woh Sirf Meri Behene nahee – New Episode
PART 10
सर्द सुभहरूम कि खिड़की पर्र ओस कि परतें जमी हुइ थीं।
स्नेहा कि आँखें धीरे धीरे खुलीं। उसने नींद मे आँखें मलतेहुए रजाई केँ बाहर् देखा
"एक्। दो.तीन."
स्नेहा नें चश्मा पहना औऱ पलंग सें थोडा उठकर देखा। आरव ज़मीन पऱ, पलंग केँ ठीकपास 'पुश-अप्स' (Push-ups) लगारहा थां। उसने टी-शर्ट नहि पहनी थि। मात्र एक् ग्रेरंग केँ ट्रैक पैंट मे थां।
स्नेहा कि नज़रें आरव कि चौड़ी, कसी हुई पीठ औऱ उसके कन्धों पर्र जाकरटिक गईं। आरव केँ बाइसेप्स औऱ उसकीपीठ कि नसेंहर पुश-अप केँ संगतन रहीथीं। उसकेबदन पऱ पसीने कि हल्की-हल्की बूंदें चमकरही थीं।
आरव कि वोँ मर्दाना बनावट, उसकी भारी साँसें औऱ उसके पसीने सें उठती वोँ एक् अजीब सि मादकमहक। स्नेहा कां गलासूख गय़ा।
"चौरानवे (94)। पचानवे (95)." आरव नें रुककर अचानक अपनी गर्दन ऊपर कि औऱ स्नेहा कों घूरते हुए पकड़ लिया।
स्नेहा हड़बड़ा कर जल्दी रजाई मे छुपने लगी, मगर आरव नें उसेदेख लिया थां।
आरव अपनी स्थान सें उठा औऱ अपना पसीना तौलिये सें पोंछते हुएबैड केँ पासआकर खड़ा हौ गय़ा।
"क्याँ बात हैं डॉक्टर साहिबा? मानना पड़ेगा, आप् घूरती बहोत क्यूट तरीके सें हौ। "
"आरव!!!" स्नेहा नें पासरखा तकिया उठाया औऱ आरव पर्र फेंका।
आरव नें तकिया हवा मे हि कैचकर लिया। "अच्छा बाबा, सॉरी। जाइए आप् नहा लीजिए। 8 बजने वाले हें, सेमिनार केँ लिएलेट हौ जाओगी। "
नहाने केँ बाद स्नेहा रेडी होकरआई। उसने एक् हल्का गुलाबी ऊनी कुर्ता औऱ सफेद लेगिंग पहनी थि। वोँ जल्द-जल्द अपनाबैग पैककर रही थि, मगरउसे अपने सबसे ज़रूरी प्रैक्टिकल नोट्स नहि मिलरहे थें।
"दोस्त! मेरे नोट्स कहां गए?आरव, तूने मेरे नोट्स देखे क्याँ? वोँ नीलेकवर वाली फाइल!" स्नेहा पूरे कमरे मे किताबें उलट-पलट रही थि।
आरव धीरे-धीरे कुर्सी पर्र बैठा एक् सेबखा रहा थां। "मुझे क्याँ पता दि? आप् हि कहींभूल गई होंगी। "
"आरव मज़ाक मतकर। आज प्रोफेसर्स फाइलचेक करेंगे।
आरव कों स्नेहा कि यह घबराई हुईँ शक्ल बहोत क्यूट लगरही थि। उसने एक् हाथ सें अपनी जैकेट केँ अंदर सें वोँ नीलेरंग कि फाइल निकाली। "यह ढूंढरही हौ?"
स्नेहा नें आरव कों देखा औऱ उसकाखून खौलउठा। "तूने मेरी फाइल छुपाई थि? कमीने! दे मुझे!"
