woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
Part 12
बस केँ अंदर स्नेहा आरव केँ ठीकआगे खड़ी थि। आरव केँ दोनों हाथ स्नेहा केँ कंधों केँ दोनों तरफ सें होतेहुए ऊपर वालीरॉड कों पकड़े हुए थें।
पहाड़ी रास्तों पर्र बस बार-बार हिचकोले खारही थि। हर झटके केँ संग स्नेहा कां गांडआरव केँ जांघों औऱ कमर सें टकरारहा थां।
आरव कां दिमाग़ सुन्न पड़ने लगा। उसने स्वयं कों कंट्रोल करने कि कोशिश कि।
कुछ हि मिनटों मे, आरव केँ पैंट केँ अंदर उसका लन्ड पूरीतरह सें खड़ा होनेलगा। आरबस ईश्वर सें प्रार्थना कररहा थां कि यह किसीतरह शांत होँ जाए, मगर इतनी नज़दीकी मे यह केसे मुमकिन थां?
तभीबस एक् बड़े सें गड्ढे मे गई। 'धचक्क!'
स्नेहा कां जिस्म ज़ोर सें पीछे कि तरफ उछला औऱ आरव कां पूरीतरह सें तनाहुआ, सख्त लन्ड सीधा स्नेहा केँ गांड कि दरार केँ ठीकबीच मे जाकर टकराया।
स्नेहा कों अपनीपीठ केँ निचले हिस्से पऱ एक् चीज़ चुभती हुई महसूस हुई।
पहले तोँ स्नेहा थोडा आगे खिसकने कि कोशिश कि।
मगर भीड़ इतनी थि कि आगेइंच भर भि स्थान नहि थि। बसफिन सें हिली, औऱ इसबार आरव कां वोँ लन्ड स्नेहा केँ कूल्हों पर्र ज़ोर सें रगड़खा गय़ा।
स्नेहा कों समझने मे अधिकदेर नहि लगी।
। स्नेहा कां दिमाग़ सुन्न हौ गय़ा।
"हे ईश्वर! यह.यह क्याँ ? आरव? नहि। स्नेहा कां चेहरा गुस्से सें लाल होँ गय़ा।
पीछेआरव कि हालत खराब थि। वोँ बार-बार अपनीकमर कों पीछे खींचने कि कोशिश कररहा थां ताकि उसका खड़ाहुआ लन्ड स्नेहा कों नाँ छुए।
स्नेहा सें अब बर्दाश्त नहि हुआ। एक् तौ उस व्यक्ति कि टेंशन औऱ ऊपर सें अब इसके स्वयं केँ भइया कि बेशर्मी!
स्नेहा नें पूरी ताकत लगाकर, भीड़ केँ बीच मे हि स्वयं कों पीछे कि तरफ मोड़ा। अब वोँ आरव कि तरफ चेहरा करके खड़ी थि। दोनों केँ चेहरों केँ बीच मात्र कुछइंच कां फासला थां।
स्नेहा कि आँखें गुस्से सें बड़ी हौ रहीथीं, नथुने फूलरहे थें। वोँ चिल्ला नहि सकती थि।
स्नेहा नें आँखों हि आँखों मे आरव कों घूरते हुए इशारा किया—"यह क्याँ बदतमीज़ी हैं? पीछेहट!"
आरव नें बिनाकुछ बोले, अपना एक् हाथरॉड सें हटाया औऱ अपने दोनों कान पकड़लिए सॉरी बोलने केँ अंदाज़ मे। उसकी आँखों मे लाचारी थि जैसे वोँ कहरहा हौ—"दि, मे जानबूझकर नहि कररहा!
