबार उसे सौंदर्य कां आकर्षण हुआ। अँधेरे घऱ मे दीपकजल उठा। बोले – ‘तुम्हें यहाअब अकेले रहने मे तौ बड़ा कष्ट होगा। उधर प्रेमा भि अकेले घबराया करती हैं। उसीघऱ मे तुम् भि क्यूं न् चलीजाओ। क्याँ कोईहरज हैं?’
पूर्णा सिर नीचाकिए एक् क्षण तक सोचने केँ बाद बोलीं- ‘हरज तौ कुछ नहि हैं, बाबूजी यहा भि तोँ आप् हि लोगों केँ भरोसे पड़ी हूं। ’
कमलाप्रसाद – ‘तौ आजचली चलो। बाबूजी कि भि यही ख़्वाहिश हैं। मे जाकर आदमियों कों असबाब लेँ जाने केँ लिएभेज देता हूं। ’
पूर्णा – ‘नहि बाबूजी, इतनी जल्द न् कीजिए। जरासोच लेने दीजिए। ’
कमलाप्रसाद – ‘इसमें सोचने कि कौन-सि बात हैं। अकेले केसे पड़ी रहोगी?’
पूर्णा – ‘अकेली तौ नहि हूं महरी भि तौ यहीं सोने कों कहती हैं। ’
कमलाप्रसाद – ‘अच्छा, वो बिल्लो। हाँ बुढ़िया हैं तोँ सीधी;मगर टर्री हैं। आखिर मेरेघऱ चलने मे तुम्हें क्याँ असमंजस हैं?’
पूर्णा – ‘कुछ नहि, असमंजस क्याँ हैं?’
कमलाप्रसाद – ‘तौ आदमियों कों जाकरभेज दूँ। ’
पूर्णा – ‘भेज दीजिएगा, अभि जल्द क्याँ हैं?’
कमलाप्रसाद – ‘तुम् व्यर्थ हि इतना संकोच कररही होँ पूर्णा, क्याँ तुम् समझती होँ तुम्हारा जानां मेरेघऱ केँ प्राणियों कों बुरा लगेगा?’
कमलाप्रसाद कां अनुमान ठीक थां। पूर्णा कों वास्तव मे यही आपत्ति थि, पऱ वो संकोच-वश इसे प्रकट न् कर सकती थि। उसने समझा, बाबूजी नें मेरेमन कि बातघूर ली। इससे वो लज्जित भि होँ गई। बाबू साहब केँ घऱ वालों केँ विषय मे ऐसी धारणा उसे न् करनी चाहिए थि, पर्र कमलाप्रसाद नें उसके संकोच कां तुरंत हि अंतकर दिया, बोले – ‘तुम्हारा ये अनुमान बिल्कुल स्वाभाविक हैं, पूर्णा मगर सोचो, मेरेघऱ मे ऐसा कौन-सां व्यक्ति हैं जोँ तुम्हारा विरोध करसके। बाबूजी कि खुदये ख़्वाहिश हैं। मुझे तुम् खूब जानती होँ। पं। वसंत कुमार सें मेरी कितनी गहरी दोस्ती थि, ये तुमसे छिपा नहि, प्रेमा तुम्हारी सहेली हि हैं, अम्माँ जी कों तुमसे कितना प्यार हैं, वो तुम् खूब जानती हि होँ, रह गई सुमित्रा, उसेजरा कुछ बुरा लगेगा। तुमसे कोई परदा नहि, मगर उसकी बातों कि परवाह कौन करता हैं? उसेखुश रखने कां भि तुम्हें एक् गुर बताए देता हूं। कभी-कभी ये मंत्र फूँक दिया करना, फिन वो कभी तुम्हारी बुराई नं करेगी। बस उसकी सुंदरता कि तारीफ करती रहना। ये नं समझना कि रंभा याँ उर्वशी कहने सें वो समझ जाएगी कि ये मुझेबना रही हैं। तुम् चाहे जितना बढ़ाओ, वो उसे यथार्थ हि समझेगी। इसी मंत्र सें मे उसे नचाया करता हूं यही मंत्र तुम्हें बताए देता हूं। ’
पूर्णा कों हँसी आँ गई, बोलीं – ‘आप् तोँ उनकी हँसी उड़ारहे हें भलाऐसा कौन होगा, जिसे इतनीसमझ नं हौ। ’
