Pratigya - body-focused teasing – New Episode
साड़ियाँ लौटाकर औऱ कमलाप्रसाद कों अप्रसन्न करके भि पूर्णा कां मनोरथ पूरा न् होँ सका। वो उस संदेह कों जरा भि नं दूरकर सकी, जोँ सुमित्रा केँ हृदय पऱ किसी हिंसक पशु कि भाँति आरूढ़ होँ गय़ा थां। बेचारी दोनों तरफ सें मारी गई। कमलाप्रसाद तौ नाराज हौ हि गय़ा थां, सुमित्रा नें भि मुँह फुला लिया। पूर्णा नें कईबार इधर-उधर कि बातें करके उसकामन बहलाने कि चेष्टा कि; पऱ जब सुमित्रा कि त्योरियाँ बदलगईं; औऱ उसने झिड़क करकह दिया – इस वक़्त मुझसे कुछ नं बोलो पूर्णा, मुझेकोई बात नहि सुहाती। मे जन्म सें हि अभागिनी हूं, नहि तोँ इसघऱ मे आती हि क्यूं? तुम् आती हि क्यूं! तुम् आईं, तौ समझी थि औऱ कुछ न् होगा, तौ रोना हि सुना दूँगी, पऱ बातकुछ औऱ हि होँ गई। तुम्हारा कोईदोष नहि हैं, ये तौ सभी मेरे क़िस्मत कां दोष हैं। इस टाइमजाओ, मुझेजरा एकांत मे रो लेनेदो – तब पूर्णा कों वहा सें उठ जाने केँ सिवा औऱ कुछसूझ नं पड़ा। वो धीरे-धीरे सें उठकरदबे पाँव अपने कमरे मे चली गई। सुमित्रा एकांत मे रोई होँ, याँ नं रोई हौ; पऱ पूर्णा अपने दुर्भाग्य पऱ घंटों रोतीरही। अभि तक सुमित्रा कों प्रसन्न करने कि चेष्टा मे वो इस दुर्घटना कि कुछ विवेचना कर नं सकी थि। अब आँखों मे आँसुओं कि बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती हुइ वो इन सारी बातों कि मन-हि-मन आलोचना करनेलगी। कमलाप्रसाद क्याँ वास्तव मे एक् साड़ी उसकेलिए लाए थें? क्यूं लाए थें? एक् दिन कों छोड़कर तोँ वो फिनकभी कमलाप्रसाद सें बोलीं तक नहि थि। उसदिन भि वो खुदकुछ नं बोलि थि। कमलाप्रसाद कि हि बातें सुनरही थि। हाँ, उससेअगर भूल हुइ, तौ यही कि वो वहाआने पर्र राजी होँ गई; मगर करती क्याँ; औऱ अवलंब हि क्याँ थां? कोई आगे-पीछे नजर भि तोँ नहि आता थां! आखिरजब इन्हीं लोगों कां दिया खाती थि, तोँ यहाआने मे कौन-सि बाधा थि? जब सें वो यहाआई, उसनेकभी कमलाप्रसाद सें बातचीत नहि कि। फिन कमलाप्रसाद नें उसकेलिए रेशमी साड़ी क्यूं ली? वो तोँ एक् हि कृपण हें, उदारता उनमें कहां सें आँ गई? सुमित्रा नें भि तौ साड़ियाँ न् माँगी थीं। अगर उसकेलिए साड़ी लानी थि, तोँ मेरेलिए लाने कि क्याँ जरूरत थि? मे उसकी ननदी नहि, देवरानी नहि, जेठानी नहि, सिर्फ आसरैत हूं।
मगरइस घऱ कों त्याग देने कां संकल्प करके भि पूर्णा निकल नं सकी? कहां जाएगी? जा हि कहां सकती हैं? इतनी जल्दचला जानां क्याँ इस लाँछन कों औऱ भि सुदृढ़ न् कर देगा। विधवा पऱ दोषारोपण करना कितना आसान हैं। जनता कों उसके विषय मे नीची-सें-नीची धारणा करतेदेर नहि लगती, मानो कुवासना हि वैधव्य कि स्वाभाविक वृत्ति हैं, मानो विधवा हौ जानां मन कि सारी दुर्वासनाओं, सारी दुर्बलताओं कां उमड़ आनां हैं। पूर्णा सिर्फ करवटबदल कररह गई।
बारहबजे केँ पहले तौ कमलाप्रसाद कभी अंदर सोने न् आते, मगर आज एक् बज गय़ा, दोबजगए, फिन भि उनकीआहट न् मिली। यहा तक कि तीनबजे केँ बाद उसके कानों मे दरवाज़ा बंद होने कि आवाज़ सुनाई पड़ी। सुमित्रा नें अंदर सें किवाड़ बंदकर लिए थें। कदाचित अबउसे भि आशा नं रही, पर्र पूर्णा अभि तक इंतजार कररही थि। यहा तक कि शेषरात भि प्रतीक्षा मे कट गई। कमलाप्रसाद नहि आए।
पूर्णा सारेदिन कमलाप्रसाद सें दो-चार बातें करने कां अवसर खोजती रही, पर्र वो घऱ मे आए हि नहि औऱ मर्दानी बैठक मे वो खुद संकोच-वश नं जासकी। आज ख़्वाहिश न् रहतेहुए भि उसे भोजन करना पड़ा। उपवास करके लोगों कों मनमानी आलोचनाएँ करने कां अवसर वो क्यूं देती?
पूर्णा नें मुस्करा करकहा – ‘मे चलूँगी, यहा अकेली केसे रहूँगी?’
पूर्णा नें बात बनाई – ‘बेचारे आँ करलौट गए होंगे। ’
पूर्णा – ‘मना लेने मे कोई बड़ी हानि तौ न् थि?’