स्नेहा नें अपने दाँतपीस लिए। उसनेआरव कों अपनी उँगलियों सें ज़ोर सें चूँटी (Pinch) काटी।
"आउच!" आरव केँ मुँह सें हल्की सि चीख निकल गई।
आस-पास केँ दो-तीन लोगों नें मुड़कर देखा। स्नेहा नें जल्दी झूठी स्माइल दि औऱ आरव कों घूरते हुए फुसफुसाई, "साँस अंदर खींच अपनी! औऱ बिल्कुल पीछे चिपकजा खिड़की सें!"
आरव नें अपनापेट इतना अंदर खींच लिया वोँ पीछे कि तरफऐसे झुक गय़ा।
स्नेहा कों लगा कि अब वोँ आरव कि तरफ मुँह करके खड़ी हैं, तोँ शायद वोँ 'चीज़'उसे महसूस नहि होगी।
मगर तभीबस केँ ड्राइवर नें एक् ज़ोरदार ब्रेक मारा।
आगे खड़ेलोग पीछे कि तरफ गिरे औऱ धक्के सें आरव जौ पीछे कि तरफ झुकाहुआ थां, वोँ सीधा होँ गय़ा। औऱ अब.आरव कां वोँ पूरीतरह सें तनाहुआ लन्ड सीधा स्नेहा केँ पेट औऱ उसकी नाभि केँ ठीक नीचे बुर पर्र जाकरदब गय़ा।
"उफ़्फ़." स्नेहा केँ मुँह सें एक् दबी हुइ कराह निकल गई।
आरव कि आँखें भि फटी कि फटीरह गईं।
अब स्थिति औऱ भि बदतर होँ गई थि। आरव कां खड़ा लन्ड स्नेहा केँ कुर्ते केँ ऊपर सें उसकेपेट पर्र चुभरहा थां। बस नें फिन सें अपनी रफ्तार पकड़ी।
हर झटके केँ संगआरव कां लन्ड स्नेहा केँ पेट औऱ बुर पऱ ऊपर-नीचे रगड़ खानेलगा।
स्नेहा नें गुस्से सें आरव कों घूरा।
मगर जैसे-जैसे मिनटबीत रहे थें यह क्रोध मजा मे बदलने लगा।
रगड़ सें स्नेहा केँ बदन कां तापमान बढ़ने लगा।
स्नेहा अभि भि ऊपर सें गुस्से मे आरव कों देखरही थि, मगर उसकी साँसें भारी होनेलगी थीं। वोँ स्वयं कों रोक नहि पारही थि। हरबार जबबस केँ झटके सें आरवक लन्ड उसकेपेट पर्र ज़ोर सें दबता, स्नेहा कि जांघों केँ बीच एक् अजीब सि मीठी सिहरन दौड़ जाती। उसकी आँखें अब आरामसे आधीबंद होनेलगी थीं। वोँ अपने निचले होंठ कों अपने दाँतों तले भींचरही थि ताकि उसके मुँह सें कोई आवाज़ नां निकले।
"मुझे क्रोध आनां चाहिए। यह मेरा भइया हैं। पऱ। स्नेहा अंदर हि अंदर पूरीतरह सें एक्साइटेड होँ चुकी थि।
आरव स्नेहा केँ चेहरे केँ बदलते हुए भावों कों देखरहा थां। उसका क्रोध, उसकी भारी साँसें, उसका अपने होंठों कों काटना। आरवसमझ गय़ा कि उसकी दिदी भि उस रोमांटिक समय कां उतना हि मजा लेँ रही थि।
लगातार 15 मिनट तक बस केँ धक्कों औऱ रगड़ नें आरव कों उसकी बर्दाश्त कि अंतिम हद तक पहुंचा दिया थां।
उसकामन अब सुन्न होँ गय़ा थां। उसेबस मे खड़े लोगों कि कोई परवाह नहि थि। स्नेहा कां वोँ शरीर, उसकी वोँ गरम साँसें जौ आरव केँ चेहरे पऱ पड़रही थीं.आरव झड़ने वाला थां।
उसने अपनी आँखें बंदकर लीं। उसके जबड़े तनगए।
"दि." आरव केँ गले सें कांपती हुइ आवाज़ निकली जिसे केवल स्नेहा सुन सकती थि।
स्नेहा नें ऊपर देखा। आरव कां चेहरा लाल हौ रहा थां।
