प्यास जोँ बढ़ती हि जाये – New Episode
Update 17
नई शुरुआत – स्वाती कि नईभूख
फ्लॅशबैक : स्वाती कि कथा(भाग १)
स्वाती नें रिया कों अपनीगोद मे औऱ धीरे-धीरे सुला लिया। कमरे कि डिम लाइट मे उसकी आँखें एक् अनोखी चमक लेँ रहीथीं। उसने रिया केँ बालों कों आहिस्ता सहलाते हुए गहरी साँसली औऱ धीमी, कामुक आवाज़ मे किस्सा शुरुआत कि।
“जब मे सोलहसाल मे प्रवेश कररही थि, तब मेरे अंदरकुछ ऐसाजाग रहा थां जिसे मे स्वयं समझ नहि पारही थि। हमारा परिवार चार सदस्यों कां थां — मेरे बापू चंद्रशेखर, मां सुमन, भइया नितिन औऱ मे। हम् XX शहर मे रहते थें, महाराष्ट्र मे।
बापू४७ साल केँ थें, बहोत बड़े व्यवसायी, हॅंडसम औऱ बेहदसफल। मगर हमेशा बिजी रहते थें। महीने मे मात्र ८-१०दिन हि घऱ पर्र होते थें। बाकी वक्त बिजनेस ट्रिप पऱ।
मां सुमन३७ साल कि थीं — बेहद खूबसूरत, सेक्सी फिगर वाली, मगर बहोत साधारण औऱ घरेलू। घऱ संभालने मे हि उनका पूरा टाइम निकल जाता थां।
मेरा भइया नितिन २०साल कां थां। इंजीनियरिंग पास करके अभि-अभि घऱआया थां। वोँ अपना फैक्ट्री सेटअप करने कां सपनादेख रहा थां। लंबा, हॅंडसम, मजबूत बॉडी वाला। ”
स्वाती नें रिया कि ब्रेस्ट कों हल्का सां दबाते हुए मुस्कुराई औऱ आगे बोलि,
“मे तब १०वीं मे थि। विद्यालय मे मेरी सहेलियाँ अचानक प्रेम औऱ सेक्स कि बातें करनेलगी थीं। कुछ लड़कियाँ तौ सेक्स कों लेकर पूरीतरह क्रेज़ी होँ गई थीं। वे खुलकर अपनी इच्छाओं केँ बारे मे बात करतीं। आरामसे मुझे भि उत्सुकता होनेलगी।
एक् दिन मेरी सबसे अच्छी सहेली नें मुझे एक् पुस्तक दि। ‘मस्तराम कि कहानियाँ’। कवर पर्र नंगी तस्वीरें थीं। अधिकतर लड़कियाँ मात्र तस्वीरें देखने केँ लिए पुस्तक लेतीथीं। मैंने भि पहले तस्वीरें देखीं। मगरफिन कहानियाँ पढ़नी शुरुआत कीं। ”
स्वाती कि आवाज़ अब औऱ धीमी औऱ कामुक होँ गई थि।
“जब मैंने उन मस्तराम कि कहानियाँ पढ़नी शुरुआत कीं, तोँ मेरे अंदरकुछ ऐसाजाग गय़ा जिसे मे पहलेकभी महसूस नहि किया थां। अधिकतर कहानियाँ भइया-बेहन वालीथीं। भइया अपनी छोटी बेहन कों आरामसे सिड्यूस करता, उसके कपड़े उतारता, उसके नाजुक जिस्म कों छूता, चूमता औऱ फिनउसे पूरीतरह अपनाबना लेता।
मे उन कहानियों कों बार-बार पढ़ती। पढ़ते-पढ़ते मेरा पूराबदन गरम हौ जाता। मेरी साँसें तेज हौ जातीं। रात कों बेड पर्र लेटकर मे अपनी ब्रेस्ट्स कों छूती, मेरी साँसें भारी होँ जातीं। मेरी बुर अनजाने मे गीली हौ जाती। मे अपनी जाँघों कों रगड़ती औऱ उन कहानियों कों याद करती। ”
स्वाती नें रिया कि गर्दन पर्र हल्का सां चुंबन दिया औऱ फुसफुसाया,
“मगर मैंने कभी किसी लड़के कों अपना बॉयफ्रेंड बनाने कि कोशिश नहि कि। बापू कां नाम, परिवार कि इज्जत। सभीकुछ दांव पर्र थां। मे बहोत सावधान थि।
पऱ। अनजाने मे हि। मेरेमन मे बार-बार नितिन आनेलगा। उसका चेहरा, उसकी बॉडी, उसकी आवाज़। मे स्वयं कों रोक नहि पाती। ”
हर किस्सा पढ़ते टाइम मेराबदन गरम हौ जाता। मेरी साँसें तेज हौ जातीं। मे रात कों बेड पऱ लेटकर कल्पना करनेलगी कि। वोँ भइया नितिन हैं, औऱ वोँ छोटी बेहन मे हूं। ”
स्वाती नें रिया कि ब्रेस्ट कों हल्का सां दबाते हुएआगे कहा,
“रात कों जबसभी सो जाते, मे अपनी नाइटि ऊपरकर लेती। अपनी ब्रेस्ट्स कों सहलाती, अपनी जाँघों कों रगड़ती औऱ नितिन केँ बारे मे सोचती। मे कल्पना करती कि नितिन मेरे कमरे मे आता हैं, मेरी नाइटि कां पट्टा खोलता हैं, मेरी ब्रेस्ट्स कों चूमता हैं, फिन नीचे जाकर मेरी बुर कों चाटता हैं।
मे उन कल्पनाओं मे इतनीखो जाती कि मेरी उँगलियाँ अनजाने मे हि मेरी बुर पऱ चली जातीं। मे अपनी क्लीट कों रगड़ती, उँगलियाँ अंदर डालती औऱ नितिन कां नाम लेँ-लेकर झड़ जाती।
‘भैया। हम्म। मुझे चोदो। आह्ह्ह। नितिन भैया.’