पूर्णा – ‘तुम् तौ हँसी उड़ाती होँ। पति किसी कारणरूठ जाए, तौ क्याँ उसे मनाना औरत कां धर्म नहि हैं?’
पूर्णा – ‘तुम्हीं अपनेदिल सें सोचो। ’
पूर्णा नें जरा भौहें चढ़ाकर कहा – ‘बेहन, तुम् कैसी बातें करती हौ? एक् तौ ब्राह्मणी, दूसरे विधवा, फिन नाते सें बेहन, मुझे वो क्याँ कुदृष्टि सें देखेंगे? फिन उनकाकभी ऐसा स्वभाव नहि रहा। ’
पूर्णा – ‘तौ आज क्यूं नहि बीमार पड़ जातीं। ’
पूर्णा – ‘बड़ी निर्दयी होँ बेहन, आज चली जानां, तुम्हें मेरीशपथ। ’
दस-बारह दिनबीत गए थें। एक् दिनआधी रात केँ बाद पूर्णा कों सुमित्रा केँ कमरे कां दरवाज़ा खुलने कि आहट मिली। उसने समझा, शायद कमलाप्रसाद आए हें। अपने दरवाज़ा पर्र खड़ी होँ कर झाँकने लगी। सुमित्रा अपने कमरे सें दबे पाँव निकलकर इधर-उधर सशंक नेत्रों सें ताकती, मर्दाने कमरे कि ओरचली जारही थि। पूर्णा समझ गई, आज रमणी कां मानटूट गय़ा। बातठीक थि। सुमित्रा नें आज पति कों मना लाने कां संकल्प कर लिया थां। वो कमरे सें निकली, आँगन कों भि पार किया, दालान सें भि निकल गई, पति-दरवाज़ा पर्र भि जा पहुँची। वहा वो एक् क्षण तक खड़ीसोच रही थि, केसे पुकारूँ? सहसा कमलाप्रसाद केँ खाँसने कि आवाज़ सुनकर वो भागी, बेतहाशा भागी, औऱ अपने कमरे मे आँ कर हि रूकी। उसका प्यार-पीड़ित हृदयमान कां खिलौना बनाहुआ थां। रमणी कां मान अजेय हैं, अमर हैं, अनंत हैं।
किंतु पूर्णा अभि तक दरवाज़ा पर्र खड़ी थि। सुमित्रा कि वियोग-व्यथा कितनी दुःसह हौ रही थि, येसोच कर उसका कोमल हृदय द्रवित होँ गय़ा। क्याँ इस अवसर पर्र उसकाकुछ भि उत्तरदायित्व न् थां? क्याँ इस भाँति तटस्थ रहकर तमाशा देख्ना हि उसका कर्तव्य थां? इस सारी मानलीला कां मूल कारण तोँ यही थां, तब वो क्याँ शांतचित्त सें दो प्रेमियों कों वियोगाग्नि मे जलतेदेख सकती थि? कदापि नहि। इसके पहले भि कईबार उसकेजी मे आया थां कि कमलाप्रसाद कों समझा-बुझा कर शांतकर दे, मगर कितनी हि शंकाएँ उसका मार्ग रोककर खड़ी होँ गई थि। आज करूणा नें उन शंकाओं कां शमनकर दिया। वो कमलाप्रसाद कों मनाने चली। उसकेमन मे किसी प्रकार कां संदेह नं थां। कमलाप्रसाद कों वो शुरुआत सें हि अपना बड़ा भइया समझती आँ रही थि, भैया कहकर पुकारती भि थि। फिनउसे उनके कमरे मे जाने कि जरूरत हि क्याँ थि? वो कमरे केँ दरवाज़ा पर्र खड़ी हौ कर उन्हें पुकारेगी, औऱ कहेगी – भाभी कों ज्वर होँ आया हैं, आप् जरा अंदरचले आइए। बस, येखबर पाते हि कमलाप्रसाद दौड़े अंदरचले जाएँगे, इसमें उसे लेशमात्र भि संदेह नहि थां। तीनसाल केँ वैवाहिक जिंदगी कां अनुभव होने पऱ भि पुरुष-संसार सें अनभिज्ञ थि। अपने मामाजी केँ छोटे-सें गाँव मे उसका बाल-जिंदगी बीता थां। वहा सारा गाँवउसे बेहन याँ बेटी कहता थां। उस कुत्सित वासनाओं सें रहित संसार मे वो स्वछंद रूप सें खेत, खलिहान मे विचरा करती थि। शादी भि ऐसे पुरुष सें हुआ, जौ जवान होँ कर भि बालक थां, जौ इतना लज्जाशील थां कि यदि मुहल्ले कि कोईऔरत घऱ आँ जाती, तौ अंदरकदम न् रखता। वो अपने कमरे सें निकली औऱ मर्दाने कमरे केँ दरवाज़ा पऱ जाकर धीरे-धीरे सें किवाड़ पर्र थपकी दि। भय तौ उसेये थां कि कमलाप्रसाद कि नींद मुश्किल सें टूटेगी, मगरवहा नींद कहां? आहट पाते हि कमलाप्रसाद नें दरवाज़ा खोल दिया औऱ पूर्णा कों देखकर कौतूहल सें बोला – ‘क्याँ हैं पूर्णा, आओ बैठो। ’
कमलाप्रसाद नें विस्मित होँ करकहा – ‘मनाने आईथीं, सुमित्रा? झूठीबात। मुझेकोई मनाने नहि आया थां। मनाने हि क्यूं लगी। जिससे प्यार होता हैं, उसे मनाया जाता हैं। मे तोँ मर भि जाऊँ, तोँ किसी कों रंज नं होँ। हाँ, मम्मी-बाप रो लेंगे। सुमित्रा मुझे क्यूं मनाने लगी। क्याँ तुमसे कहती थि?’
