woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 16
बाथरूम केँ दरवाज़े कि कुंडी खुलने कि आवाज़ नें कमरे केँ सन्नाटे कों तोड़ा।
आरव, जोँ अब तक पलंग केँ किनारे बैठा अपने हि ख्यालों मे उलझा थां, उसने झटके सें दरवाज़े कि तरफ देखा। अंदर सें स्नेहा निकली।
आरव कि नज़रें उस पऱ पड़ीं औऱ वोँ एक् लम्हा केँ लिएपलक झपकाना भूल गय़ा।
स्नेहा चलतेहुए आई औऱ बिल्कुल आरव केँ पासआकर बैठ गई। उसके बैठने सें गद्दा थोडा सां दबा औऱ आरव हल्का सां उसकीतरफ खिसक गय़ा।
"क्याँ हैं? ऐसे क्याँ ताड़रहा हैं ?" स्नेहा नें तौलिये सें अपनेबाल खोलते हुए बिंदास अंदाज़ मे पूछा।
। "नहि। कुछ नहि दि। वोँ बस.आज आप् कुछअलग लगरही होँ। "
स्नेहा नें अपने गीले बालों कों झटकते हुएआरव कि तरफ देखा। बालों सें पानी कि कुछ ठंडी बूंदें उड़कर सीधाआरव केँ गाल औऱ उसकी टी-शर्ट पऱ गिरीं।
"दि! क्याँ दोस्त, इतनीठंड हैं!" आरव नें अपनागाल पोंछते हुए शिकायत कि।
स्नेहा हँसी।
"तोँ क्याँ हौ गय़ा? थोडा सां पानी हि तोँ हैं। गुवाहाटी मे तोँ बारिश मे शर्ट उतार केँ नहाता फिरता थां, यहादो बूंदों मे कुल्फी जम गई?"
स्नेहा कां यह अंदाज़ आरव केँ लिए बिल्कुल नया थां। वोँ समझ नहि पारहा थां कि इस लड़की कों अचानक क्याँ हौ गय़ा हैं।
तभी कमरे केँ बाहर् दरवाज़े पर्र नॉक हुआ। "रूम सर्विस। "
आरव नें उठकर द्वार (दरवाज़ा) खोला औऱ नाश्ता कि ट्रे अंदर लें आया। दो प्लेट मे गर्मा-गरम आलू केँ पराठे, आम कां अचार औऱ दोकपगरम चाय। उसने ट्रेबीच वाली छोटी टेबल पऱ रखी औऱ दोनों कुर्सियां खींचलीं।
स्नेहा नें अपनेबाल एक् क्लिप मे बांधे औऱ कुर्सी पऱ बैठ गई। उसने अपनी प्लेट कि तरफ देखा भि नहि औऱ बिनाकुछ सोचे सीधाआरव कि प्लेट सें एक् पराठे कां बड़ा सां टुकड़ा तोड़ा, उसे अचार मे डुबोया औऱ अपने मुँह मे डाल लिया।
"अरे दि ! आपकी प्लेट वोँ वाली हैं, यह तौ मेरा पराठा हैं, " आरव नें अपनी कुर्सी पऱ बैठते हुए अपनी प्लेट कि तरफ इशारा किया।
स्नेहा नें गरमचाय कां एक् घूंट लिया, कप अभि भि उसके होठों सें लगाहुआ थां औऱ उसकी आँखें आरव पऱ टिकीथीं। उसनेकप नीचेरखा औऱ बोलि, "तौ? मे तेरी बड़ी बेहन हूं, मेराहक़ पहले बनता हैं तेरीहर चीज़ पऱ। औऱ वैसे भि, दूसरों कि थाली कां खानां अधिक टेस्टी लगता हैं। नहि?"