स्नेहा आरव कि तरफ झपटी, मगर आरव अपनी कुर्सी सें उछलकर खड़ा हौ गय़ा औऱ फाइल कों अपनेसिर केँ ऊपर ऊँचाकर लिया। स्नेहा कि कदआरव सें कम थि। वोँ अपने पंजों केँ बल खड़ी होकर फाइल पकड़ने कि कोशिश करनेलगी।
"आरव! प्लीज़! मुझेलेट होँ रहा हैं!" स्नेहा आरव कि टी-शर्ट खींचते हुएउछल रही थि।
"ऐसे नहि दि। पहलेकहो 'आरव मेरा सबसे प्यारा भइया हैं औऱ मे उसेकभी नहि डांटूंगी',
"तुँ सबसे बड़ागधा हैं दुनिया कां!" स्नेहा नें गुस्से मे आरव कि पसली (ribs) मे अपनी उँगलियों सें ज़ोर सें गुदगुदी कर दि।
" अरे दि! रुको!"आरव कों गुदगुदी बहोत लगती थि। वोँ फाइल बचाने केँ चक्कर मे पीछे कि तरफहटा औऱ उसका पांव कारपेट मे उलझ गय़ा।
आरव सीधाखाट पऱ गिरा औऱ स्नेहा, जौ उसकी टी-शर्ट पकड़े हुए थि, वोँ भि उसकेठीक ऊपरआकर गिर गई।
कमरे मे एकदम सन्नाटा छा गय़ा।
स्नेहा पूरीतरह सें आरव केँ ऊपर लेटी हुई थि। आरव केँ पर्र स्नेहा केँ गदराए हुए उभार बुरीतरह सें दबगए थें। स्नेहा कां चेहरा आरव कि गर्दन केँ पास थां। आरव कि हँसी अचानक गायब होँ गई। उसने अपने दोनों हाथों सें स्नेहा कि पतलीकमर कों कसकर पकड़ लिया, जैसे वोँ उसे गिरने सें बचारहा होँ।
स्नेहा केँ दिल कि धड़कन अचानक 1 भागने लगी। आरव कि वोँ खुशबू, उसके हाथों कि वोँ मज़बूत औऱ पकड़ जौ उसकीकमर पऱ थि। स्नेहा कों पहलीबार अपनेइस छोटे भइया केँ छुअन मे एक् 'मर्द' कां एहसास हुआ।
उसकामन जौ हमेशा साइंस औऱ लॉजिक सें चलता थां, आजउसे धोखादे रहा थां। "यह मुझे क्याँ होँ रहा हैं? ' मेरा ब्लड प्रेशर इतनी तेज़ी सें क्यूं बढ़रहा हैं? आरव तौ मेरा भइया हैं। फिन मेरी साँसें क्यूं फंसरही हें?" स्नेहा नें अपनेमन मे सोचा।
आरव नें स्नेहा कि आँखों मे देखा। "दि। अगर.
वोँ हड़बड़ा करउठी। उसका चेहरा टमाटर सें भि अधिकलाल हौ गय़ा थां। उसनेआरव केँ हाथ सें फाइल झपटी औऱ नज़रें चुराते हुए अपनाबैग उठाने लगी।
"मे। मे सेमिनार केँ लिएजा रही हूं। तुँ बाहर् मत घूमना, " स्नेहा नें बिनाआरव कि तरफ देखेकहा औऱ दरवाज़े कि तरफ भागी।
आरव पलंग पर्र लेटाहुआ उसे जातेहुए देखरहा थां। उसे स्नेहा केँ चेहरे कां वोँ ब्लश (Blush) औऱ उसकी वोँ घबराहट बहोत अच्छी तरहसमझ आँ गई थि।
