woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 17
4:15
स्नेहा पिलर सें टिककर खड़ी थि। उसने अपनीशॉल कों कसकर लपेटा हुआ थां।
उसकी नज़रें रास्ते पऱ जमी थीं। हॉल सें स्टूडेंट्स कां भीड़ बाहर् आँ रहीथीं।
"स्नेहा! चलरही हैं ?" रिया नें अपनेगले मे मफलर लपेटते हुए आवाज़ दि। अंजलि भि उसकेसंग थि।
स्नेहा नें अपनी नज़रें रास्ते सें हटाए जवाब दिया, "तुम् लोग निकलो। मुझे बाज़ार सें कुछ लेना हैं, मे आँ जाऊँगी। "
"अकेले जाएगी इतनीठंड मे? रुकहम भि चलते हें, " अंजलि नें कहा।
"अरे नहि, तुम् लोगजाओ।, " स्नेहा कि आवाज़ मे एक् हल्की सि झुंझलाहट थि जोँ रिया नें पकड़ली।
"ठीक हैं, मत आँ। हम् जारहे हें, " रिया नें अंजलि कां हाथ खींचा औऱ दोनों कोहरे मे गायब होँ गईं।
समय गुज़रता गय़ा। 4:45। 5:15.
शिलॉन्ग मे सर्दियाँ बहोत जल्दसाम लेँ आती हें। 5:30 बजते-बजते आसमान काला पड़ने लगा।
स्नेहा अभि भि वहीं खड़ी थि। उसकेपेर ठंड सें सुन्न हौ चुके थें। उसने अपने दोनों हाथों कों रगड़कर अपने गालों पऱ रखा। उसके होंठों पऱ लगा वोँ चेरीलिप बामअब सूख चुका थां क्योंकि वोँ गुस्से मे अपने होंठचबा रही थि।
6:00 बजगए। कैंटीन वाला भि शटर गिराने लगा थां।
"मैडम, हम् बंदकर रहे हें, " उस व्यक्ति नें आवाज़ लगाई।
स्नेहा कि आँखों केँ किनारे गीले होनेलगे।
उसने गुस्से मे अपनीआँख कों अपनीशॉल केँ किनारे सें पोंछा।
"नहि आनां थां तौ बोल देता। इतनीठंड मे खड़ा करने कि क्याँ ज़रूरत थि, " स्नेहा केँ मुँह सें बमुश्किल यह शब्द निकले। उसने अपनाबैग कंधे पऱ औऱ कस लिया औऱ गेस्ट हाउस कि तरफ मुड़ गई।
मार्ग सुनसान हौ चुका थां। ऊंचे चीड़ केँ पेड़ों केँ बीच सें गुज़रती वोँ मार्ग बहोत डरावनी लगरही थि, मगर स्नेहा कों इस टाइम किसी कां डर नहि थां। उसके अंदरबस क्रोध उबलरहा थां।
उसकीचाल बहोत तेज़ थि। हरकदम केँ संग उसकी साँसें भारी होँ रहीथीं।
लगभगआधा मार्ग पार करने केँ बाद, सामने धुंध केँ बीच सें एक् परछाईं भागती हुईँ आती दिखी।
जूतों कि आवाज़ मार्ग पऱ गूंजरही थि।
"दिदी! स्नेहा दि!"
वोँ आवाज़ आरव कि थि। वोँ दौड़ता हुआ आँ रहा थां। उसने जैकेट कि ज़िप भि नहि लगाई थि औऱ उसके बिखरे हुए थें।
आरव भागते हुए स्नेहा केँ बिल्कुल सामने आकर रुका। उसकी साँसें तेज़चल रहीथीं। उसनेझुक कर अपने घुटनों पऱ हाथरखा औऱ एक् लंबी साँसली।
"दि। आईएम सॉरी। वोँ मे."
चटाक्!