कमलाप्रसाद नें मानोये बात नहि सुनी। समीप आँ कर बोले – ‘यहाकब तक खड़ी रहोगी। अंदरआओ, तुमसे कुछ कहना हैं। ’
कमलाप्रसाद उसकी घबराहट देखकर बिस्तर पऱ जा बैठा औऱ आश्वासन देताहुआ बोला – ‘डरोमत पूर्णा, धीरे-धीरे बैठो मे भि व्यक्ति हूं, कोई काटू नहि हूं। आखिर मुझसे क्यूं इतनी भागी-भागी फिरती हौ? मुझसे दोबात करना भि तुम्हें नहि भाता। तुमने उसदिन साड़ी लौटा दि, जानती हौ मुझे कितना दुःखहुआ?’
‘कमलाप्रसाद नें येबात नं सुनी। उसकी आतुर दृष्टि पूर्णा केँ रक्तहीन मुखमंडल पर्र जमी हुईँ थि। उसके हृदय मे कामवासना कि प्रचंड ज्वाला दहकउठी। उसकी सारी चेष्टा, सारी चेतनता, सारी प्रवृत्ति एक् विचित्र हिंसा केँ भाव सें आंदोलित हौ उठी। हिंसक पशुओं कि आँखों मे शिकार करते टाइम जोँ स्फूर्ति झलक उठती हैं, कुछ वैसी हि स्फूर्ति कमलाप्रसाद कि आँखों मे झलकउठी। वो बिस्तर सें उठा औऱ दोनों हाथ खोलेहुए पूर्णा कि ओर बढ़ा। अब तक पूर्णा भय सें काँपरही थि। कमलाप्रसाद कों अपनीओर आतेदेख कर उसने गर्दन उठाकर आग्नेय नेत्रों सें उसकीओर देखा। उसकी दृष्टि मे भीषण संकटतथा भय थां, मानो वो कहरही थि – खबरदार। इधर एक् जौ-भर भि बढ़े, तोँ हम् दोनों मे सें एक् कां अंत हौ जाएगा। इस टाइम पूर्णा कों अपने हृदय मे एक् असीम शक्ति कां अनुभव होँ रहा थां, जोँ सारे संसार कि सेनाओं कों अपने पैरों-तले कुचल सकती थि। उसकी आँखों कि वो प्रदीप्त ज्वाला, उसकी वो बँधी हुई मुट्ठियाँ औऱ तनी हुईँ गर्दन देखकर कमलाप्रसाद ठिठक गय़ा, होश आँ गए, एक् कदम भि आगे बढ़ने कि उसे हिम्मत नं पड़ी। खड़े-खड़े बोला – ‘येरूप मत धारणकरो, पूर्णा। मे जानता हूं कि प्यार-जैसी वस्तु छल-बल सें नहि मिल सकती, नं मे इस इरादे सें तुम्हारे निकट आँ रहा थां। मे तोँ सिर्फ तुम्हारी कृपा-दृष्टि कां अभिलाषी हूं। जिसदिन सें तुम्हारी मधुरछवि देखी हैं, उसीदिन सें तुम्हारी उपासना कररहा हूं। पाषाण प्रतिमाओं कि उपासना पत्र-पुष्प सें होती हैं, किंतु तुम्हारी उपासना मे आँसुओं सें करता हूं। मे झूठ नहि कहता पूर्णा। अगरइस टाइम तुम्हारा संकेत पा जाऊँ, तोँ अपने प्राणों कों भि तुम्हारे चरणों पर्र अर्पण करदूँ। यही मेरीपरम अभिलाषा हैं। मे बहोत चाहता हूं कि तुम्हें भूल जाऊँ, मगर मन किसीतरह नहि मानता। ज़रूर हि पूर्व जन्म मे तुमसे मेराकोई घनिष्ठ संबंध रहा होगा, कदाचित उस जन्म मे भि मेरीये लालसा अतृप्त हि रही होगी। तुम्हारे चरणों पऱ गिरकर एक् बाररो लेने कि ख़्वाहिश सें हि मे तुम्हें लाया। बस, येसमझ लो कि मेरा जिंदगी तुम्हारी दया पऱ निर्भर हैं। अगर तुम्हारी आँखें मेरीतरफ सें यों हि फिरी रहीं, तौ देख लेना, एक् दिन कमलाप्रसाद कि लाश याँ तौ इसी कमरे मे तपड़ती हुई पाओगी, याँ गंगा-तट पर्र, मेराये निश्चय हैं।
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कमलाप्रसाद चारपाई पर्र बैठता हुआ बोला – ‘नहि पूर्णा, मुझे तौ इसमें शर्म कि कोईबात नहि दीखती। अपनी इष्ट-देवी कि उपासना करना क्याँ शर्म कि बात हैं? प्यार ईश्वरीय प्रेरणा हैं, ईश्वरीय मेसेज हैं। प्यार केँ संसार मे व्यक्ति कि बनाई सामाजिक व्यवस्थाओं कां कोई मूल्य नहि। शादी समाज केँ संगठन कि सिर्फ आयोजना हैं। जात-पात मात्र भिन्न-भिन्न काम करने वाले प्राणियों कां समूह हैं। काल केँ कुचक्र नें तुम्हें एक् ऐसी अवस्था मे डाल दिया हैं, जिसमें प्यार-सुख कि कल्पना करना हि पाप समझा जाता हैं, मगर सोचो तोँ समाज कां ये कितना बड़ा अन्याय हैं। क्याँ भगवान नें तुम्हें इसीलिए बनाया हैं कि दो-तीन साल प्यार कां सुख भोगने केँ बाद आजीवन वैधव्य कि कठोर