एक् औऱ ज़ोरदार झटका औऱ उसका जिस्म एक् सेकंड केँ लिए पूरीतरह सें अकड़ गय़ा।
स्नेहा कों अपनेपेट पर्र गीला महसूस हुआ।
आरव नें बहोत भारी मात्रा मे अपना वीर्य अपनी पैंट केँ अंदर हि डिस्चार्ज कर दिया।
स्नेहा वहींजम गई थि। उसे अचानक अपनेपेट केँ निचले हिस्से पर्र गर्माहट महसूस हुईँ। आरव कां वीर्य इतनी अधिक मात्रा मे औऱ इतने प्रेशर सें निकला थां कि वोँ आरव केँ पैंट कों पार करतेहुए सीधा स्नेहा केँ सफेद कुर्ते पऱ जाकरलग गय़ा थां।
स्नेहा कि आँखें चौड़ी होँ गईं। उसे वोँ गाढ़ा, गरम औऱ गीला वीर्य अपनेपेट औऱ जांघों केँ ऊपरी हिस्से पऱ साफ़ महसूस हौ रहा थां।
आरव पूरीतरह सें निढाल होकर स्नेहा केँ कंधे पर्र अपनासिर टिकाने हि वाला थां कि उसने स्वयं कों संभाला। उसने धीरे-धीरे सें अपनी आँखें खोलीं औऱ स्नेहा कों देखा।
स्नेहा कि नज़रें आरव केँ पेट कि तरफथीं, जहाँ दोनों केँ जिस्म जुड़े हुए थें। वोँ कुछबोल नहि पारही थि। बस मे इतनी भीड़ थि कि किसी एक् इंसान कों भि भनक नहि लगी।
स्नेहा नें आरव कि आँखों मे देखा। उसका दिमाग़ इससमय शॉक मे थां। उसके कुर्ते पर्र उस वीर्य कि गीली औऱ गरमपरत फैलरही थि। उसेआरव पऱ क्रोध करना चाहिए थां, उसे थप्पड़ मारना चाहिए थां। मगर वोँ ऐसाकुछ नहि करपाई।
तभीबस केँ कंडक्टर नें आवाज़ लगाई, "मावफलांग! मावफलांग।
bhay yeh kahani muze bahut pasand ayi bhay Keep it up bro Daily updates dete raho or ab sex bi Lao kahani mai like 4 behno ko ek saath yese scenes bi rakho baki jaisa apko acha Lage waise karo I like this kahani bro
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PART 13
मावफलांग केँ उसबस स्टैंड पऱ उतरने केँ बाद सें लेकर गेस्ट हाउस वापस पहुँचने तक, दोनों केँ बीच खामोशी छाई हुई थि।
स्नेहा बस सें उतरते हि तेज़ कदमों सें आगे-आगे चलरही थि। उसने एक् बार भि पलटकर आरव कि तरफ नहि देखा।
आरव उसके पीछे-पीछे चलरहा थां। उसेलग रहा थां कि आज उसने अपनी बेहन कि नज़रों मे अपनी इज़्ज़त हमेशा केँ लिएखो दि हैं। "दि अब मुझसे कभीबात नहि करेंगी। याँ शायद सुप्रिया दि कों सभीबता देंगी। "
साम केँ 6 बज चुके थें। कमरे मे दाखिल होते हि स्नेहा नें बिनाआरव कि तरफ देखे अपनाबैग ज़मीन पर्र पटका औऱ सीधा बाथरूम मे घुसकर द्वार (दरवाज़ा) अंदर सें लॉककर लिया।
आरव वहीं पलंग केँ किनारे ज़मीन पऱ धड़ाम सें बैठ गय़ा औऱ उसने अपनेबाल कसकर पकड़लिए।
बाथरूम केँ अंदर, स्नेहा आईने केँ सामने खड़ी थि। उसकी साँसें तेज़चल रहीथीं। उसने कांपते हाथों सें अपनाऊनी कुर्ता उतारा। कुर्ते केँ निचले हिस्से पऱ आरव केँ उस गाढ़े, सफेद औऱ चिपचिपे रस कां दागबन चुका थां।