दोपहर केँ 1:30 बजरहे थें। सेमिनार हॉल मे लञ्च ब्रेक हुआ थां। स्नेहा अपनीदो सहेलियों, रिया औऱ अंजलि केँ संग कैंटीन कि तरफजा रही थि। तभी उसने देखा कि सेमिनार हॉल केँ मेनगेट पर्र आरव खड़ा हैं।
आरव नें एक् ब्लैक डेनिम जैकेट, सफेद टी-शर्ट औऱ नीली जींस पहनी थि।
"स्नेहा। ओए स्नेहा! गेट पर्र देख, वोँ लड़काकौन हैं दोस्त? कितना हॉटलग रहा हैं!" रिया नें स्नेहा कि कोहनी मारते हुएकहा।
"हाँ दोस्त, शपथ सें।, " अंजलि नें भि आरव कों घूरते हुएकहा।
स्नेहा नें आरव कों देखा। उसे अपनी सहेलियों केँ मुँह सें आरव कि यह तारीफ सुनकर अचानक अंदरजलन महसूस हुईँ। उसे क्रोध आनेलगा कि उसकी सहेलियां आरव कों ऐसे क्यूं ताड़रही हें।
"वोँ मेरा छोटा भइया हैं आरव। औऱ तुम् दोनों अपनी नज़रें नीचीरखो, " स्नेहा नें थोडा चिढ़ते हुए, कहा।
रिया औऱ अंजलि कां मुँह खुलारह गय़ा। "तेरा भइया? दोस्त स्नेहा, तूनेकभी बताया नहि कि तेरा भइया इतना हैंडसम हैं।
स्नेहा भारी कदमों सें आरव केँ पास पहुँची। रिया औऱ अंजलि भि उसके पीछे-पीछे आँ गईं।
"तुँ यहा क्याँ कररहा हैं आरव?" स्नेहा नें थोडा सख्ती सें पूछा।
आरव नें मुस्कुराते हुए एक् टिफिन बॉक्स आगेकर दिया। "दि, आप् सुभह ब्रेकफास्ट नहि आईथीं। मुझेपता थां कि कैंटीन कां खानां आपको पसन्द नहि आएगा, इसलिये लाया हूं। एकदमगरम हें। "
तभी रियाआगे आई। "अरे आरव! मे रिया हूं, स्नेहा कि फ्रेंड। स्नेहा सच मे बहोत लकी हैं कि उसे तुम्हारे जैसा केयरिंग। औऱ हैंडसम भइया मिला हैं। "
आरव नें भि एक् चार्मिंग स्माइल दि। "थैंकयू रिया। स्नेहा दि तोँ मेरीजान हें। मुझे इनका ध्यान तोँ रखना हि पड़ेगा। "
आरव कां रिया कों देखकर मुस्कान बिखेरना स्नेहा कों बिल्कुल बर्दाश्त नहि हुआ।
स्नेहा नें जल्दी आरव कां हाथ रिया केँ हाथ सें छुड़वाया औऱ उसे अपनीतरफ खींचा। "तेरा होँ गय़ा? खानां दे औऱ चुपचाप वापस गेस्ट हाउसजा। यहा लड़कियों केँ सामने अपने दाँत दिखाने कि ज़रूरत नहि हैं। "
"ओकेबॉस। जारहा हूं। खानां पूराखा लेना, "आरव नें हँसते हुए स्नेहा केँ गाल पऱ हल्का सां थपथपाया औऱ वहा सें चला गय़ा।
रिया औऱ अंजलि स्नेहा कों ताड़रही थीं। "स्नेहा, हमनेबस हाथ हि तौ मिलाया थां!"