मे रात-रात भरऐसे हि ख्वाब देखती। कभी ड्रीम्स मे नितिन मुझेबेड पर्र दबाकर तेज़-तेज़ सें चोदरहा होता, कभी मे उसके लन्ड कों मुँह मे लेकरचूस रही होती, कभी वोँ मुझे डॉगी स्टाइल मे लेँ रहा होता।
मे दिन मे भि विद्यालय मे उसके बारे मे सोचती। जब वोँ घऱआकर शर्ट उतारकर घूमता, तौ मेरीनजर उसके मजबूत बाजुओं, चौड़ी छाती औऱ पैंट केँ अंदर केँ उभार पर्र फंस जाती। मेरी बुर गीली होँ जाती।
मे जानती थि कि यहगलत हैं। मगर जितना मे रोकने कि कोशिश करती, उतना हि ज़्यादा नितिन मेरे सपनों औऱ कल्पनाओं पर्र छा जाता। मे उसकेलिए पागल होतीजा रही थि। ”
“मे ख्वाब मे देखती कि नितिन मेरे कमरे मे आता हैं। वोँ मात्र ट्रैक पैंट पहने होता। उसकी मजबूत छाती औऱ बाजूचमक रहे होते। वोँ मेरेबेड पऱ आकरबैठ जाता औऱ धीरे-धीरे सें मेरी नाइटि कां पट्टा खोल देता।
‘स्वाती। तूँ बहोत खूबसूरत हैं, ’ कहकर वोँ मेरी ब्रेस्ट्स कों दोनों हाथों सें दबाता। मे ड्रीम्स मे कराह उठती, ‘भैया। ऊह्ह। औऱ जोर सें.’
नितिन मेरी ब्रेस्ट्स कों चूसता, निप्पल कों दाँतों सें खींचता। फिन वोँ नीचे जाता औऱ मेरी जाँघों कों चूमता। मे अपनी जाँघें फैलाकर उसे आमंत्रित करती। वोँ अपनीगरम जीभ सें मेरी बुर कों चाटता, क्लीट कों चूसता। मे ड्रीम्स मे तकिए कों कसकर पकड़कर कराहती,
‘आह्ह्ह। भैया। औऱ गहरी। अपनीजीभ अंदर डालो। आह्ह्ह। नितिन भैया.’
फिन वोँ ऊपरआता औऱ अपना मोटा, कड़क लन्ड मेरी टाईट बुर पर्र रखता। एक् झटके मे अंदरडाल देता। मे ड्रीम्स मे चीख पड़ती, ‘आआह्ह्ह। भैया। फट गई। आह्ह्ह.’
वोँ मुझे जोर-शोर सें चोदता। हर धक्के पर्र मेरी ब्रेस्ट्स उछलतीं। वोँ मेरी गर्दन काटता, ब्रेस्ट्स चूसता औऱ तेज-तेज धक्के देता। मे उसके नीचे पागल होकर कराहती,
‘भैया। औऱ तेज। मुझे फाड़दो। आह्ह्ह। मे आपकी हूं। पूरीतरह आपकी.’
ड्रीम्स मे जब वोँ मेरी बुर मे अपना गर्मरस छोड़ता, तौ मे असली दुनिया मे भि झड़ जाती। मेरी उँगलियाँ मेरी बुर मे होतीं, औऱ चादर पूरीतरह गीली हौ जाती।
मे हररात ऐसे हि ड्रीम्स देखती। कभी वोँ मेरी डॉगी पोज़िशन मे लेता, कभी मे उसकेऊपर सवार होकर राइड करती, कभी वोँ मुझे दीवार सें सटाकर खड़े-खड़े चोदता।
दिन मे जब नितिन घऱ पर्र होता, तौ मे छुपकर उसे देखती। उसकी पैंट केँ अंदर कां उभार देखकर मेरी बुर पसीज जाती। मे बाथरूम मे जाकर स्वयं कों छूती औऱ उसकेनाम पऱ झड़ जाती। ”
स्वाती कि आँखों मे एक् पुरानी चमक आँ गई। वो रिया कों अपनीगोद मे औऱ कसकर चिपकाए हुए आहिस्ता बोलने लगीं,
“उन कहानियों कों पढ़ने केँ बाद मे पूरीतरह नितिन कि दीवानी हौ गई थि। दिन मे चाहे जितना भि व्यस्त रहती, मगर रात होते हि मेरेमन मे मात्र नितिन रह जाता। मे उसे देखने केँ लिए तरसने लगी थि।
जब भि घऱ मे कोई नहि होता, मे आहिस्ता उसके कमरे केँ पास जाती औऱ दरवाजे कि दरार सें झाँकती। कभी वोँ शर्ट उतारकर व्यायाम कररहा होता, तौ मे छुपकर उसकी चौड़ी छाती औऱ मजबूत बाजुओं कों देखती। मेरी साँसें तेज हौ जातीं।
एक् दिन एक् यादगार मौकाआया।
नितिन बाथरूम सें नहाकर निकला। मात्र एक् सफेद तौलिया कमर पर्र लपेटा हुआ थां। उसकेबाल अभि भि गीले थें। पानी कि बूँदें उसकी छाती पऱ चमकरही थीं। उसकी मर्दाना चौड़ी छाती, पेट पर्र उभरेहुए साफ एब्स, औऱ खासकर उसकी भरी-भरी, बालो सें भरी आर्मपिट्स। वोँ देखकर मेरा पूराबदन सिहरउठा।
वोँ सच मे एक् ‘सच्चा मर्द’लग रहा थां।
मे दरवाजे कि दरार सें छुपकर उसेदेख रही थि। मेरी बुर पहले सें हि गीली हौ चुकी थि। मैंने अपनी उँगली अनजाने मे हि अपनी नाइटि केँ अंदरडाल दि औऱ उसे देखते हुए स्वयं कों सहलाने लगी। ”
स्वाती नें रिया कि गर्दन पऱ हल्का सां चुंबन दिया औऱ आगे बोलीं,
“उसकेबाद मेरी कल्पनाएँ औऱ भि गरम होँ गईं।