स्नेहा कि बस केँ उससफर कां एक्-एक् समययाद आनेलगा। वोँ आरव कां पीछे सें चिपकना, उसके खड़ेहुए सख्त लन्ड औऱ फिन वोँ जोँ रसआरव नें उसकेपेट पर्र छोड़ा थां।
स्नेहा नें उस कुर्ते कों धोने केँ लिए बाल्टी मे डाला। उसका दिमाग़ एक् कशमकश मे थां।
"मुझेआरव पर्र क्रोध आनां चाहिए। उसने मेरेसंग कितनी गंदी हरकत कि हैं। वोँ मेरासगा भइया हैं! मगर.मगर क्याँ सच मे गलती केवल उसकी थि?" स्नेहा नें ठंडे पानी केँ छपाके अपने चेहरे पर्र मारे।
तभी स्नेहा कों बस केँ उस व्यक्ति कि यादआई जिस सें बचने केँ लिए उसने स्वयं आरव कों अपने पीछे खड़ा किया थां। "अगर मैंने आरव कों अपने पीछे नां बुलाया होता, तोँ। औऱ। आरव एक् जवान लड़का हैं। उस भीड़ मे, जब मेराबदन बार-बार उससे रगड़खा रहा थां। तौ वोँ होना तौ लाज़मी थां नाँ? उसने जानबूझकर तौ नहि किया। वोँ तौ स्वयं पीछे हटने कि कोशिश कररहा थां। "। मगर सबसे बड़ीबात जौ स्नेहा स्वयं सें भि छुपारही थि, वोँ यह थि कि जबआरव कां लन्ड उस पर्र रगड़खा रहा थां तोँ उसने स्नेहा कि बुर मे भि हलचल पैदाकर दि थि।
लगभगआधे घंटेबाद, स्नेहा एक् ढीला सां नाइटसूट पहनकर बाथरूम सें बाहर् आई।
कमरे कि लाइटबंद थि, केवल हीटर कि लाल रोशनी जलरही थि। आरव अभि भि वहीं ज़मीन पर्र बैठा थां। उसकासिर घुटनों केँ बीच थां। स्नेहा केँ बाहर् आते हि आरव जल्दी खड़ा होँ गय़ा। उसकी आँखें लालथीं, जैसे वोँ रोरहा थां।
कमरे मे कुछ मिनटों तक मात्र हीटर केँ चलने कि आवाज़ आतीरही। स्नेहा जाकर खामोशी सें खाट केँ एक् कोने पर्र बैठ गई। उसने अपनेपेर समेटलिए औऱ नज़रें नीचीकर लीं।
आरव सें अबयह दूरी बर्दाश्त नहि होँ रही थि। वोँ आहिस्ता चलकर स्नेहा केँ पास गय़ा औऱ उसके पैरों केँ पास ज़मीन पऱ घुटनों केँ बलबैठ गय़ा।
"दि." आरव कि आवाज़ गले मे हि फंस गई। वोँ बुरीतरह कांपरहा थां।
स्नेहा नें नज़रें उठाकर आरव कों देखा। आरव कि उन आँखों मे जोँ दर्द, जौ बेबसी थि, उसे देखकर किसी कां भि दिल पिघल जाता।
"मुझे क्षमा करदो दि." आरव नें अपने दोनों हाथ जोड़लिए। उसकी आँखों सें आँसूछलक पड़े। "मे। मेरा विश्वास करो, मैंने जानबूझकर कुछ नहि किया। मे बहोत गंदा हूं दि तुम् चाहो तोँ मुझेमार लो, सुप्रिया दि कों बतादो। पर्र प्लीज, मुझसे ऐसे नफरतमत करो। "
स्नेहा कां दिल अपने भइया कों इसतरह टूटते हुए देखकर भरआया। उसका सारा गुस्साजाने कहां गायब होँ गय़ा।
स्नेहा नें धीरे-धीरे सें अपनेहाथ आगे बढ़ाए औऱ आरव केँ बालों मे उँगलियाँ फंसादीं।
आरव नें सिर उठाया।
"शांत हौ जाआरव। रोनाबंद कर, " स्नेहा कि आवाज़ मे प्रेम थां।
स्नेहा नें आरव केँ गालों सें आँसू पोंछे। "मे जानती हूं आरव। वोँ जोँ भि हुआ, हालात कि वजह सें हुआ। मे समझती हूं कि कुछ चीज़ें इंसान केँ कंट्रोल मे नहि होतीं। तूने जानबूझकर तोँ नहि किया नाँ?"