सन्नाटे कों चीरती हुई एक् आवाज़ गूंजी।
स्नेहा कां हाथ कांपरहा थां। उसने पूरी ताकत सें, अपने सुन्न पड़े हाथों सें आरव केँ गाल पऱ एक् ज़ोरदार थप्पड़ जड़ दिया थां।
आरव एकदम सुन्न रह गय़ा। उसने धीरे-धीरे सें अपना चेहरा सीधा किया। उसके गोरेगाल पऱ स्नेहा कि उँगलियों केँ लाल निशान साफ़उभर आए थें। उसने अपनाहाथ अपनेगाल पर्र रखा, मगर नज़रें नीचे हि रखीं।
स्नेहा कि आँखें आंसुओं सें भरीथीं औऱ बेइंतहा क्रोध औऱ एक् दर्द थां।
बिना एक् भि शब्द बोले, स्नेहा नें अपनाबैग ठीक किया औऱ आरव केँ बगल सें निकलकर आगे बढ़ने लगी।
आरव कुछ सेकंड वहीं खड़ारहा, फिन वोँ मुड़ा औऱ स्नेहा केँ पीछे-पीछे चलनेलगा।
"दि। मेरीबात तौ सुनलो." आरव कि आवाज़ मे लाचारी थि।
स्नेहा नें नाँ पलटकर देखा, नां अपनीचाल धीमी कि। वोँ बस अपने आंसुओं कों रोकते हुए तेज़ी सें चलतीरही।
आरव नें अपनेकदम तेज़किए औऱ स्नेहा केँ आगेआकर उसका मार्ग रोक लिया।
"दिदी, प्लीज। मुझेपता हैं मैंने बहोत वेट कराया हैं। आप् मुझेदो थप्पड़ औऱ मारलो, पऱ प्लीज ऐसे नज़रअंदाज़ मतकरो। मेरीबात सुनलो, " आरव नें कहा।
स्नेहा नें अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया। "मुझेकोई बात नहि करनीआरव। हट मेरे रास्ते सें। "
"मे नहि हटूंगा दि। आप् रोरहे होँ। मेरीवजह सें। "
"मे रो नहि रही हूं!" स्नेहा नें झटके सें अपनी आँखें पोंछीं। "औऱ तुम् होतेकौन होँ मुझे रुलाने वाले? मैंने तुम्हें कहा थां 4 बजेआने कों! ढाई घंटे.ढाई घंटे मे उस बर्फ जैसी कैंटीन केँ बाहर् खड़ीरही। तुम् नहि आँ सकते थें तोँ मुझेकह देते! मे पागलों कि तरह तुम्हारा इंतजार क्यूं करतीरही?"
स्नेहा कि आवाज़ अब थोड़ी तेज़ होँ गई थि। उसका सारा क्रोध बाहर् आँ रहा थां।
आरव कि आँखों मे भि अबनमी आँ गई।
"दि। मे पीसीओ (PCO) पऱ थां। मे वहा सें हिल नहि सकता थां। "
स्नेहा नें गुस्से सें उसे देखा। "पीसीओ? क्यूं? दोस्तों सें गप्पे मारने थें तुम्हें?"
"नहि दि, " आरव नें बहोत हि शांत, मगर भारी आवाज़ मे कहा। "सुप्रिया दि कां मोबाइल आया थां गेस्ट हाउस केँ नंबर पऱ। वोँ बहोत रोरही थीं। "
स्नेहा कां क्रोध अचानक एक् झटके मे शांत हौ गय़ा।
। "सुप्रिया दि? क्यूं? क्याँ हुआघऱ पे?"