मे ड्रीम्स मे देखती कि नितिन बाथरूम सें निकलकर मेरे सामने खड़ा हैं। मे उसके सामने घुटनों पर्र बैठ जाती औऱ उसकी आर्मपिट्स कों चाटने लगती। उसकी मर्दाना पसीने कि महक सूँघती औऱ जीभ सें पूरीतरह चाटती।
कभी मे कल्पना करती कि वोँ लेटाहुआ हैं, औऱ मे उसकी छाती पर्र बैठकर उसकी निप्प्स चूसरही हूं, फिन नीचे जाकर उसके एब्स कों चाटरही हूं। उसकी नाभि मे जीभडाल रही हूं।
सबसे ज़्यादा मुझे उसकी बालोभरी आर्मपिट्स औऱ मजबूत छाती चाटने कां मन करता। मे ड्रीम्स मे उसकी आर्मपिट मे अपना चेहरा गाड़कर सूँघती औऱ चाटती, फिन उसका लन्ड मुँह मे लेकर चूसती।
रात कों अकेले मे मे बार-बार यह कल्पनाएँ करती औऱ स्वयं कों झड़ाती। ‘नितिन भैया। ओह्ह। आपकी छाती। आपकी आर्मपिट। मुझे चाटने दो। आह्ह्ह.’
स्वाती नें रिया कि ब्रेस्ट कों हल्का सां दबाते हुए फुसफुसाया,
“मे पूरीतरह नितिन कि दीवानी होँ चुकी थि। मगर बाहर् सें कुछ नहि दिखाती थि। अंदर हि अंदरजल रही थि।
स्वाती नें रिया कों अपनीगोद मे औऱ कसकर चिपका लिया। उसकी आवाज़ अब औऱ भि धीमी औऱ भारी होँ गई थि, जैसे पुरानी यादों कि आगफिन सें सुलगरही होँ।
“मे नितिन केँ प्रति पूरीतरह दीवानी होँ चुकी थि। हररात उसके ड्रीम्स देखती, हरदिन उसे छुप-छुपकर देखती। मगरआगे बढ़ने कां कोई मार्ग नहि सूझरहा थां। वोँ मुझसे ८साल बड़ा थां। मे केवल सोलहसाल कि थि। मे डरती थि कि अगर मैंने कुछकहा याँ किया तौ वोँ मुझेगलत समझ लेगा, याँ नाराज हौ जाएगा।
सबसे बड़ी समस्या यह थि कि माँ घऱ पर्र रहतीथीं। वोँ अधिकतर टाइमघऱ मे हि होतीथीं। इसलिये मे कोई डायरेक्ट मूव नहि कर पाती थि। मे सोचती रहती कि काशकोई तरीका हौ कि मे नितिन केँ लगभगजा सकूँ, उसे छू सकूँ, उसे महसूस कर सकूँ.”
स्वाती नें रिया कि ब्रेस्ट कों हल्का-हल्का दबाते हुएआगे कहा,
“मेरी ख़्वाहिश दिन-प्रतिदिन औऱ मजबूत होतीजा रही थि। मे कईतरह केँ आईडिया सोचती, मगरफिन डर जाती।
कभी मे सोचती कि रात कों ‘डरलगरहा हैं’ कहकर उसके कमरे मे चली जाऊँ औऱ उसकेबेड पऱ लेट जाऊँ। मगर माँ केँ होने कि वजह सें हिम्मत नहि पड़ती।
कभी मे सोचती कि ‘भैया, मेरीपीठ मे दर्द हैं, थोडा मसाजकर दो’ कहकर उसकेपास जाऊँ। फिन कल्पना करती कि वोँ मेरीपीठ पऱ हाथफेर रहा हैं, आरामसे नीचेसरक रहा हैं, मेरीकमर कों सहलारहा हैं। मेरी बुर गीली होँ जाती।
कभी मे जानबूझकर छोटी-छोटी नाइटि पहनकर घऱ मे घूमती। जब नितिन पास सें गुजरता, तौ मे जानबूझकर झुक जाती ताकि वोँ मेरी ब्रेस्ट्स कां उभारदेख लेँ। मगर वोँ केवल हल्का सां मुस्कुराकर निकल जाता।
मे रात कों अकेले मे कल्पना करती कि नितिन मेरे पीछेआकर मुझे दीवार सें सटा देता हैं, मेरी नाइटि ऊपरकर देता हैं औऱ अपनी उँगलियाँ मेरी बुर मे डाल देता हैं। मे तकिए कों कसकर दबाकर झड़ जाती।
मेरी ख़्वाहिश इतनीतेज हौ गई थि कि मे दिन मे भि विद्यालय सें घऱआकर नितिन केँ कमरे केँ बाहर् खड़ी रहती औऱ दरार सें उसे देखती। कभी वोँ शर्ट उतारकर काम करता, तोँ मे अपनी उँगलियाँ अपनी बुर पऱ रखकरउसे देखते हुए स्वयं कों सहलाती। ”
स्वाती नें रिया कि गर्दन पऱ गहरा चुंबन दिया औऱ फुसफुसाई,
“मे पूरीतरह जलरही थि। मगरआगे बढ़ने कां सही मौका नहि मिलरहा थां। ”
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Update 18
नई शुरुआत – स्वाती कि नईभूख
फ्लॅशबैक : स्वाती कि किस्सा (भाग 2)
स्वाती नें रिया कि कमर पर्र हाथ फेरते हुए गहरी साँसली औऱ किस्सा आगे बढ़ाई।
“फिन एक् साम, अचानक मेरेमन मे एक् आईडिया आँ गय़ा।
उसदिन साम कों मे ड्रॉइंग रूम मे सोफे पऱ बैठी हुईँ थि। नितिन भि वहा थां। वोँ अखबार पढ़रहा थां। मे चुपचाप उसेदेख रही थि। उसकी मजबूत भुजाएँ, उसकी छाती कां उभार। मेरीनजर बार-बार उस पर्र रुकरही थि।
अचानक नितिन नें अखबार नीचेरखा औऱ मेरीतरफ देखकर पूछा,
‘स्वाती, तुम्हारी पढ़ाई कैसीचल रही हैं? खासकर मैथ्स औऱ साइंस मे?’
