छोटी-छोटी रसीली कहानियां, Total 18 stories Complete - desi kamuk kahaniyan – New Episode
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“मे रिश्ते मे तुम्हारी बेहन लगती हूं, भले हि ममेरी हि हूं पऱ आखिर हूं तौ बेहन हि नाँ। औऱ भइया औऱ बेहन मे ऐसा नहि होना चाहिए…”
“अरे तुम् किस ज़माने कि बातकर रही होँ। लण्ड औऱ बुर कां नाता तोँ कुदरत नें बनाया हैं। लण्ड औऱ बुर कां मात्र एक् हि नाता होता हैं औऱ वोँ हैं चुदाई कां। यह तोँ मात्र तथाकथित सभ्यकहे जाने वाले समाज औऱ धर्म केँ ठेकेदारों कां बनाया हुआ ढकोसला (प्रपंच) हैं। असल मे देखाजाए तौ यह सारी कायनात हि इस प्यार रस मे डूबी हैं जिसेलोग चुदाई कहते हें…” मे एक् हि सांस मे कह गय़ा।
“पऱ फिन भि इंसान औऱ जानवरों मे फर्क तोँ होता हैं नां?”
“जब बुर कि किश्मत मे चुदना हि लिखा हैं तोँ फिन लण्ड किसका हैं इससे क्याँ फर्क पड़ता हैं। तुम् नहि जानती कनिका तुम्हारा यह जौ बाप हैं न्… वोँ अपनी बेहन, भाभी, साली औऱ सलहजसब कों चोद चुका हैं औऱ यह तुम्हारी मां भि कम नहि हैं। अपने देवर जी, जेठ, ससुरजी, भइया औऱ जीजा सें नां जाने कितनी बारचुद चुकी हैं औऱ गाण्ड भि मरवा चुकी हैं…”
कनिका मेरीओर मुँह बाईं देखेजा रही थि। उसेयह सभी सुनकर बड़ी हैरानी हौ रही थि, कहा- “नहि भइया तुम् झूठबोल रहे होँ…”
“देखो मेरी बहना तुम् चाहेकुछ भि समझोयह जौ तुम्हारा बाप हैं नाँ वोँ तोँ तुम्हें भि भोगने केँ चक्कर मे हैं। मैंने अपने कानों सें सुना हैं…”
“क… क्याँ?” उसे तोँ जैसे मेरी बातों पर्र यकीन हि नहि हुआ। मैंने उसे सारी बातें बता दि जोँ आज मामाजी-मामीजी सें कहरहे थें।
उसके मुँह सें तौ बस इतना हि निकला “ओह… नोऽऽ…”
“कहो… तुम् क्याँ चाहती होँ अपनी मर्जी सें प्रेम सें तुम् अपनासभी कुछ मुझे सौंप देना चाहोगी याँ फिनउस 45 साल केँ अपने खड़ूश औऱ ठरकी बाप सें अपनी बुर औऱ गाण्ड कि सील तुड़वाना चाहती हौ… कहो?”
“मेरीसमझ मे तौ कुछ नहि आँ रहा हैं…”
“अच्छा एक् बात बताओ?”
“क्याँ?”
“क्याँ तुम् विवाह केँ बाद नहि चुदवाओगी। याँ सारी उम्र अपनी बुर नहि मरवाओगी?”