"मधु दि कि ड्यूटी पऱ उनकेसंग हादसा होँ गय़ा थां। पुलिस स्टेशन केँ पास किसी वाहन नें उनको टक्कर मार दि थि, " आरव नें अपनी मुट्ठी भींचते हुएकहा।
"सुप्रिया दि हॉस्पिटल मे थीं। उन्होंने मुझे पीसीओ पऱ कॉलआई करने कों कहा थां। मे पिछले दो घंटे सें उस पीसीओ बूथ केँ अंदर खड़ा थां दि। सुप्रिया दि नें कहा थां कि वोँ डॉक्टर सें बात करके मुझे वापसकॉल आई करेंगी। मे वोँ रिसीवर छोड़कर नहि आँ सकता थां। "
स्नेहा केँ हाथ सें उसकेबैग कि स्ट्रैप छूट गई। उसका पूरा जिस्म सुन्न पड़ गय़ा।
"मधु.मधु ठीक हैं?" स्नेहा कि आवाज़ एकदम कांप गई।
"हाँ दि। उनकेहाथ मे फ्रैक्चर हैं औऱ पेर मे चोटआई हैं। पऱ वोँ खतरे सें बाहर् हें। सुप्रिया दि कां 15 मिनट पहले हि मोबाइल आया थां कि वोँ मधु दि कों घऱ लें आई हें। जैसे हि मैंने मोबाइल रखा, मे सीधावहा सें भागता हुआआया हूं। "
आरव नें अपने चेहरे पर्र हाथ फेरा। उसकेउस गाल पऱ अभि भि वोँ लाल निशान थां जहाँ स्नेहा नें थप्पड़ मारा थां।
स्नेहा वहीं मार्ग केँ बीचों-बीच खड़ीरह गई। उसे अपने आप् पर्र इतन क्रोध आँ रहा थां कि वोँ बता नहि सकती थि।
उसनेआरव केँ उसलाल पड़ेगाल कों देखा। उसका भइयादो घंटे सें अपनी बेहन केँ लिए पीसीओ बूथ मे थां, औऱ उसने बिनाकुछ सुनेउसे थप्पड़ मार दिया थां।
"आरव। मे." स्नेहा केँ होंठ कांपने लगे। उसके आँसू बहनेलगे थें।
"कोईबात नहि दि। मुझेपता हैं आपकोठंड लगरही थि। चलिए, रूम पर्र चलते हें। "
औऱ स्नेहा केँ संग-संग गेस्ट हाउस कि तरफ चलनेलगा। स्नेहा बस चुपचाप रोतेहुए उसकेबगल मे चलरही थि।
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PART 18
गेस्ट हाउस केँ कमरे कां द्वार (दरवाज़ा) खुला।
अंदरआरव नें दीवार टटोलकर स्विच ऑन किया। ट्यूबलाइट कि पीली रोशनी कमरे मे फैली।
स्नेहा नें अपनीशॉल उतारे बिना सीधा टेबल कि तरफकदम बढ़ाए।
उसके अभि भि हाथ बुरीतरह कांपरहे थें। उसने लैंडलाइन मोबाइल कां रिसीवर उठाया औऱ जल्द सें गुवाहाटी कां एसटीडी कोड औऱ घऱ कां नंबर घुमाया।
आरव चुपचाप दरवाज़े केँ पास खड़ा रहा। उसकी नज़रें स्नेहा पऱ टिकीथीं।
"हेलो। हेलो सुप्रिया दि?" "दि। मधु कैसी हैं?"
रिसीवर सें सुप्रिया कि हल्की आवाज़ आँ रही थि, "रोमत स्नेहा। वोँ ठीक हैं। अभि दर्द कि दवाईखा केँ सोई हैं। "
स्नेहा नें अपना दूसरा हाथ मुँह पऱ रख लिया ताकि उसकी रोने कि सिसकियों कि आवाज़ सुप्रिया तक नां जाए।
"दि। मुझेबात करनी हैं उससे."
"वोँ सोरही हैं स्नेहा। सुभहबात कर लेना। तूँ रोनाबंद कर। आरव हैं नां तेरेपास? उसने बताया नहि तुम्हें?"
स्नेहा नें मुड़कर दरवाज़े केँ पास खड़ेआरव कों देखा। उसका वोँ गाल अभि भि हल्का लाल थां।
"हाँ दि। बताया उसने। आप् अपना ध्यान रखना। "
स्नेहा नें रिसीवर वापस क्रैडल पर्र रखा। कमरे मे एकदम सन्नाटा छा गय़ा। केवल स्नेहा केँ भारी-भारी साँसें लेने कि आवाज़ आँ रही थि। आरव नें कहा, "दि, आप् फ्रेश होँ जाओ। मे रिसेप्शन सें बोलकर डिनर यहीं मंगवा लेता हूं। "
आरव मुड़कर दरवाज़े कि तरफ जानेलगा।
"आरव." स्नेहा कि आवाज़ नें उसकेकदम रोकदिए।
आरव पलटा। स्नेहा दौड़ती हुई उसकेपास आई। उसनेआरव केँ चेहरे कों अपने दोनों कांपते हाथों मे भर लिया।
"मुझे क्षमा करदेआरव। प्लीज मुझे क्षमा करदे, " स्नेहा फूट-फूट कर रोनेलगी।
उसकी उँगलियाँ आरव केँ उसगाल कों सहलारही थीं जहाँ उसने थप्पड़ मारा थां। "मे कितनी गंदी हूं। तूँ मधु केँ लिए खड़ारहा। औऱ मैंने बिनाकुछ सुने."