स्नेहा बोलते हुए एक् आँख मारी।
आरव केँ गले मे निवाला फंस गय़ा। उसे ज़ोर सें खाँसी आई। उसने जल्द सें पानी कां गिलास उठाया औऱ दो घूंटपिए। "दिदी कों क्याँ होँ गय़ा हैं? यह.यह मुझे लाइनमार रही हें क्याँ? नहि-नहि, आरव, दिमाग़ खराब हौ गय़ा हैं तेरा। वोँ तेरी दिदी हें, बस मज़ाक कररही होंगी। "
"आहिस्ता खा मेरे भइया, कोई, " स्नेहा नें मुस्कुराते हुए अपनापेर टेबल केँ नीचे सें आगे किया।
टेबल छोटी थि। अचानक आरव कों महसूस हुआ कि स्नेहा कां पेर उसकी जींस केँ ऊपरपेर सें हल्का सां टकरारहा हैं। आरव नें जल्दी अपनापेर पीछे खींच लिया, यह सोचकर कि शायद स्थान कम होने कि वजह सें गलती सें लग गय़ा होगा।
मगर स्नेहा कां पेरफिन सें आगेआया। इसबार गलती कि कोई गुंजाइश नहि थि। स्नेहा नें अपने पांव कां अँगूठा आरव कि जींस केँ किनारे पऱ हल्के सें रगड़ा।
आरव नें नज़रें उठाकर स्नेहा कों देखा। स्नेहा बहोत हि आहिस्ता अपना पराठा खारही थि, जैसेउसे कुछपता हि नाँ हौ।
"दि। वोँ। पांवलग रहा हैं आपका, "आरव नें हकलाते हुए, दबी हुइ आवाज़ मे कहा। उसे समझ नहि आँ रहा थां कि वोँ रिएक्ट केसेकरे।
स्नेहा नें उसकीतरफ देखा। "तोँ तूँ हटा लेँ अपनापेर। मेरी टांगें लंबी हें, मे क्याँ करूँ? मुझे तोँ ऐसे हि बैठना हैं। "
स्नेहा आरव कां मजा लेँ रही थि।
ब्रेकफास्ट ख़त्म करने केँ बाद स्नेहा अपनी पुस्तक बैग मे डालने लगी।
शिलॉन्ग कि सुभह कि ठंड कि वजह सें उसकेहाथ एकदम ठंडे होँ रहे थें। उसने अपने दोनों हाथों कों आपस मे रगड़ा।
"इतनीठंड हैं दोस्त, " स्नेहा नें फुसफुसाते हुएकहा, औऱ फिन अचानक मुड़कर आरव कों देखा। "आरव, इधर आँ। "
"जी दि?" आरव टेबल सें प्लेटें समेटरहा थां।
"इधर तोँ आँ पहले। "
आरव अपनी स्थान सें उठा औऱ ब उसकेपास आकर खड़ा हौ गय़ा।
स्नेहा नें बिनाकुछ कहेआरव कां दायां हाथ पकड़ लिया। आरव कि हथेलियाँ हमेशा कि तरहगरम औऱ सख्तथीं। स्नेहा नें उसकी हथेली कों सीधा अपनी ठंडी, गोरी गर्दन औऱ गाल पऱ रख लिया।
"आहह-आहह। कितना चैन हैं तेरे हाथों मे, " स्नेहा नें अपनी आँखें बंद करतेहुए एक् गहरी साँसली।
स्नेहा कि गर्दन कि वोँ नर्म त्वचा, उसके बालों सें आती खुशबू, औऱ उसकाऐसे आँखें बंद करकेआरव केँ हाथ कि गर्माहट कों महसूस करना.आरव कां लन्ड जोँ सुभह सें पजामे मे शांत पड़ा थां, वोँ हरकत मे आनेलगा थां।
आरव नें अपनाहाथ पीछे खींचने कि कोशिश कि। "दि। आप् लेट हौ जाओगी। 8:30 बजगए हें। "
स्नेहा नें आँखें खोलीं। उसनेआरव कां हाथ छोड़ा नहि, बल्कि आरव केँ चेहरे केँ बिल्कुल लगभग आँ गई। उसकी साँसें आरव कि ठुड्डी पऱ पड़रही थीं।
"तुम्हे बड़ी जल्द हैं मुझेयहा सें भेजने कि? क्यूं? "
"म। मे क्याँ करूँगा दि? मे तोँ बस आपकी फिक्र."