मे चौंक गई। मैंने शर्माते हुएकहा, ‘ठीक-ठाक। मगरकुछ कॉन्सेप्ट्स समझ नहि आँ रहे। ’
नितिन मुस्कुराया औऱ बोला, ‘१०वीं मे मैथ्स औऱ साइंस बहोत इम्पोर्टेन्ट हें। अगर इनमें अच्छे नंबरआए तौ आगे इंजीनियरिंग याँ कोई अच्छा कोर्स आसानी सें मिल जाएगा। मे तुम्हें समझा सकता हूं अगर तुम् चाहो। ’
हम् दोनों बहुतदेर तक बात करतेरहे। नितिन मुझे मैथ्स केँ कुछ टॉपिक्स समझाने लगा। वोँ बहोत अच्छे सें, आरामसे समझारहा थां। मे उसके चेहरे कों, उसके हाथों कों, उसके होंठों कों देखरही थि। उसकी आवाज़ मेरे कानों मे मीठीलग रही थि।
उस लंबी बातचीत केँ दौरान मेरे दिमाग़ मे एक् धाँसू आईडिया नें जन्म लें लिया।
मैंने मन हि मन सोचा — ‘यह तौ परफेक्ट बहाने हैं। ’
मे नितिन सें कह सकती थि कि मुझे मैथ्स औऱ साइंस केँ कुछ कॉन्सेप्ट्स समझ नहि आँ रहे। इस बहाने मे रोज उसके कमरे मे जा सकती थि। कभीसाम कों, कभीरात कों। माँ कों भि कोईशक नहि होगा। मे उसके लगभगबैठ सकती थि, उसकेबदन कि गर्मी महसूस कर सकती थि, उसके हाथों कों छू सकती थि। औऱ आरामसे आगेबढ़ सकती थि।
उसरात मे बेड पर्र लेटकर इस आईडिया कों बार-बार सोचरही थि। मेरादिल ज़ोर-ज़ोर सें धड़करहा थां। मे कल्पना कररही थि कि केसे मे उसके कमरे मे जाऊँगी, उसकेबगल मे बैठूँगी, जानबूझकर उसकी जाँघ सें अपनी जाँघ सटाऊँगी, औऱ आरामसे उसे सिड्यूस करूँगी।
मेरी बुर फिन सें गीली होँ गई थि। मैंने अपनी उँगलियाँ अपनी बुर पर्र रखीं औऱ नितिन केँ नाम पर्र झड़ गई। ”
स्वाती नें रिया कों अपनीगोद मे औऱ गहराई सें समेट लिया। उसकी आवाज़ अब औऱ भि धीमी औऱ कामुक होँ गई थि।
मैंने मन हि मनसभी कुछ प्लान कर लिया।
पहले मैंने सोचा कि मे कौन-कौन सें कपड़े पहनूँगी। मैंने अपनी सबसे छोटी औऱ टाईट वाली नाइटियाँ चुनलीं — वे इतनी छोटीथीं कि मेरी जाँघें औऱ ब्रेस्ट्स कां आधा हिस्सा साफदिख जाता। कभी-कभी मे ब्रा भि नहि पहनती। मे जानती थि कि जब मे उसके सामने झुकूँगी याँ बैठूँगी, तौ वोँ मेरी ब्रेस्ट्स कां उभार औऱ जाँघों कि कोमलता देखेगा।
वक़्त कां भि पूरा ध्यान रखा। मे साम कों ८:३० सें ९:३० केँ बीच जाती, जब माँ किचन मे व्यस्त होतीं। कभी-कभी रात केँ १०:३०बजे भि ‘भैया, अभि भि कुछसमझ नहि आँ रहा’ कहकरचली जाती। रात कां टाइम सबसे अच्छा थां — कम रोशनी, कमलोग, औऱ नितिन अकेला होता थां।
मैंने पढ़ाई केँ बहाने भि रेडीकर लिए। मे जानबूझकर कुछ मुश्किल टॉपिक्स चुन लेती — इंटीग्रेशन, ट्रिग्नोमैट्री, केमिकल इक्वेशन। मे उसके सामने मासूम बनकर कहती, ‘भैया, यहसमझ नहि आँ रहा। आप् समझादो नां। ’ फिन जानबूझकर उसकेबगल मे बहोत लगभगबैठ जाती। मेरी जाँघ उसकी जाँघ सें सट जाती, मेरी ब्रेस्ट उसके बाजू कों छूती।
मैंने अपनी बॉडी लैंग्वेज भि प्लान करली थि। कभी मे उसके सामने घुटनों पऱ बैठकर पुस्तक खोलती, ताकि मेरी ब्रेस्ट्स औऱ जाँघें अच्छे सें दिखें। कभी मे उसकेबेड पर्र लेटकर पुस्तक पढ़ती औऱ जानबूझकर नाइटि कों ऊपर सरका देती। जब वोँ मुझेकुछ समझाता, तौ मे जानबूझकर उसके कंधे पऱ सिर टिका देती याँ उसकी जाँघ पऱ हाथरख देती।
हरदिन मे थोडा-थोडा आगे बढ़ने कां प्लान करती। पहले मात्र नजिकीया, फिन एक्सीडेंटल टचिंग, फिन हेतुपुर्ण स्पर्श। औऱ आहिस्ता.”