स्नेहा कि सिसकियाँ कमरे मे गूंजरही थीं।
आरव नें धीरे-धीरे अपने दोनों हाथ स्नेहा केँ हाथों केँ ऊपररखे।
उसने स्नेहा केँ हाथों कों अपने चेहरे सें हटाया औऱ उन्हें अपनी हथेलियों मे कसकर पकड़ लिया।
"दि, प्लीज। आप् क्यूं रोरहे हौ? आप् अपनी स्थान बिल्कुल सहीथीं। कोई भि लड़की इतनीठंड मे अकेले इंतजार करेगी तौ उसे क्रोध आएगा हि। चूँकि मे आपका भइया हूं, इसलिये आपकाहक़ बनता हैं क्रोध करने कां। इसमें माफ़ी मांगने वालीकोई बात नहि हैं। "
"नहि आरव." स्नेहा नें उसे कसकरगले लगा लिया।
" तूँ मुझे वहींरोक सकता थां। "
आरव नें झिझकते हुए अपना एक् हाथ स्नेहा कि पीठ पर्र रखा औऱ उसे हल्का सां थपथपाया। "आप् उस टाइमकुछ सुनने कि हालत मे नहि थीं दि। औऱ वैसे भि, थप्पड़ सें ज्यादा दर्द मुझे आपको रोतेहुए देखकर हौ रहा हैं। प्लीज, अब शांत होँ जाइए। "
स्नेहा नें आरव कि जैकेट कों अपनी मुट्ठियों मे जकड़ लिया। उसे अपनेइस छोटे भइया कि मैच्योरिटी पर्र रोना आँ रहा थां। जौ लड़का हमेशा उससे दबकर रहता थां, आज वोँ हीं हालात कों संभाल रहा थां।
लगभगदस मिनटबाद, स्नेहा थोड़ी शांत हुईँ। उसने वॉशरूम मे जाकर मुँह धोया।
रूम सर्विस सें डिनर आँ चुका थां। टेबल पऱ सूप, कुछ रोटियां औऱ सब्ज़ी रखी थि। दोनों आमने-सामने बैठे थें। माहौल मे अभि भि भारी खामोशी थि।
स्नेहा नें एक् रोटी कां टुकड़ा तोड़ा, उसे सब्ज़ी मे लगाया औऱ सीधाआरव केँ मुँह केँ सामने कर दिया।
आरव नें नज़रें उठाकर स्नेहा कों देखा। स्नेहा कि आँखें अभि भि लालथीं औऱ सूजी हुइ थीं।
"खा लेँ। " स्नेहा नें बहोत हि धीमी आवाज़ मे कहा।
आरव नें भि वोँ निवाला खा लिया। पूरा डिनर खामोशी मे हि बीता। आरव अपनीतरफ सें पूरी कोशिश कररहा थां कि स्नेहा कों अनकंफर्टेबल नाँ फील हौ, मगर स्नेहा केँ अंदर कां वोँ गिल्ट उसे अंदर हि अंदरखाए जारहा थां।
रात केँ 10:30 बज चुके थें।
बाहर् कोहरे नें पूरी घाटी कों अपने कब्ज़े मे लें लिया थां। कमरे कां हीटरफुल पऱ चलरहा थां।
आरव नें लाइटबंद कि। मात्र लैंप कि हल्की पीली रोशनी कमरे मे थि।
दोनों पलंग पर्र लेटे।
आरव नें जानबूझकर आज स्नेहा सें थोडा फासला बनाकर रखा थां। वोँ रजाई केँ बिल्कुल किनारे पऱ लेटा थां, अपनीपीठ स्नेहा कि तरफ करके।
स्नेहा सीधी लेटीछत कों ताड़रही थि। उसकी आँखें आरव कि पीठ पऱ जा टिकीं।
कमरे केँ उस सन्नाटे मे, स्नेहा कों आरव कां वोँ दूर लेटना बर्दाश्त नहि हौ रहा थां। उसेलग रहा थां कि आरव अभि भि अंदर सें आहत हैं।
स्नेहा नें धीरे-धीरे सें करवटली। उसने रजाई केँ अंदर हि अपनाहाथ आगे बढ़ाया औऱ आरव कि टी-शर्ट कों पीछे सें पकड़कर हल्का सां खींचा।
आरव नें कोई हरकत नहि कि।
स्नेहा थोडा औऱ खिसककर आरव केँ लगभग आँ गई। उसने अपना एक् हाथआरव कि कमर केँ ऊपर सें डाला औऱ उसे अपनीतरफ पलट लिया।