स्नेहा नें आरव कि टी-शर्ट कां कॉलर पकड़ा औऱ बोलि, "कलबस मे तौ बड़ाबन रहा थां तूँ। आज क्याँ हुआ?आज क्यूं घबरारहा हैं मुझसे?"
कल कि बस वालीबात सुनते हि आरव कां चेहरा एकदम सफेदपड़ गय़ा।
"दि। वोँ कल। मुझे क्षमा करदो। वोँ गलती सें."
स्नेहा नें अपनी उँगली आरव केँ होंठों पऱ रख दि। "शशशश। मैंने कुछकहा क्याँ?
स्नेहा नें आरव केँ होंठों सें उँगली हटाई, उसे एक् बहोत हि कातिलाना मुस्कान दि औऱ अपनाबैग कंधे पऱ टांग लिया औऱ वोँ दरवाज़े तक गई फिनरुक गई। उसने मुड़कर आरव कों देखा जोँ अभि भि थां।
"साम कों ठीक 4 बजे आँ जानां। औऱ हाँ.लेट मत होना, " स्नेहा नें प्रेम भरेटोन मे कहा।
"जी दि। आँ जाऊँगा, " आरव नें किसीतरह थूक निगलते हुएकहा।
'खटॅक!'
abi Tak accha likha h aapne Keep it up Jaldbazi mat krna slowly slowly seduced karke aage badhana. Jaldbazi mai read karne mai woh real wali feeling nahii hoty. Esliye slowly slowly open Karwana bahano k sath. Waiting For Next Update
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बहोत-बहोत शुक्रिया आपका जौ आप् इस बेहतरीन कथा कों प्रस्तुत कररहे हें
बहोत हि लाजवाब अच्छी रचना हैं आपकी अभि तक इसीतरह स्टोरी मे रोमांचक लम्हा लेते आइये
अगलाभाग प्रस्तुत करिये भइया साहब प्रतिक्षा नहि होती
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PART 17
कमरे अभि भि स्नेहा कि गंध थि। आरव कि नज़र पलंग केँ पासरखी कुर्सी पऱ गई।
वहा स्नेहा कां रात वाला पजामा औऱ टी-शर्ट पड़े थें। औऱ उन्हीं कपड़ों केँ ठीक नीचे स्नेहा कि पैंटी औऱ उसकी ब्रारखी थि, जिसे वोँ नहाने सें पहले उतारकर गई थि।
आरव केँ कदम स्वयं-ब-स्वयं उस कुर्सी कि तरफगए। कमरे कां हीटरचल रहा थां, मगरआरव केँ जिस्म कां तापमान उस हीटर सें कहीं अधिक थां। उसने कांपते हुए हाथों सें वोँ गुलाबी पैंटी उठाई। कपड़े मे अभि भि स्नेहा केँ बदन कि हल्की सि महक मौजूद थि।
आरव कां गलासूख गय़ा।
उसने अपने ट्रैक पैंट औऱ अंडरवियर घुटनों तक नीचे सरका दिया। उसका लन्ड पूरीतरह सख्त होँ चुका थां।
आरव नें स्नेहा कि उस पैंटी कों अपने चेहरे केँ लगभग लाया औऱ उसे अपनीनाक औऱ होठों सें लगा लिया औऱ उस कपड़े सें आतीमहक कि मदहोशी मे खोताचला गय़ा। उसनेहाथ सें अपने लन्ड कों मसलना शुरुआत कर दिया।
उसकी आँखें बंदथीं।
वोँ स्नेहा कि ब्रा कों अपने दूसरे हाथ मे भींचते हुए अपनी उत्तेजना केँ बिल्कुल चरम पऱ पहुँच गय़ा।
आरव नें अपना सारागरम औऱ गाढ़ा रसकुछ टिशू पेपर्स केँ अंदर निकाल दिया। वोँ कुछ लम्हा वहीं कुर्सी केँ पास ज़मीन पर्र बैठा हाँफता रहा।
नॉर्मल होने केँ बाद उसने स्वयं कों साफ़ किया। उसने स्नेहा कि पैंटी औऱ ब्रा कों बिल्कुल उसीतरह कपड़ों केँ नीचे वापसरख दिया, जैसे स्नेहा उन्हें छोड़कर गई थि।
शिलॉन्ग कि सड़कें कोहरे कि सफेद चादर मे लिपटी हुइ थीं।
स्नेहा नें अपनीशॉल कों अपने कंधों पऱ कस लिया। उसकेकदम हॉल कि तरफबढ़ रहे थें, मगरआज वोँ बहोत आहिस्ता चलरही थि।
हॉल केँ बाहर् बहुत भीड़ थि। अलग-अलग कॉलेजों केँ स्टूडेंट्स कप कॉफ़ी लिए खड़े थें। स्नेहा अपनीशॉल ठीक करतेहुए मेनगेट कि तरफ बढ़ी।
"ओए स्नेहा! इधर!"