स्नेहा नें नज़रें चुराईं। "चुपकर तुम् दोनों। वोँ बच्चा हैं अभि। " स्नेहा नें टिफिन पकड़ा औऱ कैंटीन कि तरफचली गई, मगर उसकेदिल कि धड़कन अभि भि तेज़ थि।
साम कों आरव स्नेहा कों लेकर वापस गेस्ट हाउसआया। आज स्नेहा कुछ ज्यादा हि चुप-चुप सि थि। वोँ बार-बार आरव कों चोरी-छिपे देखरही थि।
"दि, आप् फ्रेश हौ जाओ। मे गरमचाय औऱ पकोड़े मंगाता हूं, " आरव नें स्नेहा कां बैग टेबल पऱ रखतेहुए कहा।
स्नेहा जब फ्रेश होकरआई, तोँ आरव नें बालकनी मे दो कुर्सियां लगारखी थीं। बाहर् हल्की-हल्की बारिश हौ रही थि औऱ शिलॉन्ग कि वोँ साम बहोत हि रोमांटिक लगरही थि।
दोनों बालकनी मे बैठेगरम चायपी रहे थें। ठंड बहोत थि। स्नेहा बार-बार अपने हाथों कों रगड़रही थि।
आरव नें अपनागरम चाय कां कपरखा। बिनाकुछ कहे उसने अपनी कुर्सी स्नेहा केँ बिल्कुल लगभग खिसकाई। उसने स्नेहा केँ दोनों ठंडे हाथों कों अपनेगरम हाथों मे लें लिया औऱ उन्हें बहोत प्रेम सें मलनेलगा।
"इतनीठंड हैं दि, फिन भि आपको ग्लव्स पहनने कि याद नहि रहती, "आरव नें स्नेहा कि आँखों मे गहराई सें देखते हुएकहा।
स्नेहा कि साँसें फिन सें भारी होने लगीं। आरव केँ हाथों कि गर्माहट सीधे उसके जिस्म केँ हरपोर मे उतररही थि। आरव केँ अँगूठे स्नेहा कि हथेलियों कों बहोत हि नरमी सें सहलारहे थें।
"आरव। मे ठीक हूं." स्नेहा नें अपनी आवाज़ कों स्थिर रखने कि कोशिश कि, मगर वोँ कांपरही थि। औऱ वोँ कंपकंपी ठंड कि वजह सें नहि थि।
"झूठमत कहो दि। आपकेहाथ बर्फ जैसे हौ रहे हें, " आरव नें स्नेहा केँ हाथों कों अपने होंठों केँ लगभग लेँ जाकरउन पर्र अपनीगरम साँसें छोड़ीं। आरव कि वोँ गरम साँसें जब स्नेहा कि हथेलियों पर्र पड़ीं उसकी नज़रें आरव केँ होंठों पर्र जाकरटिक गईं।
"मुझे क्याँ होँ रहा हैं? यहगलत हैं। आरव मेरा भइया हैं। मगर। मुझे। मुझेयह सभी इतना अच्छा क्यूं लगरहा हैं?" स्नेहा कां मन पूरीतरह सें उलझ चुका थां। वोँ अपनेइस अट्रैक्शन कों 'ऑक्सीटोसिन हॉर्मोन' (Oxytocin Hormone) कां नाम देकर स्वयं कों बेवकूफ बनाने कि कोशिश कररही थि, मगर उसकाबदन आरव कि इस छुअन कां भूखा होताजा रहा थां।
आरव नें स्नेहा केँ हाथों कों छोड़ते हुए अपनी जैकेट कां ज़िप खोला औऱ अपनी जैकेट उतारकर स्नेहा केँ कंधों पऱ डाल दि।
"अबठीक हैं?" आरव नें मुस्कुरा कर पूछा।
स्नेहा नें मात्र अपनासिर 'हाँ' मे हिलाया।
रात केँ 10 बजरहे थें। दोनों पलंग पऱ लेटेहुए थें। रूम हीटर कि वजह सें गरम थां।
स्नेहा अ पुस्तक पढ़रही थि, मगर उसका ध्यान पुस्तक मे बिल्कुल नहि थां। वोँ बार-बार तिरछी नज़रों सें आरव कों देखरही थि
तभी स्नेहा कि पुस्तक अचानक उसकेहाथ सें फिसलकर सीधी उसके मुँह पर्र आँ गिरी।
"आउच!" स्नेहा नें दर्द सें हल्की चीखभरी। पुस्तक कां भारी कोना उसकीनाक पऱ लगा थां।
आरव नें जल्दी स्नेहा केँ पासआया। "क्याँ हुआ दि? दिखाओ!"