आरव पलटा औऱ सीधे स्नेहा कि आँखों मे देखने लगा। दोनों केँ चेहरों केँ बीच केवलकुछ इंच कां फासला थां।
बिना एक् भि शब्द बोले, स्नेहा नें आरव केँ कंधे पर्र हाथरखा औऱ उसे अपनीतरफ खींच लिया। उसनेआरव कां सिर सीधा अपने सीने पऱ रख लिया।
आरव कां पूरा जिस्म एक् सेकंड केँ लिए अकड़ गय़ा। स्नेहा नें उसे इतनी ज़ोर सें अपनी छाती सें लगारखा थां कि आरव कों स्नेहा केँ दिल कि तेज़ धड़कनें अपने कानों मे साफ़ सुनाई देरही थीं। स्नेहा केँ बूब्स आरव केँ चेहरे सें दबगए थें।
स्नेहा अपनी उँगलियों सें आरव केँ बालों कों सहलारही थि।
"दि." आरव कि आवाज़ रजाई केँ अंदरदब कररह गई।
"शशशश." स्नेहा नें आरव कि पीठ सहलाते हुएउसे औऱ कसकर अपने सीने मे भींच लिया।
आरव नें अपनी आँखें बंदकर लीं। शिलॉन्ग कि उसठंड रात मे, स्नेहा केँ बदन कि गर्माहट औऱ उसके बालों सें आतीगंध आरव कों पिघला रही थि।
कुछ मिनटों तक दोनों उसी पोज़ीशन मे लेटेरहे। आरव कि साँसें स्नेहा केँ गले औऱ छाती कि दरार पर्र पड़रही थीं, जिससे स्नेहा केँ पूरे जिस्म मे एक् सिहरन दौड़रही थि।
अचानक स्नेहा नें आरव केँ चेहरे कों हल्का सां ऊपर उठाया।
आरव नें अपनी आँखें खोलीं। लैंप कि रोशनी मे स्नेहा कां चेहरा एक् अजीब सि कशिश सें भराहुआ थां।
स्नेहा नें आरव केँ उसगाल कों छुआ। वोँ गाल अभि भि हल्का सां गरम थां।
स्नेहा कां चेहरा आरामसे आरव केँ चेहरे केँ लगभगआने लगा। आरव कि साँसें गले मे हि फंसगईं।
स्नेहा नें अपनी आँखें बंदकीं औऱ अपने होंठ सीधाआरव केँ उसगाल पऱ रखदिए।
आरव कि मुट्ठियाँ रजाई केँ अंदरकस गईं।
स्नेहा नें अपने होंठवहा सें नहि हटाए। बल्कि, उसने अपने होंठों कों आरव केँ गाल पर्र नीचे कि तरफ सरकाना शुरुआत किया।
वोँ होंठगाल सें होतेहुए, आरव केँ होंठों केँ बिल्कुल किनारे तक आँ गए।
स्नेहा कि गरम साँसें सीधेआरव केँ होठों पऱ टकरारही थीं।
स्नेहा अभि भि आँखें बंदकिए हुए थि। उसके होंठआरव केँ होंठों केँ किनारे पऱ बहोत हि हल्के सें रगड़खा रहे थें।
आरव कां दिमाग़ पूरीतरह सें सुन्न पड़ गय़ा।
रजाई केँ अंदर, आरव केँ पजामे मे उसका लन्ड सख्त होनेलगा थां।
स्नेहा कां एक् पेरआरव कि टांगों केँ ऊपर थां।
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PART 20
दोनों केँ चेहरे एक्-दूसरे सें इतनी लगभग थें कि साँसें आपस मे उलझरही थीं।
आरव कां लन्ड स्नेहा कि जांघ पर्र दबावबना रहा थां। स्नेहा केँ होंठ हल्के सें कांपरहे थें। उसकी नज़रें आरव केँ होंठों पऱ आँ टिकीं।
आरव कां सीना तेज़ी सें ऊपर-नीचे हौ रहा थां।
स्नेहा कां चेहरा अब औऱ लगभग आँ गय़ा। दोनों केँ होंठों केँ बीचअब शायद एक् इंच कां भि फासला नहि थां।
स्नेहा नें अपनी आँखें धीरे-धीरे सें बंदकर लीं। आरव कि साँसें भारी होँ गईं। वोँ पूरीतरह सें सुन्न थां, मगरआरव होंठों कों पीने केँ लिएआगे कि तरफ हल्का सां झुका।
उनके होंठबस एक्-दूसरे कों छूने हि वाले थें कि.