कमलाप्रसाद – ‘इतनीसमझ कों तुम् साधारण बातसमझ रही हौ, पर्र ये साधारण बात नहि। तुमको येसुन कर आश्चर्य तोँ होगा, पर्र अपनी तारीफ सुनकर हम् इतने मतवाले होँ जाते हें कि फिन हममें विवेक कि शक्ति हि लुप्त हौ जाती हैं। बड़े-सें-बड़ा महात्मा भि अपनी प्रशंसा सुनकर फूल उठता हैं। हाँ, प्रशंसा करने वाले शब्दों मे भक्ति कां भाव रहना आवश्यक हैं। यदिऐसा न् होता, तौ कवियों कों झूठी तारीफों केँ पुल बाँधने केँ लिए हमारे राजे-महाराजे पुरस्कार क्यूं देते। बताओ? राजा साहब तमंचे कि आवाज़ सुनकर चौंक पड़ते हें, कानों मे उँगली डाल लेते हें औऱ घऱ मे भागते हें, पर्र दरबार कां कवि उन्हें वीरता मे अर्जुन औऱ द्रोणाचार्य सें दोहाथ औऱ ऊँचाउठा देता हैं, तौ राजा साहब कि मूँछें खिल उठती हें, उन्हें एक् क्षण केँ लिए भि ये ख्याल नहि आता कि ये मेरी हँसी उड़ाई जारही हैं। ऐसी तारीफों मे हम् शब्दों कों नहि, उनके अंदर छिपेहुए भावों कों हि देखते हें। सुमित्रा रंग-रूप मे अपने बराबर किसी कों नहि समझती। न् जानेउसे ये खब्त केसे हौ गय़ा। ये कहते बहोत दु:ख होता हैं पूर्णा, पऱ इसऔरत केँ कारण मेरी जीवन खराब हौ गई। मुझे मालूम हि न् हुआ कि प्यार किसे कहते हें। मे संसार मे सबसे अभागा प्राणी हूं औऱ क्याँ कहूँ। पूर्व जन्म केँ पापों कां प्रायश्चित कररहा हूं। सुमित्रा सें बोलने कों जी नहि चाहता, पर्र मुँह सें कुछ नहि कहता कि कहींघऱ मे कुहराम न् मचजाए। लोग समझते हें, मे आवारा हूं, सिनेमा औऱ थिएटर मे प्रमोद केँ लिए जाता हूं, मगर मे तुमसे सत्य कहता हूं पूर्णा, मे सिनेमा मे सिर्फ अपनी हार्दिक वेदनाओं कों भुलाने केँ लिए जाता हूं, अपनी अतृप्त अभिलाषाओं कों औऱ केसे शांत करूँ, दिल कि आग कों केसे बुझाऊँ। कभी-कभी जी मे आता हैं, संन्यासी हौ जाऊँ औऱ कदाचित एक् दिनयही करना पड़ेगा। तुम् समझती होगी, ये महाशय कहां कां पचड़ा लेँ बैठे। माफ़ करना, नं जानेआज क्यूं तुमसे यह बातें करनेलगा। आज तक मैंने इन भावों कों किसी सें प्रकट नहि किया थां। आदमी हृदय हि सें सहानुभूति कि आशा होती हैं, बसयही समझलो। तौ मे जाकर आदमियों कों भेजे देता हूं, तुम्हारा असबाब उठा लें जाएँगे। ’
पूर्णा कों अब क्याँ आपत्ति होँ सकती थि। उसकाजी अब भि इसघऱ कों छोड़ने कों न् चाहता थां, पर्र वो इस अनुरोध कों टाल न् सकी। उसे येभय भि हुआ कि कहींये मेरे इनकार सें औऱ भि उदास नं हौ जाएँ। आश्रयविहीन अबला केँ लिएइस वक्त तिनके कां सहारा हि बहोत थां, तोँ वो नौका कि केसे अवहेलना करती, पऱ वो क्याँ जानती थि कि वो उसे उबारने वाली नौका नहि वरन एक् विचित्र जल-जंतु हैं, जोँ उसकी आत्मा कों निगल जाएगा?