स्नेहा नें मुड़कर देखा। रिया औऱ अंजलि गरमचाय लिए उसकीतरफ हि आँ रहीथीं।
"क्याँ बात हैं मैडम?आज तौ बड़ी फुर्सत सें आँ रही हैं, " रिया नें स्नेहा कों कंधे सें हल्का सां धक्का देतेहुए छेड़ा।
"कुछ नहि दोस्त, बसआज सुभह जल्दआँख खुल गई थि। समय थां तौ धीरे-धीरे आँ गई। "
अंजलि नें अपनी आँखें छोटीकीं औऱ स्नेहा केँ चेहरे कों बहोत ध्यान सें देखा।
"आजकल स्किन बड़ी ग्लोकर रही हैं तेरी। चक्कर क्याँ हैं?"" अंजलि नें स्नेहा केँ गाल कों हल्का सां छुआ।
स्नेहा नें अंजलि कां हाथझटक दिया। "पागल होँ गई हैं क्याँ? चलो अंदर, लेक्चर शुरुआत होने वाला हैं। "
तीनों लड़कियाँ सेमिनार हॉल केँ अंदरआकर मिडिल रो मे बैठगईं।
प्रोजेक्टर ऑनहुआ औऱ डॉक्टरने ह्यूमन नर्वस सिस्टम औऱ सेंसरी रिस्पॉन्स पर्र अपना लेक्चर शुरुआत किया। हॉल मे एकदम सन्नाटा थां, मात्र प्रोजेक्टर कि हल्की आवाज़ औऱ माइक सें गूंजती डॉक्टर कि भारी आवाज़ आँ रही थि।
स्नेहा नें अपनी डायरी खोली औऱ पेन निकाल कर बोर्ड कि तरफ देखने लगी।
"जब जिस्म कां कोई सेंसरी नर्व किसी बाहरी स्पर्श कों महसूस करता हैं, तौ वोँ सीधा दिमाग़ केँ हाइपोथैलेमस कों सिग्नल भेजता हैं."