स्नेहा अपनीनाक पकड़कर बैठी थि। "दोस्त आरव, बहोत ज़ोर सें लगी। "
आरव नें स्नेहा केँ हाथों कों हटाया। स्नेहा कि नाक हल्की सि लाल होँ गई थि। आरव कों उसे देखकर हँसी आँ रही थि।
! दि! आप् सच मे दुनिया कि पहली डॉक्टर होंगी जौ अपनी हि पुस्तक सें घायल होँ गई!"
"कमीने! मुझे दर्द होँ रहा हैं औऱ तूँ हँसरहा हैं?" स्नेहा नें गुस्से मे आरव कि छाती पऱ मुक्के मारना शुरुआत कर दिया।
आरव नें हँसते हुए स्नेहा केँ दोनों हाथों कों पकड़ लिया औऱ उसे अपनीतरफ खींच लिया।
"अच्छा सॉरी। सॉरी दि, " आरव नें कहा। फिन उसने बहोत हि प्रेम सें स्नेहा कि लालनाक पर्र फूँक मारी। "फूssss। अबठीक हैं?"
आरव कि इस छोटी सि, क्यूट सि हरकत स्नेहा एकदम शांत होँ गई। वोँ आरव कि आँखों मे देखरही थि। आरव भि उसेदेख रहा थां। दोनों केँ बीच कि दूरी करीब-करीब ख़त्म होँ चुकी थि।
कमरे केँ उस सन्नाटे मे, जहाँ केवल हीटर कि आवाज़ आँ रही थि।
"आरव." स्नेहा नें बहोत हि धीमी आवाज़ मे कहा।
"हाँ दि?" आरव नें अपनी पकड़ थोड़ी औऱ ढीली कि, मगर स्नेहा नें अपनेहाथ नहि हटाए।
"तुँ। तूँ हमेशा मेरेसंग रहेगा नाँ?" स्नेहा नें अपनी मासूम औऱ बड़ी-बड़ी आँखों सें पूछा।
। उसने स्नेहा केँ माथे पऱ एक् बहोत हि प्रेम भरा, लंबा चुंबन (Kiss) दिया।
"मे आपके बिना साँस भि नहि लेँ सकता स्नेहा दि। मे हमेशा, हमेशा आपकेसंग रहूँगा।
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PART 11
शिलॉन्ग कि सुभह हमेशा कि तरह अपनेसंग एक् जमा देने वालीठंड लेकरआई थि सुभह केँ 7 बजरहे थें।
स्नेहा आज जल्दउठ गई थि। उसेआज शिलॉन्ग सें थोडा दूर एक् रूरल हेल्थ क्लिनिक मे फील्ड विज़िट केँ लिए जानां थां। वोँ नहाकर बाहर् आई औऱ कुछ ढूँढने लगी। उसने पूराबैग छान मारा, बैड केँ नीचेदेख लिया, मगर उसे जोँ चाहिए थां वोँ नहि मिलरहा थां।
"दोस्त! मेरी जुराबें कहां गईं?कल रात तोँ मैंने यहीं टेबल पर्र रखीथीं, " स्नेहा ठंड सें कांपते हुए बड़बड़ा रही थि। उसने एक् सफेदरंग कां वूलेन कुर्ता औऱ काली जींस पहनी थि, मगर पैरों मे कुछ नाँ होने कि वजह सें मार्बल कां फर्शउसे बर्फ जैसालग रहा थां।
तभी बाथरूम कां द्वार (दरवाज़ा) खुला औऱ आरव बाहर् आया। वोँ ब्रशकर रहा थां। उसने एक् ढीला सां ट्रैक पैंट पहनाहुआ थां औऱ ऊपर एक् टी-शर्ट।
स्नेहा नें चिढ़ते हुएआरव कि तरफ देखा। "आरव! तूने मेरी पिंक सॉक्स देखीं क्याँ? मेरेपेर सुन्न हौ रहे हें। "
आरव नें ब्रश करतेहुए 'नाँ' मे हिलाया औऱ बेसिन कि तरफ जानेलगा। मगर जैसे हि वोँ मुड़ा, स्नेहा कि नज़रआरव केँ पैरों पऱ गई।
आरव केँ पैरों मे स्नेहा कि वोँ छोटी सि, क्यूट औऱ ब्राइट पिंकरंग कि जुराबें फंसी हुईँ थीं। चूँकि वोँ जुराबें आरव केँ पैरों केँ हिसाब सें बहोत छोटीथीं, इसलिये वोँ केवल उसकी एड़ियों तक हि आँ रहीथीं
स्नेहा कि आँखें बड़ी हौ गईं। "कमीने!! तूने मेरी जुराबें क्यूं पहनी हें? निकाल अभि!"