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पूर्णा कों अपनेघऱ सें निकलते वक़्त बड़ा दुःख होनेलगा। जिंदगी केँ तीन वर्षइसी घऱ मे काटे थें। यहीं सौभाग्य केँ सुख देखे, यहीं वैधव्य केँ दुःख भि देखे। अब उसे छोड़ते हुए हृदयफट जाता थां। जिस टाइम चारों कहार उसका असबाब उठाने केँ लिएघऱ आए, वो सहसारो पड़ी। उसकेमन मे कुछ वैसे हि भाव जाग्रत हौ गए, जैसेशव कों उठाते वक्त शोकातुर प्राणियों केँ मन मे आँ जाते हें। ये जानते हुए भि कि लाशघऱ मे नहि रह सकती, जितनी जल्द उसका दाहसंस्कार क्रिया होँ जाए उतना हि अच्छा हैं। वे एक् क्षण केँ लिएमोह केँ आवेश मे आँ कर पाँव सें चिमट जाते हें, औऱ शोक सें विह्वल होँ कर करूण स्वर मे रूदन करने लगते हें, वो आत्म-प्रवंचना, जिसमें अब तक उन्होंने अपने कों डालरखा थां कि कदाचित अब भि जिंदगी केँ कुछ चिह्न प्रकट हौ जाएँ, एक् परदे केँ समान आँखों केँ सामने सें हट जाती हैं औऱ मोह कां आखिरी बंधनटूट जाता हैं, उसी भाँति पूर्णा भि घऱ केँ एक् कोने मे दीवार सें मुँह छिपाकर रोनेलगी। अपने प्राणेश कि स्मृति कां ये आधार भि शोक केँ अपार सागर मे विलीन हौ रहा थां। उसघऱ कां एक्-एक् कोना उसकेलिए मधुर-स्मृतियों सें रंजित थां, सौभाग्य-सूर्य केँ अस्त हौ जाने पऱ भि यहा उसकीकुछ झलक दिखाई देती थि। सौभाग्य-म्यूज़िक कां अंत हौ जाने पर्र भि यहा उसकी प्रतिध्वनि आती रहती थि। घऱ मे विचरते हुएउसे अपने सौभाग्य कां विषादमय गर्व होता रहता थां। आज सौभाग्य-सूर्य कां वो आखिरी प्रकाश मिटाजा रहा थां, सौभाग्य-म्यूज़िक कि प्रतिध्वनि एक् अनंत शून्य मे डूबी जाती थि, वो विषादमय गर्व हृदय कों चीरकर निकला जाता थां।
संध्या वक्त वो अपनी महरी बिल्लो केँ संग रोती हुई इस भाँति चली मानोकोई निर्वासित हौ। पीछे फिन-फिन कर अपने प्यारे घऱ कों देखती जाती थि, मानो उसका हृदय वहींरह गय़ा होँ।
देवकी कों सुमित्रा कि कोईबात नं भाती थि। उसका हँसना-बोल्ना, चलना-फिरना, उठना-बैठना, पहनना-ओढ़ना सब उन्हें फूहड़पन कि चरम सीमा कां अतिक्रमण करताहुआ जान पड़ता थां, औऱ वो नित्य उसकी प्रचंड आलोचना करती रहती थि। उसकी आलोचना मे प्यार औऱ सद्भाव कां आधिक्य थां याँ द्वेष कां, इसका निर्णय करना कठिन थां। सुमित्रा तौ द्वेष हि समझती थि। इसीलिए वो उन्हें औऱ भि चिढ़ाती रहती थि – देवकी सबेरे उठने कां उपदेश करती थि, सुमित्रा पहरदिन चढ़े उठती थि, देवकी घूँघट निकालने कों कहती थि, सुमित्रा इसके जवाब मे आधासिर खुला रखती थि। देवकी महरियों सें अलग रहने कि शिक्षा देती थि, सुमित्रा महरियों सें हँसी-दिल्लगी करती रहती थि। सुमित्रा कों पूर्णा कां यहा आनां अच्छा नहि लगरहा हैं, ये उससे छिपा