“नहि पऱ यहसभी तौ विवाह केँ बाद कि बात होती हैं…”
“अरे मेरी भोली बहना। यह तौ खाली लाइसेंस लेने वालीबात हैं। विवाह शादी तोँ चुदाई जैसे महानकाम कों शुरुआत करने कां उत्सव हैं। असल मे विवाह कां मतलब तोँ बस चुदाई हि होता हैं…”
“पऱ मैंने सुना हैं कि पहलीबार मे बहोत दर्द होता हैं औऱ खून भि निकलता हैं…”
“अरे तुम् उसकी चिंता मतकरो। मे बड़े धीरे-धीरे करूँगा। देख्ना तुम्हें बड़ामजा आएगा…”
“पर्र तुम् गाण्ड तौ नहि मारोगे नाँ। बापू कि तरह…”
“अरे मेरीजान पहले बुर तौ मरवालो। गाण्ड कां बाद मे सोचेंगे…” औऱ मैंने फिनउसे बाहों मे भर लिया।
उसने भि मेरे होंठों कों अपने मुँह मे भर लिया। वाउ… क्याँ रसीले होंठ थें, जैसे संतरे कि नर्म नाज़ुक फांकें हों। कितनी हि देर हम् आपस मे गुंथे एक् दूसरे कों चूमते रहे। अब मैंने अपनाहाथ उसकी बुर पर्र फिराना चालूकर दिया।
उसने भि मेरे लण्ड कों कसकरहाथ मे पकड़ लिया औऱ सहलाने लगी। लण्ड महाराज तोँ ठुमके हि लगाने लगे। मैंने जब उसके उरोज दबाये तौ उसके मुँह सें सीत्कार निकालने लगी-“ओह… भइयाकुछ करो नां। पता नहि मुझेकुछ हौ रहा हैं…” उत्तेजना केँ मारे उसकाबदन कांपने लगा थां साँसें तेज होनेलगी थि। इसनए अहसास औऱ रोमांच सें उसके जिस्म केँ रोएँ खड़े होँ गए थें। उसने कसकर मुझे अपनी बाहों मे जकड़ लिया। अब देर करनाठीक नहि थां।
मैंने उसकी स्कर्ट औऱ टाप उतारदिए। उसने ब्रा तौ पहनी हि नहि थि। छोटे-छोटे दो अमरूद मेरी आँखों केँ सामने थें। गोरेरंग केँ दोरसकूप जिनका एरोला कोई एक् रुपये केँ सिक्के जितना औऱ निप्पल्स तौ कोई मूंग केँ दाने जितने बिलकुल गुलाबी रंग केँ। मैंने तड़ सें एक् चुम्बन उसके उरोज पऱ लेँ लिया। अब मेरा ध्यान उसकी पतलीकमर औऱ गहरी नाभि पर्र गय़ा। जैसे हि मैंने अपनाहाथ उसकी पैंटी कि ओर बढ़ाया
तोँ उसने मेराहाथ पकड़ते हुएकहा- “भइया तुम् भि तोँ अपने कपड़े उतारो नाँ…”
“ओह…हाँ…”
मैंने एक् हि झटके मे अपना नाईटसूट उतार फेंका। मैंने चड्डी औऱ बनियान तौ पहनी हि नहि थि। मेरा 7 इंच कां लण्ड 120° डिग्री पर्र खड़ा थां। लोहे कि राड कि तरह बिलकुल सख्त। उसपर प्री-कम कि बूँद चाँद कि रोशनी मे ऐसेचमक रही थि जैसे शबनम कि बूँद हौ याँ कोई मोती।
“कनिका इसे प्रेम करो नां…”
“केसे?”
“अरे बाबा इतना भि नहि जानती। इसे मुँह मे लेकर चूसो नाँ…”
“मुझे लज्जा आती हैं…”
मे तौ दिलोजान सें इसअदा पर्र फिदा हि होँ गय़ा। उसने अपनी निगाहें झुकाली पऱ मैंने देखा थां कि कनखियों सें वोँ अभि भि मेरे तप्त लण्ड कों हि देखेजा रही थि बिना पलकें झपकाए।
मैंने कहा-“चलो, मे तुम्हारी चूत कों पहले प्रेम कर देता हूं फिन तुम् इसे प्रेम कर लेना…”
“ठीक हैं…” भलाअब वोँ मना केसेकर सकती थि।