आरव नें जल्द सें कुल्ला किया"अरे दि! मुझे भि तौ ठंडलग रही हैं नां। औऱ यह पिंककलर मुझ पऱ कितना सूटकर रहा हैं, देखो तौ!"
"आरव केँ बच्चे! वोँ मेरेपेर केँ साइज़ कि हें, ! रुक तूँ!" स्नेहा नें पासरखा तौलिया उठाया औऱ आरव कों मारने केँ लिए उसके पीछे दौड़ पड़ी।
स्नेहा नें आखिरकार आरव कि टी-शर्ट पीछे सें पकड़ली औऱ उसेखाट पऱ गिरा दिया।
"निकाल गधे! मेरे पांवजम रहे हें, " स्नेहा हँसते हुएआरव केँ पेर सें वोँ गुलाबी जुराबें खींचने लगी।
इस खींचातानी मे स्नेहा कां संतुलन बिगड़ा औऱ वोँ आरव केँ पैरों केँ पास हि पलंग पर्र गिर गई। दोनों हँसरहे थें।
स्नेहा नें हँसते हुए अपनेबाल पीछेकिए। वोँ आरव कों देखरही थि जौ अभि भि मुस्कुरा रहा थां।
"यह लड़का कितना प्यारा हैं। औऱ " स्नेहा नें अपनेमन मे सोचा। आरव कि यह बचकानी हरकतें, उसकी वोँ प्यारी सि स्माइल। स्नेहा कों आरव केँ आस-पास होने सें एक् चैन मिलने लगा थां। यह स्नेहा केँ दिल कों अपनीतरफ खींचरहा थां।
"अच्छा बाबा, लो पहनलो। वैसे भि मेरे पांव कि उँगलियाँ दब गई थीं इसमें, " आरव नें हँसते हुए जुराबें स्नेहा कि तरफ फेंकदीं।
" स्नेहा नें मुस्कुराते हुए जुराबें पहनीं औऱ रेडी होनेलगी।
सुभह केँ 8:30 बजरहे थें। दोनों नें जल्द सें ब्रेकफास्ट किया।
"दि, आज कहां जानां हैं? सेमिनार हॉल तोँ बंद हैं शायद, "आरव नें अपनी जैकेट कि ज़िपबंद करतेहुए पूछा।
स्नेहा नें अपनी फाइलें बैग मे डालते हुएकहा, "हाँ, आज हमें 'मावफलांग' केँ पास एक् गाँव केँ क्लिनिक मे जानां हैं प्रोफेसर्स नें कहा हैं। हमें पुलिस बाज़ार सें लोकलबस लेनी पड़ेगी। "
"लोकल बस?."ठीक हैं दि, चलिए , " आरव।
दोनों बस स्टैंड पहुँचे। बस स्टैंड लोगों सें खचाखच भराहुआ थां।
आरव नें स्नेहा कां हाथ अपने एक् हाथ मे पकड़ लिया। वोँ बार-बार आरव केँ उसहाथ कों देखरही थि जिसने उसे इतनी मज़बूती सें, मगर प्रेम सें पकड़ा हुआ थां।
"मावफलांग! मावफलांग!!" एक् बस कां कंडक्टर दरवाज़े पर्र लटकते हुए चिल्ला रहा थां।
"दि, वोँ रहीबस! चलिए!"आरव नें स्नेहा कों आगे किया औऱ स्वयं उसके पीछे-पीछे बस केँ दरवाज़े तक पहुंचा।
बस पूरीतरह सें भरी हुईँ थि। बैठने केँ लिए तौ छोड़ो, खड़े होने केँ लिए भि मुश्किल सें स्थान थि। आरव नें भीड़ कों थोडा साइड किया औऱ स्नेहा कों बस केँ अंदर चढ़ा दिया।