धड़!धड़! धड़!
किसी नें दरवाजा खड़काना शुरुआत करदिए।
"ओए पिंटू! खोलगेट! अबे कितनी देर लगाएगा?"
स्नेहा झट सें पीछेहटी। वोँ हड़बड़ा करखाट केँ दूसरे कोने पऱ खिसक गई औऱ उसने रजाई सीधा अपनेगले तक खींचली। उसका सीना ज़ोर सें धड़करहा थां।
आरव कि हालत तौ औऱ भि खराब थि। वोँ झट सें उठकरबैठ गय़ा।
"अबे पिंटू! सो गय़ा क्याँ बे?" बाहर् सें फिन आवाज़ आई औऱ संग मे दरवाज़े केँ हैंडल कों ज़ोर सें हिलाने कि आवाज़।
आरव नें जल्द सें एक् तकिया अपनीगोद मे रखा ताकि उसकी लन्ड कि हालतछुप सके।
उसने स्नेहा कि तरफ देखा। स्नेहा बस रजाई पकड़े हुए दरवाज़े कि तरफदेख रही थि।
"दि। मे। मे देखता हूं, " आरव कि आवाज़ पूरीतरह सें फटी हुईँ थि।
उसनेखाट सें उतरने सें पहले अपनी टी-शर्ट कों नीचे कि तरफ खींचा। फिन कुर्सी पऱ पड़ी अपनी जैकेट उठाई औऱ उसे पहनकर ज़िपआधी बंदकर ली। उसने स्वयं कों थोडा नॉर्मल किया औऱ जाकर दरवाज़े कि कुंडी खोल दि।
द्वार (दरवाज़ा) खुलते हि शराब कि बदबू अंदरआई।
सामने एक् पच्चीस-छब्बीस साल कां लड़का खड़ा थां। उसने स्वेटर पहनाहुआ थां औऱ उसकी आँखें आधीबंद थीं।
"अबे पिंटू। तूने इतनीदेर." उस लड़के नें केहना शुरुआत किया, मगर फिन उसने आँखें खोलकर आरव कों देखा।
आरव कि कद औऱ उसके चौड़े कंधों कों देखकर वोँ लड़का एक् कदम पीछे हौ गय़ा।
"भैया, आप् गलतरूम मे आँ गए हें। यह पिंटू कां रूम नहि हैं, " आरव नें शांत आवाज़ मे कहा, मगर वोँ दरवाज़े केँ बीचों-बीच खड़ा थां ताकि वोँ लड़का अंदर नां आँ सके।
उस शराबी नें अपनी आँखें सिकोड़ीं। उसने दरवाजे केँ ऊपरलगा नंबर देखा। "अरे। यह 204 हैं? शिट दोस्त। पिंटू तोँ 205 मे हैं। "
"जी। आप् प्लीज वहाचेक कर लीजिए, " आरव नें द्वार (दरवाज़ा) बंद करने कि कोशिश कि।
मगरउस शराबी लड़के नें थोडा सां साइड होकर कमरे केँ अंदर झांक लिया। बेडसाइड लैंप कि रोशनी मे उसेबैड पऱ बैठी स्नेहा दिख गई। स्नेहा केँ बाल बिखरे हुए थें, चेहरा लाल थां औऱ वोँ रजाई कों कसकर पकड़े हुए थि। उस सन्नाटे औऱ दोनों कि हालत देखकर कोई भि बता सकता थां कि कमरे मे क्याँ चलरहा थां।
उस शराबी लड़के केँ चेहरे पऱ एक् मुस्कान आँ गई।
"ओह हौ! बॉस!समझ गय़ा, समझ गय़ा, " उस लड़के नें आरव केँ कंधे पऱ हाथ मारते हुएआँख मारी। "अरे भइया, रोमांस चलरहा हैं यहा तौ। औऱ मैंने कबाब मे हड्डी बनके पूरामूड खराबकर दिया!"