"नहि दि! शपथ सें नहि।
"तौ बस.बात समाप्त, " स्नेहा। "मैंने तुम्हे क्षमा किया।
स्नेहा केँ मुँह सें यहबात सुनकर आरव केँ दिल पऱ रखाबोझ हट गय़ा। उसने बिनाकुछ सोचेआगे बढ़कर स्नेहा कों अपनी बाहों मे जकड़ लिया।
स्नेहा भि इसबार पीछे नहि हटी। उसने भि आरव कि पीठ पऱ अपनेहाथ रखदिए औऱ उसे कसकरगले लगा लिया।
आरव कां चेहरा स्नेहा कि गर्दन मे धंसाहुआ थां औऱ स्नेहा केँ बूब्स पूरीतरह सें आरव केँ सीने पर्र दबरहे थें।
माहौल अब पूरीतरह सें हल्का होँ चुका थां। आरव नें रूम सर्विस सें डिनर ऑर्डर किया।
टेबल पऱ फ्राइड राइस औऱ चिली चिकनरखा थां। दोनों संग बैठकर खानां खारहे थें।
आरव बार-बार स्नेहा कों देखरहा थां। उसे अभि भि यकीन नहि होँ रहा थां कि स्नेहा नें इतनी बड़ीबात कों इतनी आसानी सें क्षमा कर दिया। मगर वोँ यह नहि जानता थां कि स्नेहा स्वयं भि उस एहसास कों अंदर हि अंदर एन्जॉय कर चुकी थि।
"तोँ." स्नेहा नें चावल चबाते हुए अपनी आँखें छोटीकीं औऱ एक् शरारती अंदाज़ मे आरव कों देखा। "शिलॉन्ग कि लोकल बसों मे सफर करने कां मजा आँ गय़ा?"