लोग एक्-दूसरे सें बिल्कुल चिपककर खड़े थें।
आरव औऱ स्नेहा बस केँ बीचों-बीच पहुँच गए। आरव नें स्नेहा कों खिड़की वाली साइड कि सीट केँ हैंडल केँ पास खड़ाकर दिया औऱ स्वयं उसके थोडा सां आगे, कंडक्टर वाली साइड मुँह करके खड़ा होँ गय़ा ताकिआगे सें आने वाले लोगों केँ धक्के स्नेहा कों नाँ लगें। स्नेहा नें ऊपर वालीरॉड पकड़ली थि।
बस नें झटके केँ संग चलना शुरुआत किया। पहाड़ी रास्तों पर्र बस बुरीतरह सें हिलरही थि। हर झटके केँ संगलोग एक्-दूसरे पर्र गिररहे थें।
आरव बार-बार पलटकर स्नेहा कों देखरहा थां। "दि, ठीक हौ नां?
स्नेहा मुस्कुरा करसिर हिला देती, "हम्म, ठीक हूं। " उसेआरव कि यह फिक्र बहोत प्यारी लगरही थि।
मगरतभी बस एक् स्टॉप पऱ रुकी औऱ कुछ औऱ लोग अंदरचढ़ गए।
स्नेहा केँ ठीक पीछे एक् अधेड़ उम्र कां व्यक्ति आकर खड़ा होँ गय़ा।
बसफिन सें चली। एक् मोड़आया औऱ वोँ व्यक्ति अचानक स्नेहा कि तरफ गिरा। स्नेहा कों लगा कि शायदबस केँ झटके कि वजह सें ऐसाहुआ हैं। उसने थोडा आगे खिसकने कि कोशिश कि, मगरआगे स्थान नहि थि।
कुछ हि सेकंड बाद, बस सीधी मार्ग पर्र चलरही थि, मगर स्नेहा कों महसूस हुआ कि उस व्यक्ति कां हाथ जानबूझकर स्नेहा कि कमर पऱ रगड़खा रहा हैं।
स्नेहा कां जिस्म एकदम सें सुन्न पड़ गय़ा। जोँ लड़कियाँ बसों मे सफर करती हें, वोँ 'गलती सें लगने वाले धक्के' औऱ 'जानबूझकर किएगए टच' केँ बीच कां फर्क एक् सेकंड मे समझ जाती हें।
स्नेहा नें गुस्से मे पीछे मुड़कर देखा। वोँ व्यक्ति नज़रें चुराकर बाहर् देखने कां नाटक करनेलगा।
स्नेहा नें स्वयं कों शांत किया। उसने सोचा शायदअब वोँ ऐसा नहि करेगा।
मगर वोँ रुकने वाला नहि थां। जैसे हि बस नें ब्रेक मारा, उस व्यक्ति नें अपना पूरा जिस्म, अपनी जांघें स्नेहा कि पीठ औऱ उसके कूल्हों पऱ बुरीतरह सें सटादीं।
स्नेहा केँ दिल कि धड़कन तेज़ हौ गई। उसकी साँसें अटकने लगीं। उसने अपने दाँतपीस लिए। उसकामन किया कि वोँ पलटकर उस व्यक्ति केँ मुँह पर्र एक् ज़ोरदार तमाचा मारे।
मगर तभी उसकी नज़र अपनेठीक आगे खड़ेआरव पर्र गई।
आरव एक् हाथ सें रॉड पकड़े हुए थां औऱ उसकी नज़रें बाहर् थीं।
"अगरआरव कों भनक भि लग गई कि इस व्यक्ति नें मुझेगलत तरीके सें छुआ हैं। तोँ आरवइसे ज़िंदा नहि छोड़ेगा। बस मे लड़ाई हौ जाएगी। आरव कां करियर खराब हौ जाएगा