यातना सहतीरहो। कभी नहि, परमेश्वर इतना अन्यायी, इतना क्रूर नहि हौ सकता। वसंत कुमार जी मेरेपरम दोस्त थें। आज भि उनकीयाद आती हैं, तौ आँखों मे आँसूभर जाते हें। इस वक़्त भि मे उन्हें अपने सामने खड़ा रखता हूं तुमसे उन्हें बहोत प्यार थां। तुम्हारे सिर मे जरा भि पीड़ा होती थि, तोँ बेचारे विकल होँ जाते थें। वो तुम्हें सुख मे मढ़ देना चाहते थें, चाहते थें कि तुम्हें हवा कां झोंका भि न् लगे। उन्होंने अपना जिंदगी हि तुम्हारे लिए अर्पण कर दिया थां। रोओमत पूर्णा, तुम्हें जरा दुःखी देखकर उनका कलेजा फट जाता थां, तुम्हें रोतेदेख कर उनकी आत्मा कों कितना दुःख होगा, फिन येआजकोई नईबात नहि। इधर महीनों सें तुम्हें रोने केँ सिवा दूसरा काम नहि हैं औऱ निर्दयी समाज चाहता हैं कि तुम् जिंदगी पर्यंत यों हि रोतीरहो, तुम्हारे मुख पर्र हास्य कि एक् रेखा भि न् दिखाई दे, नहि तोँ अनर्थ हौ जाएगा। तुम् दुष्टा होँ जाओगी। उस आत्मा कों तुम्हारी ये व्यर्थ कि साधना देखकर कितना दुःख होता होगा, इसकी कल्पना तुम् कर सकती हौ? भगवान तुम्हें दुःख केँ इस अपार सागर मे डूबने नहि देना चाहते। वो तुम्हें उबारना चाहते हें, तुम्हें जिंदगी केँ खुशी मे मग्नकर देना चाहते हें। यदि उनकी प्रेरणा न् होती, तोँ मुझ जैसे दुर्बल मनुष्य केँ हृदय मे प्यार कां उदय क्यूं होता? जिसने किसीऔरत कि ओरकभी आँखउठा कर नहि देखा, वो आज तुमसे प्यार कि भिक्षा क्यूं माँगता होता? मुझे तौ येदैव कि स्पष्ट प्रेरणा मालूम होँ रही हैं। ’
कमलाप्रसाद उसे फर्श पऱ बैठते देखकर उठा औऱ उसकाहाथ पकड़कर कुर्सी पर्र बिठाने कि चेष्टा करतेहुए बोला – ‘नहि-नहि पूर्णा, ये नहि, हौ सकता। फिन मे भि जमीन पर्र बैठूँगा। आखिरइस कुर्सी पर्र बैठने मे तुम्हें क्याँ आपत्ति हैं?’
कमलाप्रसाद कां चेहरा खिलउठा, बोला – ‘अगरकोई कुछकहे, तौ उसकी मूर्खता हैं। सुमित्रा कों यहा बैठेदेख करकोई कुछ न् कहेगा, तुम्हें बैठेदेख कर उसकेहाथ आप् हि छाती पऱ पहुँच जाएँगे। ये व्यक्ति केँ रचेहुए स्वाँग हें औऱ मे इन्हें कुछ नहि समझता। जहाँ देखो ढकोसला, जहाँ देखो पाखंड। हमारा सारा जिंदगी पाखंडमय हौ गय़ा हैं। मे इस पाखंड कां अंतकर दूँगा। पूर्णा, मे तुमसे सच कहता हूं, मैंने आज तक किसी महिला कि ओरआँख नहि उठाई। मेरी निगाह मे कोई जँचती हि न् थि, मगर तुम्हें देखते हि मेरे हृदय मे एक् विचित्र आंदोलन होनेलगा। मे उसीसमय, समझ गय़ा कि ये परमेश्वर कि प्रेरणा हैं। यदि भगवान कि ख़्वाहिश न् होती तौ तुम् इसघऱ मे आती हि क्यूं? इस वक़्त तुम्हारा यहा आनां भि ईश्वरीय प्रेरणा हैं, इसमें लेशमात्र भि संदेह न् समझना। एक्-सें-एक् सुंदरियाँ मैंने देखीं, मगरइस चंद्र मे हृदय कों खींचने वाली जौ शक्ति हैं, वो किसी मे नहि पाई। ’
कमलाप्रसाद कों सहसा साड़ियों कि याद आँ गई। दोनों साड़ियाँ अभि तक उसने संदूक मे रख छोड़ी थीं। उसने एक् साड़ी निकाल कर पूर्णा केँ सामने रख दि औऱ कहा – ‘देखो, ये वही साड़ी हैं पूर्णा, उसदिन तुमने इसे अस्वीकार कर दिया थां, आजइसे मेरी खातिर सें स्वीकार करलो। एक् क्षण केँ लिएइसे पहनलो। तुम्हारी ये सफेद साड़ी देखकर मेरे हृदय मे चोट-सि लगती हैं। मे ईमान सें कहता हूं, ये तुम्हारे वास्ते लाया थां। सुमित्रा केँ मन मे कोई संदेह नं हौ, इसलिये एक् औऱ लानी पड़ी। नहि, उठाकर रखोमत। सिर्फ एक् हि क्षण केँ लिएपहन लो। जरा मे देख्ना चाहता हूं कि इसरंग कि साड़ी तुम्हें कितनी खिलती हैं। नं मानोगी तौ जर्बदस्ती पहना दूँगा। ’
कमलाप्रसाद – ‘मे हट जाता हूं। ’
कमलाप्रसाद नें परदे कि आड़ सें कहा – ‘पहन चुकीं? अब बाहर् निकलूँ?’