औऱ फिन मैंने धीरे-धीरे सें उसकी पैंटी कों नीचे खिसकाया, गहरी नाभि केँ नीचे हल्का सां उभराहुआ पेड़ू औऱ उसके नीचे रेशम सें रसीले छोटे-छोटे बालनजर आनेलगे। मेरेदिल कि धड़कनें बढ़ने लगीं। मेरा लण्ड तोँ सलामी हि बजाने लगा। एक् बार तोँ मुझेलगा कि मे बिनाकुछ किये-धरे हि झड़ जाऊँगा। उसकी बुर कि फांकें तोँ कमाल कि थि। मोटी-मोटी संतरे कि फांकों कि तरह। गुलाबी रंग कि, दोनों आपस मे चिपकी हुई। मैंने पैंटी कों निकाल फेंका।
जैसे हि मैंने उसकी जाँघों पर्र हाथ फिराया तौ वोँ सीत्कार करनेलगी औऱ अपनी जांघें कसकर भींचली।
मे जानता थां कि ये उत्तेजना औऱ रोमांच केँ कारण हैं। मैंने धीरे-धीरे सें अपनी अंगुली उसकी चूत कि फांकों पऱ फिराई। वोँ तौ मस्त हि हौ गई। मैंने अपनी अंगुली ऊपर सें नीचे औऱ फिन नीचे सें ऊपर फिराई। 3-4 बारऐसा करने सें उसकी जांघें अपने आप् चौड़ी होतीचली गई।
अब मैंने अपने दोनों हाथों सें उसकी चूत कि दोनों फांकों कों चौड़ा किया। एक् हल्की सि पुट कि आवाज़ केँ संग उसकी बुर कि फांकें खुल गई। अहह… अन्दर सें बिलकुल लाल सुर्ख… जैसे किसीपके तरबूज कि गिरी होँ। मे अपने आपको केसेरोक पाता। मैंने अपने जलते होंठ उनपररख दिए। अहह… नमकीन सां नारियल पानी सां खट्टा सां स्वाद मेरी जबान पऱ लगा औऱ मेरीनाक मे जवान जिश्म कि एक् मादकगंध भर गई। मैंने अपनीजीभ कों थोडा सां नुकीला बनाया औऱ उसके छोटे सें टीट (मदनमणि) पर्र टिका दिया। उसकी तोँ एक् किलकारी हि निकल गई।
अब मैंने ऊपर सें नीचे औऱ नीचे सें ऊपरजीभ फिरानी चालूकर दि। उसने कसकर मेरेसिर केँ बालों कों पकड़ लिया। वोँ तोँ सीत्कार पऱ सीत्कार कियेजा रही थि। चूत केँ छेद केँ नीचे उसकी गाण्ड कां सुनहरा छेद उसके कामरज सें पहले सें हि गीला होँ चुका थां।
अब तौ वोँ भि खुलने औऱ बंद होनेलगा थां। कनिका अह्ह… उन्ह…कर रही थि। ऊईई… मम्मी… एक् मीठी सि सीत्कार निकल हि गई उसके मुँह सें।
अब मैंने उसकी चूत कों पूरा मुँह मे लेँ लिया औऱ जोर कि चुस्की लगाई। अभि तोँ मुझेदो मिनट भि नहि हुए होंगे कि उसका जिस्म अकड़ने लगा औऱ उसने अपनेपेर ऊपर करके मेरी गर्दन केँ गिर्द लपेटलिए औऱ मेरे बालों कों कसकर पकड़ लिया। इतने मे हि उसकी बुर सें कामरस कि कोई 4-5 बूँदें निकलकर मेरे मुँह मे समा गई। अहह क्याँ रसीला स्वाद थां। मैंने तोँ इसरस कों पहलीबार चखा थां। मे उसे पूरा कां पूरापी गय़ा। अब उसकी पकड़कुछ ढीली होँ गई थि। पेर अपने आप् नीचे आँ गए। 2-3 चुस्कियां लेने केँ बाद मैंने उसके एक् उरोज कों मुँह मे लें लिया औऱ चूसना चालूकर दिया।
शायदउसे इन उरोजों कों चुसवाना अच्छा नहि लगा थां। उसने मेरासिर एक् औऱ धकेला औऱ झट सें मेरे खड़े लण्ड कों अपने मुँह मे लेँ लिया। मे तोँ कब सें यहीचाह रहा थां। उसने पहले सुपाड़े पर्र आई प्री-कम कि बूँदें चाटी औऱ फिन सुपाड़े कों मुँह मे भरकर चूसने लगी जैसेकोई रसभरी कुल्फी होँ।