स्वाती नें रिया कि गर्दन पर्र हल्का सां दाँत गड़ाते हुए फुसफुसाया,
“मे पूरीतरह सजधजकर थि। बस एक् मौके कि प्रतीक्षा थि। ”
स्वाती नें रिया कि कमर पर्र हाथ फेरते हुए स्टोरी आगे बढ़ाई। उसकी आवाज़ अब औऱ भि धीमी औऱ कामुक हौ गई थि।
“धीरे धीरे मेरी ‘पढ़ाई कां एक्सक्यूज़’ अच्छे सें स्थापित हौ गय़ा। मे अबरोज साम कों नितिन केँ कमरे मे जानेलगी थि। कभी-कभी रात कों भि। माँ कों भि कोईशक नहि होता थां। अब मे नितिन सें खुलकर बात करनेलगी थि। हम् घंटों मैथ्स औऱ साइंस कि चर्चा करते। मगर मेरीनजर हमेशा उसकेबदन पर्र रहती। ”
स्वाती नें रिया कि ब्रेस्ट कों हल्का सां दबाया औऱ मुस्कुराते हुए बोलीं,
“फिन एक् साम मैंने फैसला किया कि अब थोडा बोल्ड स्टेप लेना होगा।
मैंने अपनी सबसे ट्रांसपेरेंट औऱ छोटी वाली पिंक नाइटी निकाली। वो नाइटी इतनी पतली थि कि अंदर पहनी हुईँ सफेद ब्रा औऱ पैंटी पूरीतरह दिखरही थि। मेरी ब्रेस्ट्स कां आकार, निप्पल्स कां हल्का उभार, औऱ जाँघों कि चिकनाई सभीकुछ साफनजर आँ रहा थां। नाइटी इतनी छोटी थि कि मेरी जाँघों कां बड़ा हिस्सा खुलारह गय़ा थां। मैंने जानबूझकर ब्रा कां एक् पट्टा सरका दिया ताकि औऱ अधिक मादकलगे।
मे आईने केँ सामने खड़ी होकर स्वयं कों देखरही थि। मेरी साँसें तेज हौ रहीथीं। मे जानती थि कि आज नितिन कां ध्यान जरूर जाएगा।
मे नितिन केँ कमरे मे गई।
जैसे हि मैंने दरवाजा खोला, नितिन पुस्तक सें सिर उठाकर मेरीतरफ देखा। उसका चेहरा एकदमबदल गय़ा। उसकी आँखें मेरी झीनी नाइटी पऱ, मेरीदिख रही ब्रेस्ट्स पर्र, औऱ मेरी खुली जाँघों पर्र फंसगईं। उसकेगले मे हल्की सि हलचल हुइ। वो कुछसमय तक मुझे घूरता रहा।
मैंने इनोसेंट बनतेहुए कहा, ‘भैया। आज ट्रिग्नोमैट्री केँ कुछ सम्ससमझ नहि आँ रहे। आप् समझा दोगे?’