"भैया, आप् प्लीज जाइये यहा सें, " आरव नें उसकाहाथ अपने कंधे सें हटाया।
"अरेजा रहा हूं मेरे भइया! क्रोध क्यूं कररहा हैं?" वोँ लड़का हँसते हुए पीछेहटा। फिन उसने थोडा झुककर स्नेहा कि तरफहाथ हिलाया। "सॉरीमैम ! माफ़ी चाहता हूं!। गलतसमय पे एंट्री मार दि। आप् लोग अपना रोमांस चालूरखो। सॉरीमैम, भइया कों डिस्टर्ब कर दिया मैंने। कैरीऑन! कैरीऑन!"।
आरव नें बिना एक् सेकंड औऱ लगाए, झट सें द्वार (दरवाज़ा) बंद किया औऱ अंदर सें लॉककर दिया।
'खटॅक!'
कमरे मे सन्नाटा छा गय़ा।
आरव दरवाज़े सें पीठ टिकाकर खड़ा थां। उसकी साँसें तेज़चल रहीथीं। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ स्नेहा सें नज़रें केसे मिलाएगा।
आरव नें धीरे-धीरे सें मुड़कर खाट कि तरफ देखा।
स्नेहा रजाई केँ अंदर सिकुड़ी हुई थि। उसकी नज़रें बैड कि चादर पर्र गड़ीथीं। वोँ आरव कि तरफदेख भि नहि रही थि। अभि कुछ मिनट पहले वोँ दोनों क्याँ करने वाले थें? अगर वोँ व्यक्ति नाँ आता, तौ आजइस कमरे मे वोँ कौन सि हदपार कर जाते?
आरव पलंग कि तरफआया।
"दि." आरव केँ मुँह सें बस इतना हि निकला।
स्नेहा नें जल्दी अपनाहाथ उठाया, जैसेकह रही होँ कि अभि कुछमत कहो। उसने बिनाआरव कि तरफ देखे रजाई केँ अंदर हि अपनी करवटबदल ली औऱ दीवार कि तरफ मुँह करकेलेट गई।
आरव वहीं खड़ारहा। उसेसमझ नहि आँ रहा थां कि वोँ क्याँ करे। उसने धीरे-धीरे सें अपनी जैकेट उतारी औऱ कुर्सी पर्र रख दि।
वोँ बैड केँ दूसरे किनारे पर्र जाकरलेट गय़ा।
उसनेहाथ बढ़ाकर बेडसाइड लैंप कां स्विच बंदकर दिया। कमरे मे अब अँधेरा थां। बाहर् शिलॉन्ग कि ठंडीहवा खिड़की सें टकरारही थि।
"गुड नाईट दि, " आरव नें बहोत हि दबी हुइ आवाज़ मे कहा।
कुछ सेकंड तक कोई जवाब नहि आया। फिन रजाई केँ उसपार सें एक् बहोत हि कांपती हुइ आवाज़ आई।
"गुड नाईट। "
कमरे मे अँधेरा थां, मगर नींद दोनों मे सें किसी कि भि आँखों मे नहि थि। आरव सीधे लेटकर छत कों देखरहा थां, औऱ स्नेहा दीवार कि तरफ मुँहकिए अपनी आँखों कों कसकरबंद किएहुए थि। दोनों कि धड़कनें अभि भि नॉर्मल नहि हुई थीं।
woh Sirf Meri Behene nahee - Kahani ab aur interesting hogi
Lajawab update.kahan suruwat kisi or say honi lag rahi thi yahan sneha hi aage bad rahi h . Dekte haen aage kya hotha h.pr pyaar or vasana ko alag rakhna
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