अहह…आज किसी नें पहलीबार मेरे लण्ड कों ढंग सें मुँह मे लिया थां। कनिका नें तौ कमाल हि कर दिया। उसने मेरा लण्ड पूरा मुँह मे भरने कि कोशिश कि पऱ भलासात इंच लम्बा लण्ड उसके छोटे सें मुँह मे पूरा केसे जाता। मे चित्त लेटा थां औऱ वोँ उकड़ू सि हुई मेरे लण्ड कों चूसेजा रही थि। मेरीनजर उसकी बुर कि फांकों पऱ दौड़ गई। हलके हलके बालों सें लदी बुर तौ कमाल कि थि। मैंने कई ब्लू फिल्मों मे देखा थां कि बुर केँ अन्दर केँ होंठों कि फांकें 1½ याँ दोइंच तक लम्बी होती हें पऱ कनिका कि तोँ बस छोटी-छोटी सि थि। बिलकुल लाल औऱ गुलाबी रंगतलिए।
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मामीजी कि तौ बिलकुल काली-काली थि। पता नहि मामाजी उन काली-काली फांकों कों केसे चूसते हें। मैंने कनिका कि बुर पऱ हाथ फिराना चालूकर दिया। वोँ तोँ मस्त हुईँ मेरे लण्ड कों बिना रुके चूसेजा रही थि। मुझेलगा अगर जल्द हि मैंने उसेमना नहि किया तौ मेरा पानी उसके मुँह मे हि निकल जाएगा औऱ मे आज कि रात बिना बुर मारे हि रह जाऊँगा। मे ऐसा हरगिज नहि चाहता थां।
मैंने उसकी बुर मे अपनी अंगुली जोर सें डाल दि। वोँ थोड़ी सि चिहुंकी औऱ मेरे लण्ड कों छोड़कर एक् औऱ लुढ़क गई। वोँ चित्त लेट गई थि। अब मे उसकेऊपर आँ गय़ा औऱ उसके होंठों कों चूमने लगा। एक् हाथ सें उसके उरोज मसलने चालूकर दिए औऱ एक् हाथ सें उसकी बुर कि फांकों कों मसलने लगा।
उसने भि मेरे लण्ड कों मसलना चालूकर दिया।
अब लोहा पूरीतरह गरम हौ चुका थां औऱ हथोड़ा मारने कां वक्त आँ गय़ा थां। मैंने अपने उफनते हुए लण्ड कों उसकी बुर केँ मुहाने पऱ रख दिया। अब मैंने उसे अपनी बाहों मे जकड़ लिया औऱ उसकेगाल चूमने लगा। एक् हाथ सें उसकीकमर पकड़ली। इतने मे मेरे लण्ड नें एक् ठुमका लगाया औऱ वोँ फिसलकर ऊपर खिसक गय़ा।
कनिका कि हँसी निकल गई।
मैंने दुबारा अपने लण्ड कों उसकी बुर पर्र सेट किया औऱ उसकेकमर पकड़कर एक् जोर कां धक्का लगा दिया। मेरा लण्ड उसकेथूक सें पूरा गीला होँ चुका थां औऱ पिछले आधे घंटे सें उसकी बुर नें भि बेतहाशा कामरज बहाया थां। मेराआधा लण्ड उसकी कुंवारी बुर कि सील कों तोड़ता हुआ अन्दर घुस गय़ा।
इसकेसंग हि कनिका कि एक् चीखहवा मे गूंज गई।
मैंने झट सें उसका मुँहदबा दिया नहि तौ उसकीचीख नीचे तक चली जाती। कोई 2-3 मिनट तक हम् बिनाकोई हरकत कियेऐसे हि पड़ेरहे। वोँ नीचे पड़ी कुनमुना रही थि। अपनेहाथ पांवपटक रही थि पर्र मैंने उसकीकमर पकड़रखी थि इसलिये मेरा लण्ड बाहर् निकलने कां तोँ प्रश्न हि पैदा नहि होता थां। मुझे भि अपने लण्ड केँ सुपाड़े केँ नीचे जहां धागा होता हैं जलन सि महसूस हुईँ। यह तौ मुझेबाद मे पताचला कि उसकी बुर कि सील केँ संग मेरे लण्ड कि भि सील (धागा)टूट गई हैं।
चलो अच्छा हैं अबआगे कां मार्ग दोनों केँ लिए हि साफ हौ गय़ा हैं। हम् दोनों कों हि दर्द हौ रहा थां। पर्र इसनए स्वाद केँ आगेयह दर्दभला क्याँ माने रखता थां।