नितिन नें गलासाफ किया औऱ थोड़ी हिचकिचाहट केँ संग बोला, ‘हाँ। आँ जा.बैठ जा। ’
उसने मुझे स्टडी चेयर पऱ बैठने कों कहा। मे जानबूझकर उसकी कुर्सी केँ पास वाली स्टडी चेयर पर्र बैठ गई। नितिन मेरे पीछे खड़ा होकर मुझे समझाने लगा। वो आगेझुक गय़ा। उसकी छाती मेरीपीठ केँ बहोत लगभग थि। उसकीगरम साँसें मेरे कंधे औऱ गर्दन पर्र पड़रही थीं।
मे जानती थि कि मेरी ट्रांसपैरंट नाइटी सें मेरी ब्रेस्ट्स कां पूरा उभार औऱ निप्पल्स कां हल्का रंगउसे साफदिख रहा होगा। मैंने जानबूझकर थोडा आगे झुककर पुस्तक मे इशारा किया। इससे मेरी ब्रेस्ट्स औऱ भि उभरकर दिखने लगे।
नितिन कि आवाज़ थोड़ी भारी होँ गई थि। वो कुछ-कुछ रुक-रुककर समझारहा थां। मे उसके चेहरे कि तरफदेख रही थि। उसकी आँखें बार-बार मेरी ब्रेस्ट्स पर्र जारही थीं। उसकी साँसें तेज हौ रहीथीं।
मे मन हि मन बहोत खुश थि। मैंने महसूस किया कि मेरा प्लान कामकर रहा हैं। नितिन अब मेरे नशीले शरीर कों नज़रअंदाज़ नहि करपारहा थां। ”
स्वाती नें रिया कि कमर पर्र हाथ फेरते हुए मुस्कुराई। उसकी आँखों मे एक् चंचलचमक थि।
“मेरी छोटीसी ट्रिक कामकर गयीँ, थि, तीर बराबर निशाने पर्र लगा थां। नितिन अब मेरी ट्रांसपैरंट नाइटी औऱ खुली जाँघों सें नजरे नहि हटापा रहा थां। मे रोजसाम कों उसके कमरे मे जानेलगी। हरबार मे अपनी नाइटी कां ऊपरीबटन खोलकर जाती। कभी एक्, कभीदो बटन। मेरी ब्रेस्ट्स कां गहरा क्लीवेज औऱ निप्पल्स कां हल्का उभारसाफ दिखता।
मे हमेशा एक् शॉलसंग लें जाती। बाहर् सें देखने मे लगता कि मे ठंड सें बचने केँ लिए लेँ रही हूं, मगरअसल मे वोँ मेरा सुरक्षा कवच थां। ”
स्वाती नें रिया कि गर्दन पर्र हल्का सां चुंबन दिया औऱ आगे बोलि,
“एक् साम नितिन नें पूछ हि लिया, ‘स्वाती, तुम् हरबार शॉल क्यूं लें आती होँ? अभि इतनी ठण्ड तौ नहि हैं। ’
मैंने इनोसेंट बनकर जवाब दिया, ‘भैया। बसयूँ हि। कभी-कभी ठंडलग जाती हैं नां। ’
मैंने सच्चाई नहि बताई कि वोँ शॉल इसलिये लेँ जाती हूं क्योंकि अगर मां अचानक आँ गईं तौ मे जल्दी उसे ओढ़कर इनोसेंट बन सकती हूं।
फिन एक् दिन वोँ मौका आँ गय़ा जिसका मे प्रतीक्षा कररही थि।
मैंने उससाम अपनी सबसे झिनिसि पिंक नाइटी पहनी थि। ऊपर केँ दोबटन खोलदिए थें। मेरी ब्रेस्ट्स कां आधा हिस्सा साफदिख रहा थां। निप्पल्स हल्के सें उभरेहुए थें। मे नितिन केँ कमरे मे गई।
नितिन स्टडी टेबल पऱ बैठा थां। जैसे हि मे उसकेपास बैठी, उसकीनजर मेरी खुली नाइटी पर्र रुक गई। उसकी आँखें मेरी ब्रेस्ट्स पर्र टिकगईं। वोँ बार-बार गलासाफ कररहा थां। मे जानबूझकर आगे झुककर पुस्तक मे इशारा कररही थि, ताकि वोँ औऱ अच्छे सें देखसके।
नितिन कि साँसें भारी होँ रहीथीं। उसकीनजर मेरी ब्रेस्ट्स केँ उभार औऱ निप्पल्स पऱ घूमरही थि। मे मन हि मन बहोत खुश थि।
अचानक बाहर् सें माँ कि आवाज़ आई — “स्वाती। स्वाती कहां होँ। बेटा?”
मेरादिल जोर सें धड़कउठा।
मैंने जल्दी टेबल पऱ रखीशॉल उठाई औऱ तेजी सें अपनेऊपर ओढ़ली। शॉल कों ठीक सें लपेटते हुए मैंने मां कों जवाब दिया, “जी माँ। मे भैया केँ पासपढ़ रही हूं। ”
नितिन मेरीतरफ मुँह फाड़े देखरहा थां। उसका मुँह खुलारह गय़ा थां। वोँ अभि भि मेरी खुली नाइटी औऱ ब्रेस्ट्स कि याद मे खोयाहुआ थां।
मैंने शॉल ओढ़कर इनोसेंट मुस्कान दि, आँख मिचमिचाकर उसे देखा औऱ धीरे-धीरे सें बोलि, “भैया। कलफिन आऊँगी। ”
फिन मे मां केँ पासचली गई।
जाते-जाते मैंने पीछे मुड़कर देखा — नितिन अभि भि उसी हैरान औऱ उत्तेजित नजर सें मुझे ताड़रहा थां। ”
प्यास जोँ बढ़ती हि जाये – New Episode
Update 19
नई शुरुआत – स्वाती कि नईभूख
फ्लॅशबैक : स्वाती कि कथा(भाग 3)
स्वाती नें रिया कों अपनीगोद मे औऱ भि कसकर चिपका लिया। उसकी आवाज़ अब पूरीतरह कामुक औऱ यादों मे डूबी हुईँ थि।
“मैंने शॉल मात्र माँ सें बचने केँ लिए नहि ली थि। मे जानती थि कि जब मे शॉल ओढ़कर बाहर् जाती हूं औऱ कमरे मे उतार देती हूं, तोँ नितिन कों साफ संकेत मिल जाएगा कि यहखास नज़ारे मात्र उसकेलिए हें।
औऱ सच मे। नितिन समझ गय़ा थां।
जब मैंने शॉल ओढ़कर कमरे सें बाहर् निकली, तौ उसकी आँखों मे एक् अलग हि चमक थि। वोँ मेरीतरफ देखकर मुस्कुराया। मे समझ गई कि उसने मेरे इशारे कों पकड़ लिया हैं। मन हि मन मुझे बहोत खुशी हुईँ। ”
स्वाती नें रिया कि जाँघ पऱ हाथ फेरते हुएआगे कहा,
“अगली सुभह। मौकाफिन मिल गय़ा।
मां किचन मे ब्रेकफास्ट बनारही थीं। नितिन ड्रॉइंग रूम मे सोफे पर्र बैठा अखबार पढ़रहा थां। मैंने जानबूझकर एक् बहोत छोटी, टाइट स्कर्ट पहनी थि। वोँ इतनी छोटी थि कि मेरी गोरी, मांसल चिकनी जाँघें अच्छे-खासे हिस्से तक दिखरही थीं। ऊपर केवल एक् लूज़ फिटिंग वालाटॉप थां, जिसमें मेरी ब्रेस्ट्स कां उभारसाफ थां।
मे ड्रॉइंग रूम मे गई औऱ उसके सामने खड़ी होँ गई।
नितिन नें अखबार नीचेरखा औऱ मेरी जाँघों कों देखते हि उसकी आँखें चमक उठीं। वोँ कुछसमय तक मेरी खुली जाँघों कों घूरता रहा। फिन उसने धीरे-धीरे सें अपनाहाथ बढ़ाया औऱ मेरी जाँघ पऱ रख दिया।
मे चौंक गई। ‘ईसस्सस्स…….भैया.!’