कमलाप्रसाद नें परदाउठा कर झाँका। पूर्णा हँस पड़ी। कमलाप्रसाद नें फिन परदा खींच लिया औऱ उसकीआड़ सें बोला – ‘अबकीअगर तुमने नं पहना पूर्णा, तौ मे आँ कर जर्बदस्ती पहना दूँगा। ’
पूर्णा – ‘पहनेहुए तोँ हूं। अब केसे पहनूँ। कौन अच्छी लगती हैं। मेरीदेह पऱ आँ कर साड़ी कि मिट्टी भि खराब हौ गई। ’
कमलाप्रसाद – ‘दीपक कि ज्योति मात हौ गई। वाउरे परमेश्वर! तुम् ऐसी आलोकमय छवि कि रचनाकर सकते हौ। तुम्हें धन्य हैं। ’
कमलाप्रसाद – ‘परमेश्वर अब मेरा बेड़ा केसेपार लगेगा। ’
कमलाप्रसाद नें पूछा – ‘यहा क्यूं रखती हौ?’
कमलाप्रसाद – ‘भगवान दंड नहि देंगे, पूर्णा, ये उन्हीं कि आज्ञा हैं। तुम् उनकी चिंता न् करो। खड़ी क्यूं होँ। अभि तौ बहोत रात हैं, क्याँ अभि सें भाग जाने कां इरादा हैं। ’
कमलाप्रसाद नें जोरदे करकहा – ‘येकभी नहि हौ सकता पूर्णा, जरूरत पड़े तोँ तुम्हारे लिए प्राण तक देदूँ। जब चाहे परीक्षा लें कर देखो। ’
कमलाप्रसाद नें मुँह लटकाकर कहा – ‘पूर्णा, मे तोँ मर जाऊँगा। सच कहता हूं, मे जहरखा करसो रहूँगा, औऱ हत्या तुम्हारे सिर जाएगी। ’
ये आखिरी वाक्य पूर्णा नें सुना थां याँ नहि, हम् नहि कह सकते। उसने दरवाज़ा खोला औऱ आँगन कि ओरचली। कमलाप्रसाद दरवाज़ा पर्र खड़ा ताकता रहा। पूर्णा कों रोकने कां उसे साहस न् हुआ। चिड़िया एक् बार दाने पर्र आँ करफिन नं जाने क्याँ आहटपा करउड़ गई थि। इतनी हि देर मे पूर्णा केँ मनोभावों मे कितने रूपांतर हुए, वो खड़ायही सोचता रहा। वो रोष, फिन वो हास-विलास, औऱ अंत मे ये विराग! ये रहस्य उसकीसमझ मे न् आता थां। क्याँ वो चिड़िया फिन दाने पर्र गिरेगी? यही सवाल कमलाप्रसाद केँ मस्तिष्क मे बार-बार उठनेलगा।
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आदर्श हिंदू-बालिका कि भाँति प्रेमा पति केँ घऱ आँ कर पति कि हौ गई थि। अब अमृतराय उसकेलिए मात्र एक् स्वप्न कि भाँति थें, जौ उसनेकभी देखा थां। वो गृह-कार्य मे बड़ी कुशल थि। सारादिन घऱ कां कोई-नं-कोई काम करती रहती। दाननाथ कों सजावट कां सामान खरीदने कां शौक थां, वो अपनेघऱ कों साफ-सुथरा सजाहुआ देख्ना भि चाहते थें। मगर इसकेलिए जिस संयम औऱ श्रम कि जरूरत हैं, वो उनमें नं थां। कोईचीज ठिकाने सें रखना उन्हें आता हि नं थां। ऐनक स्नान केँ कमरे केँ ताक पऱ रख दिया, तोँ उसकीयाद उस टाइमआती जब कॉलेज मे उसकी जरूरत पड़ती। खाने-पीने, सोने-जागने कां कोई नियम नं थां। कभीकोई अच्छी किताब मिल गई, तौ सारीरात जागते रहे। कभी सरेशाम सें सोरहे, तोँ खाने-पीने कि सुध न् रही। आय-व्यय कि व्यवस्था न् थि। जब तक हाथ मे रुपए रहते, बेदरेग खर्चकिए जाते, बिना जरूरत कि चीजें आया करतीं। रुपए खर्च होँ जाने पर्र, लकड़ी औऱ तेल मे किफायत करनी पड़ती थि। तब वो अपनी वृद्ध माता पर्र झुँझलाते, पर्र माता कां कोईदोष न् थां। उनकाबस चलता तोँ अब तक दाननाथ चार पैसे केँ व्यक्ति हौ गए होते। वो पैसे कां काम धेले मे निकलना चाहती थि। कोई महरी, कोई कहार, उनकेयहा टिकने नं पाता थां। उन्हें अपने हाथों काम करने मे शायदमजा आता थां। वो गरीब माँ-बाप कि बेटी थि, दाननाथ केँ पिता भि मामूली व्यक्ति थें औऱ फिनजिए भि बहोत कम। माता नें अगर इतनी किफायत सें काम न् लिया होता तोँ दाननाथ किसी दफ्तर केँ चपरासी होते। ऐसी स्त्री केँ लिए कृपणता स्वाभाविक हि थि। वो दाननाथ कों अब भि वही बालक समझती थीं जोँ कभी उनकीगोद मे खेला करता थां। उनके जिंदगी कां वो सबसे आनंदप्रद वक़्त होता थां जब दाननाथ केँ सामने थालरख कर वो खिलाने बैठती थि। किसी महाराज याँ रसोइए, कहार याँ महरी कों वो इस खुशी मे बाधा न् डालने देना चाहती थीं, फिन वो जिएँगी केसे?