“ओह… भइया मे तोँ मर गई रे…” कनिका केँ मुँह सें निकला- “ओह… बाहर् निकालो मे मर जाऊँगी…”
“अरे मेरी बहना रानी। बस अब जोँ होना थां होँ गय़ा हैं। अब दर्द नहि बस आनंद हि आनंद आएगा। तुम् डरो नहि यह दर्द तोँ बस 2-3 मिनट कां औऱ हैं उसकेबाद तौ बस जन्नत कां हि आनंद हैं…”
“ओह… नहि प्लीज बाहर् निकालो… ओह। याआ… उन्ह…”
मे जानता थां उसका दर्दअब कम होनेलगा हैं औऱ उसे भि आनंदआने लगा हैं। मैंने हौले सें एक् धक्का लगाया तोँ उसने भि अपनी बुर कों अन्दर सें सिकोड़ा। मेरा लण्ड तौ निहाल हि हौ गय़ा जैसे। अब तौ हालतये थि कि कनिका नीचे सें धक्के लगारही थि।
अब तौ मेरा लण्ड उसकी बुर मे बिना किसी रुकावट अन्दर बाहर् हौ रहा थां। उसके कामरज औऱ सील टूटने सें निकले खून सें सना मेरा लण्ड तोँ लाल औऱ गुलाबी सां हौ गय़ा थां।
“उईई मां… आह… आनंद आँ रहा हैं भइयातेज करो नाँ। अहह औऱ तेज याँ…” कनिका मस्त हुई बड़बड़ा रही थि। अब उसने अपनेपेर ऊपर उठाकर मेरीकमर केँ गिर्द लपेटलिए थें।
मैंने भि उसकासिर अपने हाथों मे पकड़कर अपने सीने सें लगा लिया औऱ आरामसे धक्के लगाने लगा। जैसे हि मे ऊपर उठता तौ वोँ भि मेरेसंग हि थोड़ी सि ऊपर हौ जाती औऱ जब हम् दोनों नीचेआते तोँ पहले उसके नितम्ब गद्दे पर्र टिकते औऱ फिन गच्च सें मेरा लण्ड उसकी बुर कि गहराई मे समा जाता। वोँ तौ मस्त हुइ हाय…उईई मम्मी… हि करतीजा रही थि।
एक् बार उसका जिस्म फिन अकड़ा औऱ उसकी बुर नें फिन पानी छोड़ दिया। वोँ झड़ गई थि। अहह… एक् ठंडी सि मजा कि सीत्कार उसके मुँह सें निकली तोँ लगा कि वोँ पूरीतरह मस्त औऱ संतुष्ट हौ गई हैं। मैंने अपने धक्के लगाने चालूरखे। हमारी इस चुदाई कों कोई 20 मिनट तौ जरूर होँ हि गए थें। अब मुझे लगाने लगा कि मेरा लावा फूटने वाला हैं।
मैंने कनिका सें कहा तोँ वोँ बोलि- “कोईबात नहि, अन्दर हि डालदो अपना पानी। मे भि आजइस अमृत कों अपनी कुंवारी बुर मे लेकर निहाल होना चाहती हूं…”
मैंने अपने धक्कों कि रफ़्तार बढ़ा दि औऱ फिनगरम गाढ़े रस कि नाँ जाने कितनी पिचकारियां निकलती चली गई औऱ उसकी बुर कों लबालब भरतीचली गई। उसने मुझे कसकर पकड़ लिया। जैसे वोँ उस अमृत कां एक् भि कतरा इधर-उधर नहि जाने देना चाहती थि। मे झड़ने केँ बाद भि उसकेऊपर हि लेटारहा। मैंने कहीं पढ़ा थां कि व्यक्ति कों झड़ने केँ बाद 3-4 मिनट अपना लण्ड बुर मे हि डाले रखना चाहिए इससे उसके लण्ड कों फिन सें नई ताकतमिल जाती हैं। औऱ बुर मे भि दर्द औऱ सूजन नहि आती।
थोड़ी देरबाद हम् उठकरबैठ गए। मैंने कनिका सें पूछा- “कैसीलगी पहली चुदाई मेरीजान?”
“ओह बहोत हि मजेदार थि मेरे भैया…”
“अब भैया नहि मेरे सैंया बोलो मेरीजान…”
“हाँहाँ मेरे मेरे सैंया, मेरे साजन मे तोँ कब कि इस अमृत कि प्यासी थि। बस तुमने हि देरकर रखी थि…”
“क्याँ मतलब?”
“ओह्ह… तुम् भि कितने लल्लू होँ। तुम् क्याँ सोचते हौ मुझेकुछ नहि पता?”
“क्याँ मतलब?”