न् रहसका, पहले हि सें उसने पति केँ इस प्रस्ताव पऱ नाक सिकोड़ी थि। पऱ, ये जानते हुए कि इनकेमन मे जौ ख़्वाहिश हैं उसेये पूरा हि करके छोड़ेंगे, उसने विरोध करके अपयश लेना उचित नं समझा थां। सुमित्रा सासू केँ मन केँ भावघूर रही थि। औऱ ये भि जानती थि कि पूर्णा भि ज़रूर हि देखरही हैं। इसलिये पूर्णा केँ प्रति उसकेमन मे स्नेह औऱ सहानुभूति उत्पन्न होँ गई। अब तक देवकी पूर्णा कों आदर्श गृहिणी कहकर बखान करती रहती थि। उसको दिखाकर सुमित्रा कों लज्जित करना चाहती थि। इसलिये सुमित्रा पूर्णा सें जलती थि। आज देवकी केँ मन मे वो भाव नं थां, इसलिये सुमित्रा केँ मन मे भि वो भाव नं रहा।
ग्यारह बजे थें। पूर्णा प्रकाश मे आँखें हटाकर खिड़की केँ बाहर् अंधकार कि ओरदेख रही थि। उस गहरे अँधेरे मे उसे कितने खूबसूरत दृश्य दिखाई देरहे थें – वही अपना खपरैल कां घऱ थां, वही पुरानी बिस्तर थि, वही छोटा-सां आँगन थां, औऱ उसके पतिदेव दफ्तर सें आँ कर उसकीओर साहसमुख औऱ सप्रेम नेत्रों सें ताकते हुएजेब सें कोईचीज निकाल करउसे दिखाते औऱ फिन छिपा लेते थें। वो बैठीपान लगारही थि, झपटकर उठी औऱ पति केँ दोनों हाथ पकड़कर बोलि – ‘दिखादो क्याँ हैं? पति नें मुट्ठी बंदकर ली। उसकी उत्सुकता औऱ बढ़ी उसनेखूब जोरलगा कर मुट्ठी खोली, पर्र उसमें कुछ नं थां। वो मात्र कौतुक थां। अहह!उस कौतुक, उस क्रीड़ा मे उसे अपने जिंदगी कि व्याख्या छिपी हुईँ मालूम होँ रही थि। ’
पूर्णा नें आँसू पोंछ डाले औऱ आवाज़ सँभाल कर बोलीं – ‘ये तौ तुम् झूठ कहती हौ बेहन। ये सोचती तोँ तुम् आती क्यूं?’
पूर्णा नें कुछ आशंकित हौ कर पूछा – ‘तुम् अब तक केसेजाग रही होँ?’
पूर्णा – ‘तौ क्यूं सोती हौ सारेदिन?’
सुमित्रा हँसने लगी। एक् क्षण मे सहसा उसकामुख गंभीर हौ गय़ा। बोलीं – ‘अपने माँ-बाप कि धन-लिप्सा कां प्रायश्चित कररही हूं, बेहन औऱ क्याँ। ’ ये कहते-कहते उसकी आँखें सजल हौ गई।
सुमित्रा किसी अंतर्वेदना सें विकल हौ कर बोलीं – ‘तुम् देख लेना बेहन, एक् दिनये महलढह जाएगा। यही अभिशाप मेरे मुँह सें बार-बार निकलता हैं। ’ पूर्णा नें विस्मित होँ करकहा – ‘ऐसा क्यूं कहती हौ बेहन?फिन उसे एक् बातयाद हौ गई। पूछा – ‘क्याँ अभि भैयाजी नहि आए?’
पूर्णा नें एक् लंबी साँस खींचकर कहा – ‘मेरे किस्मत सें अपने क़िस्मत कि तुलना नं करो, बेहन पराश्रय सें बड़ी विपत्ति दुर्भाग्य केँ कोश मे नहि हैं। ’
सुमित्रा चली गई। पूर्णा नें बत्ती बुझा दि औऱ लेटी, पर्र नींद कहां? आज हि उसनेइस घऱ मे कदमरखा थां औऱ आज हि उसे अपनी जल्दबाजी पऱ खेद हौ रहा थां। ये निश्चय थां कि वो बहोत दिनयहा न् रह सकेगी।
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