मगर नितिन नें मुस्कुराते हुए अपनी उँगलियों कों मेरी मरमरी जाँघ पऱ ऊपर कि तरफ सरकाना शुरुआत कर दिया। उसकी उँगलियाँ मेरी जाँघ केँ अंदरूनी हिस्से कों सहलारही थीं। बहोत धीरे-धीरे, मगर भूखेपन सें।
मे खड़ी-खड़ी काँपने लगी। मेरी साँसें तेज होँ गईं।
‘अह्ह्ह्ह……… उम्ह्ह्ह्ह्ह्ह…। ईएसस्स्स्स्सस्स….भैया। कोईदेख लेगा.’ मैंने बहोत धीमी, काँपती हुइ आवाज़ मे कहा।
नितिन नें मेरी जाँघ कों औऱ जोर सें सहलाते हुए मुस्कुराया। उसकी उँगलियाँ अब मेरी स्कर्ट केँ नीचेसरक रहीथीं। मेरी जाँघें आपस मे सिकुड़ गईं।
‘हम्म। भैया। उम्म्म्मम्म्म्म प्लीज। मां.’ मैंने फिन सें फुसफुसाकर कहा।
मगर नितिन नें मेरी जाँघ कों दबाते हुएकहा, “चुप.बस एक् मिनट.”
उसकी उँगलियाँ मेरी जाँघ केँ सबसे नाजुक हिस्से कों छूरही थीं। मेरी बुर पहले सें हि गीली होँ चुकी थि। मे डर केँ मारे काँपरही थि, मगर …। आह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्…। मज़ा भि आँ रहा थां।
तभी अचानक किचन सें माँ केँ कदमों कि आवाज़ आई।
नितिन नें जल्दी अपनाहाथ हटा लिया। मैंने तेजी सें मुड़कर अपनी स्कर्ट ठीक कि औऱ बेडरूम कि तरफ भागी।
मे अपने कमरे मे पहुँचकर दरवाजा बंद करके दीवार सें सट गई। मेरी साँसें बहोत तेजचल रहीथीं। मेरा चेहरा लाल थां, जाँघें अभि भि काँपरही थीं। मगर मेरे होंठों पऱ मुस्कान थि।
मैंने मन हि मन सोचा ‘याने कि मेराकल वालातीर बराबर निशाने पऱ जालगा थां.’
दोदिन बादसाम कां वक्त थां। मां किचन मे डिनरबना रहीथीं। नितिन ड्रॉइंग रूम मे सोफे पऱ बैठा थां। मे जानबूझकर उसकेपास गई। इसबार मैंने एक् बहोत लूज फिटिंग वाला औऱ बहोत छोटी स्कर्ट पहनी थि।
मे उसके सामने खड़ी होकर इनोसेंट बनकर बोलि, “भैया। कल वाले सम्सफिन सें भूल गई हूं। थोडा देखलो नां। ”
नितिन नें मुझे अपनीबगल मे बिठा लिया। मगर इसबार वोँ सीधे मेरी जाँघ पऱ हाथ रखकर बोला, “बैठोयहा.”
जैसे हि मे बैठी, उसने अपनी पूरी हथेली मेरी जाँघ पर्र रख दि। उसकी उँगलियाँ धीरे धीरे मेरी स्कर्ट केँ अंदर सरकने लगीं। मे चौंक गई।
“आह्ह्ह्ह……भैया.!” मैंने फुसफुसाकर कहा।
नितिन नें मेरी जाँघ कों दबाते हुए मुस्कुराया औऱ धीरे-धीरे सें बोला, “चुप। माँ किचन मे हें। ”
उसकी उँगलियाँ अब मेरी जाँघ केँ अंदरूनी हिस्से कों सहलारही थीं।
बहोत धीरे-धीरे, मगर भूखेपन सें। वोँ ऊपर कि तरफसरक रहीथीं। मेरी साँसें तेज होँ गईं।
मे सातवे आसमान पऱ थि, बड़ी मुश्किल सें अपनी सिसकारियां रोकरही थि, मगर मेरी बुर पहले सें हि गीली हौ चुकी थि।
“स्स्स्सss स्स्स्स……भैया। कोईदेख लेगा। आह्ह.” मैंने बहोत धीमी आवाज़ मे कहा।
नितिन नें मेरी जाँघ कों औऱ जोर सें पकड़ लिया। वोँ मेरी जाँघ केँ सबसे सेन्सिटिव हिस्से कों हल्का-हल्का सहलारहा थां।
“उफ्फ्फ्फ…….तेरी जाँघें। कितनी सॉफ्ट हें स्वाती.” उसने मेरेकान केँ पास फुसफुसाया।
मे सिहरउठी। मेरी साँसें भारी होँ गईं।
“आह्ह। भैया। प्लीज। मां.” मैंने काँपते हुएकहा।
“अह्ह। भैया। उम्म्म्म.मत करो। उफ्फ.”