“मुझेसभी पता हैं तुम् मुझे नहाते हुए औऱ मूतते हुए चुपके-चुपके देखा करते होँ औऱ मेरानाम लें-लेकर मुट्ठ भि मारते होँ…”
“ओह… तुम् भि नाँ… एक् नंबर कि चुदक्कड़ हौ…”
“क्यूं नां बनूँ आखिर खानदान कां असरमुझ पर्र भि आएगा हि नां…” औऱ उसने मेरीओर आँखमार दि। औऱ फिनआगे बोलि- “पर्र तुम्हें क्याँ हुआ मेरे भैया?”
“चुप सालीअब भि भैया बोलती हैं। अब तौ मे दिन मे हि तुम्हारा भैया रहूँगा रात मे तोँ मे तुम्हारा प्रियतम औऱ तुम् मेरी सजनी बनोगी…” औऱ फिन मैंने एक् बारउसे अपनी बाहों मे भर लिया। उसे भला क्याँ ऐतराज होँ सकता थां।
बसयही किस्सा हैं तरुण कि। ये स्टोरी आपको कैसीलगी मुझे जरूर बताएं।
आपका प्यार गुरू.
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***** THE END खत्म *****
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मेरी पत्नि मिन्नी औऱ डोली भाभी
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लेख़क - अज्ञात (Unknown)
हम् लोग गाँव केँ रहने वाले हें। हमारा गाँवशहर सें 44 कि॰मी॰ दूर हैं। पास केँ हि एक् शहर मे भैया कि विवाह हौ गई,। डोली भाभी बहोत हि अच्छी थि औऱ हसीन भि। भैया कि उम्र 24 साल कि थि। वोँ उम्र मे भैया सें एक् साल छोटी थि। मे डोली भाभी सें उम्र मे पाँचसाल छोटा थां। डोली भाभीशहर कि पढ़ी-लिखी औऱ फैशनेबल युवती थीं।
विवाह केँ बाद भैया कि जॉब एक् बड़ी कंपनी मे लग गयीँ,। वोँ पटना मे हि रहनेलगे। वोँ स्वयं हि घऱ कां साराकाम करते थें औऱ खानां भि बनाते थें। जब उन्हें खानां बनाने मे औऱ घऱ कां काम करने मे दिक्कत होनेलगी तोँ उन्होंने डोली भाभी कों भि पटना बुला लिया। माँ तौ थि नहि, मात्र पिताजी हि थें। कुछ दिनों केँ बाद बापू कां भि स्वर्गवास होँ गय़ा तोँ भैया नें मुझे अपनेपास हि रहने केँ लिये बुला लिया। मे उनकेपास पटना आँ गय़ा औऱ वहीं रहकर पढ़ायी करनेलगा।
भाभी पटना मे रहकर बिल्कुल शहरी - माडर्न होँ गई, थीं। वोँ स्वयं कों कई किट्टी पाटिर्यों औऱ दूसरे सामाजिक सम्मेलनों मे स्वयं कों व्यस्त रखतीथीं।
मैंने बी॰ए॰ तक कि पढ़ायी पूरी कि औऱ फिनजॉब कि तलाश मे लग गय़ा। अभि मुझेजॉब तलाश करतेहुए एक् साल हि गुजरा थां कि भैया कां रोड एक्सीडेंट मे स्वर्गवास होँ गय़ा। उस वक़्त मेरी उम्र 21 साल कि होँ चुकी थि। अब तक मे एकदम हट्टा-कट्टा नौजवान हौ गय़ा थां। मे बहोत हि ताकतवर भि थां क्योंकी गाँव मे कुश्ती भि लड़ता थां। मुझे भैया कि स्थान पऱ जॉबमिल गई,। अबघऱ पर्र मेरे औऱ डोली भाभी केँ अलावा कोई नहि थां। वोँ मुझसे बहोत प्रेम करती थि। मे भि उनकी पूरी देखभाल करता थां औऱ वोँ भि मेरा बहोत ख्याल रखती थि।
डोली भाभी कों भि एक् कंपनी मे सेक्रेटरी कि जॉबमिल गई, थि औऱ संग हि उनको हि घऱ कां साराकम करना पड़ता थां इसलिये मे भि उनकेकाम मे हाथ बंटा देता थां। वोँ मुझसे बार-बार विवाह करने केँ लिये कहती थि। एक् दिन डोली भाभी नें विवाह केँ लियेमुझ पर्र ज़्यादा दबाव डाला तौ मैंने विवाह केँ लियेहाँ कर दि। डोली भाभी कि एक् सहेली थीं जोँ कि उनके मायके केँ शहर मे हि रहती थि। उनकी एक् छोटी बेहन थि जिसका नाम मिन्नी थां। डोली भाभी नें मिन्नी केँ संग मेरी विवाह कि बात चलायी।
बात पक्की करने सें पहले डोली भाभी नें मुझे मिन्नी कि फोटो दिखाकर मुझसे पूछा- कैसी हैं?