जब तक दाननाथ कों अपने सामने बैठकर खिला नं लें, उन्हें संतोष न् होता थां। दाननाथ भि माता पर्र जान देते थें, चाहते थें कि ये अच्छे सें अच्छा खाएँ, पहनें औऱ धीरे-धीरे रहेंमगर उनकेपास बैठकर बालकों कि तोतली भाषा सें बातें करने कां उन्हें नं अवकाश थां नं रूचि। दोस्तों केँ संग गप-शप करने मे उन्हें ज़्यादा खुशी मिलता थां। वृद्धा नें कभीमन कि बातकही नहि, पऱ उसकी हार्दिक ख़्वाहिश थि कि दाननाथ अपना पूरा वेतन लाकर उसकेहाथ मे रखदें, फिन वो अपनेढंग पर्र खर्च करती। तीन सौ रुपए थोड़े नहि होते, नं जाने केसे खर्चकर डालता हैं। इतने रूपयों कि गड्डी कों हाथों सें स्पर्श करने कां खुशीउसे कभी न् मिला थां। दाननाथ मे याँ तौ इतनीसूझ नहि थि, याँ तोँ लापरवाह थें। प्रेमा नें दो हि चार महीने मे घऱ कों सुव्यवस्थित कर दिया। अब हरेककाम कां वक्त औऱ नियम थां, हरेकचीज कां विशेष जगह थां, आमदनी औऱ खर्च कां हिसाब थां। दाननाथ कों अबदसबजे सोना औऱ पाँचबजे उठना पड़ता थां, नौकर-चाकर खुश थें औऱ सबसे अधिकखुश थि प्रेमा कि सासू माँ। दाननाथ कों जेब खर्च केँ लिए पच्चीस रुपएदे कर प्रेमा बाकी रुपए सासू केँ हाथ मे रख देती थि औऱ जिसचीज कि जरूरत होती, उन्हीं सें कहती। इस भाँति वृद्धा कों गृह-स्वामिनी कां अनुभव होता थां। यद्यपि शुरुआत महीने सें वो कहने लगतीथीं अब रुपए नहि रहे, खर्च होँ गए, क्याँ मे रूपया होँ जाऊँ, मगर प्रेमा केँ पास तोँ पाई-पाई कां हिसाब रहता थां, चिरौरी-विनती करके अपनाकाम निकाल लिया करती थि।
उस पर्र भि दाननाथ केँ मन मे वो शंकाबनी हुइ थि। वो एक् बार उसके अंतस्तल मे बैठकर देख्ना चाहते थें – एक् बार उसके मनोभावों कि थाह लेना चाहते थें, मगरये भि चाहते थें कि वो ये नं समझे कि उसकी परीक्षा होँ रही हैं। कहीं उसने भाँप लिया तोँ अनर्थ होँ जाएगा, उसका कोमल हृदयउस परीक्षा कां भारसह भि सकेगा याँ नहि।
आखिर उन्होंने एक् दिनकह हि डाला – ‘आजकल, आईने मे अपनी सूरत देखते हौ?’
अमृतराय – ‘कोई अंतर हैं?’
अमृतराय – ‘झूठ नं कहो दोस्त, मुझे तोँ याद हि नहि आता कि तुम् इतने सजधजकर कभी थें। सच कहता हूं, मे तुम्हें बधाई देनेजा रहा थां। मगर डरता थां कि तुम् समझोगे येनजर लगारहा हैं। ’
अमृतराय अपनी हँसी नं रोकसके। दाननाथ कों उन्होंने इतना मंद-बुद्धि कभी न् समझा थां। दाननाथ नें समझा – ये मेरी हँसी उड़ाना चाहते हें। मे मोटा हूं, याँ दुबला हूं, इनसे मतलब?ये कौन होते हें पूछनेवाले? आप् शायदये सिद्ध करना चाहते हें कि प्रेमा कि स्नेहमय सेवा नें मुझे मोटाकर दिया। यही सही, तौ आपको क्यूं जलन होती हैं, क्याँ अब भि आपका उससेकुछ रिश्ता हैं। मैले बर्तन मे साफ पानी भि मैला हौ जाता हैं। द्वेष सें भरा हृदय पवित्र आमोद भि नहि सह सकता। ये वही दाननाथ हैं, जोँ दूसरों कों चुटकियों मे उड़ाया करते थें, अच्छे-अच्छों कां काफिया तंगकर देते थें। आज सारी बुद्धि घास खानेचली गई थि। वो समझरहे थें कि ये महाशय मुझे भुलावा देकर प्रेमा कि टोह लेना चाहते हें। मुझी सें उड़ने चले हें। अभि कुछदिन पढ़ोतब मेरे मुँह आनां। बोले – ‘तुम् हँसे क्यूं? क्याँ मैंने हँसी कि बातकही हैं?’
दाननाथ – ‘आपकी आँखों कों धोखाहुआ हैं। ’
दाननाथ – ‘पहाड़ पऱ जाने मे रुपए लगते हें, यहा कौड़ी कफन कों भि नहि हैं। ’
दाननाथ – ‘तुम्हारे पास भि तोँ रुपए नहि हें, ईंट-पत्थर मे उड़ादिए। ’
दाननाथ – ‘खूबउन रूपयों सें आप् पहाड़ों कि हवा खाइएगा। अपनेघऱ कि जमा लुटाकर अब दूसरों केँ सामने हाथ फैलाते फिरोगे?’