डॉक्टर केँ शब्द स्नेहा केँ कानों मे पड़ तोँ रहे थें, मगर उसकामन कहीं औऱ हि थां। बोर्ड पर्र बनी नसों कि तस्वीरें स्नेहा कि आँखों केँ सामने धुंधली होँ गईं औऱ उनकी स्थान आरव कां पानी सें भीगाहुआ चौड़ा सीना आँ गय़ा।
स्नेहा कि पकड़ अपनेपेन पऱ मज़बूत होँ गई। उसेयाद आँ रहा थां कि केसेआरव केँ गरमहाथ उसकी गर्दन पर्र रखे थें। केसेआरव कि उँगलियों उसकी त्वचा पऱ महसूस हुआ थां।
स्नेहा नें अपनी दोनों टांगों कों आपस मे कसकरदबा लिया।
इस मूवमेंट सें उसकी पैंटी कां वोँ हिस्सा जौ सुभह सें हि हल्का-हल्का नम थां, वोँ उसकी सबसे नाज़ुक स्थान पर्र ज़ोर सें रगड़खा गय़ा।
स्नेहा केँ मुँह सें एक् सिसकी निकल गई। उसने जल्द सें अपना दूसरा हाथ अपने मुँह पऱ रख लिया।
रिया, जौ उसके बिल्कुल बगल मे बैठी नोट्स बनारही थि, उसने तिरछी नज़र सें स्नेहा कों देखा।
"स्नेहा। ओए? क्याँ हुआ?पेन क्यूं चबारही हैं?" रिया नें फुसफुसाते हुए पूछा।
स्नेहा नें सच मे अपनापेन अपने होंठों केँ बीचदबा रखा थां औऱ उसे ज़ोर सें काटरही थि। उसने झटके सें पेन मुँह सें निकाला। "क.कुछ नहि। वोँ बस। डायग्राम समझ नहि आँ रहा थां। "
रिया नें बोर्ड कि तरफ देखा, जहाँ मात्र कुछ बेसिक पॉइंट्स लिखे थें। उसने वापस स्नेहा कों अजीब नज़रों सें देखा, पऱ कुछ बोलि नहि।
लेक्चर केँ बाद एक् घंटे कां प्रैक्टिकल सेशन थां। सब स्टूडेंट्स कों जोड़ियों मे बांट दिया गय़ा थां। स्नेहा औऱ रिया एक् संगथीं।
"ठीक हैं, अब तुम् लोग एक्-दूसरे कां पल्सरेट औऱ कार्डियक रिदमचेक करोगे, " इंस्ट्रक्टर नें निर्देश दिया।
रिया नें स्नेहा कि कलाई पकड़ी औऱ अपनी उँगलियाँ उसकी नब्ज़ पऱ रखदीं। वोँ अपनी घड़ी मे देखने लगी।
उसने स्नेहा कि कलाई कों औऱ ज़ोर सें पकड़ा।
"अबें? स्नेहा, तूँ ठीक तोँ हैं नां?" रिया नें अपनी घड़ी सें नज़र हटाकर सीधा स्नेहा कि आँखों मे देखा।
"हाँ, क्याँ हुआ?" स्नेहा नें बहोत हि नॉर्मल रहने कि कोशिश करतेहुए पूछा।
"तेरा हार्ट रेट 115 चलरहा हैं!
इतनी तेज़ नब्ज़ क्यूं चलरही हैं तेरी?" रिया नें हैरानी सें पूछा।
स्नेहा नें झटके सें अपनाहाथ रिया कि पकड़ सें छुड़ा लिया। उसका चेहरा लाल हौ गय़ा थां। "अरे वोँ। मैंने सुभह स्ट्रांग ब्लैक कप कॉफ़ी पीली थि नाँ। शायदउसी वजह सें। "
"कप कॉफ़ी? तूँ तोँ कप कॉफ़ी पीती हि नहि हैं। "
"पीली थि आज! तूँ अपनाकाम कर नाँ, " स्नेहा नें बात कों घुमाते हुए अपना स्टेथोस्कोप उठाया औऱ रिया केँ सीने कि तरफ बढ़ा दिया।
दोपहर केँ 2 बज चुके थें। दोपहर का खाना ब्रेक मे स्नेहा नें मुश्किल सें एक् सैंडविच खाया। उसका जिस्म एक् अजीब सि बेचैनी सें गुज़र रहा थां। वोँ बार-बार हॉल केँ दरवाज़े कि तरफदेख रही थि, जहाँ सें कलआरव उसकेलिए लञ्च लेकरआया थां। पऱ आजआरव वहा नहि थां।
स्नेहा उठी औऱ सीधा वॉशरूम कि तरफचली गई।