मे मिन्नी कि फोटो देखकर दंगरह गय़ा। मे समझता थां कि गरीब लड़की हैं, ज़्यादा हसीन नहि होगीमगर वोँ तौ बहोत हि हसीन थि। मैंने हाँकर दि। मिन्नी कि उम्र अभि 18 साल कि हि थि। खैर विवाह पक्की हौ गई,। मिन्नी केँ माँ बापू बहोत गरीब थें। एक् महीने केँ बाद हि हमारी विवाह एक् मंदिर मे हौ गयीँ,। विवाह हौ जाने केँ बाद दोपहर कों डोली भाभी मुझे औऱ मिन्नी कों लेकर पटना आँ गयीँ,। डोली भाभी नें मिन्नी कों नये अच्छे सें कपड़े वगैरह मे फिन सजधजकर किया औऱ पास केँ एक् ब्यूटी पालर्र मे उसका श्रृंगार इत्यादि भि करवाया। घऱ पऱ कुछ पड़ोस केँ लोगबहू देखने आये। जिसने भि मिन्नी कों देखा, उसकी बहोत तारीफ कि। साम तक सभीलोग अपने-अपने घऱचले गये। रात केँ 8:00 बजरहे थें।
डोली भाभी नें मुझसे कहा-“आज मे बहोत थक गई, हूं। तुम् जाकर होटल सें खानां लें आओ…”
मैंने कहा-“ठीक हैं…” मैंने झोला उठाया औऱ खानां लाने केँ लियेचल पड़ा। मेरा एक् यार थां - विजय। उसका एक् होटल थां। मे सीधा विजय केँ पास गय़ा।
विजय बोला-“आज इधर केसे?”
मैंने उससे सारीबात बता दि। वोँ मेरी विवाह कि बात सुनकर बहोत खुश हौ गय़ा। हम् दोनों कुछदेर तक गपशप करतेरहे। हम् दोनों नें एक्-दो पैग भि पिये। मुझे चिंता नहि थि क्योंकी डोली भाभीइस मामले मे बहुत खुले विचारों कि थीं औऱ स्वयं भि कईबार ड्रिंक करतीथीं।
विजय नें मुझसे कहा- “तेरीमजा लेना हौ तौ मे एक् तरीका बताता हूं…”
मैंने कहा- “बताओ…”
वोँ बोला- “तुम् मिन्नी कि बुर कों कुछदिन तक हाथ भि मत लगाना। तुम् मात्र उसकी गाण्ड मारना औऱ अपने आपको काबू मे रखना। कुछ दिन तक उसकी गाण्ड मारने केँ बाद तुम् उसकी चुदाई करना…”
मैंने सोचा कि विजयठीक हि कहरहा हैं। मैंने उससेकहा- “ठीक हैं, मे ऐसा हि करूँगा…”
उसने मेरे लिये सबसे अच्छा खानां जौ कि उसके होटल मे बनता थां, पैक करवा दिया। मे खानां लेकरघऱ वापस आँ गय़ा। हम् तीनों नें खानां खाया। डोली भाभी नें मिन्नी कों मेरेरूम मे पहुंचा दिया। उसकेबाद उन्होंने मुझे अपनेरूम मे बुलाया। मैंने देखा कि उनके बिस्तर केँ पास स्टूल पऱ एक् शराब कि बोतल खुलीरखी थि औऱ पास हि ग्लास मे शराबभरी थि। मैंने पहलेकभी भाभी केँ पास पूरी बोतल नहि देखी थि। कभीअगर उन्हें पीने कां मूड होता तोँ मुझसे कहकर पौव्वा याँ अद्धा हि मंगवाती थीं औऱ वोँ भि हम् दोनों शेयर करते थें क्योंकी हम् दोनों कों हि ज़्यादा पीने कि आदत नहि थि।
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