दाननाथ – ‘जी, तौ मुझे माफ़ कीजिए, आप् हि पहाड़ों कि सैर कीजिए। तुमने व्यर्थ इतने रुपए नष्टकर दिए। सौ-पचास अनाथों कों तुमने आश्रय दे हि दिया, तौ कौन बड़ा उपकार हुआ जाता हैं। हाँ, तुम्हारी लीडरी कि अभिलाषा पूरी हौ जाएगी। ’
दाननाथ कों ‘उपकार’ शब्द सें घृणा थि। ‘सेवा’ कों भि वो इतना हि घृणित समझते थें। उन्हें सेवा औऱ उपकार केँ परदे मे सिर्फ अहंकार औऱ ख्याति-प्यार छिपाहुआ मालूम होता थां। अमृतराय नें कुछ उत्तर नं दिया। दाननाथ कोई उत्तर सुनने कों रेडी भि नं थें, उन्हें घऱ जाने कि जल्द थि, अतएव उन्होंने भि उठकरहाथ बढ़ा दिया। दाननाथ नें हाथ मिलाया औऱ विदा होँ गए।
घऱ पहुँचे, तौ प्रेमा नें पूछा – ‘आज बड़ीदेर लगाई, कहां चलेगए थें? देर करके आनां होँ तौ भोजन करके जायाकरो। ’
प्रेमा नें इसकाकुछ उत्तर न् दिया। हाँ मे हाँ मिलाना नं चाहती थि, विरोध करने कां साहस नं थां। बोलीं – ‘अच्छा चलकर भोजन तोँ करलो, महाराजिन कल सें भुनभुना रही हैं कि यहा बड़ीदेर होँ जाती हैं। कोई उसकेघऱ कां ताला तोड़दे, तौ कहीं कि न् रहे। ’
दाननाथ दिल मे अमृतराय कों इतनानीच न् समझते थें – कदापि नहि। उन्होंने मात्र प्रेमा कों छेड़ने केँ लिएये स्वाँग रचा थां। प्रेमा बड़े असमंजस मे पड़ गई। अमृतराय कि ये निंदा उसकेलिए असह्य थि। उनके प्रति अब भि उसकेमन मे श्रद्धा थि। दाननाथ केँ विचार इतने कुत्सित हें, इसकीउसे कल्पना भि नं थि। बड़े-बड़े तिरस्कारपूर्ण नेत्रों सें देखकर बोलीं – ‘मे समझती हूं कि तुम् अमृतराय केँ संग बड़ा अन्याय कररहे हौ। उनका हृदय विशुद्ध हैं, इसमें मुझेजरा भि संदेह नहि। वो जौ कुछ करना चाहते हें, उससे समाज कां उपकार होगा याँ नहि, ये तौ दूसरी बात हैं, मगर उनके विषय मे ऐसे शब्द मुँह सें निकाल कर तुम् अपने हृदय कां ओछापन दिखारहे होँ। ’
बोले – ‘मुझे नहि मालूम थां कि तुम् अमृतराय कों देवता समझरही होँ, हालाँकि देवता भि फिसलते देखेगए हें। ’
दाननाथ – ‘तौ फिन लीडर केसे बनते, हम् जैसों कि श्रेणी मे नं आँ जाते? अपने त्याग कां सिक्का जनता पऱ केसे बैठाते?’
इतने मे वृद्ध माता आँ कर खड़ी हौ गईं। दाननाथ नें पूछा – ‘क्याँ हैं, अम्माँ जी?’
दाननाथ नें हँसकर कहा – ‘यही मुझसे लड़रही हैं, अम्माँ जी, मे तौ बोलता भि नहि। ’
माता – ‘बहू, जोर सें तौ तुम्हीं बोलरही होँ। ये बेचारा तौ बैठाहुआ हैं। ’
दाननाथ – ‘अम्माँ जी मे यही तोँ गुण हैं कि वो सच हि बोलती हें। तुम्हें शर्माना चाहिए। ’
दाननाथ – ‘तुमने भोजन क्यूं नं कर लिया? मे तौ दिन मे दसबार खाता हूं। मेरा प्रतीक्षा क्यूं करती होँ। आज बाबू अमृतराय नें भि कह दिया कि तुम् इन दिनों मोटे हौ गए हौ। एकाधदिन न् भि खाऊँ तौ चिंता नहि। ’
दाननाथ – ‘नहि अम्माँ जी, सचमुच कहते थें। ’
दाननाथ मोटे चाहे न् होँ गएहों, कुछहरे ज़रूर थें। चेहरे पर्र कुछ सुर्खी थि। देह भि कुछ चिकनी होँ गई थि। मगरये कहने कि बात थि। माताओं कों तोँ अपने लड़के सदैव हि दुबले मालूम होते हें, मगर दाननाथ भि इस विषय मे कुछ वहमीजीव थें। उन्हें हमेशा किसी-न्-किसी बीमारी कि शिकायत बनी रहती थि। कभी खानां नहि हजमहुआ, खट्टी डकारें आँ रही हें, कभीसिर मे चक्कर आँ रहा हैं, कभी पांव कां तलवाजल रहा हैं। इसतरह यह शिकायतें बढ़ गई थीं। कहीं बाहर् जाते, तोँ उन्हें कोई शिकायत न् होती, क्योंकि कोई सुनने वाला न् होता। पहले अकेले मम्मी कों सुनाते थें। अब एक् औऱ सुनने वालामिल गय़ा थां। इसदशा मे यदिकोई उन्हें मोटाकहे, तौ ये उसका अन्याय थां। प्रेमा कों भि उनकी खातिर करनी पड़ती थि। इससमय दाननाथ कों खुश करने कां उसे अच्छा अवसरमिल गय़ा। बोलि – ‘उनकी आँखों मे शनीचर हैं। दिदी बेचारी जरा मोटीथीं। रोज उन्हें ताना दिया करते, घी मतखाओ, दूधमत पीयो। परहेज करा-करा केँ बेचारी कों मार डाला। मे वहा होती तौ लालाजी कि खबर लेती। ’