आरव केँ मुँह मे फंसा निवाला रुक गय़ा। उसे ज़ोर सें खाँसी आँ गई।
"दि! आप् भि नां." आरव नें पानी पीतेहुए अपनालाल होता चेहरा छुपाया।
स्नेहा हँसने लगी। "क्याँ दि? मे तौ बसपूछ रही हूं।
स्नेहा जिस बेबाकी सें यह बातें कररही थि, उसनेआरव कों हैरान कर दिया।
"दि, आप् मुझे चिढ़ा रही हौ नाँ?, " आरव नें मुँह फुलाते हुएकहा।
"अरे बाबा! " स्नेहा नें मुस्कुराते हुए अपनापेर टेबल केँ नीचे सें आरव केँ पांव सें छुआ दिया। यह एक् बहोत हि कैज़ुअल सां टच थां, पऱ आरव केँ जिस्म मे फिन सें एक् झुरझुरी दौड़ गई।
डिनर केँ बादरात केँ लगभग 9:30 बजरहे थें।
स्नेहा रजाई मे घुसकर अपनी पुस्तक पढ़ने लगी। आरव भि अपने कपड़े बदलकर बैड केँ दूसरी तरफआकर लेट गय़ा।
"दि। आपकेपेर अभि भि दर्दकर रहे हें क्याँ?" आरव नें बहोत हि मासूमियत सें पूछा।
स्नेहा नें पुस्तक सें नज़र हटाई। "हम्म, थोडा सां। "
आरव रजाई केँ अंदर खिसककर थोडा स्नेहा केँ लगभग आँ गय़ा। "तौ लाओ, मे दबा देता हूं। "
"नहि आरव, आज तूँ भि थका हैं। रहनेदे, " स्नेहा नें मना किया।
पर्र आरव कहां मानने वाला थां। उसने रजाई केँ अंदर हि स्नेहा केँ पैरों कों पकड़ लिया औऱ उन्हें अपनीगोद मे रख लिया। स्नेहा नें कोई विरोध नहि किया।
आरव केँ हाथफिन सें स्नेहा कि उन नर्म औऱ गोरी पिंडलियों पऱ चलनेलगे। वोँ आहिस्ता मालिश करतेहुए स्नेहा कि जांघों केँ निचले हिस्से तक पहुँच गय़ा।
स्नेहा पुस्तक पढ़रही थि, पऱ उसका पूरा ध्यान आरव केँ उन हाथों पऱ थां।
"आरव." स्नेहा नें अचानक पुस्तक बंद कि औऱ आरव कि तरफपलट कर करवट लें ली।
"हाँ दि?" आरव नें भि मालिश रोककर उसकी आँखों मे देखा।
"तुँ गुवाहाटी जाकरयह सभी किसी कों बताएगा तोँ नहि नाँ? मेरा मतलब। वोँ बस वालीबात?"
"बिल्कुल नहि दि।। औऱ वैसे भि, अगर मे सुप्रिया दि कों बताऊँगा, तोँ वोँ मुझेघऱ सें निकाल देंगी। "
"तुँ बहोत चालाक होँ गय़ा हैं, " स्नेहा नें मुस्कुराते हुएआरव कि नाक खींची। "चलअबसो जा।
रात केँ 10 बज चुके थें। कमरे कि लाइटबंद होँ गई।
दोनों एक् हि रजाई केँ अंदर लेटे थें। थोड़ी देरबाद, स्नेहा हमेशा कि तरह नींद मे आरव कि तरफ खिसकआई। उसने अपना एक् हाथआरव केँ सीने पर्र रख दिया।
आरव नें भि प्रेम सें अपना एक् हाथ स्नेहा कि कमर पऱ रख लिया औऱ उसे स्वयं सें थोडा औऱ लगभगकर लिया।
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leech साहब, अपने प्रोफाईल मे आप् स्वयं कों ' मिस्टर जीरो ' बतारहे हें, मगर भइया साहब आप् जीरो तौ बहोत दूर कि कौड़ी हैं आप् एक् मंझेहुए बल्कि एक् प्रोफेशनल राइटर लगरहे हें।
जिसतरह आपनेइस इन्सेस्ट स्टोरी केँ अंदर परिवेश कां वर्णन किया हैं, जिसतरह घटित घटनाक्रम केँ संगसंग जगहों केँ नामों कां वर्णन किया हैं, जिसतरह मौसम कां वर्णन किया हैं, जिसतरह कां संवाद लिखा हैं औऱ जिसतरह भावनाओं कां वर्णन किया हैं वो एक् प्रोफेशनल राइटर हि कर सकता हैं।
बहोत हि शानदार लिखरहे हें आप्।
आरव नें अभि तक पहली मंजिल पऱ कदम नहींरखा हैं औऱ उसेचार मंजिल तक सफर करना हैं, ये वाकई मे बहोत कठिनसफर लगरहा हैं। बहरहाल देखते हें आरव कां इन्सेस्ट रूपीसफर क्याँ रूप अख्तियार करता हैं !
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