स्नेहा जानती थि कि आरव अपनी बहनों कों लेकर कितना पजेसिव हैं। वोँ किसी भि हद तक जा सकता थां।
पीछे खड़ा वोँ व्यक्ति अब औऱ हिम्मत जुटारहा थां। उसकाहाथ स्नेहा केँ कुर्ते केँ ऊपर सें उसकीकमर कों सहलाने कि कोशिश कररहा थां। स्नेहा किसी भि तरहउस व्यक्ति सें बचना थां, मगर बिनाकोई हंगामा मचाए।
स्नेहा नें आरव कि जैकेट कों पीछे सें ज़ोर सें खींचा।
आरव नें जल्दी पीछेपलट कर देखा। स्नेहा कां चेहरा उतराहुआ थां औऱ वोँ थोड़ी डरी हुई लगरही थि।
"क्याँ हुआ दि? क्याँ हुआ? किसी नें कुछकहा क्याँ?" आरव।
"नहि। नहि आरव.कुछ नहि, " स्नेहा नें आरव कों शांत करने केँ लिए एक् झूठी स्माइल दि। उसनेआरव कां हाथ पकड़कर अपनीतरफ खींचा।
"आरव.तुम्। तुम् एक् कामकरो, " स्नेहा नें आरव कि आँखों मे देखते हुए बहोत हि धीमी आवाज़ मे कहा, "तुम् इधर आँ जाओ। मेरे पीछे खड़े होँ जाओआरव। प्लीज। "स्नेहा नें बहोत हि मासूमियत सें हुएकहा।
आरव कों यहबात थोड़ी अजीबलगी। मगर स्नेहा कि उस रिक्वेस्ट देखकर आरव सें मना नहि किया गय़ा। वोँ यहसमझ नहि पाया कि स्नेहा केँ पीछेकोई उसेछू रहा हैं, उसेलगा भीड़ कि वजह सें स्नेहा परेशान हैं।
"ठीक हैं दि, आप् आगे हौ जाओ, "आरव नें कहा।
स्नेहा थोड़ी सि आगे खिसकी। वोँ जोँ व्यक्ति स्नेहा केँ पीछे खड़ा थां, आरव नें उसे एक् धक्का देकर पीछे खिसका दिया। वोँ व्यक्ति चुपचाप बस केँ पिछले हिस्से कि तरफ खिसक गय़ा।
अबआरव स्नेहा केँ ठीक पीछे आँ चुका थां।
स्थान इतनीकम थि कि आरव कों स्नेहा केँ बिल्कुल सटकर खड़ा होना पड़ा। आरव नें अपने दोनों हाथ स्नेहा केँ कंधों केँ दोनों तरफ सें निकालकर ऊपर वालीरॉड कों पकड़ लिया।
इस पोज़ीशन मे आरव कां सीना स्नेहा कि पीठ सें पूरीतरह सें चिपक गय़ा थां।
वोँ व्यक्ति अबदूर थां। स्नेहा नें राहत कि साँस li। उसेआरव कि छाती कि गर्माहट अपनीपीठ पऱ महसूस हौ रही थि। आरव कि साँसें स्नेहा केँ बालों मे पड़रही थीं।
आरव स्नेहा केँ इतना लगभग थां कि वोँ उसकीदिल कि धड़कन महसूस कर सकता थां। बिनाकुछ किए, स्नेहा स्वयं आरव कि बाहों मे आँ गई थि।
बस नें एक् औऱ ज़ोरदार झटका लिया, औऱ इसबार स्नेहा कां पूराबदन पीछे कि तरफआरव केँ सट गय़ा।
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