दाननाथ – ‘अच्छी नहि, पत्थर हैं। बलगमभरा हुआ हैं। महीने भर कसरत छोड़दें, तौ उठना-बैठना दूभर हौ जाए। ’
दाननाथ – ‘मेरेसंग खेलते थें, तोँ रुला-रुला मारता थां। ’
मगर दाननाथ जहाँ विरोधी स्वभाव केँ मनुष्य थें, वहाकुछ दुराग्रही भि थें। जिस मनुष्य केँ पीछे उनका अपनी हि पत्नि केँ हाथों इतनाघोर अपमान हुआ, उसे वो सस्ते नहि छोड़ सकते। सारा संसार अमृतराय कां यश गाता, उन्हें कोई परवाह नं थि, नहि तोँ वो भि उस स्वर मे अपना स्वर मिला सकते थें, वो भि करतल-ध्वनि कर सकते थें, पर्र उनकी पत्नि अमृतराय केँ प्रति इतनी श्रद्धा रखे औऱ सिर्फ हृदय मे नं रखकर उसकी दुहाई देती फिरे, जरा भि चिंता न् करे कि इसका पति पऱ क्याँ प्रभाव होगा, ये स्थिति दुस्सह थि। अमृतराय अगरबोल सकते हें, तौ दाननाथ भि बोलने कां अभ्यास करेंगे औऱ अमृतराय कां गर्व मर्दन कर देंगे, उसकेसंग हि प्रेमा कां भि। वो प्रेमा कों दिखा देंगे कि जिन गुणों केँ लिए तूँ अमृतराय कों पूज्य समझती हैं, वेगुण मुझमें भि हें, औऱ ज़्यादा मात्रा मे।
प्रेमा नें पूछा – ‘क्याँ आज तुम्हारा व्याख्यान हैं? तुम् तोँ पहलेकभी नहि बोले। ’
प्रेमा – ‘मुझे तोँ तुमने सुनाई हि नहि। मे भि जाऊँगी। देखूँ तुम् कैसा बोलते होँ?’
प्रेमा- ‘लालाजी नें तुम्हें आखिर अपनीओर घसीट हि लिया?’
प्रेमा नें दबी जबान सें कहा – ‘अब तक वो तुम्हें अपना सहायक समझते थें। ये नोटिस पढ़कर चकित हौ गए होंगे। ’
दाननाथ – ‘नहि, अभि मेरे सामने करदो। तुम्हें गाते-बजाते मंदिर तक जानां पड़ेगा। ’
रात केँ आठबजरहे थें। दाननाथ प्रेमा केँ संग बैठेदून कि उड़ारहे थें – ‘सच कहता हूं, प्रिये। दस हजार व्यक्ति थें, मगर क्याँ मजाल कि किसी केँ खाँसने कि आवाज़ भि आती होँ। सभी-केँ-सभी बुतबने बैठे थें। तुम् कहोगी, येजीट उड़ारहा हैं पर्र मैंने लोगों कों कभी इतना तल्लीन नहि देखा। ’
दूँ। ’
शादी केँ बादआज अमृतराय पहलीबार दाननाथ केँ घऱआए थें। प्रेमा तौ ऐसी घबरा गई, मानो दरवाज़ा पर्र बारात आँ गई हौ। मुँह सें आवाज़ हि न् निकलती थि। भय होता थां, कहीं अमृतराय उसकी आवाज़ न् सुन लें। इशारे सें महरी कों बुलाया औऱ पानदान मँगवा करपान बनाने लगी।
अमृतराय नें उन्हें गले लगाते हुएकहा – ‘आज तौ दोस्त तुमने कमालकर दिखाया मैंने अपनी जीवन मे कभीऐसी स्पीच न् सुनी थि। ’
अमृतराय – ‘दिल्लगी नहि थि भइया, चमत्कार थां। तुमने तौ आगलगा दि। अबभला हम् जैसों कि कौन सुनेगा। मगरसच बताना दोस्त, तुम्हें ये विभूति केसेहाथ आँ गई? मे तोँ दाँतपीस रहा थां। मौका होता वहीं तुम्हारी मरम्मत करता। ’
अमृतराय- ‘सबसे पीछे कि तरफ, मे मुँह छिपाए खड़ा थां। आओ, जरा तुम्हारी पीठ ठोंकदूँ?’
अमृतराय – ‘अब तुम् मेरे हाथों पिटोगे। तुमने पहली हि स्पीच मे अपनीधाक जमा दि, आगेचल कर तौ तुम्हारा जवाब हि न् मिलेगा। मुझे दुःख हैं तौ यही कि हम् औऱ तुम् अबदो प्रतिकूल रास्ता पर्र चलतेनजर आएँगे। मगर दोस्त यहा दूसरा कोई नहि हैं, क्याँ तुम् दिल सें समझते हौ कि सुधारों सें हिंदू-समाज कों हानि पहुँचेगी?’
अमृतराय – ‘तोँ फिन हमारी औऱ तुम्हारी खूब छनेगी, मगर एक् बात कां ध्यान रखना, हमारे सामाजिक सिद्धांतों मे चाहे कितना हि भेद क्यूं न् होँ, मंच पर्र चाहे एक्-दूसरे कों नोच हि क्यूं न् खाएँमगर मैत्री अक्षुण्ण रहनी चाहिए। हमारे निज केँ संबंध पऱ उनकीआँच तक नं आनेपाए। मुझे अपनेऊपर तोँ विश्वास हैं, मगर तुम्हारे ऊपर मुझे विश्वास नहि हैं। माफ़ करना, मुझेभय हैं कि तुम्…’
अमृतराय नें संदिग्ध भाव सें कहा – ‘तुम् कहते होँ, मगर मुझे विश्वास नहि आता। ’
अमृतराय – ‘औऱ तौ घऱ मे सभी कुशल हैं न्? अम्माँ जी सें मेरा प्रणाम कह देना। ’
Pratigya - body-focused teasing - Next part mein bada twist
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