वॉशरूम खाली थां। उसने बेसिन कां नल खोला औऱ ठंडे पानी अपने चेहरे पऱ मारे। पानी कि ठंडक सें उसे थोडा चैन मिला।
उसने अपना चेहरा पोंछा औऱ आईने मे स्वयं कों देखा। पानी कि कुछ बूंदें अभि भि उसकी गर्दन सें फिसलकर उसकेसूट केँ गले मे जारही थीं।
स्नेहा नें अपनेबैग कि ज़िप खोली। वोँ हमेशा केवलपेन, डायरी औऱ एक् छोटी सि कंघी रखती थि। मगरआज उसनेबैग केँ अंदर वाले पॉकेट मे हाथ डाला औऱ एक् छोटी सि डब्बी निकाली। एक् हल्के चेरीकलर कां लिपबाम, जोँ उसने जानेकब सें अपनेबैग मे डालरखा थां औऱ कभी इस्तेमाल नहि किया थां।
स्नेहा नें आईने केँ लगभग अपना चेहरा किया। उसने वोँ लिपबाम लिया औऱ उसे अपने निचले होंठ पर्र मलना शुरुआत किया।
उसे याद आँ रहा थां कि आज सुभहजब वोँ खाट पऱ आरव केँ बिल्कुल लगभग थि, तौ आरव कि साँसें इन्हीं होंठों पर्र टकरारही थीं।
स्नेहा नें अपने दोनों होंठों कों आपस मे मला। चेरी कां वोँ हल्का सां रंग औऱ चमक उसके होंठों पर्र आँ गई थि। वोँ आईने मे स्वयं कों देखती रही। उसने अपनेसूट केँ गले कों हल्का सां खींचा, जिससे उसकी गर्दन थोड़ी औऱ साफ़ दिखने लगी।
वोँ वॉशरूम सें बाहर् आँ गई।
3 बज चुके थें।
अंतिम सेशनचल रहा थां। हॉल मे बहुत स्टूडेंट्स उबासी लेँ रहे थें, मगर स्नेहा कि हालतकुछ औऱ हि थि। वोँ अपनी कुर्सी पर्र टिककर बैठ हि नहि पारही थि। वोँ बार-बार अपनी घड़ीदेख रही थि।
3:15.
3:30.
स्नेहा नें अपनी डायरी बंद कि। उसने अपनेपेन कों कैप लगाया औऱ बैग मे डाल दिया।
"क्याँ कररही हैं? अभि 20 मिनटबचे हें, " रिया नें फुसफुसा करकहा।
"मेरा हौ गय़ा आज कां। मुझे जौ नोट करना थां मैंने कर लिया, " स्नेहा नें अपनीशॉल कों समेटते हुए बहोत हि बेपरवाह अंदाज़ मे जवाब दिया।
वोँ लगातार अपनी उँगलियों सें टेबल पर्र टैपकर रही थि। उसका एक् पांव लगातार हिलरहा थां।
जैसे हि 4 बजे कि घंटीबजी औऱ प्रोफेसर नें 'थैंकयू क्लास' कहा, स्नेहा पहली स्टूडेंट थि जोँ अपनी स्थान सें उठी।
उसने अपनाबैग कंधे पऱ डाला।
। वोँ दौड़ते हुएहॉल केँ मेनगेट कि तरफबढ़ गई।
हवा मे ठंडक थि, मगर स्नेहा कों कोईठंड महसूस नहि हौ रही थि। उसकी नज़रें आस-पास कि भीड़ मे मात्र एक् चेहरे कों ढूँढरही थीं।
। वोँ लगातार अपनी उँगलियों सें टेबल पऱ हल्का-हल्का टैपकर रही थि। उसका एक् पांव लगातार हिलरहा थां।
जैसे हि 4 बजे कि घंटीबजी औऱ प्रोफेसर नें 'थैंकयू क्लास' कहा, स्नेहा पहली स्टूडेंट थि जौ अपनी स्थान सें उठी।
उसने अपनाबैग कंधे पर्र डाला।
"ओए रुकजा! संग चलते हें, " अंजलि नें पीछे सें आवाज़ लगाई।
स्नेहा नें पीछे मुड़कर देखा तक नहि। वोँ दौड़ते हुए सेमिनार हॉल केँ मेनगेट कि तरफबढ़ गई।
हवा मे ठंडक थि, मगर स्नेहा कों कोईठंड महसूस नहि हौ रही थि। उसकी नज़रें भीड़ मे केवल एक् चेहरे कों ढूँढरही थीं।
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