मे सिहरउठी।
‘भैया। ऊह्ह….कोई देख लेगा.’ मैंने बहोत धीमी, काँपती हुइ आवाज़ मे कहा।
मगर नितिन नें मेरी जाँघ कों दबाते हुए मुस्कुराया। उसकी उँगलियाँ मेरी जाँघ केँ अंदरूनी हिस्से पऱ आहिस्ता ऊपर कि तरफ सरकने लगीं। उसका स्पर्श इतनागरम औऱ भूखा थां कि मेरी साँसें फँसने लगीं।
तभी अचानक मां कि आवाज़ आई — “स्वाती। गरमचाय पी लोगी?”
मेरादिल जोर सें धड़कउठा। मे डर केँ मारे काँपने लगी।
नितिन नें जल्दी अपनाहाथ नहि हटाया। बल्कि उसने शांति सें टेबल पर्र रखी मेरी लंबी एक्सरसाइज बुक उठाई, उसे खोला औऱ मेरीगोद मे रख दिया, बिल्कुल मेरी जाँघों पर्र। पुस्तक इतनी बड़ी औऱ खुली थि कि बाहर् सें कुछ भि नहि दिखरहा थां।
फिन उसने मेरी जाँघ पर्र अपनाहाथ पुस्तक केँ नीचे सरका दिया।
माँ किचन मे थीं, मगर ड्रॉइंग रूम कां दरवाजा खुला थां। कोई भि आँ सकता थां।
नितिन कि उँगलियाँ पुस्तक केँ नीचे मेरी जाँघ केँ अंदरूनी हिस्से कों सहलाने लगीं। बहोत धीरे-धीरे, मगर जानबूझकर। उसकी उँगलियाँ मेरी स्कर्ट केँ अंदरसरक गईं औऱ मेरी पैंटी केँ किनारे कों छूने लगीं।
मे काँपरही थि। मेरी साँसें भारी होँ गई थीं।
“भैया। प्लीज। आऔउच…….स्स्सस्स्सी… मां.” मैंने फुसफुसाकर कहा, मगर मेरी आवाज़ मे डर केँ संग उत्तेजना भि थि।
नितिन नें मेरी जाँघ कों दबाते हुए बहोत धीरे-धीरे सें कहा, “शश। चुप.बस एन्जॉय कर.”
उसकी उँगली अब मेरी पैंटी केँ ऊपर सें मेरी बुर कि लाइन पर्र घूमरही थि। हल्का-हल्का दबाव। गोल-गोल सर्कल्स। मेरी पैंटी पहले सें हि भीग चुकी थि।
“आह्ह। सीईईईई…….” मेरे मुँह सें अनियंत्रित कराह निकल गई। मैंने जल्दी अपना मुँहबंद कर लिया।
नितिन मुस्कुराया। उसकी उँगली अब मेरी पैंटी केँ अंदर सरकने कि कोशिश कररही थि। मेरी अनछुई, गीली बुर कों छूरही थि।
“तेरी मुनिया। कितनी गीली हैं स्वाती.” उसने बहोत धीरे-धीरे सें फुसफुसाया।
मे अपनी जाँघें कसकरबंद करने कि कोशिश कररही थि, मगर नितिन कि मजबूत उँगलियाँ मुझेरोक रहीथीं। उसकी उँगली मेरी क्लीट पऱ हल्का-हल्का दबावबना रही थि।
मेरी साँसें तेज होँ गईं। मेरी ब्रेस्ट्स ऊपर-नीचे होँ रहीथीं। मे पुस्तक कों कसकर पकड़े हुए थि, ताकि बाहर् सें कुछ नं दिखे।
“भैया। उफ्फ.मत करो। आआह्ह्ह्ह्ह्…… श्ह्ह्ह्ह्ह्… धीरे-धीरे। माँ आँ जाएंगी.” मैंने काँपते हुएकहा।
मगर नितिन नें मेरी पैंटी कों थोडा सरकाकर अपनी उँगली मेरी गीली बुर पऱ रख दि। बस हल्का-हल्का सहलाना।
मैंने आँखें बंदकर लीं। मेरी जाँघें काँपरही थीं। मेरी बुर उसकी उँगली पऱ औऱ गीली हौ रही थि।
तभी माँ कि आवाज़ आई — “स्वाती। गरमचाय ठंडी होँ रही हैं!”
नितिन नें जल्दी अपनी उँगली हटाली। मैंने तेजी सें पुस्तक नीचेरखी, अपनी स्कर्ट ठीक कि औऱ काँपते पैरों सें किचन कि तरफ भागी।
मे बाथरूम मे घुसकर दरवाजा बंदकर लिया। मेरी साँसें बहोत तेजचल रहीथीं। मेरी पैंटी पूरीतरह भीग चुकी थि। मे आईने मे स्वयं कों देखरही थि — लाल चेहरा, भारी साँसें, औऱ आँखों मे एक् अनियंत्रित उत्तेजना।
मैंने मन हि मन सोचा “उफ्फफ्फ्फ़……… यह भैया तौ लगता हैं …….अभि मेरा उद्घाटन कर देते.” औऱ शर्माकर मुस्कुराने लगी
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